शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

नन्हें से पहरेदार - शम्भु चौधरी




जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

जन्मेगा जब आतंकवाद,
इन भोले-भाले बालों में,
टपकेगें नयनों से आँसू,
हीरे से मोती गालों पे।
घर-घर में जब आग जलेगी,
संध्या को दिवालों में,
पग-पग में तब मौत उगेगी,
खेतों और खलियानों में।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

न्यापालिका जब यहाँ पर,
सत्ता की गुलाम बनी,
जंजीरों को तोड़ यहाँ,
लुटेरों की सरकार बनी।
विधानसभा जेलों में होगी,
संसद तब ‘तिहाड़’ बने,
थाने-थाने में गुण्डे होंगे,
देश के पहरेदार बने।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

न्यायपालिका जब यहाँ पर,
हो जायेगी गूँगी तब,
संसद में बैठे नेतागण,
चिर का हरण करेगें तब।
कौन बनेगा ‘कृष्ण’ यहाँ,
किसकी सामत आयी है,
कलियुग के भीम-गदा को देखो,
युधिष्ठर, नकुल, सहदेव कहाँ
‘अर्जून’ की तरकश में अब,
वाणों का वह वेग कहाँ,
भीष्मपितामह की वाणी में,
ममता-व- स्नेह कहाँ,
‘धृतराष्ट्र’ ढग-ढग पे देखों,
सत्ता के गलियारों में,
दुर्योधन की गिनती कर लो,
चाहे हर मंत्रालयों में।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

आज यहाँ होली तू क्यों,
विधवा बनकर आयी हो,
सतरंगी - रंगों में देखो,
ये कैसी परछाई है? ।
होली तू ऐसी आयी क्यों?
सब अपने ही रंग में सिमट गये,
गांधी के भारत को देखो,
ये कैसी आग लगाई है।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

लोकपाल बिलः भ्रमाक प्रचार का सहारा



सरकार ने धोखेबाजी के साथ यह सब नाटक रच देश की जनता के साथ न सिर्फ धोखा किया है। संसद में कमजोर लोकपाल बिल लाकर वह लोकपाल बिल को एक तमाशा बना देने पर तुली है। इसके साथ ही अब यह तय हो गया कि टीम अन्ना द्वारा सूझाये गये सभी प्रस्तावों को कचरे के डब्बें में फेंक दिया गया है। यह एक खोखला प्रचार किया जा रहा है कि सरकार ने अन्ना के सूझावों को ध्यान में रखते हुए बिल में काफी परिवर्तन किये हैं। हाँ! परिवर्तन इस बात का किया गया है कि किसी भी प्रकार से मनमोहन की पिछली और वर्तमान सरकार के पापों की जाँच लोकपाल न कर सके इस बात को ध्यान में रखते हुए बिल के सभी प्रावधानों को सावधानी पूर्वक प्रस्तावित बिल में संजोया गया है ताकी निकट भविष्य में इन बेइमानों को कोई जेल में न भेज सके।


पिछले 65 सालों के इतिहास में देश की सबसे बड़ी भ्रष्ट सरकार के केबिनेट स्तर की बैठक में आज एक प्रकार से भ्रमित प्रचार का सहारा लेते हुए प्रस्तावित सरकारी लोकपाल बिल को केबिनेट की मंजूरी प्रदान कर दी। जिसे संसद के अगले सत्र में बहस के लिए प्रस्तुत किया जाना है और यह भी तय है कि सरकार का यह सरकारी ड्रामा संसद के गलियारे में या तो दम तोड़ देगा या ऐसा बिल पारित हो जायेगा जो न सिर्फ देश के लोकतंत्र को अंगूठा दिखा अपनी तामाम काली करतूतों पर परदा डाल देगा कि किसी भ्रष्टाचारी सजा मिलने की जगह उसे क्लिन चिट दे दिया जायेगा। मसलन 2जी घोटाला, कामनवेल्थ घोटाला, जैसे मामालों को तथाकथित लोकपाल बिल के दायरे में लाकर उसे न सिर्फ पाक-साफ कर दिया जायेगा। घोटालेबाजों पर अंगूली दिखाने वाले को जेल की हवा भी खानी पड़ेगी। आपने अभी देखा ही है कि भ्रष्ट सरकार किस प्रकार रामदेव बाबा व उनके सहयोगियों को न सिर्फ झूठे और मनगढ़ंत मामाले में उलझाकर देश को गुमराह करने में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है।


1. सरकार द्वारा भ्रमाक प्रचार -
सरकारी पक्ष देश में यह भ्रम फैला रही है कि अन्ना हजारे संसद के ऊपर होकर लोकपाल बिल को खुद ही पास करना चाहतें हैं जबकि बिल को संसद के अन्दर संसद सदस्य पारित करेगें अन्ना उनके अधिकार क्षेत्र में दखलअंदाजी कर रहे हैं। उनका यह भ्रम आज कुछ मंत्रियों के बयानों से साफ झलकने लगा कि सरकार अपने केबिनेट को यह समझाने में सफल हो गई कि संसद के चुने हुए सांसदों के ऊपर कोई नहीं। ये भी जनता के प्रतिनिधि ही हैं। सिविल सोसायटी के चन्द लोग मिलकर सरकार को डराने का काम कर संसदीय प्रणाली की मर्यादा को भंग कर उन पर हावी होने का प्रयास कर रही है जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जायेगा। यह मिथ्या प्रचार न सिफ्र भ्रमक है देश कि जनता के साथ-साथ अपने साथियों को लामबंद करने का एक प्रयास भी है। अन्ना हजारे व सिविल सोसायटी के सदस्य मजबूत लोकपाल बिल लाने के पक्ष में अपनी राय जनता से शेयर कर रहें है। जबकि सरकार ने जनता के द्वारा किये आन्दोलन को दबाने का नाटक रच जनता की आंखों में धूल झोंक कर सिविल सोसायटी के सदस्यों के साथ बैठकें की। अब उसे ही कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर एक प्रकार से अभी से ही जनता के आन्दोलन का कूचलने की रणनीति बना रही है। जिसके तहत वह संसद की मर्यादा को भी ताक में रखने को तैयार दिखती है।


2. सरकार द्वारा भ्रमाक प्रचार -
सरकार जिस तरह से अन्ना हाजारे व बाबा रामदेव को अपने जाल में फंसाने का प्रयास कर न सिर्फ अनैतिक दबाब बनाये रखने के लिये इन लोगों के द्वारा संचालित ट्रस्टों की जाँच व अन्य धोखाबाजी वाली चालें चल रही है इससे इस सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है कि सरकार की नियत देश को गुमराह करने की है न कि मजबूत लोकपाल बिल लाने की अतः इस सरकार के रहते हम एक मजबूत लोकपाल बिल की कल्पना किसी भी कीमत पर नहीं कर सकते। चुंकि सरकार भ्रष्टचारियों के सहयोग से चल रही है अतः यह भी कल्पना करना कि सरकार को निकट भविष्य में कोई क्षति होगी वह भी संभव नहीं।


3. सरकार द्वारा भ्रमाक प्रचार -
सरकारी पक्ष का मानना है कि वे देश की जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं फिर भी वे बेगेर चुने हुए लोगों के साथ लोकपाल बिल पर चर्चा कर उनके द्वारा सूझाये गये सूझावों को लोकपाल बिल में शामिल कर लिए जाने के बाबजूद अन्ना हजारे व उनकी टीम संसद को चुनोती देने का कार्य कर रही है। जबकि सरकार ने धोखेबाजी के साथ यह सब नाटक रच देश की जनता के साथ न सिर्फ धोखा किया है। संसद में कमजोर लोकपाल बिल लाकर वह लोकपाल बिल को एक तमाशा बना देने पर तुली है। इसके साथ ही अब यह तय हो गया कि टीम अन्ना द्वारा सूझाये गये सभी प्रस्तावों को कचरे के डब्बें में फेंक दिया गया है। यह एक खोखला प्रचार किया जा रहा है कि सरकार ने अन्ना के सूझावों को ध्यान में रखते हुए बिल में काफी परिवर्तन किये हैं। हाँ! परिवर्तन इस बात का किया गया है कि किसी भी प्रकार से मनमोहन की पिछली और वर्तमान सरकार के पापों की जाँच लोकपाल न कर सके इस बात को ध्यान में रखते हुए बिल के सभी प्रावधानों को सावधानी पूर्वक प्रस्तावित बिल में संजोया गया है ताकी निकट भविष्य में इन बेइमानों को कोई जेल में न भेज सके।


- शम्भु चौधरी

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार लोकतंत्र का लोकमंत्र - शम्भु चौधरी



सरकार समझती है कि मीडिया वाले मूर्ख हैं उनको जैसे उल्लू बनायेगें वे बन जाते हैं सो रोजना उसे पंतजली और उनके सहयोगियों की पोल खोलते रहेगें तो ये मूर्ख लोग उसी में उलझ कर रह जायेगें। देश की जनता बाबा रामदेव व उनकी संपति का लेख-जोखा सरकार से नहीं मांग रही है सरकार उन बेइमानों की जाँच करें जिसके लिए उच्चतम न्यायालय गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है और जिनकी वकालत सरकार कर रही है देश की जनता यह जानना चाहती है कि सरकार उनपर क्या कार्रवाई करने जा रही है।


जब हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपनी पैनी नजर डालतें हैं तो हम पाते है कि वर्तमान सरकार पूरी तरह से भ्रष्टाचारियों के गिरफ्त में कैद हो चुकी है तो दूसरी तरफ विपक्ष भी पूरी तरह से पाक-साफ नहीं इसके अन्दर भी बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछ वाले पांव फैलाये बैठें हैं। आंचलिक व क्षेत्रीय दलों के अन्दर भी राष्ट्र के संचालन की कोई इच्छा शक्ति दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती सभी अपने राजनैतिक हितों और सत्ता सुख-स्वाद लेने में लगी है। कुल मिला-जुला कर हम पातें हैं कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र का लोकमंत्र बन चुका है। इनको बदले तो लायें किसको? यह एक आम प्रश्न हमारे जेहन में कोंध रहा है। रावन ने रामदूत हनुमान की पूँछ में आग लगा दी परिणाम क्या हुआ सोने की लंका पलकों में ही धू-धूकर धधकने लगी। बाबा रामदेव के जाँच प्रकरण से ऐसा प्रतित होता है कि देश में अब कालेधन की बात करने व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों की खैर नहीं। सरकार की ताकत मानानीय उच्च न्यायलय के लाख फटकार के बावजूद कालेधन के अपराधियों को बचाने का प्रयास करती रही। खुद की जाँच एजेन्सियों को देश के लूटे धन को देश में लाने के लिए तो नहीं लगा पाई हाँ! बाबा रामदेव व उनके सहयागी श्री बालकृष्ण की डिग्रियों और उनकी जन्म प्रमाणिकता जाँच करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सरकार किसे डराना चाहती है? कालेधन के अपराधियों की जाँच में सरकार ने इतनी सक्रियता दिखाई होती तो बात समझ में आती पर सरकार समझती है कि मीडिया वाले मूर्ख हैं उनको जैसे उल्लू बनायेगें वे बन जाते हैं सो रोजना उसे पंतजली और उनके सहयोगियों की पोल खोलते रहेगें तो ये मूर्ख लोग उसी में उलझ कर रह जायेगें। देश की जनता बाबा रामदेव व उनकी संपति का लेख-जोखा सरकार से नहीं मांग रही है सरकार उन बेइमानों की जाँच करें जिसके लिए उच्चतम न्यायालय गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है और जिनकी वकालत सरकार कर रही है देश की जनता यह जानना चाहती है कि सरकार उनपर क्या कार्रवाई करने जा रही है।
बाबा रामदेव की जाँच कर सरकार बेईमानों की वकालत करती दिखाई दे रही है। सरकारी ताकतों का प्रयोग करना है तो सरकार देश में बस गये बंग्लादेशियों के हजारों जाली पासपोर्ट की भी जाँच करें जो देश में घुसपैठ कर न सिर्फ देश की अर्थ व्यवस्था को भारी क्षति पंहुचा रहें हैं। देश की सुरक्षा को भी खतरा बना हुआ है। बाबा रामदेव व पंतजलि को नुकसान पंहुचाकर सरकार परोक्ष रूप से उन विदेशी ताकतों का मनोबल मजबूत करने में लगी है जो नहीं चाहती कि भारतीय उद्योग व भी खासकर भारतीय दवा उद्योग उनका मुकाबला करे। सरकार की इस प्रकार की बदले से परिपूर्ण कार्रवाई को हम किसी भी रूप में सही नहीं ठहरा सकते। भले ही बालकृष्ण की सारी डिग्रीयों जाली हों वह हमारे देश के नागरिकों की भलाई में संलग्न है न कि आंतकवादी कार्य में संलिप्त है। इस तरह की कार्रवाई की हम खुले शब्दों में निन्दा करते हैं। सरकार आंतकवादियों के लिए इतनी सक्रियता दिखती तो हमें थोड़ा संतोष होता परन्तु सरकार की मंशा न तो आंताकवदियों को सजा दिलाने की है न ही कालेधन के मामाले में सरकार पाक-साफ नजर आती है।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

वैष्णव जन तो तेने कहिये - शम्भु चौधरी


नोटः पिछला लेख ‘‘देश के बेईमान अर्थशास्त्री’’ आपने पढ़ा होगा आगे इस लेख का दूसरा भाग पढ़ें "वैष्णव जन तो तेने कहिये"।
कानून के इस अंधेपन, गूंगापन और नंगेपन को यदि देखना हो तो वह भारत के किसी भी हिस्से में जाकर देख सकते हैं। इस देश में पहले कुछ विदेशी भ्रमणकारी भारतीयों की गरीब बस्तियों में जाकर रहते उसका अध्ययन करते और भारत की दरिद्रता व नग्नता को एक अच्छा सा नाम जैसे ‘‘सिटी ऑफ जॉय’’ देकर अपना माल हमें ही बेचने में सफल हो जाते और हम भारतीय इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि "Kolkata is City of Joy" यह न सिर्फ हमारी खोखली मानसिकता को दर्शाती है।



भारतीय अर्थशास्त्री जिन आंकड़ों से देश की अर्थव्यवस्था चला रहें हैं उससे देश के किसानों का कोई भला नहीं हो सकता। जमीन अधिग्रहण की ख़ामियाँ जगजाहिर हो चुकी है। जिस कानून को राष्ट्र के विकास व जनहित को ध्यान में रखकर बनाया गया था आज उसका खुलकर व्यवसायीकरण होने लगा है। राष्ट्र के विकास के माध्यम से खुद का पोषन व किसानों का शोषण जमकर होने लगा। सरकारी सहयोग से सरकार के ही कानून की दलीलें दे जमीनों के सौदागर किसानों की उपजाऊ जमीनों का ओने-पौने दामों में खरीद रातों-रात खरबपति बनने का सपना संजोये जा रहें हैं जिसमें प्रायः सभी राज्यों की सरकार व सरकारी एजेंसियां सहयोग प्रदान करती नजर आती है। कानून के इस अंधेपन, गूंगापन और नंगेपन को यदि देखना हो तो वह भारत के किसी भी हिस्से में जाकर देख सकते हैं। इस देश में पहले कुछ विदेशी भ्रमणकारी भारतीयों की गरीब बस्तियों में जाकर रहते उसका अध्ययन करते और भारत की दरिद्रता व नग्नता को एक अच्छा सा नाम जैसे ‘‘सिटी ऑफ जॉय’’ देकर अपना माल हमें ही बेचने में सफल हो जाते और हम भारतीय इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि "Kolkata is City of Joy" यह न सिर्फ हमारी खोखली मानसिकता को दर्शाती है। हमारे भारतीय दर्शन पर भी प्रहार करती है। कहावत है कि अंधे लोगों को सिर्फ काला ही काला दिखता है पर इसका अर्थ यह नहीं कि आंखों के अंधे को काला दिखता है भारतीय संस्कृति विश्व को दर्शन देने की क्षमता रखती है जब शिकागो के एक विश्व सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने जैसे ही यह कहा कि ‘‘जिस तरह सारी नदियां एक ही समुद्र में समा जाती उसी तरह धर्म भी’’ तो सारा विश्व उस रात सो नहीं पाया रात भर विश्व के समाचार पत्र इस समाचार को प्रधानता देने की अलग-अलग से तैयारियों में जुट गये थे। सुबह का अखबार विवेकानन्द के रंग हुआ था। भारत दर्शन की इस प्रधानता को आज भी कोई नहीं छीन पाया परन्तु दुर्भाग्य से इस देश के 80 प्रतिशत राजनेताओं ने भारत के दर्शन को न सिर्फ सांप्रदायिक स्वरूप दे दिया। वोट बैंक की राजनीति देश में हर उस व्यक्ति को सांप्रदायिक बना दिया जो भारतीय दर्शन और संस्कृति की बात करता है। वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे । लेख जारी.... (लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार है।)

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

देश के बेईमान अर्थशास्त्री - शम्भु चौधरी



जिनको जेलों में बन्द किया जाना चाहिए था उनके साथ सरकार ने मिलकर बैंकों का पाप धो डाला। अब इस लूट के बाद ‘सेबी’ के माध्यम से इन कम्पनियों को नई लूट की छूट दे दी गई है। वो है 10 रुपये के शेयरों के फेस भ्येल्यु को कम कर या तो एक रुपया या दो रुपया करना या कम्पनी की कुल शेयर पुंजी को कम कर नये शेयरों का निर्गम करना। अब आपको यह बात कैसे समझ में आयेगी? सीधी-सीधी भाषा में बता देता हूँ माल का चवन्नी करना और डकार भी न लेना। आपने वो बिल्लियों की रोटी और चालाक बन्दर वाली कहानी तो पढ़ी ही होगी। बस कुल मिला कर देश के बेईमान अर्थशास्त्री यही कार्य करने की योजना को मुर्तरूप प्रदान कर रहें हैं। लेख जारी....


भारत एक कृषि प्रधान देश है। जहाँ देश की 70 प्रतिशत आबादी आज भी कृषि आधारित जीवन यापन करती है। कच्ची सड़कों का सफर इतना लम्बा है कि उसे नापते-नापते बच्चों के पांव थक जाते हैं। 50 हजार गांवों में आजादी के 65 सालों बाद भी सड़क-पानी-बिजली-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ झलकता है। रोजाना पांच-पांच किलोमीटर का सफर तय कर, रास्ते में नदी-नाले को तैर-पार कर गांवों के बच्चे अभी भी स्कूल जाते देखे जा सकते हैं। रोजगार देने के नाम पर फल-फूल रहे उद्योगों के मालीक उद्योगपति बन गये और खेतों में सोना पैदा करने वाले किसान रोजाना फांसी के फंदे पर लटकने लगे। देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों को वतानकुलित पुस्तकों से मानद उपाधी दी जाने लगी। उनके दिमाग का खोखलापन रातों-रात खरबों की हेरा-फेरी सरकारी बैंकों के माध्यमों से कर दिया जाता है कि किसी को सपने में भी इसका अभास नहीं हो सकता। जो जिनता बड़ा अर्थशास्त्री वो उतना ही बड़ा आर्थिक अपराधी। पिछले दिनों देश के बैंकों के माध्यम से खरबों का बारा-नारा किया गया। ब्याज दर को 14-15 प्रतिशत से घटा कर 6-7 प्रतिशत की दर पे ले जाया गया, साथ ही उद्योगपतियों को बैंक लूटने की इजाजत भी दे दी गई। बैंकों के करोड़ों के पुराने कर्जों को बैगर ब्याज सिर्फ मूल को चुकता कर नया कर्ज नई दरों पर बांटा गया। अर्थात एक नई बैंक के द्वारा बेईमानों के पुराने कर्ज के अवज में नया कर्ज नये ब्याज दर पर मुहैया कराया गया और पुराने बैंकों के कर्ज को बिना ब्याज के उनका ऋण चुकता कर दिया गया। इस तरह की धोखाघड़ी को नाम ‘पुर्नजीवन’ दिया गया। अर्थात ‘‘नान परफोर्रमेन्स ऐसेस्ट’’ जिसका हिन्दी रूपान्तर होता है जो धन कार्यरहित हो चुका हो उसे सक्रिय धन में परिवर्तित करना इसके माध्यम से देश के लाखों लुटरों को पुनः धन लूटने की खुली छूट दे दी गई जबकि किसी आम किसान के साथ ऐसा करने के लिए सरकार हजार बार सोचने में वक्त गुजार देती है। ‘पुर्नजीवन’ के इस धोखाघड़ी में तमाम सरकारी बैंके शामिल हुए। एक ने दूसरे बैंक के एन.पी.ए. को समाप्त किया तो दूसरे ने तीसरे इस प्रकार न सिर्फ धन की हेरा-फेरी कर सारे एन.पी.ए को समाप्त कर दिया गया बल्की इस लूट में उद्योगपतियों को भी सहयोगी बना लिया गया कारण साफ था देश के बैंकों का 90 प्रतिशत इन्हीं लुटेरों के यहाँ दबा पड़ा था, जिसका न तो वे ब्याज भूगतान कर रह थे ना ही कम्पनी को ठीक ढंग से चला रहे थे। जनता की गाढ़ी मेहनत की कमायें धन से वे एशो-आराम की सारी सुविधाऐं खरीद कर न सिर्फ मौज मस्ती करते रहे, जनता के धन का भी दुरुपयोग करते पायें जातें रहे हैं। जिनको जेलों में बन्द किया जाना चाहिए था उनके साथ सरकार ने मिलकर बैंकों का पाप धो डाला। अब इस लूट के बाद ‘सेबी’ के माध्यम से इन कम्पनियों को नई लूट की छूट दे दी गई है। वो है 10 रुपये के शेयरों के फेस भ्येल्यु को कम कर या तो एक रुपया या दो रुपया करना या कम्पनी की कुल शेयर पुंजी को कम कर नये शेयरों का निर्गम करना। अब आपको यह बात कैसे समझ में आयेगी? सीधी-सीधी भाषा में बता देता हूँ माल का चवन्नी करना और डकार भी न लेना। आपने वो बिल्लियों की रोटी और चालाक बन्दर वाली कहानी तो पढ़ी ही होगी। बस कुल मिला कर देश के बेईमान अर्थशास्त्री यही कार्य करने की योजना को मुर्तरूप प्रदान कर रहें हैं। लेख जारी.... (लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार है।)

रविवार, 17 जुलाई 2011

जब माझी नाव डुबोऐ - शम्भु चौधरी



जब देश में राज ठाकरे जैसे आतंकवादी खुले आम घुमते हों, जो रोज कुछ न कुछ धमाका करते ही रहते हैं अब आप ही सोचे हम कितने मराठी भक्त हैं कि मुम्बई शहर के तीन व्यस्ततम व्यावसायिक इलाके में शृंखलाबद्ध धमाके हो गये पर इनकों खुद के धमाके की ज्यादा चिन्ता सता रही है। ठीक इसी प्रकार कांग्रेस के कुछ कुत्ते भी भौंकने लगे। भाई इन लोगों से तो पाकिस्तानी जनता और वहाँ की सरकार अच्छी है जिन्होंने इन घटनाओं की खुल कर निन्दा की।


मेरी मानो तो इस देश को शत-प्रतिशत आतंकवादी हमलों से बचाने के लिए अब एक ही कारगार कदम उठाने की जरूरत शेष रह गई है कि इस देश की सुरक्षा का भार जल्द ही तालीबानियों व पाकिस्तानी कट्टरपंथी जांबाजों के हाथों में सोंप देनी चाहिये। कम से कम वे देश में फल-फूल रहे चन्द कुत्तों का तो वो काम तमाम कर ही देगें। उनके अन्दर भी अभी खुद्दारी बची है। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा.. विस्फोट पर विस्फोट होते जा रहें हैं। एक तरफ कांग्रसी छुरी-काँटा लिए हमलावरों को बचाने के लिए कभी किसी पर तो कभी किसी पर मिथ्या आरोप गढ़ देश में सांप्रदायिक माहोल बनाने में अपना खून पसीना बहा रहे हैं तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री की बात कौन करे राहुल भईया देश को समझाने में लगे हैं। भाई! आखिर है खून किसका ...? माफ कीजिए... आखिर खून किसका बहा...? जिसका बहा वे रोये न तो इन्हें देश की चिन्ता है न किसी के दुःख-दर्द की बस इन सियासतदानों की सत्ता चलती रहे। ‘‘जब माझी नाव डुबोऐ तो फिर उसे कौन बचाए’’ अक्षरधाम, संसद, जयपुर, वाराणसी घाट, समझौता एक्सप्रेस, इन सब की बारी भले ही एक बार आई हो पर मुम्बई का नाम गलती से बदल दिया गया इसका नाम पुनः बम..बम..बम्बई..माफ कीजिए...मुम्बई! बम्बई रख लेना चाहिये। जहाँ न सिर्फ बार-बार आतंकी हमले हो रहे हैं और हमारी जाँच एजेन्सियां गुलछर्रे उड़ाने में लगी है। उन्हें पता है कि इन कुत्तों की लड़ाई में वे अपना वक्त ही जाया करेंगें किसी को सजा तो दिला नहीं सकते। अभी तक एक भी आतंकवादी हमलावरों को हम फांसी पर नहीं चढ़ा सके बल्की कुछ को सरकारी मेहमान बनाकर काबुल ले जाया गया हमारे देश के मंत्री साथ में रास्ते भर उनकी मेहमान नबाजी करते रहे। जब देश में राज ठाकरे जैसे आतंकवादी खुले आम घुमते हों, जो रोज कुछ न कुछ धमाका करते ही रहते हैं अब आप ही सोचे हम कितने मराठी भक्त हैं कि मुम्बई शहर के तीन व्यस्ततम व्यावसायिक इलाके में शृंखलाबद्ध धमाके हो गये पर इनकों खुद के धमाके की ज्यादा चिन्ता सता रही है। ठीक इसी प्रकार कांग्रेस के कुछ कुत्ते भी भौंकने लगे। भाई इन लोगों से तो पाकिस्तानी जनता और वहाँ की सरकार अच्छी है जिन्होंने इन घटनाओं की खुल कर निन्दा की। जय महाराष्ट्र।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? - शम्भु चौधरी



अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’


बाबा अम्बेदकर द्वारा रचित संविधान में राम का नाम लिखना-जपना सांप्रदायिकता है सो हमने इस लय को नई धुन देने का प्रयास कर रहा हूँ। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ आज देश में हर राजनेताओं की भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बू झलकती है। जिसे देखो हर मामले को सांप्रदायिकता से जोड़ रहा है। कालेधन की बात हो या राष्ट्र में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार जरा सी कोई चूँ-चपड़ किया की बस उसे सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने और चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश का हिस्सा मानने लगते हैं। इनकी भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बात साफ झलकती है। मानो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही सिर्फ 35 करोड़ अल्पसंख्यकों को बली चढ़ा दी गई हो। इस कतार में सबके सब लगे हुऐं हैं, धक्कमपेल चल रहा है। 65 सालों से उल्लू बनते आ रहे मुसलमानों के विकास, शिक्षा, कुरीतियों, रूढ़ीवादी परम्पराओं, कट्टरवादी धार्मिकता पर बोलने और उन्हें सुधारने का काम किसी ने नहीं किया। सिर्फ उन्हें हिन्दू कट्टरपंथियों से बचाये रखने व उनकी असामाजिक व कट्टरवादी धार्मिक गतिविधियों का संरक्षण कर वोट बैंक को सुरक्षित करना हमारे देश के राजनेताओं का एक मात्र लक्ष्य रह गया है। इसके लिए मुसलमानों के धार्मिक कट्टरवादी भी विशेष रूप से जिम्मेदार हैं, जो समाज के विकास को रोक राजनेताओं के पक्ष में अपने बयान देते नजर आते हैं। जब इमाम किसी दल विशेष को वोट देने या न देने की अपील जारी करता है तो वह धर्मनिरपेक्ष है। परन्तु जब बाबा रामदेव देश के लुटे हुए धन की बात करता हो या अन्ना हजारे देश की संसद को भ्रष्टमुक्त करने के कानून पर चर्चा करता हो तो या तो इन लोगों को यह सलाह दी जाती है कि वे जनता के प्रतिनिधि नहीं है पहले वे चुनकर आयें तब चुने हुए बेईमानों से बात करें या फिर उन्हें सांप्रदायिक शक्ति करार दे दिया जाता है। मानो इस देश में आतंकवादी हमला करने वाली ताकतें तो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बचती रहे और राष्ट्र के उन्नति व इसके उत्थान की बात करने वाला या तो देश का गद्दार है या देश में सांप्रदायिकता का जहर फैला रहा हो। मजे की बात यह है कि इससे न तो कभी किसी इमाम का भला हुआ न ही इनकी कौम को हाँ! कभी कभार वह भी चुनाव के वक्त उनके प्रसाद के बतौर थोड़ा बतासा खाने को जरूर मिल जाता है। जैसे कुछ असमाजिक तत्वों की रिहाई या किसी कानून को उनके पक्ष में समाप्त कर देना या बना देना या फिर बंग्लादेशियों को राशनकार्ड व वोटर कार्ड देकर उसे खुद की झौली में जमा कर लेना। इससे इस देश के मुसलमानों का क्या भला हुआ? मुसलमानों के वोट बढ़ने से यदि सत्ता उनको मिलती हो तो बात मेरी समझ में आती पर किसी कांग्रसी ने कभी भी सत्ता मुसलमानों को सोपने की बात कभी नहीं की व सत्ता किसे सोपना चाहतें हैं राहुल गांधी को.... सोनिया जी को या खुद उनसे चिपके रह कर देश को लुटने के फिराक में रहते हैं। अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी?प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ (लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

रविवार, 3 जुलाई 2011

व्यंग्यः सांप भी मर जाय.. - शम्भु चौधरी



मेरी माने तो संसद में लोकपाल बिल पर कानून लायें या न लायें जल्दी से एक अनशन कानून तो बना ही डालें। ताकी लोकतंत्र में इस हथियार का प्रयोग भविष्य में कोई न कर सके। खास कर सरकार के खिलाफ तो बिल्कुल भी नहीं। जिसे इस हथियार का प्रयोग करना है वह पहले संबन्धित सरकार से अनुमति प्राप्त कर लें अन्यथा इसे लोकतंत्र के खिलाफ और संसद की अवमान्यना मानते हुए उन लोगों पर देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जायेगा। रवाअअआ वोअ कहावत सुनलेअअ हैय कि नाहीं ‘‘सांप भी मर जाय और लाठी भी न भाजनी पड़े।’’


सावन का महीना पवन करे सोर अरे ssss बाबा सोsssर नहीं शोर... शोर हाँ! ऐसे। जियरा’रे झूमे ऐसे जैसे मनवा नाचे मोर। अब रवा’के गाना सूझेतानी कोsss? तब तूहिये बोलो बबवा का करी। लोकतंत्र में जै चुने जात है सैहिये ने देश के सिपाही बाड़े देश कै रक्षा करे खातीर बाकी सब तो हिजड़ा बानी उके बोले के कोनो अधिकार नैखे....तब गाना न गोsssई तो कोsss कर’री। कुछ लिखो- पढ़अ...। भारत के संविधान पढ़ले बानी की नाईsss? ‘‘अखनी देश में 64 साल बाद बाबा अम्बेदकर कै याद कर रहैल तानी सब कोsssई खास कर कांग्रेसियन लोग।’’ इsss कोsssअ बोले तानी? बतावह न कोsss बात बा पहेली न बुझावह। ‘‘देखे इमें पहेली बुझे कै कोनु बात नैइखे बा। ‘‘तब कोsss लिखले बाड़े जल्दी बतावह’’ उमें लिखले बोsss -‘‘कोsss’’ छोड़ो अनपढ़ गांवार के ई सब नैखे पढ़े कै और सुने कै... देश के पवित्र संविधान बाड़े। चुप करह केहु सुन ली... दीवार के भी कान बानी... जेल जाअअवे के मन है काअअ? जिकरा कसम खाईके देश के लुटल जाअअई। उमें साफ-साफ लिखले है कि लोकतंत्र कैअअ मतलब बाअअ ‘‘जनता की सरकार, जनता के लिए और जनता द्वारा’’ इमें आगे पीछे कोनो माने लिखल नैईखे। सो जै सरकार में रही वही देश के लुटे के अधिकारी बानी। ‘अच्छअअआ’ अब हमनी कै साफ होग्यैल ईं चुने शब्द पर बार-बार जोर काहे को देत रहैल बाड़ै।
ई..साला भोजपुरी लिखे के चक्कर में हमनी तो असली बातें करना ही भूल गये। रामलीला मैदान में आधी रात को चोर की तरह सरकारी सिपाही आये लाठियां बरसाई अश्रु गैस के गोले दागे। भ्रष्टाचार संरक्षक समिति के सदस्यों की दलील है कि बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान योग के लिए भाड़े पर लिया था उस पर तम्बू लगाकर सरकार को गाली देने के लिए नहीं दिया गया था, सो उनको समय दिया गया कि वे शाम तक अपना सरकारी सह पर किया गया नाटक समाप्त कर दें। जब उन्होंने हमारी बात मानने से इंकार कर दिया तो हमें लाचारी में यह कार्रवाई करनी पड़ी। तो भाई! रात को ही क्या जल्दी थी यह काम तो सुबह पाँच बजे के बाद भी किया जा सकता था। ये अलग बात है कि सरकार की मंशा अंधेरे में देश को अंधेरे में रखना था तो अपनी बात को अब जायज ठहराने के लिए कुछ तो कहना ही है। चलिये ये बात आपकी मान लेतें हैं कि बाबा रामदेव का यह अनशन कानूनी रूप से अवैध था। पर अन्ना हजारे के आगामी अनशन पर जबकि अभी तो सिर्फ आपको चमका रहें हैं, अभी से ही आपलोग क्यों बिदके हुए हैं कोई इसे लोकतंत्र पर हमला करार दे रहा है तो कोई इसे संसद को चुनौती देना मान रहा है। कोई अभी से धमका रहा है तो कोई बाबा अम्बेदकर को सामने ला रहा है। मानो देश की 130 करोड़ जनता मुर्ख और चुने हुए चतुरानन्द सांसद चालाक? कपिल जी, प्रणब जी, सलमान साहेब, 3जी के घेरे में आने वाले हमारे गृहमंत्री श्री चिदम्बरम जी सबके-सब बारी-बारी से अन्ना व उनकी टीम पर हमला करने में लगे हैं। अभी से अनशन पर बहस चला रहें है कि इसका इस्तेमाल कैसे और कौन कर सकता है। मेरी माने तो संसद में लोकपाल बिल पर कानून लायें या न लायें जल्दी से एक अनशन कानून तो बना ही डालें। ताकी लोकतंत्र में इस हथियार का प्रयोग भविष्य में कोई न कर सके। खास कर सरकार के खिलाफ तो बिल्कुल भी नहीं। जिसे इस हथियार का प्रयोग करना है वह पहले संबन्धित सरकार से अनुमति प्राप्त कर लें अन्यथा इसे लोकतंत्र के खिलाफ और संसद की अवमान्यना मानते हुए उन लोगों पर देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जायेगा। रवाअअआ वोअ कहावत सुनलेअअ हैय कि नाहीं ‘‘सांप भी मर जाय और लाठी भी न भाजनी पड़े।’’

ये हुई मर्दों वाली बात

सन्मार्ग संपादकीय यहां चटका कर देखें।

हम भी अपनी आहुति से सींच देगें



वर्तमान काल की भाषा में सिर्फ सरकारी तानाशाहों को ही पूरी आजादी प्राप्त है देश की बात कहने की। बाकी कोई व्यक्ति अब कुछ भी कहने का अधिकार ही नहीं रखता अन्यथा संसद की मर्यादा भंग हो जायेगी, मानो लग रहा हो कि हम किसी गुप्त आपातकाल के दौर से गुजर रहे हैं। जबकि भारतीय संविधान के तहत ‘‘ जनता के प्रतिनिधि- जनता के द्वारा और जनता के लिए ही खुद को चुने हुए एवं बाकी को अलग मानते हैं।’’


आदरणीय पंकज जी आज के संमार्ग (कोलकाता) में आपका एक लेख प्रकाशित हुआ पढ़कर अच्छा लगा कि अभी भी लोकतंत्र की नींव काफी मजबूत है जहाँ आप जैसे कलमकार जीवित हैं, इसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। एक बार तो संमार्ग के एक संपादकिय लेख को पढ़कर बड़ी निराशा हुई इससे पहले भी सन्मार्ग के कुछ संपादकीय मुर्खता पूर्ण मानसिकता से भरे हुए थे। खैर! छोड़िये इन बातों को। वर्तमान काल की भाषा में सिर्फ सरकारी तानाशाहों को ही पूरी आजादी प्राप्त है देश की बात कहने की। बाकी कोई व्यक्ति अब कुछ भी कहने का अधिकार ही नहीं रखता अन्यथा संसद की मर्यादा भंग हो जायेगी, मानो लग रहा हो कि हम किसी गुप्त आपातकाल के दौर से गुजर रहे हैं। जबकि भारतीय संविधान के तहत ‘‘ जनता के प्रतिनिधि- जनता के द्वारा और जनता के लिए।’’ ही खुद को चुने हुए एवं बाकी को अलग मानते हैं और इसी भाषा का प्रयोग कुछ मीडिया और समाचार पत्र वाले करें तो क्या कहा जा सकता है। इनकी तो रोजी-रोटी का सवाल जुड़ा हुआ है इनसे। भला इनसे पंगा लेकर ये लोग अपना धन्धा कैसे चला पायेगें? सो रोजी रोटी से समझौता करके भला कोई अन्ना हजारे और अरविन्द केजड़ीवाल की इस लड़ाई को क्यों साथ देगा। परन्तु आपकी इस पंक्ति से अपनी बातों को विराम दूंगा -
इन्हें मत रोप देना ये फसल बर्बाद कर देंगे
ये हैं वो बीज भीतर से गले या के सड़े हैं जी।

आपके इस बीज रोपन कार्य को हम भी अपनी आहुति से सींच देगें।


शुभकामनाओं के साथ आपका ही- शम्भु चौधरी
सेवा में
गिरीश पंकज, संपादक सदभावना दर्पण
इमेलः girishpankaj1@gmail.com

शनिवार, 2 जुलाई 2011

धन्य हो गया बिहार - शम्भु चौधरी




आज इस बात को लिखने में मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है कि हमें नीतीश कुमार भी इन्ही भ्रष्टाचारियों के बीच से ही मिला है जिसने गर्त में डूबे बिहार का न सिर्फ चन्द सालों में काया ही बदल डाली। अल्पसंख्यकों की रहनुमाई कर बार-बार सत्ता पर काबिज होने वाले सत्ता के दलालों के दरवाजों पर अलीगढ़ी ताले भी लटका डाले। चारों तरफ कुशासन, अपहरण हत्या पर न सिर्फ इन्होंने लगाम लगा दी, राज्य में पूंजी निवेश के भी कई नये विकल्प खोल दिये। मानो बिहार श्री नीतीश जी के शासन व्यवस्था से धन्य हो गया हो।


कल जब श्री अन्ना हजारे एवं उनके सहयोगी सदस्य बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार से मिले तो एक तरफ नीतीश जी ने लोकपाल बिल को प्रभावी तथा व्यापक बनाने की वकालत की तो दूसरी तरफ बिहार में जल्द ही इस तरह का कानून लाने का आश्वासन भी दे डाला। आज इस बात को लिखने में मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है कि हमें नीतीश कुमार भी इन्ही भ्रष्टाचारियों के बीच से ही मिला है जिसने गर्त में डूबे बिहार का न सिर्फ चन्द सालों में काया ही बदल डाली। अल्पसंख्यकों की रहनुमाई कर बार-बार सत्ता पर काबिज होने वाले सत्ता के दलालों के दरवाजों पर अलीगढ़ी ताले भी लटका डाले। चारों तरफ कुशासन, अपहरण हत्या पर न सिर्फ इन्होंने लगाम लगा दी, राज्य में पूंजी निवेश के भी कई नये विकल्प खोल दिये। मानो बिहार श्री नीतीश जी के शासन व्यवस्था से धन्य हो गया हो। अब जब देश में जन लोकपाल बिल पर एक लम्बी लड़ाई लड़ी जा रही है। केन्द्र में भ्रष्टों की सरकार इसे लोकतंत्र पर प्रहार मानती है और कुत्ते की तरह भौंकना आरम्भ कर दिया है कोई इसे संसद पर हमला बता रहा है तो कोई इसे लोकतंत्र पर, कोई समानान्तर सरकार की संज्ञा दे रहा है तो काई सांप्रदायिक ताकतों की साजिश मान लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आयी हुई बहुमत की सरकार को गिराने की षडयंत्र मानती है। सरकार के कुछ भ्रष्टाचार संरक्षक अभियान के मंत्री ऐन-केन प्रकारेण बिल की मूल को ही बिल से निकाल कर देश को गुमराह करने की योजना पर कार्य कर रहें हैं। इन सबके बीच बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने एक अच्छी पहल कर पुनः यह प्रमाणित कर दिया कि देश में अभी भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार का मुद्दा भले ही कांग्रेसियों के गले न उतरे पर बिहार की इस सकारात्मक पहल से देश के अन्य राज्यों को भी काफी बल मिलेगा।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

चुनौती पर चुनौती - शम्भु चौधरी



कांग्रेस के लाचार और ईमानदारी का चौला पहने देश के इतिहास में सबसे भ्रष्टतम प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह मानते है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी है और वे सिर्फ इस मजबूरी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी पार्टी में इस मुद्दे को लेकर उनके विचार कुछ अलग हैं। चोरों का सरदार कहता है कि मैंने माँस नहीं खाया? जो जेलों की सलाख़ों में बन्द हैं सिर्फ उसने ही खाया? किसी को लग रहा है कि अन्ना संसद को चुनौती दे रहें हैं तो किसी को लग रहा कि ये लोकतंत्र को ही चुनौती हैं? अब इनसे कौन बात करे?


पिछले 35 सालों से कांग्रेस पार्टी बंगाल में माकपा की पिछलग्गू पार्टी के रूप में कार्य करती रही। एक समय वाममोर्चा के खिलाफ लड़ाई में ममता दीदी को पार्टी से धक्का देने वाले कांग्रेसी चम्मचे आज प्रायः सभी एक-एक कर ममोता दीदी के चरणों में जाप करना शुरु कर दिये। ज्यों-ज्यों ममता दीदी का प्रभाव बंगाल की राजनीति में सत्ता के करीब आने लगा त्यों-त्यों कांग्रेसी सूर-ताल भी बदलने लगे। जो प्रणब दा एक प्रकार से कहा जाय तो बंगाल में कांग्रेस की राजनीति सफाया के एकमात्र सूत्रधार माने जा सकतें हैं ने कल कोलकाता शहर में गत विधानसभा में हुई जीत का जश्न चुनाव के दो माह गुजर जाने के बाद मनाया। शहर के आस-पास के उपनगरिय ईलाकों से कुल मिलाकर भी पांच हजार लोगों की भीड़ भी नहीं जुटा पाये ये कांग्रसी।
जीत के इस जिस जश्न को मनाने की असली हकदार तृणमूल कांग्रेस की नेत्री सूश्री ममता दीदी ने जबकि इस जश्न को मनाने की जगह अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा की ‘‘काज कोरोंन’’ और हर रोज खुद भी देर रात तक काम कर रही है, सुबह घर से निकलते समय ममता का सीधा संपर्क किसके ऊपर गाज गिरायेगा किसी को पता नहीं। रातों-रात गत 35 सालों से चरमराई हुई व्यवस्था खुद व खुद पटरी पर आने लगी। दूसरी तरफ इनकी सहयोगी कांग्रेस जीत का जश्न मनाने में लगी है। पर अचानक से चुनाव के दो माह गुजरने के बाद यह इस जश्न की भूमिका पर नजर डालें तो प्रणब दा का पूरा आक्रोश भ्रष्टाचार को लेकर ही रहा। केंद्रीय सरकार के मंत्रीगण मानते हैं कि देश में इस मुद्दे के लेकर जो भी बात करेगा वह ‘‘देश का शत्रु’’ है। वे लोग लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं। केंद्रीय सरकार के मंत्रीगण एक के बाद एक लोकतंत्र की नई व्याख्या देने में जुटे है। प्रणब दा देश की बढ़ती कीमतों पर जो बयान दिये थे वह तो आपको याद होगा ही] नहीं तो आपको पुनः याद दिला देता हूँ - ‘‘देश में लोगों की आमदनी बढ़ गई है इसलिए चीजों के दाम बढ़ गये।’’ अब इनका नया फरमान भी सामने आ गया कि ‘‘अन्ना हजारे तथा बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर वे लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं।’’ वैसे भी लोकतंत्र पर बात करने का अधिकार सिर्फ चुने हुए सांसदों को ही है चूंकि उनको देश को लूटने का सरकारी अधिकार प्राप्त है। ये सड़क छाप अन्ना हजारे बार-बार धमकी देगा तो सरकार यही न समझेगी।
कांग्रेस के लाचार और ईमानदारी का चौला पहने देश के इतिहास में सबसे भ्रष्टतम प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह मानते है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी है और वे सिर्फ इस मजबूरी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी पार्टी में इस मुद्दे को लेकर उनके विचार कुछ अलग हैं। चोरों का सरदार कहता है कि मैंने माँस नहीं खाया? जो जेलों की सलाख़ों में बन्द हैं सिर्फ उसने ही खाया? किसी को लग रहा है कि अन्ना संसद को चुनौती दे रहें हैं तो किसी को लग रहा कि ये लोकतंत्र को ही चुनौती हैं? अब इनसे कौन बात करे? हम उनसे पूछ रहे हैं कि आपका जो ड्राफ्ट है आप उसी के बारे में जनता को बतायें कि आप देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व्यवस्था पर लगाम लगाने के लिए कैसा जन लोकपाल बिल में ला रहे हैं। इस पर तो बोल नहीं रहे। धमकी इस बात की दे रहे हैं कि हमारी काली करतूतों को कोई जगजाहिर करेगें तो अच्छा नहीं होगा। चुनौती पर चुनौती अब एक और चुनौती। साहब! लोकपाल बिल पर बहस कीजिए लोकतंत्र की चिंता छोड़ दीजिए। देश की जनता को साफ करें कि आप जो बिल लाने की बात कर रहे हैं उसमें क्या-क्या है? और उससे किन-किन श्रेणी के लोगों पर अंकुश लगाया जा सकेगा? क्या उन लुटेरों पर भी इसका कोई प्रभाव होगा जो संसद के अन्दर ही देश को लूटने में लगें हैं? इसका संचलान व्यवस्था किन लोगों के हाथ में रहेगी?