रविवार, 19 मई 2019

‘‘एक्जिट पोल’’ - अपना-अपना तुका


 ‘‘एक्जिट पोल’’ - अपना-अपना तुका 
अंततः दुनिया के विशाल लोकतंत्र का चुनाव सात चरणों में कुल मिलाकर शांतिपूर्ण ढंग से निपट गया। इसके साथ ही चुनाव आयोग में भी मतभेद सामने आ गये कि यहाँ भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा । इसके पूर्व में आरबीआई में भी यह घटना घट चुकी है। देश के सर्वोच्च अदालत के चार जजों ने प्रेस के सामने आकर देश को चेताया कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। फिर सीबीआई की घटना जगजाहिर है। कहने का अभिप्रायः है कि कुछ तो गड़गड़ है जो देश के लोकतंत्र को भीतर ही भीतर खाये जा रहा है।

आज जैसे ही चुनाव समाप्त हुआ देश की गोदी मीडिया अपनी-अपनी दुकान सजा कर बैठ गये कोई उत्तरप्रदेश में भाजपा को 57-58 सीटें देकर दिल्ली में मोदी की सरकार बनावा रहा था तो कोई बसपा-सपा को 57-58 सीटें बांट रहा था इनके चुनावी सर्वेक्षण की बात करें तो बंगाल में एक गोदी मीडिया भाजपा को 18 से 23 सीटें देकर उत्तरप्रदेश की भरपाई करते दिख रहा था । ये सभी आंकडे एक दूसरे से इतने विपरीत नजर आ रहे थे कि इनका कूल अंतर 90 से 98 सीटों के बीच का देखा जा रहा था । इंडिया टीवी और सीएनएस के सर्वे में एनडीए को 300, न्यूज24 और चाणक्य के एग्जिट पोल में एनडीए 350 (+/-14), इंडिया टुडे और एक्सिस के सर्वे में एनडीए को 339 से 365, सीएनएन और आईपीएसओएस के सर्वे में एनडीए को 336, व एबीपी और एसी निल्सन के सर्वे में एनडीए को 267 सीटें मिलने की बात बता रहें हैं। 
इनकी बातों में ही अंतर इतना बड़ा है कि किस पर भरोसा किया जाए किस पर नहीं यह सोचने की बात है। यानि कि एनडीए को 267 से 365 के बीच सीटें मिल रही है। अर्थात इनकी बातों का ना तो आपस में सिर मिल रहा है ना पैर। सबके सब तुका लगा दिये कि बस जो लह गया तो लह गया, नहीं लहा तो कुछ दिन मुंह छुपा लेगें। जबकि दक्षिण भारत के इनके ही आंकड़े बता रहें हैं कि उन राज्यों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन रहा है। यानि कि कांग्रेस को फायदा होने की संभावना यही गोदी मीडिया जता रही है। उत्तरप्रदेश में एनडीए को नुकसान और अन्य सभी राज्यों में सिर्फ बंगाल और ओडिशा को छोड़कर कुछ ना कुछ नुकसान भले ही वे एक-दो सीटों का ही हो रहा है।  गोदी मीडिया खुद मान रही है । 
इनके गणित का एक पेंच आप देखें कि जैसे ही एनडीए को कोई बड़ा नुकसान होता दिखता है तो उसे तत्काल किसी अन्य राज्य से भरपाई कर दे रहें हैं  । जैसे उत्तरप्रदेश में 20-25 सीटें कम हो रही है तो उसे बंगाल से, 40 से 50 सीटें कम हो रही है तो बंगाल, ओडिशा से और 50-55 सीटों का अंतर आते ही उसे महाराष्ट्र व बिहार से भरपाई कर दे रहे थे। जो भी हो असली परिणाम तो 23 तारीख को ही आने हैं पर एक बात साफ हो गई कि इन ‘‘एक्जिट पोल’’ में झूठ के अलावा कुछ भी नहीं है। सब अपना-अपना तुका चला रहे थे। इन लोगों ने जो धन लिया था उसे ब्याज सहित लौटा रहे थे और सबसे पहले कौन कितना वफादार है यह जता रहे थे। जयहिन्द ।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  

बुधवार, 15 मई 2019

17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग

17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग
"2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था।  जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे"
17वीं लोकसभा के सातवें और अंतिम चरण का चुनाव आगामी रविवार को शेष 59 सीटों के लिय मतदान होने जा रहा है इसके साथ ही चुनाव आयोग का चेहरा भी ‘मोदी रडार’  से साफ-साफ दिखने लगा कि किस प्रकार चुनाव में मोदी का सहयोग कर रहा है ‘चुनाव आयोग’ । गुजरात से एक गुंडा बंगाल आकर पैसे के ताकत पर बंगाल में अराजकता फैला जाता है।
‘विद्यासागर’ की मुर्ति को तुड़वा जाता है। बंगााल की संस्कृति पर हमला कर जाता है कोई इसका विरोध करे तो देश के लोकतंत्र पर खतरा पैदा हो जाता है ? देश के सर्वोच्च अदालत ने जब सीधे मोदी सरकार पर हमला किया कि ‘‘देश के लोकतंत्र को खतरा पैदा हो चुका है’’ तब दिल्ली के तथाकथित बिकाऊ मीडिया हाऊसेस की जुबान को लकवा मार गया था? जब आरबीआई पर हमला हुआ, जब सीबीआई को पंगु बना दिया गया, जब चुनाव आयोग को भ्रष्ट अफिसरों से भर दिया गया तब इनका लोकतंत्र किस महखने में ‘स’राब की बोतलें खोल रहा था? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को तबायतों का अड्डा बना देने वाले मीडिया हाऊस खुद को लोकतंत्र का रक्षक मानते हैं पर इनकी हरकतें तो बताती है ये लोकतंत्र के भक्षक हैं । भाजपा का चरित्र तो दिल्ली के चुनाव में सड़क-सड़क पर चर्चा का विषय बना हुआ है कि किस प्रकार ये लोग किसी महिला के लेकर कितने नीचे स्तर तक गिर सकते हैं। कोई यही बात इनकी महिला नेताओं को लेकर करे तब? सत्ता के लोभ ने इनके स्तर को इतना नंगा कर दिया कि अब ‘शरम’ भी इनसे ‘शरमा’ जायेगी । असभ्यता और अनैतिकता इनके खुन में रमा-रचा-बसा है कोलोस्ट्रोल की परतें जम गई है इनके खुन में जो-जो पाप 70 साल में नहीं देखे आज की युवा पीढ़ी यह सब देख-सुन व सीख रही है ।
खैर ! अब परिणामों के घनघोर बादल छटने लगे हैं। इसबार के चुनाव में भाजपा ने कई बार अपनी रणनीतिओं में बदलाव किया कभी ‘‘राम मंदिर’’ को भुनाने का प्रयास किया गया, जब इस पर बात नहीं बनती दिखी तो, पांच साल किसानों को ठगती रही मोदी सरकार ने ठीक चुनाव से पूर्व जल्दीबाजी में अपने अंतिम बजट में दस हजार किसानों को 2000-2000/- खैरात में बांटे । पांच साल व्यापारियों को कंकाल बना देने के बाद उन्हें आयकर में 12,500/- का प्रलोभन देने का काम किया गया जो आंख में धूल झौंकने के बराबर है क्योंकि 5 लाख से ऊपर आय के होते ही यह छुट गायब हो जाती है। फिर भी इनको लगा कि इससे भी बात नहीं बनी तो जैसा सभी अनुमान लगा रहे थे कि मोदी जी चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान पर हमला भी कर सकते हैं कुछ ऐसा ही किया भी गया और राहुल की तरह, मोदीजी को भी पिछली कांग्रेस सरकार की तरह सर्वशक्तिमान नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा । विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के तकतवार नेता को अचानक से इन कलपुर्जे की क्या जरूरत आ पड़ी। जब मोदी जी इतना काम किये हैं कि पिछले 70 सालों में कभी हुआ ही नहीं जैसा कि इनके घोषणा पत्र में कहा गया है तो फिर ऐन चुनाव के वक्त यह छल-प्रपंच किसके लिए किये गये?
इस बीच विपक्ष लगातार मोदी के पिछले पांच सालों के कार्याकाल व तमाम संवैधानिक संस्थाओं को लेकर शोर मचा ही रहा था, वहीं राहुल गांधी ‘राफेल’ के मुद्दे को किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं थे। लगातार ‘‘चौकीदार चोर है’’ बोल-बोल कर मोदी पर प्रहार किये जा रहे थे । 
2019 के चुनाव में भाजपा की रणनीति में तीन बार बदलाव लाया गया। पहले इनका नारा बड़े-बड़े विज्ञापनों से यह प्रचारित किया गया कि ‘‘नामुमकिन अब मुमकिन है’’  फिर इसमें मोदीजी का नाम जोड़ा गया ‘‘ मोदी है तो मुमकिन है’’ यह बताने का प्रयास किया गया कि मोदी के आने से वह काम हुआ जो कभी नहीं हो सका था पर जैसे ही इस नारे का उल्टा अर्थ सामने आने लगा तो अचानक से मोदी ने ‘‘मैं भी चौकीदार’’ से कांग्रेस पर पलटवार करना चाहा। यानि 'राहुल' का वार सही जगह जाकर लग चुका था। मोदी अपनी सारी रणनीति भूलकर खुद 'चौकीदार' के एजेंडे में उलझ गये और साथ ही अपनी पूरी टीम को भी उसमें उलझा डाले। इसे पत्रकारिता में ‘‘बुलेट एजेंडा सेटिंग’’ बोला जाता है जो सीधे सामने वाले के मस्तिष्क में जाकर अटेक करता है। किसी ने उन्हें ज्ञान दिया कि इससे आप ‘राफेल’ के मुद्दे को ही खुद जनता के बीच ले जा रहें हैं तो रातों-रात मोदी की पार्टी ने फिर अपने नारे में बदलाव कर दिया ‘‘फिर एक बार मोदी सरकार’’  जबकि पिछले 2014 के लोकसभा के चुनाव में मोदी पार्टी के कई नारे थे जिसमें - बहुत हुई मंहगाई की मार- अबकी बार मोदी सरकार’’ , ‘‘अच्छे दिन आने वाले हैं।’’ ‘‘हर-हर मोदी-घर-घर मोदी’’  आप एक नजर नारों के इस गणित को ही देखें । 
2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था।  जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे। कभी कुछ, कभी कुछ कह डालते हैं जो स्वतः विवाद पैदा कर देती है। कहने का अर्थ है कि 2019 के चुनाव में मोदीजी ना तो पिछले पांच सालों की सफलता पर कोई बात कह पा रहे थे ना ही  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही मोदीजी के कार्यकाल की सफलता पर कोई चर्चा कर रहें थे। 

हां! भाजपा के घोषणा पत्र में मोदी सरकार के कार्यों की चर्चा जरूर की गई है ‘‘संकल्पित भारत - सशक्त भारत’’ के नाम से 2019 का भाजपा के संकल पत्र में लिखा है कि ‘‘कोई एक सरकार बीस साल तक चलती है तो एक-दो ऐतिहासिक निर्णय लेती है। श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पांच वर्षों में अनेक ऐसे निर्णय लिये हैं, जो ऐतिहासिक और आमूलचूल बदलाव को मूर्त रूप देने वाले हैं । स्वच्छता आंदोलन, उज्जवला योजना, सौभाग्य योजना, नोटबंदी, जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, हर घर बजली, 2.5 करोड़ से ज्यादा परिवारों को आवास तथा पचास करोड़ लोगों को मुफ्त चिकित्सा देने के लिए आयुष्मान भारत योजना और 14 करोड़ लोगों को मुद्रा लोन के तहत ऋण जैसे अनेक ऐसे कार्य हैं, जो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने करना तो दूर, कभी सोचा तक नहीं ।’’ 
अर्थात चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र में कही गई बातों की कोई चर्चा नहीं हो रही थी, ना ही भाजपा का यह संकल्प पत्र को आम जनता पढ़ पा रही थी।  जनता तो मोदीजी और अमित शाह के आये दिन के भाषणों  के टेप गोदी मीडिया के माध्यम से ही सुन व पढ़ रही थी जिसमें सिवा हिन्दू खतरे में है को छोड़कर कोई नई बात थी तो "डाक्टर मोदी जी" का तीसरा ज्ञान ‘‘नाले के गेस पैदा करने से "रडार ज्ञान" तक, डिजिटल कैमरा से लेकर ई-मेल ज्ञान’’ मानों देश की युवाओं को वह यह बता रहे हैं जो दादी मां अपने बच्चों को कैसे बहला फुसला के खाना खिला देती थी। मोदीजी के संकल्प घोषणा पत्र में एक नजर उसके आंकड़ों पर देखें तो 66.5 करोड़ देश की आबादी को मोदी की तमाम योजनाओं से सीधे लाभ पंहुचा है। यानि कि लगभग देश की आधी आबादी को मोदी सरकार ने सीधे लाभ पंहुचा है। वहीं 10 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 2000/- रुपये ठीक चुनाव से पहले जमा करा कर लगभग 75.5 करोड़ लोगों को सीधे लाभ दिया गया । इस प्रकार देखा जाए तो मोदी सरकार ने कुल 90 करोड़ मतदाताओं में से 75 करोड़ मतदाताओं को जो कुल मतदाताओं का 83% होता है को तो सीधे मोदी सरकार से लाभ मिला है तो फिर उनको अपने कामों पर वोट ना मांगना, समझ से परे है।  कभी सेना का नाम पर, तो कहीं राम के नाम पर तो कभीं नेहरू, राजीव गांधी को अपमानित कर, तो कहीं विद्यासागर जी की मुर्ति को खंडित कर, कहीं हिन्दुओं को भड़का कर, तो कहीं पुलमावा के शहीदों के नाम वोट करने का प्रथम युवा मतदाताओं से आह्वान कर, तरह-तरह की बात, जगह-जगह, अलग-अलग बात करते देखे गए। इसके साथ ही गोदी मीडिया साथ-साथ अपनी ताकत झौंके हुए है। 

मुझे एक बात अभी तक समझ में नहीं आ रही जब मोदी सरकार की इतनी सफलता है तो उनको अपने कामों पर वोट ना मांगते देखकर घोर आश्चर्य भी हो रहा है और इनके रणनीतिकारों के दिवालियापन पर अफसोस भी । ऊपर मैंने इनके नारे के फर्क की बात की, फिर इनके घोषणा पत्र की बात की अब तीसरे भाग में कुछ चुनावी अंकगणित पर भी चर्चा कर लेते हैं।

2014 में पांच राज्यों प्रमुख राज्यों जिसमें उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तिसगढ़ और बिहार जो भाजपा का गढ़ माने जाते थे जिसमें पिछले लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने उत्तरप्रदेश में 41.3% वोट प्रतिशत शेयर के साथ में 80 में 71 सीटें,  राजस्थान में 54.9% वोट प्रतिशत शेयर के साथ में 25 में 25 सीटें , मध्यप्रदेश में 54% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 29 में 27 सीटें, छत्तिसगढ़ में  में 48.7% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 11 में 10 सीटें और बिहार में वर्तमान यूपीए गठबंधन को 51.6% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 40 में 30 सीटें आज इनके पास है। यानि की इन पांच राज्यों में ही भाजपा को 163 सीटें मिली थी। जो 2019 के चुनाव में उत्तरप्रदेश में वोट प्रतिशत घटकर 35% वोट प्रतिशत के नीचे घिसने का अनुमान लगाया जा रहा है इसके प्रमुख कारण है - योगी सरकार से ब्राहमणों की बड़ी नाराजगी वहीं मोदी सरकार की नोटबंदी व जीएसटी से परेशान बुनकर उद्योग का कमजोर तबका खासा नाराज दिख रहा है। जबकि 2014 में ‘‘मोदी लहर’’ में बाबजूद बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी को 41.8% वोट प्रतिशत शेयर प्राप्त हुए थे।  यह ‘‘मोदी लहर’’ जैसा कि सबने 2014 में देखा और अनुभव भी किया था आज किसी भी रूप में यह कोई ‘मोदी लहर’ यूपी में नहीं है। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ़ में भाजपा की सरकार चले जाने से वहां भी लोकसभा के चुनाव के वे सम्मीकरण जो 2014 में थे गड़बड़ाये हुए हैं। अर्थात कि उत्तर प्रदेश में 10%  और इन तीनों राज्यों - राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ़ में 7% से 10% वोट शेयर प्रतिशत में गिरावट का अंदाज आंका जा रहा है। 
वहीं बिहार की बात ले लें तो, इस बार बिहार में लोजपा और नितीश की सरकार से लोगों को नाराज साफ देखा जा रहा है जो नितीश कुमार के चेहरे से भी साफ झलक रहा है। कहने का अभिप्रायः यह है कि बिहार में भी भाजपा 2014 के मुकाबले उतनी मजबूत नहीं दिखाई पड़ रही है।  अर्थात इन पांच राज्यों में कुछ न कुछ खोना निश्चित है । जो लगभग 80 सीटों के आसपास माना जा रहा है । 
अब महाराष्ट्र, गुजरात में भी भाजपा को कुछ नुकसान तो जरूर होगा यह नुकसान दोनों राज्यों में मिलाकर 10 सीटों के आसपास से रहेगी।  इसी प्रकार भाजपा को अन्य राज्यों में जैसे दिल्ली, कर्नाटका, झारखंड, हरियाणा और असम में भी हानि के संकेत मिल रहे है। कुल अनुमान के अनुसार इसबार भाजपा को पिछले चुनाव परिणाम से लगभग 100 सीटों का भारी नुकसान का आंकलन साफ दिख रहा है जिसकी भरपाई बंगाल व ओडिशा से कदापी संभव नहीं हो सकता यदि अमित शाह की बात भी मान ली जाए तो तब भी  बंगाल की कुल 42 सीटें, ओडिशा की कुल 21 सीटें और त्रिपुरा की दो सीटों में आधी भी भाजपा को दे दी जाए यानि कि 65 सीटों में 30-32 सीटें भी भाजपा के खातें में जोड़ भी दी जाए जो एक काल्पनिक बात है तब भी भाजपा को बहुमत से 70 सीटें कम रहेगी। जो ना तो अखिलेश - मायावती की जोड़ी पूरी कर सकती है ना ही शरद पवार और ममता की जोड़ी । जयहिंद !

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

शनिवार, 11 मई 2019

न्यू मीडिया: भारत में लोकतंत्र की नई किरण

न्यू मीडिया: भारत में लोकतंत्र की नई किरण
न्यू मीडिया का यह प्रयोग कम लागत में कोई भी शुरू कर सकता है बस उसके अंदर कार्य करने का ज़ज़्बा होना चाहिये जो सत्य के साथ अपने विचारों को आज भी बिना की किसी ख़ौफ़ और डर के रख सके।  भारत में लोकतंत्र की नई किरण देखने में  भले ही आज छोटी लगती हो पर जब चारों तरफ बाढ़ आ जाती है तो लोग खुद को बचाने के लिये अपने साथ एक दीया साथ रख लेते हैं जो रात के अंधेरे में ही उनके जिंदा रहने का सबूत दुनिया को बता देती है। 

आज "यू ट्यूब" टी.वी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अच्छा विकल्प बनता जा रहा है वह भी ऐसे समय में जब देश की अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किसी न किसी राजनीति विचारधारा से प्रभावित नजर आती है।  पिछले दिनों चुनाव के दौरान बिहार की एक चुनावी सभा में कन्हैया कुमार ने जैसे ही कहा कि आप टीवी चैनल देखते हैं? उनका इशारा ‘‘गोदी मीडिया’’ की तरफ था। बस इतना ही कहना था कि चारों तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी । कहने का अभिप्राय यह है कि देश की आम जनता इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी है कि इन मीडिया हाऊसेस ने अपनी साख खो दी है। कम-ओ-वेस यही हाल समाचार पत्रों का भी होते जा रहा है । लोगों का इन समाचार पत्रों से भी विश्वास हटते जा रहा है जो खुद को एक समय लोकतंत्र का चौथा प्रहरी मानते थे आज ये लोग खुद को सत्ता का दलाल बना चुके हैं । 
वहीं दूसरी तरफ "यू ट्यूब"  की तरफ जनता का झुकाव पैदा हो जाना किसी नये संकेत की तरफ इशारा तो नहीं कर रहा है कि आने वाले दिनों में करोड़ों रुपये से संचालित होने वाले समाचार हाऊस के दिन लदने वाले हैं? यह बात यहीं नहीं ठहर रही है "यू ट्यूब" की बढ़ती मांग के साथ-साथ इंटरनेट पर संचारित होने वाली वेब पत्रिकाएँ जैसे भड़ास4मीडिया पोर्टल के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह, विनोद दुआ द्वारा "द वायर" आशुतोष के द्वारा "सत्य हिन्दी डाट कॉम", पुण्य प्रसून वाजपेयी के द्वारा यू ट्यूब पर धारावाहिक आना,  "स्वराज एक्सप्रेस",  अभिजात शर्मा के द्वारा ‘‘न्यूज चक्र’’  आज देश के राष्ट्रीय पटल पर अपना स्थान बना चुके हैं।

इनके दर्शकों की संख्या तेजी से बढ़ते जा रही है जो एक लाख से 50 लाख के बीच देखी जा रही है । इन "यू ट्यूब" या वेब पोर्टलों का तेजी से फैलाव इस बात का भी प्रमाण है कि जनता को उन चापलुस पत्रकारों की बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं रहा, उनको लगता है कि ये पत्रकार झूठ परोस रहें हैं और भ्रम फैला रहें हैं। इन यू ट्यूब या वेब पोर्टलों का चंद समय में ही लोकप्रिय हो जाना, आपातकाल की याद दिला देती है जब तमाम समाचार पत्रों ने श्रीमती इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये के सामने घुटने टेक दिये थे तब गली मौहल्ले व पान-चाय की दुकानों पर लोग लंबी लाइनों में खड़ा होकर बीबीसी सुनने लगते थे। स्व. रामनाथ गोयनका को आज भी इसी के कारण याद किया जाता है कारण कि वे एक मात्र उस दौर के संपादक थे जिन्होंने जयप्रकाश नारायणजी का खुल के साथ दिया और श्रीमती गांधी के सामने घुटने टेकने से साफ इंकार कर दिया था।

सनु 2014 के बाद का यह संक्रमण काल जिसमें टी.वी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समाचारों में झूठ का समावेश जिस तेजी से बढ़ा है यह भले ही इनके टीआरपी को एक समय के लिये बढ़ा दे पर इनका अंत निश्चित है। क्योंकि कोई भी प्रत्रकार कितना भी समय की चपेट में आकर वह अपने विचारों को छोड़ दे, खुद की आत्मा को गिरवी रख दे, पर वह अंदर ही अंदर घुटता रहेगा जब तक वह सच बोल नहीं लेता। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता तो वह पत्रकार है ही नहीं।

आज रवीश कुमार को लोग पलक झपकते ही सुनने को लोग ऐसे ही बेताब नहीं रहते, कारण साफ है रवीश कुमार सीधे जनता के मुद्दों से खुद को जोड़े रखने में देश के तमाम टीवी ऐंकरों से काफी आगे निकल चुके हैं। भले ही इसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत रही हो, पर समाचारों को संपादित करने में उनकी मेहनत साफ झलकती है, जो पुण्य प्रसून वाजपेयी के संपादन में भी झलकती है के अलावा किसी दूसरे ऐंकरों के संपादन में नहीं झलकती, लगता है वे किसी रोबोट की तरह समाचार के वाचक बनकर उतना भर ही बोल पाते हैं जितना उनकी खोपड़ी में भरा जाता है। यानि कि वे व्यक्ति न रह कर एक मशीन की तरह आते हैं और एंकरिंग कर के घर में टंगी अपनी खोपड़ी को पुनः सर पर लगा लेते हैं।
"यू ट्यूब" या वेब पोर्टलों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर वैसे तो कई और भी चैनलों  या वेब पोर्टल की भरमार देखी जा सकती है पर उनकी विश्वनियता पर उतना भरोसा नहीं किया जा सकता । साथ ही ऐसा नहीं है कि ये पारंपरिक  इलेक्ट्रॉनिक  मीडिया "यू ट्यूब" या वेब पोर्टलों पर नहीं हैं पर उनकी साख समाप्त हो जाने के कारण उनकी पहचान भी भीड़ में खो चुकी है यहाँ इस बात का जिक्र भी करना जरूरी समझता हूँ कि जिस प्रकार बेगूसराय लोकसभा चुनाव में कन्हैया कुमार ने "यू ट्यूब" इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रयोग कर अपने चुनाव का प्रचार किया और दुनिया भर के समाचार पटल पर चंद दिनों में ही छा गये यह भी किसी नये सुबह होने का संकेत दे रही है।
न्यू मीडिया का यह प्रयोग कम लागत में कोई भी शुरू कर सकता है बस उसके अंदर कार्य करने का ज़ज़्बा होना चाहिये जो सत्य के साथ अपने विचारों को आज भी बिना की किसी ख़ौफ़ और डर के रख सके।

भारत में लोकतंत्र की नई किरण देखने में  भले ही आज छोटी लगती हो पर जब चारों तरफ बाढ़ आ जाती है तो लोग खुद को बचाने के लिये अपने साथ एक दीया साथ रख लेते हैं जो रात के अंधेरे में ही उनके जिंदा रहने का सबूत दुनिया को बता देती है। जयहिन्द!

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

राफेल: खतरा ही खतरा

राफेल: खतरा ही खतरा
माननीय अदालत को यह तो साफ हो गया कि वे आसानी से  मुक्त नहीं हो सकती । बंद लिफाफे में सुनवाई कर वह बुरी तरह फंस चुकी है जो अदालत के इतिहास में लिखा जा चुका है कि बिना प्रतिपक्ष को सुने बंद लिफाफे में भी वह भी देश की सर्वोच्च अदालत में कोई फैसला हुआ था जो ना सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया के दृष्टि से असंवैधानिक ही नही गलत भी था।  
गत् 10 मई' 2019 को देश की सर्वोच्च अदालत में राफेल मामले की पुनः सुनवाई हुई सर्वोच्च अदालत बंद लिफाफे की राजनीति में इस कदर फंस चुकी है कि अब उससे निकलना ठीक उसी प्रकार है जैसे गले की हड्डी ना खाये बनती है ना निकाले बनती है।  माननीय अदालत को यह तो साफ हो गया कि वे आसानी से  मुक्त नहीं हो सकती । बंद लिफाफे में सुनवाई कर वह बुरी तरह फंस चुकी है जो अदालत के इतिहास में लिखा जा चुका है कि बिना प्रतिपक्ष को सुने बंद लिफाफे में भी वह भी देश की सर्वोच्च अदालत में कोई फैसला हुआ था जो ना सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया के दृष्टि से असंवैधानिक ही नही गलत भी था। अब इसकी सुनावाई के दो पहलु है पहला सरकार खुद को निर्दोष मानती है । दूसरा सरकार ही अब उसी अदालत को ब्लैकमेल करेगी और कल की अदालत में ऐसा ही हुआ जहाँ सरकारी वकील ने सीधे-सीधे तीन जजों की बेंच की धमकी ही दे डाली कि उनके दायरे में ही नहीं कि व देश की सुरक्षा के मामले में कोई सुनवाई कर सकें। तब सवाल उठता है कि जब सरकार को इसी अदालत से क्लिनचीट की जरूरत ही क्या थी? जब इस अदालत के दायरे में ही नहीं कि वह इस सौदे की जांच कर सके।

आपने ओसामा बिन लादेन या सद्दाम हुसैन का नाम सुना तो सुना होगा। नहीं सुना है तो आज इसके बारे में सुन लें यह वे ताकतवर लोगा थे जिनका सभी अपराध इस्लाम के नाम पर होता था। उनके ऊपर कोई भी हमला होता तो वे एक ही बात कहते कि ‘‘इस्लाम को खतरा है’’ या ‘‘इस्लाम पर हमला हो गया’’ यही बात जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है तबसे किसी न किसी बहाने से मोदी जी, अमित शाह, योगीजी व इनके तमात छुट भईया नेतागण, मोदी भक्त और गोदी मीडिया को दिनभर यही बात करते दिखाई देती है ‘‘हिन्दू खतरे में है’’  ‘‘हिन्दू धर्म असुरक्षित है’’ या फिर देश की सुरक्षा खतरे में है।  अब कल की ही बात ले लें, भारत के अटार्नी जनरल (महान्यायवादी) के.के. वेणुगोपाल को भी लगता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में आ जायेगी। उच्चतम अदालत में यही गुहार लगाते हैं कि ‘‘यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। दुनिया की कोई अन्य अदालत इस तरह के तर्कों पर रक्षा सौदे की जांच नहीं करेगी’’ अटार्नी जनरल ने उच्चतम अदालत को चेतावनी देते हुए कहा कि यह एक रक्षा सौदा है मसलन देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है, तकनीकी मामला है जिसे आसानी से समीक्षा करने  नहीं दिया जायेगा। कहने का अभिप्रायः यह था कि मोदी की सरकार के पास खतरा ही खतरा है जिसकी सुरक्षा में वे दिन-रात विदेशों के चक्कर लगाकर करते रहते हैं। कभी छुपकर पाकिस्तान जाते हैं तो कभी पाकिस्तानियों से पाठानकोठ हमले की जांच करवा के देश की रक्षा करते है। 
खैर राफेल पर पुनः आतें हैं -
अदालत में जिन बातों पर दलीलों दी गई उनमें प्रशांत भूषण ने कहा कि - 
  1. यह निर्णय (14 दिसंबर का निर्णय) सरकार द्वारा आपूर्ति किए गए गलत और अधूरे तथ्यों पर आधारित है।
  2.  समझौते दस्तावेज से ‘‘मानक भ्रष्टाचार विरोधी खंड’’ को क्यों हटाया गया? क्या किसी अपराधी क्रिया को अंजाम दिया जाना था?
  3.  सरकार ने निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में कोर्ट को पूरी जानकारी नहीं दी है।
  4.  बेंचमार्क की कीमत 5 बिलियन यूरो तय की गई थी, लेकिन अंतिम सौदे में बेंचमार्क के ऊपर कीमत 55.6% बढ़ गई।
  5.  INT के सदस्यों की आपत्तियों के बावजूद (Sovereign guarantee clause)  संप्रभु गारंटी खंड को हटा दिया गया था।
  6.  INT के असंतोष तीन सदस्यों के निर्णय को अदालत से छुपाया गया।
  7. सरकारी हलफनामे में, सरकार ने स्वीकार किया कि ‘‘पीएमओ द्वारा निगरानी’’ की जा रही थी। क्या इसे ‘‘समानांतर वार्ता’’ नहीं माना जा सकता?।
  8. इस डील के बाद अंबानी की कंपनी को फ्रांस सरकार की तरफ से ‘कर’  में भारी छूट भी दी गई। जो किसी शक के दायरे में खड़ा करता है। 
जबकि अरुण शौरी ने कहा कि माननीय अदालत का पुर्व निर्णय सरकार द्वारा दिये गये झूठ पर आधारित था, इसलिए इसकी समीक्षा जरूरी है। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलों पर सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है पर इतना तो जरूर है कि अब माननीय उच्चतम अदालत के सामने 'हिन्दू समाचार' में छपे वे नये दस्तावेज हैं जिसे भारत सरकार ने अपने पास छुपा रखा था और एक प्रकार से स्वीकार भी कर लिया है कि ये सभी दस्तावेज जो ‘हिन्दू’ में छपे हैं, सरकारी फाइल की प्रतिकॉपी है। जिसे पीएमओ की निगरानी शब्द से जोड़ दिया गया है। तो यह सवाल उठता है कि सरकार ने क्या पहले संसद और अदालत से झूठ बोला था? कि प्रधानमंत्री जी का इसमें कोई दखल नहीं है, क्या रक्षा मंत्री का संसद में दिया गया बयान झूठ पर आधारित था जैसा कि नये शपथपत्र में सरकार ने स्वीकार किया है कि ‘‘पीएमओ द्वारा निगरानी’’ की जा रही थी। अब यह निगरानी भारत के अटार्नी जनरल वेणुगोपाल को लगता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। भला हो भी क्यों नहीं ?
मोदी सरकार के आने के बाद हर बात को देश की सुरक्षा से जोड़ा जा रहा है। मुफ्ती की सरकार बनाने से लेकर सेना की हत्या करवाने तक, चुनाव में  ‘जवाहरलाल नेहरू’ से लेकर ‘राजीव गांधी’ तक, ‘राम‘ से लेकर ‘जय श्रीराम’ तक, ‘अली’ से लेकर ‘बली’ तक ‘बंदे मातरम्’ से लेकर ‘‘भारत माता की जय’’ तक सब जगह खतरा ही खतरा हो गया। राष्ट्रीय सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है। सब जगह मोदी सेना ‘‘भारत की सुरक्षा’’ में लगी है । मानो हर तरफ भारत की सुरक्षा को खतरा ही खतरा पैदा हो गया इन पांच सालों में। जब इतना खतरा एक साथ पैदा हो गया तो मोदी सरकार कर क्या रही थी ?
जयहिन्द ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

बुधवार, 8 मई 2019

मांछे तेल तिके मांस भाजा होबे

मांछे तेल तिके मांस भाजा होबे 
 बंगाल में एक कहावत है - ‘‘मांछे तेल तिके मांस भाजा होबे’’ कहने का अभिप्राय है कि पत्रकारों को उसकी कमज़ोरी से मारा जाए। जो पत्रकार पैसे से बिक जायेगा उसे पैसे से खरीद लिया जाता है, जो नहीं बिके उसे धमकाया या उसके मालिकों को डराया जाता है। विज्ञापन का प्रलोभन या उसे हटा देने की धमकी से मीडिया हाउस ना सिर्फ परेशान हो चुकी है लाचार भी है।


पिछली कांग्रेस की सरकार में एक बात थी कि इनके नेता बार-बार एक ही बात की धमकी देते थे कि ‘‘वे चुन कर आयें हैं ’’ उनका यही अहंकार कांग्रेस पार्टी को ले डूबा। आज वही कांग्रेस पार्टी चुनावी समर में हाथ-पांव मार रही है खुद को बचाने की जद्दोजहद में लगी है। जो एक समय इस अहंकार में दंभ भरते थे वे आज हासिये पर खड़ें हैं। आज वहीं हाल भाजपा के नेताओं का हो चला है। बात-बात में गाली देना, धमकाना, गौरी लंकेश का उदाहरण देना व मानहानि का मुकदमा कर देना इनके दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। इनको पता है कि एक बार मानहानि का मुकदमा फाइल हो जाने के बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में कम से कम पांच साल तो चला ही जायेगा। किसी बात को साबित करने की एक लंबी प्रक्रिया है इतने में तो कमजोर पत्रकार खुद ही मर जायेगा और अंत में झक मार कर खुद घुटने टेक देगा। बंगाल में एक कहावत है - ‘‘मांछे तेल तिके मांस भाजा होबे’’ कहने का अभिप्राय है कि पत्रकारों को उसकी कमज़ोरी से मारा जाए। जो पत्रकार पैसे से बिक जायेगा उसे पैसे से खरीद लिया जाता है, जो नहीं बिके उसे धमकाया या उसके मालिकों को डराया जाता है। विज्ञापन का प्रलोभन या उसे हटा देने की धमकी से मीडिया हाउस ना सिर्फ परेशान हो चुकी है लाचार भी है। भाजपा (मोदी भाजपा) जब किसी पत्रकार को जबाब नहीं दे सकती तो उस पत्रकार को अपने समर्थकों से ना सिर्फ अपमानित करावाती है उसके घर-परिवार के सदस्यों पर भी भद्दे व अपमानित करने वाले शब्दों से प्रहार करती है।  और इसे मीडिया जगत के उस वर्ग की मौन स्वीकृति प्राप्त है । जो इन दिनों खुद को गोदी मीडिया कहलाने में फूलों नहीं समा रहे। यह सिलसिला लगातार जारी है। परन्तु इन सब के बीच एक अच्छी बात लेह से सामने आई -

लेह प्रेस क्लब  (Press Club Leh ) की घटना:  जहां भाजपा के एक नेता के द्वारा पत्रकारों को नगद बांटते दिखाया गया है। जब इसका विरोध किया गया तो प्रेस क्लब को धमकी दी गई कि उसके विरूद्ध मानहानि का मुकदमा किया जायेगा। इसके पूर्व एक दिवालिया संस्थान के मालिक के द्वारा पांच हजार करोड़ का मामला एक पत्रकार पर पहले ही किया जा चुका है। इसी प्रकार के कई मुक़द्दमे की सूची तैयार हो सकती है जो पिछले पांच सालों में सामने आये हैं। अभी राफेल के दस्तावेज़ पर ‘हिन्दू’ समाचार में छपने पर ‘‘समाचार पत्रों पर आपराधिक मुकदमा करने तक की धमकी दी गई थी’’ ख़ुदा न खास्ता कोई कमजोर पत्रकार होता तो मोदी भाजपा अभी तक उस पत्रकार को सूली पर चढ़ा डालती। इनका एक ही लक्ष्य है किसी भी प्रकार से देश की उस व्यवस्था पर प्रहार करना है जो सोचता हो, जो अच्छे-बुरे में अंतर करता हो और सबसे बड़ी बात वह देश के संविधान में विश्वास रखता हो। ना तो वह पत्रकार कभी कांग्रेस का गुलाम था ना आज किसी मोदी भाजपा का ग़ुलाम बनने को तैयार है। जो लोग इस बात का भ्रम फैला रहें है कि इनके पांच सालों के कार्यकाल में ही देश की सुरक्षा हुई  जो इससे पहले कभी नहीं हुई थी यह पांच सालों का सबसे बड़ा ‘झूठ’ है कि इनका ‘सच’ स्वतः इनके ही झूठ से दबकर मर रहा है । इससे बड़े आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है जो व्यक्ति देश की सुरक्षा को वीडियो गेम समझता हो, देश के किसानों की आत्महत्या व सेना की शहादत को एक ही समस्या समझता हो वह देश का प्रधानमंत्री बना रोजना लाखों की नई-नई सूट पहनकर विदेशों के चक्कर लगा रहा है।

यह बात सही है कि पत्रकारों का एक छोटा सा वर्ग ‘गोदी मीडिया’ बन चुका है परन्तु इससे देश के ईमान को  नहीं ख़रीदा जा सकता ना ही गोदी मीडिया का अपना कोई नहीं वजूद है, गिरगिट की तरह ही गोदी मीडिया वक्त बदलते ही अपना रंग बदल लेता है। भारत ने मुगलों का शासन देखा उस दौर में हजारों चारण पैदा लिये जो राजा के गुणगान में कशीदे पढ़ा करते थे पर राणा प्रताप एक ही पैदा हुआ जिसे आज भी देख रहें हैं, अंग्रेजों के शासनकाल में हजारों चापलूसों को उनकी गुलामी करते देखा गया, आज जो लोग राष्ट्रवाद की बात कर रहें हैं उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में कभी ‘‘बंदे मातरम्’’ नहीं गाया, तिरंगे झंडे को लेकर कल तक जो खुद को अपमानित समझते थे, आरएसएस की शाखा में आज भी बंदे मातरम्’’  सुनाई नहीं देता  जिसे (बंदे मातरम्’) सत्ता में आने के लिए अपना हथियार बना के देश के लोगों को मुर्ख बनाने चले हैं। आज का यह गाना ‘‘एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग’’ यदि रावण के काल में लिखा व गाया, गया होता तो तब का रावण इस गाने को लिखने, सुनने वाले, फिल्मानेवाले, चित्रकार, कलाकार, सबको फाँसी पर लटका दिया होता। गणिमत है की भारत का संविधान इनके आड़े हाथों बीच में रोड़ा अटकाये खड़ा है नहीं तो अब तक सच लिखने व बोलने के जुर्म में कई पत्रकारों को फाँसी के फंदे पर लटका दिया गया होता ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  

शुक्रवार, 3 मई 2019

मुद्दा विहीन चुनाव-2019

निहारिका, एम.ए (मास कॉमनिकेशन)


सब बस एक-दूसरों पर व्यक्तिगत हमला करने से भी नहीं चूक रहें हैं। नेताओं और उम्मीदवारों की भाषा-शैली निम्न स्तर की होती जा रही है । उनके भाषण का स्तर हास्यप्रद हो राह है। यानी एक सटीक वाक्य में कहा जाए तो इस बार का लोकसभा चुनाव 2019 एक  ‘‘मुद्दा विहिन’’ चुनाव  के रूप में जनमत में देखा जा रहा है। एक प्रकार से इसे अनौपचारिक रूप से जनता के विश्वास के साथ धोखा है।
निहारिका
'चुनाव' लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंग है।  यह प्रक्रिया लोकतंत्र को अतिमजबूत तब बनाती हैं जब चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्षता पूर्वक संपन्न की जाती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा सशक्त लोकतंत्र है, तब यहाँ आम चुनावों को सम्पन्न कराना भी  बहुत ही कठिन व चुनौतीपूर्ण कार्य तो  है, किंतु यह यहां एक माहपर्व के रूप में या  लोकतंत्र के सबसे बड़े त्योहार के रूप में इसे मनाया जाता है। इसलिए इस  चुनावी महापर्व को सफल बनाना एवं  शांति व सौहार्द्धपूर्वक पूर्ण करना सबकी जबाबदेही है। इसके लिये चुनाव आचार संहिता का सख़्ती से पालन करना भीअतिआवश्यक होता है। जिससे चुनाव आयोग, मतदाताओं को आकर्षित, प्रभावित और लुभाने वाले अनुचित प्रयासों से बचा सके। ऐसे में सरकारों व राजनीति दलों को यह तय करना होता है कि वे ऐसे कोई भी अनाचार को रोकें, जिससे आचार संहिता का उल्लंघन न हो और चुनावी  माहौल न बिगड़े।

वर्तमान में17वीं लोकसभा का चुनाव के अबतक चार चरणों के मतदान पूरे किये जा चुके हैं एवं तीन चरणों का मतदान होना अभी बाकी है। किंतु इस लोकसभा चुनाव में एक खास बात देखी जा रही है इस बार महत्वपूर्ण मुद्दों से नमस्कार कर लिया गया है। यानी कि मंहगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, गरीबी, नई फसल योंजनाएं, रोजगार, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, किसान एवं कृषि  आदि जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करके सभी  राजनीतिक दलों  के नेतागण एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज, अपशब्द, व्यक्तिगत एवं जातिगत हमला आदि करने में लगे हुए हैं।कोई किसी को मुर्ख कहता है कोई किसी को चोर  किसी को बच्चा कहता है, कोई स्वयं को चौकीदार कह रहा है, कोई किसी खास को तो यह भी कह रहा है कि उसकी पूरी जाति ही चोर व भगौड़ा ह। इसमें  से कोई  कोई भी अपने पूर्व कार्यों को ब्यौरा व रिपोर्ट कार्ड नहीं दिखाता और  न तो आने वाले चुनावी परिणाम के फलस्वरूप उनकी सत्ता आने पर आम जनता के लिए कोई ठोस कदम एवं दूर दृष्टि ही दिखाता है।
सब बस एक-दूसरों पर व्यक्तिगत हमला करने से भी नहीं चूक रहें हैं। नेताओं और उम्मीदवारों की भाषा-शैली निम्न स्तर की होती जा रही है । उनके भाषण का स्तर हास्यप्रद हो राह है। यानी एक सटीक वाक्य में कहा जाए तो इस बार का लोकसभा चुनाव 2019 एक  ‘‘मुद्दा विहिन’’ चुनाव  के रूप में जनमत में देखा जा रहा है।
एक प्रकार से इसे अनौपचारिक रूप से जनता के विश्वास के साथ धोखा है। पिछले चुनाव की बात करें तो  कम से कम या हल्के-फुल्के वादे जैसे काले धन की वापसी, नदियों की स्वच्छता, किसानों को राहत, गरीबों को लाभ देने जैसे फरेबी भाषण व वादे भी सुनने को मिलते थे किन्तु इस सत्रहवें लोकसभा चुनाव में तो इसका भी आभाव दिख रहा है। कहीं-न-कहिं आज के इन हालातों की वजह तथा जिम्मेवार आम जनता व जनमत स्वयं भी है।
वर्तमान में नेताओं, मंत्रियों एवं देश के शीर्ष पदों पर आसीन लोगों व कुछ राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के द्वारा प्रयोग की जानेवाली निम्न स्तर की भाषा शैली, अपशब्द, एवं अभद्र वाक्यों को प्रयोग निकट भविष्य में सवेदनशील एवं चिंताजनक है। इससे विश्वस्तर पर देश की छवि धूमिल होती है। इस विषय पर गहन चिंतन करना आवश्यक है।
निहारिका, एम.ए (मास कॉमनिकेशन)
यह लेख, लेखक के निजी विचार हैं।

गुरुवार, 2 मई 2019

बिकाऊ पत्रकारिता

बिकाऊ पत्रकारिता 
मीडिया हाउस भी यही चाहता है कि जनता उसके दिखाये मार्गों का ही अनुसरण करें, साथ ही ये आपस में भी एक दूसरों को नीचा दिखाने व दिल्ली में किसकी सरकार सत्ता पर काबिज होगी  इसकी हौड़ में लगें हैं । क्या ‘जी-न्यूज’ सत्ता में आयेगा कि ‘आजतक’ ? क्या ‘रजत शर्मा’ की सरकार बनेगी कि ‘अर्नब गोस्वामी’ की?  इसीप्रकार प्रिंट मीडिया में भी दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर इस दौड़ में सबसे आगे की पंक्ति में दिखाई दे रहें हैं। एक’आध को छोड़कर किसी ने भी अपनी ज़िम्मेदारी का सही से निर्वाहन नहीं किया है । सबके सब बिकाऊ पत्रकारिता का हिस्सा बन चुके हैं। 
देशभर में सातवें और अंतिम चरण के चुनाव का नामांकन भरे जा चुके हैं जिसका चुनाव आगामी 19 मई को होने जा रहा है इसके संपन्न होते ही चुनाव आयोग ईवीएम मशीनों से निकलने वाले आंकड़ों का खेल खेलने लगेगी। गोदी मीडिया के डब्बों से भी भर-भर लौटा सीटें निकलने लगेगी। चुनाव में कौन जीतेगा या कौन हारेगा यह तो 23 मई या उसके बाद ही पता चल सकेगा परन्तु गोदी मीडिया यह पहले ही बता देगी कि देश में किस मीडिया हाउस की सरकार बनने जा रही है।
इसबार का चुनाव कई मायने में बहुआयामी और देश के पिछले सभी चुनावों से कुछ हठकर भी है। जहां सत्ताधारी मोदी पार्टी अपने कार्य पर नहीं, सेना की शहादत पर वोट मांग रही है तो वहीं विपक्ष एक सूर में अपनी अलग-अलग ताल ठोक उस गाने को चरितार्थ कर रहा है ‘‘मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा’’  बंगाल में ममता-माकपा-कांग्रेस और दिल्ली में ‘आप’ व कांग्रेस का गठबंधन अंतिम क्षणों तक फाँसी के फंदे पर हिचकोले लेता रहा। कभी हां, कभी ना, होता रहा । वहीं दूसरी तरफ पिछले पांच राज्यों के विधानसभा में सीटों के बँटवारे को लेकर नाराज़ चल रहे अखिलेश व मायावती की जोड़ी ने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को ही किनारे लगा दिया । मोदी को सत्ता से हटाने का अंक गणित जिन आंकड़ों को लेकर विपक्ष चला रहा था वह अंक गणित, चुनाव शुरू होने से पहले ही धराशाही हो गया। सभी पार्टियां अपने जनाधार से कोई समझौता नहीं करना चाहती, सबकी यही इच्छा है कि उसे इतना मिल जाए कि सत्ता की भागीदारी में सौदा अच्छे से किया जा सके। यही हालात भाजपा के साथ भी है जिसमें शिवसेना के उद्धव ठाकरे व लोजपा के रामविलास पासवान बार-बार आँखें तरेर रहे थे। राजनीति दलों का जोड़-घटाव या गुणा-भाग तो समझ में आता है पर मीडिया हाउसेस का नहीं ।
यहां राजनीति पंडितों का यह आकलन भी गौर करने योग्य है कि विपक्ष के पास खोने को कुछ नहीं है जबकि मोदी पार्टी का जनाधार पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव के अनुपात में काफी तेजी से नीचे गिरा है और ‘मोदी लहर’ नामक  कोई चीज 2019 के इस चुनाव में नहीं है जैसा 2014 में था। कुल मिलाकर सभी पक्षों ने यह तो स्वीकार कर ही लिया है कि इस बार के 17वीं लोकसभा के चुनाव में किसी एक दल की सरकार नहीं बनने वाली है। 
साथ ही 17वीं लोकसभा के चुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर तरह-तरह के संदेह पैदा हुए हैं । बड़ी संख्या में ईवीएम मशीनों के खराबी की शिकायतें आती रही। चुनाव संचालन के रूल 49MA की शिकायतों को छुपाया गया, मतदाताओं को डरा कर बहार भगा दिया गया। यह सब चलता रहा, पर एक बात तो साफ हो गई कि जो ईवीएम मशीनें कल तक ठीक थी वे ही मशीनें वीवीपेट के आ जाने के बाद खराब कैसे हो गई? जो किसी गुप्त रहस्य की तरफ इशारा/संकेत करती है कि दाल में कहीं काला तो जरूर है नहीं तो चुनाव आयोग ईवीएम मशीनों में शिकायतें आने के बाद बदली जाने वाली मशीनों के तथ्यों को छुपा क्यों रही है? साफ-साफ इस बात का जिक्र क्यों नहीं कर रही कि इन सभी मशीनों में एक ही तरह की शिकायत ही आ रही है कि वोट जिसे डाला जा रहा है उसे ना जाकर किसी अन्य दल को जा रहा है। जिन मशीनों को खराब बोल कर चुनाव आयोग ने हटा दिया उन मशीनों की कोर्ट की निगरानी में फॉरेंसिंग जांच करानी चाहिये कि मामला आखिर है क्या? 
पुनः जिस प्रकार बनारस में सेना के एक पूर्व सैनिक तेज बहादुर यादव के नामांकन को दबाव में आकर रद्द किया गया स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग की भूमिका संदेह के घेरे में आ चुकी है । दूसरी तरफ भारत की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा घड़ा जो ‘फेक-लहर’ के साथ-साथ इस बार ‘फेक जहर’ भी फैलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है। ये दोनों ही बातें लोकतंत्र के लिये किसी खतरे से कम नहीं है।
17वीं लोकसभा के चुनाव में समाचारों में  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विचारों को जहरीले सांप ने डंस लिया है। हर घटना के पीछे कोई न कोई 'जहर' काम करता दिखाई दे रहा है। चाहे वह देशद्रोही बनाने का 'जहर' हो या फिर 'देश प्रेमी' बनाने का। एक जमाना जब मीडिया सिर्फ देशप्रेमी बनाने की हौड़ में लगी रहती थी। कवियों की कविताएं में देश भक्ति के भाव झलकते थे अब इनकी कविताओं में यह बताया जाता है कि देशद्रोही कौन है । खुदा ना खास्ता कल न उच्चतम अदालत भी कोई फैसला इनके खिलाफ कर देगी तो वह भी देशद्रोही की श्रेणी आ जायेगा। देश को लुटने वाले लोग अब अदालत में यह दलील भी देने लगे है कि यह राष्ट्र की सुरक्षा का मसला है । अतः उन समाचार पत्रों के मालिकों को भी जेल भेज देना चाहिये जो उनकी बातों से सहमत नहीं है। पत्रकारों को जान से मारने लेकर उनके परिवारों को धमकाने व उसे नौकरी से निकालने की शुरूआत तो हो ही चुकी है। इसके साथ ही 'फेक चैनल' के संचालन से लेकर 'फेक साक्षात्कार' का प्रसारण भी होने लगा है। यह सब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सहयोग के बिना कदापी संभव नहीं है। 
देश का कोई एक व्यक्ति मीडिया से भी बड़ा हो सकता है यह कल्पनाहीन बातें थी, कल तक गांव का एक पत्रकार सीना तानकर चलता था । उस पत्रकार से सरकार की तमाम एजेंसियां, पदाधिकारी व नेतागण घबड़ाते नजर आते थे, आज इसमें तेजी से ह्रास हुआ है । अब वही संवाददाता सही माना जा रहा है जो अफवाहों या फेक न्यूज को फैलाने में मीडिया हाउस का साथ दे रहा  है। 
मीडिया हाउस भी यही चाहता है कि जनता उसके दिखाये मार्गों का ही अनुसरण करें, साथ ही ये आपस में भी एक दूसरों को नीचा दिखाने व दिल्ली में किसकी सरकार सत्ता पर काबिज होगी इसकी हौड़ में लगें हैं । क्या ‘जी-न्यूज’ सत्ता में आयेगा कि ‘आजतक’ ? क्या ‘रजत शर्मा’ की सरकार बनेगी कि ‘अर्नब गोस्वामी’ की?  इसीप्रकार प्रिंट मीडिया में भी दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर इस दौड़ में सबसे आगे की पंक्ति में दिखाई दे रहें हैं। एक’आध को छोड़कर किसी ने भी अपनी ज़िम्मेदारी का सही से निर्वाहन नहीं किया है । सबके सब बिकाऊ पत्रकारिता का हिस्सा बन चुके हैं। 
अब हमें इस बात का इंतजार रहेगा कि 23 मई को किस मीडिया हाउस की सरकार दिल्ली की सत्ता पर काबिज होती है। सरकार किसी की भी बने किसी को लड्डू खाने मिलेगा,  किसी को रसगुल्ला, पर इतना तो तय है कि यह जहरीला होगा। इस बार के चुनाव मे इन मीडिया हाउसों के चंद पत्रकारों ने अपने निजी स्वार्थ के चलते पूरे पत्रकारों की प्रतिष्ठा को शक के दायरे में ला खड़ा किया है। अब पाठक वर्ग साफ-साफ कहने लगा है कि यह समाचार अमूक पार्टी द्वारा संचालित है। जो अब तक उसकी ऐसी छाप नहीं थी जो पत्रकारों के लिए एक सोचनीय विषय है। देश के हरे-भरे वातावरण में इन समाचार हाउसेज ने जो जहर फैलाया है उसे लोकतंत्र की हत्या के अपराध से कम नहीं आंका जा सकता है। जिसका दूरगामी परिणाम आने वाले दिनों में हमारे बच्चों के भविष्य पर भी पड़ेगा और अब नई पौध भी नाथुराम गोडसे से लेकर प्रज्ञा ठाकुर की मिशाल कायम कर सत्ता प्राप्ती का सुख लेना चाहेगी।  जयहिन्द ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  




मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

तेज बहादुर यादव (Tej Bahadur Yadav)

#tejbahadur

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

ईवीएम से छेड़-छाड़ संभव?


ईवीएम से छेड़-छाड़ संभव? 
चुनाव आयोग रूल 49MA  के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर को जाने पर क्या करना होगा इसकी व्यवस्था दी गई है इसके दो अर्थ साफ-साफ निकाले जा सकतें हैं 1. ईवीएम मशीन में खराबी संभव है  2. मशीन के साथ छेड़छाड़ संभव है। यह लेख जनहित में लिखा गया है और कॉपीराइट अधिनियम से मुक्त है। आगे पढ़ें -
किसी भी चुनाव में मतदान के बाद मतगणना उसका दूसरा पड़ाव होता है। चुनाव संपन्न कराने वाले अधिकारियों का यह दायित्व बन जाता है कि वे चुनाव की सभी प्रक्रियाओं को पारदर्शीता के साथ ना सिर्फ पूरा करें साथ ही समय-समय पर सभी संबंधित पक्षों के साथ राय-मशवरा कर चुनाव की प्रक्रियाओं में सुधार भी लायें तथा  आयोग के द्वारा घोषित परिणामों में कोई शक-शुबहा की गुंजाइस ना रह जाए। चाहे वह लोकसभा के चुनाव हो या विधानसभा के चुनाव या किसी भी क्षेत्र में चुनाव हो। परन्तु चुनाव की प्रक्रिया हमेशा विवादों में बनी रही है। इस संदर्भ में ‘‘राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी (1975)’’ का ऐतिहासिक फैसला जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तात्कालिक जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने श्रीमती गांधी के चुनाव को रद्द करते हुए जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव में सरकारी अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जो जन प्रतिनिधित्व कानून के अनुसार गैर-कानूनी था। 
ठीक इसी प्रकार उस जमाने में कागज के मतपत्रों के द्वारा मतदान कराया जाते थे जिसे बाहुबली लोग कई बार लूट भी लेते थे। भारत में सांइस्टिफिक रेगिंग काफी मशहूर है, जिसमें मतदान केंद्रों के अंदर सुबह से ही एक लंबी लाईन सभ्य तरीके से लगा दी जाती है और उस लाइन के सदस्य ही बारी-बारी से मतदान करते पुनः लाईन के मध्य लग जाते हैं। पीछे के लोग घंटों खडे रह जाते कुछ शोर-शराबा होता तो लाईन हटा ली जाती फिर यही प्रक्रिया कुछ अंतराल के बाद फिर से चलाई जाती है। इसी प्रकार कई ईलाकों में ऐसा भी देखा जाता है कि मतदाताओं को डरा-धमका के भगा दिया जाता है और मतदान केन्द्र पर कब्जा कर के मतदान किया जाता था। हांलाकि ईवीएम मशीन के आ जाने के बाद व टी.एन शेषन के द्वारा चुनाव प्रक्रियाओं में सुधार क पश्चात मतपत्रों की लूट में काफी हद तक कमी आई है वहीं ईवीएम की हैकिंग की बातें सामने आने लगी । चुनाव आयोग कितना भी खुद को पाक-साफ बताते रहे, कितने भी  सचे-झूठे दावे करते रहे पर विज्ञान इस बात को स्वीकार नहीं सकता कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव ही नही है। ऐसा संभव नहीं होता तो दुनियाभर में आई.टी एक्सपर्ट क्यों रखे जाते हैं ? ईवीएम भी एक मशीन ही है इस बात से तो चुनाव आयोग इंकार नहीं कर सकता। दो प्लस दो चार हो सकतें हैं तो दो गुना तीन छह भी हो सकता है। इस बात को कोई  इंकार नहीं कर सकता ।

देखें एक ईवीएम में कितने प्रकार से प्रोग्राम सेट किये जा सकते हैं - 
1) टाइम सेट: मतदान शुरू होने के दो घंटे के बाद हर पांच मिनट में अगले पांच मिनट तक किसी भी एक पार्टी को मत देने का निर्देश दिया जा सकता है। उसे ऐसे या इस प्रकार सेट किया जा सकता है।  आप उसे सेट कर दें तो मशीन आपके आदेश का पालन करेगी। यानि की चुनाव शुरू होने के दो घंटा पश्चात से लेकर अंत तक वह वही कार्य करेगी। 
2) टाइम सेट-2 : दूसरा तरीका है मतदान शुरू होने के एक या दो घंटे के बाद प्रत्येक दो वोट के बाद तीन या चार वोट किसी एक ही दल को मिले। अर्थात आप जब वोट डालने जायेगें तो पहला व दूसरा वोट सही पड़ेगा फिर चौथा, पांचवां, छठा और सातवाँ वोट किसी एक विशेष दल को ही मिलेगा। पुनः यह प्रक्रिया स्वतः दोहराई जायेगी। यह सब कार्य मशीन स्वतः करेगी। 
3) अनुपात सेट : शुरू में 100 या 200 वोट सही पड़ेगें उसके बाद एक सही, दो गलत .. एक सही, दो गलत .. यह प्रक्रिया अंत तक चलेगी। यह प्रक्रिया में अनुपात तय कर दिया जाता है जिसमें किसी एक उम्मीदवार को हमेशा वह आगे ही रखेगा ।

अर्थात उपरोक्त तीनों प्रक्रिया में जब उम्मीदवारों के प्रतिनिधि इस बात की पुष्टि कर देगें कि सबकुछ ठीक है । तब वह अपना काम वह भी एक या  दो घंटों के बाद शुरू करेगी। भले ही चुनाव आयोग इस बात से अनिभिज्ञ हो पर ऐसा संभव है। यह एक स्वाभाविक है कि किसी भी मशीन में ऐसा किया जा सकता है। तो ईवीएम में भी संभव है।  तकनीकी विशेषज्ञ इस बात से इंकार नहीं कर सकते।  शेयर बाजार में इस प्रक्रिया का प्रयोग साधारण है जब किसी भी स्टाॅक की खरीद-बिक्री अचानक से बाधित कर दी जाती है। या उसमें नये नियम ट्रेडिंग के बीच ही जोड़ दिये जातें हैं।

जबसे वीवीपेट प्रणाली को ईवीएम यूनिट के साथ जोड़ दिया गया है तो अब नयी तरह की बातें सामने आने लगी। बड़ी संख्या में ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की बात खुलकर सामने आने लगी है। जो अब तक पर्दे के पीछे थी। जिसे चुनाव आयोग  अभी तक स्वीकारने  को तैयार नही था कि गलत मतदान संभव है ।  हांलाकि चुनाव आयोग अभी भी सभी आरोपों का समाधान निर्वाचनों का संचालन रूल्स, 1961’’ की रूल 49MA के तहत करने का दावा करती है जिसमें संबंधित निर्वाचन अधिकारी को नियम 17A के तहत एक ‘एक नया जांच मत’ संबंधित व्यक्ति को देने की बात कही गई है । यानि कि चुनाव आयोग का रूल 49MA यह स्वीकार करता है कि मतदान में गड़बड़ी संभव है । और अपने पापों को छुपाने के लिए मतदाताओं को पहले धमकाता भी है कि उसे आईपीसी  177 के तहत यदि यह सिद्ध हो जाता है कि मतदाता ने जानबूझ कर चुनाव अधिकारी को गलत सूचना दी तो सजा का भी प्रावधान है। परन्तु यहां यह सोचने की बात भी है कि जब ईवीएम मशीन में गलती पाई जायेगी तो किसे सजा मिलगी? देश के लोकतंत्र से खिलवाड़ करने वाले लोग सजा मुक्त और जागरूक जनता  को डराया जाना यह नेचुरल जस्टिस के विरूध है।  चुनाव आयेग इतना ईमानदार कब से हो गया? कि वह जो कहे सब सही बाकी लोग झूठे?

[ET Bureau & Agencies Apr 30, 2019, 07.17 AM IST] 
New Delhi: The Supreme Court has sought the Election Commission’s response on a plea which sought striking down of a provision in election rules that envisages prosecution of an elector if a complaint alleging malfunctioning of EVMs and VVPATs cannot be proven.
A bench comprising Chief Justice Ranjan Gogoi and justices Deepak Gupta and Sanjiv Khanna took note of the plea, filed by Mumbai-based lawyer Sunil Ahya, that said 49MA of the Conduct of Elections Rules was unconstitutional 
ऊपर के पेरा का यह अर्थ भी निकाला जा सकता है - जब वीवीपेट के द्वारा देखने की सुविधा नहीं थी तब कि ये मशीने  क्या यही करती थी जो अब वीवीपेट से जोड़े जाने के बाद देखा जा रहा है? मत किसी ओर पार्टी को जाते साफ देखा जा सकता है। इसीलिये यह नया रूल 49MA को जोड़ा गया है। अर्थात चुनाव आयोग खुद यह स्वीकार कर रहा है कि ऐसा संभव है। इसका यह अर्थ भी निकला जा सकता है कि क्या ईवीएम के साथ कोई छेड़-छाड़ की जा सकती है जो इस नये रूल 49MA में बताया गया है?

इन आरोपों को चुनाव आयोग ‘‘निर्वाचनों का संचालन नियम, 1961’’ की रूल 49MA के उप नियम 1, 2,3 व 4 के तहत आईपीसी की धारा 177 के तहत एक चेतावनी देकर, रूल 17A के तहत उस व्यक्ति को पुनः एक जांच वोट डालने का अवसर देती  है। परन्तु सवाल यह भी उठता है कि जिस ‘मत स्लीप’ में उस मतदाता ने गलती देखी उसी स्लीप की जांच कैसे होगी ? कोई जरूरी नही कि दूसरा मत भी गलत हो? या अल्टनेटर सेटिंग हो या हर चार मत के बाद एक मत की सेटिंग हो ऐसा भी तो  संभव हो सकता है? और जब जांच के लिये दूसरा मत पत्र जारी किया जाए तो वह सही पाया गया तो सजा किसे होगी?  क्यों  देश को धोखा दे रहा है चुनाव आयोग?
जहां गलत पाये जाने पर सजा  (1000/- तक फाइन व 6 माह की जेल या दोनों ) हो सकती है तो चुनाव आयोग को साथ ही यह भी बताना चाहिये कि जिन-जिन मशीनों में गड़बड़ी की शिकायत सही पाई गई और ईवीएम मशीनें उन बुथों पर बदली गई उसमें शिकायत कर्ता का आरोप सही पाया गया था क्या? और किस राजनीति दल के पक्ष में गलत मतदान हो रहा था? इन बातों को आयोग ने क्यों छुपा लिया ताकि उसकी पोल न खुल जाए ? चुनाव आयोग पर यह प्रतिबद्धता होनी चाहिये  कि वे उन ईवीएम मशीनों के आंकड़े और रद्द मशीनों का पूरा विवरण सार्वजनिक करे, ताकि जनता को यह भी पता चल सके कि ईवीएम में क्या गड़बड़ी पाई जा रही थी। और इन गड़बड़ियों का सीधा संबंध किस-किस राजनीति दल से है?  जयहिन्द! [Edited]
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  




मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

चुनाव आयोग - दाल में काला


VVPAT ki parchi ki ginti tou good idea hai. Kisi ko koi sikayat hi nai rahegi.

1. Voter janch kar liya ki uska vote kise Gaya.
2. Candidate gin le ki kisko kitna Mila.
Vivad Kahan hai?
Ya tou app free and fare chonaw nai karana chate. Ya niyat main kahin  khot hai.
आज तीसरे चरण का मतदान संपन्न हो गया। इसके साथ ही देशभर से ईवीएम मेशीनों में गड़बड़ी की शिकायतें आती रही। चुनाव आयोग इसे तकनीकी खराबी बोलकर मशीनों को बदल रहा है। पर यह सोचने की बात है जब से ईवीएम मशीन में किसे वोट पड़ा को वीवीपेड के माध्यम से देखने की व्यवस्था की गई है तब से उन मेशीनों में जाे शिकायतें आ रही है वह भाजपा को ही मत जाने की शिकायत क्यों दिखा रहा है अर्थात ये वहीं मशीनें है जिस लेकर लगातार कई राजनीतिक ने पिछलेे चुनावों में आवाजें उठाई थी।

इन मेशीनें में निकल रही गड़बड़ियों को चुनाव आयोग हल्के में टाल रहा है पर इसके पीछे गहरी साजिश की भी बू आ रही है कि क्या ये वहीं मशीनें हैं जिसमें बिना वीवीपेड के चुनाव हुआ थे?

यदि ये वही मशीने हैं तो चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि इन गड़बड़ी वाली मशीनों का उपयोग पिछले किन-किन चुनाव में और किन-किन बुथों पर हुआ था? ताकि उन बुथों के मतों के परिणामों का आकलन पुनः  किया जा सके कि वहां क्या हुआ था।

चुनाव आयोग यदि वह सच में लोकतंत्र की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है तो वर्तमान लोकसभा के चुनाव में शिकायतें आने वाली तमाम मेशीनों के आंकड़ों  उसकी कोड संख्या और पिछले चुनावों में उन मेशीनों का प्रयोग किन-किन बुथों पर हुआ था उसकी पूरी सूचना अपने बेवसाइट पर जारी करे। अन्यथा यह मान लिया जायेगा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र के नाम पर मजाक करने में किसी विशेष राजनीति दल को सहयोग कर रहा है और चुनाव आयोग की उस आनाकानी की भी बात अब समझ में आ जायेगी जिसमें आयोग सभी बुथों के वीवीपेड के मतपत्रों की गिणती में हिचकिचा रहा था दाल में काला तो जरूर है। जब लोकतंत्र की ताकत जनगणना है जो मतगणना से क्यों डर रहा है आयोग?

1. Das Joseph Koottappillil6:04 In Kerala EVM votes are going to BJP while pressing icons other parties..

2.
Sameer Omar0:02 ചേര്ത്തലയിലും വോട്ടിംഗ് മെഷീനില് പിഴവ്; കോണ്ഗ്രസിനും എല്ഡിഎഫിനും വോട്ട് ചെയ്താല് സ്‌ക്രീനില് തെളിയുന്നത് താമര

https://www.reporter.live/2019/04/23/557345.html


3. 
गोवा में ‘दोषपूर्ण’ ईवीएम अन्य वोटों को बीजेपी में ट्रांसफर करती है. क्या वास्तव में प्रोग्राम में दोष है या इसे इस तरह से प्रोग्राम किया गया है.

4. 
“Faulty” EVM in Goa also transfers others votes to BJP. Are these really faulty or programmed in this fashion?

5.
Way too many EVMs are malfunctioning in Chittapur. Over 20 reported so far. Hope the district administration has enough backups.@ceo_karnataka

कई जगह खराब हुईं ईवीएम
केरल से भी इसी तरह की खबर आ रही है. न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक आरोप लग रहे हैं कि कांग्रेस को पड़ने वाले वोट बीजेपी के खाते में जा रहे हैं. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक राज्य के कई लोकसभा क्षेत्रों से ईवीएम खराब होने की रिपोर्ट्स आ रही हैं. कासरगोड में 20 ईवीएम और कयानकुलम में 5 मशीनों के खराब होने की रिपोर्ट आई है. वायनाड जहां से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव लड़ रहे हैं यहां एनडीए के प्रत्याशी ने फिर से चुनाव कराने की मांग की है. इस लोकसभा सीट पर भी कई ईवीएम के खराब होने की खबर आई है.
यूपी में खराब हुईं 300 ईवीएम?यूपी के रामपुर में समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि सैकड़ों ईवीएम मशीनें काम नहीं कर रही हैं. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आजम खान के बेटे अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि 300 से ज्यादा ईवीएम काम नहीं कर रही हैं. हालांकि बाद में रामपुर के डीएम ने कहा कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है. ये अफवाह था.