बुधवार, 28 नवंबर 2007

मानवाधिकार

Tribal woman stripped naked in Guwahati

"हम" अपने को कहतें हैं 'मानव'
"वे" भी तो हैं 'मानव'!
परन्तु हम उसे मानव नहीं मानते;
उसे अपनावें, यही सत्य है।
ईश्वर भी यही है।
अज़ान या घन्टे की आवाज से ईश्वर नहीं मिलते;
ईश्वर न तो गिरजघरों में रहते हैं,
न ही गुरूद्वारा, मस्जीद, मंदिर में,
यह तो बस बसा है हमारे-अपके हृदय में,
कैद हो गया है हमारा हृदय,
जो चारदिवारी के बीच खोजता है ईश्वर को,
पूजा उसकी करो जो दीन है,
वे दीन नहीं,
भूखे, नंगे और लाचार हैं या अशक्षित हैं,
उनकी सेवा ऎसे करो, कि वे इनसे मुक्त हो सके,
अपने दान से उनके जीवन को बदलने का प्रयास करें।
वे दीन नहीं,
उनके हृदय में बसा "हृदय"
स्वच्छ व संतुष्ठ है।
भूखे-नंगे-अनपढ़ तो हम हैं;
न तो हम स्वच्छ हैं, न ही संतुष्ठ ;
मानव से मानव की दूरियों को बढ़ाते चले जा रहें हैं।
उनको देखो!
वे कैसे एकत्रित हो नाच-झूम-गा रहें,
परन्तु हम एक कमरे में सिमटते जा रहे हैं
हमारी दूरी तय नहीं,
और वे दूरी को पास आने नहीं देते।
देखो! उनको ध्यान से देखो, और कान खोल कर सुनो!
.....उनकी तरफ ध्यान दो!.........
'सूर्य की किरणें, बादलों का बरसना़......
हवा का बहना, खेतों का लहलहाना......
पक्षियों का चहकना, चांद का मुस्कराना......
मिट्टी की खुशबु, वन की लकड़ी, वंशी की धुन......
सब उनके लिये है, हमारे पास क्या है?
सिर्फ एक मिथ्या अधिकार कि हम 'मानव' हैं
तो वे क्या हैं? - जानवर? ......
नहीं! वे भी मानव हैं, पर ......
हम अनके साथ जानवर सा करते हैं सलुक;
कहीं धर्म के नाम पर, कहीं रंग के नाम पर,
कहीं वर्ण के नाम पर, कहीं कर्ण के नाम पर,
यह सब शोषण है, इसे समाप्त करना होगा;
इसके लिये हमें लड़ना होगा - शम्भु चौधरी

कोलकात्ता






1.

कोलकात्ता आज भी ढोता है,
जिन्दा लाशों को, कन्धों पे नहीं, शीनों पे,
श्मशान की बात मत करो;
ये तो फिर जग जाते हैं,
हम लावारिश लाशों की
गिनती में आ जाते हैं।
चढ़ कर देखो एक बार सिर्फ!
एहसास तुम्हें हो जायेगा
मानवता व आजादी का
नाम नहीं ले पायेगा।

2.
ये सड़कें, ये गलियाँ, फुटपाथ का रहना
अमीरों का घर है, गरिबों का गहना।
देखों शहर कलकत्ते का रैन वसेरा,
धुँआं देती गाड़ी, जलती ये राहें,
इंसानों की यहाँ चिता सज गई है,
ये वादे-इरादे, ये रिश्ते और नाते,
सभी कुछ है पर आधे-आधे।
अधिकारों का यह सब झूठा आडम्बर,
बँटता है खूनी रोजगार यहाँ पर;
देखो शहर कलकत्ते का रैन वसेरा,
अमीरों का घर है, गरिबों का गहना।
-शम्भु चौधरी

मैं भी स्वतंत्र हो पाता

मैं भी स्वतंत्र हो पाता
- शम्भु चौधरी, कोलकात्ता

चलो आज खिड़कियों से कुछ हवा तो आई,
कई दिनों से कमरे में घुटन सी बनी हुई थी।
हवाओं के साथ फूलों की खुशबू
समुद्री लहरों की ठंडक,
थोड़ी राहत,थोड़ा शकुन,
पहुँचा रही थी मेरे मन को शकुन
कुछ पल पूर्व मानो कोई बंधक बना लिया था
समुंदर पार कोई रोके रखा था,
कई बंधनों को तोड़, स्वतंत्रता के शब्द ताल
बज रही थी एक मधुर धुन।
सांय...सांय.....सांय.....सांय.....
मैं नितांत, निश्चित व शांत मन से
एकाग्रचित्त हो कमरे के एक कोने में बैठा,
हवाओं का लुफ्त उठा रहा था।
काश! इन हवाओं की तरह,
मैं भी कभी स्वतंत्र हो पाता
अपने - आपसे?

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निःशब्द हो जलता रहा
- शम्भु चौधरी, कोलकात्ता

आज, अपने आपको खोजता रहा,
अपने आप में,
मीलों भटक चुका था, चारों तरफ घनघोर अंधेरा
सन्नाटे के बीच एक अजीब सी, तड़फन ,
जो आस-पास,
भटक सी गयी थी।
शून्य ! शून्य ! और शून्य !
सिर्फ एक प्राण,
जो निःसंकोच, निःस्वार्थ रहता था,
हर पल साथ
पर मैंने कभी उसकी परवाह न की,
अचानक उसकी जरूरत ने,
सबको चौंका दिया।
चौंका दिया था मुझको भी,
पर! अब वह
बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर...
और मैं जलता रहा निःशब्द हो आज
..

मंगलवार, 27 नवंबर 2007

देश भक्ति गीत










वतन की नाव
मारो मुझे एक ऐसी कलम से,
जिससे फड़कती हो मेरी नबज़;
लड़ते रहें, हम लेकर नाम मज़हब का,
मुझको भी जरा ऐसा लहू तो पिलावो,
वरसों से भटकता रहा हुँ,
कहीं एक दरिया मुझे भी दिखाओ;
बना के वतन की नाव यहाँ पे;
मेरे मन को भी थोडा़ तो बहलाओ।
मरने चला जब वतन कारवाँ बन,
कब तक बचेगा जरा ये भी बताओ?


श्रद्धांजलि
नमन तुम्हें, नमन तुम्हें, नमन तुम्हें,
वतन की राह पे खडे़ तुम वीर हो,
वतन पे जो मिटे वो तन,
नमन तुम्हें! नमन तुम्हें,
नमन तुम्हें! नमन तुम्हें,
ये शहीदों की चित्ता नहीं,
भारत नूर है,
चरणों पे चढ़ते 'हिन्द' ! तिरंगे फूल हैं।
मिटे जो मन, मिटे जो धन,
मिटे जो तन, वतन की राह पे खडे़ तुम वीर हो,
वतन पे जो मिटे वो तन,
नमन तुम्हें! नमन तुम्हें! नमन तुम्हें! नमन तुम्हें!

मेरा भारत महान
मेरा वतन मेरा वतन...ये प्यारा हिंदोस्तान - २
हम वतन के हैं सिपाही... वतन के पहरेदार!
मेरा वतन मेरा वतन...ये प्यारा हिंदोस्तान - २
डर नहीं तन-मन-धन का...मन मेरा बलवान!
वतन की रक्षा के खातिर... दे देगें हम अपने प्राण
मेरा वतन मेरा वतन...ये प्यारा हिंदोस्तान - २
सात स्वरों का संगम भारत... जन-गण की आवाज,
मिल-जुल कर गाते हैं सब... मेरा भारत महान्


ध्वजः प्रणाम्
हिन्द-हिमालय,

हिम शिखर, केशरिया मेरा देश।
उज्ज्वल शीतल गंगा बहती,
हरियाली मेरा खेत,
पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण...
लोकतंत्र यह देश
चक्रधरा माँ करते...हम सभी नमन्,
'जय-हिन्द' - 'जय-हिन्द'।


संपर्क: शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453, साल्टलेक सिटी,कोलकाता - 700106