शनिवार, 28 दिसंबर 2013

केजरीवाल का ऐतिहासिक भाषण -शम्भु चौधरी



अब यह सरकार सिर्फ 7 मंत्री नहीं चलायेगें, सरकार कुछ अफ़सर नहीं चलायेगें, सरकार कुछ पुलिसवाले नहीं चलायेंगें। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करगें दिल्ली के अंदर हम डेढ़ करोड़ लोग मिलकर सरकार बनायेगें। डेढ़ करोड़ मिलकर सरकार चलायेगें। - अरविंद 

मेरी एक कविता है-
वोटों की ताकत को जानो, अपनी ताकत  को  पहचानो,
   घर-घर अलख जगा दो आज, भ्रष्टाचार मिटा दो आज। 




























अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के रामलीला मैदान के ऐतिहासिक मंच पर


श्री अरविंद केजरीवाल ने आज दिल्ली के रामलीला मैदान के ऐतिहासिक मंच पर अपने 6 विधायकों के साथ मुख्यमंत्री पद व गोपनीयता की शपथ लेकर देश के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। लोकतंत्र इस रामलीला मैदान से मानो हुंकार भर यह कह रहा हो- ‘‘मुझे मजाक से भी हल्का मत लेना’’

लाखों लोगों के जन सैलाब, लबालब भरा रामलीला मैदान को देशभर की जनता अपनी आंखों से देख रही थी । भारत के इतिहास में सैलाब वह भी एक साधारण सामाजिक जीवन से राजनीति में आने वाले एक आम आदमी के उस क्षण का है जो हमेशा से ही अपना नया रास्ता बनाता रहा है। मध्यम श्रेणी के परिवार में जन्मे श्री अरविंद केजरीवाल ने अपने चंद साथियों के साथ सफलता के उस शिखर पर कदम रखने के लिए अपना पहला कदम बढ़ा दिया हो।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जिस ऐतिहासिक जीत की कल्पना किसी ने भी नहीं की थी, आम आदमी पार्टी ने उन तमाम राजनैतिक आंकड़ों को उथल-पुथल कर रख दिया। लोकतंत्र क्या होता है यह देश की जनता को बता दिया। भले ही इसका रूप हमें आज बहुत छोटा नजर आता हो पर कहावत है- ‘‘ देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’’ जो राजनीति पार्टियाँ अपने अहंकार में मस्त-मस्त हो चल रही है अथवा जो राजनेता इस बात के घमंड में चूर है कि वे सत्ता की ताकत से इस आम आदमी को मिटा देने का जज्बा रखते हैं उनके एक लिए अरविंद केजरीवाल एक सबक है।

दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से श्री अरविंद केजरीवाल अपनी टीम के साथ शपथ लेने के तुरंत बाद जो भाषण दिया उस भाषण के प्रमुख अंश जो इस प्रकार है। -

अभी हमने मुख्यमंत्री और मेरे साथियों ने मंत्री पद की शपथ ली है। यह सारी लड़ाई जो हमलोगों ने लड़ी थी, यह सारी कबायत जो हमलोगों ने की थी, यह कबायत हमलोगों ने अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नहीं की थी। यह सत्ता के किले तोड़कर सत्ता जनता के हाथ में देने के लिए की थी।

 दोस्तों!! आज आम आदमी की जीत हुई है। दिल्ली के लोगों ने इस बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में एक बहुत बड़ा काम कर के दिखाया है। अभी तक हमलोग, इस देश के लोग बिल्कुल निराश हो चुके थे, हमें लगता था इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह देश तो बिल्कुल गर्त में जा रहा है। इस देश की राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया था, लेकिन इसबार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में दिल्ली के लोगों ने दिखा दिया कि ईमानदारी से भी राजनीति की जा सकती है। ईमानदारी से चुनाव लड़ें जा सकतें हैं, और ईमानदारी से चुनाव जीते जा सकते हैं।

दोस्तों!  इसके लिये मैं आप सब लोगों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। दिल्ली के लोगों को बधाई देता हूँ। यह एक बहुत बड़ी जीत है, दिल्ली के लोगों की जीत है। मैं परमपिता परमेश्वर, ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरु उनको मैं धन्यवाद देना चाहुँगा। जो यह जीत हुई है, यह वाकई यह कुदरती करिश्मा लगता है। नहीं तो आज से दो साल पहले हमलोग यह सोच भी नहीं सकते थे। इस देश में ऐसी क्रांति आयेगी कि जो जब हम भ्रष्ट पार्टियों को उखाड़ कर फेंक देगें और असल में जनता का राज स्थापित होगा।

दोस्तों!! यह हमारी वजह से नहीं हुआ। यह जरूर कुछ न कुछ कुदरती करिश्मा है। इसके लिये हम भगवान को धन्यवाद अदा करता हूँ, ईश्वर को धन्यवाद अदा करता हूँ अल्लाह का शुक्रिया अदा करता हूँ।

दोस्तों! अभी तो यह शुरूआत है। अभी तो केवल आम आदमी की सरकार बनी है। असली लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। यह लड़ाई हम लोग नहीं लड़ सकते। अरविंद केजरीवाल अकेले नहीं लड़ सकता। हम 6 लोग 7 लोग मिलकर यह लड़ाई नहीं लड़ सकते। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि अगर दिल्ली के डेढ़ करोड लोग़ एकट्डें हो जायें तो इस देश से दिल्ली से भ्रष्टाचार हम दूर कर सकते हैं। हम मिलकर भ्रष्टाचार दूर कर सकते हैं।

दोस्तों ! हमें यह बिल्कुल गुमान नहीं है, हमें यह बिल्कुल घमंड नहीं है कि सारी समस्याओं का समाधान हमारे पास है। हमारे पास सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। भगवान ने सारी बुद्धी हमें नहीं दी है। हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि आज सरकार बनेगी, कल सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। लेकिन हमें यह पूरा यकिन है कि यदि दिल्ली के डेढ़ करोड़ लोग एकट्डा हो गए तो ऐसी कोई समस्या नहीं कि जिसका समाधान हम नहीं निकाल सकते। हमें अब दिल्ली मिलकर चलानी होगी।

अब यह सरकार सिर्फ 7 मंत्री नहीं चलायेगें, सरकार कुछ अफ़सर नहीं चलायेगें, सरकार कुछ पुलिसवाले नहीं चलायेंगें। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करगें दिल्ली के अंदर हम डेढ़ करोड़ लोग मिलकर सरकार बनायेगें। डेढ़ करोड़ मिलकर सरकार चलायेगें। 

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इनके साथ 6 अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण किया । दिल्ली के उप राज्यपाल श्री नजीब जंग ने इनको पद की गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह एक ऐतिहासिक वह झण था जिसे दिल्ली वासियों ने ना सिर्फ सुना इस घटना को अमर बना दिया है।
 -शम्भु चौधरी 28/12/2013

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

आम आदमी की सरकार -शम्भु चौधरी

कांग्रेसी नेताओं के अहंकार ‘‘हम चुनकर आयें हैं, हमसे बात करना हो तो चुन कर आयें। जनता ने प्रतिनिधित्व करने का दायित्व हमें दिया है। आपलोग एक भीड़ का हिस्सा हो।’’ जैसे शब्दों का चयन करना और उनको देश की जनता को सीधे तौर इस बात की चुनौती देना कि राजसत्ता में जनता कि नहीं नेताओं की बात सुनी जाती है। आखिरकार दिल्ली की जनता ने इनके इस अहंकार को नस्तनामूद कर दिया।
श्री प्रमोद शाह की एक कविता है-
इंतजार और नही, और नहीं, और नहीं
गर बदलना है इसे, आज बदलना होगा। 

आम आदमी पार्टी का उदय एक ऐसे समय में हुआ है जब देश की प्रायः सभी राजनैतिक पार्टियों के भीतर अधिकांशतः नेतागण भ्रष्टाचार में लिप्त हो चुके हैं। धीरे-धीरे इनकी जड़ें इतनी मजबूत हो चूंकि है कि ये लोग भ्रष्टाचारियों व दागी नेताओं को सही ठहराये जाने के पक्ष में कई तरह के तर्क देते नहीं थकते। इन सबके बीच दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों ने इन नेताओं की जुबान पर मानो ताला ही जड़ दिया हो। आम आदमी के हित को अनदेखी करने वाले नेता आज मजबूर और बेबस नजर आने लगे हैं। 

भले ही इस बेबसता के बीच आम आदमी को भले ही दिल्ली के चुनाव में आंशिक सफलता ही मिली हो, परन्तु इस सफलता की चर्चा ना सिर्फ देश में, दुनियाभर में हो रही है। दुनिया को केजरीवाल के अंदर ना जाने ऐसा क्या दिख रहा है कि भारत की बदलती राजनीति में उन्हें एक मसीहा के तौर पर देखा जाने लगा है। 

केजरीवाल के अंदर भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत का अंदाजा उस समय लगा जब 2011 में श्री अण्णा हजारे ने केजरीवाल के सहयोग से रामलीला मैदान में ‘‘इंडिया एगेंस्ट कप्शन’’  के बैनर तले अनशन किया गया था। उस ऐतिहासिक घटना को दुनियाभर के लोगों ने देखा था। 

कांग्रेसी नेताओं के अहंकार ‘‘हम चुनकर आयें हैं, हमसे बात करना हो तो चुन कर आयें। जनता ने प्रतिनिधित्व करने का दायित्व हमें दिया है। आपलोग एक भीड़ का हिस्सा हो।’’ जैसे शब्दों का चयन करना और उनको देश की जनता को सीधे तौर इस बात की चुनौती देना कि राजसत्ता में जनता कि नहीं नेताओं की बात सुनी जाती है। आखिरकार दिल्ली की जनता ने इनके इस अहंकार को नस्तनामूद कर दिया।

उस समय देश की आम जनता को लगा कि भ्रष्ट व्यवस्था बदलने के लिए सत्ता में अच्छे और इमानदार लोगों को सामने आना ही होगा। अण्णा आंदोलन के समय देशभर की यही भावना थी कि अच्छे लोगों को राजनीति में आना ही होगा। जिसकी कमान संभाली श्री अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, संजय सिंह व गोपाल राय ने। तमाम राजनीति विपरीत परिस्थितियों व सहयोगी के अड़ियल रूख के बावजूद इन लोगों ने हार नहीं मानी। 
राजनीति का क, ख, ग भी नहीं जानने वाले साथियों के साथ मिलकर एक विचारधारा ‘‘पूर्ण स्वराज्य’’ के सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ाने का दृढ़ संकल्प ले इन नन्हे सेनानियों की टोली ने दिल्ली में अपना भाग अजमाने चुनावी मैदान में कूद पड़े। इस बगावत के झंडे को जिसने भी थामा उसे जनता ने सर पै बैठा लिया। 40-40 साल से चुने जानेवाले कदवार नेता को एक अदने से आम आदमी के सामने मुंह की खानी पड़ी। लोकतंत्र मानो हंस कर कह रहा था ‘‘मुझे मजाक से भी हल्का मत लेना’’

इन सबके बीच कांग्रेस ने पुनः एक नई चाल चली, इन लोगों ने अण्णाजी को पुनः अनशन कराने और देश की भावना को बांटने की साजिश रची। आनन-फानन में एक लंगड़ा लोकपाल सदन के पटल पर लाया गया। भाजपा के नेता तो इस लंगड़े बिल को पारित करने के लिए इतने उतावले दिखे कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि इसे पारित करने के लिए वक्त ना मिले तो बिना बहस के ही इस बिल को पारित किया जा सकता है। इन दोंनो राजनैतिक पार्टियों के उतावलेपन से साफ हो गया था कि केजरीवाल के बढ़ते कद का इनको पहले से ही आभास हो चुका था। जिसे ये लोग लोकपाल बिल चाहे जैसा ही क्यों न हो पारित कर दिल्ली की जनता का ध्यान बांट देना चाहते थे। ताकि चुनाव में आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्त दी जा सके साथ ही देश में बन रहे नये राजनीति धुर्वीकरण को रोका जा सके।

कहावत है ‘‘जो लोग दूसरों के लिए गड्ढा खोदतें हैं खुद उसमें गिरते हैं’’ देश की राजनीति ने नई करवटें लेनी शुरु कर दी। अण्णा को आंदोलन राळेगांव सिद्धी से शुरु होकर राहुल गांधी तक सिमटकर रह गई। 

 जोड़-तोड़ की राजनीति और गठबंधन धर्म की राजनीति ने देश को भीतर ही भीतर दीमक की तरह खोखला बना दिया है। मसरुम की तरह फैलते राजनीति दलों के गठबंधन की खेती सिर्फ धन पैदा करने की फसल बनकर रह गई। लोकतंत्र के चारों खंभे इस लहलहाती खेती को ललचाई आंखों से देखते और हर कोई अपने बाड़े-न्यारे करने में लग गये। बंदरबांट की इस राजनीति के बीच अचानक से एक हल्की सी चिंगारी पैदा कर दी है केजरीवाल ने।

मेरी एक कविता - 
भले ही अंधरे ने बसा लिया हो साम्राज्य दुनिया में सदा,/ बस एक चिंगार भर से ही कांप जायेगा वह सदा।
जागते रहो...जागते रहो....जागते रहो...../ ठक...ठक....ठक...ठक....ठक...ठक....
बस इस शब्दचाप से ही / चोर भाग जाएगा सदा।
-शम्भु चौधरी 
 25/12/2013

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

दिल्ली चुनावः आप ने रचा नया इतिहास-2


भारतीय गणतंत्र की इस खुशबू के साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस चमन में जो फूल खिल रहे हैं उसे कैसे इन गिद्ध दृष्टि से बचाया जा सके। निःश्कोंच मुझे यह बात मानने से कोई परहेज नहीं कि अभी आम आदमी पार्टी में परिपक्वता की काफी कमी देखने को मिली है। हांलाकि उनकी भावना और ईमानदारी पर कोई शक नहीं, परन्तु जिस प्रकार के शब्दों का चयन या प्रयोग पार्टी के कार्यकर्ताओं को करते देखा जा रहा है यह लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकती। कम से कम सभ्य तो नहीं मानी जा सकती। 
देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि कोई राजनैतिक पार्टी सिर्फ इसलिए जनता के पास रायशुमारी के लिए जाती है कि अब चूंकि उनकी पार्टी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला है ऐसे में उनकी पार्टी को सरकार बनाने के लिए दूसरी राजनीति पार्टी अर्थात जिस कांग्रेस के खिलाफ वे चुनाव लड़कर आयें हैं उनके ही समर्थन से सरकार बनानी चाहिए कि नहीं?

भारत के राजनीति इतिहास में कहीं भी ऐसे प्रयोग की चर्चा पढ़ने या सुनने को नहीं मिली है। हाँ! अक्सर इस बात की चर्चा हम जरूर करते हैं कि दो विपरीत विचारधाराओं को संसद और विधान सभाओं में जो चुनाव के पूर्व एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाते थे, एक -दूसरों के खून के प्यासे थे, वे सत्ता के लिए कमरे में बैठकर आपस में गले मिल जनता का गला घोंटते रहें हैं। जनता इनके इन इरादों को कभी भाँप भी ही नहीं पाती थी। लाचार जनता किंकर्तव्यविमूढ खुद को ठगी सी महसूस करती अगले चुनाव का इंतजार करती नजर आती। जिस अंगूलियों से उन्होंने वोट दिया था उन अंगूलियों को दाँत के तले दबाने के अलावा जनता के पास कुछ भी नहीं बचता था।

देश में कई राजनीति दल तो सिर्फ इस काम के लिए ही बने हैं जो सिर्फ खरीद फरोख्त के कार्य को ही अपना राजनीति धर्म मानती रही हैं । ऐसे राजनीति दलों की इस वातावरण में चाँदी ही चाँदी हो जाती थी। यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच भी है तो मजाक भी है। गठबंधन की सरकार चलाना या सरकार बनाने के लिए गठबंधन बनाना सिवा एक राजनैतिक समझौता है। जिसने देश को लूटने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है।

भारत की जनता को यह भी सोचना जरूरी हो गया कि देश में गठबंधन राजनीति का जो दौर शुरु हुआ है यह देश के कितने हित में है? कांग्रेस पार्टी के वर्तमान अनुभव की ही बात को लें तो यूपीए-2 का गठबंधन पूरी तरह से भ्रष्टाचार के बलि चढ़ चुका है। जिन-जिन राजनैतिक पार्टियों ने कांग्रेस से गठबंधन किया उन लोगों ने जमकर देश को लूटने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी। कुछ ईमानदार लोग राजनीति करने की चेष्टा की तो उनको बीच में ही इस गठबंधन से बाहर जाना पड़ा। एक गये तो दो नये आ गये। कुल मिलाकर गठबंधन की राजनीति, सत्ता का संरक्षण और देश को लूटने का लाइसेंस बन चुका है। इस राजनीति में आतंकवादी तक भी संरक्षण प्राप्त कर सकता है।

इन सबके बीच भारतीय लोकतंत्र में एक ठंडी हवा का हल्का सा झोंका ही सही देश की जनता ने दिल्ली के चुनाव में महसूस किया है। शायद मेरे मित्र मेरी इस बात से भी सहमत होंगे कि भले ही हमारी अपनी अलग-अलग विचारधारा रही हो पर इस बार दिल्ली के चुनाव में सिर्फ दिल्ली की जनता की ही भागीदारी हमें नहीं दिखी बल्की लगभग पूरी देश की निगाहें इस चुनाव पर ही टिकी थी, दिल्ली की जनता के साथ-साथ देश की जनता ने भी ‘आप पार्टी’ की रायशुमारी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है। जो कभी देखने को नहीं मिला था।

भारतीय गणतंत्र की इस खुशबू के साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस चमन में जो फूल खिल रहे हैं उसे कैसे इन गिद्ध दृष्टि से बचाया जा सके। निःश्कोंच मुझे यह बात मानने से कोई परहेज नहीं कि अभी आम आदमी पार्टी में परिपक्वता की काफी कमी देखने को मिली है। हांलाकि उनकी भावना और ईमानदारी पर कोई शक नहीं, परन्तु जिस प्रकार के शब्दों का चयन या प्रयोग पार्टी के कार्यकर्ताओं को करते देखा जा रहा है यह लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकती। कम से कम सभ्य तो नहीं मानी जा सकती। आम आदमी पार्टी ने जनता का विश्वास प्राप्त करने में जरूर सफलता प्राप्त की है परन्तु इस विश्वास पर खरा उतरने के लिए इनको ना सिर्फ अपनी भाषा को संतुलित करने, साथ ही इनको अब ज़िम्मेदारी पूर्वक बयान देने की भी जरूरत है।

रविवार की रात आम आदमी पार्टी के लिये काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। ‘आप’ एक ऐसे अंतर्विरोध के बाद सरकार बनाने का फैसला लेगी जहां दिल्ली में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभायेगी।  लोकतंत्र में इसे त्रासदी कह लें यह हकीकत। आम आदमी पार्टी को मानना ही होगा कि वह जो सोचती है ये रास्ते उतने आसान नहीं हैं। अपने घोर दुश्मन के सहयोग से सरकार बनाना उससे भी कहीं खतरनाक मार्ग है। जबकि इनको इनमें से एक विकल्प चुनना ही होगा। इसी को लोकतंत्र कहा जा सकता है।

मेरी शुभकानाऐं ‘आप’ के सभी कार्यकर्ताओं के साथ है। इसी शुभकामनाएं के साथ।
शम्भु चौधरी
21-12-2013

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दिल्ली चुनावः आप ने रचा नया इतिहास-1

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

दिल्ली चुनावः 'आप' ने रचा नया इतिहास


राजनीति में कुछ भी हो सकता है। यह बात चार दिन की आम आदमी पार्टी के उस दावे को झूठलाने के लिए सामने खड़ी है जिसमें ‘आप’ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में साफ किया था कि उनकी पार्टी ‘‘ना तो किसी का समर्थन लेगी ना देगी। साथ ही इनका प्रमुख सिद्धांत कि ‘‘हम यहां राजनीति करने नहीं - बल्की इसे बदलने आये हैं।’’ यह बात सही है कि जबसे ‘आप’ ने राजनीति मंच पर अपने पैर फैलने शुरु किये हैं, भारत की राजनीति में कई नये प्रयोग हमें देखने को मिल रहें हैं। जिसे अबतक के राजनीति धुरंधर समझ पाने में ना सिर्फ नकाम रहे हैं। जाने-अनजाने में वे जो भी शतरंजी दाव चलते हैं सब ‘आप’ के रणनीतिकारों के सामने रैंगते और घुटने टैकते नजर आते हैं।

चुनावी सर्वेक्षण और सट्टाबजार
जिसप्रकार राजनीतिक पार्टीयाँ चुनाव के पूर्व और बाद के चुनावी सर्वेक्षणों और सट्टाबजार की राजनीति करती रही है इसबार दिल्ली के विधानसभा में इन्हें मुंह की खानी पड़ी है। यह कोई पहली घटना नहीं है इससे पहले भी कुछ राज्यों में ऐसा हो चुका है। दिल्ली के चुनाव परिणामों को देखकर ऐसा लगने लगा कि ‘आप’ पार्टी की सोच अन्य राजनीतिक पार्टियों की सोच से अलग हटकर है जिसे भांप पाना आसान नहीं है जितना ये लोग सोचतें हैं। मीडियावाले एक-एक राजनीति दलों के पक्ष में धूंआधार प्रचार और उनके पक्ष में आंकड़े प्रस्तुत करने में लगे थे। पहले कौन बाजी मार ले, इस दौड़ में कुछ मीडिया कर्मी को छोड़ दें तो बाकी बचे सबके सब रस्सा-कस्सी के मैदान में जंग लड़ने को तैयार दिखाई दे रहे थे । शब्दों के जाल बूने जा रहे थे। नये-नये अल्फाजों से इतिहास बूनने की तैयार चल रही थी कि दिल्ली के चुनाव परिणामों ने इनकी तुकाबाजी को विराम लगा दिया। इनको यह बात समझने की है कि सट्टा बाजार की तरह अटकलें लगाना व जाति, धार्मिक आंकडों के जोड़-तोड़ कितना सही है? 

भाजपा का मैदान छोड़कर भागना
चार राज्यों के चुनाव परिणाम के पश्चात जिस प्रकार भाजपा ने 4-0 क मशाल जलाकर दौड़ लगाई यह मशाल दिल्ली तक आते-आते ही बूझने लगी। अंततः भाजपा को 3-1 पर ही संतोष करना पड़ा। जोड़-तोड़ के सिद्धांत को राजनीति की सच्चाई माननेवाली भाजपा जो हरकतें चुनाव के पूर्व करने का प्रयास कर, अपनी सरकार बनाने का दावा पेश कर रही थी। चुनाव परिणाम आते-आते शाम तक इनके पांव-हाथ सूजने लगे थे। डा. हर्षबर्धन जी की ज़ुबान लड़खड़ाने लगी। बोले हमारे पक्ष में आंकड़ें नहीं हैं। हम विपक्ष में बैठेगें। राजनीति के माहिर इनके इस बयान से ना सिर्फ अचंभित थे। जानकारों की बात माने तो यह एक प्रकार से इनकी नैतिक राजनैतिक हार ही मानी जाएगी। जिस नैतिकता का ‘भूत’ भाजपा ने दिल्ली में पाला है यह ‘भूत’ भाजपा को अब आजन्म पीछा छोड़ने वाला नहीं। भले ही इनके पक्ष या विपक्ष में भाजपा जो भी तर्क ये दे दें। भाजपा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर ही मैदान छोड़ना चाहिये था जो कि ये लोग नहीं कर सके। यह तो ठीक ‘‘खेल के मैदान में दौड़ लगाने से पहले ही भाग लेना’’ सी बात हुई। भाजपा ये सभी बातें ‘‘फ्लोर आॅफ दी हाउस’’ में बहुमत प्रस्तुत करते वक्त भी कह सकती थी। उप राज्यपाल के निमंत्रण से पहले ही भाजपा का इस प्रकार से पहले ही मैदान में फैल जाना फिर इसे आंकड़ों का खेल बताना, प्रमाणित करता है कि भाजपा को अभी भी राजनीति सीखनी होगी।

कांग्रेस पार्टी का समर्थन
सांप्रदायिकता की राजनीति करनेवाली कांग्रेस दिल्ली में महज 8 सीटों पर आकर किसी प्रकार अपनी लाज बचा पाई। प्रायः सभी सीटों पर तीसरे और चौथे स्थान पर आने वाली पार्टी अपने 8 विधायकों के साथ दिल्ली के राजनीति हलचल आज भी बनी हुई है। जबकि इसके विपरीत 32 सीटों वाली भाजपा दिल्ली के खेल में अपना दम पहले ही तोड़ चुकी हैं। इस बात से यह तो पता चलता है कि दिल्ली विधानसभा में भले ही कांग्रेस का सफाया सा हो चुका है पर राजनीति हासिये पर खड़ी अभी भी डूबते को तिनके का सहारा मिला चुका है। दिल्ली के विधानसभा के गठन में अब कांग्रेस का महत्वपूर्ण रोल को नकारा नहीं जा सकता। भले ही कांग्रेस पार्टी का जो भी चरित्र इतिहास रहा हो। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस समर्थन देने के मामले में हमेशा से सत्ता गिराने या सत्ता के करीब बना रहने की नियत बनी रहती है। जिस चुनाव में जो ‘आप’ कांग्रेस पार्टी को जी भर-भरकर गालियां दी इनके भ्रष्टाचार को उजागर किया, अभी भी लगातार नये-नये विशेषण से कांग्रेस पार्टी को अलंकृत कर रही है फिर भी थेतर की तरह अपने राजनीति एजेंडे कि  ‘‘हम सांप्रदायिक पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिये ‘आप’ को समर्थन दे रहें हैं।’’ अरे भाई! भाजपा तो पहले ही सत्ता से बहार होने का दावा प्रस्तुत कर चुकी है। अब तो केवल ‘आप’ ही बची है जो आपसे समर्थन भी नहीं मांग रही। फिर भी कांग्रेस की ज़ुबान से सांप्रदायिकता शब्द की भाषा निकलना इस बात की तरफ इशारा करता है कि उनको जो आठ सीटें दिल्ली विधानसभा में मिली है उसका जांच परख की जाये तो साफ हो जाता है कि मुसलमानों के वोट बैंक ने कांग्रेस को 8 सीटों में से 6 सीटें प्रदान की है। यदि मुसलमान कांग्रेस का साथ ना देते तो दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस का सुपड़ा साफ हो जाता।                                                                      
शम्भु चौधरी
21-12-2013

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

व्यंग्य: अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त - शम्भु चौधरी

 बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।  कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।   तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। 

वैसे तो मॉर्निंग वॉक के समय हंसी-मजाक को दौर रोजाना चलता ही रहता है, कभी धर्म और राजनीति को लेकर तो कभी महिलाओं से छेड़-छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज, बलात्कार, बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह, स्वास्थ, जीना-मरना आदि आदि।

धीरे-धीरे इन विषयों के वक्ता भी हमारी टीम में जमा हो गए। मुंगेरीलाल रोजना कोई नई बात (समाचार) लाते और व्यायाम के पश्चात शुरु हो जाती बहस की परम्परा। कुछ दिनों से मुंगेरीलाल बिस्तर पर ही पड़े थे लगभग एक सप्ताह हो गया। उनका अन्न-पानी सब छूट सा गया था। वजन भी कम होने लगा था। सबने मिलकर मन बनाया कि क्यों ना आज मुंगेरीलाल के पास ही मिलने को चला जाए। एक ने कुछ नाश्ता के पैकेट खरीद लिये, एक ने दो पैकट दूध ले लिया बोले- ‘‘यार लगा तो काम आ जाएगा नहीं तो घर लेते जाएंगे।’’

घर पंहुते ही एक ने व्यंग्य कसा ‘‘ कैसे हो भाई!! अब तो ‘जल’-‘पानी’ ग्रहण कर लो, लोकपाल बिल पास हो गया है।’’
मानो किसी ने मुंगेरीलाल की दुखती नब्ज को ही छेड़ दिया हो। बोले क्या खाक पास हो गया? अन्ना ने देश के साथ धोखा किया है। सब कुछ पहले से ही तय था यह सब  आप लोगों ने सुना नहीं!! हमलोगों कि तरफ देखते हुए कहने लगे... मेरी तो तबियत खराब चल रही है नहीं तो....

तभी उनको बीच में ही टोकते हुए रामप्रसाद जी बोल पड़े... ‘‘अरे भाई अभी थोड़ा आराम भी कर लो, फिर लिखना जो मन आयें वैसे भी तेरे लिखे को पढ़ते ही कितने लोग हैं? अपने मुंह मियाँ मिठू खुद ही बनते रहो, खुद ही लडू बनाओ और खुद ही खाओ। फिर बात को बदलते हुए ‘‘हम तो बस आपकी सेहत का हाल जानने आ गये, कैसी है अभी आपकी सेहत?’’ पास ही भाभी जी खड़ी थी बोलने लगी - इनको कल ही डाक्टर के पास दिखाने ले गई थी बोले अभी भी थोड़ा बुखार है एक दो दिन में उतर जायेगी। सर्दी-जूकाम लग गई थी।’’

सीताराम जी को पिछले रात की घटना याद थी भाभी जी को बीच में ही रोकते हुए बोल - ‘‘ वह तो लगनी ही थी, अब भला कोई सुबह चार बजे ही इस ठंडी के समय घर से बहार किसी से लड़ने निकल जाए तो सर्दी नहीं लगेगी तो और क्या लगेगी?’’

तभी भाभी ने वैहिचक होते हुए हमारे हाथ से नाश्ते का पैकेट लेते हुए बोली- ‘‘इनसब की क्या जरूरत थी! थोड़ी सकुचाती हुई बोली दूध तो अभी आने ही वाला है...’’ तभी रामप्रसाद ने बात को संभालते हुए बोले ‘‘नहीं भाभीजी हमारे मॉर्निंग वॉकर क्लब का यह नियम ही है कि सुबह किसी से मिलने जाना हो तो वहां भी हमें अपना नाश्ता और चाय पीनी हो तो दूध साथ ही ले जाना होगा। बस आप तो इसमें अपना प्यार मिला कर हमें परोस दिजिए’’

भाभी मुसकराती हुई नाश्ते के पैकेट लेकर भीतर जाते-जाते एक तीर चला गई - हां!! हां!! अभी लाती हूँ थोड़ी इनको भी अक्ल दे देते कि कैसे बात संभाली जाती है’’ और भीतर चली गई।

तभी ने एक ने मुंगेरलाल के हालचाल पूछने के लिये पुनः उसकी दुखती नब्ज को सहलाया ‘‘तो आपने अनाज क्यों छोड़ दिया?’’ हमने तो सुना कि आप भी अन्ना के साथ अनशन में बैठे हो।

अब मुंगेरीलाल का पारा सातवें आसमान को छूने लगा। बोले- ‘‘ अरे यार मेरा अन्ना से कोई लेना-देना नहीं ना ही मेरी इस बीमारी से उनके लोकपाल बिल का कोई संबंध है। हां! एक पत्रकार के हैसियत से मैं उस आदमी की जरूर खबर लूंगा।

‘‘क्यों? क्या कर दिया अन्ना ने बीच में ही रामप्रसाद जी ने उन्हें रोकते हुए पूछ डाला।’’

क्या किया? अब मुंगेरीलाल आपे से बहार हो गया था। उसका पूरा चेहरा लाल तपतपाने लगा। ये लोग सब मिलकर संसद को ड्रामा मंच बना दिये हैं लगता ही नहीं कि कोई देश चला रहा है। सारे बिल ऐसे पास हो रहे हैं कि  जैसे मनमोहन मुद्रा में पूरी संसद सोई हुई हो ... बिल्ली जैसी आंख से टूकूर-टूकूर देखता है बोलता ऐसे है जैसे कोई दैहाती औरत अपने पति के सामने घीघीयाती हो।
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
फिर थोड़ा रुककर सोचते हुए। दिल्ली चुनाव में भाजपा की भी सांस फूलने लगी। इनको लगा कि ये केजरीवाल ने कांग्रेस पार्टी का जो हर्ष दिल्ली में किया कहीं दोनो राजनीति पार्टियों की भी बैंड ना बजा दे?

बस अन्ना के दो दलाल (नाम नहीं लिया) पर इशारा काफी था को इस काम में लगा दिया। उधर अन्ना को इस बात के लिए मना लिया कि वह जनता का ध्यान बंटाने में कांग्रेस की मदद करे और कांग्रेस उनके बिल को संसद में पास कर देगी। बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।

कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।  

तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। कह दिया ने ‘‘अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त‘‘ जब तक कि हमारी बात समाप्त होती चाय-नाश्ता आ गया था।  

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

व्यंग्य: चूहे ने बिल खा लिया... - शम्भु चौधरी

अब मुंगेरीलाल ने मेरा हिसाब लेना शुरू कर दिया - ‘‘ अच्छा ये बताओ ये अन्ना का आंदोलन तुमने क्यों किया था? मुझे रोज उसपर लिखने को क्यों कहता था? भाई! वो तो दो साल पुरानी बात हो गई, इसबार तो हमने कोई आंदोलन-वांदोलन नहीं किया? यह अन्ना कहां से बीच में आगया आज?
मॉर्निंग वॉकर क्लब के हमारे पत्रकार मित्र मुंगेरीलाल ने पता नहीं क्या लिख दिया कि सुबह-सुबह पांच बजे ही मुझे उठाने चले आये। ठंड से सिकुड़ता हुआ रजाई के भीतर से ही उनकी आवाज सुनी...‘‘अरे ओउउउ..सीताराम जी... जल्दी बहार आओ घूमने जाना नहीं क्या?

 मुझे अनायास ही ‘अरे’ कि जगह पता नहीं सिर्फ ‘‘ओअअअ म्हारा सीताराम जी’’ सुनाई देने लगा। मैंने उनको समझाते हुए कहा कि यार सुबह-सुबह तो शुभ-शुभ बोला कर यार....
दूसरी बार उन्होंने फिर जोर से आवाज लगाई.... मैं हड़बड़ी में गरम-गरम रजाई का मोह त्याग कर खिड़की से बहार देखा- चारों तरफ  कुप अंधेरा ही अंधेरा, कुहासा छाया हुआ था मध्यरात्रि सा सन्नाटा चारों तरफ बिखरा हुआ था। स्ट्रीट लाईटें चमक रही थी। कोलकाता में दिसम्बर माह में भी ठंड कम ही रहती है परन्तु हमारा ईलाका शहर से थोड़ा दूर रहने के चलते यहाँ गांव जैसा आनन्द मिलता है।

अपनी आंखें मसलते हुए- बोला यार आता हूँ...आता हूँ....उम्र की इस दहलीज पर भी आकर तुम नहीं सुधरने वाले। सुबह-सुबह क्यों बकवास किये जा रहे हो।

मुंगेरीलाल कहां मेरी बात सुनता वह चिल्लाये ही जा रहा था जल्दी बहार आता है कि आज इस कलम की समाधी तेरे घर के बाहर ही कर दूंगा। मुझे समझ में आ गया जरूर कोई बड़ी घटना रात को हो गई होगी। जल्दी से गुसलखाने में गया, कपड़े बदले सोचता हुआ रात 11 बजे तक के समाचार में तो कोई बड़ी खबर नहीं थी सिवा लोकपाल के और केजरीवाल के। पर केजरीवाल पर तो हमने कल ही बात की थी और रही लोकपाल के यह तो दो साल पुरानी बात है। अन्ना का आंदोलन में भी इस बार कोई खास बात नहीं थी जैसा कि पिछले बार देखने को मिला था। फिर इनको यह क्या सूझी कि तड़के सुबह-सुबह ही हंगामा मचाने लगे।

वैसे तो मॉर्निंग वॉक में जबतक मुंगेरीलाल जी कोई नया धमाका नहीं करते हमें मजा ही नहीं आता। हम सबने मिलकर इनका नाम ही ‘‘मीडिया समाचार’’ रख दिया है।

 घर के बाहर आकर दरवाजा भीतर से बंद किया, चाबी खिड़की के भीतर डालते हुए अंदर आवाज दी... अजी सुनती हो.... ‘‘चाबी भीतर डाल दी है!’’  अंदरे से एक चुभती हुई आवाज निकली- ‘‘ मेरे सर पर मार देते?’’ काम-धाम तो कुछ करना नहीं बस दूसरों को परेशान करना। 

मैंने वह आवाज सुनी-अनसुनी करते हुए मुंगेरीलाल की तरफ रुख किया बोलो तुम्हें क्या हो गया इतनी सुबह?
मुंगेरीलाल और ताव खा गया बोला- ‘‘चल बेटा आज तो तेरी भीतर भी धुलाई होनी है और बहार भी’’
मैंने उसकी तरफ शक की नजर से देखा.. प्रश्नवाचक चिन्ह की मुद्रा में उसको निहारा- ‘‘मैं...मैं...ने??
अच्छा..अ..अ..आ अब मिमियाने भी लगा तुमको सब पता है। तुम्ही हो वो....अभी थोड़ी देर में ही तुमको सब पता चल जायेगा।

मैंने ऊपर की ओर देखा अभी भी सूरज की लालीमा पूरब में नहीं दिखाई दे रही थी.. सेन्ट्रल पार्क का मैनगेट भी अभी तक नहीं खुला होगा। मुंगेरीलाल की तरफ देखते हुए भाई सुबह-सुबह मेरे से क्या गलती हो गई कि तुम इतने गुस्से में दिखाई दे रहे हो?

मुंगेरीलाल कुछ बोलता तभी पीछे से किसी ने आवाज दी.....जयश्री राम.....!! राधे....राधे....!!
हमदोंनो ने पीछे मुड़कर देखा रामप्रसाद जी मफ्लर, चादार ओढ़े चले आ रहें हैं... मैंने मौका देखते ही बात पलटने की चेष्टा की ‘‘क्यों रामप्रसादजी इतनी भी ठंड नहीं है कि आपको इतना ठंडा लग गया’’
रामप्रसादजी भी कहाँ मौका खोनेवाले थे मुझपर पलटवार करते हुए कहा- बस अब सूरज की किरण आकाश में चढ़ने दो सबको गर्मी आ जायेगी। राधे...राधे...

अब मुंगेरीलाल ने मेरा हिसाब लेना शुरू कर दिया - ‘‘ अच्छा ये बताओ ये अन्ना का आंदोलन तुमने क्यों किया था? मुझे रोज उसपर लिखने को क्यों कहता था?

भाई! वो तो दो साल पुरानी बात हो गई, इसबार तो हमने कोई आंदोलन-वांदोलन नहीं किया? यह अन्ना कहां से बीच में आगया आज?

खुद ही देख लो मैंने कहा था अन्ना से सावधान रहना!!! अब लो लोकपाल!! पूरा का पूरा लोकपाल बिल में चला गया.... अन्ना का अनशन..अन्ना का अनशन, सब दिखावा था। शेर को पीछे करने और चूहे को सामने लाने का। मजा लो अब! चूहे ने बिल खा लिया...।

मैं शर्मिंदा था। आज मुंगेरीलाल ने वह बात कह दी जो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मुझे पहली बार लगा कि मुंगेरीलाल को गुस्सा करने का हक बनता है। सुरज निकल चुका था.. लोगों का आना शुरु हो चुका था।
व्यायाम करते-करते मुझे अपनी धर्मपत्नी की भी याद आ गई। उन दिनों किस प्रकार मुझपर अन्ना का भूत सवार था। मैं उसकी एक बात सुनने को तैयार नहीं था। आज मुंगेरीलाल की बात सुनकर मुझे भीतर ही भीतर इतनी आत्मग्लानी हो रही थी कि कुछ बोले भी नहीं बन रहा था।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

गांधी परिवार तक सिमटती कांग्रेस?

जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव धार्मिक तुष्टिकरण के आधार पर नहीं लड़ा जा सकता। पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है।

कोलकाता से शम्भु चौधरी- पिछले माह पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव व इनके परिणामों पर विभिन्न विद्वानों के विश्लेषण से इस बात के संकेत प्राप्त होतें हैं कि कांग्रेस पार्टी में अब कार्यकर्ताओं की जगह नेताओं ने ले ली है। देश के चार राज्यों साम-दाम-दंड-भेद करने के बाद भी इनकी करारी हार ने ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है। यह परिणाम कांग्रेस की नीतियों और इनके बड़बोलेपन नेताओं को भी सबक है।
जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव धार्मिक तुष्टिकरण के आधार पर नहीं लड़ा जा सकता। पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है।

 माहाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, छतिसगढ़, राजस्थान कुछ ऐसे राज्यों की सूची में आ चुके हैं जहाँ कांग्रेस के केन्द्रीय या राज्य के चन्द चापलूस-पदलोलुप नेताओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को सामने रख संगठन को हमेशा से नुकसान पंहुचाते रहे हैं। माहाराष्ट्र में जहाँ शरद पावर ने कांग्रेस से अलग होकर खुद को शक्तिशाली बना लिया तो बंगाल में ममता बनर्जी के कद को नीचा दिखाने व केन्द्र में रहने की मजबूरी ने इस पार्टी की जमीन ही बंगाल से हिला कर रख दी।

 तमिलनाडु में पिछले 45 सालों से, बिहार और उत्तरप्रदेश में पिछले दो दशकों से, बंगाल में पिछले 35 सालों कांग्रेस पार्टी सत्ता से बहार हो चुकी है। पंजाब, कर्नाटक, आंध्रा, राजस्थान, असम, हरियाणा व देश के कुछ छोटे राज्यों में कांग्रेस अपनी स्थिति को किसी प्रकार बचा पाती है इसका कारण यह नहीं कि वहां इस पार्टी कर जनाधार मजबूत है। इसका कारण है कि अभी वहाँ जनता को कोई अच्छा विकल्प नहीं मिल पाया है। जबकि केरल व त्रिपुरा में माकपा का जनाधार कुछ हद तक कांग्रेस को टक्कर देती रही है।

 कांग्रेस पार्टी के जो सोनिया के चापलुस नेतागण अपने ही राज्यों के मझले नेताओं के पर हमेशा से ही कुतरते रहे हैं इन लोगों ने ही सत्ता को अपनी जागीर बनाये रखने के लिए गांधी परिवार के सामने अपने घुटने टैकने का कार्य करते रहें हैं।

मजे कि बात यह है कि कांग्रेस पार्टी में इनके खुद की जमीन को मजबूत बनाने की जगह हवा में महल बनाने के लिए नींव रखी जाती रही है। दिल्ली के गलियारे तक सिमटती कांग्रेस पार्टी आज धीरे-धीरे राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस पार्टी का जनमत पर विश्वास न कर गांधी परिवार तक सिमटता जा रहा है।
 इससे देश के अन्दर छोटी-छोटी ताकतें अपना सर उठाने में सफल रही है। देश का राजनैतिक परिदृश्य भी तेजी से बदलता जा रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम हमें चौंकाने वाले परिणाम से कांग्रेस पार्टी को पुनः सोचने के लिए विवश तो किया है साथ ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को देश में तीसरे विकल्प के रूप में जगह भी प्रदान कर दी है।
इसका विश्लेषण कांग्रेस पार्टी को अंततः करना ही चाहिए कि उनकी पार्टी किस दिशा में जा रही है? राज्य के नेताओं के पर्र कुतरने के बजाय यदि कांग्रेस पार्टी उनके कद को एक अनुशासन के अन्दर महत्व प्रदान करे और सत्ता प्राप्त करने की जल्दबाजी न कर अपने संगठन को महत्व दे तो संभवतः यह दल भारतीय राजनीति में अपनी पहचान पुनः बना पाएगी अन्यथा इसका हर्ष सिमटता चला जाऐगा।

व्यंग्य: हम हार नहीं मानगें? - शम्भु चौधरी



कुछ तो शर्म करो भाई! भाजपा ने दिल्ली में सरकार बना भी लेती या नहीं बनाई तो क्या हुआ? केजरीवाल को दे तो दिया सबने मिलकर अपना समर्थन। अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता से किये वादों को पूरा करे। सिर्फ छह महीने में बिजली-पानी का वादा हम भी देखते हैं कैसे पूरा करेंगें? हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। जबतक केजरीवाल को अपनी जाति में शामिल नहीं कर लेते, हम हार नहीं मानगें।  


भाजपा को अगला चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ना चाहिए। यह बात हमें सुनने में बड़ी ही अटपटी सी लगती हो, पर इस बात में कहीं ना कहीं सच्चाई तो लग ही रही है। आज सुबह मॉर्निंग वॉकर क्लब में कुछ हंसी मजाक की बात चल रही थी तभी मुंगेरीलाल काफी गंभीर हो कर बोलने लगे’ आप लोगों को मजाक की सूझ रही है? इस देश का अब क्या होगा? ऐसे ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा, सरकार बनाने से पहले ही मैदान छोड़ कर पतलीगली से भाग निकली। नैतिकता का यही तकाजा यदि लोकसभा चुनाव के पश्चात दिखा तो सोचे देश का क्या होगा?
पास खड़े सीताराम जी मुंगेरीलाल की बात सुन कर थोड़े चिंतित नजर आने लगे। बीच में ही मुंगेरीलाल को टोकते हुए बोले- ‘‘यार बात तो सोचने की है, अब केजरीवाल को ही देखो समर्थन लेने के नाम पर भी अपनी शर्तें रख रहा है। गजब ही कर दिया बंदे ने’’ मेरे जीवन में तो ऐसा कभी नहीं सुना था। इतनी नैतिकता किस काम की? भले आदमी को थोड़ा तो समझौता करना ही चाहिए। अब ये घमंड ही तो है और इसको क्या कहें ?

अब सुबह का वातावरण धीरे-धीरे राजनीतिमय होने लगा। गोपालजी ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि मुझे तो लगता है इसमें भी कोई राजनीति है? केजरीवाल को सरकार बना लेनी चाहिए। राजनीति पार्टियों को समर्थन लेने की कीमत चुकानी पड़ती है परन्तु केजरीवाल को तो सब कुछ बिना शर्त बिलकुल मुफ्त मिल रहा है। कहावत हैं न ‘‘हल्दी लगे ना फिटकरी रंग चोखो आये’’ अब केजरीवाल को कुछ काम कर के दिखाना चाहिए।
हमारे कुछ मित्र राजनीति बहस होते देख धीरे-धीरे घिसकने लगे। अब हम चार ही बच गये थे सो बात करते-करते चाय की दुकान की तरफ हो लिए। चाय वाले के पास खड़े-खड़े बात ही कर रहे थे कि पास में ही युवकों की एक टोली खड़ी थी पहले तो वे लोग हमारी बातें सुनते रहे, फिर कुछ देर बाद उनमें से एक युवक थोड़ा ताव में आकर बोलने लगा। -
‘‘तो भाई सा’ब ये बीजेपी और कांग्रेस वाले ही मिलकर सरकार क्यों नहीं बना लेते? इनकी हर जगह आपस में मैच फिक्सड है। अब ये लोकपाल बिल को ही ले लिजिये? बीजेपी के वो क्या नाम है..... कुछ याद करते हुए... हां!  जेटली जी सा’ब कहते हैं कि ‘‘संसद में लोकपाल बिल को बिना बहस के ही पास कर दिया जाए’’ भाई!  मैं पूछता हूँ ये दोनों इतने उतावले क्यों दिखने लगे लोकपाल बिल को पास करने के मामले में? सोचना तो पड़ेगा ही दो विपरीत विचारधारा के ध्रुव जब एक दिखें तो दाल में काला तो जरूर है। हो ना हो देश में ग्रहण काल दिख रहा है।
तभी उनमें से एक दूसरा युवक बोलने लगा-
‘‘मुझे तो राहुल गांधी ज्यादा ईमानदार नजर आते हैं। बेचारा जो कुछ भी बोलता है सही बोलता है। दागी बिल में भी राहुल जी को उन लोगों ने वेबजह बकरा बना दिया। जब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने तो तय ही कर लिया था कि दागी अध्यादेश जल्दी से पास हो जाए तो बेचारे को बकरा क्यों बनाया मिलकर?

तभी तीसरा युवक सामने आया- हमें समझाने की लहजे में बोला ‘‘आरटीआई कानून से लेकर कोयला दलाली तक दोनों राजनीति दल सूर में सूर मिलाते नजर आतें हैं। क्यों ने दोनों ही मिलकर दिल्ली में सरकार बना लेते?’’
अब मुंगेरीलाल से रहा नहीं गया। बीच में ही टोकते हुए कहे ये सब तो ठीक है पर केजरीवाल को तो मौका हाथ से गँवाना नहीं चाहिए?
हम तो गंवारू लोग हैं, हमें तो बस यही समझ में आता है कि कैसे भी हो सरकार बना लो बस। जनता का वादा पानी, बिजली से हमें अब क्या लेना-देना वैसे भी केजरीवाल को कौन सा 5 साल सरकार चलानी है। 6 माह के बाद चुनाव करवाना तो होगा ही? अभी तो सरकार बना ही लेनी चाहिए’’ - क्यों कोई गलत बात हो तो बताओ?
मेरे से तब रहा नहीं गया। मैंने उनसे पूछा मेरी एक बात समझ में नहीं आती ये अन्ना को क्या हो गया जो उनको अचानक से ये अनशन की क्या सूझी, मुझे तो इनके अनशन के समय और इनके बयान पर भी शंका नजर आने लगी।

मुंगेरीलाल अब आपे से बहार हो गए- बोले जो भी हो जैसा भी हो बस अब संसद को चलने भी दो यार मिलकर जब दोनों बड़ी पार्टियां काम करती हैं तो इसमें देश का भला ही तो है। आप लोगों को बस बात बनानी आती है। बेबजह हर बात में अंगूली करना आदत सी बन गई है।

देश की दो बड़ी राजनीति पार्टी देश हित में लगातार फैसलों पर फैसला लिये जा रही है। चार साल संसद को जम कर लूटा, देश को मिल बांट कर लूटा। अब चुनाव का समय आया और फैसले लेने में लगी है तो भी इनके ऊपर सवाल पर सवाल किये जा रहे हो!! कुछ तो शर्म करो भाई! भाजपा ने दिल्ली में सरकार बना भी लेती या नहीं बनाई तो क्या हुआ? केजरीवाल को दे तो दिया सबने मिलकर अपना समर्थन। अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता से किये वादों को पूरा करे। सिर्फ छह महीने में बिजली-पानी का वादा हम भी देखते हैं कैसे पूरा करेंगें? हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। जबतक केजरीवाल को अपनी जाति में शामिल नहीं कर लेते, हम हार नहीं मानगें।

रविवार, 15 दिसंबर 2013

Letter to Sonia Gandhi By Aam Adami Party

सोनिया गांधी को अरविंद केजरीवाल ने चिट्ठी में क्या लिखा.
 दिनांकः 14/12/13
श्रीमती सोनिया गांधी जी, 
अध्यक्षा, कांग्रेस पार्टी 
नई दिल्ली
HIGHLIGHT: हम इस राजनीति में सत्ता हासिल करने नहीं आएं हैं। जनता उन समस्याओं का समाधान चाहती हैं।
श्रीमती सोनिया जी,
कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने के लिए कहा है। हमने तो कांग्रेस से समर्थन मांगा नहीं था। आम आदमी पार्टी का जन्म ही बीजेपी और कांग्रेस पार्टियों की भ्रष्ट, आपराधिक और साम्प्रदायिक राजनीति के कारण हुआ। जब देश का आम आदमी भ्रष्टाचार से कराह उठा तो इस देश के आम लोगों ने खुद अपनी पार्टी बनाई और आवाज उठाने का निश्चय किया। ऐसे में आम आदमी पार्टी और बीजेपी जैसी पार्टियों के साथ कैसे हाथ मिला सकती है?
चुंकि आपकी पार्टी ने कहा है कि आप बिना शर्त समर्थन देने के लिए तैयार हैं तो देश की जनता जानना चाहती है कि इसका क्या मतलब है? दिल्ली की जनता के कुछ ज्वलंत मुद्दे हैं जिसकी वजह से दिल्ली की जनता परेशान है। 15 वर्ष के शासनकाल में कांग्रेस की सरकार ने इन मुद्दों का समाधान करने की बजाय कई जगह तो जनता की परेशानियों को और ज्यादा बढ़ा दिया है। सात वर्ष के अपने शासनकाल में भाजपा ने नगर निगम को जमकर लूटा है। ऐसे में यदि अब आप आम आदमी पार्टी की सरकार को बिना शर्त समर्थन देते हैं तो आपका इन मुद्दों पर क्या विचार होगा?
आज देश की राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का एक माध्यम बन गई है। सत्ता हासिल करने के लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। हर पार्टी किसी भी तरह सत्ता हासिल करना चाहती है। लोगों के मुद्दों से किसी को कोई लेना-देना नहीं है। हम इस राजनीति में सत्ता हासिल करने नहीं आएं हैं। हम जनता उन समस्याओं का समाधान चाहती हैं।
ऐसे कुछ मुद्दे मैं इस पत्र के साथ संलग्न कर रहा हूँ। आपसे उम्मीद करता हूँ कि आपकी पार्टी हर मुद्दों पर अपना रुख साफ करेगी। चूंकि हमारी पार्टी की बुनियाद ही सच्चाई और पारदर्शिता पर आधारित है, इसलिए यह पत्र मैं जनता के बीच रख रहा हॅँ। आपका जो भी जबाब आएगा उसे भी हम जनता के बीच रख देंगे और जनता से पूछेंगे कि आपके जबाब के मद्देनजर क्या आम आदमी पार्टी को सरकार बनानी चाहिए? और हां! कृपया हर मुद्दों पर अपना नजरिया स्पष्ट रूप से बतलाइएगा। गोलमोल करके मत कहिएगा। जैसे - ‘‘सैद्धांतिक रूप से हम साथ हैं’’ इत्यादि। आपके जबाब का इंतजार रहेगा।
अरविंद केजरीवाल

रविवार, 8 दिसंबर 2013

आम आदमी पार्टी की सफलता आम आदमी - शम्भु चौधरी

कल तक जो काँग्रेसी और भाजपाई ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को भारत की राजनीति में कोई महत्व तक देने को तैयार नहीं थे आज चुनाव परिणामों को देख कर ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के नीचे की जमीन खिसक गई, भाजपा पार्टी के भी दाँत खट्टे कर दिये। चुनाव परिणाम के दो दिन पूर्व तक जो पार्टी आम आदमी के सदस्यों को तोड़ने की गंदी साजिश करने का प्रयास कर रही थी? आज अचानक से नैतिकता की बात करने लगी। डॉ. हर्षवर्धन कल तक अपनी जीत का दावा करते नहीं थक रहे थे आज उनको विपक्ष में बैठने का ज्ञान जग गया।

दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम में किसी एक राजनीति दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में आप आदमी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन देश की राजनीति में हलचल सी पैदा कर दी है। 125 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के स्टार केंपेनर श्री राहुल गांधी ने इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि दिल्ली में उनकी पार्टी की शीला दीक्षित के अच्छे कार्यों के बावजूद उनकी पार्टी आम आदमी की बात को समझने में भूल की है। उन्होंने अपने नेताओं को भी कड़ा संदेश देते हुए आम आदमी पार्टी के नेताओं से सीख लेने की सलाह तक दे डाली।

कल तक जो काँग्रेसी और भाजपाई ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को भारत की राजनीति में कोई महत्व तक देने को तैयार नहीं थे आज चुनाव परिणामों को देख कर ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के नीचे की जमीन खिसक गई, भाजपा पार्टी के भी दाँत खट्टे कर दिये। चुनाव परिणाम के दो दिन पूर्व तक जो पार्टी आम आदमी के सदस्यों को तोड़ने की गंदी साजिश करने का प्रयास कर रही थी? आज अचानक से नैतिकता की बात करने लगी। डॉ. हर्षवर्धन कल तक अपनी जीत का दावा करते नहीं थक रहे थे आज उनको विपक्ष में बैठने का ज्ञान जग गया।

मुझे याद है जोड़-तोड़ में माहिर भाजपा के नेताओं ने कई बार राज्यपाल व महामहिम राष्ट्रपति जी को इस आधार पर नैतिकता का पाठ पढ़ा चुके हैं कि उनकी पार्टी संसद या विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है। जनता का जनादेश उनके पक्ष में है। अतः सरकार बनाने का पहला अधिकार उनकी पार्टी को ही मिलना चाहिए। आज नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली पार्टी, जोड़-तोड़ की राजनीति में आस्था रखने वाली पार्टी के मुंह से नमाज पढ़ने की बात गले नहीं उतर रही। कहावत तो हम भी पढ़ते हैं और भाजपा भी पढ़ती है। यदि इसी बात को कहावत में कहा जाए तो ‘‘ सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को ’’ इन पर सटीक बैठता है।

दिल्ली के विधानसभा चुनाव परिणाम ने देश की तमाम राजनीतिज्ञों को एक चेतावनी भर दी है कि ‘‘ वे इस बात का अहंकार कि ‘‘वे चुन कर आयें हैं’’ इसलिए वे ही आम आदमी के प्रतिनिधि हैं इसके अलावा वे किसी को भी जनता का प्रतिनिधि नहीं मानते और जिनको उनसे बात करनी हो तो पहले चुनाव लड़कर आयें तब ही वे उनसे बात करे।’’

पहली बात तो यह कि यदि आम आदमी ही चुनकर चले गये तो उनसे बात ही क्यों करेंगें? दूसरी बात कि जब आम आदमी ही चुनकर संसद या विधानसभा में पंहुचगें तो आप खुद ही बहार हो जाएंगे। इसलिए यह अहंकार पालने वाले सांसदों को भी आज सोचने की जरूरत है कि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें।

देश से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं होता और लोकतंत्र में संसद या विधानसभा से बड़ा कोई मंदिर। इस मंदिर के पुजारी यदि वहां बैठकर जनता को लूटने में लग जाए। लोकतंत्र के पवित्र मंदिर को अपवित्र कर दे तब प्रशांत भूषण, अरविन्द केजरीवाल, मनीष सीसोदिश, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, संजय सिंह, शाजिया इल्मी जैसे नेता पैदा होते हैं। इतिहास में इनके नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखें जाऐगें। Date:09/12/2013

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

वाममोर्चा का ‘‘सांप्रदायिक-सेक्युलरवाद’’ - शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी देश में "सेक्युलर-सांप्रदायिकता" की राजनीति शुरु से ही करती रही है परन्तु चूंकि इस बार दिल्ली में कांग्रेस की हालत ना सिर्फ पतली होती जा रही है वाममोर्चा कभी भी यह खतरा नहीं उठाना चाहेंगी कि वह भी कहीं कांग्रेस पार्टी के चक्कर में जनता के आक्रोश का शिकार ना बन जाए। तब बंगाल में उनको सीट कहां से मिलेगी?

जो वाममोर्चा लगातार 35 सालों से बंगाल में एक छत्र राज किया कई बार काँग्रेसी बैशाखी के सहारे लंगड़ाती हुई चली, दिल्ली में कांग्रेस को सहारा देती, तो कभी लतियाती रहती। बंगाल में ठीक चुनाव के समय या यूँ कह लें चुनाव के ठीक एक वर्ष पूर्व से ही वाममोर्चा के नेतागण कांग्रेस पार्टी को पानी पी-पी कर कोसते नजर आते और चुनाव में टिकट बांटते समय फ्रेंडली चुनाव लड़कर दिल्ली में उनकी सरकार बनाने में मदद करते रहें है। जिसमें सिर्फ एक चुनाव में माकपा ने जयप्रकाश आंदोलन के समय जनता पार्टी जिसमें आज की भाजपा (जनसंघ) भी शामिल थी के साथ कई सालों भात-दाल खाया था।

पिछले लोकसभा चुनाव 2009 के ठीक पूर्व भी वाममोर्चा ने इसका प्रयोग जारी रखा पर उस बार यह प्रयोग इनको भारी पड़ गया । कांग्रेस पार्टी ने पलटवार करते हुए बंगाल की शेरनी तृणमूल नेत्री जो लगातार वाममोर्चा के विरूद्ध अपनी आवाज उठाती रही थी का साथ दे दिया। लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा से भी वाममोर्चा के परचे-परचे उखड कर गाड़ी का टायर सड़क पर ही पौं बोल गया।

विधानसभा का चुनाव हो या म्यूनिसिपल व पंचायत का चुनावों में सब जगह वाममोर्चा की लाल तानाशाही ने दम तोड़ दिया। पिछले 35 सालों में बंगाल को कंगाली के हालात में पंहुचा देने वाली माकपा जिसने ना सिर्फ बंगाल को कर्ज में गले तक डुबो दिया। हवड़ा के सरकारी अस्पताल में पिछले 30 सालों तक एक ऐम्बूलेंस तक खरीद कर नहीं दे सकी। सारा का सारा सांसद निधि, विधायक निधि तक को डकार जाती रही वाममोर्चा की सरकार अब एक नया राग अलापने में लगी है। ‘सेक्लुलरवाद’

इनका सेक्युलरवाद क्या है?

बंगाल में तृणमूल की सरकार व इस राजनीति दल के साथ इस वाममोर्चा कभी भी किसी भी हालात में एक साथ खड़ी नहीं हो सकती कारण स्पष्ट है जिस वाममोर्चा को जड़ से उखाड़ने का प्रण ममता बनर्जी ने ले रखा तब उसका क्या होगा? कांग्रेस पार्टी देश में "सेक्युलर-सांप्रदायिकता" की राजनीति शुरु से ही करती रही है परन्तु चूंकि इस बार दिल्ली में कांग्रेस की हालत ना सिर्फ पतली होती जा रही है वाममोर्चा कभी भी यह खतरा नहीं उठाना चाहेंगी कि वह भी कहीं कांग्रेस पार्टी के चक्कर में जनता के आक्रोश का शिकार ना बन जाए। तब बंगाल में उनको सीट कहां से मिलेगी?

वाममोर्चा बंगाल में अपना दम-खम पहले ही समाप्त कर चुका है बंगाल में अब ज्योति बसु और सुभाष चक्रवर्ती सरिके नेता नहीं रहे। रही-सही कसर इन लोगों बंगाल के वरिष्ठ माकपा नेता श्री सोमनाथ चटर्जी को संगठन से अलग कर माकपा महासचिव श्री प्रकाश करात के अहंकार पर मोहर जड़ दी। आज माकपा दिल्ली का ख़्वाब देखने में लगी है। सोचती है सेक्युलरवाद का सहारा ही ले लिया जाए? इसमें बुराई ही क्या है। सब राजनीति दल जब यही कह रहें तो वाममोर्चा भी उनके सूर में सूर मिला दें तो हर्ज ही क्या है।

मैं इनसे ही जानना चाहता हूँ वामपंथी विचारधारा के किस विचारधारा को यह नेतृत्व करती हैं, धर्म आधारित विचारधारा को या कुछ और ? अफसोस की बात है कि इनका बैचारिक दिवालिपन तो बहुत पहले ही निकल चुका था। अब इनका मानसिक दिवालियापन निकलना बाकी है। खैर यह भारत की राजनीति ही है जहां माकपा के नेता समझते हैं कि देश की जनता अनपढ़ है और खुद को विद्वान समझते हैं। इनके ‘‘सांप्रदायिक-सेक्युलरवाद’’ की जनता इस बार के लोकसभा चुनाव में जमकर पिटाई करेगी। लूट-लूट कर देश को जर्जर अवस्था में पंहुचा देने राजनीतिज्ञों के द्वारा अब सेक्युलरवाद का सहारा लेना देश की जनता को खलने लगा है।


शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

तहलका : तमाशा ना बन जाए देश? - शंभु चौधरी

सवाल यह उठता है कि महिला का होना, महिला के साथ होना कहीं अपराध तो नहीं बन गया? कोई भी कभी भी किसी भी दिन, किसी कारण से ही अपने साथ हुए व्यवहार को यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत कर दें और हमारा कानून संबंधित पुरुष का अपराधी मामने लगे तो और यह क्रम इसी प्रकार ही चलता रहा तो जो कानून, संसद ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाये हैं वही कानून देश की पूरी सभ्यता को चौखट पर लाकर खड़ा कर देगा।

कोलकाता- 30 नवम्बर ’2013 इन दिनों महिलाओं के द्वारा कथित यौन उत्पीड़न आरोप में दो घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। जिसमें लगातार एक सप्ताह से सुर्खियों में तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के ऊपर लगाया गया यौन उत्पीड़न मीडिया वालों के लिए टीआरपी बढ़ाने के लिए मानो एक प्रकार से ‘‘यूरिया खाद’’ ही मिल गया हो । दूसरा मामला वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री ए के गांगुली पर एक वर्ष पूर्व की घटना का जिक्र अपने ब्लॉग में लिख कर किया । दोनों ही मामले एक ऐसे वर्ग से जुड़े हैं जहां समाज को सोचने के लिए मजबूर तो करता ही साथ ही यह भी सोचने के लिए बाध्य करता है कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? कहीं हम आधुनिक बनते-बनते महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर इस कदर अपराधी बन जाए कि पूरी दूनिया हमारे पास खड़ी होने से भी भयभीत होने लगे?

सर्वप्रथम में यहां यह लिख देना जरूरी समझता हूँ कि में पीड़ित महिला की भावना के साथ हूँ और महिलाओं की भावना उनकी मान-मर्यादा का सम्मान भी करता हूँ । साथ ही इस बहस में उनकी भागीदारी भी चाहता हूँ जो महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिन्तीत भी हैं।

अभी हाल के दो मामले हमारे सामने हैं-

पहला मामला:-
तहलका संपादक तरुण तेजपाल का ही लें जो हाल की ही घटना पर आधारित है। इस मामले की पीड़ित महिला ने पहले मामले को पत्राचार और तेजपाल से वार्तालापए संस्थान के सहयोगियों के माध्यम से सुलह-सफाई मे कुछ दिन गंवा दिए। सवाल उठता है कि जब तरुण तेजपाल के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला बनता है तो यह सुलह सफाई कहीं अपने कंपनी के बॉस को ब्लैकमेल करने का हिस्सा तो नहीं था? आखिर वह पीड़ित पत्रकार महिला कोई अनपढ़ व तैहाती औरत या लड़की तो नहीं थी कि उसको थाने में जाकर अपनी बात कहने से डर लग रहा था। जो महिला 6 पेज का पत्र लिख कर यह कहती हो कि ‘‘तेजपाल ने जो किया वह दुष्कर्म है । एक ओर जहां तेजपाल अपने धन, ऐश्वर्य, रसूल और विशेष लाभ को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे वहीं उनके लिए यह लड़ाई अपने सम्मान और अपने अधिकार के लिए है कि मेरा शरीर मेरा है और मेरे नियोक्ता का खिलौना नहीं है ।’’ सवाल उठता है कि जो पत्रकार महिला इतनी लंबी-लंबी बातें, बड़ी-बड़ी बातें कर रही है वह घटना के इतने दिन बाद उसको याद आया कि वह अपने सम्मान के लिए लड़ रही है? कौन सा सम्मान बताने का कष्ट करेंगी। फिर ईमेल और एसएमएस का आदान-प्रदान क्यों हुआ? समझौते और माफीनामा किस लिए मांगा और किसके लिए मांगा जा रहा था? तेजपाल की लड़की और सोमा चौधरी और चंद मित्रों को बीच में क्यों डाला और डाला भी गया था तो उसका क्या उद्देश्य था?

इन सब प्रश्नों का जबाब उनको देना ही चाहिए । जब इस पत्रकार महिला ने इतने नाटक कर दिये उसके बाद भी वह खुद गोवा के थानें में या देश के किसी भी थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने क्यों नहीं गई? उसको इस बात का भी जबाब देना चाहिए कि वह तरुण तेजपाल के साथ जो बातें इन दिनों शेयर करने लगी थी और उनसे उत्तेजक बातें पूछने लगी थी वे क्या बातें थी और क्यों करती थी? उसका इन बातों से उसके प्रोफेशन से क्या रिलेशन था? आज उस पीड़ित महिला को अपने शरीर की चिंता है तो क्या इस बात का भी जबाब वे देगी कि तब उसको अपने कद और अपने उम्र का ध्यान क्यों नहीं आया था? तब उसका सम्मान किधर घास चढने गया था?

दूसरा मामला:-
भी ठीक इससे विपरीत पर कुछ-कुछ मिलता जुलता सा है। जिसमें पीड़ित महिला अधिवक्ता ने एक आपबीती जग से शेयर की । यह आपबीती वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री ए के गांगुली के अधीन एक वर्ष पूर्व प्रशिक्षु अधिवक्ता के तौर पर जब प्रशिक्षण ले रही थी तब की है जो इस महिला ने भी किसी थाने में जाकर आरोप नहीं लगाया, उसने इस रोचक वारदात को अपने ब्लॉक पर ठीक प्रतिभा खेतान की कहानी की तरह एक लेखिका बनकर प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए लगा दिया । मामले की जांच के आदेश आनन-फानन में दे दिए गए । जांच जारी है ।

सवाल यह उठता है कि महिला का होना, महिला के साथ होना कहीं अपराध तो नहीं बन गया? कोई भी कभी भी किसी भी दिन, किसी कारण से ही अपने साथ हुए व्यवहार को यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत कर दें और हमारा कानून संबंधित पुरुष का अपराधी मामने लगे तो और यह क्रम इसी प्रकार ही चलता रहा तो जो कानून, संसद ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाये हैं वही कानून देश की पूरी सभ्यता को चौखट पर लाकर खड़ा कर देगा।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आरुषि हत्याकांड : सीबीआई सफेद का झूठ?

[HIGHLIGHT: सीबीआई ने मीडिया और देश को गुमराह कर गलत तथ्य देश और कानून के सामने रखने में सफल रही है। परन्तु देश का कानून कहता है कि एक निर्दोष को सजा देने से बेहतर है 10 दोषी को सजा ना मिले। सीबीआई ने जिस प्रकार इस मामले में एक रोचक कहानी के आधार पर तलवर दंपति को सजा दिलाने का प्रयास किया है यह फैसला कानून के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज किया जाना है। ]

सीबीआई सफेद झूठ का पुलंदा है। सबूत जुटाने में असमर्थ इस संस्था के पास सबूत नहीं, सिर्फ कहानी बनाकर मामला चलाने का लाइसेंस प्राप्त है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में कहा दिया कि सीबीआई एक असंवैधानिक संस्था है। इस संस्था को हमेशा के लिए बंद कर एक ऐसी संस्था का गठन समय की मांग हो चुकी है जो देश में बढ़ते आधुनिक अपराधों को जांच करने में सफल हो सके। ऐसी संस्था जो ना सिर्फ देश की सुरक्षा पर पैनी नजर रख सके अपने कार्य को अंजाम तक पंहुचाने के लिए किसी राजनेताओं की सिफारिश का उसे मुहंताज ना होना पड़े।

इन दिनों जिस प्रकार सीबीआई का प्रयोग दुरुपयोग बड़े पैमाने में सामने आया है। जिस प्रकार अन्य आतंकी हमलों में इसको वोट बैंक के लिए प्रयोग किया गया। जिस प्रकार अपने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिज्ञों को बदनाम करने या उनके चरित्र को दागदार करने व उनके ऊपर आपराधिक मामले लगाने के आरोप इस संस्था पर लगे हैं इससे इस संस्था की ना सिर्फ इसके साख पर बट्टा लगा है। हमारी देश की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह इस संस्था की करतूतों से लग चुका है। सीबीआई हर जगह ना सिर्फ विफल साबित होती रही है देश का धन बर्बाद करने में इस संस्था को महारत हासिल है एक-एक मामला 25-25 साल चलाना और अपराधियों को कभी बचाना, कभी पकड़ना फिर उसे बचाना इस संस्था का सिर्फ और सिर्फ यही काम हो चुका हैं। सीबीआई के द्वारा जांच होनेवाले आजतक के तमाम मामलों की समीक्षा की जाए तो हमें इस संस्था के परिणाम निराशाजनक लगते हैं। अदालतों को बार-बार इन्हें फटकारना पड़ता है।

आरुषि हत्याकांड में भी इनके क्लोजर रिपोर्ट के बाद तलवार दंपति के निवेदन और अपनी लड़की के लिए न्याय की गुहार लगाते हुए क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया था। जिस पर अदालत ने इसे फटकार लगते हुए क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर ही ठीक से इस मामले की जांच का आदेश दिया था। अदालत के निर्देश के बावजूद जब इनको मामला सुलझाने में सफलता नहीं मिली तो सीबीआई ने न्याय की गुहार लगाने वाले तलवार दंपति को ही अपने जाल में फंसा लिय। बोले अब लगाओ न्याय से गुहार? तुम दोनों को ही फाँसी पर झूला डालते हैं। सीबीआई ने जो तथ्य अदालत के सामने रखें हैं वह सबको चौंका देनेवाला है। इनका निष्कर्ष था ‘‘घटना स्थल पर जो चार लोग थे उनमें से दो की हत्या हो चुकी है इसलिए उस स्थल पर जा दो बचे तलवार दंपति ही इस घटना के अपराधी हैं।’’ कितनी मजेदार कहानी है सीबीआई से कोई पूछे तब इस कहानी को गढ़ने के लिए इतना वक्त क्यों लगा यह तो एक बच्चा भी बता देता तो इनके पास सिर्फ धमकी है। सीबीआई को शाबाशी देने का मन करता हैं कि इसने देश के रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटना को इतनी आसानी से सुलझा दिया।

सवाल यह उठता है कि तब सीबीआई ने कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल आखिर क्यों की थी? इस बात से सीबीआई के ऊपर शक की सूई जाती हैं कि यदि कोई अपराधी ही होगा तो वह सीबीआई के इस क्लोजर रिपोर्ट पर खुश होगा कि वह इनके खिलाफ न्यायालय से न्याय की गुहार लगायेगा? इस मामले में सीबीआई खुद की असर्मथता और अपने दोष को एक निर्दोष परिवार पर मढ़ दिया है।

देश का कानून कहानी और शक के आधार पर किसी को अपराधी नहीं करार दे सकता। सीबीआई इस मामले में सबूत जुटाने और तथ्यों को खोजने में पूर्णतः असफल रही है। इस केस से प्रमाणित होता है, सीबीआई सिर्फ देश का पैसा बर्बाद करती है। सीबीआई ने मीडिया और देश को गुमराह कर गलत तथ्य देश और कानून के सामने रखने में सफल रही है। परन्तु देश का कानून कहता है कि एक निर्दोष को सजा देने से बेहतर है 10 दोषी को सजा ना मिले। सीबीआई ने जिस प्रकार इस मामले में एक रोचक कहानी के आधार पर तलवर दंपति को सजा दिलाने का प्रयास किया है यह फैसला कानून के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज किया जाना है। अब लगाओ न्याय से गुहार?

Date: 25-11-2013 [Free copyright]

शनिवार, 23 नवंबर 2013

व्यंग्यः मोदी ने कांग्रेस पार्टी ज्वा......ईन कर ली?

मुझे मुंगेरी लाल पर बार-बार शक भी हो रहा था पटना में मेरे सौ रु खर्च करवा दिया थे अब तक उसका हिसाब नहीं किया, बोला- "दे दूगां मोदी को आ जाने दो।" जैसे मोदी के आने से ही इसका लोन पास होगा। कांग्रेस इतना लोन बांट रही वह इसको नहीं दिखाई देता। अनाज सस्ता कर दिया। फल-सब्जी भी मुफ्त में खाना चाहता है? अब 20रु रोजाना कमाकर देश को ही खा जाएगा क्या? अब भी मोदी की दलाली करता है नमकहराम। मुझे लगा कि आज काई नया बहाना लेकर आया है मुझसे फिर पैसे ऐंठने का।

मुंगेरीलाल भागता-भागता और हांफता-हांफता मेरे पास आया बोला सुना है क्या?, ‘क्या’ पर इतना जोर दिया की उसके दम फूलने लगे, थोड़ी बहुत जो सांसें वह ले पाता था, वह भी लेने के लाले पड़ गये।
मैंने जल्दी से उसको पास पड़ी पानी की बोतल पीने को दी और उसे पहले बैठने को कहा-
‘‘यार! पहले थोड़ी सांस तो ले लो!’’
मुंगेरी लाल पास पड़ी बेंची पर बैठते हुए कहा हां! हां! ‘‘ यार बड़ी धांसू खबर लाया हूँ’’... फिर पानी की बोतल मुंह में डाली और गट-गट पानी पीने लगा। उसको पानी पीते देख मुझे भी प्यास लग गई।
पर पानी बचने का नाम ही नहीं ले रही थी, उसने एक ही बार में पूरी की पूरी बोतल साफ कर डाली । फिर बोला- ‘‘यार हां! अब आराम मिला मेरी तो पूरी सांस ही चढ़ गई थी। तेरे जैसा यार मिल जाए तो फिर किस बात की चिन्ता मुझे। थोड़ा मुस्कराया और बोला- ‘‘चल चाय पिला’’
मुंगेरी मेरी तरफ तिरछी नजर से बार-बार देखकर मुस्करा रहा था, मानो जैसे कोई ‘मुर्गा’ उसके सामने खड़ा हो।
मैंने उसकी हां में हां मिलाते हुए कहा- ‘‘हाँ! क्यों नहीं चाय तो बनती ही है’’ फिर थोड़ा रूक कर
यार! तू जो खबर लाया था वह तो पहले बता।
जैसे-जैसे मुंगेरी लाल को हवा मिलती गई वह खुद को तरोताजा महसूस करने लगा।
बोला. यार मोदी जी के बारे में एक जोरदार खबर लाया हूँ।
मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था।
पिछले दिनों ही हम दोनों ने मिलकर पटना के गांधी मैदान में मोदीजी का भाषण सुना था।
वह तो गनिमत है कि हमारी जान बच गई, ठीक हमारे सामने एक बम फटा था। इसकी खबर हमको पहले से ही थी कि इधर कोई ‘धमाका’ होने का है। हमने सोचा यह मोदी का धमाका है।
हम ठहरे बिहारी के बिहारी सोचे- हमको क्या लेना-देना धमाके से। हमको तों बस मोदीजी को सुनना है।
हमको तो बस मोदी ही मोदी चारों तरफ दिखाई दे रहे थे । धमाके की आवाज सुनकर भी कोई हिलने को तैयार नहीं था। हम दोनों भी मोदी को सुनने के लिए वहीं डटे रहे। यह सब मैं सोच ही रहा था कि मुंगेरी लाल ने मेरे सपने में खलल पैदा कर दी-
अरे.... जनाब कहां खो गए? चाय आ गई थी। यार !!! जानते हो कांग्रेस पार्टी ने.... बीच में ही उसको टोकते हुए पूछा-
‘‘क्यों क्या हुआ कांग्रेस पार्टी को ?’’ फिर पप्पू ने कोई नई बात तो नहीं बोल दी, जैसे ‘नानसेंस’ , ‘बकवास’
अरे नहीं- इस बार मोदी ने कहा है इससे पूरी कांग्रेस पार्टी बल्ले-बल्ले करने लगी है।
चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ गई है। सभी जगह फटाके फौंड़े जा रहें हैं। कांग्रेस पार्टी में दीवाली मनाई जाने लगी।
मैं भी आश्चर्यचकित सा हो गया? यह सब सुनकर।
आखिर मोदी ने ऐसा क्या रातों-रात तीर मार दिया कि कांग्रेस में हर तरफ खुशियाली छा गई?

आज अचानक से कांग्रेस को खुश होने का कारण मेरी समझ से परे था। कल तक तो ‘‘मोदी पीछा करो अभियान’’ चला रहे थे। खोजी कुत्तों की टीम लगा दी उनके पीछे, पूरा देश एक ही काम में लगा था क्या सी.बी.आई हो क्या नेतागण सबको एक ही आदेश का पालन करना था, ‘‘मोदी को खोजो’’ पर ये जनाब हर जगह मंच पर आते कोई नया धमाका कर के चले जाते। ऐसा तो आजादी के समय भी देखने को नहीं मिला था। गजब का नेता है अभी से सत्ता पक्ष, विपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार बैठी है।

मुंगेरीलाल की तरफ देखते हुए पूछा - "यार बात ठीक से समझाते हो कि सिर्फ पहेली में ही बात करोगे?"
मुंगेरी- बताता हूँ.. बताता हूँ जल्दी भी क्या है? "यार चाय तो पी लेने दो पहले।"
मुझे मुंगेरी लाल पर बार-बार शक भी हो रहा था पटना में मेरे सौ रु खर्च करवा दिया थे अब तक उसका हिसाब नहीं किया, बोला- "दे दूगां मोदी को आ जाने दो।" जैसे मोदी के आने से ही इसका लोन पास होगा। कांग्रेस इतना लोन बांट रही वह इसको नहीं दिखाई देता। अनाज सस्ता कर दिया। फल-सब्जी भी मुफ्त में खाना चाहता है? अब 20रु रोजाना कमाकर देश को ही खा जाएगा क्या? अब भी मोदी की दलाली करता है नमकहराम।
मुझे लगा कि आज काई नया बहाना लेकर आया है मुझसे फिर पैसे ऐंठने का।
मैंने आशंका भरी नजरों से उसकी तरफ देख कर पुछा-
"तु कुछ बतायेगा कि मैं अब यहां से जाऊं?,"
यार! आप तो बस नाराज हो गए-
लो सुन मोदी ने कांग्रेस पार्टी...
हां!...हां!... आगे बोल क्या? ‘‘कांग्रेस पार्टी...’’
‘‘मोदी ने कांग्रेस पार्टी ज्वा.......ईन कर ली है।’’
क्या???? यह सुनकर मैं भौंच्चका रह गया।
अब मोदी भी सांप्रदायिक नहीं रहे? अब देश को फिर से सेक्युलरवादी के हाथ ही सौंप देना होगा? मुझे तो पहले सी लगता था कांग्रेस कुछ ना कुछ चालाकी करेगी फिर सत्ता में आने के लिए लो कर लो बात अब इनसे। अब हिटलर किसको कहेंगे हम? अब मोदी की शादी कराने के लिए कांग्रेस ने जिस महिला को खोजा था उसका क्या होगा? माकपा, भाकपा, सपा, राजद, बसपा, जदयू सब ने मोदी की तारीफ में नये-नये कशीदे गढ़ने शुरू कर दिये। यह तो सरासर गद्दारी है। - शम्भु चौधरी

रविवार, 17 नवंबर 2013

माकपा : खुद के पांव पर खुद की कुल्हाड़ी - शम्भु चौधरी

पुनः 2014 में लोकसभा के चुनाव आने हैं। बंगाल के एक वरिष्ठ नेता श्री गौतम देव का बयान ने सबको चौंका दिया है आपकी बात मानी जाए तो माकपा चाहती है कि भाजपा से लड़ने के लिए माकपा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन होना जरूरी है।। माकपा इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है कहती है कि यदि भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो देश टूट जायेगा? अब इनको कौन समझाये कि देश टूटेगा की नहीं हां! इनकी फ़ज़ीहत जरूर हो जानी है। जो पार्टी खुद के पांव पर ही नहीं खड़ी हो सकती वह जब खुद के पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाये तो कोई इनको कैसे बचायेगा?

मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्टी अर्थात माकपा एक समय में बंगाल में लगातार 25 साल एक छत्र राज किया। स्व. ज्योति बसु के नेतृत्व में इस पार्टी ने कांग्रेस का बंगाल से सफाया कर दिया था। कांग्रेस पार्टी बंगाल में हमेशा से माकपा की ‘बी’ टीम कहलाती रही और माकपा पार्टी केन्द्र में कांग्रेस पार्टी की ‘बी’ बनकर केन्द्र का लुत्फ़ उठाती रही। यह सांप-छुछुंदर का खेल आपस में कई सालों तक चलता रहा। जब बंगाल का चुनाव आता तो माकपा जम कर कांग्रेस पार्टी को गाली देती और अपनी हर असफलता का ठीकरा केन्द्र पर फोड़ती नहीं थकती और जैसे ही केन्द्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस को संसद में बहुमत की जरूरत होती यह मुंह चुरा कर समझौता कर लेती। कभी सामने के दरवाजे से तो कभी पीछे के दरवाजे से।

लेकिन जैसे ही न्यूक्लियर रियेक्टर डील पर संसद में मतदान की बात आई तो माकपा तिलमिला उठी, प्रश्न था अमेरिका को समर्थन देना का जो इनके सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था। साथ ही इनके माकपा महासचिव प्रकाश करात जी चाहते थे कि वे कांग्रेस को ठेंगा दिखा कर खुद के बल पर बंगाल में राजनीति करने में सफल रहेंगें । माकपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पहली बार माकपा के मूलभूत सिद्धांतों से अलग हटकर पुंजीपतियों के साथ मिलना शुरू कर दिये थे। बंगाल में नये उद्योग लगाने के कवायद शुरू कर दी।

सिंगुर में टाटा का नैनो कारखाना लाने की भरसक प्रयास किया गया। जमीन अधिग्रहण की राजनीति ने ममता बनर्जी को जहां राजनैतिक फसल काटने का अवसर दिया वहीं पिछले 30-35 सालों से जुड़े मजदूर संगठन धीरे-धीरे इनसे किनारा लेते गए। स्वभाव से विपरीत का समझौता इन संगठनों को रास नहीं आ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के अच्छे प्रदर्शन के बावजूद बंगाल से माकपा का सफाया हो गया।

माकपा का देश हित किस सिद्धांत पर चलता है इनकी बातों से कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता। मजदूरों के छोटे-छोटे संगठन बनाना और उनके बल पर सत्ता की राजनीति करना इनका प्रमुख और एक मात्र लक्ष्य रहता है। परन्तु जब मजदूरों की हितों के रक्षा की बात आती है तो ये लोग अपनी रोटी सेंकने में लग जाते हैं, परिणाम स्वरूप हजारों मजदूरों का परिवार सड़कों पर भीख मांगने के कगार पर खड़ा हो जाता है। इसके कई उदाहरण आपको बंगाल में देखने को मिल जायेंगे।

लगातार 25 साल से इस दल ने कांग्रेस के साथ मिलकर जनता के साथ आँख मिचौली खेलते रहे। इनका पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व आपस में तलाक हो गया तो दुश्मनी भी बराबरी की करनी थी, सो कांग्रेस पार्टी ने माकपा पार्टी की कट्टर विरोधी तृणमूल नेत्री सूश्री ममता बनर्जी का दामन थाम लिया। माकपा का बंगाल से सिर्फ लोकसभा की सीटों से ही नहीं, विधानसभा की सीटों से भी सफाया हो गया। माकपा का गढ़ देखते ही देखते बालू के टीले की तरह ढह गया । इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी को बड़ी राहत मिली। लोकसभा के चुनाव में उसने भी ममता के सहयोग से कुछ सीट बंगाल में लेने में सफलता प्राप्त कर ली ।

इस बीच तृणमूल पार्टी के द्वारा कांग्रेस से मोह भंग होते ही माकपा को पुनः बंगाल में मौका तलाशने में लग गई। बंगाल में खोई जमीन को पुनः पाने के प्रयास में माकपा चाहती है कि कांग्रेस पार्टी का दामन किसी बहाने ही सही पुनः थाम लिया जाए । अब जब कांग्रेस पार्टी की नैया देश में डूबने के कगार पर खड़ी है तो डूबती नैया पर माकपा खुद को सवार कर बची-खुची भी इज़्ज़त भी समाप्त कर लेना चाहती है।

पुनः 2014 में लोकसभा के चुनाव आने हैं। बंगाल के एक वरिष्ठ नेता श्री गौतम देव का बयान ने सबको चौंका दिया है आपकी बात मानी जाए तो माकपा चाहती है कि भाजपा से लड़ने के लिए माकपा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन होना जरूरी है।। माकपा इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है कहती है कि यदि भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो देश टूट जायेगा? अब इनको कौन समझाये कि देश टूटेगा की नहीं हां! इनकी फ़ज़ीहत जरूर हो जानी है। जो पार्टी खुद के पांव पर ही नहीं खड़ी हो सकती वह जब खुद के पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाये तो कोई इनको कैसे बचायेगा?


शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

यहूदियों के जूल्म का परिणाम था हिटलर - शम्भु चौधरी

जब ये लोग हिटलर के पापों को गिनाते नहीं थकते, तो 1918 से लेकर 1933 तक के खुद के पापों पर पर्दा क्यों डाल रहे हैं जिसमें यहूदियों ने साम्यवाद का सहारा लेकर पूरे जर्मन को समाप्त करने की योजना पर कार्य कर रहे थे। हिटलर कोई जमीन से पैदा नहीं हुआ था? उसको व उसके विचारों को पैदा करने में साम्यवादी ताकतों का जूल्म और जर्मन की जनता पर यहूदियों का अत्याचार काफी हद तक जिम्मेदार रहा है।

जैसे-जैसे देश आगामी लोकसभा के चुनाव की तरफ बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे सत्ताधरी दल अभी से ही विपक्ष की मुद्रा में दिखाई देने लगी है। कोई हिटलरवाद या फासिस्टवाद की तुलना श्री नरेन्द्र मोदी कर रहा है तो कोई अपना संयम खोते जा रहा है। कोई शैतान कहता है तो कोई चायवाला। इससें तो यही लगता है कि सच में मोदी दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो चुके हैं। मजे की बात तो यह है कि जो माकपा खुद फासिस्टवाद की परिचायक रही है जिसके अत्याचारों के परिणाम स्वरूप हिटलर का जन्म हुआ वह भी इस सत्ता के महायुद्ध में एक कदम आगे है।

जिस साम्यवादी ताकतों ने ना सिर्फ जर्मन को बर्वाद कर दिया था जर्मनी को बेरोजगारी के कगार पर भी ला खड़ा कर दिया था। इनके राज्य में अपने विरोधियों को गोली से भून देना या उनको जेलों में डाल देना आम बात थी। इनके जूल्म का इतिहास ना सिर्फ भयावीत करनेवाला था, मानवता को भी शर्मसार करता था जब पूरा जर्मन इन साम्यवादी ताकतों के आतांक से कांपने लगा था। तब हिटलर का उदय हुआ था। इनको यह इतिहास भी साथ-साथ बताना नहीं भूलना चाहिए। यहूदियों के साथ मिलकर नाजी समूदायों पर एकतरफा जूल्म करना इनका इतिहास रहा है।

1918 से लेकर 1933 के बीच के अपने पापों के इतिहास को छुपाकर सिर्फ हिटलर के उस पक्ष को सामने रखना इनकी पुरानी आदत सी रही है। जिस प्रकार इन दिनों सेक्युलरवादी दलों के द्वारा प्रयोजित सांप्रदायिक आतांकवाद को समर्थन देकर देश में आई.एस.आई को फलने-फूलने का माहौल पैदा करने देना और अपने विरोधियों को सांप्रदायीक कहना आम है।

अपने पापों पर पर्दा डालने के लिए कांग्रेस पार्टी, तथा तथाकथित ये सेक्लुलरवादी दल और साम्यवादी ताकतों ने मिलकर देश में मोदी लहर को हिटलर फासिस्टवाद की संज्ञा देने की योजना पर कार्य कर रहें हैं। इसके लिए देश के कुछ विद्वानों को हिटलर का इतिहास भी पढ़ाया जा रहा है ताकि देश में लोकसभा का चुनाव आते-आते मोदी के विरूद्ध एक अच्छा जनमानस तैयार किया जा सके। जब इनको लगा कि देश में सेक्लुलरवाद फसल और काटी नहीं जा सकती तो इन लोंगो ने हिटलरवाद का सहारा लेना शुरू कर दिया ताकि देश की जनता को बताया जा सके कि हिटलरवाद कितना खतरनाक था।

जब ये लोग हिटलर के पापों को गिनाते नहीं थकते, तो 1918 से लेकर 1933 तक के खुद के पापों पर पर्दा क्यों डाल रहे हैं जिसमें यहूदियों ने साम्यवाद का सहारा लेकर पूरे जर्मन को समाप्त करने की योजना पर कार्य कर रहे थे। हिटलर कोई जमीन से पैदा नहीं हुआ था? उसको व उसके विचारों को पैदा करने में साम्यवादी ताकतों का जूल्म और जर्मन की जनता पर यहूदियों का अत्याचार काफी हद तक जिम्मेदार रहा है। देश में साम्यवादी ताकतों का हर वक्त यह प्रयास रहा है कि वे भारत की सत्ता पाने या सत्ता पर ऐण-केण प्रकारेण अपना अधिकर जमाने का प्रयास करे। इनको इसमें अभी तक सफलता नहीं मिलती दिखाई देती तो ये एक मिथ्यक इतिहास का सहारा लेकर जिससे भारत को कोई लेने-देना नहीं को माध्यम बनाकर से देश में कांग्रेस के खिलाफ बनते जनमानस को अपने पक्ष में करने की जी तौड़ कोशिश करने में लगे हैं। कोशिश अच्छी है। परन्तु देश की कीमत पर यह कोशिश क्यों?

जब देश के जवानों का सर कलम कर पाकिस्तानी ले जा रहे थे तब ये लोग कहां गायब हो गये थे ? एक-एक संसाद जो चून कर संसद में गए थे जैसा कि ये लोग अण्णा आंदोलन के समय कहते नहीं थकते थे, देश की जनता इनका चून-चून कर हिसाब चूकता करेगी।


रविवार, 10 नवंबर 2013

मेरे पास 1000टन सोना है - शम्भु चौधरी

यदि इस संपदा से होने वाली आय को पिछले 60 सालों में जमा किया जाता तो आज डालर का मूल्य एक रु के बदले 2 डालर या 5 डालर हो सकता था। आज भी इस प्रयोग को हम अपना सकते हैं। सिर्फ इस प्रयोग से ही देश की अर्थ व्यवस्था में रोजना का परिवर्तन हमें देखने को मिल सकता है। परन्तु हमारी लाचारी यह है कि हमने खनीज संपदा को ना सिर्फ खुद की तिजौरी भरने का माघ्यम बना दिया है, सरकारी खर्चों को पूरा करने व राज्यों को लूटने के काम में लगा दिया है।

मेरे पास 1000टन सोना है जो भारत मां की सेवा में अर्पित करना चाहता हूँ। कल रात जब संत श्री शोभन सरकार के सपने की बात को पढ़ रहा था तभी मुझे लगा कि देश में अपार संपदा भरा हुआ हैं और हम जमीन के तह में खजाने की खोज में लगे हैं।

1. हमारे पास अपार खनीज संपदा है। 2. हमारे पास 9 रत्न सरकारी उद्योग लगे हुए हैं। 3. हमारे पास कृषि योग्य भूमि का अपार भंडार है। 4. हमारे मंदिरों में खजानों का भंडार भरा पड़ा है। 5. हमारे पास 125 करोड़ जनसमूह की अदभूत क्षमता है।

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -1

आज हम भारत की अर्थ व्यवस्था व अन्य विकसित देशों की अर्थ व्यवस्था पर नजर देगें। जो देश विकसित हैं उनके खान-पान, रहन-सहन अलग हो सकते हैं पर रोटी तो रोटी ही होती है। जिसका मूल्य लगभग सभी देशों में एक ही होना चाहिए। रोटी बनाने के तरिके भले ही अलग हो सकते हैं, खाने का तरीका तो एक ही होगा। इसी प्रकार पहनने, नहाने-धोने के सामान व अन्य जरूरी वस्तुएं सिर्फ दवाओं व इलेक्ट्रोनिक समानों की बात छोड़ दें तो हमारे और उनके रोजाना ईस्तमाल की वस्तुएं प्रायः एक जैसी है। उन देशों के क्षेत्रफल और जनसंख्या का अनुपात भी हमारे देश से कम ही है। भारत में जहां क्षे़त्रफल अधिक है और काम करने वालों की संख्या भी अधिक है तो इस देश की मुद्रा इतनी कमजोर कैसे? उन देशों का रूपया इतना मजबूत क्यों यह सवाल उठाना जरूरी हो जाता है। अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत है कि आमदनी या संपत्ति और खर्च या कर्ज जिस तरह हमारे जीवन के तराजू हैं जो हमारे स्वास्थ का दर्शाता ही नहीं वह यह भी बताता है कि उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति कितनी कमजोर या मजबूत है। सिर्फ सोना के संकलन से ही उस व्यक्ति के स्वास्थ का आंकलन नहीं किया जा सकता। उसकी कूल सकल आय या बचत, जमीन-जायदाद/ शिक्षा आदि सभी का आंकलन जरूरी होता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ सोना ही जमा कर ले और उसका हेल्थ खराब रहे व उसे सोना देने से भी अनाज खाने को ना मिले तो उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होते हुए भी उसके किसी काम की नहीं हो सकती और उसके सोने का मूल्य नहीं लगाया जा सकता। भारत में राजा मिडास की एक कहानी काभी प्रचलित रही है। इस कहानी से वर्तमान अर्थशास्त्र को समझाने में हमें मदद मिलेगी।

राजा मिडास की कहानी आपने जरूर पढ़ी होगी। इस कहानी में राजा को एक वरदान मिला था कि वह जिसे छूएगा वह वस्तु सोने की हो जाएगी। परिणाम स्वरूप वह अपनी बच्ची को भी सोने में बदल डाला। कहानी आज के परिदृष्य पर आर्थिक जगत के लालच का दर्शनशास्त्र है। पीने का ग्लास, पानी भी सोने में बदल गया। राजा मिडास को बहुत तेज भूख लग रही थी और सोना खाकर तो कोई पेट नहीं भर सकता था वह!

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -2

भारत की अर्थ व्यवस्था को समझने के लिए हमें कुछ बुनियादी बातों की तरफ भी अपना ध्यान देना होगा। हम अपने घरों में सबसे अच्छा सामान लाना चाहते हैं, खाना चाहते हैं परंतु बनाने और बेचने के नाम पर जब बात अच्छे की आती है तब मुनाफा हमारे सामने खड़ा होकर हमें चोर बना डालती है। जिसका परिणाम. यहीं से हमारी मुद्रा कमजोर होना शुरू कर देती है। किसी समान का निर्माण सस्ता हो गलत नहीं है पर खराब माल बनाकर उसे अच्छा बोलना गलत है। आज चीन दुनिया भर में सस्ते सामान बना कर जो शोहरत और प्रतिष्टा प्राप्त की है वह एक उदाहरण के तौर पर हमें देखना चाहिए। माल बनाने वाला बोलकर बेचता है माल की कोई गारण्टी नहीं है, लेने वाला, बेचने वाला, ट्रेडर, सरकार सब इस बात को जानते हैं कि चाइना का माल किसी भी समय खराब हो सकता है। अच्छी बात है। जो है, स्पष्ट है। एक बच्चे को हमें अभी खुश करना है इसके लिए महत्व उस समय सस्ता या मंहगा का नहीं है बच्चे को मात्र एक खिलौना देकर चुप कराया जा सकता है। इस समय की उपयोगिता उसके सामान पर है ना कि उसके मूल्य या वह कितना चलेगा पर। इसी प्रकार इस उपयोगिता को हम निम्न हिस्से में देखें। 1. पहली उपयोगिता वह होती है जहां वस्तु के मूल्य को न देखते ह्रए कि वह सस्ता है या मंहगा हमें लेना ही पड़ता है। जैसे दवा, पानी, आटा, दाल, चावल। 2. दूसरी उपयोगिता वह है जो हमें झणीक सुख के लिए लेना होता है। जैसे गहने, जवहरात, सुंदर बनने के प्रशाधन आदि...आदि । 3. तीसरी उपयोगिता होती है कि हम भविष्य के लिए कोई सामान लेते या निर्माण करतें हैं। जैसे घर के सामान, पुनः गहने, घर बनाना इत्यादि। इसी प्रकार उपयोगिता की एक लंबी सूची तैयार की जा सकती है।

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -3

हमने पहले भाग में पढ़ा था कि हमारे पास खनिज संपदा का अपार भंडार है। लोहा, कोयला, पानी, अबरख, पथ्थर, बालू, चूना, मारबल, समुद्री तल,तेल के कूएं, लाखों जल क्षेत्र व तालाब इत्यादि । जो हमें हर वक्त धन देते रहते हैं इसके बदले में उनको कोई शुल्क जमा नहीं देना पड़ता है। सरकार सिर्फ इन स्त्रोतों से होने वाले आय को ही सरकारी खजाने में जमा कर दे तो यह कंगाल देश पलकों में धनवान हो सकता है। परन्तु हम इस संपदा को हर तरफ से नोचने, लूटने में लगे हैं। जो उत्पादन इन स्त्रोतों से हो रहा है उसका धन या तो नेताओं की तिजौरी में चला जाता है या विदेशी खातों में जमा हो जाता है। देश के एक-दो नहीं प्रायः तमाम उद्योगपति इस संपदा का लाभ लेने से नहीं चुकते। हर तरफ लूट मची है। सब मिलकर अपनी तिजौरी भरने में लगें हैं। यदि इस संपदा से होने वाली आय को पिछले 60 सालों में जमा किया जाता तो आज डालर का मूल्य एक रु के बदले 2 डालर या 5 डालर हो सकता था। आज भी इस प्रयोग को हम अपना सकते हैं। सिर्फ इस प्रयोग से ही देश की अर्थ व्यवस्था में रोजना का परिवर्तन हमें देखने को मिल सकता है। परन्तु हमारी लाचारी यह है कि हमने खनीज संपदा को ना सिर्फ खुद की तिजौरी भरने का माघ्यम बना दिया है, सरकारी खर्चों को पूरा करने व राज्यों को लूटने के काम में लगा दिया है। बड़े-बड़े सरकारी पद सृजन कर इन क्षेत्रों को उनकी तनख्वाह बांटने में इन स्त्रोंतों का धन बर्वाद होने लगा दिया है। क्रम जारी....

सीबीआई : काम का ना धाम का-सौ मन अनाज का।

सीबीआई का बॉल खुद उछलकर माननीय उच्चतम अदालत के पाले में आ गिरा है। माननीय उच्चतम अदालत ने कई बार सरकार को इसे ठीक करने के निर्देश भी जारी किए थे। आज अवसर है कि इस सफेद हाथी को समाप्त कर नये सिरे से इसके गठन की नई प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए जो सीधे तौर पर न्यायालय क्षेत्र के अधीन हो ना कि सत्तासीन नेताओं के अधिन। यह सफेद हाथी है। गांव में एक कहावत है ‘‘काम का ना धाम का-सौ मन अनाज का।’’

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2013 को अपने एक फैसले में कहा कि ‘‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम 1946 के तहत गठित ‘सीबीआई‘ पुलिस बल नहीं है और ‘सीबीआई‘ इस अधिनियम का न तो एक अवयव है और न ही हिस्सा। इस फैसले में कहा गया है कि जहाँ हम ‘सीबीआई‘ की वैधता बनाए रखने से इनकार करते हैं और घोषित करते हैं कि ‘सीबीआई‘, डीएसपीई अधिनियम 1946 विधान का वैध हिस्सा नहीं है, वहीं हम यह पा रहे हैं कि सीबीआई न तो डीएसपीई अधिनियम का अवयव है और न ही हिस्सा है और इसीलिए डीएसपीई अधिनियम 1946 के तहत गठित ‘सीबीआई‘ को ‘‘पुलिस बल’’ नहीं माना जा सकता। इस प्रकार गुवाहाटी उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सीबीआई गठित करने के गृह मंत्रालय के 1 अप्रैल 1963 के प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

यह निर्णय एक अपील जो सन् 2008 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय में 'नवीन कुमार' के मामले में केश नम्बर 119/2008 जो कि 'बीएसएनएल' के एक कर्मचारी के मामले के आपराधिक मामले की सीबीआई द्वारा जांच किए जाने के विरोध में की गई अपील के संदर्भ में दिया गया है।

करीब छह साल पहले गुवाहाटी उच्च न्यायालय की ही एक सदस्यीय पीठ ने 'नवीन कुमार' की याचिका को खारिज कर दिया था, लेकिन अब न्यायमूर्ति आई.ए.अंसारी और न्यायमूर्ति इंदिरा शाह की खंडपीठ ने गृह मंत्रालय के 1963 के उस संकल्प को ही गैरकानूनी करार दिया है, जिसके तहत सीबीआई के गठन का दावा किया जाता रहा है। अदालत ने दस्तावेज़ों की रोशनी में यह टिप्पणी की कि सीबीआई न तो दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट का अंग है, न ही इसका हिस्सा। इसका गठन न तो संयुक्त कैबिनेट का फैसला था और न ही इसके गठन को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी, जबकि इस तरह की एक केंद्रीय जांच एजेंसी का गठन कानून बनाकर ही होना चाहिए था। अदालत का मंतव्य है, कि चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए सीबीआई न तो पुलिस की तरह व्यवहार कर सकती है, न वह अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर सकती है और न ही उसे किसी की गिरफ्तारी करने का अधिकार है।

सीबीआई पर गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आनन-फानन में एक अपील दायर कर दी । सरकार ने अपील में कहा कि इस फैसले से 10 हजार केस पर इसका असर पड़ेगा। सीबीआई के गठन को असंवैधानिक बताने वाले गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ शनिवार को शाम साढ़े चार बजे सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 6 दिसम्बर को होगी।

हालाँकि दिल्ली की बौखलाई केंद्रीय सरकार के लिए जहाँ पहाड़ ही टूट पड़ा हो । वहीं अदालत में सजा काट रहे लालू यादव व अन्य कई मामले में जेल में बंद सीबीआई के शिकारी अदालत से गुहार लगा दी है कि अब तो हमको भी बहार निकालो भाई इस पिंजड़े से।

मजे की बात यह है कि इस तोते ने कई कमाल भी किये हैं। मसलन 1984 के सिख दंगों की फाइल को पिछले 25 साल से चबा-चबा कर खा गए कोई निर्णय पर नहीं पंहुच पाए। 60 हजार की फौज 10 हजार से अधिक मामले। एक-एक ममला 25 साल, सोचे कितना फायदा होता होगा इस विभाग को। चारा घोटाला की जांच कर रहे इनके पूर्व जाँचकर्ताओं की फाइल ये भी चबा डालते हैं और फिर नई जांच शुरू कर देते हैं। मजा ही मजा है इस विभाग को। सरकार भी खुश ये भी खुश।

भाई ! काम कितना भारी है! और तो और इनके ऊपर देश चलाने की जिम्मेदारी भी तो है। इस यूपीए-2 की सरकार का तो पूरा दामोदार ही सीबीआई के ऊपर ही ठिका हुआ था। तभी तो मुलायम यादव और मायावती दोनों यूपीए-2 सरकार को पानी पी-पीकर गाली देते रहे परन्तु जहां मामला संसद में मतदान का आता, तुरंत पलट जाते। इनको सांप्रदायिकता याद आने लगती या इनको इनकी नानी याद आने लगती थी। अब जब सरकार का कार्यकाल प्रायः लगभग समाप्त के कगार पर है तो इनको सीबीआई ने इनको इनकी ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे दिया। आपको याद ही होगा कि इसी मुलायम के चक्कर में एक बार ममता दीदी भी गच्चा खा चुकी है। जब ममता दीदी से वादा कर रातों-रात मुलायम यादव जीजीजीजीजी ने अपना स्टैंड ही बदल लिया था, ममता दीदी ताकती ही रह गई।

भाई ! हैं न इस तोते का कमाल! सांप्रदायिकता का जादुई चाबूक! क्यों गलत कहा क्या? मजे की बात देखिये कभी इस तोते पर उच्चतम अदालत कड़ी टिप्पणी करती है, तो कभी कोई पर इसके सेहत को कुछ फर्क नहीं पड़ता। संसद में तो यह संस्था राजसत्ता के खेल का हिस्सा बन चुकी हैं।

इस परिपेक्ष को नजर रखें तो माननीय गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सही समय पर छक्का मारा है। केंद्र सरकार चारों खाने चित दिखाई दे रही है। कई तरह की दलील दे रही है, अपने पापों को दलीलों से सही ठहराने का प्रयास में लग गई है। इनको एक बात तो समझ में आनी ही चाहिए कि जब उच्चतम अदालत ने दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ जब आदेश दिया था तो संसद में बैठे सारे दागी सांसद एक साथ चिल्लाने लगे थे कि अदालत को विधायिका के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सबने मिलकर इसे संसद की गरिमा पर हमला करार दिया था। अदालत पर गंभीर आरोप भी जड़ने लगे थे। चोर दरवाजे से दागी अध्यादेश लाने का प्रयास भी किया गया। महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने इस दागी अध्यादेश को हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया तो इन लोगों ने श्री राहुल गांधी का उपयोग कर अपनी इज़्ज़त बचाई।

अब पुनः इनके भाई सब जेल से ही चिल्लाने लगे, हमें छोड़ों । मौका है सबको आजाद करने का। अब इनको सीबीआई की इतनी चिंता कैसे हो गई? जब इनको उच्चतम न्यायालय का निर्णय इतना बुरा लगता है जिसके खिलाफ ये लोग दागी अध्यादेश तक ला सकते हैं तो आज इनको सीबीआई को बचाने के लिए इसी अदालत के पास जाने की क्या जरूरत नजर आ गई? सच तो यह है कि जिस आधार को लेकर गुवाहाटी के माननीय उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय दिया है वह ना सिर्फ तर्क संगत है, सही भी है। इसलिए बौखलाई कांग्रेस की सरकार को उच्चतम अदालत से कोई सफलता मिलेगी ऐसी उम्मीद नहीं लगती मुझे। सीबीआई का बॉल खुद उछलकर माननीय उच्चतम अदालत के पाले में आ गिरा है। माननीय उच्चतम अदालत ने कई बार सरकार को इसे ठीक करने के निर्देश भी जारी किए थे। आज अवसर है कि इस सफेद हाथी को समाप्त कर नये सिरे से इसके गठन की नई प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए जो सीधे तौर पर न्यायालय क्षेत्र के अधीन हो ना कि सत्तासीन नेताओं के अधिन। यह सफेद हाथी है। गांव में एक कहावत है ‘‘काम का ना धाम का-सौ मन अनाज का।’’ जयहिन्द!

बुधवार, 6 नवंबर 2013

व्यंग्यः हाथी-चारों तरफ से सिर्फ खाता ही खाता है।- शम्भु चौधरी

मानो चुनाव आयोग नहीं जनता के मनोरंजन का साधन बन गया है। इसबार तो सभी तालाब को भी मिट्टी से पटवाने की मांग की गई ताकी तलाब में लबालब कमल के फूल जो खिलते जा रहें हैं उन्हें रोका जा सके। चुनाव आयोग को एक काम और करना चाहिए क्रिकेट में छक्का लगाने पर भी प्रतिबंध कर देना चाहिए क्योंकि एंपायर हर छक्के पर दोंनो पंजा उठाकर जनता को इशारा करता है कि वोट कहां डालना है।

आज ही कांग्रेस पार्टी के एक मास्टर जी ने मीडिया जगत की कक्षा ली और उसमें वे सभी बच्चों का समझाने में लगे थे कि उनकी पार्टी हाथी है और मोदी की पार्टी शियार, खैर ! मुझे इनसे क्या लेन-देना वह शियार हो या खरगोश । इसके पहले कुछ दिन ही पूर्व इनके विद्धान प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि उनकी पार्टी कछुए की चाल से चल रही है जो अंत में सफलता प्राप्त कर लेगी।

भाई ! इनको इतिहास का इतना ज्ञान हो गया कि ये लोग हिटलर के इतिहास को पढ़-पढ़कर कभी खरगोश निकालते हैं तो कभी शियार अब इतिहास का इनको कितना पता है यह तो मैं नहीं जानता हाँ! आदमखोर हिटलर का नाम वे सुने होंगे हम भी आदमखोर हाथी को जानते हैं जो दिल्ली में बैठकर पूरे देश में आतांक पैदा कर रहा है। इसके पहले इनके इतिहास से चींटी निकली थी । आम आदमी पार्टी को इनके ही एक नेता ने चींटी कहा था जो अब दिल्ली के विधानसभा चुनाव में इनके नाक में दम कर दिया है और बैचारी शीला जी छटपट-छटपट कर रही है पानी भी नहीं पी पा रही । वैसे भी दिल्ली में पानी की किल्लत है।

आपने एक मुहावरा पढ़ा होगा - ‘‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’’ इसका मतलब मुझे अभी तक नहीं समझ में आया, आज जब इनके एक नेता ने समझाया तो इसका अर्थ समझा। अर्थ समझते ही खुद का ही सर खुजलाने लगा तो पता चला कि हाँ! ये लोग ठीक ही तो कह रहें हैं कि ये लोग हाथी ही हैं अब देखिये ने इनकी पार्टी ने पिछले 10 सालों में इतना लूटा कि लालू यादव बेचारे जाने को तो जेल चले गए, पर कांग्रसियों को देश लूटने का नूख्सा सिखा गए।

एक कहावत और देखिये- ‘‘हाथी जिंदा लाख का मरे तो सवा लाख का’’ आपको याद नहीं हो तो इतिहास की किताब खोलकर हिटलर का इतिहास पढ़ लिजिएगा । पिछले उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग ने सारे हाथीयों को तिरपाल से बंधवा दिए थे ।

अब चुनाव आयोग को कौन समझाए कि भाई जहां दिमाग खर्च करना है वहां तो खर्च करते नहीं, जहां नहीं खर्च करना है वहीं दिमाग लगाते हो । मानो चुनाव आयोग नहीं जनता के मनोरंजन का साधन बन गया है। इसबार तो सभी तालाब को भी मिट्टी से पटवाने की मांग की गई ताकी तलाब में लबालब कमल के फूल जो खिलते जा रहें हैं उन्हें रोका जा सके। चुनाव आयोग को एक काम और करना चाहिए क्रिकेट में छक्का लगाने पर भी प्रतिबंध कर देना चाहिए क्योंकि एंपायर हर छक्के पर दोंनो पंजा उठाकर जनता को इशारा करता है कि वोट कहां डालना है, और जिस राज्य में चुनाव की घोषणा हो जाए वहां सभी को हाथ मिलाने पर भी प्रतिबंध लगा देना चाहिए। मुझे हाथ और हाथी से याद आया कांग्रेस पार्टी को इससे मिलते जूलते सभी जूमले और शब्दों का कॉपीराइट करवा लेना चाहिए ताकी इसके नाजायज प्रयोग पर भी प्रतिबंध लगाया जा सके, कम से कम सभी भाजपाईयों के हाथ तो कटवा ही देने चाहिए कारण की ये लोग इस पंजे का प्रयोग गलत काम के लिए भी कर सकतें हैं मसलन शोचालय जाने के वक्त या भाषण देते वक्त। ये जनता तो बैचारी इतनी भोली है कि ये क्या जाने की ये पंजा खूनी है कि पाक..-साफ?

अरे मैं सफेद हाथी की बात बताना भूल गया। ये कहावात ने तो मुझे हिला ही दिया। अब जब ये हाथी मर जायेगा तो सवा लाख का कैसे हो जायेगा यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी तभी पास बैठा एक बूढ़े आदमी ने मुझे समझाया कि हाथी का सिर्फ दांत ही नहीं उसकी लीद भी गांव वाले खरीदकर ले जाते हैं। सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस हाथी ने इतना क्या खा लिया कि गांव वाले इसकी लीद भी खरीदकर ले जायेंगे।

हां! लीद से ध्यान आया कि एक कहावत और भी है शायद कांग्रसियों ने इसे हिटलर के इतिहास में नहीं पढ़ा होगा वह है कि ‘‘हाथी चले बजार-कुत्ता भूँके हजार‘‘ भाई ठीक ही पढ़ा है आपने इतिहास को आने वाले चुनाव में आप हाथी हो कि कुत्ता यह तो देश की जनता ही आपको बताएगी। पर एक बात बात-बात में याद आ गई कि सफ़ेद हाथी एक मुहावरा है जिसका अर्थ होता है कि जो दिखने में सफेद दिखता है वह किसी काम का नहीं।

अब यह तो इनको ही तय करना है कि ये लोग कौन सा हाथी है। लाल, काला, पीला या सफेद?

इसी बात से एक कहानी भी याद आ गई- जो बचपन में सभी ने पढ़ी ही होगी।
एक गाँव में चार अंधे रहते थे। उन्होंने गाँव में हाथी आने की खबर सुनी। वे रास्ता पूछते-पूछते हाथी के पास पहुँचे। महावत से बोले, ‘‘भैया, जरा हाथी को कब्जे में रखना, हम उसे टटोलकर देखेंगे।’’
महावत ने सोचा.इसमें मेरा क्या बिगड़ता है, इन अंधे गरीबों का मन रह जाएगा। बोलाए ‘‘खुशी से देखो।’’
अंधे हर चीज को हाथ से टटोलकर ही देखते हैं। एक ने अपना हाथ बढ़ाया तो हाथी के कान पर पड़ा। बोला, ‘‘हाथी तो सूप की तरह होता है।’’
दूसरे का हाथ उस हाथी के पाँव पर पडा। बोला, ‘‘नहीं, हाथी खंभे सा होता है।’’
तीसरे के हाथ के सामने सूँड़ आई। उसने कहा- ‘‘नहीं-नहीं, वह तो मोटे रस्से जैसा होता है।’’
चौथे का हाथ हाथी के पेट पर पड़ा। वह कहने लगा- ‘‘आप सब गलत कहते हो, हाथी तो एकदम मशक सा होता है।’’
चारों अपनी-अपनी बात पर अड़ गए और लगे लड़ने-झगड़ने। हर एक अपनी ही हांकता, दूसरे की नहीं सुनता था।
एक जयराम रमेश जैसे समझदार आदमी पास खड़ा-खड़ा इनकी सब हरकतें देख रहा था। उसने अपने मन में लड़ाई का बड़ा अच्छा नतीजा निकाला कि दरअसल हाथी नहीं ये एक विचित्र जानवर है जो चारों तरफ से सिर्फ खाता ही खाता है।

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सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

सेकुलरवादी दल आई.एस.आई के एजेंट?

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके। ।

पिछले 27 अक्टूबर को पटना में आयोजित भाजपा की विशाल रैली जिसमें लगभग 5 से 6 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था इस दौरान पटना के रेलवे स्टेशन और गांधी मैदान के चारों तरफ सिलसिलेवार सात बम धमाके हुए। इन धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई, जबकि 100 से अधिक लोगों की घायल होन की सूचना मिली। दो लोग मौके से पकड़े जा चुके हैं। बोधगया के बाद बिहार में यह दूसरी और सबसे बड़ी आतंकी घटना है । गांधी मैदान में आयोजित इस विशाल रैली में भाजपा के नेताओं ने यदि थोड़ी सी भी चूक की होती या श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने भाषण में इन विस्फोटों का जिक्र किया होता तो भगदड़ मच जाती और इस भगदड़ में हजारों लोगों की जान पलकों में चली जाती । खैर! हम इस बात के लिए भाजपा नेताओं की दिलेरी और हिम्मत को सलाम करते हैं कि इतनी बड़ी बारदात को आंखों के सामने होते हुए भी मंच छोड़ कर नहीं भागे जैसा की कांग्रेसी सोच रहे हैं। संभवतः सेकुलरवादी दलों की मिलीभगत रही हागी किसी प्रकार इस रैली में भगदड़ मचा दिया जाए और फिर इस भगदड़ के बहाने देश की जनता को गुमराह कर अपनी-अपनी राजनीति रोटी पकाई जा सके।

मुज्जफ्फरनगर दंगों की आग को जिस प्रकार राहुल गांधी ने आग में घी डालने का प्रयास किया और देश के मुसलमानों पर शंका कर उन्हें अपमानित करने का प्रयास किय इससे भी इस बात की पूष्टी हो जाती हैं कि इस देश में सेकुलरवादी दल आईएसआई के एजेंट के रूप में कार्य कर रहें हैं। इंडियन मुजाहिदीन भारत में तेजी से अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा है । उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड में इस संगठन ने काफी सक्रियता से पांव फैलायें हैं। जिसको आंचलिक सेकुलरवादी दलों का संरक्षण भी प्राप्त है। अब कांग्रेसी भी इस संगठन को अपना संरक्षण देने का प्रयास कर आतंकवदियों के साथ सांठगांठ करने का प्रयास कर रही है। मुसलमानों के वोट को लेकर भारत में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है इससे यह तो स्पष्ट हो चुका है कि अब मुसलमानों को काफी सतर्क होने की आवश्यकता है । एक तरफ आईएसआई इनको भारत के खिलाफ भड़काने में लगी है तो दूसरी तरफ सेकुलरवादी दल इनको अपने-अपने पाले में लेने के लिए इनको हिन्दुओं के खिलाफ भडकाने में लगी है। जिसप्रकार इन दिनों राजनैतिक दलो द्वारा वोट की रजनीति के लिए सेकुलरवाद की परिभाषा का अलग-अलग अर्थ लगाया जा रहा है इससे आईएसआई मजबूत ही नहीं उनके समर्थकों का मनोबल भी बढ़ता जा रहा है। मानों ऐसा लग रहा है कि भारत में सेकुलरवादी राजनैतिक दल आईएसआई के पक्षधर बन चुकें है। मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के कारण समस्‍तीपुर, दरभंगा और मधुबनी जिला इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है! यूपी का 'आजमगढ़ मॉड्यूल' की जगह अब 'दरभंगा मॉड्यूल' और 'मधुबनी मॉड्यूल' सक्रिय हो गया है।

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

दागी अध्यादेश: राष्ट्रपति भवन की यात्रा...- शम्भु चौधरी

अचानक से दोपहर दो बजे श्री राहुल गांधी को प्रसव पीढ़ा होने लगी कि देश की सभी पार्टियाँ दागियों का बचाव करती है अतः इस अध्यादेश को फाड़कर फैंक देना चाहिए । इस बात को मीडिया के सामने कहते हुए राहुलजी के बाड़ी लेंग्वेज से यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता थ कि सबकुछ पहले से ही फिक्स था । कांग्रेस पार्टी के तमाम दिग्गजों ने तत्काल यू टर्न ले लिया और उसी प्रेस कांफ्रेंस में श्री अजय माखन ने भी यह एलान भी कर दिया कि राहुल बाबा जो बोलतें हैं वही कांग्रेस पार्टी की जुबान है ।

कोलकाता- 27 सितम्बर’2013

कल रात को जैसे ही राष्ट्रपति भवन से यह खबर सामने आई कि राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने इस सिलसिले में कैबिनेट के तीन मंत्रियों जिनमें कानून मंत्री श्री कपिल सिब्बल, लोकसभा में सदन के नेता और गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे और संसदीय कार्यमंत्री श्री कमलनाथ को तलब किया है । इस अध्यादेश को लेकर राष्ट्रपति जी की नाराजगी छन-छन कर बहार आने लगी । देश के तमाम अखबारों में इस बात की खबर भी छप चुकी कि श्री प्रणब मुखर्जी ने इस बिल को लेकर अपनी कुछ शंकाओं का इजहार इन मंत्रियों के सामने कर दिया है । भले ही इन तीनों काँग्रेसी नेताओं ने इस बात का उजागर ना किया हो पर इनके चेहरे के भाव इस बात की तरफ साफ संकेत दे रहे थे कि इस बिल को लेकर राष्ट्रपति जी की चिंताएं आम होने से पहले या उनके द्वारा इस अध्यादेश को वापस करने से पहले कोई एक दूसरा रास्ता निकाल जाए जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे ।

इस दागी अध्यादेश को लेकर देश भर में विरोध खुल कर सामने आ रहा था । जिसका लाभ सीधे तौर पर भाजपा के खेमे को मिलना तय सा लग रहा था । हांलाकि भाजपा इस दागी बिल को लेकर राज्यसभा में लचिला रूख अपना चुकी है। जिस प्रकार भाजपा ने पिछले दिनों लोकपाल बिल या सूचना के अधिकार में राजनीति पार्टियों द्वारा जानकारी देने के मामले से जूड़े बिल या खाद्य सुरक्षा का बिल हो सभी मामलों में अपने चरित्र के अनुसार दोगली बातें करती रही है ने इस बिल पर भी कल शाम राष्ट्रपति महोदय से मिलकर अपना प्रतिवाद जताते हुए महामहिम से इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर ना करने का अनुरोध की थी ।

मौका अच्छा था देश के करोड़ों लोगों की भावना से जुड़ा मुद्दा भी था । दागियों को बचाने के प्रश्न पर जब ये खुद को असफल होते नजर आए तो इन्होंने इस मुद्दे का राजनैतिक लाभ लेने के लिए एक मास्टर प्लान बनाया जिस प्लान की भूमिका बनी कांग्रेस पार्टी के दफ्तर में दोपहर होते-होते यह तय कर लिया कि इस अध्यादेश का राजनीति लाभ लेने के लिए राहुल गांधी को ठीक राष्ट्रपति जी के विचारों के अनुसार जनता के सामने प्रस्तुत किया जाए ताकी श्री राहुल गांधी रातों-रात देश के हीरो बनकर जनता के सामने उभर सके ।

आज दोपहर को इस प्लान को सभी कांग्रेसियों ने मंजूरी प्रदान कर दी और अचानक से दोपहर दो बजे श्री राहुल गांधी को प्रसव पीढ़ा होने लगी कि देश की सभी पार्टियाँ दागियों का बचाव करती है अतः इस अध्यादेश को फाड़कर फैंक देना चाहिए । इस बात को मीडिया के सामने कहते हुए राहुलजी के बाड़ी लेंग्वेज से यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता थ कि सबकुछ पहले से ही फिक्स था । कांग्रेस पार्टी के तमाम दिग्गजों ने तत्काल यू टर्न ले लिया और उसी प्रेस कांफ्रेंस में श्री अजय माखन ने भी यह एलान भी कर दिया कि राहुल बाबा जो बोलतें हैं वही कांग्रेस पार्टी की जुबान है । चलो राहुल बाबा को इससे चुनावी फायदा होगा कि नहीं यह तो वक्त हा बता पायेगा हाँ! उच्चतम न्यायलय के लिए एक शुभ संदेश तो अवश्य है कि उनके विचारों का गला अभी नहीं घोंटा जा सका है । संसद को अपवित्र करने की साज़िश का जिस प्रकार पर्दाफ़ाश हुआ है इससे सभी कांग्रेसियों को यह तो आभास हो गया होगा कि सक्रिय राजनीति से अलग कर श्री प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन में भेजना उनके लिए कितना मंहगा हो चुका है।-