बुधवार, 7 नवंबर 2018

लोकतंत्र: भाइयों कुछ तो गड़बड़ है?


कोलकाता- 8 नवंबर 2018
 अभी हाल में ही रिजर्व बैंक का सुरक्षित कोष जो कि  देश की जनता का धन है उसका एक तिहाई हिस्सा सरकार उन लुटेरों  अडानी, अनील अंबनी व नीरव मोदी जैसे देश के महान लुटारों, जिन्होंने  देश लूटने में  उनको मदद की थी  के खातों में डाल देने का दबाव बना रही है ।  एक बात पुनः यहां उल्लेख करना चाहता हूँ पंतलजि का विज्ञापन लोकतंत्र को धराशाही करने में मोदी सरकार को सहयोग कर रहा है यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है 
दुष्यंत कुमार की एक कविता - दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है, आज कल नेपथ्य में संभावना है। 
आज इस बात को इतिहास में लिखना जरूरी हो गया कि भारत की प्रायः सभी संवैधानिक संस्थाएं जिसमें सुप्रीम कोर्ट से लेकर, चुनाव आयोग, सीबीआई, भारतीय रिजर्व बैंक, सीवीसी, व अन्य तंत्र पूर्ण रूप से मौजूदा हिटलरशाही मोदी सरकार के गिरफ़्त में आ चुकी है । सीबीआई में किस प्रकार राकेश अस्थाना की नियुक्ति से लेकर उनके काले कारनामों को बचाने के लिए जिस प्रकार रातों-रात सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं को ताख पर रख कर सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को उनको उनके पद से हटा दिया गया। ठीक यही घटना कुछ दिनों पूर्व सुप्रीम कोर्ट में हुई जिसमें चार जजों ने मीडिया के सामने आकर अपना दुखड़ा रोया था कि "सबकुछ ठीक नहीं चल रहा "। आदरणीय रजंन गोगोई की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से लेकर अन्य जजों की नियुक्तियों पर संध का हस्तक्षेप,  जिस प्रकार अभी से भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मोदी सरकार को मजबूत करने का राग दौहरने लगे, जिस प्रकार सेना के तीनों मुख्य सेनापति सरकार की सुरक्षा में तैनात दिखे,  आज रिजर्व बैंक की बात सामने आ गई - आरबीआई गवर्नर (पालतू) उर्जित पटेल जिसने नोटबंदी के समय से अबतक मोदी सरकार के कहे-कहे देश को गुमराह किया, आज उसी पर इतना भीतरी दबाब है कि वे खुद इस्तीफा देने की पेशकेश करने वाले हैं। ‘‘ दाल में काला तो जरूर है ’’ मोदी जी की ही भाषा में - ‘‘काली रात को काली करतूत - भाइयों कुछ तो गड़बड़ है? अब रात के अंधेरे में क्या होता है क्या यह भी  बताने की जरूरत है  आपको ! ’’
दुख तो तब होता है जब लोकत्रंत का प्रहरी मीडिया तंत्र जो खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा मानती है  उसका एक वर्ग पेट के रोग से ग्रसित हो चुका है उनके पेट में चांदी के जूतों का जौंक पैदा हो चुका है जो भीतर ही  भीतर शरीर रूपी लोकतंत्र का खून पीने लगा है । कभी हमें धर्म की खुंटी पीलाई जा रही है, कभी हमें राष्ट्रवाद की तो कभी देश की सुरक्षा की दुहाई दी रही है । मानो अचानक से सब कुछ खतरे में पड़ चुका हो । वही व्यक्ति जब देश के साथ गद्दारी करता है और भारतीय जवानों को भारत की सड़कों पर ही जूतों से पीटवाता हो ।  देश द्रोहियों (मोदी जी ने ही कहा था) के साथ सरकार बनाता हो तब इनकी देशभक्ति किस अंतरिक्ष यात्रा पर चली जाती है ? ‘‘भारत माता की जय’’ या  ‘‘गाय का मांस खाने की बात’’ क्यों टाल दी जाती जब इनको सरकार बनानी होती?  राममंदिर इनका चुनावी मुद्दा बनकर क्यों रह गया? यह सोचने की बात है।  पिछले पांच सालों की कुव्यवस्था से आज देश की अर्थव्यवस्था विनाश के कगार पर आ चुकी है । तेल व गैस के दामों से जनता को लूटने के बाद भी, बच्चों की शिक्षा पर 18% प्रतिशत जीएसटी (GST) लगा देने बाद भी, डालर अपनी रफ्तार पकड़ेे हुए है ।  अभी हाल में ही रिजर्व बैंक का सुरक्षित कोष जो कि जनता का धन है का एक तिहाई हिस्सा सरकार उन लुटेरों - अडानी, अनील अंबनी व नीरव मोदी जैसे देश के महान लुटारों, जिन्होंने  देश लूटने में  इनको मदद की  के खातों में डाल देने का दबाव बना रही है । एक नीरव मोदी से देश के किसानों को भला हो सकता था पर नहीं हुआ। एक अनिल अंबानी से देश के सैकड़ों गांवों में शिक्षा व इलाज की व्यवस्था हो सकती थी नहीं हुई, पर मोदी सरकार देश को गंभीर आर्थिक संकंट में डालने के हर उस कदम पर मोहर लगा रही हैं जो देश को बर्वाद करने में तुली हो।  यह किसी आर्थिक खतरों की तरफ संकत दे रहा है कि देश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा ।
एक बात पुनः यहां उल्लेख करना चाहता हूँ पंतलजि का विज्ञापन लोकतंत्र को धराशाही करने में मोदी सरकार को सहयोग कर रहा है यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है।  अतः मीडिया तंत्र को कहीं लकवा ना मार जाए इस बात पर बहस जरूरी है कि उन प्रतिष्ठानों में काम लोकतंत्र की  शर्त पर की जाय या नही ?
 - शंभु चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

NO COPYRIGHT RESERVED FREE TO PUBLISH IN ALL PRINT MEDIA



शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

चुनाव-2019: भेड़िया आया


कोलकाता- 2 नवंबर 2018
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक लघु कथा है ‘भेड़िया’ गांव में एक बालक हर बार गाँववालों को मुर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया करता था। जब भी उसको गांव वालों को मुर्ख बनाने की जरूरत पड़ती वह गांव में भागा-भागा आता और जोर-जोर से चिल्लाता ‘‘भेड़िया आया... भेड़िया आया...’’ बस गांव के सारे लोग उस बालक के कहे-कहे भेड़िया को मारने दौड़ पड़ते। पर हाथ कुछ नहीं आता । बालक मन ही मन गांव वालों की मुर्खता पर इतराता और मजा लेता था ।
इस बार के चुनाव में इस बालक को पहले से अंदाज हो चुका है कि उसे लोक सभा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। जिसमें राजस्थान, तेलंगाना मध्य प्रदेश और मिजोरम और छत्तीसगढ़। इसमें तीन राज्यों राजस्थान, तेलंगाना मध्य प्रदेश में भाजपा की हालात बहुत खराब बताई जा रही है।  इन सभी राज्यों में लोकसभा की 83 सीटें हैं। यदि हम प्रमुख तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और मिजोरम और छत्तीसगढ़ की बात करें इन तीन राज्यों में भाजपा के पास अभी 16वीं लोकसभा की 61 सीटें हैं। भाजपा को लगता इन राज्यों में हमने जनता को इतना छल्ला है कि अब धोखे से भी हमारी बात में नहीं आयेगें। विधानसभा चुनाव से उनके तलवे की जमीं अभी से ही खिसकती दिखाई दे रही है। 
लगे हाथ आपको बताता चला जाऊँ कि इस बार भाजपा को सत्ता में लाने के लिये चुनाव आयोग खुलकर जनता के साथ धोखा/साज़िश करने का मन बना चुकी है। पूरी की पूरी चुनाव आयोग की टीम तोता बन चुकी है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पिछली चुनावी घोषणा के ठीक एक दिन पूर्व भाजपा के द्वारा तेल के दामों में 2.5 रुपये की कटौती करना । इसका स्पष्ट अर्थ निकलता है कि चुनाव आयोग भाजपा की ‘बी टीम’ के रूप में कार्य कर रही है। 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून 2014 को हुआ था एवं इसके इसका कार्यकाल 3 जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जायेगा । स्पष्ट है कि आगामी चुनाव की तिथि की घोषणा आगामी जनवरी-फरवरी माह में किसी भी समय कर दी जायेगी 
आज एक पंचतंत्र की कहानी सही साबित हो रही चालाक सियार ने शेर के खोल धारण कर लिया है। आरएसएस की मुंबई में हुए तीन दिवसीय शिविर के समापन में संघ के महासचिव व भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने नया सगुफा छोड़ दिया । एक चोर साहुकार बनकर दूसरे चोर को चेतावनी दे डाली कि ‘‘राम मंदिर को लेकर पुनः 1992 जैसा आंदोलन करेगी’’ । पिछले 70 सालों में संघ का यह चेहरा नया नहीं है । हर चुनावी मौसम में संघ कोई न कोई नया पैंतरा दिखाता ही है। 
अबकी सबको पता है कि मोदी का वह जूमला जिसमें तेल के दाम, डालर के बढ़ते मूल्य, मंहगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन, जवानों के दो सर, युवाओं को नौकरी, अच्छे दिन के वादा जैसे कोई खोखले वादे नहीं चलने वाला है। काठ की हांडी  पूरी तरह से जलकर खाख हो चुकी है। अब मोदी को वे सभी संवैधानिक संस्थाये बचाने का प्रयास करेगी जिसके प्रमुख को मोदी ने तमाम नियमों को ताख पर रखकर पदास्थिापित किया है।
इस बार के चुनाव में एक तरफ व्यापारी वर्ग काफी नाराज है उन्हें लग रहा हे मोदी ने उनके साथ धोखा किया। वहीं यही हालात किसानों की है, तो आरक्षण विवाद भी एक प्रकार से मोदी सरकार के गले की हड्डी बन चुकी है। पिछले पांच सालों में मोदी की विदेश यात्रा, राफेल सौदे में देश को गुमराह करना, सभी संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बना देना मोदी सरकार की उपलब्धि रही है । अब यह देखना है कि गांव को हर बार झलने वाला व्यक्ति क्या इस बार भी सफल हो जायेगा देश को अपने जुमले सुनाकर या संध के नये पैंतरे से देश को मुर्ख बनाया जायेगा?
-शंभु  चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

चुनाव-2019: काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

चुनाव-2019:  काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
कोलकाता- 2 नवम्बर 2018
हम सभी इस बात से भलीभांती अवगत हैं कि 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून 2014 को हुआ था एवं इसके इसका कार्यकाल 3 जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जायेगा । स्पष्ट है कि आगामी चुनाव की तिथि की घोषणा आगामी जनवरी-फरवरी माह में किसी भी समय कर दी जायेगी । 
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 में भारत के चुनाव आयोग को इसका अधिकार दिया गया है। वहीं अनुच्छेद 83(2) में इसका कार्यकाल 5 वर्ष का तय किया गया और आपात किसी स्थिति में एक साल का कार्यकाल संसद में कानून बना के बढ़ाया जा सकता है । वहीं भारत के नागरिकता कानून, 1951 की धारा 14 में नई लोकसभा गठन की प्रक्रिया दी गई है। जिसमें लिखा है कि नई लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव करायें जायेगें । इसके लिए पूर्व की लोकसभा की समाप्ति जो कि जून 2019 में हो जायेगी के छः माह अर्थात 1 दिसम्बर-2018 से 30 मई 2019 के बीच चुनाव की सभी प्रक्रियाओं को पूरा कर लेनी होगी । अर्थात 16वीं लोकसभा की उलटी गनती शुरू हो चुकी है। 
पिछले पांच सालों में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि मोदीजी ने देश को बहुत बड़े आर्थिक संकट में डाल दिया  है । तेल व गैस के दाम, डालर का मंहगा होना, रसोई गैस का 400/- रुपये से 900/- रुपये का हो जाना, राफेल सौदे में 20 हजार करोड़ का डाका, निरव मोदी का फरार होना, अमित साह के बेटे के धन में रातों-रात, दिन दूनी रात चौकनी कमाई हो जाना, बाबा रामदेव के 850 करोड़ रुपये की कम्पनी का 11526 करोड़ की कम्पनी हो जानी, बाबा के विज्ञापनों के माध्यम से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को नपूंसक बना देना का षड़यंत्र, नोटबंदी से 60 प्रतिशत नये करोड़पतियों की उपज, कालेधन पर चुप्पी, आतंकवाद के नाम पर देश को धोखा देना, सेना का इस्तमाल अपनी रक्षा में प्रयोग करना, बच्चों की शिक्षा पर भी जीएसटी लागू कर देना। कभी गाय के नाम पर कभी धर्म के नाम पर  तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर देश को गुमराह करना, देश के युवाओं को पकौड़े बेचने को कहना, ‘‘मान न मान - मैं तेरा मेहमान’’ विश्वभर में 80 से अधिक बार विदेश की यात्रा, मानहानी के मुकदमों का नया दौर शुरू कर अपने विरोधियों की आवाज को दबा देना। रिजर्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, सीबीआई, आईबी, लोकपाल, आदि सभी संवैधनिक संस्थाओं को पिछले पांच सालों में कमजोर कर लोकतंत्र को धराशाही करने में लगातार कार्यरत रहना यह मोदी सरकार की पिछले पांच साल की प्रमुख उपलब्धीयां हैं । 

  • आज हमें सोचना होगा कि क्या हम लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं कि बाबा रामदेव के विज्ञापनों के पीछे कुत्ते की तरह दुम हिल्लाकर अपनी कलम को, पत्रकारिता को गिरबी रखना चाहतें हैं?
  • आज हमें सोचना होगा कि धर्म की आड़ लेकर जो भेड़िया हमें पिछले 25 सालों से नोचता रहा वह पुनः उसी खाल में हमें लुटने तो नहीं आ रहा?
  •  आज हमें सोचना होगा जिसने 2014 के चुनाव में हमें जो सपने दिखाये थे उसका क्या हुआ।
  • आज हमें साचेना होगा घरों की रसोई की गैस में ऐसी कौन सी आग लग गई की मोदी सरकार ने पांच सालों में इसके मूल्य को 400 से 900 कर दिये?
  • आज हमें यह भी सोचना होगा जिस लोकपाल के गठन को लेकर पूरा देश आंदोलनरत हो चुका था, उसका गठन मोदी सरकार ने क्यों नहीं किया? 
  • ऐसे हजार सवाल हो सकते हैं साथ ही एक सवाल यह भी उठता है कि मोदी नहीं तो फिर कौन?
  • स्वाल बहुत गंभीर है। क्या हमारे पास कोई विकल्प नहीं? क्या एक सवाल यह भी किया जा सकता है मोदी ने इन पांच सालों में हमारी सोच को भी विकलांग बना दिया कि हम किसी विकल्प की बात भी नहीं सोच सकते?  जयहिन्द !  
- शंभु चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

राफेल सौदा बनाम मोदी की सुरक्षा?


राफेल सौदा बनाम देश मोदी की सुरक्षा?

" यह सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा मामला है ।"

तब बोफोर्स का मामला किसकी सुरक्षा  से जुड़ा था ?
भारत सरकार के अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि 
"अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए ।
ये नेशनल सिक्योरिटी का मामला है । 
ये जनहित याचिका नहीं है बल्कि राजनीति से प्रेरित याचिका है।
दिनांक 11 अक्टूबर 2018:  देश की सर्वोच्च अदालत ने कल एक प्रकार से दबी ज़ुबान से ही सही यह राफेल सौदे की प्रक्रिया संबंधी पूरा विवरण अदालत में सौंपने का निर्देश अंततः दे दिया। अभी पिछले सप्ताह ही मुख्य न्यायाधीश के पद पर मोदी सरकार की तरफ से कालेजियम व वरियता को फेर-बदल कर बनाये गये मुख्य न्यायाधीश माननीय रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के.कोल, व जस्टिस के.एम. जोसेप की खंडपीठ ने विनीत ढंडा बनाम भारत सरकार W.P.(C) No. 1205/2018 पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से कहा कि  वे दाम से जुड़े प्रश्न पर कोई सवाल नहीं कर रहे । ना ही वे देश की सुरक्षा से कोई समझौता कर रहे । ना ही वे इस पीआईएल का स्वीकार या रद्द कर रहे ।  अदालत सरकार से सिर्फ यह जानना चाहती है कि इसमें अपनाये जाने वाली प्रक्रिया क्या थी ? 

कहने का सार यह है अदालत यह नही जानना चाहती -
1. कि युपीए सरकार के सौदे 526 करोड़ रुपये  प्रति राफेल विमान को रद्द कर मोदी सरकार ने कैसे 1670 करोड़ रुपये का कर दिया? 
2. कि देश की रक्षा के नाम पर मोदी की सरकार संसद को गुमराह करती रही,  कि सरकार का इस सौदे में कोई भूमिका नहीं? 
3. कि एक पत्रकार के द्वारा सच को सामने लाने पर मोदी सरकार के प्यादे अनिल  अंबानी ने 5000 करोड़ रुपये का मानहानि का दावा एक पत्रकार के उपर ठोक दिया ताकि मामला दबा रहे।
4. कि प्रधान सेवक ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही यह इस योजना को कैसे पग-पग पर अमली जामा पहनाया गया।
5. कि कैसे 20 दिसम्बर 2014 को तीन नई कंपनी रिलायंस डिफेंस टेक्नोलॉजी प्रा. लि. , रिलायंस डिफेंस सिस्टम प्रा. लि.  और रिलायंस डिफेंस एंड ऐरोस्पेश प्रा. लि. को जन्म दिया गया ।
6. कि कैसे 28 मार्च 2015 को पुनः एक नई कंपनी रिलायंस डिफेंस लि. को जन्म दिया गया ।
7. कि कैसे और क्यों? 10 फरवरी 2017 को पुनः एक नई कंपनी डास्साल्ड रिलायंस ऐरोस्पेश लि. को जन्म दिया गया ।
अब इन प्रश्नों का जबाब ना लेकर सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश माननीय रंजन गोगोई ही बता पायेंगे कि अंबानी परिवार की 5000 करोड़ रुपये  की मानहानि की भरपाई कैसे और कौन करेगा?
किसी पत्रकार की आवाज को दबा देने का नया नुख्सा मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने निकाल लिया है मानहानि का मामला ठोक दो चाहे काई भी मामला हो दब जायेगा । अब वेचारा गरीब पत्रकार लोकतंत्र की बात कर के तो देख ले जबान काटकर उसके हाथ में ना थमा दिया तो मोदी की सरकार नहीं।
अब जरा मोदी सरकार का अदालत में दलील देखिये -
भारत सरकार के अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि "अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए ।ये नेशनल सिक्योरिटी का मामला है । ये जनहित याचिका नहीं है बल्कि राजनीति से प्रेरित याचिका है।  यह सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा मामला है ।"  
माने सीधे तौर पर अदालत को धमकाया गया है ।  तो अदालत ने भी वहीं किया जो सरकार चाहती थी । इधर अचानक से रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण फ्रांस की यात्रा पर चली गई । मोदी को डर है कि कहीं फ्रांस की सरकार भारत सरकार के उस दस्तावेज़ को जारी ना कर दे जिसमें एचएएल ‘‘हिन्दुस्थान एयरोनेटिक्स लिमिटेड’’ जो एक सरकारी कंपनी है से सौदा छीन कर अनील अम्बानी की कम्पनी को सौदा दे दिया गया।
जिस कंपनी की स्थापना मोदी जी की फ्रांस यात्रा ( दिनांक 11-12 अप्रैल 2015)  कंपनी की स्थापना (28 मार्च 2015 ) कूल 15 दिन की इस कंपनी को कैसे दे दिया गया ?  अब तक एक के बाद एक कूल पांच कंपनी की स्थापना क्यों की गई?
मजे की बात देखिये भारत के वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल बीएस धनोआ भी देश की रक्षा के लिये नहीं सरकार की रक्षा के लिये इस मैदान में कूद पड़े।
सवाल देश की सुरक्षा से जुड़ा है । अब अदालत यह भी बता दे कि तब बोफोर्स का मामला किसकी सुरक्षा  से जुड़ा था ?
 लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  -शंभु चौधरी

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

बागड़ी मार्केट


बुधवार, 19 सितंबर 2018

तीन तलाक: साला मैं तो शाह बन गया !

यह बात सही है कि पीड़ित मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक को लेकर जानवर की जिंदगी जीने के लिये मजबूर हो जाती है । मुस्लिम समाज में तलाक के बाद उसकी गुहार सुनने के तमाम रास्ते बंद कर दिए जाते । न्याय देने की बात तो दूर की, कई महिलायें तो भेंट भी चढ़ जाती । एक प्रकार से समाज में दरिंदगी का माहौल बना हुआ था । 

मोदी सरकार को किसी भी बात पर या तो उसे सांप्रदायिक रूप में समस्या को परिवर्तित कर देना या किसी बात का बचाव करना हो तो दूसरी बड़ी समस्या को सामने ला खड़ा करो ताकि जनता मुद्दों से भटक कर नई बातों में उलझ जाए । अभी देश में तेल के दामों और रुपये के गिरते मूल्य से भारत को रोजाना अरबों की क्षति पर बहस चल ही रहा था कि मोदी को अचानक से नया पैंतरा सूक्ष गया । तीन तलाक । बस ले आये आॅडिनेन्स । 
भला कौन नहीं चाहेगा कि तीन तलाक जैसी सामाजिक कुप्रथा को भारत जैसे गरीब देश से भी समाप्त किया जाए ? भारत के सुप्रीम कोर्ट ने तो पहले से ही शयरा बानू मामले में इसे गैर कानूनी करार दे दिया था । भारत सरकार को निर्देश भी दिया था कि संसद में इसपर कड़ा कानून लाया जाए । 
मोदी सरकार के दो विघिज्ञाता ने इसपर एक बिल तैयार कर संसद के पटल पर रख भी दिया और संसद में पारित भी करा दिया गया । पर समस्या राज्यसभा में आकर लटक गई । राज्यसभा में सरकार को बहुमत नहीं होने के कारण बिल अटक गया । विपक्ष इस सामाजिक समस्या में कई सुधार चाहता था । लोकतंत्र में बहस की गुजांइस होनी चाहिये । परन्तु शाह बानू में जैसे कांग्रेस ने किया ठीक सबकुछ वैसा ही मोदी जी ने शायरा बानू में किया ।
यह बात सही है कि पीड़ित मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक को लेकर जानवर की जिंदगी जीने के लिये मजबूर हो जाती है । मुस्लिम समाज में तलाक के बाद उसकी गुहार सुनने के तमाम रास्ते बंद कर दिए जाते । न्याय देने की बात तो दूर की, कई महिलायें तो भेंट भी चढ़ जाती । एक प्रकार से समाज में दरिंदगी का माहौल बना हुआ था । 
परन्तु यह बात मोदी सरकार को सोचनी होगी कि तलाक पर तो उसने प्रतिबंध लगा दिया परन्तु दूसरी शादी पर तो प्रतिबंध नहीं लगा सके । समस्या और विकराल बन जायेगी । वह महिला जिसको तलाक नहीं मिला अब वह उसी के कोठे पर एक जानवर की जिंदगी जीने को मजबूर हो जायेगी या फिर वह कचहरियों में वकीलों की फीस चुकाते-चुकाते थक जायेगी । कोई दुबई में दूसरी शादी कर के मौज करेगा?  कोई गुजरात में । कहने का अर्थ है तलाक नहीं देगा पर दूसरी, तीसरी या चौथी शादी कर के कहेगा नाचेगा और अपनी हवस की आग बुझायेगा गाना गायेगा ‘‘साला मैं तो शाह बन गया !’’ -लेखक: शंभु चौधरी
दिनांक 20 सितम्बर 2018, कोलकाता । 

शनिवार, 15 सितंबर 2018

2024 के बाद मोदी हिटलर शासक?

इन सबके बीच भाजपा की तरफ से एक बयान यह भी आया कि 2019 के चुनावी विजय के बाद भाजपा को अगले 50 साल तक सत्ता से कोई नहीं हटा पायेगा ।  क्या सच में ऐसा संभव है? या किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बयान है। इन दिनों मीडिया जगत में एक बात देखी जा रही है - सरकार को बचाने के लिये उनके सरकार के मंत्री नदारत रहतें हैं पर मीडिया सरकार का ऐसे बचाव करती है जैसे मोदी की सरकार मीडिया की मेहरबानी पर चल रही हो ।
कोलकाता 15 सितम्बर : पिछले सप्ताह दिल्ली में बने नए अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में भाजपा की दो दिवसीय कार्यकारिणी बैठक संपन्न हुई । इस बैठक में कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार विमर्श किया गया, वहीं अपनी दो दिवसीय  राष्ट्रीय कार्यकारिणी    में पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी मंथन किया गया । भाजपा ने अपने नये अध्यक्ष के चुनाव को भी 2019 के लोकसभा के चुनाव तक टाल दिया। संकेत साफ था कि भाजपा ने अगला लोकसभा का चुनाव भी मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में ही करने का मन बना लिया है। 
इस कार्यकारिणी बैठक में मोदी के प्रभाव को लेकर अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग तरह के विचार दबे स्वर में आने लगे थे । जबकि एससी-एसटी बिल, राफेल सौदा, बढ़ते तेल के दाम, गिरते रुपये से लेकर विपक्ष के होते तेज हमले पर भी चर्चा हुई । साथ ही बिहार के सुशासन बाबू का बलात्कार, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की गाय प्रेम, राजस्थान में वसुंधरा राजे के कमजोर होती सत्ता, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह को लेकर साथ में उत्तर प्रदेष की राजनीतिक बदलते हालात पर भी चर्चा हुई। दबी ज़ुबान पर सबको इस बार इन राज्यों में लोकसभा की सीटों को लेकर आशंका बनी हुई है कि पिछले लोकसभा के चुनाव जैसे ही परिणाम क्या इन राज्यों में आ पायेंगें? 
इधर अमित शाह ने बंगाल यूनिट से आगामी लोकसभा के चुनाव में कम से कम 24-25 सीटों को लाने का लक्ष्य बना के कार्य करने का संकेत कल की कोलकाता में होने वाली बंगाल राज्य कार्यकारिणी की बैठक के बाद, संवाददाताओं को संबोधित करते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने घोषणा की ।
इन सबके बीच भाजपा की तरफ से एक बयान यह भी आया कि 2019 के चुनावी विजय के बाद भाजपा को अगले 50 साल तक सत्ता से कोई नहीं हटा पायेगा । क्या सच में ऐसा संभव है? या किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बयान है। इन दिनों मीडिया जगत में एक बात देखी जा रही है - सरकार को बचाने के लिये उनके सरकार के मंत्री नदारत रहतें हैं पर मीडिया सरकार का ऐसे बचाव करती है जैसे मोदी की सरकार मीडिया की मेहरबानी पर चल रही हो ।
आयें अब भाजपा के इस ताजा बयान पर भी हम गंभीरता से विचार कर लें कि आलगे 50 सालों तक सत्ता में वे कैसे बने रहने का सपना संजो रहे हैं । दरअसल इसके पीछे राज्यसभा की उन सीटों की बात उनके दिमाग में चल रही है जो आगामी 2019-24 के सालों में खाली होने वाली है । अभी भाजपा राज्यसभा में बहुमत में नहीं है यही कारण है कि मोदी के तमाम तानाशाही फरमानों पर कई बार राज्यसभा रोक लग चुका है, जिसमें जमीन अधिग्रहण से लेकर तीन तलाक जैसे कई मुद्दे हैं जों राज्यसभा में भारी विरोध के कारण लटक गये। मोदी जी सत्ता को पकड़े रखने की कला के खिलाड़ी माने जातें हैं जिस प्रकार उन्होंने गुजरात में अपने तमाम विरोधियों को भले ही वे सत्ता पक्ष को हों या विरोधी पक्ष के, को किनारे कर दिया था ठीक इसी योजना के तहत वे अपना अगला कदम बढ़ाने की ओर अग्रसर दिखाई दे रहें हैं । इससे भाजपा के खुले विचारों के सांसदों में एक प्रकार से चिंता की लकीर साफ दिखाई पड़ रही है। 
245 राज्यसभा की सीटों में भाजपा को इन चार सालों में अपनी बढ़त बनाते हुए बीजेपी-73 सीट के आंकडे पर पंहुच गई, जबकि कांग्रेस-50, टीएमसी- 13, एआईएडीएमके-13, समाजवादी- 13, बीजुद-9 , जद(यु)- 6, टीडीपी-6, तेलांगना- 6, आरजेडी- 5, सीपीएम- 5, डीएमके- 4, बीएसपी- 4, एनसीपी-4, षिवसेना- 4, आकालीदल-3, आमआदमी-3 सीपीआई-2, नोमिनेटेड- 4, व अन्य छोटी-छोटी पार्टियों के पास एक-एक सीटें हैं । कुल 25-30 सीटों के उलट-पुलट से राज्यसभा का यह खेल भाजपा के पक्ष में हो जायेगा । 
दरअसल भारत का लोकतंत्र इसी राज्यसभा के बल पर बचा हुआ जिसे भाजपा चाहती है अगले पांच सालों में पूर्ण रूपेन रूप से दखल कर ले। यह तभी संभव हो सकता है जब भाजपा लगातार दूसरी बार ना सिर्फ 2019 का लोकसभा का चुनाव 2014 के मुकाबले अधिक सीटों से जीतें वहीं राज्यों में होने वाले चुनावों में भी उनकी सीटों को आंकड़ा बढ़ सके। क्योंकि इन सीटों के अंक गणित ही मोदी को राज्यसभा और लोकसभा में क्रूर शासक बना सकता जिसका सपना पिछली कार्यकारिणी में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने देखा है। 
इन सपनों को केरल की 3 सीट जो अभी वामपंथी दलों के पास है, कर्नाटक की तीन सीट, (6 सीट)- उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की 11 सीट जो 2020 से 2022 के बीच खाली होने वाली है। कांग्रेस की 8 सीटें जो विभिन्न राज्यों में है जो 2019-2020 में खाली हो जायेगी। इसी प्रकार बंगाल व उन सभी राज्यों को लक्ष्य किया जाएगा जहां से भाजपा को  लोकसभा  के साथ ही राज्यसभा में भी बहुमत के आंकड़े को छूने में मदद कर सके । लोकतंत्र के ये आंकड़ें मोदी को 2024 तक हिटलर बना देने के लिये काफी होगा । जयहिन्द !  शंभु चौधरी, लेखक एक विधिज्ञात भी हैं।

रविवार, 12 अगस्त 2018

‘मास्टरस्ट्रोक’: पंतजलि के विज्ञापनों का सच?


केलकाता- 12 अगस्त 2018
यदि बाबा के विज्ञापन महज एक विज्ञापन होते तो काई बात नहीं पर किसी ऐसे पत्रकार को हटाने में इस विज्ञापन हाथ होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह सभी विज्ञापन जो 2014 के बाद प्रकाश में आयें हैं । इन विज्ञापनों के धन का अज्ञात स्त्रोत कोई ओर है जो इन विज्ञापनों के माध्यमों से लोकतंत्र को गुलाम बनाने की योजना पर कार्य कर रहा है ।
यह बात सच है कि जो बाबा कल तक कालेधन के खिलाफ अन्नाहजारे के विकल्प में अपनी एक अलग मुहिम छेड़ रखी थी, जो बाबा आंदोलन स्थल से कूदकर भाग खड़ा होता हो, जो औरत के भेष  में अपने गेहुया वस्त्र को त्यागकर जान बचा कर सभास्थल से भाग खड़ा होता है । जिसके उत्पादनों के विज्ञापन कभी भी इतनी बड़ी संख्या में नहीं आये । अचानक से मोदी की सरकार आते ही रामदेव बाबा के विज्ञापनों की एक प्रकार तमाम प्रिंट मीडिया से लेकर इल्केट्रोनिक मीडिया में बाढ़ सा आ जाना किसी बात का संकेत तो देता ही है, पर यह नहीं पता था कि इन विज्ञापनों का स्रोत सीधे देश के प्रधानमंत्री मोदी से जुड़ा हुआ है।
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी और उनके झूठ को उजागर करते हुए एबीपी न्यूज़ से दो वरिष्ठ पत्रकारों ने के हटाने के पीछे पंतजलि के विज्ञापन का क्या रोल हो सकता है? यह सोचने की बात हो सकती है।
‘द वायर’  के द्वारा  पूछे गये सवालों के जवाब में पतंजलि के प्रवक्ता एस.के. तिजारावाला ने एबीपी न्यूज चैनल से विज्ञापन हटाने की पुष्टि करते हुए स्वीकार किया कि पंतजलि के विज्ञापन हटाये गये हैं।  दरअसल में इसके पीछे पुण्य प्रसुन बाजपेयी के एक कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ की चोट से मोदी सरकार इतनी बैचेन हो गई कि उनके कालेधन के इस विज्ञापन का स्त्रोत अंदर से बोल ही पड़ा ।
पिछले चार सालों से रामदेव बाबा के व्यवसाय के विज्ञापनों की बाढ़ के आंकड़े जो सच बताने के लिये काफी है।  बीएआरसी इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक पतंजलि आयुर्वेद ने टेलीविज़न चैनलों में 1.14 मिलियन विज्ञापन दिये, 161 चैनलों में 7,221 घंटों के लिए टीवी चैनलों पर पतंजलि विज्ञापन प्रदर्शित किए गए थे। यह प्रति दिन औसतन 19 घंटे 43 मिनट के विज्ञापनों का भूगतान पंतजलि कर रही है ।  इसके साथ ही प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों में पतंजलि के विज्ञापनों की बाढ़ के धन का स्त्रोत क्या है?  चार साल पहले जो कंपनी 2013-14 में महज 850 करोड़ की थी रातों-रात ऐसा क्या ऐसा क्या गुल बाबा ने खिला दिया कि देखते ही देखते 2016-17 में 11526 करोड़ो की कम्पनी बंन गई । दरअसल बाबा आरएसएस का एक मुखौटा है जो स्वदेशी अभियान के बहाने बाबा ने देश का गुमराह कर रहें हैं एवं भाजपा के कालेधन को असली धन बनाकर विज्ञापन का रोजगार कर रही है । जरा आप भी सोचियेगा किस विदेशी कम्पनी ने  च्यवनप्रास, शहद, घी और आटा का व्यवसाय भारत में किया है? जरा दिमाग पर जोर देकर साचियेगा । स्वदेशी के नाम पर देश की भावना से खिलवाड़ की यह प्रणालि आरएसएस का एक हिस्सा मात्र है। व्यवसाय करना अपराध नहीं पर व्यवसाय की आड़ में देश के लोकतंत्र को पंगु बना देने की योजना अपराध है। एक समय ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जो किया वही बाबा के विज्ञापनों के माध्यम से मोदीजी करने जा रहें हैं । यदि बाबा के विज्ञापन महज एक विज्ञापन होते तो काई बात नहीं पर किसी ऐसे पत्रकार को हटाने में इस विज्ञापन हाथ होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह सभी विज्ञापन जो 2014 के बाद प्रकाश में आयें हैं । इन विज्ञापनों के धन का अज्ञात स्त्रोत कोई ओर है जो इन विज्ञापनों के माध्यमों से लोकतंत्र को गुलाम बनाने की योजना पर कार्य कर रहा है । दरअसल बाबा का यह विज्ञापन का खेल कुछ ओर ही ज्ञात होता है जो मीडिया को धमकाने के कार्य में मोदीजी प्रयोग कर रहें हैं बाबा तो बस एक मोहरा है।
 नोटः यह लेखक के अपने विचार हैं। इसे लेख को प्रकाशित और पुनः प्रकाशित करने के लिये सभी स्वतंत्र है। । लेखक विधिज्ञाता व स्वतंत्र पत्रकार हैं।  - शंभु चौधरी

एनआरसी: भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संसद और सुप्रीम कोर्ट से भी बड़े हैं ?


कोलकाता- 12 अगस्त 2018
यदि इन सभी बयानों को परखा जाए तो ममता बनर्जी के साथ-साथ, देश की सर्वोच्य अदालत (सुप्रीम कोर्ट), देश के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री, असम के राज्यपाल वे सभी देशद्रोही है जो इन 40 लाख धुसपैठियों को सूची में शामिल करने पूरा अवसर देने की वकालत कर रहें। परन्तु अमित शाह का बयान है कि ये सभी घुसपैठियें हैं । तो फिर इन सभी घुसपैठियों को भाजपा अध्यक्ष सूट-एट-साइट आदेश क्यों नहीं दे देते?  क्या जरूरत है संसद की?  क्या जरूरत है सुप्रीम कोर्ट की?
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एनआरसी के अध्यक्ष प्रतीक हजेला को, प्रेस में उनके एक बयान को लेकर नाराजगी जताते हुए उनसे पूछा कि उनका काम है रजिस्टर तैयार करना है ना कि प्रेस में एनसीआर के मुद्दों पर बयानबाज़ी । सुप्रीम कोर्ट ने हजेला और रजिस्टार जरनल को जेल भेजने की चेतावनी देते हुए कहा कि वे कोर्ट के आदेश के मुताबिक काम करें। परन्तु भाजपा के अध्यक्ष इन सबसे बड़े हैं । इनके बयानों को सुप्रीम कोर्ट न तो अभी तक संज्ञान में लिया ना ही कोई टिप्पणी ही की । शेर की तरह खुलेआम सुप्रीम कोर्ट को आँख दिखा कर 40 लाख लोगों को धुसपेठिया बना दिया । जबकि एनसीआर की प्रक्रिया अभी जारी है। 
पिछले माह 30 जुलाई को एनआरसी की दूसरी सूची जारी की गई। इस सूची में 2 करोड़ 90 लाख लोगों के नाम शामिल किए गए हैं। सूची में 40 लाख लोगों के नाम प्रकाशित नहीं किए गए हैं। इस सूची के प्रकाश में आते ही बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस सूची पर आपत्ति व्यक्त की जो अमित शाह से लेकर भाजपा के देशप्रेमी छुटभयै तक ममता बनर्जी पर इस प्रकार हमला बोल दिये मानो किसी देशद्रोही से बात कर रहें हैं । जबकि देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद को भरोसा दिया कि यह अंतिम सूची नहीं है। यह मसौदा है। इसलिए जिनका नाम छूट गया है, उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वे दोबारा आवेदन कर अपनी बात रख सकते हैं। फिलहाल किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी। वहीं असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल जो खुद भाजपा में जुड़ने से पूर्व असम गण परिषद के सदस्य थे। ने राज्यवासियों से अपील की है कि वह किसी भी प्रकार से आशंकित ना हों । जिस किसी भी भारतीय नागरिक का नाम इसमें शामिल नहीं हुआ है उसका नाम अवश्य शामिल किया जाएगा। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी इस जारी एनआरसी की सूची को लेकर अपनी टिप्पणी में कहा कि ना तो हम इस सूची को इंकार कर रहें ना ही स्वीकार । सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि एनआरसी के अंतिम ड्राफ्ट के रिलीज के आधार पर अथाॅरिटी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती और जिन लोगों के नाम छूट गए है, उन्हें पूरा मौका मिलने के बाद ही कोई एक्शन लिया जाएगा।
यदि इन सभी बयानों को परखा जाए तो ममता बनर्जी के साथ-साथ, देश की सर्वोच्य अदालत (सुप्रीम कोर्ट), देश के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री, असम के राज्यपाल वे सभी देशद्रोही है जो इन 40 लाख धुसपैठियों को सूची में शामिल करने पूरा अवसर देने की वकालत कर रहें। परन्तु अमित शाह का बयान है कि ये सभी घुसपैठियें हैं । तो फिर इन सभी घुसपैठियों को भाजपा अध्यक्ष सूट-एट-साइट आदेश क्यों नहीं दे देते?  क्या जरूरत है संसद की?  क्या जरूरत है सुप्रीम कोर्ट की?  राज्यों के मुख्यमंत्रियों की क्या जरूरत है?
इस देश में अभी दो ही व्यक्ति है एक नरेन्द्र मोदी जो भारत के प्रधानमंत्री हैं दूसरा शेयर बाज़ार का सटोरिया अमित शाह को आज भाजपा का अध्यक्ष कम भारत का तानाशाह अधिक बनकर ना सिर्फ पूरी मीडिया तंत्र को पंतजलि विज्ञापनों के माध्यम लोकतंत्र के चौथेस्तंभ का नपुसंक बना दिया है।  साथ ही साथ चुनाव आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक,  सुप्रीम कोर्ट, उच्चतम अदालतों को पंगु बनाने का क्रम जारी है। यह भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और भाजपा जैसे संगठन का दुर्भाग्य ही होगा कि हम छद्म राष्ट्रवाद के चक्कर में देश को दो तानाशाह के गिरफ़्त में कहिं न बंध जाएं ? 
 नोटः यह लेखक के अपने विचार हैं। इसे लेख को प्रकाशित और पुनः प्रकाशित करने के लिये सभी स्वतंत्र है। । लेखक विधिज्ञाता व स्वतंत्र पत्रकार है। - शंभु चौधरी, अधिवक्ता

बुधवार, 8 अगस्त 2018

एनआरसी: तब भारतीय नागरिक कौन ?


कोलकाता- 7 अगस्त 2018
पिछले दिनों असम के गुवाहाटी शहर में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के संगठनों ने मिलकर सरकार के इस व्यवहार पर और नाम काटे जाने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 25 लाख हिन्दू हिन्दी व बांग्ला भाषी समाज के नाम एनआरसी की सूची से ग़ायब बतायें जा रहें हैं जिसे भाजपा के अध्यक्ष श्री अमित शाह बांग्लादेशी घुसपैठिये बताते नहीं थक रहे ।
असम में विदेशी नागरिकों के प्रश्न पर छात्र आंदोलन (1979-1985)  हुए । छात्र आंदोलन का एक गुट अगप बनकर सत्ता में आ गई। दूसरा गुट अल्फा के नाम  पर पाकिस्तानियों के सहयोग से भारत में आतंक का साम्राज्य फैला दिया । एक लंबा भय और आतंक का सृजन पूरे असम में फैला दिया गया । अगप के तात्कालिक गृह मंत्री भृगु फूकन ने अल्फा के साम्राज्य के लिये खुलकर तात्कालिक मुख्यमंत्री प्रफ्फुला कुमार महंत पर आरोप लगाये। अगप की सरकार गई । कांग्रेस की सरकार आ गई । आज वही प्रफ्फुला कुमार महंत भाजपा की सरकार में शामिल है। जिसके कार्यकाल में असम में सैकड़ों हिन्दी भाषी जनता को मौत के घाट सुला दिया गया था। हजारों हिन्दी भाषी व बँगला भाषियों को असम छोड़कर पलायन करना पड़ा था ।
एनआरसीः यानि कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मूल उद्देश्य बंग्लादेश से आये बंग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करनी व उसे भारतीय नागरिकता के मतदाता सूची से अलग करना है। बार-बार इस बात का उल्लेख हर जगह हो रहा है कि भारतीयों को घबड़ाने की या भयभीत होने की जरूरत नहीं । परन्तु जिस प्रकार भाजपा के नेताओं के बयान आ रहें हैं इससे पूरा देश  एक बार भयभीत तो हो ही चुका है कि क्या जिस तरह से असम में विदेशियों के नाम पर मूल भारतीय जिसमें  बड़ी संख्या में बिहार, उत्तरप्रदेश के भौजपुरी समाज, बंगाल के हिन्दू बंगाली समाज, पंजाब के पंजाबी या राजस्थान के मूल निवासी जो कई पुश्तों से असम में रह रहे हैं उनके नाम को तमाम दस्तावेज प्रस्तुत किये जाने के वाबजूद एनआरसी के दस्तावेज़ में शामिल नहीं किया गया और मजे कि बात है कि चंद दलाल मीडिया ने इन्हें विदेशी घुसपैठिये तक करार दे दिया ।
पिछले दिनों असम के गुवाहाटी शहर में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के संगठनों ने मिलकर सरकार के इस व्यवहार पर और नाम काटे जाने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 25 लाख हिन्दू हिन्दी व बांग्ला भाषी समाज के नाम,  सोची समझी साजिश के तहत एनआरसी की सूची से  ग़ायब बतायें जा रहें हैं जिसे भाजपा के अध्यक्ष श्री अमित शाह बांग्लादेशी घुसपैठिये बताते नहीं थक रहे ।  उनमें बड़ी संख्या में हिन्दू भारतीय की हैं, जबकि इस एनआरसी के बहाने अब तक 10 लाख से अधिक बंग्लादेशी मुसलमानों को भारतीय बना दिया गया है। सवाल उठता है तो फिर असली भारतीय कौन? जो भाजपा के अध्यक्ष अफवाह फैला रहे वो या फिर जिनके नाम एक साजिश के तहत काटे और जोड़े  जा रहें वो?
एक आंकड़े को यदि सही माना जाए तो असम के जिन-जिन इलाकों में 50 प्रतिशत की संख्या में मुसलमानों की आबादी हो चुकी है वहां की आबादी का महज 10 प्रतिशत नाम ही चिन्हीत किये गये अर्थात 45 प्रतिशत मुसलमानों को भारतीय मान लिया गया व इलाके हैं। हैलाकांदी, साउथ सालमारा, धुबड़ी व करीमगंज । ऐसे ही सैकड़ों गांव है जहां मुस्लिमों को खुले रूप में एनआरसी में दर्ज कर लिया गया जबकि हिन्दू भारतीयों के नाम सूची में नहीं शामिल किये गये। उदाहरण के लिये शोणितपुर जिले की ही बात कर लें इस क्षेत्र में लगभग 20 से 45 प्रतिशत प्रवासी भारतीय पुश्तों से अपना जीवन बसर कर रहें हैं  यहां की लगभग आधी आबादी का नाम ही एनआरसी से ग़ायब कर दिया गया। भाजपा एक प्रकार से भारतीय संवेदना के नाम पर देश के विभिन्न राज्यों में रमे बसे लोगों के बीच असुरक्षा की भावना का सृजन करने में सफल हो चुकी है। जिसे भले आज हम घुसपैठिये के नाम पर समर्थन दे लें, दरअसल जमीनी हकिकत कुछ ओर ही बयान कर रही है।  इसका परिणाम अंततः संपूर्ण भारतीयों को भोगना पड़ सकता है । शायद आप जिस राज्य में हैं आने वाले समय में आप भी एक दिन विदेशी बना दिये जायेगें। - शंभु चौधरी