शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

तहलका : तमाशा ना बन जाए देश? - शंभु चौधरी

सवाल यह उठता है कि महिला का होना, महिला के साथ होना कहीं अपराध तो नहीं बन गया? कोई भी कभी भी किसी भी दिन, किसी कारण से ही अपने साथ हुए व्यवहार को यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत कर दें और हमारा कानून संबंधित पुरुष का अपराधी मामने लगे तो और यह क्रम इसी प्रकार ही चलता रहा तो जो कानून, संसद ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाये हैं वही कानून देश की पूरी सभ्यता को चौखट पर लाकर खड़ा कर देगा।

कोलकाता- 30 नवम्बर ’2013 इन दिनों महिलाओं के द्वारा कथित यौन उत्पीड़न आरोप में दो घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। जिसमें लगातार एक सप्ताह से सुर्खियों में तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के ऊपर लगाया गया यौन उत्पीड़न मीडिया वालों के लिए टीआरपी बढ़ाने के लिए मानो एक प्रकार से ‘‘यूरिया खाद’’ ही मिल गया हो । दूसरा मामला वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री ए के गांगुली पर एक वर्ष पूर्व की घटना का जिक्र अपने ब्लॉग में लिख कर किया । दोनों ही मामले एक ऐसे वर्ग से जुड़े हैं जहां समाज को सोचने के लिए मजबूर तो करता ही साथ ही यह भी सोचने के लिए बाध्य करता है कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? कहीं हम आधुनिक बनते-बनते महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर इस कदर अपराधी बन जाए कि पूरी दूनिया हमारे पास खड़ी होने से भी भयभीत होने लगे?

सर्वप्रथम में यहां यह लिख देना जरूरी समझता हूँ कि में पीड़ित महिला की भावना के साथ हूँ और महिलाओं की भावना उनकी मान-मर्यादा का सम्मान भी करता हूँ । साथ ही इस बहस में उनकी भागीदारी भी चाहता हूँ जो महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिन्तीत भी हैं।

अभी हाल के दो मामले हमारे सामने हैं-

पहला मामला:-
तहलका संपादक तरुण तेजपाल का ही लें जो हाल की ही घटना पर आधारित है। इस मामले की पीड़ित महिला ने पहले मामले को पत्राचार और तेजपाल से वार्तालापए संस्थान के सहयोगियों के माध्यम से सुलह-सफाई मे कुछ दिन गंवा दिए। सवाल उठता है कि जब तरुण तेजपाल के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला बनता है तो यह सुलह सफाई कहीं अपने कंपनी के बॉस को ब्लैकमेल करने का हिस्सा तो नहीं था? आखिर वह पीड़ित पत्रकार महिला कोई अनपढ़ व तैहाती औरत या लड़की तो नहीं थी कि उसको थाने में जाकर अपनी बात कहने से डर लग रहा था। जो महिला 6 पेज का पत्र लिख कर यह कहती हो कि ‘‘तेजपाल ने जो किया वह दुष्कर्म है । एक ओर जहां तेजपाल अपने धन, ऐश्वर्य, रसूल और विशेष लाभ को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे वहीं उनके लिए यह लड़ाई अपने सम्मान और अपने अधिकार के लिए है कि मेरा शरीर मेरा है और मेरे नियोक्ता का खिलौना नहीं है ।’’ सवाल उठता है कि जो पत्रकार महिला इतनी लंबी-लंबी बातें, बड़ी-बड़ी बातें कर रही है वह घटना के इतने दिन बाद उसको याद आया कि वह अपने सम्मान के लिए लड़ रही है? कौन सा सम्मान बताने का कष्ट करेंगी। फिर ईमेल और एसएमएस का आदान-प्रदान क्यों हुआ? समझौते और माफीनामा किस लिए मांगा और किसके लिए मांगा जा रहा था? तेजपाल की लड़की और सोमा चौधरी और चंद मित्रों को बीच में क्यों डाला और डाला भी गया था तो उसका क्या उद्देश्य था?

इन सब प्रश्नों का जबाब उनको देना ही चाहिए । जब इस पत्रकार महिला ने इतने नाटक कर दिये उसके बाद भी वह खुद गोवा के थानें में या देश के किसी भी थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने क्यों नहीं गई? उसको इस बात का भी जबाब देना चाहिए कि वह तरुण तेजपाल के साथ जो बातें इन दिनों शेयर करने लगी थी और उनसे उत्तेजक बातें पूछने लगी थी वे क्या बातें थी और क्यों करती थी? उसका इन बातों से उसके प्रोफेशन से क्या रिलेशन था? आज उस पीड़ित महिला को अपने शरीर की चिंता है तो क्या इस बात का भी जबाब वे देगी कि तब उसको अपने कद और अपने उम्र का ध्यान क्यों नहीं आया था? तब उसका सम्मान किधर घास चढने गया था?

दूसरा मामला:-
भी ठीक इससे विपरीत पर कुछ-कुछ मिलता जुलता सा है। जिसमें पीड़ित महिला अधिवक्ता ने एक आपबीती जग से शेयर की । यह आपबीती वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री ए के गांगुली के अधीन एक वर्ष पूर्व प्रशिक्षु अधिवक्ता के तौर पर जब प्रशिक्षण ले रही थी तब की है जो इस महिला ने भी किसी थाने में जाकर आरोप नहीं लगाया, उसने इस रोचक वारदात को अपने ब्लॉक पर ठीक प्रतिभा खेतान की कहानी की तरह एक लेखिका बनकर प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए लगा दिया । मामले की जांच के आदेश आनन-फानन में दे दिए गए । जांच जारी है ।

सवाल यह उठता है कि महिला का होना, महिला के साथ होना कहीं अपराध तो नहीं बन गया? कोई भी कभी भी किसी भी दिन, किसी कारण से ही अपने साथ हुए व्यवहार को यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत कर दें और हमारा कानून संबंधित पुरुष का अपराधी मामने लगे तो और यह क्रम इसी प्रकार ही चलता रहा तो जो कानून, संसद ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाये हैं वही कानून देश की पूरी सभ्यता को चौखट पर लाकर खड़ा कर देगा।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आरुषि हत्याकांड : सीबीआई सफेद का झूठ?

[HIGHLIGHT: सीबीआई ने मीडिया और देश को गुमराह कर गलत तथ्य देश और कानून के सामने रखने में सफल रही है। परन्तु देश का कानून कहता है कि एक निर्दोष को सजा देने से बेहतर है 10 दोषी को सजा ना मिले। सीबीआई ने जिस प्रकार इस मामले में एक रोचक कहानी के आधार पर तलवर दंपति को सजा दिलाने का प्रयास किया है यह फैसला कानून के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज किया जाना है। ]

सीबीआई सफेद झूठ का पुलंदा है। सबूत जुटाने में असमर्थ इस संस्था के पास सबूत नहीं, सिर्फ कहानी बनाकर मामला चलाने का लाइसेंस प्राप्त है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में कहा दिया कि सीबीआई एक असंवैधानिक संस्था है। इस संस्था को हमेशा के लिए बंद कर एक ऐसी संस्था का गठन समय की मांग हो चुकी है जो देश में बढ़ते आधुनिक अपराधों को जांच करने में सफल हो सके। ऐसी संस्था जो ना सिर्फ देश की सुरक्षा पर पैनी नजर रख सके अपने कार्य को अंजाम तक पंहुचाने के लिए किसी राजनेताओं की सिफारिश का उसे मुहंताज ना होना पड़े।

इन दिनों जिस प्रकार सीबीआई का प्रयोग दुरुपयोग बड़े पैमाने में सामने आया है। जिस प्रकार अन्य आतंकी हमलों में इसको वोट बैंक के लिए प्रयोग किया गया। जिस प्रकार अपने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिज्ञों को बदनाम करने या उनके चरित्र को दागदार करने व उनके ऊपर आपराधिक मामले लगाने के आरोप इस संस्था पर लगे हैं इससे इस संस्था की ना सिर्फ इसके साख पर बट्टा लगा है। हमारी देश की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह इस संस्था की करतूतों से लग चुका है। सीबीआई हर जगह ना सिर्फ विफल साबित होती रही है देश का धन बर्बाद करने में इस संस्था को महारत हासिल है एक-एक मामला 25-25 साल चलाना और अपराधियों को कभी बचाना, कभी पकड़ना फिर उसे बचाना इस संस्था का सिर्फ और सिर्फ यही काम हो चुका हैं। सीबीआई के द्वारा जांच होनेवाले आजतक के तमाम मामलों की समीक्षा की जाए तो हमें इस संस्था के परिणाम निराशाजनक लगते हैं। अदालतों को बार-बार इन्हें फटकारना पड़ता है।

आरुषि हत्याकांड में भी इनके क्लोजर रिपोर्ट के बाद तलवार दंपति के निवेदन और अपनी लड़की के लिए न्याय की गुहार लगाते हुए क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया था। जिस पर अदालत ने इसे फटकार लगते हुए क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर ही ठीक से इस मामले की जांच का आदेश दिया था। अदालत के निर्देश के बावजूद जब इनको मामला सुलझाने में सफलता नहीं मिली तो सीबीआई ने न्याय की गुहार लगाने वाले तलवार दंपति को ही अपने जाल में फंसा लिय। बोले अब लगाओ न्याय से गुहार? तुम दोनों को ही फाँसी पर झूला डालते हैं। सीबीआई ने जो तथ्य अदालत के सामने रखें हैं वह सबको चौंका देनेवाला है। इनका निष्कर्ष था ‘‘घटना स्थल पर जो चार लोग थे उनमें से दो की हत्या हो चुकी है इसलिए उस स्थल पर जा दो बचे तलवार दंपति ही इस घटना के अपराधी हैं।’’ कितनी मजेदार कहानी है सीबीआई से कोई पूछे तब इस कहानी को गढ़ने के लिए इतना वक्त क्यों लगा यह तो एक बच्चा भी बता देता तो इनके पास सिर्फ धमकी है। सीबीआई को शाबाशी देने का मन करता हैं कि इसने देश के रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटना को इतनी आसानी से सुलझा दिया।

सवाल यह उठता है कि तब सीबीआई ने कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल आखिर क्यों की थी? इस बात से सीबीआई के ऊपर शक की सूई जाती हैं कि यदि कोई अपराधी ही होगा तो वह सीबीआई के इस क्लोजर रिपोर्ट पर खुश होगा कि वह इनके खिलाफ न्यायालय से न्याय की गुहार लगायेगा? इस मामले में सीबीआई खुद की असर्मथता और अपने दोष को एक निर्दोष परिवार पर मढ़ दिया है।

देश का कानून कहानी और शक के आधार पर किसी को अपराधी नहीं करार दे सकता। सीबीआई इस मामले में सबूत जुटाने और तथ्यों को खोजने में पूर्णतः असफल रही है। इस केस से प्रमाणित होता है, सीबीआई सिर्फ देश का पैसा बर्बाद करती है। सीबीआई ने मीडिया और देश को गुमराह कर गलत तथ्य देश और कानून के सामने रखने में सफल रही है। परन्तु देश का कानून कहता है कि एक निर्दोष को सजा देने से बेहतर है 10 दोषी को सजा ना मिले। सीबीआई ने जिस प्रकार इस मामले में एक रोचक कहानी के आधार पर तलवर दंपति को सजा दिलाने का प्रयास किया है यह फैसला कानून के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज किया जाना है। अब लगाओ न्याय से गुहार?

Date: 25-11-2013 [Free copyright]

शनिवार, 23 नवंबर 2013

व्यंग्यः मोदी ने कांग्रेस पार्टी ज्वा......ईन कर ली?

मुझे मुंगेरी लाल पर बार-बार शक भी हो रहा था पटना में मेरे सौ रु खर्च करवा दिया थे अब तक उसका हिसाब नहीं किया, बोला- "दे दूगां मोदी को आ जाने दो।" जैसे मोदी के आने से ही इसका लोन पास होगा। कांग्रेस इतना लोन बांट रही वह इसको नहीं दिखाई देता। अनाज सस्ता कर दिया। फल-सब्जी भी मुफ्त में खाना चाहता है? अब 20रु रोजाना कमाकर देश को ही खा जाएगा क्या? अब भी मोदी की दलाली करता है नमकहराम। मुझे लगा कि आज काई नया बहाना लेकर आया है मुझसे फिर पैसे ऐंठने का।

मुंगेरीलाल भागता-भागता और हांफता-हांफता मेरे पास आया बोला सुना है क्या?, ‘क्या’ पर इतना जोर दिया की उसके दम फूलने लगे, थोड़ी बहुत जो सांसें वह ले पाता था, वह भी लेने के लाले पड़ गये।
मैंने जल्दी से उसको पास पड़ी पानी की बोतल पीने को दी और उसे पहले बैठने को कहा-
‘‘यार! पहले थोड़ी सांस तो ले लो!’’
मुंगेरी लाल पास पड़ी बेंची पर बैठते हुए कहा हां! हां! ‘‘ यार बड़ी धांसू खबर लाया हूँ’’... फिर पानी की बोतल मुंह में डाली और गट-गट पानी पीने लगा। उसको पानी पीते देख मुझे भी प्यास लग गई।
पर पानी बचने का नाम ही नहीं ले रही थी, उसने एक ही बार में पूरी की पूरी बोतल साफ कर डाली । फिर बोला- ‘‘यार हां! अब आराम मिला मेरी तो पूरी सांस ही चढ़ गई थी। तेरे जैसा यार मिल जाए तो फिर किस बात की चिन्ता मुझे। थोड़ा मुस्कराया और बोला- ‘‘चल चाय पिला’’
मुंगेरी मेरी तरफ तिरछी नजर से बार-बार देखकर मुस्करा रहा था, मानो जैसे कोई ‘मुर्गा’ उसके सामने खड़ा हो।
मैंने उसकी हां में हां मिलाते हुए कहा- ‘‘हाँ! क्यों नहीं चाय तो बनती ही है’’ फिर थोड़ा रूक कर
यार! तू जो खबर लाया था वह तो पहले बता।
जैसे-जैसे मुंगेरी लाल को हवा मिलती गई वह खुद को तरोताजा महसूस करने लगा।
बोला. यार मोदी जी के बारे में एक जोरदार खबर लाया हूँ।
मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था।
पिछले दिनों ही हम दोनों ने मिलकर पटना के गांधी मैदान में मोदीजी का भाषण सुना था।
वह तो गनिमत है कि हमारी जान बच गई, ठीक हमारे सामने एक बम फटा था। इसकी खबर हमको पहले से ही थी कि इधर कोई ‘धमाका’ होने का है। हमने सोचा यह मोदी का धमाका है।
हम ठहरे बिहारी के बिहारी सोचे- हमको क्या लेना-देना धमाके से। हमको तों बस मोदीजी को सुनना है।
हमको तो बस मोदी ही मोदी चारों तरफ दिखाई दे रहे थे । धमाके की आवाज सुनकर भी कोई हिलने को तैयार नहीं था। हम दोनों भी मोदी को सुनने के लिए वहीं डटे रहे। यह सब मैं सोच ही रहा था कि मुंगेरी लाल ने मेरे सपने में खलल पैदा कर दी-
अरे.... जनाब कहां खो गए? चाय आ गई थी। यार !!! जानते हो कांग्रेस पार्टी ने.... बीच में ही उसको टोकते हुए पूछा-
‘‘क्यों क्या हुआ कांग्रेस पार्टी को ?’’ फिर पप्पू ने कोई नई बात तो नहीं बोल दी, जैसे ‘नानसेंस’ , ‘बकवास’
अरे नहीं- इस बार मोदी ने कहा है इससे पूरी कांग्रेस पार्टी बल्ले-बल्ले करने लगी है।
चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ गई है। सभी जगह फटाके फौंड़े जा रहें हैं। कांग्रेस पार्टी में दीवाली मनाई जाने लगी।
मैं भी आश्चर्यचकित सा हो गया? यह सब सुनकर।
आखिर मोदी ने ऐसा क्या रातों-रात तीर मार दिया कि कांग्रेस में हर तरफ खुशियाली छा गई?

आज अचानक से कांग्रेस को खुश होने का कारण मेरी समझ से परे था। कल तक तो ‘‘मोदी पीछा करो अभियान’’ चला रहे थे। खोजी कुत्तों की टीम लगा दी उनके पीछे, पूरा देश एक ही काम में लगा था क्या सी.बी.आई हो क्या नेतागण सबको एक ही आदेश का पालन करना था, ‘‘मोदी को खोजो’’ पर ये जनाब हर जगह मंच पर आते कोई नया धमाका कर के चले जाते। ऐसा तो आजादी के समय भी देखने को नहीं मिला था। गजब का नेता है अभी से सत्ता पक्ष, विपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार बैठी है।

मुंगेरीलाल की तरफ देखते हुए पूछा - "यार बात ठीक से समझाते हो कि सिर्फ पहेली में ही बात करोगे?"
मुंगेरी- बताता हूँ.. बताता हूँ जल्दी भी क्या है? "यार चाय तो पी लेने दो पहले।"
मुझे मुंगेरी लाल पर बार-बार शक भी हो रहा था पटना में मेरे सौ रु खर्च करवा दिया थे अब तक उसका हिसाब नहीं किया, बोला- "दे दूगां मोदी को आ जाने दो।" जैसे मोदी के आने से ही इसका लोन पास होगा। कांग्रेस इतना लोन बांट रही वह इसको नहीं दिखाई देता। अनाज सस्ता कर दिया। फल-सब्जी भी मुफ्त में खाना चाहता है? अब 20रु रोजाना कमाकर देश को ही खा जाएगा क्या? अब भी मोदी की दलाली करता है नमकहराम।
मुझे लगा कि आज काई नया बहाना लेकर आया है मुझसे फिर पैसे ऐंठने का।
मैंने आशंका भरी नजरों से उसकी तरफ देख कर पुछा-
"तु कुछ बतायेगा कि मैं अब यहां से जाऊं?,"
यार! आप तो बस नाराज हो गए-
लो सुन मोदी ने कांग्रेस पार्टी...
हां!...हां!... आगे बोल क्या? ‘‘कांग्रेस पार्टी...’’
‘‘मोदी ने कांग्रेस पार्टी ज्वा.......ईन कर ली है।’’
क्या???? यह सुनकर मैं भौंच्चका रह गया।
अब मोदी भी सांप्रदायिक नहीं रहे? अब देश को फिर से सेक्युलरवादी के हाथ ही सौंप देना होगा? मुझे तो पहले सी लगता था कांग्रेस कुछ ना कुछ चालाकी करेगी फिर सत्ता में आने के लिए लो कर लो बात अब इनसे। अब हिटलर किसको कहेंगे हम? अब मोदी की शादी कराने के लिए कांग्रेस ने जिस महिला को खोजा था उसका क्या होगा? माकपा, भाकपा, सपा, राजद, बसपा, जदयू सब ने मोदी की तारीफ में नये-नये कशीदे गढ़ने शुरू कर दिये। यह तो सरासर गद्दारी है। - शम्भु चौधरी

रविवार, 17 नवंबर 2013

माकपा : खुद के पांव पर खुद की कुल्हाड़ी - शम्भु चौधरी

पुनः 2014 में लोकसभा के चुनाव आने हैं। बंगाल के एक वरिष्ठ नेता श्री गौतम देव का बयान ने सबको चौंका दिया है आपकी बात मानी जाए तो माकपा चाहती है कि भाजपा से लड़ने के लिए माकपा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन होना जरूरी है।। माकपा इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है कहती है कि यदि भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो देश टूट जायेगा? अब इनको कौन समझाये कि देश टूटेगा की नहीं हां! इनकी फ़ज़ीहत जरूर हो जानी है। जो पार्टी खुद के पांव पर ही नहीं खड़ी हो सकती वह जब खुद के पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाये तो कोई इनको कैसे बचायेगा?

मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्टी अर्थात माकपा एक समय में बंगाल में लगातार 25 साल एक छत्र राज किया। स्व. ज्योति बसु के नेतृत्व में इस पार्टी ने कांग्रेस का बंगाल से सफाया कर दिया था। कांग्रेस पार्टी बंगाल में हमेशा से माकपा की ‘बी’ टीम कहलाती रही और माकपा पार्टी केन्द्र में कांग्रेस पार्टी की ‘बी’ बनकर केन्द्र का लुत्फ़ उठाती रही। यह सांप-छुछुंदर का खेल आपस में कई सालों तक चलता रहा। जब बंगाल का चुनाव आता तो माकपा जम कर कांग्रेस पार्टी को गाली देती और अपनी हर असफलता का ठीकरा केन्द्र पर फोड़ती नहीं थकती और जैसे ही केन्द्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस को संसद में बहुमत की जरूरत होती यह मुंह चुरा कर समझौता कर लेती। कभी सामने के दरवाजे से तो कभी पीछे के दरवाजे से।

लेकिन जैसे ही न्यूक्लियर रियेक्टर डील पर संसद में मतदान की बात आई तो माकपा तिलमिला उठी, प्रश्न था अमेरिका को समर्थन देना का जो इनके सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था। साथ ही इनके माकपा महासचिव प्रकाश करात जी चाहते थे कि वे कांग्रेस को ठेंगा दिखा कर खुद के बल पर बंगाल में राजनीति करने में सफल रहेंगें । माकपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पहली बार माकपा के मूलभूत सिद्धांतों से अलग हटकर पुंजीपतियों के साथ मिलना शुरू कर दिये थे। बंगाल में नये उद्योग लगाने के कवायद शुरू कर दी।

सिंगुर में टाटा का नैनो कारखाना लाने की भरसक प्रयास किया गया। जमीन अधिग्रहण की राजनीति ने ममता बनर्जी को जहां राजनैतिक फसल काटने का अवसर दिया वहीं पिछले 30-35 सालों से जुड़े मजदूर संगठन धीरे-धीरे इनसे किनारा लेते गए। स्वभाव से विपरीत का समझौता इन संगठनों को रास नहीं आ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के अच्छे प्रदर्शन के बावजूद बंगाल से माकपा का सफाया हो गया।

माकपा का देश हित किस सिद्धांत पर चलता है इनकी बातों से कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता। मजदूरों के छोटे-छोटे संगठन बनाना और उनके बल पर सत्ता की राजनीति करना इनका प्रमुख और एक मात्र लक्ष्य रहता है। परन्तु जब मजदूरों की हितों के रक्षा की बात आती है तो ये लोग अपनी रोटी सेंकने में लग जाते हैं, परिणाम स्वरूप हजारों मजदूरों का परिवार सड़कों पर भीख मांगने के कगार पर खड़ा हो जाता है। इसके कई उदाहरण आपको बंगाल में देखने को मिल जायेंगे।

लगातार 25 साल से इस दल ने कांग्रेस के साथ मिलकर जनता के साथ आँख मिचौली खेलते रहे। इनका पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व आपस में तलाक हो गया तो दुश्मनी भी बराबरी की करनी थी, सो कांग्रेस पार्टी ने माकपा पार्टी की कट्टर विरोधी तृणमूल नेत्री सूश्री ममता बनर्जी का दामन थाम लिया। माकपा का बंगाल से सिर्फ लोकसभा की सीटों से ही नहीं, विधानसभा की सीटों से भी सफाया हो गया। माकपा का गढ़ देखते ही देखते बालू के टीले की तरह ढह गया । इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी को बड़ी राहत मिली। लोकसभा के चुनाव में उसने भी ममता के सहयोग से कुछ सीट बंगाल में लेने में सफलता प्राप्त कर ली ।

इस बीच तृणमूल पार्टी के द्वारा कांग्रेस से मोह भंग होते ही माकपा को पुनः बंगाल में मौका तलाशने में लग गई। बंगाल में खोई जमीन को पुनः पाने के प्रयास में माकपा चाहती है कि कांग्रेस पार्टी का दामन किसी बहाने ही सही पुनः थाम लिया जाए । अब जब कांग्रेस पार्टी की नैया देश में डूबने के कगार पर खड़ी है तो डूबती नैया पर माकपा खुद को सवार कर बची-खुची भी इज़्ज़त भी समाप्त कर लेना चाहती है।

पुनः 2014 में लोकसभा के चुनाव आने हैं। बंगाल के एक वरिष्ठ नेता श्री गौतम देव का बयान ने सबको चौंका दिया है आपकी बात मानी जाए तो माकपा चाहती है कि भाजपा से लड़ने के लिए माकपा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन होना जरूरी है।। माकपा इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है कहती है कि यदि भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो देश टूट जायेगा? अब इनको कौन समझाये कि देश टूटेगा की नहीं हां! इनकी फ़ज़ीहत जरूर हो जानी है। जो पार्टी खुद के पांव पर ही नहीं खड़ी हो सकती वह जब खुद के पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाये तो कोई इनको कैसे बचायेगा?


शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

यहूदियों के जूल्म का परिणाम था हिटलर - शम्भु चौधरी

जब ये लोग हिटलर के पापों को गिनाते नहीं थकते, तो 1918 से लेकर 1933 तक के खुद के पापों पर पर्दा क्यों डाल रहे हैं जिसमें यहूदियों ने साम्यवाद का सहारा लेकर पूरे जर्मन को समाप्त करने की योजना पर कार्य कर रहे थे। हिटलर कोई जमीन से पैदा नहीं हुआ था? उसको व उसके विचारों को पैदा करने में साम्यवादी ताकतों का जूल्म और जर्मन की जनता पर यहूदियों का अत्याचार काफी हद तक जिम्मेदार रहा है।

जैसे-जैसे देश आगामी लोकसभा के चुनाव की तरफ बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे सत्ताधरी दल अभी से ही विपक्ष की मुद्रा में दिखाई देने लगी है। कोई हिटलरवाद या फासिस्टवाद की तुलना श्री नरेन्द्र मोदी कर रहा है तो कोई अपना संयम खोते जा रहा है। कोई शैतान कहता है तो कोई चायवाला। इससें तो यही लगता है कि सच में मोदी दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो चुके हैं। मजे की बात तो यह है कि जो माकपा खुद फासिस्टवाद की परिचायक रही है जिसके अत्याचारों के परिणाम स्वरूप हिटलर का जन्म हुआ वह भी इस सत्ता के महायुद्ध में एक कदम आगे है।

जिस साम्यवादी ताकतों ने ना सिर्फ जर्मन को बर्वाद कर दिया था जर्मनी को बेरोजगारी के कगार पर भी ला खड़ा कर दिया था। इनके राज्य में अपने विरोधियों को गोली से भून देना या उनको जेलों में डाल देना आम बात थी। इनके जूल्म का इतिहास ना सिर्फ भयावीत करनेवाला था, मानवता को भी शर्मसार करता था जब पूरा जर्मन इन साम्यवादी ताकतों के आतांक से कांपने लगा था। तब हिटलर का उदय हुआ था। इनको यह इतिहास भी साथ-साथ बताना नहीं भूलना चाहिए। यहूदियों के साथ मिलकर नाजी समूदायों पर एकतरफा जूल्म करना इनका इतिहास रहा है।

1918 से लेकर 1933 के बीच के अपने पापों के इतिहास को छुपाकर सिर्फ हिटलर के उस पक्ष को सामने रखना इनकी पुरानी आदत सी रही है। जिस प्रकार इन दिनों सेक्युलरवादी दलों के द्वारा प्रयोजित सांप्रदायिक आतांकवाद को समर्थन देकर देश में आई.एस.आई को फलने-फूलने का माहौल पैदा करने देना और अपने विरोधियों को सांप्रदायीक कहना आम है।

अपने पापों पर पर्दा डालने के लिए कांग्रेस पार्टी, तथा तथाकथित ये सेक्लुलरवादी दल और साम्यवादी ताकतों ने मिलकर देश में मोदी लहर को हिटलर फासिस्टवाद की संज्ञा देने की योजना पर कार्य कर रहें हैं। इसके लिए देश के कुछ विद्वानों को हिटलर का इतिहास भी पढ़ाया जा रहा है ताकि देश में लोकसभा का चुनाव आते-आते मोदी के विरूद्ध एक अच्छा जनमानस तैयार किया जा सके। जब इनको लगा कि देश में सेक्लुलरवाद फसल और काटी नहीं जा सकती तो इन लोंगो ने हिटलरवाद का सहारा लेना शुरू कर दिया ताकि देश की जनता को बताया जा सके कि हिटलरवाद कितना खतरनाक था।

जब ये लोग हिटलर के पापों को गिनाते नहीं थकते, तो 1918 से लेकर 1933 तक के खुद के पापों पर पर्दा क्यों डाल रहे हैं जिसमें यहूदियों ने साम्यवाद का सहारा लेकर पूरे जर्मन को समाप्त करने की योजना पर कार्य कर रहे थे। हिटलर कोई जमीन से पैदा नहीं हुआ था? उसको व उसके विचारों को पैदा करने में साम्यवादी ताकतों का जूल्म और जर्मन की जनता पर यहूदियों का अत्याचार काफी हद तक जिम्मेदार रहा है। देश में साम्यवादी ताकतों का हर वक्त यह प्रयास रहा है कि वे भारत की सत्ता पाने या सत्ता पर ऐण-केण प्रकारेण अपना अधिकर जमाने का प्रयास करे। इनको इसमें अभी तक सफलता नहीं मिलती दिखाई देती तो ये एक मिथ्यक इतिहास का सहारा लेकर जिससे भारत को कोई लेने-देना नहीं को माध्यम बनाकर से देश में कांग्रेस के खिलाफ बनते जनमानस को अपने पक्ष में करने की जी तौड़ कोशिश करने में लगे हैं। कोशिश अच्छी है। परन्तु देश की कीमत पर यह कोशिश क्यों?

जब देश के जवानों का सर कलम कर पाकिस्तानी ले जा रहे थे तब ये लोग कहां गायब हो गये थे ? एक-एक संसाद जो चून कर संसद में गए थे जैसा कि ये लोग अण्णा आंदोलन के समय कहते नहीं थकते थे, देश की जनता इनका चून-चून कर हिसाब चूकता करेगी।


रविवार, 10 नवंबर 2013

मेरे पास 1000टन सोना है - शम्भु चौधरी

यदि इस संपदा से होने वाली आय को पिछले 60 सालों में जमा किया जाता तो आज डालर का मूल्य एक रु के बदले 2 डालर या 5 डालर हो सकता था। आज भी इस प्रयोग को हम अपना सकते हैं। सिर्फ इस प्रयोग से ही देश की अर्थ व्यवस्था में रोजना का परिवर्तन हमें देखने को मिल सकता है। परन्तु हमारी लाचारी यह है कि हमने खनीज संपदा को ना सिर्फ खुद की तिजौरी भरने का माघ्यम बना दिया है, सरकारी खर्चों को पूरा करने व राज्यों को लूटने के काम में लगा दिया है।

मेरे पास 1000टन सोना है जो भारत मां की सेवा में अर्पित करना चाहता हूँ। कल रात जब संत श्री शोभन सरकार के सपने की बात को पढ़ रहा था तभी मुझे लगा कि देश में अपार संपदा भरा हुआ हैं और हम जमीन के तह में खजाने की खोज में लगे हैं।

1. हमारे पास अपार खनीज संपदा है। 2. हमारे पास 9 रत्न सरकारी उद्योग लगे हुए हैं। 3. हमारे पास कृषि योग्य भूमि का अपार भंडार है। 4. हमारे मंदिरों में खजानों का भंडार भरा पड़ा है। 5. हमारे पास 125 करोड़ जनसमूह की अदभूत क्षमता है।

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -1

आज हम भारत की अर्थ व्यवस्था व अन्य विकसित देशों की अर्थ व्यवस्था पर नजर देगें। जो देश विकसित हैं उनके खान-पान, रहन-सहन अलग हो सकते हैं पर रोटी तो रोटी ही होती है। जिसका मूल्य लगभग सभी देशों में एक ही होना चाहिए। रोटी बनाने के तरिके भले ही अलग हो सकते हैं, खाने का तरीका तो एक ही होगा। इसी प्रकार पहनने, नहाने-धोने के सामान व अन्य जरूरी वस्तुएं सिर्फ दवाओं व इलेक्ट्रोनिक समानों की बात छोड़ दें तो हमारे और उनके रोजाना ईस्तमाल की वस्तुएं प्रायः एक जैसी है। उन देशों के क्षेत्रफल और जनसंख्या का अनुपात भी हमारे देश से कम ही है। भारत में जहां क्षे़त्रफल अधिक है और काम करने वालों की संख्या भी अधिक है तो इस देश की मुद्रा इतनी कमजोर कैसे? उन देशों का रूपया इतना मजबूत क्यों यह सवाल उठाना जरूरी हो जाता है। अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत है कि आमदनी या संपत्ति और खर्च या कर्ज जिस तरह हमारे जीवन के तराजू हैं जो हमारे स्वास्थ का दर्शाता ही नहीं वह यह भी बताता है कि उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति कितनी कमजोर या मजबूत है। सिर्फ सोना के संकलन से ही उस व्यक्ति के स्वास्थ का आंकलन नहीं किया जा सकता। उसकी कूल सकल आय या बचत, जमीन-जायदाद/ शिक्षा आदि सभी का आंकलन जरूरी होता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ सोना ही जमा कर ले और उसका हेल्थ खराब रहे व उसे सोना देने से भी अनाज खाने को ना मिले तो उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होते हुए भी उसके किसी काम की नहीं हो सकती और उसके सोने का मूल्य नहीं लगाया जा सकता। भारत में राजा मिडास की एक कहानी काभी प्रचलित रही है। इस कहानी से वर्तमान अर्थशास्त्र को समझाने में हमें मदद मिलेगी।

राजा मिडास की कहानी आपने जरूर पढ़ी होगी। इस कहानी में राजा को एक वरदान मिला था कि वह जिसे छूएगा वह वस्तु सोने की हो जाएगी। परिणाम स्वरूप वह अपनी बच्ची को भी सोने में बदल डाला। कहानी आज के परिदृष्य पर आर्थिक जगत के लालच का दर्शनशास्त्र है। पीने का ग्लास, पानी भी सोने में बदल गया। राजा मिडास को बहुत तेज भूख लग रही थी और सोना खाकर तो कोई पेट नहीं भर सकता था वह!

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -2

भारत की अर्थ व्यवस्था को समझने के लिए हमें कुछ बुनियादी बातों की तरफ भी अपना ध्यान देना होगा। हम अपने घरों में सबसे अच्छा सामान लाना चाहते हैं, खाना चाहते हैं परंतु बनाने और बेचने के नाम पर जब बात अच्छे की आती है तब मुनाफा हमारे सामने खड़ा होकर हमें चोर बना डालती है। जिसका परिणाम. यहीं से हमारी मुद्रा कमजोर होना शुरू कर देती है। किसी समान का निर्माण सस्ता हो गलत नहीं है पर खराब माल बनाकर उसे अच्छा बोलना गलत है। आज चीन दुनिया भर में सस्ते सामान बना कर जो शोहरत और प्रतिष्टा प्राप्त की है वह एक उदाहरण के तौर पर हमें देखना चाहिए। माल बनाने वाला बोलकर बेचता है माल की कोई गारण्टी नहीं है, लेने वाला, बेचने वाला, ट्रेडर, सरकार सब इस बात को जानते हैं कि चाइना का माल किसी भी समय खराब हो सकता है। अच्छी बात है। जो है, स्पष्ट है। एक बच्चे को हमें अभी खुश करना है इसके लिए महत्व उस समय सस्ता या मंहगा का नहीं है बच्चे को मात्र एक खिलौना देकर चुप कराया जा सकता है। इस समय की उपयोगिता उसके सामान पर है ना कि उसके मूल्य या वह कितना चलेगा पर। इसी प्रकार इस उपयोगिता को हम निम्न हिस्से में देखें। 1. पहली उपयोगिता वह होती है जहां वस्तु के मूल्य को न देखते ह्रए कि वह सस्ता है या मंहगा हमें लेना ही पड़ता है। जैसे दवा, पानी, आटा, दाल, चावल। 2. दूसरी उपयोगिता वह है जो हमें झणीक सुख के लिए लेना होता है। जैसे गहने, जवहरात, सुंदर बनने के प्रशाधन आदि...आदि । 3. तीसरी उपयोगिता होती है कि हम भविष्य के लिए कोई सामान लेते या निर्माण करतें हैं। जैसे घर के सामान, पुनः गहने, घर बनाना इत्यादि। इसी प्रकार उपयोगिता की एक लंबी सूची तैयार की जा सकती है।

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -3

हमने पहले भाग में पढ़ा था कि हमारे पास खनिज संपदा का अपार भंडार है। लोहा, कोयला, पानी, अबरख, पथ्थर, बालू, चूना, मारबल, समुद्री तल,तेल के कूएं, लाखों जल क्षेत्र व तालाब इत्यादि । जो हमें हर वक्त धन देते रहते हैं इसके बदले में उनको कोई शुल्क जमा नहीं देना पड़ता है। सरकार सिर्फ इन स्त्रोतों से होने वाले आय को ही सरकारी खजाने में जमा कर दे तो यह कंगाल देश पलकों में धनवान हो सकता है। परन्तु हम इस संपदा को हर तरफ से नोचने, लूटने में लगे हैं। जो उत्पादन इन स्त्रोतों से हो रहा है उसका धन या तो नेताओं की तिजौरी में चला जाता है या विदेशी खातों में जमा हो जाता है। देश के एक-दो नहीं प्रायः तमाम उद्योगपति इस संपदा का लाभ लेने से नहीं चुकते। हर तरफ लूट मची है। सब मिलकर अपनी तिजौरी भरने में लगें हैं। यदि इस संपदा से होने वाली आय को पिछले 60 सालों में जमा किया जाता तो आज डालर का मूल्य एक रु के बदले 2 डालर या 5 डालर हो सकता था। आज भी इस प्रयोग को हम अपना सकते हैं। सिर्फ इस प्रयोग से ही देश की अर्थ व्यवस्था में रोजना का परिवर्तन हमें देखने को मिल सकता है। परन्तु हमारी लाचारी यह है कि हमने खनीज संपदा को ना सिर्फ खुद की तिजौरी भरने का माघ्यम बना दिया है, सरकारी खर्चों को पूरा करने व राज्यों को लूटने के काम में लगा दिया है। बड़े-बड़े सरकारी पद सृजन कर इन क्षेत्रों को उनकी तनख्वाह बांटने में इन स्त्रोंतों का धन बर्वाद होने लगा दिया है। क्रम जारी....

सीबीआई : काम का ना धाम का-सौ मन अनाज का।

सीबीआई का बॉल खुद उछलकर माननीय उच्चतम अदालत के पाले में आ गिरा है। माननीय उच्चतम अदालत ने कई बार सरकार को इसे ठीक करने के निर्देश भी जारी किए थे। आज अवसर है कि इस सफेद हाथी को समाप्त कर नये सिरे से इसके गठन की नई प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए जो सीधे तौर पर न्यायालय क्षेत्र के अधीन हो ना कि सत्तासीन नेताओं के अधिन। यह सफेद हाथी है। गांव में एक कहावत है ‘‘काम का ना धाम का-सौ मन अनाज का।’’

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2013 को अपने एक फैसले में कहा कि ‘‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम 1946 के तहत गठित ‘सीबीआई‘ पुलिस बल नहीं है और ‘सीबीआई‘ इस अधिनियम का न तो एक अवयव है और न ही हिस्सा। इस फैसले में कहा गया है कि जहाँ हम ‘सीबीआई‘ की वैधता बनाए रखने से इनकार करते हैं और घोषित करते हैं कि ‘सीबीआई‘, डीएसपीई अधिनियम 1946 विधान का वैध हिस्सा नहीं है, वहीं हम यह पा रहे हैं कि सीबीआई न तो डीएसपीई अधिनियम का अवयव है और न ही हिस्सा है और इसीलिए डीएसपीई अधिनियम 1946 के तहत गठित ‘सीबीआई‘ को ‘‘पुलिस बल’’ नहीं माना जा सकता। इस प्रकार गुवाहाटी उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सीबीआई गठित करने के गृह मंत्रालय के 1 अप्रैल 1963 के प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

यह निर्णय एक अपील जो सन् 2008 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय में 'नवीन कुमार' के मामले में केश नम्बर 119/2008 जो कि 'बीएसएनएल' के एक कर्मचारी के मामले के आपराधिक मामले की सीबीआई द्वारा जांच किए जाने के विरोध में की गई अपील के संदर्भ में दिया गया है।

करीब छह साल पहले गुवाहाटी उच्च न्यायालय की ही एक सदस्यीय पीठ ने 'नवीन कुमार' की याचिका को खारिज कर दिया था, लेकिन अब न्यायमूर्ति आई.ए.अंसारी और न्यायमूर्ति इंदिरा शाह की खंडपीठ ने गृह मंत्रालय के 1963 के उस संकल्प को ही गैरकानूनी करार दिया है, जिसके तहत सीबीआई के गठन का दावा किया जाता रहा है। अदालत ने दस्तावेज़ों की रोशनी में यह टिप्पणी की कि सीबीआई न तो दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट का अंग है, न ही इसका हिस्सा। इसका गठन न तो संयुक्त कैबिनेट का फैसला था और न ही इसके गठन को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी, जबकि इस तरह की एक केंद्रीय जांच एजेंसी का गठन कानून बनाकर ही होना चाहिए था। अदालत का मंतव्य है, कि चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए सीबीआई न तो पुलिस की तरह व्यवहार कर सकती है, न वह अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर सकती है और न ही उसे किसी की गिरफ्तारी करने का अधिकार है।

सीबीआई पर गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आनन-फानन में एक अपील दायर कर दी । सरकार ने अपील में कहा कि इस फैसले से 10 हजार केस पर इसका असर पड़ेगा। सीबीआई के गठन को असंवैधानिक बताने वाले गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ शनिवार को शाम साढ़े चार बजे सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 6 दिसम्बर को होगी।

हालाँकि दिल्ली की बौखलाई केंद्रीय सरकार के लिए जहाँ पहाड़ ही टूट पड़ा हो । वहीं अदालत में सजा काट रहे लालू यादव व अन्य कई मामले में जेल में बंद सीबीआई के शिकारी अदालत से गुहार लगा दी है कि अब तो हमको भी बहार निकालो भाई इस पिंजड़े से।

मजे की बात यह है कि इस तोते ने कई कमाल भी किये हैं। मसलन 1984 के सिख दंगों की फाइल को पिछले 25 साल से चबा-चबा कर खा गए कोई निर्णय पर नहीं पंहुच पाए। 60 हजार की फौज 10 हजार से अधिक मामले। एक-एक ममला 25 साल, सोचे कितना फायदा होता होगा इस विभाग को। चारा घोटाला की जांच कर रहे इनके पूर्व जाँचकर्ताओं की फाइल ये भी चबा डालते हैं और फिर नई जांच शुरू कर देते हैं। मजा ही मजा है इस विभाग को। सरकार भी खुश ये भी खुश।

भाई ! काम कितना भारी है! और तो और इनके ऊपर देश चलाने की जिम्मेदारी भी तो है। इस यूपीए-2 की सरकार का तो पूरा दामोदार ही सीबीआई के ऊपर ही ठिका हुआ था। तभी तो मुलायम यादव और मायावती दोनों यूपीए-2 सरकार को पानी पी-पीकर गाली देते रहे परन्तु जहां मामला संसद में मतदान का आता, तुरंत पलट जाते। इनको सांप्रदायिकता याद आने लगती या इनको इनकी नानी याद आने लगती थी। अब जब सरकार का कार्यकाल प्रायः लगभग समाप्त के कगार पर है तो इनको सीबीआई ने इनको इनकी ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे दिया। आपको याद ही होगा कि इसी मुलायम के चक्कर में एक बार ममता दीदी भी गच्चा खा चुकी है। जब ममता दीदी से वादा कर रातों-रात मुलायम यादव जीजीजीजीजी ने अपना स्टैंड ही बदल लिया था, ममता दीदी ताकती ही रह गई।

भाई ! हैं न इस तोते का कमाल! सांप्रदायिकता का जादुई चाबूक! क्यों गलत कहा क्या? मजे की बात देखिये कभी इस तोते पर उच्चतम अदालत कड़ी टिप्पणी करती है, तो कभी कोई पर इसके सेहत को कुछ फर्क नहीं पड़ता। संसद में तो यह संस्था राजसत्ता के खेल का हिस्सा बन चुकी हैं।

इस परिपेक्ष को नजर रखें तो माननीय गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सही समय पर छक्का मारा है। केंद्र सरकार चारों खाने चित दिखाई दे रही है। कई तरह की दलील दे रही है, अपने पापों को दलीलों से सही ठहराने का प्रयास में लग गई है। इनको एक बात तो समझ में आनी ही चाहिए कि जब उच्चतम अदालत ने दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ जब आदेश दिया था तो संसद में बैठे सारे दागी सांसद एक साथ चिल्लाने लगे थे कि अदालत को विधायिका के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सबने मिलकर इसे संसद की गरिमा पर हमला करार दिया था। अदालत पर गंभीर आरोप भी जड़ने लगे थे। चोर दरवाजे से दागी अध्यादेश लाने का प्रयास भी किया गया। महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने इस दागी अध्यादेश को हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया तो इन लोगों ने श्री राहुल गांधी का उपयोग कर अपनी इज़्ज़त बचाई।

अब पुनः इनके भाई सब जेल से ही चिल्लाने लगे, हमें छोड़ों । मौका है सबको आजाद करने का। अब इनको सीबीआई की इतनी चिंता कैसे हो गई? जब इनको उच्चतम न्यायालय का निर्णय इतना बुरा लगता है जिसके खिलाफ ये लोग दागी अध्यादेश तक ला सकते हैं तो आज इनको सीबीआई को बचाने के लिए इसी अदालत के पास जाने की क्या जरूरत नजर आ गई? सच तो यह है कि जिस आधार को लेकर गुवाहाटी के माननीय उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय दिया है वह ना सिर्फ तर्क संगत है, सही भी है। इसलिए बौखलाई कांग्रेस की सरकार को उच्चतम अदालत से कोई सफलता मिलेगी ऐसी उम्मीद नहीं लगती मुझे। सीबीआई का बॉल खुद उछलकर माननीय उच्चतम अदालत के पाले में आ गिरा है। माननीय उच्चतम अदालत ने कई बार सरकार को इसे ठीक करने के निर्देश भी जारी किए थे। आज अवसर है कि इस सफेद हाथी को समाप्त कर नये सिरे से इसके गठन की नई प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए जो सीधे तौर पर न्यायालय क्षेत्र के अधीन हो ना कि सत्तासीन नेताओं के अधिन। यह सफेद हाथी है। गांव में एक कहावत है ‘‘काम का ना धाम का-सौ मन अनाज का।’’ जयहिन्द!

बुधवार, 6 नवंबर 2013

व्यंग्यः हाथी-चारों तरफ से सिर्फ खाता ही खाता है।- शम्भु चौधरी

मानो चुनाव आयोग नहीं जनता के मनोरंजन का साधन बन गया है। इसबार तो सभी तालाब को भी मिट्टी से पटवाने की मांग की गई ताकी तलाब में लबालब कमल के फूल जो खिलते जा रहें हैं उन्हें रोका जा सके। चुनाव आयोग को एक काम और करना चाहिए क्रिकेट में छक्का लगाने पर भी प्रतिबंध कर देना चाहिए क्योंकि एंपायर हर छक्के पर दोंनो पंजा उठाकर जनता को इशारा करता है कि वोट कहां डालना है।

आज ही कांग्रेस पार्टी के एक मास्टर जी ने मीडिया जगत की कक्षा ली और उसमें वे सभी बच्चों का समझाने में लगे थे कि उनकी पार्टी हाथी है और मोदी की पार्टी शियार, खैर ! मुझे इनसे क्या लेन-देना वह शियार हो या खरगोश । इसके पहले कुछ दिन ही पूर्व इनके विद्धान प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि उनकी पार्टी कछुए की चाल से चल रही है जो अंत में सफलता प्राप्त कर लेगी।

भाई ! इनको इतिहास का इतना ज्ञान हो गया कि ये लोग हिटलर के इतिहास को पढ़-पढ़कर कभी खरगोश निकालते हैं तो कभी शियार अब इतिहास का इनको कितना पता है यह तो मैं नहीं जानता हाँ! आदमखोर हिटलर का नाम वे सुने होंगे हम भी आदमखोर हाथी को जानते हैं जो दिल्ली में बैठकर पूरे देश में आतांक पैदा कर रहा है। इसके पहले इनके इतिहास से चींटी निकली थी । आम आदमी पार्टी को इनके ही एक नेता ने चींटी कहा था जो अब दिल्ली के विधानसभा चुनाव में इनके नाक में दम कर दिया है और बैचारी शीला जी छटपट-छटपट कर रही है पानी भी नहीं पी पा रही । वैसे भी दिल्ली में पानी की किल्लत है।

आपने एक मुहावरा पढ़ा होगा - ‘‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’’ इसका मतलब मुझे अभी तक नहीं समझ में आया, आज जब इनके एक नेता ने समझाया तो इसका अर्थ समझा। अर्थ समझते ही खुद का ही सर खुजलाने लगा तो पता चला कि हाँ! ये लोग ठीक ही तो कह रहें हैं कि ये लोग हाथी ही हैं अब देखिये ने इनकी पार्टी ने पिछले 10 सालों में इतना लूटा कि लालू यादव बेचारे जाने को तो जेल चले गए, पर कांग्रसियों को देश लूटने का नूख्सा सिखा गए।

एक कहावत और देखिये- ‘‘हाथी जिंदा लाख का मरे तो सवा लाख का’’ आपको याद नहीं हो तो इतिहास की किताब खोलकर हिटलर का इतिहास पढ़ लिजिएगा । पिछले उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग ने सारे हाथीयों को तिरपाल से बंधवा दिए थे ।

अब चुनाव आयोग को कौन समझाए कि भाई जहां दिमाग खर्च करना है वहां तो खर्च करते नहीं, जहां नहीं खर्च करना है वहीं दिमाग लगाते हो । मानो चुनाव आयोग नहीं जनता के मनोरंजन का साधन बन गया है। इसबार तो सभी तालाब को भी मिट्टी से पटवाने की मांग की गई ताकी तलाब में लबालब कमल के फूल जो खिलते जा रहें हैं उन्हें रोका जा सके। चुनाव आयोग को एक काम और करना चाहिए क्रिकेट में छक्का लगाने पर भी प्रतिबंध कर देना चाहिए क्योंकि एंपायर हर छक्के पर दोंनो पंजा उठाकर जनता को इशारा करता है कि वोट कहां डालना है, और जिस राज्य में चुनाव की घोषणा हो जाए वहां सभी को हाथ मिलाने पर भी प्रतिबंध लगा देना चाहिए। मुझे हाथ और हाथी से याद आया कांग्रेस पार्टी को इससे मिलते जूलते सभी जूमले और शब्दों का कॉपीराइट करवा लेना चाहिए ताकी इसके नाजायज प्रयोग पर भी प्रतिबंध लगाया जा सके, कम से कम सभी भाजपाईयों के हाथ तो कटवा ही देने चाहिए कारण की ये लोग इस पंजे का प्रयोग गलत काम के लिए भी कर सकतें हैं मसलन शोचालय जाने के वक्त या भाषण देते वक्त। ये जनता तो बैचारी इतनी भोली है कि ये क्या जाने की ये पंजा खूनी है कि पाक..-साफ?

अरे मैं सफेद हाथी की बात बताना भूल गया। ये कहावात ने तो मुझे हिला ही दिया। अब जब ये हाथी मर जायेगा तो सवा लाख का कैसे हो जायेगा यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी तभी पास बैठा एक बूढ़े आदमी ने मुझे समझाया कि हाथी का सिर्फ दांत ही नहीं उसकी लीद भी गांव वाले खरीदकर ले जाते हैं। सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस हाथी ने इतना क्या खा लिया कि गांव वाले इसकी लीद भी खरीदकर ले जायेंगे।

हां! लीद से ध्यान आया कि एक कहावत और भी है शायद कांग्रसियों ने इसे हिटलर के इतिहास में नहीं पढ़ा होगा वह है कि ‘‘हाथी चले बजार-कुत्ता भूँके हजार‘‘ भाई ठीक ही पढ़ा है आपने इतिहास को आने वाले चुनाव में आप हाथी हो कि कुत्ता यह तो देश की जनता ही आपको बताएगी। पर एक बात बात-बात में याद आ गई कि सफ़ेद हाथी एक मुहावरा है जिसका अर्थ होता है कि जो दिखने में सफेद दिखता है वह किसी काम का नहीं।

अब यह तो इनको ही तय करना है कि ये लोग कौन सा हाथी है। लाल, काला, पीला या सफेद?

इसी बात से एक कहानी भी याद आ गई- जो बचपन में सभी ने पढ़ी ही होगी।
एक गाँव में चार अंधे रहते थे। उन्होंने गाँव में हाथी आने की खबर सुनी। वे रास्ता पूछते-पूछते हाथी के पास पहुँचे। महावत से बोले, ‘‘भैया, जरा हाथी को कब्जे में रखना, हम उसे टटोलकर देखेंगे।’’
महावत ने सोचा.इसमें मेरा क्या बिगड़ता है, इन अंधे गरीबों का मन रह जाएगा। बोलाए ‘‘खुशी से देखो।’’
अंधे हर चीज को हाथ से टटोलकर ही देखते हैं। एक ने अपना हाथ बढ़ाया तो हाथी के कान पर पड़ा। बोला, ‘‘हाथी तो सूप की तरह होता है।’’
दूसरे का हाथ उस हाथी के पाँव पर पडा। बोला, ‘‘नहीं, हाथी खंभे सा होता है।’’
तीसरे के हाथ के सामने सूँड़ आई। उसने कहा- ‘‘नहीं-नहीं, वह तो मोटे रस्से जैसा होता है।’’
चौथे का हाथ हाथी के पेट पर पड़ा। वह कहने लगा- ‘‘आप सब गलत कहते हो, हाथी तो एकदम मशक सा होता है।’’
चारों अपनी-अपनी बात पर अड़ गए और लगे लड़ने-झगड़ने। हर एक अपनी ही हांकता, दूसरे की नहीं सुनता था।
एक जयराम रमेश जैसे समझदार आदमी पास खड़ा-खड़ा इनकी सब हरकतें देख रहा था। उसने अपने मन में लड़ाई का बड़ा अच्छा नतीजा निकाला कि दरअसल हाथी नहीं ये एक विचित्र जानवर है जो चारों तरफ से सिर्फ खाता ही खाता है।

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