1. ई- साहित्य प्रकाशन करना
2. ई-पत्रिका 'कथा-व्यथा' का प्रकाशन
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सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक विषयों का खुला मंच


इस ब्लॉग पर लिखने के लिये अपना पूरा परिचय हमें मेल करें। हमारा email: ehindisahitya@gmail.com है। - शम्भु चौधरी

मंगलवार, २९ जुलाई २००८

जन्मदायिनी माँ की आंख में आंसू क्यूँ


कन्या: जगत की
जीवनदायिनी शक्ति क्यूँ ?
शापित जनम से,
जन्म लेने के
अधिकार से वंचित क्यूँ ?
प्रकृति का कोमल उपहार
भोर की उजली किरण
जीवन की प्रथम कलि
खिलने से पहले ही मुरझाने को
विवश क्यूँ ?
कन्या: माँ, बेटी, बहन है
जन्मदायिनी माँ की आंख में
आंसू क्यूँ ।



Neelima Garg,
B-Block Nehru Colony ,
Dehradun,UTTARAKHAND

E-mail: neel_garg22@rediffmail.com



पटना से श्री सुरज कुमार वर्मा का एक पत्र डाक द्वारा आज ही प्राप्त हुआ। आपने अपने विचार भ्रूण ह्त्या पर लिखें हैं। इनका मानना है कि भ्रूण में पल रहा बच्चा मीरा, सहजो या लक्ष्मी बाई भी हो सकती है। कल्पना चावला या किरण वेदी भी बन सकती है। ऎसा सोचकर उसे जन्म दे, धरती पर आने दें। आप आगे लिखते हैं कि किसी अनैतिक संबंध के चलते हुऎ गर्भाधारन को समाज की मान्यता न होने से उसका गर्भपात विवशता हो सकती है, परन्तु यह भी अध्यात्म की दृष्टी से पाप ही माना जायेगा। समाज में यह गलत घर कर गया है कि बेटी होने से खर्च बढ़ जायेगा। जबकि बेटा बुढ़ापे का सहारा बनकर सहयोग देगा, शरीर समाप्त हो जाने के बाद मुखाग्नी देगा। यह हमारी सामाजिक परम्परा की सबसे बड़ी कमजोरी है। समाज के सभी वर्ग को मिलकर इस वातावरण में परिवर्तन लाना होगा। - सुरज कुमार वर्मा, गोसोई टोला, पटलिपुत्र , पटना -13

सोमवार, २८ जुलाई २००८

शम्भु चौधरी की चार झणिका

1. कलतक उस बुढ़िया ने
बहु पर जुल्म ढहाये
आज बुढ़ापे में
बहु ने किस्तों में चुकाएं।


2. उसने पहाड़ को इस तरह
नीचा दिखाया,
पाहड़ पर खड़ा हो
अपना झंण्डा लहराया।


3. देखो ये कैसी रीत आई
उसने खुद की इज्जत देकर
अपनी
इज्जत बचाई ।


4. एक दल वाले ने
दूसरे दल से हाथ मिलाया
फिर दोनों ने मिलकर
संसद को 'दलदल' बनाया ।

[shambhu choudhay]

शनिवार, २६ जुलाई २००८

मैं एक माँ हूँ


इन्दीरा चौधरी



प्रताड़ना, उपेक्षा, दुत्कार,
दुर्वचन, अवहेलना, तिरस्कार,
अपमान, छिन-भिन्न कर दे ?
निजता को,
व्यक्तिता को,
शांत रहे तो कैसे ?
शान्ति
अशान्ति,
कोई वार्तालाप,
कोई विनय नहीं,
केवल आक्रोश
विरोध के स्वर चुप-चाप,
स्वयं को ढालने, गलाने,
तपाने से कुछ नहीं हाथ आया
एवं
भीतर की ओर,
स्वयं को जानने का प्रयत्न किया
मिथ्या अहम मिटा,
अलौकिक लौकिक अनुभति ।

शुक्रवार, २५ जुलाई २००८

कथा-व्यथा

एक साहित्यिक 'कथा-व्यथा'नाम से एक ई-पत्रिका का प्रकाशन करने का निर्णय 'ई-हिन्दी साहित्य सभा' द्वारा लिया गया है।
इस पत्रिका का पहला अंक 15 अगस्त के दिन जारी किया जायेगा। आप सभी से निवेदन है कि आप इस पत्रिका हेतु अपने लेख/विचार/कहानी/ कविता व चित्र इत्यादि हमें 10 अगस्त तक भेज देवें। हमारा मेल पता पुनः नोट कर लेवें:
मेल भेजते वक्त "कथा-व्यथा" जरूर लिखे। -शम्भु चौधरी
ehindisahitya@gmail.com

गुरुवार, २४ जुलाई २००८

तो फिर इस भ्रूण की हत्याऎ क्यों? - राजिया मिर्जा

भ्रूण हत्या विषय पर महेश जी के लेख से संपूर्ण सहमत हुं। हम लोग जब लक्ष्मीजी, पार्वतीजी, कालिकाजी अम्बाजी जैसी देवीओं को 'मां' के रूप में पूजते है। तो फिर इस भ्रूण की हत्याऎ क्यों? - राजिया मिर्जा

कटक से श्री रमेश जी ने एक नई कविता भेजी है:
अजन्मी बच्ची की व्यथा -
क्यों मां क्यों बाबा
क्यों तुमने मुझे मिटा दिया
अपनी ममता अपने जीवन से
क्यों तुमने मुझे जुदा किया
मैं इक लडकी हूँ
ये तो मेरा अपराध न था
जिसने दिया मुझे ये रूप
क्यों उस ईश्वर को तुमने क्षमा किया
क्यों लड़के की चाहत में
तुमने इस निरिह के प्राण हरे
क्यों भ्रूण से
अस्पताल के कूडेदान भरे
क्यों ना कांपे हाथ डाक्टर के
जिसने मुझे बलिदान किया
क्यों चंद सिक्कों की खातिर
पेशा उसने अपना निलाम किया
क्यों किसी का ह्रदय ना रोया
दादा-दादी का प्यार क्यों सोया
उनकी इक चाहत की खातिर
क्यों मैने अपना सब कुछ खोया
मैं इक लडकी ये मेरी गलती न थी
गलती मेरे मां बाप की
उस ईश्वर की
जिसने मुझे यूं जन्म दिया
मैं पूछूं संगी से अपने
क्यों फ़िर मेरा ही खून हुआ
क्यों ना ईश्वर का सिंहासन डोला
ना धरती का सीना फटा
क्यों गंगा भी मौन रही
क्यों पर्वत हिमालय रहा खड़ा
क्यों थी सबकी मौन स्वीकृति
मृत्यु का चोला क्यों मुझ पर दिया चढ़ा

Ramesh Agarwal
Advocate Orissa High Court
President Marwari Yuva Manch Cuttack Vikash
Sree Ram Kutir, hazari Lane, Telenga Bazar,
Cuttack - 753009
Cell : 9437035453
Ramesh Agarwal

बुधवार, २३ जुलाई २००८

श्रीमती सरला माहेश्वरी, पूर्व राज्यसभा सांसद, ने लिखा है:

श्रीमती सरला माहेश्वरी, पूर्व राज्यसभा सांसद, ने लिखा है:
औरतों की कम होती हुई आबादी


""आँकड़ों की नीरस और बेजान भाषा के पीछे जो अन्तर-कथा छिपी रहती है उस अन्तर-कथा की व्यथा का मै आप सबको सहभागी बनाना चाहती हूँ । यह अन्तर-कथा वैसे तो सिर्फ मेरी है, मेरी जाति की है, लेकिन इसके लिये मैं कहाँ तक दोषी हूँ ? जो जन्म लेने के साथ ही परिवार में विषाद का कारण बन जाती हूँ। मेरा जन्म, मुझे जन्म देने वाली माँ के चेहरे पर खुशी या गर्व के बजाय निराशा और भय समाज भर देता है। वो माँ जो प्रसव की असहनीय पीड़ा से जूझते हुए एक नये जीवन का सृजन करती है, लेकिन उस सृजन के प्रति उसके परिवार की बेरुखी उसे अपराध बोध से भर देती है, मुझे जन्म देकर किसी पाप-बोध से भर जाती है। वो मुझे चाहकर भी चाह नहीं पाती और जाने -अनजाने 'मैं' उस पाप-बोध की वेदी पर बलि चढ़ने लगती हूँ, जो पाप मैंने नहीं किया, मेरी माँ ने नहीं किया।"



जमशेदपुर, (झारखण्ड) से रंजना सिंह का मेल प्राप्त हुआ, इनकी एक मार्मिक कविता यहाँ जारी कर रहें है।

"जीवन सब का मैं संवारूंगी, तेरे घर को स्वर्ग बनाऊँगी ।
तेरे पथ के सब कांटे चुनु, तेरे सारे सपनो को बुनू ।
मुझे शिक्षा दे, संस्कार दे, मुझे ममता और दुलार दे।
ऐ माँ मुझको आने दे, और इस जग पर छाने दे।।"
रंजना सिंह कविता देखें



जबकि 23 वर्षीय डॉ.गरिमा तिवारी लिखती हैं " मुझे नहीं पता कि मेरा विचार आपके मुहिम के अनुरूप है या नही, अगर आपको ऐसा लगता है कि मेरा विचार आपके मुहिम को विषय से भटक सकते हैं तो इन्हे ब्लॉग पर ना जोड़े, मुझे तनिक भी आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि किसी भी मुहिम के सार्थक होने के लिये विषयानुकुल विचारों से ही आगे कदम बढावा जा सकता है, अन्य बातें भटकाव पैदा कर सकती हैं। इनके विचार जानने के लिये शीर्षक " भ्रूणहत्या को मैं कई तरीकों से देख रही हूँ"

डॉ.गरिमा तिवारी के विचारों को भी जाने



ऊपर दिये गये सभी विचार और कविता की एक झलक है, आप इनके पूरे विचार को नीचे देये गए लिंक में जाकर देख सकते हैं। कूछ लेख हमें ओर भी मिले हें, पर उनके विचार यहाँ प्रकाशित विचारों से मिलते-जूलते होने के चलते, दे पाना संभव नहीं हो पा रहा है। कृपया उनसे आग्रह है कि वे पुनः प्रयास करें। आप भी भाग लेवें इस बहस में। Dt: 24th july 2008



आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

सोमवार, २१ जुलाई २००८

मेरी हत्या की मौन स्वीकृति

कन्या भ्रूण हत्या: हमें बेटी को पराया धन और बेटे को कुल दीपक की मानसिकता से ऊपर उठने की जरूरत है। यह सोचा जाना भी आवश्यक है कि भ्रूण हत्या करके हम किसी को अस्तित्व में आने से पहले ही खत्म कर देते हैं। आज के दौर में बेटीयां बेटे से कमतर नहीं है। इस गलत परम्परा को रोकने के लिये हम सभी को मिलकर तेजी से अभियान चलाना होगा। सरकारी सहयोग की अपेक्षा हमें नही करनी चाहिये। इस मामले में कानून भी लाचार सा ही दिखता है। जाँच सेन्टरों के बाहर बोर्ड पर लिख देने से कि "भ्रूण जाँच किया जाना कानूनी अपराध है।"
उन्हें इसका भी लाभ मिला है। जाँच की रकम कई गुणा बढ़ गई। रोजना गर्भपात के आंकड़े चौकाने वाले बनते जा रहे हैं, चुकिं भारत में गर्भपात को तो कानूनी मान्यता है, परन्तु गर्भाधारण के बाद गर्भ के लिंक जाँच को कानूनी अपराध माना गया है। यह एक बड़ी विडम्बना ही मानी जायेगी कि इस कानून ने प्रचार का ही काम किया। जो लोग नहीं जानते थे, वे भी अब गर्भधारण करते वक्त इस बात की जानकारी कर लेते हैं कि किस स्थान पर उन्हें इस बात की जानकारी मिल जायेगी कि होने वाली संतान नर है या मादा। धीरे-धीरे लिंगानुपात का आंकड़ा बिगड़ता जा रहा है। यदि समय रहते ही हम नहीं चेते तो इस बेटे की चाहत में हर इंसान जानवर बन जायेगा। भले ही हम सभ्य समाज के पहरेदार कहलाते हों, पर हमारी सोच में भी बदलाव लाने की जरूरत है। इस बहस का प्रयास सिर्फ इतना ही है कि हम एक साथ और एक जगह् बहुत सारी सामग्री देश की पत्र-पत्रिकाओं को उपलब्ध करा दें , ताकि वे इस बात में वक्त न खपाकर सीधे तौर पर यहाँ हुई बहस से अपने उपयोग की सामग्री उठाकर अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर सके। हाँ ! हम इतना जरूर चाहेंगे कि जब आप यहाँ प्रकाशित सामग्री लें तो इस वेवपेज का उल्लेख जरूर कर देंवे, ताकि दूसरे भी इसका लाभ लें सकें। आप यदि किसी पत्र-पत्रिका में इस बात की चर्चा कर रहें हों तो यह हमार सौभाग्य होगा। कृपया उसकी एक प्रति हमें जरूर भेंजे। अब तक हमें जो मेल प्राप्त हुए हैं उसके कुछ अंश हम यहाँ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहें हैं।
सीमा सचदेव ने बैंगलोर से एक कविता भेजी जो बड़ी ही मार्मिक कविता है देखें ;

मैं दिखाऊंगी नई राह
दूँगी नई सोच जमाने को
मुझे दुनिया में आने तो दो
मैं जीना चाहती हूँ
मुझे जीने तो दो

वहीं डॉ.कुमारेन्द्र सिंह सेंगर मानते हैं कि: "वर्तमान में समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध लगातार हो रहा है. सरकार, समाजसेवी संस्थाएं आदि अपने-अपने स्तर पर इस बुराई को दूर करने का प्रयास कर रहे है। इसके बाद भी भ्रूण लिंग की जाँच हो रही है, लड़की के होने पर उसकी गर्भ में ह्त्या हो रही है। बचाव के इन प्रयासों के बीच कुछ नारियों ने एक नया सवाल खड़ा कर पूरे मुद्दे को अलग दिशा में ले जाने का काम किया। इन महिलाओं का सवाल है की वे लड़की नहीं चाहतीं क्योंकि उनके परिवार में पहले से दो या तीन लड़कियां हैं। ऐसे में या तो सरकार उनको लिंग परीक्षण एवं चयन की आजादी दे. यदि सरकार चाहती है कि भ्रूण में कन्या की हत्या न हो तो वो उस लड़की के पैदा होने के बाद उस बच्ची की देखभाल की जिम्मेवारी ले।"

अरूण कुमार वर्मा लिखते हैं-

माँ तू माँ है, अपनी
अपनी ममता पर वार न होने देना
इस बेटी को दुनिया में न लाकर,
बेटी को बादनाम न होने देना
दुनिया को दिखा देना की
माँ बेटी का रिश्ता कितना प्यारा है
संदेश मिले हर माँ को ये की
"बेटी सबका सहारा है"


मनोज भावुक कि कविता तो बहुत ही भावुक कर देती है, पठकों को:

नारी शक्ति, नारी भक्ति
नारी सृष्टि, नारी दृष्टि
आंगन की तुलसी है नारी
पूजा की कलसी है नारी
नेह-प्यार, श्रद्धा है नारी
बेटी, पत्नी, मां है नारी
नारी के इस विविध रूप को आंगन में खिल जाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो


रायबरेली से श्री अवतंश रजनीश, प्रदान सम्पादक: 'चर्चित-अचर्चित' की कविता ने तो सबका दिल ही दहला दिया एक बार देखें:

असहाय विवश माँ / जलाए जाने के भय से
बलिपशु की तरह थर-थर कांपती हुई
मेरी हत्या की मौन स्वीकृति
देने को विवश-बाध्य।
नर्सिंग होम का शल्यकक्ष / मूर्छित माँ के गर्भ में
अति सूक्ष्म उपकरण / मेरी हत्या के लिये
मेरे सिर की तलाश कर रहे हैं
और मैं गर्भाशय के एक / कोने में दुबकी-अजन्मी
सभ्य समाज के बीचों-बीच
विज्ञान के जाने माने हाथों से
अपनी निर्मम हत्या की प्रतीक्षा रत हूँ।

यदि आप भी आपने विचार व्यक्त करना चाह्ते हों तो, हमें अपने विचार/लेख, कविता मेल कर इस बहस में हिस्सा लें सकते हैं सभी मेल हमें 30 जुलाई रात तक मिल जाने चाहिए| हमारा पता है: ई-हिन्दी साहित्य सभा, email:ehindisahitya@gmail.com - शम्भु चौधरी
आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

भ्रूण जाँच किया जाना कानूनी अपराध है

कन्या भ्रूण हत्या: हमें बेटी को पराया धन और बेटे को कुल दीपक की मानसिकता से ऊपर उठने की जरूरत है। यह सोचा जाना भी आवश्यक है कि भ्रूण हत्या करके हम किसी को अस्तित्व में आने से पहले ही खत्म कर देते हैं। आज के दौर में बेटीयां बेटे से कमतर नहीं है। इस गलत परम्परा को रोकने के लिये हम सभी को मिलकर तेजी से अभियान चलाना होगा। सरकारी सहयोग की अपेक्षा हमें नही करनी चाहिये। इस मामले में कानून भी लाचार सा ही दिखता है। जाँच सेन्टरों के बाहर बोर्ड पर लिख देने से कि "भ्रूण जाँच किया जाना कानूनी अपराध है।"
क्या आप भी इस बहस में भाग लेना चाह्तें हैं तो हिन्दी लिखने के लिये नीचे दिये लिंक का प्रयोग करें और पोस्ट कर दें आपने विचार आज ही। आपना परिचय, फोटो, पता और फोन नम्बर जरूर देवें। यदि आपके पास भ्रूण हत्या से संबंधित कोई चित्र हो तो उसे भी भेज सकते हैं
आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

रविवार, २० जुलाई २००८

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ...........

इस पत्र के लेखक की राय भी जाने शीर्षक " भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध " नीचे लिंक में दिया हुआ है। आप भी भाग लेवें इस बहस में।


-- महेश कुमार वर्मा, पटना: दिनांक : २०.०७.२००८ आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

मैं दिखाऊंगी नई राह

मैं
दिखाऊंगी नई राह
दूँगी नई सोच जमाने को
मुझे दुनिया में आने तो दो
मैं
जीना चाहती हूँ
मुझे जीने तो दो
इस कवि का हृदय जानने के लिये शीर्षक " मैं दिखाऊंगी नई राह " पूरी कविता नीचे लिंक में दिया हुआ है। आप भी भाग लेवें इस बहस में।

Seema Sachdev, 7a,3rd cross,Ramanjanaya layout, Marathalli, Bangalore-37
आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

कलियों को मुसकाने दो

बेटा आया, खुशियां आईं
सोहर-मांगर छम-छम-छम
बेटी आयी, जैसे आया
कोई मातम का मौसम
मन के इस संकीर्ण भाव को, रे मानव मिट जाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो।
इस कवि का हृदय जानने के लिये शीर्षक " कलियों को मुसकाने दो " पूरी कविता नीचे लिंक में दिया हुआ है। आप भी भाग लेवें इस बहस में। आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

चिंतित जैन समाज

इस काम में साधु-संतों और समाज के दूसरे लोगों की भी मदद ली जा रही है. पंडितों ने आश्वासन दिया है कि वे केवल बेटों को महिमामंडित करने वाले श्लोकों में बदलाव के लिए तैयार हैं और शायद अब पुत्रवान भव की जगह संतान भव के श्लोक सुनाई दें. तेरापंथ महिला मंडल की राष्ट्रीय अध्यक्ष सायर बेंगानी ने बीबीसी को बताया कि उनके यहाँ लड़कियों की संख्या तेज़ी से कम हो रही है। इनके विचार जानने के लिये शीर्षक " चिंतित जैन समाज " का लेख नीचे लिंक में दिया हुआ है। आप भी भाग लेवें इस बहस में। आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

शनिवार, १९ जुलाई २००८

शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी

पिछले दिनों एक खबर पढ़ी जिसने थोड़ी राहत दी, शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने यह निर्णय लिया है कि सिख धर्म को मानने वाले कन्या भ्रूणों को ना मारें अगर वे लड़िकयों को पालने में रूचि नहीं है तो वे गुरुद्वारों के बाहर रखे पालनों में बच्चियों को छोड़ जाएं, इन बच्चियों का पालन-पोषण एसजीपीसी और गुरुद्वारे करेंगे। आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

नन्हा फूल मुरझाया - रंजना भाटिया

नानी सुनाएगी कहानी, दादी लोरी गायेगी,
बुआ-मासी मुझपे जैसे बलहारी जाएँगी......
बेटी हूँ तो क्या हुआ काम वो कर जाऊँगी ,
सबका नाम रोशन करूंगी, देश का गौरव कहलाऊँगी ,
पर..................?
सुन कर मेरा नन्हा हृदय कंपकपाया,
माँ का दिल कठोर हुआ कैसे, एक पिता यह फ़ैसला कैसे कर पाया,
"लड़की " हूँ ना इस लिए जन्म लेने से पहले ही नन्हा फूल मुरझाया ..!!!!!!!!!
रंजना भाटिया का हृदय जानने के लिये शीर्षक " नन्हा फूल मुरझाया " पूरी कविता नीचे लिंक में दिया हुआ है। आप भी भाग लेवें इस बहस में। आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या


शुक्रवार, १८ जुलाई २००८

अपनी निर्मम हत्या की प्रतीक्षा में

मै अजन्मी, माँ की कोख में पल रही,
एक भ्रूण कन्या,
मेरा बाप, जिसने माँ की कोख में/ बोया था बेटा,
अंकुरित हो गई बेटी।
अब मेरी हत्या की योजना बना रहा है,
माँ को बहला-फुसला कर मना रहा है।


आगे देखें - बहस : भ्रूण हत्या

माँ तेरी ममता की परीक्षा

जारी है कन्या भ्रूण हत्या पर बहस, देर न करें। शायद आपके विचार सारे हिन्दुस्तान के समाचार में छा जाये। कन्या भ्रूण हत्या पर आप आपने विचार, लेख, कविता हमें मेल कर आप इस बहस में हिस्सा लें सकते हैं सभी मेल हमें 30 जुलाई रात तक मिल जाने चाहिए| कन्या भ्रूण हत्या पर बहस जारी आज कुछ मेल प्राप्त हुऎ जिसे यहाँ हम पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहें हैं। - "ई हिन्दी साहित्य सभा"

बहस में हिस्सा लें: कन्या भ्रूण हत्या

कन्या भ्रूण हत्या: हमें बेटी को पराया धन और बेटे को कुल दीपक की मानसिकता से ऊपर उठने की जरूरत है। यह सोचा जाना भी आवश्यक है कि भ्रूण हत्या करके हम किसी को अस्तित्व में आने से पहले ही खत्म कर देते हैं। आज के दौर में बेटीयां बेटे से कमतर नहीं है। इस गलत परम्परा को रोकने के लिये हम सभी को मिलकर तेजी से अभियान चलाना होगा। सरकारी सहयोग की अपेक्षा हमें नही करनी चाहिये। इस मामले में कानून भी लाचार सा ही दिखता है। जाँच सेन्टरों के बाहर बोर्ड पर लिख देने से कि "भ्रूण जाँच किया जाना कानूनी अपराध है।" उन्हें इसका भी लाभ मिला है। जाँच की रकम कई गुणा बढ़ गई। रोजना गर्भपात के आंकड़े चौकाने वाले बनते जा रहे हैं, चुकिं भारत में गर्भपात को तो कानूनी मान्यता है, परन्तु गर्भाधारण के बाद गर्भ के लिंक जाँच को कानूनी अपराध माना गया है। यह एक बड़ी विडम्बना ही मानी जायेगी कि इस कानून ने प्रचार का ही काम किया। जो लोग नहीं जानते थे, वे भी अब गर्भधारण करते वक्त इस बात की जानकारी कर लेते हैं कि किस स्थान पर उन्हें इस बात की जानकारी मिल जायेगी कि होने वाली संतान नर है या मादा। धीरे-धीरे लिंगानुपात का आंकड़ा बिगड़ता जा रहा है। यदि समय रहते ही हम नहीं चेते तो इस बेटे की चाहत में हर इंसान जानवर बन जायेगा। भले ही हम सभ्य समाज के पहरेदार कहलाते हों, पर हमारी सोच में भी बदलाव लाने की जरूरत है। इस बहस का प्रयास सिर्फ इतना ही है कि हम एक साथ और एक जगह् बहुत सारी सामग्री देश की पत्र-पत्रिकाओं को उपलब्ध करा दें , ताकि वे इस बात में वक्त न खपाकर सीधे तौर पर यहाँ हुई बहस से अपने उपयोग की सामग्री उठाकर अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर सके। हाँ ! हम इतना जरूर चाहेंगे कि जब आप यहाँ प्रकाशित सामग्री लें तो इस वेवपेज का उल्लेख जरूर कर देंवे, ताकि दूसरे भी इसका लाभ लें सकें। आप यदि किसी पत्र-पत्रिका में इस बात की चर्चा कर रहें हों तो यह हमार सौभाग्य होगा। कृपया उसकी एक प्रति हमें जरूर भेंजे। अब तक हमें जो मेल प्राप्त हुए हैं उसे हम यहाँ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहें हैं। यदि आप भी आपने विचार व्यक्त करना चाह्ते हों तो, हमें अपने विचार/लेख, कविता मेल कर इस बहस में हिस्सा लें सकते हैं सभी मेल हमें 30 जुलाई रात तक मिल जाने चाहिए| हमारा पता है: ई-हिन्दी साहित्य सभा, शम्भु चौधरी, एफ.डी.453, साल्टलेक सिटी, कोलकाता- 700106 email:ehindisahitya@gmail.com













दिल को छूने वाले पोस्टर एवं नारे

क्रियाक्रम एवं पिण्डदान

उत्सव/जलवा

जघन्य अपराध

लिंग भेद एवं कन्या भ्रूण हत्या

लैंगिक असमानता के बड़े विरोधी

माँ तेरी ममता की परीक्षा

भ्रूण हत्या जघन्य अपराध

अपनी निर्मम हत्या की प्रतीक्षा में

जनम से पहले

नन्हा फूल मुरझाया

समाधन समाज को ही ढूढ़ना होगा

शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी

कलियों को मुसकाने दो

चिंतित जैन समाज

भ्रुणहत्या को मैं कई तरीकों से देख रही हुँ।

मुझे भी जन्म लेने दो

बेटी पैदा होने से, सन्नाटा छा जाता है।

औरतों की कम होती हुई आबादी

माँ मेरी आर्त पुकार सुन....



ई-मेल द्वारा प्राप्त पत्र


औरतों की कम होती हुई आबादी
आँकड़ों की निरस और बेजान भाषा के पीछे जो अन्तर-कथा छिपी रहती है उस अन्तर-कथा की व्यथा का मैं आप सबको सहभागी बनाना चाहती हूँ । यह अन्तर-कथा वैसे तो सिर्फ मेरी है, मेरी जाति की है, लेकिन इसके लिये मैं कहाँ तक दोषी हूँ ? जो जन्म लेने के साथ ही परिवार में विषाद का कारण बन जाती हूँ। मेरा जन्म, मुझे जन्म देने वाली माँ के चेहरे पर खुशी या गर्व के बजाय निराशा और भय समाज भर देता है। वो माँ जो प्रसव की असहनीय पीड़ा से जूझते हुए एक नये जीवन का सृजन करती है, लेकिन उस सृजन के प्रति उसके परिवार की बेरुखी उसे अपराधबोध से भर देती है, मुझे जन्म देकर किसी पाप-बोध से भर जाती है। वो मुझे चाहकर भी चाह नहीं पाती और जाने -अनजाने 'मैं' उस पाप-बोध की वेदी पर बलि चढ़ने लगती हूँ, जो पाप मैंने नहीं किया, मेरी माँ ने नहीं किया ।
मुझे और मेरी माँ को इस पाप-बोध में भरने वाला कौन है ? इस पाप की वेदी पर बलि चढ़ाकर नारी जाति की हत्या करने वाला कौन है ? इस सवाल का जबाब पाने का प्रायः करती रही। हमारा समाज अभी भी औरतों के प्रति अपने दकियानुसी विचारों की केंचुली उतार नहीं पाया है। आज भी समाज के सर्वोच्च शिखर पर बैठे हुए, न्याय के उच्चतम आसन पर बैठे हुए लोग तक औरतों को मात्र घर की चार-दीवारी में बैठी रहने का आदेश देते हुए झिझकते नहीं हैं। सती के नाम पर पति के साथ औरत के जिन्दा जलकर मरने की पैरवी करने वाले पैरोकारों की आज भी हमारे समाज में कमी नही है। कन्याओं को 'आक का दूध' जहर के रूप में पिलाकर, तो कहिं खाट के पाये के नीचे दबा कर मार दिया जाता था। आज इस आधुनिक काल में एमियोसिंटेसिस के जरिये भ्रूणवस्था में ही कन्या की हत्या करवा दी जाती है।
सवाल यह है कि आखिर हमने यह कौन-सा समाज बनाया है ? जहाँ एक कन्या भ्रूण को, एक अबोध बच्ची को, एक औरत को, मजबूरन मौत के घाट सुला दिया जाता है।
इस प्रकार, जन्म से लेकर जिंदगी के तमाम चरणों में सिर्फ लिंग के आधार पर महिलाओं के साथ जो भेदभाव बरता जा रहा है, क्या यह समानता की हमारी तमाम संवैधानिक घोषणाओं को कोरी औपचारिकता नहीं घोषित कर देता?
हमारी अर्थव्यवस्था, परिवार, समाज और राजनीतिक जीवन में क्रमशः नारी जाति को जिस प्रकार हाशिये पर डाला जा रहा है, वही नारी जाति का एक बड़ा हिस्सा भी इस शोचनीय दशा के लिए जिम्मेदार है ।

श्रीमती सरला माहेश्वरी, पूर्व राज्यसभा सांसद, email: saralam@sansad.nic.in

ऊपर जायें


माँ मेरी आर्त पुकार सुन.......
कातर नयनो से निहार रही, दृग भरे अश्रु भयभीत खड़ी।
किस हेतु हृदय पाषाण किया, क्यों मुझको मृत्यु दान दिया।
मैं भी तेरी संतान हूँ माँ, तेरी शक्ति पहचान हूँ माँ।
ममता का न अपमान यूँ कर, स्त्रीत्व को न बलिदान तू कर।
मेरा जीवन अभिशाप नही, बेटी होना कोई पाप नही।
न कर मेरा तू तिरस्कार, अस्तित्व को न कर तार तार।
मुझको माँ तू स्वीकार कर, श्रृष्टि को न निस्सार कर।
अपने ममत्व का प्रमाण दे, मुझको तू जीवन दान दे।
क्या है मेरा तू दोष बता , कैसे कर लूँ संतोष बता।
माना भाई तुझे प्यारा है, कुलदीपक तेरा सहारा है।
तेरा वह वंश बढ़ाएगा, तुझको सम्मान दिलाएगा।
पर ज्यों मैं तुझको सुन सकती हूँ,
तेरे हर सुख-दुख गुन सकती हूँ ।
क्या नर वह सब सुन पायेगा,
अनकही तेरी गुन पायेगा।

मुझपर माता विश्वास तो कर, मुझमे हिम्मत उत्साह तो भर।
मैं इस जग पर छा जाउंगी, मैं भी तेरा मान बढाऊंगी।
ऐ जननी नारीत्व का मोल तोल, शंसय के सारे बाँध खोल।
तू कर मेरा उद्धार ऐ माँ, न ठहरा जग का भार ऐ माँ।
माँ मेरी आर्त पुकार सुन, मुझको अपना सौभाग्य चुन।
अब हर्ष से मुझको अपना ले, उर में भर स्नेह तू बिखरा दे।
भर जाए यह मन मोद से, जन्मू तेरी जब कोख से ।
जीवन सब का मैं संवारूंगी, तेरे घर को स्वर्ग बनाऊँगी ।
तेरे पथ के सब कांटे चुनु, तेरे सारे सपनो को बुनू ।
मुझे शिक्षा दे संस्कार दे, मुझे ममता और दुलार दे।
ऐ माँ मुझको आने दे, और इस जग पर छाने दे।।

रंजना सिंह, जमशेदपुर, (झारखण्ड )


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मुझे भी जन्म लेने दो
तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

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बेटी पैदा होने से, सन्नाटा छा जाता है।
नारी शक्ति

घर की चार दिवारी में भी,
नही सुरक्षित है नारी।
घर के बाहर तो फ़ैली है,
भारी भरकम महामारी।।
घर की चार------

घर में आने से पहले,
विज्ञान का है अभिशाप ।
कोख में कन्या होने पर,
गर्भपात कराते माँ-बाप ।।
आने से पहले हो जाती,
जाने की तैयारी ।
घर की चार------

बेटा की चाह,
यह नोबत लाती है ।
पत्नी के होते,
शादी रचाई जाती है ।।
रूढिवादिता के चलते,
जनसंख्या में वृध्दी है जारी ।
घर की चार------

बेटी पैदा होने से,
सन्नाटा छा जाता है ।
माँ-बाप कुटुम्ब कबीले में
भूचाल सा आ जाता है ।।
नन्ही जान ने,
नही देखी दुनियाँदारी ।
घर की चार-----------------

बेटा-बेटी का अन्तर,
स्पष्ट नजर जब आता है ।
बेटा को कुल का "दीपक"
बेटी को पराया जाना जाता है ।।
शिक्षा, रहन-सहन में,
नारी का शोषण है भारी ।
घर की चार-----------------

अभी समय है सावधान !
1-2 बच्चे परिवार में शान ।
बेटा हो या बेटी,
मानो ईश्वर का "वरदान" ।।
आने बाला भबिष्य,
है प्रलयकारी ।
घर की चार-----

नारी शक्ति है, अबला नही,
करो इस का सम्मान ।
सुनीता, इंदिरा जी,पर
देश को है अभिमान ।।
नर-नारी के अनुपात में,
गिरावट से लाचारी ।
घर की चार-------


देवेन्द्र कुमार मिश्रा, अमानगंज मोहल्ला नेहरु बार्ड न0 13, छतरपुर (म0प्र0)
07682242676 , devchp@gmail.com


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दिल को छूने वाले पोस्टर एवं नारे
कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में हृदय विदारक और दिल को छू देने वाले नारे एवं पोस्टर सोनोग्राफी केन्द्रों पर लाये जाने चाहिये। ताकि गर्भवती महिला ऎसा कदम उठाते समय स्वयं को अपराधई समझे। - सरला अग्रवाल, बलांगीर।


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क्रियाक्रम एवं पिण्डदान
अंतिम क्रियाक्रम एवं पिण्डदान के लिये बेटियों को भी समाज बराबर का दर्जा प्रदान करे। - डॉ.पूर्णिमा केडिया , राँची।


उत्सव/जलवा
लड़के के जन्म के अवसर पर मनाये जाने वाले उत्सव/जलवा आदि को या तो बन्द कर दिया जाना चाहिये या फिर इस तरह का उत्सव लड़का-लड़की दोनों के जन्म पर मनाया जाना चाहिये। - सुनिता सिंह, दिल्ली।


ब्लॉग से संग्रहित किये गये लेख/विचार


जघन्य अपराध
वर्तमान में समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध लगातार हो रहा है. सरकार, समाजसेवी संस्थाएं आदि अपने-अपने स्तर पर इस बुराई को दूर करने का प्रयास कर रहे है. इसके बाद भी भ्रूण लिंग की जाँच हो रही है, लड़की के होने पर उसकी गर्भ में ह्त्या हो रही है। बचाव के इन प्रयासों के बीच कुछ नारियों ने एक नया सवाल खड़ा कर पूरे मुद्दे को अलग दिशा में ले जाने का काम किया.
इन महिलाओं का सवाल है की वे लड़की नहीं चाहतीं क्योंकि उनके परिवार में पहले से दो या तीन लड़कियां हैं। ऐसे में या तो सरकार उनको लिंग परीक्षण एवं चयन की आजादी दे. यदि सरकार चाहती है कि भ्रूण में कन्या की हत्या न हो तो वो उस लड़की के पैदा होने के बाद उस बच्ची की देखभाल की जिम्मेवारी ले.
इन महिलाओं का तर्क है कि कितने और किन बच्चों को जन्मना है इस बात की आज़ादी महिलाओं को होनी चाहिए। आख़िर वे ही गर्भ में बच्चे को पालती हैं।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर


लिंग भेद एवं कन्या भ्रूण हत्या
लिंगभेद (जेण्डर इन इक्वेलिटी) एक बहुत बड़ी समस्या है । लड़का-लड़की भेद इस सीमा तक है कि इतनी राष्ट्रीय स्तर की जागरूकता के बाद भी नर-नारी अनुपात में विसंगति बढ़ती जा रही है । कन्या भ्रूण हत्या के कारण यह समस्या पैदा हुई है । लड़का ही वंश चलाएगा, यह एक मूल भ्रांति है और इस संबंध में एक व्यापक अभियान गायत्री परिवार द्वारा चलाया जा रहा है । यदि अन्य आध्यात्मिक शीर्ष वक्ता, सामाजिक संगठन और अधिक जागरूक होकर इस क्षेत्र में अपनी शक्ति झोंक दें, तो हम इस कलंक से मुक्ति पा सकते हैं । बड़े आधुनिक शहर यथा चण्डीगढ़ में भी यह अनुपात जब हम 1000/750 का देखते हैं, तो लगता है कि पढ़े-लिखे भी उतने ही पिछड़े व नासमझ हैं । इस संबंध में रैलियाँ निकलें, इन्टरनेट से लेकर प्रिण्ट मीडिया, प्रदर्शनी के सभी साधन प्रयुक्त हों एवं दोषियों को कड़े दण्ड दिये जायँ, तभी कुछ हो सकता है ।

अखिल विश्व गायत्री परिवार


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लैंगिक असमानता के बड़े विरोधी
'कन्या भ्रूण हत्या और लैंगिक असमानता के बड़े विरोधी हमारे एक तथाकथित क्रांतिकारी साथी हैं। समाज में काफी सम्मान पाते हैं। बिरादरी की नाक हैं। सम्पर्क बढ़ा तो पता चला कि इनके दो बेटे हैं। बेटी एक भी नहीं। पत्नी और विधवा मां घर के अलावा खेत खलिहान भी देखती हैं और इन महाशय ने समाज सुधारने का बीड़ा उठाया हुआ है। गुड़गांव के सोहणा प्रखण्ड के एक गांव में ग्राम प्रधान और स्थानीय राजनेता ने अपनी ही स्त्री का बलात्कार अपने दामाद व दो अन्य मित्रें के साथ संयुक्त रूप से किया। इसकी न कोई प्राथमिकी दर्ज होनी थी और न ही हुई। पंचायत भी क्यूं बैठती। दबे जुबान पूरा गांव हकीकत जानता है। मगर कोई कुछ नहीं कहता। यह कोई अजूबा नहीं क्योंकि सभी छलनियों में छेद हैं। यह स्त्री जिसके साथ यह सब हुआ वह कोई पारो नहीं बल्कि स्थानीय महिला है। आप कल्पना कर सकते हैं कि जब इनका यह हाल है तो 'पारो' जैसी स्त्रियों का क्या हाल होगा। हमारे आंदोलन के साथी के एक चचेरे भाई हैं। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। बातों-बातों में खुल गए, कहने लगे दिल्ली आना चाहते हैं उनको नौकरी पाने में मैं कुछ मदद करूं। उम्र 40 के करीब हो चुकी है। विवाह नहीं हो पाया। सोचते हैं पारो ले आएं। इसके लिये कमाना पडेग़ा। इसलिए दिल्ली आएंगे। फिर वहीं से पारो ले आएंगे। उन्होंने बात भी कर रखी है। करीब 15 हजार का खर्च है। वो कहते हैं, कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने पर विवाह होना कठिन है। वैसे भी लड़कों का विवाह उनके भाग्य पर निर्भर करता है। विडम्बना है कि यहां एक तरफ लड़कों को विवाह के लाले पडे हैं वहीं दहेज के आंकड़े आसमान छू रहे हैं। सामान्यत: यह माना जाता है कि कन्या भ्रूण हत्या एक नगरीय समस्या है। मगर यह कहते हुए हम भूल जाते हैं कि जमीन से जुड़े मध्यवर्गीय (व्यापक अर्थों में) तबके में आरम्भ से ही नवजात कन्याओं को मारने के अनेकों तरीके प्रचलित हैं। नाक दबा कर, नमक चटाकर, अफीम चटाकर, दूध में डुबाकर, और मर्दों के साथ सुलाकर जिनसे दब कर वे दम तोड़ देती थीं। ऐसी कई तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल किया जाता रहा है। परिणाम सामने है। हम लोगों को कन्या भ्रूण हत्याओं का परिणाम भुगतते देख रहे है। ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पारो भी अनुपलब्ध होगी। तब बचेगा बस थोथा पुरुषार्थ, मर्यादा, सम्मान, सम्पत्ति और कुछ भी नहीं।

भारतीय पक्ष


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माँ तेरी ममता की परीक्षा
माँ तेरी ममता की परीक्षा
आज ये बेटी लेती है,
कोख में हूँ, मजबूर हूँ मै
पर आज ये तुमसे कहती हूँ,
तेरे जिगर का टुकडा हूँ मै
मुझे तुछ पर विश्वास है
तू समझेगी मेरी व्यथा बस
मुझको पुरी आस है,
चाहे कोई तुझको समझाए
या मेरे विरोध में भड़काए
पर अपना बंधन मजबूत हो इतना
की कोई हमको जुदा न कर पाए
माँ तू माँ है, अपनी
अपनी ममता पर वार न होने देना
इस बेटी को दुनिया में न लाकर,
बेटी को बादनाम न होने देना
दुनिया को दिखा देना की
माँ बेटी का रिश्ता कितना प्यारा है
संदेश मिले हर माँ को ये की
"बेटी सबका सहारा है"

अरुण कुमार वर्मा


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भ्रूण हत्या जघन्य अपराध
कन्या भ्रूण हत्या जघन्य अपराध है हमने अपनी संस्था के माध्यम से एक विचार गोष्ठी आयोजित की थी महिलायों को जागरूक करने के लिए ! अजन्मी कन्या शिशु की हत्या करना आने वाले समय में स्त्री की संख्या को कम कर रहा है मात्रभूमि फ़िल्म में यह समस्या प्रभावी रूप से दिखाई गई है सभी नारियों से अपील है .....अपने अपने तरीके से इस समस्या के खिलाफ आवाज उठायें !!!

नीलिमा गर्ग


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पत्र-पत्रिकाओं से संग्रहित किये गये लेख/विचार/कविता



अपनी निर्मम हत्या की प्रतीक्षा में

मै अजन्मी, माँ की कोख में पल रही,
एक भ्रूण कन्या,
मेरा बाप, जिसने माँ की कोख में/ बोया था बेटा,
अंकुरित हो गई बेटी।
अब मेरी हत्या की योजना बना रहा है,
माँ को बहला-फुसला कर मना रहा है।
रोज मेवा-मिठाई फल/ खिला-खिला कर पटा रहा है।
अभागिन बेटी को जन्म देकर क्या पाओगी,
घुटन, अपमान, संत्रास, दहेज, बलात्कार
यही सब तो नियति है नारी की
मैं रोती हूँ, गिड़गिड़ाती हूँ,
माँ! मुझे भ्रूण हत्या से बचालो,
मुझे खुली हवा में सांस तो लेने दो,
माँ अचानक चीख उठती है।
नहीं-नहीं-नहीं / हत्यारा बाप
मेरी माँ को ही मार डालने के / चिन्तन में खो जाता है।
जन्म लेने से पूर्व ही / मेरी हत्या की योजना बनाता है।
क्रूर हत्यारे निर्मोही बाप ने
माँ की अस्वीकृति से खीझ / उसे कोठरी में कैद कर
खाना-पीना तक बंद कर देता है।
मेरी दादी
चिल्ला-चिल्ला कर चीख रही है।
इस करम जली को जला दो,
आज्ञाकारी पुत्र-नरपिशाच पिता
केरोसीन की बोतल उठा / दियासलाई की तलाश में जुट जाता है।

असहाय विवश माँ / जलाए जाने के भय से
बलिपशु की तरह थर-थर कांपती हुई
मेरी हत्या की मौन स्वीकृति
देने को विवश-बाध्य।
नर्सिंग होम का शल्यकक्ष / मूर्छित माँ के गर्भ में
अति सूक्ष्म उपकरण / मेरी हत्या के लिये
मेरे सिर की तलाश कर रहे हैं
और मैं गर्भाशय के एक / कोने में दुबकी-अजन्मी
सभ्य समाज के बीचों-बीच
विज्ञान के जाने माने हाथों से
अपनी निर्मम हत्या की प्रतीक्षा रत हूँ।

- अवतंश रजनीश, प्रदान सम्पादक: 'चर्चित-अचर्चित'. प्रकाश नगर, रायबरेली-229001

'कोलकाता से प्रकाशित 'मनिषिका' संस्करण-2006 से साभार

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जनम से पहले

मैया ! जनम से पहले मत मार
बाबुल ! जनम से पहले मत मार

चाहे मुझको प्यार न देना / चाहे तनिक दुलार न देना
कर पाओ तो अतना करना / जनम से पहले मार न देना

मैं बेटी हूँ, मुझको भी है
जीने का अधिकार...।

मेरा दोष बताओ मुझको / क्यों बेबत सताओ मुझको
मैं भी अंश तुम्हारा ही हूँ / तज कर फेंक न जाओ मुझको

जीने का जो हक दे दो तुम
देखलुँ ये संसार...।

थोड़ी नजर बदल कर देखो / संग समय के चल कर देखो
बेटी से भी नाम चलेगा / ठहरो जरा संभल कर देखो

चौथेपन की लाठी बनकर
दूंगी दृढ़ आधार ...।

मैं जब आँगन में डोलूँगी / मिसरी सी बोली बोलूँगी
सेवा, करुणा, त्याग, तपस्या / के नूतन द्वारए खोलूँगी

दोनों कुल के मान की खातिर
तन-मन दूँगी वार...।।

- डॉ. सरिता शर्मा, 115ए, पाकेट-बी, मयूर विहार, फेज-II, दिल्ली-110091

'कोलकाता से प्रकाशित 'मनिषिका' संस्करण-2006 से साभार

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ई-मेल द्वारा प्राप्त पत्र


नन्हा फूल मुरझाया

गर्भ गुहा के भीतर एक ज़िंदगी मुस्कराई ,
नन्हे नन्हे हाथ पांव पसारे..........
और नन्हे होठों से फिर मुस्कराई ,
सोचने लगी की मैं बाहर कब आऊँगी ,
जिसके अंदर मैं रहती हूँ, उसको कब "माँ " कह कर बुलाऊँगी ,
कुछ बड़ी होकर उसके सुख -दुख की साथी बन जाऊँगी..
कब "पिता" के कंधो पर झुमूंगी,
कब "दादा" की बाहों में झूलूँगी,
नन्ही-नन्ही बातो से सबका मन बहलाऊँगी .......

नानी सुनाएगी कहानी, दादी लोरी गायेगी,
बुआ-मासी मुझपे जैसे बलहारी जाएँगी......
बेटी हूँ तो क्या हुआ काम वो कर जाऊँगी ,
सबका नाम रोशन करूंगी, देश का गौरव कहलाऊँगी ,

पर..................?
सुन कर मेरा नन्हा हृदय कंपकपाया,
माँ का दिल कठोर हुआ कैसे, एक पिता यह फ़ैसला कैसे कर पाया,
"लड़की " हूँ ना इस लिए जन्म लेने से पहले ही नन्हा फूल मुरझाया ..!!!!!!!!!


Ranjana Bhatia, email: ranjanabhatia2004@gmail.com


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समाधन समाज को ही ढूंढ़ना होगा

भ्रूण हत्या एक सामाजिक समस्या है और इसका समाधान हम सबको मिलकर ही ढूंढ़ना होगा। सरकार या कानून ऎसी बुराइयों को दूर करने में असफल रहें हैं।
भारतीय समाज यह मानता है कि बेटे से नाम चलता है, बेटे ही पितरों का उद्धार करने वाला होता है और बेटा ही कमाकर घर चलाने वाला तथा वृद्धावस्था में देखभाल करने वाला है। लेकिन गहरायी से जाँचने स ये सभी धारणाएँ भ्रांत सिद्ध हो जाती है।
हमें समाज के विचारों में तो परिवर्तन लाना ही होगा , सथ ही साथ गर्भ-परीक्षण और गर्भपात से गर्भाशय पर होने वाले बुरे प्रभाव से भी हम महिलाओं को सचेत होना पड़ेगा। गर्भपात हम महिलाओं की स्वतंत्रता में बाधक न बने इस बात को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। माता बनना सबको अच्छा लगता है, परन्तु मातृ स्वरूप कलंकित हो यह कोई बहने नहीं चाहती। मेरी सोच है कि इस समस्या को जनचेतना से दूर किया जा सकता है। कानून हर बात का कभी समाधान नहीं हो सकता। यदि ऎसा होता तो अपराध का ग्राफ कम हो जाता, बहस का माध्यम इस समस्या का मार्ग परस्त करेगी। ई-हिन्दी साहित्य सभा का यह प्रयास निश्चय ही कोई ठोस निर्णय पर पहुँचेगी। - डॉ. पूर्णिमा केडिया ' अन्नपूर्णा', 105, फिकॉन पैलेस, लालपुर , राँची-1

- डॉ. पूर्णिमा केडिया ' अन्नपूर्णा', 105, फिकॉन पैलेस, लालपुर , राँची-1


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शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी

दस पंद्रह साल से जबसे गली मोहल्लों में अल्ट्रा साउंड सेंटर खुले हैं तब से शिक्षित और सम्पन्न राज्यों में अजन्मी बच्चियां ज्यादा मारनी शुरू कर दी गई हैं। पहले सिर्फ लोग कहते थे, फिर जनसंख्या के आंकड़ों ने कहना शुरू कर दिया। पर हम नहीं संभले क्योंकि बेटियां बोझ हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और इनकी सीमाओं से लगते आसपास के क्षेत्र में ये ज्यादा हुआ। लेकिन कुछ नहीं हुआ।सब कुछ सरकारों पर छोड़ दिया गया, वही हुआ जो सरकारी काम में होता आया है। इन अल्ट्रासाउंड सेंटरों के बाहर तख्तियां टंग गई कि यहां भ्रूण का लिंग परीक्षण नहीं होता लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। कोई कुछ बोलने वाला नहीं कोई कुछ देखने वाला नहीं।फिर भी लिंग परीक्षण चालू हैं कोई सामाजिक जिम्मेदारी भी तो लेने को तैयार नहीं ।
पिछले दिनों एक खबर पढ़ी जिसने थोड़ी राहत दी, शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने यह निर्णय लिया है कि सिख धर्म को मानने वाले कन्या भ्रूणों को ना मारें अगर वे लड़िकयों को पालने में रूचि नहीं है तो वे गुरुद्वारों के बाहर रखे पालनों में बच्चियों को छोड़ जाएं, इन बच्चियों का पालन-पोषण एसजीपीसी और गुरुद्वारे करेंगे। ऐसा बहुत कम होता है जब धार्मिक संस्थाएं या समाज मिलकर इस तरह के निर्णय लेते हैं। हालांकि कुछ अंदर के लोगों का कहना है कि इस निर्णय के पीछे कुछ और कारण भी हैं जैसे कि लड़कियों की कमी की वजह से दूसरे राज्यों से लड़कियों लाकर शादी करना, लड़कों में सैक्सुअलल और सोशल फ्रस्ट्रेशन।लेकिन इससे ज्यादा वे इस बात से डरे हुए हैं कि बाहर की लड़कियों कैसे उनकी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर पाएंगी। ऐसे में पहले से ही संख्या में कम होते जा रहे सिखों के लिए अपने धर्म की रक्षा करना मुश्किल हो जाएगा । खैर मामला जो भी हो लेकिन कोई संस्था इतने जोर-शोर से लड़कियों को बचाने के िलए आगे आई है तो ये स्वागत योग्य है, आखिर कोई तो है जिसे बच्चियों की फिक्र है।इस खबर को पढ़ने के दो तीन दिन बाद ही गुरु पूरब पर गुरुद्वारे जाना हुआ , वहां पर जगह-जगह बड़े -बड़े पोस्टर लगे थे जिसमें बहुत ही आकर्षक ढंग से कन्या भ्रूण हत्या रोकने की अपील की गई थी और इसे धर्म विरूद्ध बताया गया था।
लेकिन मुझे इस पूरे मामले में खुशी इस बात की हुई , कोई तो जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आया है और इस कलंक को मिटाने की कोशिश कर रहा है।

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा


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कलियों को मुसकाने दो

खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो

जाने किस-किस प्रतिभा को तुम
गर्भपात मे मार रहे हो
जिनका कोई दोष नहीं, तुम
उन पर धर तलवार रहे हो
बंद करो कुकृत्य - पाप यह,
नयी सृष्टि रच जाने दो
आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

जिस दहेज-दानव के डर से
करते हो ये जुल्मो-सितम
क्यों नहीं उसी दुष्ट-दानव को
कर देते तुम जड़ से खतम
भ्रूणहत्या का पाप हटे, अब ऐसा जाल बिछाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

बेटा आया, खुशियां आईं
सोहर-मांगर छम-छम-छम
बेटी आयी, जैसे आया
कोई मातम का मौसम
मन के इस संकीर्ण भाव को, रे मानव मिट जाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

चौखट से सरहद तक नारी
फिर भी अबला हाय बेचारी?
मर्दों के इस पूर्वाग्रह मे
नारी जीत-जीत के हारी
बंद करो खाना हक उनका, ऋनका हक उन्हें पाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

चीरहरण का तांडव अब भी
चुप बैठे हैं पांडव अब भी
नारी अब भी दहशत में है
खेल रहे हैं कौरव अब भी
हे केशव! नारी को ही अब चंडी बनकर आने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

मरे हुए इक रावण को
हर साल जलाते हैं हम लोग
जिन्दा रावण-कंसों से तो
आंख चुराते हैं हम लोग
खून हुआ है अपना पानी, उसमें आग लगाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

नारी शक्ति, नारी भक्ति
नारी सृष्टि, नारी दृष्टि
आंगन की तुलसी है नारी
पूजा की कलसी है नारी
नेह-प्यार, श्रद्धा है नारी
बेटी, पत्नी, मां है नारी
नारी के इस विविध रूप को आंगन में खिल जाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

-मनोज भावुक


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चिंतित जैन समाज

राजस्थान में लड़कियों की घटती संख्या से चिंतित जैन समाज की महिलाओं ने कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया है.
इस काम में साधु-संतों और समाज के दूसरे लोगों की भी मदद ली जा रही है. पंडितों ने आश्वासन दिया है कि वे केवल बेटों को महिमामंडित करने वाले श्लोकों में बदलाव के लिए तैयार हैं और शायद अब पुत्रवान भव की जगह संतान भव के श्लोक सुनाई दें. तेरापंथ महिला मंडल की राष्ट्रीय अध्यक्ष सायर बेंगानी ने बीबीसी को बताया कि उनके यहाँ लड़कियों की संख्या तेज़ी से कम हो रही है.
जागृति अभियान
राजस्थान में फिलहाल एक हज़ार पुरुषों पर 870 महिलाएँ हैं. महिला मंडल ने जगह-जगह सम्मेलन कर जागृति अभियान छेड़ दिया है. इस अभियान को आचार्य महाप्रज्ञ, युवाचार्य महाश्रमण और साध्वी कनक प्रभा का सक्रिय सहयोग मिल रहा है. इस अभियान में सिख समाज, राजपूत और मुस्लिम महिला संगठनों ने सुर मिलाया है. श्रीगंगानगर में एक गुरुद्वारे के मुख्य सेवादार तेजेंदर पाल सिंह टिम्मा कहते हैं, “हम गाँव-गाँव जाकर बेटियों के हक़ में अलख जगा रहे हैं. हमारे ग्रंथ कहते हैं कि कुड़ी मार से कोई दोस्ती नहीं. यानी कन्या भ्रूण हत्या करने वाले से कोई रिश्ता नहीं.” टिम्मा का कहना है कि ग्रंथों का हवाला देकर लोगों को भ्रूण हत्या नहीं करने लिए पाबंद किया जा रहा है.
कन्या गरिमा कार्यक्रम
डिग्निटी टू गर्ल चाइल्ड प्रोग्राम यानी कन्या गरिमा कार्यक्रम की राज्य समन्वयक डॉ मीना सिंह कहती हैं, “ भ्रूण हत्या रोकने के लिए हमें भ्रूण परीक्षण तकनीकी से जुड़े लोगों और डॉक्टरों से संपर्क करना होगा.” सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में 1200 से ज़्यादा अल्ट्रासाउंड मशीनें लगी हैं. इस मुहिम को पंडितों ने भी समर्थन दिया है. ब्राह्मण समाज के अर्जुन पंडित कहते हैं, “हम समाज के वरिष्ठ लोगों से बात कर उन श्लोकों में बदलाव करेंगे जो पुत्रों का महिमामंडन करते हैं. पुत्रवान भव की जगह हम संतान भव का श्लोक काम में ले सकते हैं.” राजपूत समाज की प्रेम कंवर की मानें तो इस मुद्दे पर राजपूतों में सकारात्मक परिवर्तन आया है. वो कहती हैं, “अतीत की बात भूल जाओ. अब बेटियों की संख्या बढ़ रही है.”
मुस्लिम वेलफ़ेयर सोसायटी की निशात हुसैन कहती हैं, “कम से कम मुसलमानों में तो बेटी को कोख में मारने की बुराई नहीं है. मजहब शायद इसका बड़ा कारण है. नबी ने कहा है कि जिसके दो बेटियाँ हैं वो जन्नत का हक़दार है.” तेरा पंथ महिला मंडल की कांता जैन और बीना कहती हैं, “हम लोगों में बेटियों के प्रति प्रेम की समझ पैदा कर रहे हैं.” इसी मुहिम से जुड़ी कांता मालू का कहना है कि जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा का पैगाम दिया था और कन्या भ्रूण का वध अहिंसा के संदेश का उल्लंघन है. राजस्थान सरकार ने हाल ही में कन्या भ्रूण हत्या के आरोप में 28 डॉक्टरों की प्रेक्टिस पर रोक लगा दी थी. लेकिन वंश, वसीयत और विरासत के नाम पर बेटियों को उपेक्षित रखने की प्रवृत्ति अब भी कायम है.

- नारायण बारेठ, बीबीसी संवाददाता, जयपुर


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भ्रुणहत्या को मैं कई तरीकों से देख रही हुँ

मैं भी अपने विचार रखने के लिये सोच रही हुँ, पर समझ मे नहीं आ रहा है, कि कहाँ से शुरू करूँ, क्योंकि भ्रुणहत्या को मैं कई तरीकों से देख रही हुँ।
एक तो वो जो जन्म देने के पहले ही मार दी जाती हैं, और एक वो जन्म लेने के बाद मार दी जाती हैं, एक वो जो जिन्दा रहती हैं पर उन्हे जीने का हक नही मिलता, एक वो जिन्दा रहती हैं तो जाने किस दुनिया कि स्वामिनी बन जाती हैं, अब वो किसी और को जीने नही देती, यानि कि यहाँ से फ़िर ह्त्या शुरू हो जाता है, समाज के ऐसे कई दृश्य हैं, जिन्हे देखकर मन विचलित हो जाता कि आखिर बोला जाये तो क्या बोला जाये, किसे समझाया जाये, और कैसे समझाया जाये।
उदाहरण के तौर पर मैं कुछ सच्ची बाते बता रही हुँ जो आये दिनो मेरे पास आती रहती हैं।
1. एक दिन मेरे पास एक महिला का फोन आया, अपनी बेटी-दामाद के सही जीवन के लिये औरा हीलींग कराना चाहती थी, आप कहेंगे वाह यह तो अच्छी बात, पर मैंने अन्त में वो केस लेने से इंकार कर दिया, कारण कि उनकी बेटी, शादी के बाद भी आगे पढ़ना चाहती थी, कुछ करना चाहती थी, इसके लिये उसने पहले ही अपने ससुराल में बात कर ली थी, और तब लोंगो ने कोई आपत्ति नहीं जताई, अब उनको मंजूर नहीं था, लड़की उस घर के लिय खुद के सपनों को मारने को तैयार को नहीं थी, वो एक बीवी, एक बहु, बनने के पहले खुद के पहचान को अपने ढंग से बनाना चाहती थी, इसलिये उसके घर मे हंगामा हो रहा था, जब बात मायके तक गयी तो सबने उसे यही समझाया कि बेट कुछ भी कर लो ना किचेन से छुटकारा मिलेगा न पति से, फ़िर इतना सब हंगामे की जरूरत क्या है? ससुराल में जो लोग बोल रहे हैं उनकी बात मान लो, हर तरफ़ से बेबस होकर उसने अपने आपको मारने से अच्छा अपने रिश्ते को ही खत्म करके आगे बढने का फ़ैसला ले लिया, सबकी नजरों में वो महापापी हो गयी, मेरे पास जब केस आया था तो वो तलाक के लिये पुरी तरह से तैयार थी, माँ नहीं चाहती थी कि तलाक हो, वरना समाज में वो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं बचेंगे। लोग चाहते थे कि मैं बेटी को पिंक औरा से ऊजान्वित करूँ ताकि, वो तलाक ना ले और आगे बढ़ने का सपना ना देखे। मुद्दे की बात यह थी कि जिसने मुझे यह केस रिफ़्फ़र किया था, वो शक्स मुझे हमेशा कहते थे कि "बेटा आप नारी जगत में जरूर कुछ अच्छा करोगे"।
बाद में मैंने उन शक्स से बात की, कि क्या समाज में मैं ही सिर्फ़ अच्छा करूँगी या और लोगो को भी करने देना चाहिये? आप भी भ्रुण हत्या के खिलाफ़ बोलते हैं, पर चन्द पैसे बनाने के लिये मेरे पास ऐसा केस भेज दिया जिससे किसी के सपनो की हत्या हो रही थी, यह क्या भ्रुण हत्या से कम दर्दनाक है? जिसने भी मेरे इस फ़ैसले बारे मे सुना, खरी खोटी सुनाई, कितनो ने तो यह तक बोल दिया कि यह लड़की चाहती ही नहीं कि लडकियाँ खुशी से रहें, कई लोगो ने कहा कि गरिमा कल को वही लडकी तुम्हे कोसेगी.... वगैरह वगैरह।
2. एक अन्य केस मिला था, जिसमें एक महिला जो कि सास हैं, चाहती थी कि उन्हें औरा प्रोजेक्शन सिखलाऊँ, मैं अपनी सुविधा के लिये पुछ लेती हुँ कि आप किस मकसद से इस कोर्स को सीखना चाहते हैं? उन्होंने ने बडे ताव से बतलाया कि वो अपनी बेटे बहुओं पर अपन कन्ट्रोल बनाये रखना चाहती हैं, इसलिये सीखना चाहती हैं, वो चाहती हैं कि उनकी बहु जो कुछ भी करे, अपनी सास के लिये करे, मुझे लगा कि शायद बहु इनको तकलीफ़ देती होगी, पर मामला कुछ और था, बहु ऑफ़िस जाती थी, उसके पहले घर के सारे काम निपटाती, आकर निपटाती, सासु माँ कि वो हरेक सेवा करती, महीने के अन्त में जो तन्ख्वाह लाती बस एक गलती थी कि वो पुरी तनख्वाह अपनी सास को ना देकर थोड़े बचा लेती थी, मुमकिन है वो उन पैसे को अपने व्यक्तिगत खर्च के लिये रखती होगी, पर सासु माँ को ये बरदाश्त नहीं था, उन्हें लगता कि बहु कभी दगा दे जायेगी। इसलिये उसके इस तनख्वाह रूपी पंख को वो काट देना चाहती थी। मुझे लगा कि एक भ्रुण हत्या ये भी है, किसी की सारी मेहनत और उस पर पलने वाले कुछ व्यक्तिगत सपने इनको मार डालो।
3. मेरी एक मित्र जो उम्र मे मुझसे काफ़ी छोटी थी, मेडिटेशन क्लास मे आती, ताकि वो सीख सके, वो हमेशा कहती, दीदी मुझे अपनी कला मे निपुण बना दो ताकि मै भी अपने पैरो पर खडी हो सकुँ, कमोबेश मै उसकी पारिवारिक हालत जानती थी, और मै चाहती भी हुँ, आज हरेक लडकी को अपने पैरो पर खडी हो सके, इसलिये उसे सीखाने मे मुझे कोई आपत्ति नही थी, पिताजी कोलकत्ता पुलिस ऑफ़िसर थे, मुझे तनिक भी अन्दाजा नही था कि समाज के बुराई को साफ़ करने वाले इंसान खुद इतने बुरे हो सकते हैं, एक दिन उनको पता लगा कि उनकी बेटी आम लडकियो से हटकर कुछ अलग कर गुजरने कि क्षमता रखने लगी है तो, उन्होने आकर सबके सामने ही कह डाला, पैरो की जुती कितना भी कर ले, सर का ताज नही बन सकती, और बननी की जरूरत भी नही है.... उस वक्त लडकी ने क्या महसुस किय होगा? क्या यह भ्रुण हत्या से कुछ कम है?
4. इस तरह के और कितने उदाहरण है जो मुझे ये सोचने पर विवश कर देते हैं कि शायद वो भ्रुण हत्या ज्यादा अच्छा है जो गर्भ मे ही कर दिया जाता है, कम से कम तिल तिल कर मरने की नौबत नही आती है, वो माता-पिता जो एक लडकी को सही मायने मे जीवन नही दे सकते, उसे मार देते है, ठीक ही करते हैं, क्योंकि जरूरी नहीं कि लड़की बड़ी होकर सिर्फ़ घर चलाने, शादी करने और बच्चे पैदा करने के ख्वाब देखे, वो उसके अलावा भी कुछ और करने के ख्वाब देख सकती है, वैसी परिस्थिती मे उसे रोज मरना पड़ता है, रोज ही उसके ख्वाबो की, उसके अरमानो की हत्या की जाती है, रोज-रोज मरने से अच्छा है कि एक बार मे ही मार दिया जाये... कहानी खत्म।
मैं बिल्कुल दुसरे दृष्टिकोण से बोल रही हुँ जो वास्तव में गन्दा है, इसका मतलब नहीं बनता कि मैं भ्रुण हत्या के पक्ष में हुँ, आप मेरी भावाना को ठंडे दिमाग से समझेंगे तो पायेंगे कि मैं उसके पक्ष में नहीं हुँ, बल्कि मैं ऐसे हत्या के विपक्ष में हुँ जो तिल-तिलकर जीवन को मार रही है, मर-मर कर जीने पर मजबुर कर रही है, जब जीवन का मतलब साँस लेना, शादी करना, बच्चे पैदा करना इत्यादि ही रह जाता है, जब अपने सपनों को मारने पर विवश होकर जीना पडता है, जब इसे ही अपनी किस्मत समझ कर खुन के ऑसुओं को पीने पर विवश होन पडता है.... मैं इस सिस्टम के खिलाफ़ बोल रही हुँ।
मुझे नहीं पता कि मेरा विचार आपके मुहिम के अनुरूप है या नही, अगर आपको ऐसा लगता है कि मेरा विचार आपके मुहिम को विषय से भटका सकते हैं तो इन्हे ब्लॉग पर ना जोड़े, मुझे तनिक भी आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि किसी भी मुहिम के सार्थक होने के लिये विषयानुकुल विचारों से ही आगे कदम बढाया जा सकता है, अन्य बातें भटकाव पैदा कर सकती हैं। धन्यवाद
संपर्क:
Dr. Garima Tiwari (B.A.S.M)
Gold medal in Reiki
Specialized in P.K.M (Power key meditation), Face Reading, Aura Reading, Aura healing, Medtational Healing.
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Treatment- mental problems, memory power, respiratory problems, nerve disorder, heart problem, skin problem.
Healing- Environment, Relationship, Infant.
Boosting- Career opportunities, Luck. Wealth.
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- Dr. Garima Tiwari (B.A.S.M)


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मुझे जीने दो
मुझे
जीना है
मुझे जीने दो

हे जननी
तुम तो समझो
मुझे दुनिया मे आने तो दो

तुम
जननी हो माँ
केवल एक बार तो
मान लो मेरा भी कहना

नहीं
सह सकती मैं
और बार-बार अब
और नही मर सकती मैं

कोई
तो मुझे
दे दो घर में शरण
रहने दो मुझे अपने चरण में

क्यों
हर बार मुझे
तिरस्कार ही मिलता है?
मेरा आना सबको ही खलता है

हे जनक
मैं तुम्हारा ही तो
बोया हुआ बीज हूँ
नही कोई अनोखी चीज़ हूँ

बोलो
मेरी क्या ग़लती है?
क्यों केवल मुझे ही
तुम्हारी ग़लती की सज़ा मिलती है?

कब तक
आख़िर कब तक
मैं यह सब सहूँगी?
दुनिया में आने को तड़पती रहूंगी?

क्या
माँ का गर्भ ही
है मेरा सदा का ठिकाना?
बस वहीं तक होगा मेरा आना जाना?

क्या
नहीं खोलूँगी मैं
आँख दुनिया में कभी?
क्यों निर्दयी बन गये हैं माँ बाप भी?

कहाँ तक
चलेगी यह दुनिया
बिन बेटी के आने से?
बेटी बन कर मैने क्या पाया जमाने से?

मैं
दिखाऊंगी नई राह
दूँगी नई सोच जमाने को
मुझे दुनिया में आने तो दो

मैं
जीना चाहती हूँ
मुझे जीने दो! मुझे जीने दो!

Seema Sachdev, 7a,3rd cross,Ramanjanaya layout, Marathalli, Bangalore-37 Mob. no.:- 09980847468
e-mail:- ssachd@yahoo.co.in , sachdeva.shubham@yahoo.com


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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध
भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं।
यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।
जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है।


-- महेश कुमार वर्मा, पटना: दिनांक : २०.०७.२००८


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गुरुवार, १७ जुलाई २००८

पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ - चरणसिंह पथिक

पुरस्कृत कहानी : बक्खड़


इस कहानी ने लेखक श्री चरण सिंह पथिक को पुरस्कार ही नहीं दिलाया, उन्हें सफल एवं सजग कहानीकारों की जमात में भी ला खड़ा किया। आज से कोई ग्यारह साल पहले देहात के रचनात्मक अकेलेपन से ऊबकर लेखक जब सदा की भाँति अपने साहित्यकार एवं कवि मित्र प्रभात के घर जयपुर पहुँचे तो वहाँ साहित्यकारों का मजमा जमा हुआ था। प्रभात के आग्रह पर लेखक ने अपनी इस नई कहानी को वहाँ पढ़ सुनाया। सुनकर सब अवाक, लेखक चकित। जब सन्नाटा टूटा तो सबने कहानी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और कहा कि यह ‘‘हंस’’ या ‘‘पहल’’ में जानी चाहिए। लेखक उम्र में उन सबसे बड़ा था, पर साहित्यिक अनुभव में उन सबसे छोटा। इसे हीन ग्रंथि कह लें या और कोई कारण, लेखक फिर भी इसके प्रकाशन के प्रति उदासीन ही बना रहा। उस बीच 1998 में ‘दैनिक नव ज्योति’ ने कथा प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें इस कहानी को भेज दिया गया। निर्णायक ज्ञानरंजन जी ने ढेर सारी कहानियों में से इसे प्रथम पुरस्कार के लिए चयनित किया। बस, इसके बाद लेखक का सफर हंस, पहल, कथादेश, वसुंधरा, वर्तमान साहित्य आदि को पार करता हुआ अन्य पत्र-पत्रिकाओं तक जा पहुँचा। - ई हिन्दी साहित्य सभा



पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ भाग-1
पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ भाग-2
पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ भाग-3


पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ भाग-1


गैबी और बक्खड़
उत्तर-पूर्वी राजस्थान में आदिवासी मीणा, गूजर और अन्य तबको की महिलाओं द्वारा झगड़े के दौरान पुरुषों को दी जाने वाली बहुप्रचलित गालियाँ हैं- ‘गैबी और बक्खड़’ यों दोनों शब्द अर्थ के स्तर पर लगभग समान हैं या यों कहना चाहिए कि दोनों ही एक जूड़ी (जुआ) के दो बैल जैसे हैं, मगर नस्ल अलग-अलग है।
जहाँ तक ‘गैबी’ शब्द का सवाल है-यह अधिकांशतः धूर्त, मक्कार, लफंगा था फिर ऐसे व्यक्ति के लिए भी प्रयुक्त होता है जो विश्वसनीय नहीं रहा हो। इस गाली का लोग खास बुरा नहीं मानते। लेकिन आप किसी को ‘बक्खड़’ कहकर ताना मारेंगे या गाली देंगे तो स्थिति बिल्कुल उलट हो जाएगी। मिसाल के तौर पर इसे यहाँ दिए कुछ संवादों से बखूबी समझा जा सकता है।
जैसे अगर कोई बच्चा,किशोर या जवान कहीं ऊधम या शरारत करके घर आता है और उसकी शिकायत उसकी माँ से की जाए तो वह कभी-कभी गुस्से में अपने बेटे से कह देती है - ‘‘सारे दिन उधम करता रहता है। तू मरा नहीं गैबी? मर जाता तो क्लेश बुझता।’’ इसी प्रकार कोई व्यक्ति हमसे मजाक कर रहा हो, या उसकी वजह से हमारा कोई काम न हो सका हो, ऐसी हालत में हम यह कह भी दें कि - ‘‘यार तू तो बहुत गैबी निकला’’ तो उसे बुरा नहीं लगेगा।
दोनों ही संवाद सुनने और पढ़ने में खराब लगते हों, मगर माँ द्वारा अपने बेटे को दी गई ‘‘गैबी’’ गाली में भी उसका अपार वात्सल्य छिपा रहता है। गैबी कहते हुए उसे खास जोर नहीं आता, मगर वह अपने लाल को ‘‘बक्खड़’’ नहीं कहेगी। दोनों शब्दों की व्यंजना बिल्कुल भिन्न है। कभी-कभी बहुत गुस्से में या बहुत ज्यादा प्रताड़ित होने पर पत्नी भी गैबी शब्द का प्रयोग कर बैठती है। पति अपने लिए गैबी संबोधन सुनकर गुस्सा तो होता है, मगर उसे सहजता से टाल जाता है। यह सिर्फ मीणा-गूजर जाति में ही नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाली सवर्ण व पिछड़ी जातियों और दलित-आदिवासी जातियों के बारे में भी इतना ही सच है।


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पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ भाग-2

‘‘हरामजादी कुतिया, तेरे बाप का घर है जो चली आई?’’ और फिर तड़ाक-तड़ाक लात-घूँसे मैं एक कोने में कबूतर सा दुबका हुआ माँ का पिटना लाचार हो बस देख सकता था। कितना खौफनाक और मुश्किल होता है अपनी माँ को बेरहमी से पिटना देखना....जी करता था, कुल्हाड़ी उठा लूँ और फिर खच्चाक् से अपने बाप के सिर में दे मारूँ। मगर मैं कुछ भी नहीं कर सकता था सिवाय रोने के।
माँ ने कभी प्रतिरोध नहीं किया हो ऐसी बात नहीं है। लेकिन कब तक....? वह भूखी प्यासी और घायल कई-कई दिनों तक अँधेरी कोठरी में पड़ी रहती और मैं माँ के सूखे, पिचके हुए स्तनों को लिबड़ता रहता। एक सुनियोजित तरीके से वे अपनी हर चाल चलते। कोई नहीं चाहता था कि माँ यहाँ रहे। उनकी बला से कहीं जाए। क्या कसूर था मेरी माँ का....?
मुझे जन्म देने के लिए माँ ने जीते जी नर्क भोगा था और उस नर्क की शुरुआत भी बड़े धूमधाम से हुई। पहले वाले बाप को सरकार में उच्च पद मिल गया था। बाबा का सीना चैड़ा हो गया था। वे चैबीसा के पटेल थे। पटेल का अपना रुतबा था। मान-सम्मान था। ऊँचा खानदान था। इस पर पूरे इलाके में उसके बेटे को उच्च पद मिलना। बस उसी दिन से बुरे दिन शुरू हो गए थे माँ के। घोर उपेक्षा, तीखे, जहर बुझे बोल। फिर मेरा पेट में आना, माँ का सवेरे जल्दी उठना, आटा पीसना, झाड़ू लगाना, गोबर डालना, कंडे थापना, पानी लाना, दोपहर में रोटी बनाना, बीच-बीच में सास-ससुर की झिड़की, फिर शाम हो जाना। माँ कोल्हू का बैल बनकर जीने पर मजबूर थी बाप ने तो माँ से बोलचाल तक बन्द कर दी थी। दादी का माँ के हाथ से रोटियाँ छीन लेना। मेरे लिए दूध पर पाबंदी लगा देना। माँ प्रतिरोध करती तो दादी दहाड़ती, ‘‘तेरा बाप कमा के रख गया है क्या? बाप खाणी, मरी नहीं तू.....नकटी राँड।’’
माँ भी तीखा जवाब दे देती तो, घर में कोहराम मच जाता। दादी रोने-बिसूरने लगती। अपने नाटक को चरम पर पहुँचाने के लिए दरवाजे से माथा पीटने लगती। तमाम तरह की भद्दी गालियाँ बकती, ‘‘आने दे तेरे खसम को, तेरी खाल नहीं उधड़वा दूँ तो मेरा नाम भौंरी नहीं।’’
और जब बापू शहर से आते तो दादी बापू के नसीब को कोसती और रो-रो कर स्वांग भरती, ‘‘संभाल इस कलूटी को। अरे, तेरे तो भाग ही फूट गए। काम करने के नाम पर मारने दौड़ती है हत्यारी। ऐसा धक्का दिया कि देख....।’’ और फिर वह अपना माथा बापू को बताती। बापू के खौफ से माँ बकरी की तरह मिमियाने लगती। मगर सब बेकार जाता। जो भी हाथ लगता, माँ रुई की तरह धुन दी जाती। माँ मुझे पेट में लिए गाय सी डकारती। होश ही नहीं रहता। लूगड़ी कहीं गिरती। पड़ोसी जैसे-तैसे बचाते। मगर कब तक? कई-कई दिनों तक माँ को भूखा रखा जाता। दिन भर काम करवाया जाता। माँ खुद भूखी रह सकती थी मगर मुझ अभागे को कैसे भूखा रख सकती थी। हाथ-मुँह धोने के बहाने खेतों की तरफ निकल जाती। चने की घेघरी चबाती। गेहूँ की बाल मसल-मसलकर पेट में डालकर मुझे तृप्त करती। पड़ोसियों से छुपकर रोटियाँ लाती और रात को चुपचाप खाकर पानी पी सो जाती। जब भी बादल होते माँ कराहने लगती, पूरी रात सो भी नहीं पाती। शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था, जहाँ दानवीय चिन्ह नहीं हों। कंधे, बगल, पिण्डली व शरीर के तमाम जोड़ बुरी तरह दर्द करते। जैसे-जैसे दिन नजदीक आ रहे थे, माँ की मुश्किलें बढ़ रही थीं। साँवला रंग और तीखे नैन-नक्श अब मात्र बीते युग की कहानी बन कर रह गए थे। माँ सूखकर छुआरा जैसी हो चली थी। चलती तो चक्कर आने लगते। फिर भी माँ का जीवट कम नहीं हुआ। बदस्तूर घर का काम करती। लेकिन अन्दर ही अन्दर टूट सी गई थी माँ। जब लगने लगा कि अब नहीं जी पाऊँगी तो एक रात चुपके से नानी के यहाँ आकर शरण ली। बेहद डरावनी रात थी वह। मई की उमस, वातावरण में बेशरमी सी पसरी हुई थी। घोर अँधेरा, चारों तरफ सन्नाटा। कभी-कभी उमस से बौखला कर मोर कुहुकने लगते। रात के दूसरे पहर माँ पहुँची। माँ की हालत देखकर नानी सकते में आ गई। घर में जगार हो चुकी थी। नानाजी लाठी टेकते हुए बाहर आए। छोटे मामाजी को आवाज देकर पूछा, ‘‘कौन आयो है?’’
‘‘मैणा आई है।’’ मामाजी ने अवरुद्ध कंठ से बस इतना ही कहा। नानाजी सब कुछ समझ गए। माँ कटे पेड़ सी चारपाई पर सिकुड़ कर लेट गई थी। आँखों से लगातार दर्द बह रहा था। नानी हौले-हौले सिसकियाँ लेती माँ के सिर पर हाथ फेर रही थी। रात का वक्त, लालटेन की मन्द रोशनी। माँ ने अपनी पीठ, पिंड लियो आदि को बतौर सबूत नानी को दिखाया। नानाजी हल्की आह भरकर बैठक में जा चुके थे। नींद कोसों दूर थी।
सुबह का वातावरण बोझिल था। उजाले में माँ की हालत देखकर नानी ने बाबा, दादी और बापू की सात पुश्तों की खबर ले डाली।
‘‘राम करे तो कीड़े पड़ेगे निपूतों को....गैबी, बेशरम, मर्द होकर बैय्यर पै मर्दानगी दिखावे, नामर्द कहीं का....।’’ नानी जब शांत होती तो वह माँ की पिंडलियों पर पड़े नीले निशानों को सहलाने लगती। माँ एक अनगढ़ पीड़ा से कराह उठती।
लेकिन बाप के घर बेटी कब तक धिकेगी.....? अगर बाल-बच्चा यहीं हो गया तो.....? दिन बीतते-बीतते ऐसे सवाल भी नानी के जेहन में दस्तक देने लगे थे।‘‘ खानदान की नाक कट जाएगी अगर बाल-बच्चा हो गया संतों को।’’ नानी ने एक दिन यही प्रश्न नानाजी के सामने रखा।
‘‘..........तो फिर..........?’’ नानाजी ने हताश होकर बमुश्किल शब्दों को बाहर निकाला।
‘‘..........तो फिर क्या..........। तुम जाओजी। समधी से जैसे-तैसे हो संतों को रखने को कहो। अगर यहाँ कुछ हो गया तो जात बिरादरी में क्या मुँह दिखाएँगे।’’ जगरौटी इलाके की भूडैल धरती के बाषिन्दे, गूजर-मीणों की अपनी परम्पराओं में पली-बढ़ी मजबूर नानी आखिर कहती भी क्या?
और एक दिन नानाजी बाबा के पास गए। मैं जानता हूँ नानाजी ने हाथ जोड़े होंगे। अपनी पगड़ी बाबा के पैरों में डालकर बेटी को अपनाने की भीख माँगी होगी। जात-बिरादरी, लोक-लाज और ऊँचे खानदान का वास्ता दिया होगा। वरना बाबा सहज में हाँ करने वाले नहीं थे।
बाबा का व्यक्तित्व रोबीला था। नानाजी कहते हैं कि उनका खानदान सात पीढ़ियों का खानदानी और हमारा पाँच पीढ़ियों का। बाबा चैबीसा के पटेल हैं। जात-बिरादरी एवं अन्य जातियों की पंचायत में उनको आदर से बुलाया जाता था। ऊँचा कद, चैड़ा माथा। नुकीली मूँछें और सुतवां नाक, बड़ी-बड़ी आँखें, जिनमें अब भी जमींदार मीणों के सामंती अवशेष बचे हुए थे। जब पंचायत में बोलते तो सन्नाटा छा जाता। पूरे ढाई सौ बीघा के जोता जो ठहरे। चमार, कोली, जोगी आदि बाबा के यहाँ बारी-बारी से हाली लगते। गोपाल डोम का पाँच बीघा का आम वाला खेत बाबा ने जिस तरीके से हड़पा, वह सभी को मालूम है। सिर्फ पाँच हजार रुपये कर्ज देकर खेत की आँट लिखवा ली थी और फिर सूद पर सूद। बेचारा गोपाल डोम अब घर-घर ढोल बजाकर दाने माँगता फिरता है। नानाजी ने अपने पाँच पीढ़ियों वाले खानदान की दुहाई देकर माँ को जैसे-तैसे तैयार किया और सग्गड़ जोड़कर एक दिन माँ को पहुँचा दिया उसी नर्क में सड़ी-गली परम्पराओं का वास्ता देकर एक नर्क और भोगने के लिए। नानी को विष्वास था, माँ अब शायद ही बचे। अच्छा है, स्वर्ग मिलेगा, धणी के दरवाजे मरने पर। नानी मन ही मन आष्वस्त होती है। रूढ़ियों में जकड़ी नानी करती भी क्या?

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मेरा जन्म और बापू का शहर में किसी पढ़ी-लिखी सुन्दर औरत को मेरी दूसरी माँ बनाकर लाना, सब पता नहीं एक ही दिन कैसे हो गया। संयोग भी हो सकता है। बापू ने किसी से कुछ भी नहीं कहा। बाबा और दादी तो चाहते भी यही थे। दादी बहू को देखकर बहुत खुश थी। बड़ा घर, बड़ी बातें। सभी जात-बिरादरी वाले फुस-फुस करने के अलावा कुछ नहीं कर सके। उस दिन बड़ा भोज रखा गया था। बाद में सुना कि कोर्ट में शादी की है। माँ ने सुना तो एकाएक कह उठी, ‘‘हे भगवान, अब तो समेट ले मुझे, और कितना भुगताएगा.....?’’
आस-पड़ोसी डर के मारे माँ से बात नहीं करते। अगर कभी किसी को दादी देख लेती तो फिर न माँ की खैर थी न उस औरत की, जो माँ से बात कर रही होती। माँ हमेशा अँधेरी कोठरी में पड़ी रहती। नानकी ताई माँ से बेहद लगाव रखती थी। वही प्रसव में साथ रही। नानकी ताई बरसों से इस घर में काम करती आ रही थी। लेकिन जब से माँ ने इस घर में कदम रखा है, दादी ने उसकी भी छुट्टी कर दी थी। लेकिन नानकी ताई दादी की नस-नस से परिचित थी। वह उससे जमकर टक्कर लेती। दादी तो चाहती थी कि माँ इस अँधेरी कोठरी में प्रसव के समय तड़प-तड़प कर अपनी जान दे दे। मगर नानकी ताई सतर्क थी। वह वक्त रहते हाजिर हो गई थी। दादी के लाख मना करने के बावजूद भी नानकी ताई ने र्दाइं का दायित्व पूरी सतर्कता और ईमानदारी से पूरा किया। मेरे पैदा होने की खुशी माँ केवल नानकी ताई के साथ ही बाँट सकी थी। वो तो नई बहू के आगमन पर बहू के रंग-रूप और पढ़ाई पर इतने मुग्ध थे कि मैं कब पैदा हुआ कोई मतलब ही नहीं था।


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पुरस्कृत कहानी : बक्खड़ भाग-3

मैं कैसे बड़ा हो रहा था..........। और तमाम विपदाओं के बीच माँ कैसे मुझे पाल रही थी, ये माँ का जीवट था। तीन साल का हो चुका हूँ। बाबा-दादी मेरी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। मैं चाहता हूँ कि दादी मुझे गोद में लेकर चूमें। बाबा मुझे खेतों पर घुमाने ले जाएँ। मैं सब कुछ चाहता हूँ। चाँद, तारे, खिलौने-कार, घोड़ा, गुड़िया। मैं रूठ जाऊँ और बाबा मुझे मनाएँ। दादी मुझे छाती से लगाकर लोरी सुनाए। लेकिन मैं रो रहा हूँ। ना जाने कब मेरी नाक बहकर मुँह में आ गई। माँ खेत पर सरसों की लावणी करने गई है। मेरे पास पहनने को चड्डी तक नहीं है। मैं धूल में लोट-पोट एक रोटी के टुकड़े के लिए धरती-आसमान एक कर रहा हूँ, गला बैठ गया है रोते-रोते। अब और रोया नहीं जाता। दादी उड़ती सी नजर मुझ पर डालकर माँ को भद्दी गाली देती हुई उठकर सूँघना सूँघने लगती है। बाबा बैठक में हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं। घेरबंद बाखर। चारों तरफ पर कोटा। एक लोहे का जालीदार फाटक। मैं रेंगता-रेंगता फाटक के पास आकर खड़ा हो गया हूँ, शायद आसमान से उतरेगी मेरी माँ। मेरे सामने, इस दगड़े में। इसी आस में हर शाम खड़ा रहता हूँ फाटक के पास भूखा-प्यासा। छः साल गुजर जाते हैं। थोड़ा बहुत समझने लगा हूँ, गाँव के हिसाब से। समझने लगा हूँ कि मेरे बाप के पास दो बैय्यर हैं। एक शहर में रहती है उनके साथ बन-ठन कर। गाँव तो बस तफरीह के लिए आती है। एक माँ है जो कोल्हू के बैल जैसी घूमती रहती है। घर से खेतों पर और खेतों से घर। गोल-गोल चकरघिन्नी सी। आज दादी और बाबा शहर जाने की तैयारी कर रहे हैं। दादी ने कीमती कशीदा कढ़ी हुई लुगड़ी और छींट का नया घाघरा पहना हुआ है। गले में सोने का गुलीबंद। हाथों में चाँदी के हथफूल। माथे पर चाँदी का चमकता बोरसा। चमड़े की नई जूती। बाबा मूँछों पर खिजाब लगा रहे हैं। लाल चूंदड़ी का साफा। जवाहर जाकिट। इकलंगी धोती। खादी का सफेद झक्क कुर्ता, पैरों में चमरौधा, हाथ में बेंत। पटेल जो ठहरे। ऐसे ही थोड़े जाएँगे शहर। हवेली के ताला ठोक दिया। माँ को हिदायत दी गई कि भैंस-बैलों का
ध्यान रखे। गोबर रोज डाले, दूध-दही को छूए नहीं। मैं माँ की ओर टुकर-टुकर देखता। पूछता तो माँ की आँखें गंगा-जमुना हो जातीं। नई माँ को बेटा हुआ है। दस दिन में लौटेंगे। माँ कराह उठती है-‘‘हे भगवान।’’
ग्यारहवें दिन फाटक के बाहर एक जीप आकर रुकती है। मैं कौतूहलवश दौड़कर खोलता हूँ। जीप से पहले दादी उतरती है। गोद में खरगोश सा लिए हुए। मुझे देखते ही दुत्कार देती है, ‘‘दूर-दूर, दूर हट, गैबी का।’’ मैं सहम कर एक ओर हो जाता हूँ। दादी के मुँह से एक निहायत ही गंदी गाली निकलती है- ‘‘मैया की.....आ गया जीप देखने।’’ मैं रुआँसा हो जाता हूँ। एक नजर नई माँ पर डालता हूँ। शायद कुछ लाई हो शहर से मेरे लिए। एक नजर बापू और बाबा पर मगर झिड़कियों के अलावा कुछ नहीं मिला।
हवेली के ढांई तरफ दो गह की पाटौर थी। उसी में डाल रखा था हमको। एक दिन मैं नन्हे को देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका। डरते-डरते हवेली के ऊपर पहुँचा। जाड़े के दिन थे। नई माँ, दादी, बापू हवेली के ऊपर बैठे हुए नन्हे को लेकर भविष्य की योजना बना रहे थे शायद।
मुझे देखते ही दादी फट पड़ी, ‘‘चल नीचे उतर, नकटी राँड के।’’
मैं जड़ सीढ़ियों के पास खड़ा रह गया। दादी को गुस्सा आ गया। उसने अपना भारी भरकम शरीर समेटा और भनभनाती मेरी ओर लपकी। एक जोरदार धक्का लगाया। मैं सँभल पाता इससे पहले ही कदम डगमगाए और लुढ़कता हुआ नीचे चैक में।.....एक भयानक चीख वातावरण में उछली। माँ ने फौरन चीख को लपका। हकबकाती चैक में आई। मैं बेहोश था। दाँए हाथ की हड्डी चटख गई थी। माँ रोती-रोती मुझे उठाकर बाहर ले गई। पाटौर में चारपाई पर मुझे लिटाया गया। शोर सुनकर बाबा आए। बोले- ‘‘जो हुआ सो हुआ। बाहर मत जाना, किसी से कहने-सुनने की जरूरत नहीं है।’’ मैं अब भी बेहोश था।
माँ ने उस दिन पता नहीं कहाँ से साहस जुटाया होगा। माँ का धैर्य टूट चुका था। माँ अब दबने वाली नहीं थी। उसने दादी की सात पीढ़ियों की जब खबर लेनी शुरू की तो दादी आग-बबूला हो गई। बापू की मातृभक्ति भी प्रचंड हो उठी।
‘‘इसकी इतनी मजाल। निकल अभी मादर.....की दो कौड़ी की औरत।’’ और न जाने क्या क्या.....। मुझे धीरे-धीरे होश आ रहा है। मैं देख रहा हूँ कि माँ पर लात-घूँसों की अनवरत मार पड़ रही है। कपड़े अस्त-व्यस्त हैं। मैं चारपाई के एक कोने में डर से दुबका सुबक रहा हूँ। कोई आए और बचा ले मेरी माँ को। जी करता है-मैं कुल्हाड़ी उठाऊँ और खच्चाक.....। और फिर हम दोनों माँ-बेटे होश नहीं कब तक बेहोश उस पाटौर में पड़े रहे। शाम हो चुकी थी शायद।
माँ ने अब काम करना बिल्कुल बंद कर दिया था। अब न तो माँ खेतों पर जाती और न ही घास लाती। ना ही गोबर डालती। एक फैसला कर चुकी थी माँ।

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‘‘मैं क्यों खटूँ? मैं क्यों चराऊँ भैंसों को? क्यों गोबर डालूँ? बाँदी थोड़ी आई हूँ। सात फेरे खाए हैं, काम करे मेरा मुट्ठा। जिसको जो करना है कर ले मेरा, मारेंगे तो सही। पर अन्याय तो अब एक दिन भी सहन नहीं करूँगी।’’
इस बात पर घर में बहुत कोहराम मचा था। लेकिन माँ दृढ़ थी। अब वह खुलकर बोलने लगी थी। लेकिन माँ अकेली कब तक लड़ती.....। कई बार आत्महत्या करने की भी सोची, मगर माँ ने घर छोड़ना ही उचित समझा। अपने और मेरे भविष्य की खातिर माँ ने दूसरी बार घर छोड़ा था।
माँ आते ही नानाजी पर बरस पड़ी, सारी बिरादरी मर गई थी क्या जो नर्क में ले जाकर पटका मुझे? और नहीं मिला कोई? किसी गरीब को देता तो एहसान मानता। हाथ-पैर तो ना तुड़वाती। भाड़ में गया खानदान। ऐसे ही होते हैं क्या पटेल? माँ ने जमकर सभी को कोसा और फूट-फूट कर रो पड़ी। सभी की आँखें नम थीं। बैठक भरी हुई थी। मामाजी तो गुस्से में बंदूक निकाल लाए।
‘‘इनकी ऐसी की तैसी, गोली मार दूँगा एक-एक को।’’बड़ी मुश्किल से सबने उन्हें समझाया। शान्त किया। हीरू नानाजी ने पंचायत बिठाने की सलाह दी। रामेसर मामाजी ने कोर्ट में दावा करने का सुझाव दिया। नानाजी सबकी सुन रहे थे। पहले ही सूख-सूख कर पिंजर हो चले थे। उनके दिमाग में एक ही बात कील की तरह
धँस गई थी। ‘‘मेरी संतों को छोड़’’ दिया है।
पंचायत में लोग हँसी उड़ाएँगे। मजे ले-लेकर पूछेंगे। कोर्ट कचहरी में सालों लगेंगे। तब क्या किया जाए। उन्होंने अपनी कोटर सी आँखों को झपकाया और बोले- ‘‘ना पंचायत बिठाऊँगा और ना ही कोर्ट में जाऊँगा। संतों यहीं रहेगी, मेरे पास। जब तक कोई इंतजाम नहीं हो जाता।’’ नानाजी का फैसला सुनकर सब हतप्रभ थे।
अब मैं आठ साल का हो गया हूँ। साढ़े छः बरस से आठ साल तक ननिहाल रहा। इन डेढ़ वर्षों में नानाजी की जो हालत हुई वह अविश्वसनीय थी। माँ को लेकर उन्हें हजारों आँखों के हजारों सवालों का उत्तर देना पड़ता था। मामाजी तथा नानाजी दोनों को शराब की लत ने तोड़कर रख दिया। वे अब बैठक के बाहर कम ही निकलते। पंचायतों में जाना छूट चुका था। घर की हालत दयनीय हो चली थी। सब चैपट हो चला था।

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और इसी का प्रतिफल हुआ-माँ का बीस हजार में सौदा होकर नाते जाना।
उसी दिन मुझे नए कपड़े पहनाए गए थे। मैं बहुत खुश था। मुझे अपनी आठ वर्ष की जिन्दगी में कभी इतनी खुशी नहीं हुई थी। उस दिन घर में बड़ी चहल-पहल थी। यों वह कहने को ही घर था। वर्ना ननिहाल था। देशी घी में पुआ-पुड़ी भूख को उभार दे रहे थे। नानी के चेहरे पर संतोष झलक रहा था। माँ को भी नए-नए कपड़े लाए गए थे। एक सितारों जड़ी, कशीदा कढ़ी हुई लुगड़ी, जिसमें मोर, तोता, फूल पत्तियाँ जीवंत थे। नई अँगिया, नया सलूका, नया छींट का घेरदार घाघरा। कई गहने-हथफूल, गुलीबंद, बोरला, कणकती, कडूल्या, सींक-सारा का सारा जेवर चाँदी-सोने का था। नानाजी बेटी को ठिकाने से लगाने के बाद मेहमानों के साथ बैठक में कई आदमियों के साथ मजे से हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। बाहर गैत (बाड़े) में नीले बैलों की एक मलूक जोड़ी बँधी हुई थी। उन्हीं के पास सग्गड़ (ताँगा) रखा हुआ था।
कुल बीस हजार में सौदा तय हुआ था माँ का। दस हजार झगड़े के और दस हजार नानाजी ने अपनी अंटी में खोंस लिए थे। माँ के कपड़े जेवरों को देखने के लिए आँगन में चारपाई पर एक नुमाइश सी लगी हुई थी। सभी औरतें अपने-अपनी तरीके से चीजें परख रही थीं।
मेरे पाँव हवा में थे। बहुत दिनों बाद सग्गड़ में मौजी खाने का अवसर आने वाला है। एक नया बाप मिलने वाला है। मैं बैठक में बैठे मेहमानों में अपने नए बाप को उड़ता सा जाता और देख आता। फिर जाता और पहले वाले से उसकी तुलना करता। तुलना करते ही मुझे पहले वाले का हर वक्त नफरत और गुस्से में डूबा हुआ चेहरा याद आने लगता और मैं सर से पाँव तक काँप उठता।
माँ को दूसरी बार लाड़ी जैसी सजाया गया। कितनी अथाह पीड़ा हुई होगी माँ को.....। कितनी बार किस्मत को कोसा होगा माँ ने.....? विदा के वक्त कितनी रोई थी माँ.....।
नानी ने बार-बार माँ से लिपट-लिपट कर रोते हुए ना जाने कितनी ही ऊँच-नीच की बातें माँ को समझाई.....। नानाजी बार-बार मुझे दुलार रहे थे। मामाजी के होठ दुरूख से फड़क रहे थे। सारा मोहल्ला ही हमें विदा करने आया हुआ था। कितना अपनापन था सभी में। कितना प्यार था एक दूसरे में.....। नानी ने बहुत सी चीजें बनाकर एक छोटे से संदूक में रख दी थीं। बैल सग्गड़ में जोत दिए गए थे। एक टिचकारी के साथ सग्गड़ चल पड़ा था। सब बैठ चुके थे। धीरे-धीरे ननिहाल पीछे छूटता जा रहा था। सग्गड़ में मेरे पास बैठे माँ लगातार रोए जा रही थी.....रोए जा रही थी.....।
नया घर, नया गाँव, नया माहौल। नया बाप, नया बाबा, दादी नहीं थी। सब कुछ नया ही नया, हम भी नए। नए घर में जोरदार स्वागत हुआ। लगभग सारा गाँव ही महीनों तक मुझे तथा माँ को देखने उमड़ा रहा। गाँव की थाई (चैपाल), कउ (अलाव), गलियों, मोहल्लों यहाँ तक कि हर घर में चूल्हे पर कई महीने तक एक ही कथा रही, ‘‘हजारी मीणा नई भौंटिया लायो है, संग में एक आठ-नौ साल को छोरा भी। जिसका एक हाथ टेढ़ा है।’’ मैं नए घर का राजकुमार था, माँ महारानी। मैं अब मूला मीणा वल्द हजारी मीणा हो चुका था। माँ ने बाकायदा घर सँभाल लिया था। जो माँगू फौरन हाजिर। मैं रूठ जाता तो गजब हो जाता, गाँव भर में दद्दू के साथ घूमता-फिरता। स्कूल के नाम से ही बिदकता। पढ़ने का खास चाव नहीं था। पिछली तमाम यातना और पीड़ा से लबरेज स्मृतियों को पोंछ कर माँ ने अपने आप से एक गुप्त समझौता कर लिया था। भूल गई थी सब कुछ अपना अतीत दफन कर चुकी थी, माँ एक और नए भविष्य की बुनियाद रख रही थी। नई उमंग के साथ जिन्दगी को भरपूर जीने की चाह फिर से जाग उठी थी। वक्त का घोड़ा दिन, महीने, सालों को रौंदता हुआ दौड़ रहा था।
सत्रह-अठारह वर्ष का रहा हूँगा। दद्दू के साथ खेतों पर काम करता। एक हाली भी लगा रखा था, गनेसी चमार। काफी जमीन है। माँ घर को सँभालती। मुझसे छोटे रामसहाय और हरसहाय को दद्दू ने पढ़ने बिठा दिया है। दोनों शहर में रहकर पढ़ते हैं। मेरा काम भैंसों को चराना था। गाँव का विशाल चारागाह, जिसमें सभी की भैंसें चरतीं, चराने वाले सभी किशोर। चैमासे में रिमझिम बूँदों में भीगते हुए फाँद (लंबी कूद) कूदते, दकना (ऊँची कूद) कूदते, जोर (कुश्ती) करते।
मेरे साथ ही सुखराम पटेल का बदरी, भोंदू का खिलारी, जगन का जौहरी और मलुआ का रमजू। सभी खेलते-कूदते। भैंसें चराया करते।

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मैं और बदरी एक दिन जोर कर रहे थे। मैंने धोबीपाट लगाया तो बदरी बच गया। लेकिन जब इकलंगा मारा तो सीधा चित लाया। सुखराम पटेल न जाने कब आकर खड़ा हो गया था। पूरे गाँव का पटेल था। उसके बेटे को मैं पटक दूँ। राम.....राम.....।
वह अपने बेटे बदरी पर बरस पड़ा- ‘‘हरामजादे, मूला से हार गया। एक बक्खड़ से.....ना जाने किसका मूत है ये और तू इसी से मात खा गया। डूब मर मादर .....। आ.....क्क.....थू.....।’’
मुझे जैसे हजारों विषधरों ने डस लिया हो, मैं संज्ञा शून्य हो चुका था। मुझे पहली बार लगा कि मैं आदमी होने के अलावा भी और कुछ हूँ। बक्खड़.....बक्खड़.....मैं बक्खड़ हूँ। मैं मूला मीणा वल्द हजारी मीणा.....। मेरे बाप का नाम हजारी है। गाँव का माना हुआ आदमी है। पाँच आदमियों में उठता-बैठता है।
मैं चीखा- ‘‘कौन, किसका मूत है सुखराम पटेल। बक्खड़ होगा तू.....तेरा बाप। ठहर तो सही.....।’’ और एक जोरदार लाठी मैंने सुखराम पटेल की पीठ में दे मारी। कितना कोहराम मचा था उस दिन। जिसने भी सुना-सन्न रह गया। पल भर में क्या से क्या हो गया? मैं होश खो बैठा था। दद्दू ने सुना तो दौड़े चले आए। माँ भागी-भागी आई और कसूरवार सी मुझे झिंझोड़ने लगी। कुछ भी हो सकता था। मेरी आँखों में तैरते सवालों से माँ सहम गई थी। सुखराम पटेल के कुटुंबी लाठियाँ लेकर आ चुके थे। दद्दू के साथ बाबा, चाचा, ताऊ तथा अन्य सभी के हाथों में लाठियाँ कसी हुई थीं। गाँव के तकरीबन सभी स्त्री-पुरुष बच्चे चारागाह की ओर लपके जा रहे थे।
सुखराम पटेल की पिटाई.....कोई खेल है क्या? नहीं, नहीं झूठ होगा। किसी को विश्वास नहीं.....। सभी घटनास्थल की ओर आ रहे थे। सुखराम पटेल अब भी बेहोश था। उसके सभी कुटुम्बी उसे होश में लाने में तल्लीन। एक बार होश में आ जाए बस.....फिर देखेंगे मुझे.....।

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लेकिन फिर देखना नहीं हुआ। बीच-बचाव हुआ। राजीनामा हुआ। सभी को ताजुब्ब था। जो होना था क्यों नहीं हुआ? किसी का सिर क्यों नहीं फूटा? गाँव के लोग अपने-अपने तरीके से बात को घुमाते। बहुत से भाइयों को तो लड़ाई का मजा ही नहीं आया था। उनके अनुसार जमकर लाठियाँ चलतीं। फिर थाना कचहरी हो तब लड़ाई का मजा। वर्ना सब बेकार। पटेल हम से
बदला लेगा, ऐसा सभी सोच रहे थे।
सुखराम पटेल ने फिर जिस प्रकार बदला लिया, उससे जिन्दगी की राहें ही बदल गई। संभवतः उस दिन ज्यादा होता तो किसी के हाथ-पैर में चोट लगती, कुछ घाव आते जो वक्त के साथ भर जाते। लेकिन ये एक ऐसा घाव था जो मरते दम तक नहीं भरेगा। मेरी शादी दद्दू के लिए सिरदर्द से कम नहीं थी। इज्जत का सवाल था। दद्दू के पास बहुत जमीन थी। काफी पैसा था। गाँव में अच्छा रुतबा था। पाँच आदमियों में शुमार था दद्दू का नाम। लेकिन बक्खड़ को कौन ब्याहेगा अपनी बेटी? माँ इस चिंता में घुलने लगी थी। मेरा मूला क्या कुँआरा रह जाएगा? जो भी नाते-रिश्तेदार आता, उससे बस यही जिक्र करती। माँ की चिंता में अतीत टीसने लगता। दद्दू कहते-सब हो जाएगा मूला का ब्याह। तू क्यों चिंता करती है। माँ सूनी-सूनी आँखों से दद्दू की ओर देखती। दद्दू समझते हैं माँ का दर्द।
मगर सुखराम पटेल गोटियाँ जमने ही नहीं देता। कोई आता उसे पहले ही उल्टी-सीधी सुनाकर उखाड़ देता- ‘‘क्या सारी बिरादरी की औरतें बाँझ हो गई या हमारी बिरादरी में उससे मलूक कोई लड़का ही नहीं.....? जो बक्खड़ को छोरी देने चले आए।’’ और फिर वह लोक-लाज, खानदान, हैसियत, बिरादरी न जाने कैसे और क्या-क्या उदाहरण देकर सामने वाले को उल्टे पाँव लौटा देता।
हमें सब खबर रहती। लेकिन माँ और दद्दू हार मानने वाले नहीं थे। माँ कहती, ‘‘मूला का घर बसाकर ही दम लूँगी। चाहे धरती बिके तो बिक जाए।’’
मेरा घर बसाना माँ के लिए अब एक मिशन से कम नहीं था। माँ की कोशिशें अनवरत थीं। दद्दू भी भरपूर सहयोग कर रहे थे। खेती का काम अब पूरी तरह मेरे जिम्मे आ पड़ा था। बीस की उम्र को पार कर गया हूँ। दोनों छोटे रामसहाय और हरसहाय पढ़ाई में अच्छे चल रहे थे। सभी उम्मीद लगाए हैं कि आरक्षण की वजह से अच्छी नौकरी पकड़ लेंगे। अच्छे घरों में दोनों की शादी भी हो जाएगी।

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.....कि एक दिन सुबह माँ को मैंने बहुत व्यस्त और खुश देखा। मैंने पूछा तो माँ केवल मुस्करा कर रह गई। शाम तक घर में उत्सव की तैयारी होती रही। घर पर अजीब माहौल था। सब इधर-उधर दौड़ रहे थे। चाचियाँ तथा चचेरी बहिनें, बुआ आदि अनोखी उमंग में उड़ी जा रही थी। शाम को जब मैं बाड़े में अकेला लेटा हुआ था तो चचेरी बहन गजरी दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई। मेरे कान में धीरे से कहा, ‘‘भाया, भाभी आई है।’’ मेरे पेट में गोला सा उठा। मैं बड़बड़ाया-‘‘भाभी, कौन सी भाभी...?’’
गजरी ने इटलाते हुए बताया- ‘‘थारी लाड़ी आई है।’’
मैं एक अनगढ़ दर्द से बिलबिला उठा, ‘‘कौन लाड़ी? किसकी लाड़ी.....? ना सगाई, ना ब्याह, ना बारात, ना ढोल-तमाशे, कोई उत्सव नहीं। कोई खुशी नहीं। सब कुछ गोपनीय। क्यों....? आखिर क्यों.....? मैं क्या अछूत हूँ? मैं क्या समाज से बाहर हूँ? क्या किया है मैंने? कोई आकर बताए तो। सब कुछ समाज ने किया। समाज के बड़े-बड़े खानदान के ठेकेदारों ने किया है। मैं बक्खड़ हूँ तो इसमें मेरा क्या दोष है?’’ मेरी आँखों से लगातार आँसू टपक रहे हैं। गजरी मुझे फिर बुलाने आती है।
‘‘भाया, ओ भाया! माँ बुला री है।’’
मैं अनमना सा जाता हूँ। माँ, चाचियाँ, बुआ तथा अन्य औरतें मंगल गीत गा रही हैं। सभी नेगचार होते हैं। कहाँ से आई है? क्या नाम है? कोई चाव नहीं रहा। बड़ी हसरत थी कि मेरा भी किसी दिन धूमधाम से ब्याह होगा। बारात जाएगी। उस दिन सबने जमकर पी। माँ ने और दद्दू ने जैसे कोई जंग जीत ली हो। सुबह तो सारे गाँव में ये खबर आग की तरह फैल गई थी। सभी औरतें दुल्हन का मुँह देखने आ रही थीं। सुखराम पटेल तिलमिला गया। बहुत दूर की कौड़ी खोज कर लाए थे लोहड़े मामा। मालवा की मिट्टी से। मालवा की काली, कछारी मिट्टी की अफीमी गंध थी सुगरो। कैसे-कैसे मामा ने टोह ली.....? कैसे सौदा तय किया.....। सब एक तिलिस्म से कम नहीं है। कितना लिच्चड़ और कमीना होगा सुगरो का बाप। दूसरी बार बिकी थी सुगरो अपने बाप की दलाली में।

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माँ ने सुगरो को सिर-आँखों पर बिठाया। माँ उसका हर संभव ख्याल रखती। मेरी भी पटरी बैठ गई थी। सुगरो भी धीरे- धीरे सामान्य हो चली थी। उसकी पीड़ को माँ बखूबी समझती थी। दिन पंख लगाकर उड़े जा रहे थे। दोनों छोटों की भी अच्छी नौकरी लग गई थी। उनकी शादियाँ भी धूमधाम से की थीं हमने। एक पोते की लालसा में माँ बूढ़ा रही थी कि एक दिन अप्रत्याशित रूप से सुगरो कही नहीं थी। घर में कुहराम मच गया। दुनिया छान मारी। मगर सुगरो नहीं मिली। ज्यों-ज्यों दिन गुजर रहे थे, माँ छीजती जा रही थी। मैं रेशा-रेशा होकर बिखर रहा था। दद्दू तथा लोहड़े मामा ने मालवा तक खोजखबर ली। सब प्रयास बेकार जा रहे थे।
सुखराम पटेल सीना तान अकड़-अकड़ कर चलता। मुझे देखकर अजीब तरीके से खांसता और पिच्च से थूक देता। मैं राख हो चला था। बक्खड़ होने का अभिशाप भोग रहा था। बेटे की बहू भागने की पीड़ा दद्दू तथा माँ को कमजोर किए दे रही थी।
लोहड़े मामा ने फिर दूर की खोज की.....। सुनकर सब दंग रह गए थे। सुगरो को सुखराम पटेल तथा उसके आदमियों ने ऐसी जगह पहुँचा दिया था जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता.....। एक बार फिर कोहराम मचा। तनातनी हुई, मगर अब हो भी क्या सकता था? माँ ने उसी दिन चारपाई पकड़ ली थी।
.....ना जाने क्यों अब इस सत्तर साल की उमर में सब कुछ याद आ रहा है। मेरे जन्म से पहले की माँ द्वारा बताई सब बातें और बाद का बचपन-जवानी सब फोड़े सा रह-रहकर टीसने लगा। सुगरो की अफीमी गंध रातों में अब भी मेरे आसपास प्रेतनी सी डोलती थी। वो साठ-सत्तर वर्ष पहले का गाँव याद आता है। कितना प्रेम सहयोग था। माँ और दद्दू कभी के चले गए। बहुत याद आती है माँ। चारपाई पर अब ढंग से लेटा भी नहीं जाता, बस पड़ा रहता हूँ। एक गिलास पानी के लिए किसी को दस बार पुकारना पड़ता है। वो गाँव के चैड़े-दगड़े अब पगडंडियों में बदल गए हैं। जमीन के एक-एक कूड़ के लिए महाभारत होने लगे हैं। घर-घर टीवी लग चुके हैं। आए दिन लूट-हत्या, अपहरण की घटनाएँ। गाँव गंधाने लगा है अब।
माँ की एक-एक बात याद आती है। दद्दू, चाचा, मामा सब न जाने क्यों बार-बार याद आते हैं। भाई तथा उनके सभी बच्चे गाँव छोड़ चुके है। शहर में कोठियाँ बना ली हैं। मैं इस टूटे छप्पर में एक गिलास पानी के लिए आवाज लगा रहा हूँ हाथ-पाँव लाचार हैं। सब दुआ करते हैं कि इस दुनिया से मुक्त हो जाऊँ। मैं भी यही दुआ करता हूँ सुबह-शाम। अब तो लोग मेरा नाम भी भूल चुके हैं। शायद। मुझे भी याद नहीं कि मेरा नाम क्या है.....? लोग मुझे बक्खड़ कहते हैं।
बक्खड़.....बक्खड़.....सुनते.....सुनते सत्तर साल हो गए हैं। नसें चटकने लगी हैं। मुट्ठियाँ कस जाती हैं। मैं पागल कुत्ते जैसा भौंक उठता हूँ.....मैया.....रीऽऽऽ....


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मंगलवार, १५ जुलाई २००८

हिंद-युग्म एक परिचय

इंटरनेट ने सूचना के प्रचार-प्रसार का काम तो आसान किया ही है, एक सोच के बिखरे पड़े लोगों अथवा समूहों को एकजुट करने में भी भरपूर योगदान दिया है। इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी व अन्य भाषाओं का वर्चस्व तो है मगर हिन्दी ने पिछले कुछ सालों में जिस कदर इंटरनेट पर अपनी जगह बनायी है, यह तो कहा ही जा सकता है कि आने वाले समय में कम-से-कम हिन्दी को इस बात का मलाल नहीं रहेगा कि वो तकनीक की दौड़ में किसी भी अन्य भाषा से कमतर है।
इस क्रम में इलाहाबाद के तीन युवक जिन्होंने एक दूरदर्शी सपना संजोया और जुट गए हिन्दी कि सेवा में, एक ब्लॉग बनाया ‘‘हिन्दयुग्म’’ इसीलिए नहीं कि अपनी भड़ास निकालें, बल्कि इसीलिए कि ज्यादा से ज्यादा हिन्दी भाषी लोगों की बात विश्वभर के हिन्दी भाषी लोगों तक पहुँच सकें और अपनी बात रख सकें। सफर अभी शुरू ही हुआ था कि दिल्ली में ब्लॉग की दुनिया में सक्रिय कुछ हिन्दी-प्रेमियों की नजर इन युवाओं के प्रयास पर पड़ी। फिर राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल आदि जगहों से भी इंटरनेट पर सक्रिय कुछ लोग जुट गए। ब्लॉग के बड़े उद्देश्यों पर चर्चा हुई और शुरू हो गया महाप्रयास हिन्दी को तकनीक की दुनिया में परचम लहराने का। इनका मूलमंत्र ये था कि हिन्दी के नाम पर खास तारीखों पर रोने और गोष्ठियों-समारोहों में चीख मचाने से इस भाषा को कोई खास फायदा नहीं होने वाला बल्कि इसके लिये एक सार्थक पहल करने की जरूरत है। पर ऐसा देखा गया है कि हिन्दी की रोटी खाने वाले लोगों की जमात ही ऐसी सभाओं में अपनी भाषा को कैसे समृद्ध किया जाय पर चर्चा न कर आमतौर पर दूसरी या अन्य भाषाओं को कोसते नजर आते हैं। चीनी भाषा को आज दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में हम सभी जानते हैं, इसका हाल भी हमारा जैसा ही है, परन्तु ये लोग निराशावादी न होकर आशावादी हैं, दूनिया की कई भाषाओं में अपनी बात रखते हैं, जिसमें हिन्दी भी है। चाइना रेडियो इन्टरनेशनल (CRI ) पुराना नाम रेडियो पेकिंग की स्थापना 3 दिसंबर 1941 को हुई ने हिन्दी भाषा में अपनी सेवा देना शुरू भी कर दिया। यह इस लिये नहीं कि उसे अपनी भाषा से प्यार नहीं वरण इसलिये कि ये लोग चीनी भाषा के विकास में हिन्दी का भी सहयोग ले सकें। खर! ये बात एक बहस का विषय है। चुकिं इस बहस में लाखों हिन्दी भाषी जिनकी रोजी चल रही है, वे अपना पालन-पोषण कर रहें हैं उनके हित को चोट पहुँच सकती है। बंगाल में जब कम्पूटर की बात शुरू हुई थी तो मुझे यह बात अच्छी तरह से याद है कि यही माकपा सरकार ने सबसे ज्यादा शोरशराबा मचाना शुरू कर दिया था, कि इससे लाखों युवक बेकार हो जायेगें, आज स्थिति कुछ ओर ही नजर आती है। आइये हम बात करते हैं, इन्टरनेट की दुनिया में हिन्दी के विकास की।
हिंद-युग्म एक परिचय
‘हिन्द-युग्म’ यानी हिन्दुस्तानियों का युग्म (समूह), जिसे हिन्दी भाषा में विश्वास है। ऐसे हिन्दी प्रेमियों का समूह जो कि केवल हिन्दी की बात नहीं करते बल्कि हिन्दी का प्रयोग करके, प्रयोग को प्रोत्साहित करके हिन्दी की सेवा करते हैं। जिन्हें आज पर भरोसा है। जो हिन्दी की दुर्दशा पर रोने से ज्यादा इसे बेहतर करने की कोशिश में लगें हैं।
इंटरनेट के जरिये देश भर में अपनी बात पहुंचाने के लिए धन की जरूरत महसूस की आपस में ही समूह के लोगों ने अंशदान करना शुरू कर दिया, कई और लोग भी आर्थिक मदद को आगे आए और मिशन जारी रहा । हिन्दयुग्म के सफर में सबसे सक्रिय शैलेश भारतवासी के अनुसार हिन्दी को इंटरनेट की भाषा बनाने और हर वर्ग को जोड़ने के लिए हम गाँव-गाँव तक जाते हैं, बेशक हमारे पास अभी पैसे नहीं हैं मगर हौसला तो है और फिर हिंदीप्रेमियों को जब हमारे उद्देश्य समझ आते हैं तो वह खुद ही मदद को तैयार हो जाते हैं। संपर्कः

वेबसाईट- www.hindyugm.com ईमेल- hindyugm@gmail.com
तो फिर देर किस बात की, आप भी जुट जाएँ हिन्दी की सेवा में, इंटरनेट पर जाएँ तो इन प्रयासों को जरुर देखें और सहयोग भी करें। -शम्भु चौधरी

सोमवार, १४ जुलाई २००८

सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग


राजस्थान पत्रिका ने अपने संडे के परिशिष्ट में हिंदी ब्लागिंग पर स्टोरी प्रकाशित की है जिसे लिखा है मशहूर हिंदी ब्लागर शैलेश भारतवासी ने। इसमें भड़ास के बारे में भी जिक्र है। यहां भड़ास के बारे में जो कुछ प्रकाशित हुए है, उसे हू ब हू दे रहा हूं ताकि बाकी भड़ासियों को भी पता चल सके....पत्रकारों के ब्लॉग सबसे आगे हिंदी ब्लागिंग में अभी पत्रकार ब्लागरों का प्रतिशत सबसे अधिक है। इस बात का अंदाजा यहां से लगाया जा सकता है कि हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले कम्युनिटी ब्लाग भड़ास http://bhadas.blogspot.com/ में 300 से अधिक कांट्रीब्यूटर हैं और अधिकाधिक पत्रकार हैं। इस ब्लाग पर हिंदी पत्रकारों की जाब छोड़ने-पकड़ने की जानकारी भी मुहैया कराई जाती है। भड़ास पर अभद्र ब्लाग का आरोप लगने पर ब्लाग प्रमुख यशवंत सिंह कहते हैं, ''हम तो खुद कहते हैं कि हम फटेहाल, परेशान, कुंठित, दमित, डरे हुए लोग हैं, जो गांव देहात से आए हैं और शहर के अजनबीपन और प्रोफेशनलिज्म में अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं। ''पूरी स्टोरी आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं"

- बधाई ! - ई हिन्दी साहित्य सभा


नोट: हमारी नजर में भी श्री शैलेश भारतवासी द्वारा संचालित 'हिन्द-युग्म' और भडा़स का चयन वर्ष २००७-२००८ के लिए क्रमशः सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग के रूप में किया गया है। शीघ्र ही इनका प्रमाण पत्र इन्टरनेट पर जारी कर दिया जायेगा - ई-हिन्दी साहित्य सभा

शुक्रवार, ११ जुलाई २००८

अपनी पहचान बनाने से पहले दूसरों को पहचाने - शम्भु चौधरी

साधारणतः हमलोगों मे एक हीन भावना ग्रसित है कि हम गरीब हैं, और यही गरीबी विरासत में हम अपने बच्चों को दे जाते हैं, बच्चे भी अपने बच्चों को और यह सिलसिला क्रमबद्ध चलता जा रहा है, क्यों न हम आज से हम अपनी गरीबी को मात देकर एक नई जिन्दगी शुरू करें। इस बीमारी को जड़ से समाप्त करने का यही एक मात्र तरीका है जिसे हमें अपनाना ही होगा। एक कदम हम आगे बढ़कर अपनी संतानों को थोड़ा ही सही अर्थ/शिक्षा से उन्हें समृद्ध करें, उनकी मानसिकता को कमजोर करने के बजाये उन्हें सबल प्रदान करें। लोग सोचते हैं कि हारा हुआ इंसान क्या कर पायेगा। परन्तु हमारी यह धारणा ही गलत बन चुकी है। हमें हार में से ही जीत की संभावनाओं को तलाशना होगा। कुछ लोग कहते है कि "जिन्दा रहेंगे तो फिर मिलेंगे" इस बात को इस प्रकार भी कहा जा सकता है " मिलते रहेंगे तो जिन्दा रहेंगे" । मैं जानता हूँ कि आपके पास मेरी बातों को उत्तर जरूर होगा। यदि है तो जरूर लिखें। -शम्भु चौधरी

गुरुवार, १० जुलाई २००८

जागो भारत जागो !

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

बन के पुजारी लोकतंत्र ये
लूट रहे मंदिर सब कोई,
मिटा नहीं अस्तित्व देश का
नंगे बन फिरते सब कोई।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

अंधी - लंगड़ी - लूली हो गयी
संसद देश की, गूँगी हो गयी,
भारत का स्वाभीमान खो गया,
हिन्दू - मुस्लिम - सिख - ईसाई,
संसद का ईमान खो गया ।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

सोने की चिड़ियां भूखी-प्यासी,
दाने-दाने को तरसाती,
साम्प्रदायिकता की आड़ में ये अब
हिन्दू-मुस्लिम गीत ही गाती ।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

इनके इरादे नेक नहीं अब,
'बुर्का' पहन सब एक हो गये;
सत्ता के सब अंधे हो गये।
खेत बैच दे, देश बैच दे,
सत्ता की जागीर बैच दे,
माँ का आँचल, दूध बैच दे,
बलदानी इतिहास बैच दे,
भगत सिंह का नाम बैच दे,
और बैच दे भारत को।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

संसद की ताकत पहचानो,
वोटों की ताकत जानो,
घर-घर अलख जगा दो आज,
धर्मनिरपेक्ष कौन बना है?
इनके इरादे जानो आज।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

बुधवार, ९ जुलाई २००८

अलग पहचान

इस शहर में कवि और साहित्यकारों की भरमार है,
ये सभी लावारिस इंसान है।
खो गई इनकी कलम भी भीड़ में,
न कोई अलग पहचान है।

हर कोई अब खोजता हर एक को,
जैसे दफ़ना दिया गया हो कोई शहर,
कब्र में ये कैसी आहट हो रही,
हर कोई मुर्दा यहाँ इंसान है।

दस्तकें मत दो....!! इन बन्द दरवाजों को,
हर कोई भीतर यमराज है,
तुम्हें भय हो न हो मौत का,
भय मौत को, तुमसे अब हो चला।

खो न जायें हम कहिं, खुद में ही;
'कलम' की भी खुद की पहचान है,
वक्त मिल जाये लिखने के बाद दोस्तों!
तो देख लेना, उसमें भी थोड़ी सांस है।

रोज पैदा हो रहे हैं हम मशरूम की तरह
कोई भीड़ चीर निकलता नहीं,
हर कोई बस एक ही ढर्रे पर जमे
मंच को कोई बदलता नहीं।

इस शहर में कवि और साहित्यकारों की भरमार है,
ये सभी लावारिस इंसान है।
खो गई इनकी कलम भी भीड़ में,
न कोई अलग कोई पहचान है।

सोमवार, ७ जुलाई २००८

उपेक्षित है हवेलियां - राजलदेसर की



यह लेख मुझे कल रात ही 'राष्ट्रीय महानगर' के संपादक श्री प्रकाश चण्डालिया द्वारा प्राप्त हुआ, जिसे मैं इस वेव पत्रिका के माध्यम से पाठकों के लिये जारी कर रहा हूँ। लेख के लेखक श्री कुन्दन शर्मा "दाधीच" (मोबाइल फोन न. 09829998494) जो कि स्वयं भी राजस्थान के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं ने राजस्थान की स्थापत्यकला और भित्ति चित्रों के जो दर्दनाक दृश्य हमें भेजे हैं उससे हम आपको भी परिचय कराते हैं। कहने को बात कुछ भी हो पर श्री कुन्दन जी के दर्द को कोई देख पाये तो जबाब लिखना न भुलें। - शम्भु चौधरी



स्थापत्यकला
और भित्ति चित्रों के लिये विख्यात थली अंचल के चूरू जिले के राजलदेसर कस्बे की हवेलियां सार संभाल के अभाव में पहचान खोती जा रही है। कस्बे में एक दर्जन से अधिक हवेलियां है। जो लोककला और संस्कृति से रू - ब- रू करवाती है। लकड़ी के बड़े-2 कलात्मक कपाटौं से सुसज्जित, गवाक्ष, दरवाजे तथा सामने की दीवारों पर राजपूत व 'फ्रेस्को बुआनो' शैली में उकेरित चित्र वास्तुकला का बैजोड़ नमूने देखने को मिलते हैं। शीशों की जड़ाई, चित्रशाला, वस्तुकला आन, बान और शान के प्रतीक भित्ति चित्र इन हवेलियों में देखे जा सकते हैं। चित्रशाला बनी सेठ सचियालाल की हवेली अपनी अन्तिम सांसे गिन रही है। इस हवेली के कमरों की दीवार में शीशों की जड़ाई का मनमोहक काम शीशमहल की यादगार को ताजा कर देती है। चौबारे के मुँह बोलते भित्ति चित्र एक से एक बढ़कर है। इसी प्रकार सेठ मोहनलाल बैद की हवेली का कमरा स्थापत्यकला का उत्त्कृष्ट नमूना है। दीवारों पर शीशे की जड़ाई, सोने की हिल का उपयोग व विभिन्न रंगों की बेल-बूटों के चित्र मनोहारी है।
सेठ हीरालाल नथमल बैद, मानिकचन्द भँवरलाल दूगड़, मोहनलाल बोथरा, मोटाराम बालचन्द लाडसरिया, संतोकचंद बैद की हवेलियों के बाहर व छज्जे के नीचे टोडों के बीच शिकारी, नायक-नायिका, मल्लयुद्ध, पशु-पक्षियों, देवी-देवताओं, लोककथाओं, ऊँट-घौडो़ पर चढ़े राजपूत, राजस्थानी पौशाक, गठीला शरीर, दाढ़ी-मूँछें तथा आभूषणों से श्रृगांरित कलात्मक भित्ति चित्र चित्रित है। सेठ जेसराज जयचन्दलाला बैद की हवेली की पोंली व टोडों के नीचे उकेरे गये चित्र बरबस ही लोगों को आकर्षित कर लेते हैं। सेठ शिद्धकरण बैद की हवेली की खिड़्कियों व शानदार मुख्यद्वार स्थापत्यकला में बेमिशाल है। परन्तु दुर्भाग्य है, कि आज अधिकांश इन हवेलियों की कोई सुध लेने वाला नहीं है।
हवेलियों के मालिक अन्य राज्यों में प्रवास करने लगे हैं जिन्हे भारत के अन्य हिस्सों में मारवाड़ी के रूप में जाना और पहचाना जाता है। चार-पांच हवेलियां तो गिरने के कगार पर है। हवेलियों के भित्तिचित्र इनके मालिकों की उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। इस सांस्कृतिक विरासत को धीरे-धीर हमारी आधुनिक सभ्यता ने अपना ग्रास बनाना आरम्भ कर दिया है। गत अर्द्ध शताब्दी से हवेलियां अतीत की चिजें बनकर रह गई है। चौबोर सूने-2 और उपेक्षित पड़े हैं,

तो भित्ति चित्र धूल-धसरित होकर धूमिल पड़ने लगे हैं। वर्तमान पीढी़ को इस कलात्मक सृजनता से कोई सरोकार है, दिखाई नही पड़ता। हवेलियों के वर्तमान मालिकों की अदासीनता साफ झलक रही है। न तो कोई सांरक्षण देने वाला दिखाई पड़ता है न ही कोई रुचि लेने वाला ही है।
- कुन्दन शर्मा "दाधीच" ( मोबाइल फोन न. 09829998494 )

रविवार, ६ जुलाई २००८

नन्हें से पहरेदार

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

जन्मेगा जब आतंकवाद,
इन भोले-भाले बालों में,
टपकेगें नयनों से आंसू
,
हीरे से मोती गालों पें।
घर-घर में जब आग जलेगी,
संध्या को दिवालों में,
पग-पग में तब मौत उगेगी,
खेतों और खलियानों में।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

न्यापालिका जब यहाँ पर,
सत्ता की गुलाम बनी,
जंजीरों को तोड़ यहाँ,
लुटेरों की सरकार बनी।
विधानसभा जलों में होगी,
संसद तब ' तिहाड़ ' बने,
थाने-थाने में गुण्डे होंगे,
देश के पहरेदार बने।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

न्यायपालिका जब यहाँ पर,
हो जायेगी 'गूँगी' तब,
संसद में बैठे नेतागण,
'चिर' का हरण करेगें तब।
कौन बनेगा 'कृष्ण' यहाँ,
किसकी सामत आयी है,
कलियुग के भीम-गदा को देखो,
युधिष्ठर, नकुल, सहदेव कहाँ
'अर्जून' की तरकश में अब,
वाणों का वह वेग कहाँ,
भीष्मपितामह की वाणी में,
ममता-व- स्नेह कहाँ,
'धृतराष्ट्र' ढग-ढग पे देखों,
सत्ता के गलियारों में,
दुर्योधन की गिनती कर लो,
चाहे हर मंत्रालयों में।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

आज यहाँ होली तू क्यों,
विधवा बनकर आयी हो,
सतरंगी - रंगों में देखो,
ये कैसी परछाई है? ।
होली तू ऎसी आयी क्यों?
सब अपने ही रंग में सिमट गये,
गांधी के भारत को देखो,
ये कैसी आग लगाई है।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

धर्मनिरपेक्ष?

धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में ,
देते हैं ये
आतंकवाद को पनाह,
मानो यह सुरक्षा कवच हो,
देश के गद्दारों का
जो करते हैं गद्दारी देश से,
फैलाते हैं आतंक,
इसलाम के नाम पर
अपने ईमान को भी
देते हैं दगा,
करते ये शरीयत की बात
वोट का यह ड्रामा कब और कैसे
समाप्त होगा?
कब मुसलमान अपने को
भारती समझेगा?
धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में ,
कब तक लेगा पनाह
कब वो हिन्दुस्तानी बन,
एक मन बना पायेगा ?
आजादी के इतने सालों बाद भी
एक आम मुसलमान,
अपनी बस्ती से अलग नहीं रहा पाता।
एक आम हिन्दु, मुसलमानों की बस्ती में-
टहल नहीं पाता।
फिर भी कहते हैं हम देश को
धर्मनिरपेक्ष?
सिर्फ वोट के लिये?
सिर्फ वोट के लिये?

शनिवार, ५ जुलाई २००८

कोलकाता शहर

विश्व के एक नम्बर में आने वाला शहर कोलकाता,
आज भारत की अन्तीम पंक्ती में खड़ा है।
विकास के नाम पर
कामगार मजदूरों के हाथों में
थमा दिया है झंण्डा,
हिंसा और अराजकता का डण्डा।
आज भी इस आशा में जीवित हैं,
जर्जर होता शरीर, कल-कारखाने
दिवारों पर लिखे नारे,
इस भयानक स्थिति की घोषणा करते हैं-
"यहाँ कोई आशा नहीं"
केवल '' मिथ्या आक्रोश "
शेष बचा है।


कचरे का अम्बार, विषाक्त हवा,
टूटी-फुटी सड़कें, बहती गंदी नालियाँ,
पानी के फटे पाइप,
पीने के पानी की वही पुरानी व्यवस्था,
कतार में लगे लोग,
रोजाना शहर आना, कुछ हो न हो
शहर को गंदा जरूर कर जाना।
चप्पा-चप्पा अबाद है,
शहर के फुटफाथ
कहिं दुकान, घर, या धर्मस्थल
यदि कुछ नहीं है तो, बस खाली जगह।


दो रोटी खा लेना,
सो जाना,
बहुत कुछ हुआ तो,
रास्ते पर ही कहीं बैठ- सुस्ता लेना;
न कोई मनोरंजन,
न कोई उत्साह,
बस,
दिनभर आने-जाने,
जाम और थकावट से
हर इंसान,
परिवार से इस कदर दूर हो जाता है;
पति-पत्नि का प्रेम,
बच्चों का प्यार, स्नेह,
बिस्तर में थकावट का रूप ले,
करवटें बदल सो जाता है।


-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता- 700106

गुरुवार, ३ जुलाई २००८

कोलकाता में हिन्दी नाट्य और मारवाड़ी समाज

कोलकाता में हिन्दीभाषी समुदाय बहुत लंबे समय से और बहुत बड़ी तादाद में निवास करता आया है । यहां हिन्दी नाट्य प्रस्तु्तियों का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है । इसके शुरूआती दौर में तो पारसी शैली के व्यावसायिक नाटक ही छाए रहे । 1906 में पहली बार मुंशी भृगुनाथ वर्मा के नेतृत्व में फूलकटरा में हिन्दी नाट्य समिति की स्थापना हुई । यह हिंदी में पहला गैरव्यावसायिक रंग प्रयास था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पं। माधव शुक्ल के कोलकाता आगमन और भोलानाथ बर्मन के साथ ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना से कोलकाता के हिन्दी रंगमंच को अपेक्षित गति व प्रतिष्ठा मिली जिसका सतत विकास आज के समर्थ नाट्य आंदोलन में देखा जा सकता है । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर कंपनियों ने कोलकाता में पारसी शैली के नाटक प्रदर्शित करने शुरू कर दिए थे । मूनलाइट, मिनर्वा, कोरिंथियन आदि थियेटरों में व्यावसायिक दृष्टि से सफल नाटक खेले जाने लगे थे । मनोरंजन करना और पैसा कमाना इनका एकमात्र उद्देश्य था । वृहत्तर सामाजिक संदर्भों से इनका कोई गहरा सरोकार नहीं था परंतु भारी संख्या में आम जनता को रंगमंच की ओर आकर्षित कर लेना इनकी बड़ी सफलता थी । सरल उर्दू या हिन्दुस्तानी में खेले जाने वाले इन नाटकों की भाषानीति नारायण प्रसाद ‘बेताब’ के ‘महाभारत’ नाटक के इस उद्धरण द्वारा समझी जा सकती है :
" न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी जबान गोया मिली-जुली हो ।
अलग रहे दूध से न मिसरी, डली-डली दूध में घुली हो ।।
किन्तु पारसी नाटकों की प्रवृत्ति बाजारू और रुचि हल्की थी । अभिनय कला में भी एक तरह का उथलापन था । तिनाटकीयता के साथ आकस्मिकता और चमत्कार का संयोग उसे और भी भोंडा बनाता था । किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह हमारी रंगयात्रा का प्रारंभिक चरण था और व्यावसायिकता के दबाव के बावजूद पारसी शैली के कई नाटक तत्कालीन राष्ट्रीय भावनाओं और आकांक्षाओं को निरूपित करने का खतरा मोल ले रहे थे । हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा में पारसी नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है । बहुत लंबे समय तक हिन्दी का गैरव्यावसायिक रंगमंच भी इनकी शैली से खासा प्रभावित रहा । 1930 तक पारसी शैली का थियेटर जिंदा रहा। सिनेमा के प्रचलन के बाद स्थाई रूप से इनका पर्दा गिर गया । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में व्यावसायिक व शौकिया रंगमंच समानांतर चलते रहे । देश इस समय नवजागरण की लहर पर सवार था । हिन्दी जाति के सांस्कृतिक अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट व पं। माधव शुक्ल जैसे अनेक बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत देशवासी पारसी कंपनियों की लोकरुचि को दूषित करने वाली प्रस्तुतियों से क्षुब्ध थे । धीरोदात्त नायक दुष्यंत को खेमटेवालियों की तरह कमर मटका कर नाचते और ‘पतरी कमर बल खाय’ गाते हुए देखना इनके लिए असह्य था । ये वे लोग थे जो भाषा और देश दोनों के लिए चिंतित थे । वे अपनी भाषा में सुसंस्कृत और साहित्यिक अभिरुचि वाले नाटक खेलना चाहते थे और जनता को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना चाहते थे ।
1916 में प्रकाशित महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक की भूमिका में शुक्ल जी ने स्पष्ट लिखा है कि "आजकल पारसी नाटकों का प्रधान्य है । उसके साज-सामान हाव-भाव बिल्कुल कृत्रिम होते हैं । क्योंकि उनके सारे कार्य अर्थोपार्जन के उद्देश्य पर ही संबद्ध हैं……।’ परंतु शुक्ल जी यह भी अनुभव कर रहे थे कि "संपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ नाट्यकला में भी आशातीत परिवर्तन हो रहा है । दर्शकों की इच्छा भाव और दृष्टि में बहुत अंतर आ गया है । अब लोग उदारतापूर्वक नाट्यशाला में जाते हैं और बड़े ही उत्सुकता से नाटक देखते हैं । शिक्षित समाज अब बहुत कम पारसी कंपनियों की ओर झुकता है । राष्ट्रीय जागरण में नाटक की भूमिका के प्रति वे विशेष सजग थे । महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक में कुंती के मुंह से मानो भारत माता स्वयं आह्वान कर रही है :
"स्वाभिमान नहिं तजो आत्म चिंता नहिं छोड़ो ।
स्वाधिकार हित लड़ो सत्य से मुख नहिं मोड़ो ।।
1911 में माधव शुक्ल कोलकाता पधारे । ‘हिन्दी नाट्य समिति’ तब भारतेंदु के नाटक ‘नीलदेवी’ के मंचन की प्रक्रिया में थी । शुक्ल जी के मार्गदर्शन से 1912 में भारत संगीत समाज के मंच पर ‘नीलदेवी’ का सफल मंचन हुआ । पर इसी रान कुछ मतभेद उभरे और भोलानाथ बर्मन व शुक्ल जी हिन्दी नाट्य समिति से अलग हो गए । हिन्दी नाट्य समिति ने नीलदेवी’ के अतिरिक्त पं। राधेश्याम कथावाचक लिखित ‘वीर अभिमन्यु’ का सफल मंचन किया । पहले प्रदर्शन में ही इतनी धनराशि प्राप्त हुई कि प्रस्तुति का खर्च निकालकर चार हजार रुपये उड़ीसा के बाढ़पीड़ितों की सहायतार्थ दिए गए . 1920 में जमुनादास मेहरा ने ‘पाप परिणाम’ नामक नाटक के कई सफल मंचन किए । मेहरा जी द्वारा निर्देशित ‘भक्त हलाद’ के भी लगभग दस मंचन हुए । इसके अतिरिक्त ‘हिन्दी नाट्य समिति’ के बैनर तले सत्यविजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मिनी, सम्राट परीक्षित और स्कूल की लड़की आदि नाटकों के सफल प्रदर्शन किए गए । 1939 के बाद यह संस्था कुछ विशेष या सार्थक नहीं कर सकी । पं. माधव शुक्ल द्वारा ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना के साथ हिन्दी रंगमंच का संबंध देशानुरागी भावनाओं से और प्रगाढ़ हो गया था । शुक्ल जी नाटकों के द्वारा जागृति लाकर राष्ट्रीय आंदोलन को बल देना चाहते थे ।
परंतु अंग्रेज सरकार 1876 में ‘ड्रामैटिक पफ़ॉर्मेंस बिल’ पास कर चुकी थी और दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नीलदर्पण’ जब्त कर लिया गया था। खाडिलकर का ‘कीचक वध’ और वृंदावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ भी प्रतिबंधित कर दिया गया था । ऐसे समय में जब परिषद ने राधाकृष्ण दास का नाटक ‘महाराणा प्रताप’ खेलना चाहा तो अनुमति नहीं दी गई। अत: यह नाटक ‘भामाशाह की राजभक्ति’ नाम से खेला गया। इसी तरह अंग्रेज सरकार की आंख में धूल झोंककर ‘महाभारत’ नाटक ‘कौरव कलंक’ नाम से व ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक ‘विश्व प्रेम’ नाम से खेला गया । इनके अतिरिक्त डी.एल.राय के ‘चंद्रगुप्त’ आदि नाटक सफलतापूर्वक खेले गए ।
लगभग दो दशकों तक ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की कमान पं। माधव शुक्ल के हाथों में रही और रंगमंच पर राष्ट्रप्रेम की धारा अप्रतिहत बहती रही । आलम यह था कि शुक्ल जी के प्रयत्नों से महाकवि निराला जैसे साहित्यकार भी नाट्य लेखन और अभिनय की ओर प्रवृत्त हुए । पं. माधव शुक्ल के पश्चात परिषद का नेतृत्व पं. देवव्रत मिश्र व ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने किया और नूरजहां, शाहजहां, उस पार, महात्मा ईसा, छत्रसाल व पुनर्मिलन (महानिशा) मंचित किए । ‘महानिशा’ नाटक का मंचन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण था कि इसमें पहली बार स्त्री पात्रों की भूमिकाएं महिला कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की गई थीं । इससे पहले पुरूष कलाकार ही स्त्री पात्रों की भूमिका में आते थे । 1931 में कोलकाता से ही नरोत्तम व्यास के संपादन में ललित कला संबंधी सचित्र साप्ताहिक ‘रंगमंच’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । इसका उददेश्य निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के रूप में लिखा रहता था :
" हिन्दी माता के पुत्रों में कला-विवेक भाव भर दे
जग में ये भी शीश उठाएं, इतना इनको अवसर दे ।।
क्रम-क्रम से वे सब उठ जाएं, पड़े हुए हैं जो परदे ।
कागज का यह ‘रंगमंच’, पैदा वह रंगमंच कर दे ।।
पं। माधव शुक्ल के महाभारत (पूर्वार्ध) में भी तो अर्जुन कुछ ऐसा ही उद्घोष करता है :
"आत्मदशा का ज्ञान नहीं जिस नर के भीतर ।
उसकी भी क्या है मनुष्य में संज्ञा क्षिति पर ।।
"हिन्दी नाट्य परिषद के ही कुछ सदस्यों ने बाद में अलग होकर ‘बजरंग परिषद और ‘श्री कृष्ण परिषद’ जैसी नाट्य संस्थाएं गठित कीं । ‘बजरंग परिषद’ ने 1939 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन में ‘श्रवण कुमार’ नाटक का मंचन किया जो सफल नहीं रहा। किंतु अगले दिन ‘भक्त प्रहलाद’ नाटक सफलतापूर्वक खेला गया । बजरंग परिषद द्वारा ‘सिंहनाद’, ‘भयंकर भूत’ और ‘जखमी पंजाब’ नाटक का भी मंचन किया गया । श्रीकृष्ण परिषद तो ‘कृष्ण- सुदामा’ नामक एक ही नाटक खेल सकी । बड़ाबाजार के ‘अपर इंडिया एसोसिएशन’ नामक क्लब ने ‘दुर्गादास’, ‘राजा हरिशचंद्र’ व ‘मधुर मिलन’ आदि नाटकों का मंचन किया । 1943 में स्थापित ‘बिड़ला क्लब’ ने 1945 से 1963 के बीच मिनर्वा, कालिका, कोरिंथियन, स्टार तथा विश्वरूपा आदि थियेटरों में डी।एल.राय के ‘मेवाड़ पतन’ ‘चंद्रगुप्त’ और ‘उस पार’ नाटकों का और उग्र के ‘महात्मा ईसा’ नाटक का मंचन किया । इस काल में कई सामाजिक विषयों पर भी नाटक खेले गये थे, जिसका मारवाड़ी समाज में काफ़ी प्रभाव पड़ा था। जिनमें प्रमुख रूप से दो नाटक- 'समाज दर्पण' और 'फ़ैशनेबुल लुगाई' का जिक्र मिलता है। स्व.गोरधन दास चौधरी द्वारा लिखीत नाटक- ' समाज दर्पण ' (राजस्थानी भाषा में) कोरिंथियन में खेला गया था, इसमें खास बात समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करना था। इस नाटक में बाल विवाह, वृद्ध विवाह, मृतक भोज, ब्रह्मपुरी, परदा प्रथा, सड़कों पर नाच-गाना, जीमनवार- सज्जनगोठ (शादी के अवसर पर भोजन करवाना) जैसी समस्या पर तीखा और व्यंग्यात्मक तरीके से प्रहार किया गया था। इस नाटक में 'स्व. मनसुख रामजी मोर' ने खुद मुख्य भूमिका निभाई थी। 'फ़ैशनेबुल लुगाई' (राजस्थानी भाषा में) कोरिंथियन में ''स्व. काली प्रसाद खेतान के जातिय बहिष्कार'' को लेकर नाटक खेला गया था, जिसमें खुद स्व.काली प्रसाद खेतान ने मुख्य किरदार की भूमिका निभाई थी। इस नाटक के लेखक भी स्व.गोरधन दास चौधरी थे। जिसको लेकर उस जमाने में समाज के बीच काफ़ी हलचल पैदा हो गई थी। 1964 में ‘रुपया बोलता है’ का प्रदर्शन किया गया । 1947 में ‘तरुण संघ’ की स्थापना के साथ कोलकाता में नवीन विषयवस्तु वाले नाटकों का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ । क्रमश: पाश्चात्य रंगमंच के तत्वों को भी जगह मिलनी शुरू हुई । भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, सुशीला भंडारी, सु्शीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल जैसे ऊर्जस्वी कलाकार कुछ नया व सार्थक करने की बेचैनी लेकर रंग परिदृश्य पर उभरे । ‘तरुण संघ’ ने विष्णु प्रभाकर, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, जगदीशचंद्र माथुर व तरुण राय जैसे लेखकों के नाटक खेले । 1953 में राजेंद्र शर्मा द्वारा स्थापित संस्था ‘भारत भारती’ ने 1967 में खेले गए नाटक ‘डाउन ट्रेन’ के लिए इन्हें द्वितीय जनकीमंगल पुरस्कार प्राप्त हुआ । 22 दिसंबर 1955 को ‘अनामिका’ की स्थापना के साथ कोलकाता के हिन्दी रंगमंच ने एक नए युग में प्रवेश किया । श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, मन्नू भंडारी व तरुण संघ के उनके अन्य साथियों ने मिलकर इस संस्था का गठन किया । ‘अनामिका’ द्वारा प्रदर्शित कई नाटकों की अनुगूंज पूरे देश में सुनाई दी । इस संस्था ने पचास से भी अधिक नाटकों, कई एकांकियों व बाल नाटकों का मंचन किया । घर और बाहर ( रवींद्रनाथ ठाकुर के बांग्ला उपन्यास ‘घरे- बाइरे’ का प्रतिभा अग्रवाल कृत नाट्य रूपांतर), आर. जी. आनंद के ‘हम हिंदुस्तानी हैं’, विनोद रस्तोगी के ‘नया हाथ’, मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ व ‘लहरों के राजहंस’ व बादल सरकार के नाटकों के मंचन के लिए अनामिका को खासी लोकप्रियता हासिल हुई । अधिकांश नाटकों का निर्देशन श्यामानंद जालान,विमल लाठ और डा. प्रतिभा अग्रवाल ने किया । प्रतिभा अग्रवाल ने नाटकों के अनुवाद व नाट्य रूपांतर करने की दिशा में अत्यंत स्थायी महत्व का कार्य किया। 1964 में अनामिका ने एक नाट्य महोत्सव का आयोजन किया । उसमें देश के मशहूर लेखक, निर्देशकों व नाट्य समीक्षकों ने शिरकत की और उस अवसर पर आयोजित विचारगोष्ठियों में भाग लिया । इस नाट्य महोत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने किया था व इसमें थियेटर यूनिट, बंबई ने ‘अंधा युग’, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने ‘राजा ईडिपस’, अनामिका ने ‘छपते-छपते’, मूनलाइट ने ‘सीता बनवास’ व ‘रामलीला नौटंकी’, श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली ने ‘अंडर सेक्रेटरी’ व श्री नाट्यम, वाराणसी ने ‘गोदान’ का मंचन किया ।

Pratibha Agarwal in 'GODAN'
इसी वर्ष कृष्णाचार्य के संपादन में ‘हिन्दी नाट्य साहित्य’ का प्रकाशन हुआ । अनामिका को ‘नाट्य वार्ता’ नामक रंग पत्रिका के प्रकशन का भी श्रेय जाता है । 1963 से नाटकों के मंचन में सक्रिय ‘संगीत कला मंदिर’ नामक संस्था ने विभिन्न भाषाओं में पचास से अधिक प्रस्तुतियां की जिनमें ‘एक प्याला कॉफी’, ‘मृच्छकटिक’, ‘किसी एक फूल का नाम लो’, ‘एक गुलाम बीबी का’ व ‘एक और द्रोणाचार्य’ प्रमुख हैं । 1976 में इस संस्था ने मोहन राकेश को उनके नाटक ‘आधे-अधूरे’ के लिए मरणोपरांत पुरस्कृत किया ।अदाकार नाट्य दल को भी पचास से अधिक प्रस्तु्तियों का श्रेय है । यह दल ‘भूचाल’,'खामोश अदालत जारी है’ व ‘रिश्ते-नाते’ के उत्कृष्ट मंचन के लिए जाना जाता है । इसके निर्देशक-अभिनेता कृष्ण कुमार राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पाकर अहींद्र चौधरी से अभिनय का पाठ पढ़ने कोलकाता आए थे । अहींद्र चौधरी तब रवींद्र भारती में अभिनय कला के प्रोफेसर थे । अनामिका में अधिक प्रयोगशील व ‘बोल्ड’ नाटकों के मंचन के लिए वांछित खुलेपन की गुंजाइश न पाकर श्यामानंद जालान ने 1972 में ‘पदातिक’ की स्थापना की और ‘गीधाड़े’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक खेला । ‘पदातिक’ को ब्रेश्ट, मोलियर, इब्सन व सैमुअल बैकेट आदि विदेशी नाटककारों एवं मोहन राकेश, महा्श्वेता देवी,विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, निर्मल वर्मा व जीपी देशपांडे जैसे भारतीय लेखकों के नाटकों को मंचित करने का श्रेय प्राप्त है । पदातिक ‘शुतुरमुर्ग’ ‘एवम इंद्रजीत’, ‘आधे-अधूरे’, ‘पगला घोड़ा’ व ‘सखाराम बाइंडर’ की प्रभावोत्पादक प्रस्तुतियों के लिए ख्यात है ।
श्यामानंद जालान के अतिरिक्त विजय शर्मा और कुणाल पाथी ने पदातिक के नाटकों का निर्देशन किया है ।
1976 में रंगकर्मी ने कोलकाता के नाट्य परिदृश्य में ‘एंट्री’ ली और सबसे सक्रिय नाट्यदल के रूप में उभरकर आया । पिछले पच्चीस वर्षों में उषा गांगुली जैसे समर्पित रंग व्यक्तित्व और संगठनकर्ता के नेतृत्व में ‘महाभोज’, ‘लोक कथा’, ‘होली’, ‘वामा’, ‘कोर्ट मार्शल’, ‘रूदाली’, ‘खोज’ व ‘बेटी आई’ के प्रदर्शन के साथ यह राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण नाट्य दल के रूप में सराहा जाता है । ‘हिम्मत माई’ व ‘शोभा यात्रा’ के मंचन के पश्चात उषा गांगुली ने न केवल एक समर्थ अभिनेत्री और सफल निर्देशक के रूप में वरन विशिष्ट नाट्य समालोचक एवं व्याख्याकार के रूप में भी अपने को स्थापित किया है । उषा गांगुली ने हिन्दी रंगमंच को अधिक जनोन्मुख तो बनाया ही, साथ ही बांग्ला रंगमंच की गौरवशाली परंपरा से गहरे जुड़े बांग्लाभाषी दर्शकों के बीच भी हिन्दी नाटकों को प्रतिष्ठा प्रदान की ।

Gopal Kalwani in 'Ram-shyam-Jadhu'
अभी हाल ही में काशीनाथ सिंह की सुप्रसिद्ध रचना पर ‘काशीनामा’ और मंटो की कहानियों पर आधारित तीन नाटकों की श्रृंखला के सफल मंचन द्वारा उन्होंने अपनी निर्देशकीय क्षमता को प्रदर्शित किया है । कोलकाता की एक शताब्दी से चली आ रही हिन्दी रंग परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में लगभग एक दर्जन नाट्य दल अपनी सक्रियता से इसे पुष्ट कर रहे हैं । महेश जायसवाल ने अपने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से हिन्दीभाषी समाज को जन संस्कृति के वृहत्तर सरोकारों से जोड़ा है । विपरीत परिस्थितियों में भी प्रताप जायसवाल ने न केवल अपनी टोली ‘अभिनय’ को बचाए रखा, बल्कि ‘मिस्टर अभिमन्यु’, ‘रावणलीला’ व ‘दुस्समय’ जैसी कई नाट्य प्रस्तु्तियों के माध्यम से हस्तक्षेप जारी रखा । स्पंदन, लिटिल थैस्पीयन, अकृत, रंगकृति, प्रयास, कला सृजन अकादमी, नीलांबर व कलाकार जैसी रंग संस्थाएं लगातार अपनी उपस्थिति का अहसास कराती रही हैं । सामूहिकता और सृजनात्मकता के लिए यह कठिन समय है । नाटक की तो संरचना ही सामूहिकता और सृजनात्मकता के पायों पर टिकी है । नाटक के होने का अर्थ है एकांतिकता और बंजरपन का न होना । एक समर्थ नाट्य आंदोलन जीवंत और गतिशील समाज की पहचान है । जिस भाषा में श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली जैसे तपे हुए नाट्य व्यक्तित्व सक्रिय हों, जिसमें नाट्य शोध संस्थान जैसी अद्वितीय संस्था का अस्तित्व हो, जिसमें आज भी संसाधनों के अभाव के बावजूद सामूहिकता के बल पर नाटकों का मंचन संभव हो तो गैरजरूरी हताशा का कोई कारण दिखाई नहीं देता । http://samakaal.wordpress.com

[संदर्भ:'वागर्थ' के मार्च-अप्रैल २००२ अंक प्रियंकर पालीवल द्वारा लिखित ]


अनामिका:

‘अनामिका’ की स्थापना कलकत्ता में 22 दिसंबर 1955 को हुई। संस्था के गठन के लिए पहली बैठक जुलाई-अगस्त 1955 में बुलाई गई थी। अध्यक्ष पद के लिए गोविंद प्रसाद कानोड़िया और मंत्री पद के लिए प्रतिभा अग्रवाल तथा श्यामानंद जालान का चुनाव हुआ। संस्था ने आगामी दो तीन बैठकों में अपने मूल उद्देश्य, नियमावली तथा कार्यक्रम निश्चित किए और सुमित्रानन्दन पन्त के गीतों पर आधारित ‘पन्त प्रवाहिनी’ कार्यक्रम के साथ 22 दिसंबर 1955 को जनता के समक्ष आई। और तबसे यही दिन स्थापना दिवस के रूप में माना जाने लगा।

‘अनामिका’ का प्रथम कार्यक्रम ही साहित्यिक था- सुमित्रानन्दन पन्त के गीतों का व्याख्या एवं विवरण युक्त गायन। मार्च सन् 1956 में आर. जी. आनंद लिखित ‘हम हिन्दुस्तानी है’ ‘अनामिका’ की पहली नाट्य-प्रस्तुति थी।
सन् 1959 में जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की नृत्य रूपक के रूप में प्रस्तुति साहित्य, संगीत एवं नाटक की त्रिवेणी थी, ‘अनामिका’ के मूल उद्देश्यों की सार्थक- समन्वित अभिव्यक्ति थी। इस काल में सौमेन टैगोर, भूपेन हजारिका (गुवाहाटी), चंद्रबदन सी. मेहता (बड़ौदा), चाल्र्स एल्सन (न्यूयार्क), पं.नारायण आचार्य (वाराणसी), कल्याणमल लोढ़ा (कलकत्ता) जैसे विद्वानों को ‘अनामिका’ ने अपने बीच पाया भवानी प्रसाद मिश्र और कैलाश वाजपेयी जैसे कवियों की कविताओं का रसास्वादन किया।
नाट्य क्षेत्र में ‘अनामिका’ को जो यश मिला, जो उसकी उपलब्धि हुई, उसने उसे नाट्य-प्रस्तुतियों पर ही अधिक ध्यान देने को प्रेरित किया। सन् 1959 में ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा ‘नए हाथ’ के मंचन पर प्रथम पुरस्कार की प्राप्ति ने इस धारणा की पुष्टि की। सन् 1961 में रवीद्र जन्म-शतावार्षिकी के अवसर पर ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा आयोजित विशेष समारोह में रवीन्द्रनाथ के ‘घरे बाइरे’ उपन्यास का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत करने के लिए ‘अनामिका’ के आमंत्रित होने पर उक्त धारणा को और बल मिला।
‘अनामिका’ के प्रारंभिक पाँच वर्षों के इतिहास को हम देखें तो एक ओर हमें कार्यक्रमों की विविधता दिखलाई पड़ती है, दूसरी ओर हिंदी नाटक एवं रंगमंच को ठोस धरातल प्रदान करने की चेष्टा। सन् 1956 से 1960 के बीच ‘हम हिन्दुस्तानी है’ (आर. जी. आनंद, मार्च 1956: श्यामानंद जालान), ‘नए हाथ’ (विनोद रस्तोगी, अप्रैल 1957: बद्रीप्रसाद तिवारी), ‘चाय पाटियाँ’ (संतोष नारायण नौटियाल, जनवरी 1959: संतोष नारायण नौटियाल), ‘जनता का शत्रु’ (हेनरिक इब्सन, मार्च 1959: श्यामानन्द जालान) तथा ‘आषाढ़ का एक दिन’ (मोहन राकेश, सितंबर 1960: श्यामानन्द जालान) पूर्णांग नाटक प्रस्तुत किए गए तथा ‘संगमरमर पर एक रात’ (धर्मवीर भारती, सितंबर 1956), ‘सत्य किरण’ (कृष्ण किशोर श्रीवास्तव, सितंबर 1956), ‘नदी प्यासी थी’ (धर्मवीर भारती, जनवरी 1956), ‘पाटलीपुत्र के खँडहर में’ (कमलाकांत वर्मा, सितंबर 1957), ‘अँजो दीदी’ (अश्क, सितंबर 1958), तथा ‘नवज्योति की नई हीरोइन’ (सत्येन्द्र शरत, सितंबर 1958) एकांकी प्रस्तुत किए गए।

‘अनामिका’ की गतिविधियों का दूसरा पंचवर्षीय चरण सन् 1961 से 1965 तक था। इन वर्षों में ‘घर-बाहर’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 1961: श्यामानन्द जालान), ‘छपते-छपते’ (मिहिल सेबेशियन, 1963: श्यामानन्द जालान), ‘शेष रक्षा’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 1963: प्रतिभा अग्रवाल), ‘मादा कैक्टस’ (लक्ष्मीनारायण लाल, 1964: श्यामानन्द जालान), ‘छलावा’ (परितोष गार्गी, 1964: प्रतिभा अग्रवाल) एवं ‘कांचन रंग’ (शंभु मित्र तथा अमित मैत्र, 1965: कृष्ण कुमार) नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें से ‘मादा कैक्टस’ को छोड़कर अन्य सब अनुवाद एवं रूपान्तर थे।
सन् 1966 में अमृत लाल नागर के ‘सुहाग के नूपुर’ का नाट्यरूपांतर (प्रतिभा अग्रवाल) और मोहन राकेश का ‘लहरों के राजहंस’ (श्यामानन्द जालान), सन् 1967 में लक्ष्मीनारायण लाल का ‘दर्पण’ (बद्री तिवारी), ज्ञानदेव अग्निहोत्री का ‘शुतुरमुर्ग’ (श्यामानन्द जालान), शिवकुमार जोशी का ‘साप-उतारा’ सन् 1968 में बादल सरकार का एवं ‘इन्द्रजीत’ (श्यामानन्द जालान), लुइजी पिरैडेलो के ‘राइट यूँ आर इफयू थिंक सो’ का भारतीय रूपान्तर ‘मनमाने की बात’ (प्रतिभा अग्रवाल), सन् 1969 में आर्थर मिलर के 'आल माई सन्स’ का भारतीय रूपान्तर ‘मेरे बच्चे’ (शिवकुमार जोशी), सन् 1970 में मोहन राकेश का ‘आधे-अधूरे’ (श्यामानन्द जालान), बादल सरकार का ‘बल्लभपुर की रूप कथा’ (कृष्ण कुमार) तथा ‘राम-श्याम-जदु’ (बादल सरकार) नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें ‘साप-उतारा’, ‘रूप कथा एवं राम-श्याम-जदु’ हास्यरस प्रधान नाटक थे, शेष सभी गंभीर। गंभीर नाटक होने के कारण इन सभी प्रस्तुतियों का महत्व था तथापि, इनमें ‘लहरों के राजहंस’, शुतुरमुर्ग’, एवं ‘इन्द्रजीत’ तथा ‘आधे-अधूरे’ विभिन्न दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय हैं।

सन् 1971 से ‘अनामिका’ की गतिविधियों ने जोर पकड़ा। मई 1970 से प्रारंभ की गई रविवारीय प्रदर्शन की योजना ने ‘अनामिका’ के कार्यकर्ताओं को सत क्रियाशील रहने को बाध्य किया। 1971 के प्रारंभ में ‘पगला-घोड़ा’ (श्यामानन्द जालान) का मंचन हुआ। भावनाओं के आलोड़न को बड़ी तीव्रता से प्रस्तुत करने वाला बादल सरकार का यह नाटक लोकप्रिय हुआ। उसी समय ‘बहु-रूपी’ ने भी इसे बँग्ला में प्रस्तुत किया। दोनों प्रदर्शन महीनों तक साथ-साथ चले और चर्चा का विषय रहे। मई 1971 में रविवारीय कार्यक्रम को एक वर्ष पूरा हुआ।
सन् 1970 और 1971 के दो बाल नाटकों का उल्लेख इसी प्रसंग में आवश्यक है।
प्रथम वर्ष श्यामा जैन द्वारा रचित एवं निर्देशित ‘कृतघ्न मनुष्य’ तथा 1971 में आत्मानन्द द्वारा रचित एवं निर्देशित ‘मासूम’ बाल नाटक बड़े लोकप्रिय हुए। सच पूछिए तो कलकत्ता में तभी से बाल नाटक प्रस्तुत करने की परंपरा सी चल पड़ी। 1973 में ‘अनामिका’ ने ही श्यामाजी के एक और नाटक ‘सुधीर और शैल’ का मंचन किया।
सन् 1972 में पुनः तीन नए नाटक प्रस्तुत किए गए- ‘कहत कबीरा’ (लेखन एवं निर्देशन: शिवकुमार जोशी), ‘हय बदन’ (गिरीश कार्नाड निर्देशन: राजेन्द्रनाथ) तथा ‘चटनी टमाटर की’ (गणेश बागचीय निर्देशन: शिवकुमार झुनझुनवाला)। ‘कहत कबीरा’ में मंच पर छोटा सा चकी मंच (12 फिट) भी लगाकर दृश्य परिवर्तन करने का नया प्रयोग किया गया। ‘हय बदन’ के निर्देशन के लिए दिल्ली से श्री राजेन्द्रनाथ को आमंत्रित किया गया।
इसी वर्ष श्री बसंत पोद्दार के एकालाप ‘सेर सिवराज ह’ के छह प्रदर्शन भी ‘अनामिका’ के तत्वावधान में किए गए।
सन् 1973 में पुनः तीन नाटकों- ‘लँगड़ी टाँग’ (हरि शंकर परसाई), ‘अबूहसन’ (बादल सरकार), ‘इस अँधेरे से’ (अमृत राय) तथा दो एकांकियों- ‘सेतुबंध’ एवं ‘नायक खलनायक विदूषक’ (सुरेन्द्र वर्मा) के साथ ही बसंत पोद्दार का एकालाप ‘अग्नि-पुत्र’ प्रस्तुत किए गए। प्रथम दोनों नाटकों का निर्देशन विमल लाठ ने, तीसरे का शिवकुमार झुनझुनवाला ने, तथा एकांकियों का प्रतिभा अग्रवाल ने किया।
सन् 1974 में ‘सारी-रात’ (बादल सरकार), ‘प्रयोग’ (कमलाकान्त वर्मा), ‘बड़ी बुआजी’ (बादल सरकार) तथा ‘चन्द्रगुप्त’ (प्रसाद) प्रस्तुत किए गए। ‘सारी रात’ की प्रस्तुति अत्यंत प्रभावपूर्ण हुई। स्त्री-पुरुष के संबंधों की उलझनों और घुटन को बड़ी गहराई से इस नाटक में बादल सरकार ने चित्रित किया है और उसे उतनी ही निष्ठा एवं गहराई के साथ निर्देशक शिवकुमार झुनझुनवाला ने उभारा तथा स्त्री की भूमिका में अभिनय करने वाली कलाकार यामा ने जिया। इस प्रस्तुति से ‘अनामिका’ एवं निर्देशक दोनों को प्रतिष्ठा मिली।

Bimal Lath in Middel
सन् 1975 में ‘अनामिका’ ने केवल दो नाटक प्रस्तुत किए- शिवकुमार जोशी रचित ‘लक्ष्मण रेखा’ और बादल सरकार रचित ‘बाकी इतिहास’। प्रथम का निर्देशन स्वयं नाट्यकार ने किया और दूसरे का शिवकुमार झुनझुनवाला ने। इसी वर्ष अगस्त में ‘लक्ष्मण रेखा’ का दूरदर्शन से प्रसारण भी हुआ।
अप्रैल सन् 1976 में रवि दवे के निर्देशन में प्रेमचन्द की अमर कृति ‘गोदान’ का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत किया गया। ‘अनामिका’ की इस प्रस्तुति ने साहित्य एवं नाट्य मर्मज्ञ, सामान्य दर्शक, छात्र वर्ग, ग्रामीण वातावरण में पले लोगों- तात्पर्य यह कि समाज के हर वर्ग के मन को को स्पर्श किया।
सन् 1976 में ही मणि मधुकर रचित ‘दुलारी बाई’ का मंचन हुआ, निर्देशक वे स्वयं थे।
अक्टूबर 1976 से ‘अनामिका’ ने एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया- ‘नाटक’। तीन अंकों के बाद इसका नाम बदलना पड़ा- ‘नाट्य वार्ता’।
सन् 1977 में ‘अनामिका’ केवल दो नए नाटक कर पाई- ‘देना-पावना और मिस आलूवालिया’। मिस आलूवालिया का निर्देषन किया स्व0 षेखर चटर्जी व गोपाल कलवानी ने। इस नाटक के 150 के करीब प्रदर्षन हुए। इसमें श्री कलवानी के अभिनय को बहुत ही सराहा गया। शरतचन्द्र की शतवार्षिकी के अवसर पर ‘देना पावना’ विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। रूपान्तर प्रतिभा जी ने किया एवं निर्देशन भी उन्होंने ही किया।
सन् 1978 प्रस्तुतियों की दृष्टि से अधिक सक्रिय वर्ष था। इस साल ‘वंशवृक्ष’, ‘एक था गधा’, ‘शरशय्या’ तथा ‘सूरदास’- चार नाटक प्रस्तुत हुए। कन्नड़ के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘वंशवृक्ष’ का रूपान्तर प्रतिभा जी ने किया।
इस साल की अंतिम प्रस्तुति ‘सूरदास’ थी। ‘सूरदास पंचशती समारोह समिति’ के आमंत्रण पर इसे विशेष रूप से तैयार किया गया पहला प्रदर्शन समिति द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सूर संगोष्ठी के अवसर पर 11 दिसंबर को किया गया। सूर-प्रेमियों ने इसे खूब सराहा, किन्तु नाट्य-प्रेमियों की दृष्टि में सूर के जीवन, दृष्टि और पदों को प्रस्तुत करने वाली यह कृति शिथिल रही।
सन् 1979 में दो नाटक हुए- ‘कथा एक कंस की’ तथा ‘हिमालय की छाया’। दया प्रकाश सिन्हा रचित ‘कथा एक कंस की’ एक सशक्त कृति है।
‘हिमालय की छाया’ वसंत काने टकर की बहुचर्चित
कृति है। इसका निर्देशन शिवकुमार जोषी ने किया। इसमें साठ-सत्तर वर्ष के बूढ़े की प्रमुख भूमिका में प्रदीप अरोड़ा ने बहुत सशक्त अभिनय किया। साथ ही सुस्मिता सिंघी (अब गुप्ता) ने माँ की भूमिका में अत्यन्त प्राणवान अभिनय किया। उसके लिए यह पहली महत्वपूर्ण भूमिका थी।
22 दिसंबर सन् 1979 को ‘अनामिका’ ने पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश किया। सन् 1980 को रजत जयन्ती वर्ष घोषित किया गया और अवसर के उपयुक्त वर्ष व्यापी कार्यक्रम आयोजित किया गया।
जनवरी 1980 में पाँच दिनों का ‘अनामिका’- नाट्योत्सव आयोजित हुआ, जिसमें तीन पुराने नाटकों की पुनरावृत्ति हुई तथा दो नए नाटक प्रस्तुत किए गए। सन् 1957 में प्रस्तुत ‘नए हाथ’ के तीन कलाकार भँवरमल सिंघी, नरेन्द्र अग्रवाल तथा प्रतिभा अग्रवाल ने पुरानी भूमिकाओं में अभिनय किया, शेष कलाकार नए रहे। इसी प्रकार सर्वप्रथम सन् 1969 में प्रस्तुत ‘बल्लभपुर की रूपकथा’ की पुनरावृत्ति हुई, जिसमें उत्तम राम नागर, आत्मानंद तथा नरेन्द्र अग्रवाल अपनी पुरानी भूमिकाओं में उतरे, रामगोपाल बागला नई में। सन् 1970 में प्रस्तुत ‘आधे-अधूरे’ के मूल कलाकारों में कृष्णकुमार तथा प्रतिभा अग्रवाल ने पुनः नई प्रस्तुति में अभिनय किया, शेष नए कलाकार लिए गए। सन् 1974 में अनामिका द्वारा आयोजित नाट्योत्सव में जयशंकर प्रसाद के चंद्रगुप्त की प्रस्तुति एक चुनौती थी। पूरे परिश्रम के बावजूद प्रस्तुति को सीमित सफलता मिली। केवल महोत्सव में एक प्रदर्शन होकर रह गया। इस प्रस्तुति के बाद निर्देशन में अंतराल रहा, सन् 1978 में शरद जोशी का 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ' को प्रस्तुत किया। ‘गोदान’ (1976), ‘आधे-अधूरे’ (1980), ‘नये हाथ’ (1980, पुनः मंचन), ‘रेशमी रूमाल’ (1988), ‘इस पार उस पार’ तथा ‘साँझ ढले’ (1985) आदि।
नई प्रस्तुतियों में ‘हानूश’ उल्लेखनीय है। भीष्म साहनी का यह नाटक दर्शकों द्वारा प्रशंसित हुआ, निर्देशक थे रवि दवे।‘अनामिका’ ने अपनी रजत जयंती मनाकर एक पड़ाव पार किया। उसके सामने उज्ज्वल किन्तु संघर्षमय भविष्य है।श्यामानन्द जालान ‘अनामिका’ के महत्वपूर्ण निर्देशक थे, सब उनकी कुशलता के कायल थे, कोई समस्या नहीं थी। सन् 1971 में अनामिका से श्री श्यामानन्द जालान का अलग होना, इस घटना को कोलकाता का कोई नट्य प्रेमी भुला नहीं पायेगा। श्यामानन्द जालान ने अनामिका में रहते हुए, अनामिका की ही एक अन्य कलाकार ' चेतना' से पहली पत्नी 'किरण' के रहते-रह्ते ही दूसरा विवाह कर लिया, जो 'अनामिका' जैसी संस्था के नाम पे बदनुमा धब्बा था । श्यामानन्दजी के ‘अनामिका’ से अलग होने पर निर्देंशक का भार दूसरों के कंधों पर देने को बाध्य होना पड़ा। हालांकि इस विघटन के बाद अनामिका का प्रदर्शन कम और प्रभावहीन होता चला गया श्री भंवरमल सिंघी व शुशीला सिंघी के देहावसान पश्चात तो यह संस्था प्रायः मृत सी हो गई है।

अनामिका से श्यामानन्द जालान अलग होने के बाद 1972 में ‘पदातिक’ नाम से नई संस्था का जन्म दिया। जिसके तत्वाधान में शुरूआती वर्ष में ‘गिधाड़े’, ‘सखाराम बाइंडर’, ‘हजार चैरासी की माँ तथा शकुंतला’ नाटकों का संचय किया गया। ‘पदातिक’ बन जाने के बाद कलकत्ते के हिन्दी रंगमंच में नए दौर की शुरुआत हुई। आज कोलकात्ता जैसे शहर में ‘पदातिक’ एक शिक्षण संस्थान के रूप में काफी चर्चित हो गई है। जिसका एक मात्र श्रेय श्री श्यामानन्द जी जालान को ही जाता है।
पदातिक


1949- नया समाज, 1950- विवाह का दिन, 1951- समस्या, 1952- अलग अलग रास्ता, 1953- एक थी राजकुमारी, 1954- कोणार्क, 1955- चंद्रगुप्त, 1956- हम हिन्दुस्तानी है, 1956- संगमरमर पर एक रात, 1956- सत्य किरण, 1957- नदी प्यासी थी, 1957- पाटलीपुत्र के खंडहर में, 1957- नये हाथ, 1958- अंजो दीदी, 1958- नवज्योती के नयी हिरोइन, 1958- नीली झील, 1959- जनता का शत्रु, 1959- कामायनी (डांस ड्रामा), 1960- आशाढ़ का एक दिन, 1961- घर और बाहर, 1963- शेष रक्षा, 1963- छपते छपते, 1964- मादा कैक्टस, 1966- लहरों के राजहंस, 1967- शुतुरमुर्ग, 1968- मन माने की बात, 1968- एवम् इंद्रजीत, 1970- आधे अधूरे, 1971- पगला घोड़ा, 1972- पंछी ऐसे आते हैं, 1972- तुगलक (बांग्ला),1973- सखाराम बाइंडर, 1977- गुड वुमन आफ सेटजुआन, 1978- हजार चैरासी की माँ, 1980- कौवा चला हंस की चाल, 1980- शकुंतलम्, 1981- पंक्षी ऐसे आते हैं, 1982- उद्वास्त धर्मशाला, 1982- बीबियों का मदरसा, 1983- आधे अधूरे, 1985- मुखिया मनोहरलाल, 1987- कन्यादान, 1987- क्षुदितो पाशाण, 1988- राजा लियर, 1989- बीबियों का मदरसा, 1991- सखाराम बाइंडर, 1992- आधार यात्रा, 1995- रामकथा रामकहानी, 1998- कौवा चला हंस की चाल, 2000- खामोश अदालत जारी है, 2006- माधवी, 2008- लहरों के राजहंस।
नोट: निर्देषक और अभिनेता के रूप में इन नाटकों में श्री श्यामानन्द जालान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
अकृतः

श्री गोपाल कलवानी द्वारा निर्मित नाट्य-संस्था है जिसका मूल उद्देश्य है कोलकाता में हिन्दी नाट्य-मंच पर व्याप्त षून्य में से गुजरते हुए उसे इकाइयों, दहाइयों एवं ईश्वर चाहे तो अनगिनत संख्याओं में परिवर्तित करना ।
हिंदी नाट्य-मंच जिसका स्वर्णिम अतीत आसमान की ऊँचाइयाँ पाने के बाद बादलों के पीछे ओझल होता प्रतीत हो रहा था, बादलों के साये में से उसके अलौकिक आलोक का उद्दीपन आपको नजर आये, उसे उसका वर्तमान मिल जाए । ‘अकृत’ नाटक के साथ-साथ कला एवं संस्कृति के हर क्षेत्र में कार्य करने को प्रस्तुत है। गीत-संगीत नृत्य, चित्रकला व साहित्य सभी लौह कड़ियों से एक ऐसी मजबूत श्रृंखला बने जिसे चाहकर भी कोई तोड़ न पाये-अकृत के कार्य कलापों में यही भावना परिलक्षित होगी । इसके प्रमाण स्वरूप ‘अकृत’ की पहली प्रस्तुति ‘मायाजाल’ है। विजयदान की राजस्थानी कहानी ‘अमित लालसा’ पर आधारित यह संगीतमय नाटक दर्शकों को खूब पंसद आया। निर्देशक गोपाल कलवानी ने स्वरचित गीतों और लोक नृत्यों के माध्यम से इसे लोक नाटक का रूप दे दिया है ।
‘LittleThespain’:



Uma JhunJhunwala In 'Yadoon ke bhuje savere'

उमा झुनझुवाला द्वारा संचालित संस्था ने कथा-कोलाज-1 और कथा कोलाज-2 (2007 में) ‘?’ प्रश्नचिन्ह (हिन्दी, 2007 में), मंटों की कहानी पर आधारित नाट्य मंटों ने कहा (उर्दू 2006) यादों के बूझे हुए सवेरे (उर्दू 2005) हयवदन (नेपाली 2004 में), शुतुरमुर्ग (हिन्दी 2004 में), काँच के खिलौने (हिन्दी 2002 में) लाहौर (हिन्दी 1999) सुलगते चिनार (उर्दू 1996) महाकाल (हिन्दी 1995) और जब
आधार नहीं रहते हैं (हिन्दी 1997) और भी कई नाटकों मे आपकी संस्था ने महत्व पूर्ण पार्ट अदा किया है जिसमें बड़े भाई साहब (हिन्दी उर्दू 2006) रक्सी को श्रृष्टीकर्ता (नेपाली 2003) नमक की गुड़ीया (उर्दू 2001) तमसीली मुशायेरा (उर्दू 1998) सतगति (हिन्दी उर्दू 1994) और आग अब भी जल रही है (हिन्दी 1994) प्रमुख हैं। आपकी संस्था द्वारा कई स्ट्रीट नाटकों का भी मंचन किया गया-जिनमें ब्लैक संडे, किस्सा कुर्सी का, अटलबाबू-पटलबाबू, हाहाकार, खेल-खेल में आदि प्रमुख हैं।