बुधवार, 9 जुलाई 2008

अलग पहचान

इस शहर में कवि और साहित्यकारों की भरमार है,
ये सभी लावारिस इंसान है।
खो गई इनकी कलम भी भीड़ में,
न कोई अलग पहचान है।

हर कोई अब खोजता हर एक को,
जैसे दफ़ना दिया गया हो कोई शहर,
कब्र में ये कैसी आहट हो रही,
हर कोई मुर्दा यहाँ इंसान है।

दस्तकें मत दो....!! इन बन्द दरवाजों को,
हर कोई भीतर यमराज है,
तुम्हें भय हो न हो मौत का,
भय मौत को, तुमसे अब हो चला।

खो न जायें हम कहिं, खुद में ही;
'कलम' की भी खुद की पहचान है,
वक्त मिल जाये लिखने के बाद दोस्तों!
तो देख लेना, उसमें भी थोड़ी सांस है।

रोज पैदा हो रहे हैं हम मशरूम की तरह
कोई भीड़ चीर निकलता नहीं,
हर कोई बस एक ही ढर्रे पर जमे
मंच को कोई बदलता नहीं।

इस शहर में कवि और साहित्यकारों की भरमार है,
ये सभी लावारिस इंसान है।
खो गई इनकी कलम भी भीड़ में,
न कोई अलग कोई पहचान है।

1 विचार मंच:

हिन्दी लिखने के लिये नीचे दिये बॉक्स का प्रयोग करें - ई-हिन्दी साहित्य सभा

Mired Mirage ने कहा…

बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती

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