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Saturday, June 27, 2009

कहानी: अपना मुकद्दमा वापस लेती हूँ..... -शम्भु चौधरी


अरे...आप चिन्ता मत किजिए....एक ठाहके के बीच ही वकील सा'ब ने अपने मुवक्किल जो गाँव के मुखिया भी हैं को कहा.....आपके लड़के को कोई सजा नहीं होगी।
"जी....जी... पर...आप तो जानते ही हैं कि अगले साल चुनाव है... पार्टी ने मुझे चुनाव लड़ने को कहा है... इस मामले में लड़के को सजा हो गई तो मेरी इज़्ज़त ही सारी मिट्टी में मिल जायेगी.... बीच में ही मुखिया जी बोल पड़े।"
"अरे सा'ब आप बस देखते जाईये....वकील सा'ब ने पुनः मुखिया जी को ढाढ़स बंधाया।"
एक ठहाका.....
फिर बोले..." ये तो आपके लड़के ने एक ही लड़की की इज़्ज़त लूटी है.. मुखिया जी...गाँव का कन्हैया है... पूरे गाँव की लड़कियोँ की भी... समझ रहे हैं न मैं क्या कहना चाह रहा हूँ...आप चिन्ता न करें .. फिर थोड़ा रुककर...मुखिया जी का लड़का है.. शौक भी तो मुखिया जैसे ही होने चाहिये।".. ठहाका......
"आप निश्चिंत रहें आपका काम हो जायेगा। एक लड़की की इज़्ज़त से ज्यादा जरूरी है आपकी इज़्ज़त को बचाना... आखिर आप हमारे गाँव के मुखिया भी तो हैं....वकील सा'ब ने यह बात कह कर मुखिया जी के दिल को मजबूत आधार प्रदान कर दिया"
हाँ ! सो तो है...मुखिया जी ने वकील सा'ब से सहमति जताते हुए कहा- "आप भी चिन्ता न करें बस किसी तरह हमारी इज़्ज़त को बचा लीजिये...आपको....गाँव की तिजौरी संभला दूँगा।"
"हूँ.... सो तो ठीक है.. पर आप तो जानते ही हैं... मामला पेचीदा बनता जा रहा है...आपने सुना नहीं कि कल किस तरह पत्रकारों ने कुत्ते की तरह पीछा किया था... बार-बार पूछ रहे थे.. कि मैं इस मामले की पैरवी क्यों कर रहा हूँ।
"बीच में ही टोकते हुए मुखिया जी ने पूछा.. फिर आपने क्या कहा उनको..."
- कहना क्या था वकील हूँ मेरा पेशा है अपने मुवक्किल की पैरवी करना.. जब तक अपराध साबित नहीं हो जाता, कानून की नज़र में कोई अपराधी नहीं है।.. मुखिया जी का लड़का तो निर्दोष है बेचारे को फंसाया गया है।...."
"फिर वे लोग (पत्रकार) पूछने लगे...कि वो जो मेडिकल रिपोर्ट है....?"
पास टेबल पर पड़े पानी के गिलास को उठाकर पानी पीते हुए...
"फिर क्या कहा आपने......एक साथ कई प्रश्नों से घिरे मुखिया जी पत्रकारों की बात सुनकर एकबार कांप से गये..... कड़ाके की ठंडक में भी चेहरे पर पसीना साफ झलकने लगा था"
"कहता क्या....कह दिया मामला अदालत में है...अदालत में देखा जायेगा वकील सा'ब ने जवाब दिया।"
"वकील सा'ब आप इस जिले के सबसे बड़े वकील हैं....."
"हां ... सो तो है ही... आपकी इज़्ज़त से कहीं ज्यादा मेरी इज़्ज़त का भी ख़्याल है मुझे।.... फिर कहने लगे कि मैंने आजतक कोई मुकदमा नहीं हारा है.. आप देखते रहिये...कोर्ट में लड़की की ऐसी इज़्ज़त उतारूँगा कि कमरे के अन्दर आपके लड़के ने क्या इज़्ज़त उतारी होगी वह भी भूल जायेगी।....ठहाका....."
(मानो वकील सा'ब यह बताना चाहते थे कि इज़्ज़त कचहरी के अन्दर ही उतरती है, इनकी हँसी में वासना की भूख नज़र आ रही थी।)
यह सुनकर मुखिया जी को अब थोड़ी राहत महसूस होने लगी थी।
"वकील सा'ब ने अपनी बात को बढ़ाते हुए आगे कहा- अपने नाम के साथ वकील लिखना बन्द कर दूँगा.. आपका मुक़द्दमा हार गया तो।"
अपने बैग से कुछ नोटों के बण्डल टेबल पर रखते हुए... "बस आप मामला लड़ते जाईए...किसी तरह से लड़की मामला उठा ले तो भी मैं समझौता करने को तैयार हूँ ...लड़के की शादी भी करनी ही है....मुखिया जी ने एक मझे-मझाये हुए अंदाज में वकील सा'ब की इंसानियत को भी परखने का प्रयास किया।"
"नहीं...नहीं....यह बात दिमाग में भी नहीं लायें...किसी के सामने बोल मत दीजियेगा.... सारा मामला हाथ से निकल जायेगा.... समझे न क्या कह रहा हूँ.....वकील सा'ब ने अपने अनुभव से मुखिया जी की इंसानियत को जिंदा ही दफ़ना दिया।..... फिर बोलने लगे न जात .....न पात...... ऐसी लड़की को तो गाँव में नहीं, शहर के कोठे पर होना चाहिये...... आपके पवित्र मंदिर जैसे घर की शोभा कैसे बन सकती है?...... जिसने आपकी इज़्ज़त को कचहरी में चुनौती दे दी हो........ मामला कमजोर पड़ जायेगा।...... आपके यह सब बोलने से........ कचहरी में कानून बोलता है,......... इंसानियत नहीं बोलती..........गवाह देने होते हैं...........फिर एक ठहाका........आपने सुना नहीं ....-"कानून अंधा होता है"........फिर एक ठहाका........ कमरे के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा हो गई थी, मानो किसी जानवर ने वकील के शरीर में प्रवेश कर सारे वातावरण में हड़कम्प पैदा कर दिया हो........मुखिया जी की बात ने कुछ ऐसा ही माहौल पैदा कर दिया था।"
"हां सो तो .....मुखिया जी ने अपनी बात को वापस लेते हुए कहा ...आप जैसा कहेंगे.. ठीक वैसा ही होगा.. वकील सा'ब ...आप पर मुझे पूरा भरोसा है। पर वो दो टकिया छोकड़ी तो मुँह पर लगाम देती ही नहीं....."
"सब ठीक हो जायेगा... कतरन की सी जुबान पर जब सूई चुभने लगेगी तो खुद व खुद जुबान भी बंद हो जायेगी... फिर एक ठहाका...हहाहहह....बस आप देखते जाईये।"
"हाँ.. पर.. मामला कमजोर है.....वो मेडिकल रिपोर्ट?...फिर एक प्रश्न के समाधान खोजने का प्रयास किया था मुखिया जी के मन ने"
"आप भी कैसी बात करते हैं....मुखिया जी....कैसा मामला....कोर्ट...कचहरी...थाना...पुलिस....पी.पी....पेशकार...सबतो आपके साथ खड़े हैं...बस वो जज का बच्चा नया आया है....उसे भी कुछ समय लगेगा..... सब ठीक हो जायेगा......।"
"हां!.........जज का नाम सुनते ही मुखिया जी को एक नई शंका ने घेर लिया ।
[मुखिया जी हर प्रश्न का समाधान पहले ही खोज लेना चाहेते थे]
अब तक वकील सा'ब की बातों से जितना आश्वस्त हुए थे, नये जज का नाम सामने आते ही पुनः चेहरे पर पसीने की बूंदे झलकने लगी थी..........पर आप तो बता रहे थे....कि जज को आप मेनैज कर लेंगे.....?
"कोशिश तो की थी......पर....मन ही मन में कुछ सोचते हुए अभी बताना मुनासिब नहीं होगा......अब वकील सा'ब ने मुखिया जी की कमजोर नबज़ को टटोलते हुए ....एक काम करियेगा...आप कल एक पेटी भिजवा दीजियेगा।"
"किसकी सेव की या संतरा की.. मुखिया जी ने सोचा कि शायद जज सा'ब को भेंट भेजने को कह रहे हैं वकील सा'ब...... वकील सा'ब से पूछा.."
"अरे इतने भोले मत बनिये....... मुखिया जी.. अभी आपका लड़का तो रिमाण्ड पर ही गया है.. ख़ुदा न करे, कल उसे जेल हो जाये। मुझे बताना पड़ेगा कि.... पेटी का क्या मतलब होता है।"
"हां...हाँ समझ गया.. कल सुबह आठ बजे तक आपके पास मेरा आदमी एक पेटी लेकर आ जायेगा।"
"तो बस आप भी समझो कि आपका काम हो गया"
दृश्य बदलता है: दिन का समय है सुहानी धूप ने मौसम को सुहावना बना दिया है।
"वाह... मदनगोपाल जी (वकील सा'ब का नाम).....आपने तो कमाल ही कर दिया.. क्या इज़्ज़त उतारी.... आपने.... उस लड़की की..... अदालत में मजा आ गया, जैसे लग रहा था, मनोरमा कहानी सुना रहे हों आप......वाह...... मज़्ज़्जा आआआअग्या।"
"दूसरे वकील ने कहा....अरे सा'ब मदनगोपाल जी का जोड़ा नहीं है अदालत में, कोई फांसी पर भी लटकता हो तो बचा लेंगे उसको।.....क्या टियूस्ट किया था, उस समय... आपने.... "अपने कपड़े खुद खोले थे कि लड़के ने खोले थे"......."
"तीसरे ने कहा...... अरे उस समय तो बड़ा मजा आ गया जब आपने उस लड़की से पूछा था...तुम और कितनों से संबंध रखती हो? सच मुझे तो लगा कि आपको सब पता है कि इस लड़की के कितने मर्दों से संबंध है.. वाह सा'ब!..... कहीं आप भी इस चक्कर में तो नहीं...... रहते..? ठहाका.....इतने राज की बात तो बस वही जान सकता है...."
"चौथे ने कहा देखा नहीं कैसे बात खुलते ही सहम गई बेचारी...... चिल्ला पड़ी...........नहीं.............नहीं मेरी और इज़्ज़त मत उतारो.........बेचारी......""मैं अपना मुकद्दमा वापस ले लेती हूँ।""" उसके वकील की तो आपने बोलती ही बन्द कर दी थी बेचारा शर्म के मारे सर नीचे कर लिया था ......ठहाका......"
" पुनः एक ने कहा- देखा नहीं कैसे भावनात्मक बातें कर रहा था.... नारी जाति .....नारी जाति.......जैसे कोर्ट में मुकद्दमा नहीं किसी फिल्म में भाषण देने आया हो।"
"दूसरे ने एक प्रश्न भरी निगाहों से मदनगोपाल जी से पूछा... सर वो फोटो कहाँ से मिली उसकी जिसमें उसके........" अरे रहने भी दो यार.... सब यहीं पूछ लोगे तो कल क्या सुनोगे वकील साब ने एक बार सबको अपना आभार व्यक्त करते हुए बात को समाप्त करने की चेष्टा की।"
तभी पास खड़े एक पत्रकार ने पूछ लिया... सर आपने मामला तो जीत ही लिया है मानो, पर यह तो बताते जाईये कि कल को यही घटना आपकी लड़की के साथ हो जाती तो आप क्या करते?....
पत्रकार के इस प्रश्न ने अचानक पास खड़े सभी वकीलों के चेहरे पर सन्नाटा ही पैदा कर दिया था । अभी तक जो हँस-हँस के वकील सा'ब को बधाई दे रहे थे, धीरे से सटक लिये... मदनगोपाल जी अकेले खड़े इस प्रश्न का उत्तर खोजने में लग गये। रातभर बिस्तर पर तड़पते रहे........
सुबह पुनः उसी अदालत में सभी खड़े थे..
जज साहेब ने अदालत की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया।
लड़की के बायन को पुनः दर्ज किया जाना था.... लड़की उठी और मदनगोपाल जी को हाथ जोड़ते हुए कहा..... आप मेरे पिता तुल्य हैं और कटघरे में जाकर खड़ी हो गई।
आज फैसला होना ही था यह सबकी जुबान पर था कि लड़की मुकद्दमा हार चुकी है। मदनगोपाल जी उठे....... अदालत के चारों तरफ देखा। अपने मुवक्किल को ध्यान से देखा उसके चेहरे पर उसकी हँसी देखी...... लड़की को देखते हुए कहा......
मैं इस मुकदमे को नहीं लडूँगा.. अपना वकालतनाम वापस लेता हूँ।
अदालत परिसर में यह बात आग की तरह फैल गई....... मदन जी ने मुकदमा लड़ने से इंकार कर दिया है।
जज ने स्वीकृति प्रदान करते हुए लिखा काश! मदनगोपाल जी की जगह यह गौरव मेरे को मिल पाता...... मदनगोपाल जी ने आज इस अदालत में जो इतिहास रचा है.. वह हमेशा याद रखा जायेगा।
नोट: सभी पात्र और घटना काल्पनिक है।


लेखक का संपर्क पता:
शम्भु चौधरी, एफ-डी- 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता- 700106 फोन: 0-9831082737

Wednesday, March 4, 2009

साहित्य-संगीत को साथ लेकर चलने की जरुरत: पं. जसराज

Pandit Jasraj, Pramod Shah and  Dr. Krishn Bihari Mishra

संगीत मार्तण्ड पद्मविभूषण पंडित जसराज प्रमोद शाह द्वारा तीन खंडों में परिकल्पित, संकलित एवं संपादित पुस्तक ‘थॉट्स ऑन रिलीजियस पॉलिटिक्स इन इंडिया’ (1857-2008) का लोकार्पण करते हुए। साथ में हैं डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र, प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश, श्री हरि कृष्ण चौधरी और एकदम बायें प्रमोद शाह।

कोलकाता: भारत को साहित्य व संगीत को साथ लेकर चलने की जरुरत है, इसी से मनुष्यता और सद्भाव बचेगा। मुझे कुछ लिखना-पढ़ना नहीं आता। जो कुछ है, उसे गाकर जी लेता हूँ। ये बातें संगीत मार्तण्ड पद्मविभूषण पंडित जसराज ने प्रमोद शाह द्वारा तीन खंडों में परिकल्पित, संकलित एवं संपादित पुस्तक ‘थॉट्स ऑन रिलीजियस पॉलिटिक्स इन इंडिया’ (1857-2008) का लोकार्पण करते हुए कही। समारोह की अध्यक्षता डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने की। समारोह के विशिष्ट अतिथि प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने भी अपने विचार रखे।
Religious Politics In Indiaभारतीय भाषा परिषद में आयोजित लोकार्पण समारोह में पंडित जसराज ने कहा, ‘मैं एक समारोह में गा रहा था तो पीछे से किसी ने फरमाया, अल्लाह हो मेहरबान। इसे सुन कर मैं क्षण भर के लिए खो गया इसके बारे में जब मैंने अपनी बेटी को फोन किया, तो उसने बताया कि भगवान ने आपको एक विशेष काम के लिए धरती पर भेजा है। अपना विचार प्रस्तुत करने के बाद पंडित जसराज ने ‘चिदानन्द शिवोह्म, अल्लाह हो मेहरबान’ और शिवशंकर महादेव गाकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। हर-हर महादेव कहते हुए उन्होंने प्रमोद शाह को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा, मेरे मुंह से अभी हर-हर महादेव का स्वर निकला है। इसलिए आपकी यह किताब दुनिया को बहुत पसंद आयेगी।’ मौके पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने कहा कि सांप्रदायिकता धार्मिक नहीं राजनीतिक प्रतिक्रिया है। इतिहास के गड़े मुर्दे को उखाड़ने से देश शक्तिशाली नहीं होगा। जो भारत को गढ़ना और बनाना चाहते हैं, उन्हें भाषा, धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर उठ कर सद्भाव बनाने की पहल करनी चाहिए। समारोह की अध्यक्षता मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि साहित्य, संगीत व अध्यात्म का स्वर राजनीति छोड़ दे, तो वह लंगड़ी हो जायेगी। रामकृष्ण परमहंस व महात्मा गांधी से बड़ा धर्मनिरपेक्ष कौन हो सकता है? गांधी और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे लोगों ने समझाया कि सभी मनुष्य एक हैं। गांधी जी ने सचेत करते हुए कहा था कि आज हमारा देश अधार्मिक हो रहा है। लोकार्पित पुस्तक के बारे में डॉ. मिश्र ने कहा कि यह पुस्तक नई पीढ़ी के लिए प्रेरक और हमारी पीढ़ी के लिए गौरव की बात है। समारोह में पंडित जसराज की उपस्थिति ने समारोह में प्राण प्रतिष्ठा कर दी है। प्रमोद शाह ने पुस्तक को संपादित करने में जो अनुभव और संघर्ष झेला, उसे सुनाया और कहा कि धर्म अलग है। धर्म के नाम पर राजनीति अलग है। धर्म को संस्कृति में रखने पर देश सुधरता है और राजनीति में रखने पर विकृत होता है। धार्मिक मतभेदों को भुला कर हमें देश को खुशहाल करने की कोशिश करनी चाहिए। कार्यक्रम का संचालन नंदलाल शाह व स्वागत भाषण संयोजक महेश चन्द्र शाह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ.शशि शेखर शाह ने किया। सोसायटी फाॅर नेशनल अवेयरनेस के अध्यक्ष व प्रकाशक हरि कृष्ण चौधरी ने कहा कि आनेवाली पीढ़ी के लिए यह पुस्तक प्रेरणादायक साबित होगी। कार्यक्रम के शुरुआत में श्रीमती अनुराधा खेतान ने तीनों पुस्तकों का ऑडिओ-वीडियो चित्रण दिया।

Monday, February 16, 2009

परिचय: पद्म विभूषण श्रीमती महाश्वेता देवी : -शम्भु चौधरी


Mahasweta Deviमहाश्वेता देवी एक ऐसा नाम जिसका ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। जिसने अपनी मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा है। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया। महाश्वेता देवी का जन्म सोमवार 14 जनवरी १९२६ को ईस्ट बंगाल जो भारत विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान में (बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था।
गत 13 फरवरी '2009 को सुबह 11.30 बजे सहारा समय (कोलकाता) की वरिष्ठ पत्रकार सईदा सादिया अज़ीम , हिन्द-युग्म (दिल्ली से) श्री शैलेश भारतवासी और मैं खुद कोलकाता स्थित महाश्वेता देवी के घर उसने मिलने गये थे।
महाश्वेता जी ने अपना सारा जीवन ही मानो आदिवासियों के साथ गुजार दिया हो। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के संघर्ष में खर्च कर दिया हो। उन्होंने पश्चिम बंगाल की दो जनजातियों 'लोधास' और 'शबर' विशेष पर बहुत काम किया है। इन संघर्षों के दौरान पीड़ा के स्वर को महाश्वेता ने बहुत करीब से सुना और महसूस किया है।
Mahasewta Devi and Shambhu Choudharyपीड़ा के ये स्वर उनकी रचनाओं में साफ-साफ सुनाई पड़ते हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां' हैं। आपको पद्मविभूषण पुरस्कार (२००६), रैमन मैग्सेसे (1997), भारतीय ज्ञानपीठ(1996) सहित कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। पिछले दशक में महाश्वेता देवी को कई साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आपको मग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है जो एशिया महादीप में नोबेल पुरस्कार के समकक्ष माना जाता है।
फिर भी आप बोलती हैं कि आपने किसी पुरस्कार के लिये कार्य नहीं किया। बार-बार आदिवासी के प्रश्न पर विचलित होते इनको कई बार देखा गया। कहती हैं कि "हम लोग तब तक अपने आपको सभ्य नहीं कह सकतें,जब तक हम आदिवासियों के जीवन को नहीं बदल देते। आपने 'संथाल', 'लोधास', 'शबर' और मुंदास जैसे खास आदिवासी (आदिवासी जन जाति) लोगों के जीवन को बहुत गहराई से न सिर्फ अध्ययन ही किया इन पर बहुत कुछ अपनी कथाओं में समेटने का प्रयास भी किया है, आज भी आपको ऐसे समाचार विचलित कर देतें हैं जहाँ किसी आदिवास के ऊपर ज़ुल्म किया जाता है। आप सदैव से सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिक विषयों पर अपनी कलम से प्रहार करती रहीं हैं। आप एक जगह लिखती हैं- ‘‘एक लम्बे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी.....।’’ आपने अपना पूरा जीवन और साहित्य, आदिवासी और भारतीय जनजातीय समाज को समर्पित कर दिया है। इसलिए नौ कहानियों संग्रह में से आठ कहानियों के केन्द्र में आदिवासी जाति केन्द्रित है, जो आज भी समाज की मूख्यधारा से कटकर जी रहा है।
Mahasveta Deviलेखिका महाश्वेता देवी 14 जनवरी 2009 को 83 वें साल की हो गई, पर इनके चेहरे पर हमें कहीं कोई थकान देखने को नहीं मिला। बातें ऐसे करती हैं जैसे कोई परिवार का सदस्य ही हो हम। वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान उनकी लेखनी ने लोगों को दहला दिया था। आज भी किसी आंदोलन के नाम आपको आगे देखा जा सकता है। जब मैंने यह प्रश्न किया कि-"आप तो बुद्धदेव बाबू (वर्तमान में बंगाल के मुख्यमंत्री) को तो बहुत मानती थी, फिर नंदीग्राम और सिंगूर के मुद्दे पर आपने उनका साथ नहीं दिया?" बोलने लगी- " मैं बहुत दिन राजनीतिक की हूँ। किसानों की जमीं को दखल करके उद्योग कैसे लगाया जा सकता है?" तुम्हीं सोचो... फिर थोड़ा रूक कर किसान भूमिहीन हो जायेगा तो खायेगा क्या?
तब तलक फोटोग्राफर भी आ गया था। उसे देखते ही एकदम से उस पर बरस पड़ी "एई...ई अमार छ्वी कोथाई?" फिर मुस्कराते हुए बोलीं- " तारा.. ताड़ी छ्वी तुलो ... ओनेक काज कोरते होवे...."( देवज्योति फोटोग्रफर को देखते ही उस पर नाराज हो गई.... ए लड़के ... मेरी फोटौ कहाँ है? ... फिर थोड़ा मुस्कारते हुए कहा.. जल्दी से फोटो ले लो मुझे बहुत काम करना है अभी) इससे पहले जब हिन्द-युग्म के श्री शैलेश भारतवासी उनसे बात करना शुरू ही किये थे तो बात को शुरू करने के लिये मैंने जैसे ही बंगला में उनका परिचय देना शुरू किया तो बोलने लगी- "तुमी हिन्दीते बोलो... मैं अच्छा से हिन्दी जानती हूँ।"
आपने साहित्य व सांस्कृतिक आंदोलन के साथ राजनीतिक आन्दोलनों में भी भाग लिया है। तसलीमा नसरीन को कोलकाता से हटाये जाने के मामले को लेकर वे पश्चिम बंगाल व केंद्र सरकार के रवैये से काफी आहत हैं। आप बोलती हैं कि " इधर देश में जहाँ मुस्लमान हैं वहाँ हमलोग मुस्लीम उम्मीदवार तो जिधर हिन्दू हैं उधर हिन्दू उम्मीदवार खड़े करते हैं इससे देश कैसे चलेगा। सोचो तब तो उनकी भाषा में ही हमें बात करना होगा। हमने उनके साथ जो पल गुजारा इसे आपके साथ बाँटने का यह प्रयासभर है। किसी राजनैतिक विचारधारा से हमें कोई सरोकार नहीं है, फिर भी कहीं कोई बात आपको राजनीति सी लगती हो तो उसे नजरांदाज कर देंगे। इस अवसर पर आपको मेरे द्वारा संपादित कोलकाता से प्रकाशित एक समाजिक पत्रिका "समाज विकास" के कुछ साहित्य विशेषांक भी भेंट किया जिसे आपने स्वीकार करते हुए कहा कि- "खूब भालो काज कोरछो तुमी" ( खूब अच्छा काम करते हो तुम) चेहरे पर तेजस्व की रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे साक्षात हमने माँ का दर्शन कर लिया हो।
परिचय:
आप न सिर्फ एक प्रख्यात लेखिका एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। महाश्वेता देवी का जन्म सोमवार 14 जनवरी १९२६ को ईस्ट बंगाल जो भारत विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान में (बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था। आपके पिता मनीष घटक एक कवि और एक उपन्यासकार थे, और आपकी माता धारीत्री देवी भी एक लेखकिका और एक सामाजिक कार्यकर्ता थी। आपकी स्कूली शिक्षा ढाका में हुई। भारत विभाजन के समय किशोरवस्था में ही आपका परिवार पश्चिम बंगाल में आकर बस गया। बाद में आपने विश्वभारती विश्वविद्यालय,शांतीनिकेतन से बी.ए.(Hons)अंग्रेजी में किया, और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम.ए. अंग्रेजी में किया। कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में आपने अपना जीवन शुरू किया। तदुपरांत आपने कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में नौकरी भी की। तदपश्चात 1984 में लेखन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आपने सेवानिवृत्त ले ली।
महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपकी पहली उपन्यास, "नाती", 1957 में अपनी कृतियों में प्रकाशित किया गया था
‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है। जो 1956 में प्रकाशन में आया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पूना, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। आप बताती हैं कि "पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी और उपन्यास है।" उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में, आपकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के करीब (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुकी है।
लिंक के साथ है नीचे :
आपकी कुछ कृतियां हिन्दी में:(सभी बंग्ला से हिन्दी में रुपांतरण)
अक्लांत कौरव, अग्निगर्भ, अमृत संचय, आदिवासी कथा, ईंट के ऊपर ईंट, उन्तीसवीं धारा का आरोपी, उम्रकैद, कृष्ण द्वादशी, ग्राम बांग्ला, घहराती घटाएँ, चोट्टि मुंडा और उसका तीर, जंगल के दावेदार, जकड़न, जली थी अग्निशिखा, झाँसी की रानी, टेरोडैक्टिल, दौलति, नटी, बनिया बहू, मर्डरर की माँ, मातृछवि, मास्टर साब, मीलू के लिए, रिपोर्टर, रिपोर्टर, श्री श्री गणेश महिमा, स्त्री पर्व, स्वाहा और हीरो-एक ब्लू प्रिंट आदि...

Contact Address: Smt. Mahasveta Devi, W-2C, 12/3 Phase- II, Golf Green, Kolakata - 700095 Phone: 033-24143033

Sunday, February 15, 2009

हिन्दुस्तानी एकेडेमी का साहित्यकार सम्मान समारोह:

Dr.Kavita Vachaknavee


इलाहाबाद, 6 फ़रवरी 2009 ।
"साहित्य से दिन-ब-दिन लोग विमुख होते जा रहे हैं। अध्यापक व छात्र, दोनों में लेखनी से लगाव कम हो रहा है। नए नए शोधकार्यों के लिए सहित्य जगत् में व्याप्त यह स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक है।" उक्त विचार उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मन्त्री डॊ.राकेश धर त्रिपाठी ने हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा आयोजित सम्मान व लोकार्पण समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। उत्तर प्रदेश भाषा विभाग द्वारा संचालित हिन्दी व उर्दू भाषा के संवर्धन हेतु सन् 1927 में स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी की श्रेष्ठ पुस्तकों के प्रकाशन की श्रृंखला में इस अवसर पर अन्य पुस्तकों के साथ एकेडेमी द्वारा प्रकाशित डॊ. कविता वाचक्नवी की शोधकृति "समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य" को लोकार्पित करते हुए उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक अत्यन्त चुनौतीपूर्ण विषय पर केन्द्रित तथा शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है। इस अवसर पर एकेडेमी के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित 'सूर्य विमर्श' तथा एकेडेमी द्वारा वर्ष १९३३ ई. में प्रकाशित की गयी पुस्तक 'भारतीय चित्रकला' का द्वितीय संस्करण (पुनर्मुद्रण) भी लोकार्पित किया गया। किन्तु जिस पुस्तक ने एकेडेमी के प्रकाशन इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर सबको अचम्भित कर दिया है वह है डॉ. कविता वाचक्नवी द्वारा एक शोध-प्रबन्ध के रूप में अत्यन्त परिश्रम से तैयार की गयी कृति "समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य"। इस सामग्री को पुस्तक का आकार देने के सम्बन्ध में एक माह पूर्व तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। स्वयं लेखिका के मन में भी ऐसा विचार नहीं आया था। लेकिन एकेडेमी के सचिव ने संयोगवश इस प्रकार की दुर्लभ और अद्‌भुत सामग्री देखते ही इसके पुस्तक के रूप में प्रकाशन का प्रस्ताव रखा जिसे सकुचाते हुए ही सही इस विदुषी लेखिका द्वारा स्वीकार करना पड़ा। कदाचित्‌ संकोच इसलिए था कि दोनो का एक-दूसरे से परिचय मुश्किल से दस-पन्द्रह मिनट पहले ही हुआ था। यह नितान्त औपचारिक मुलाकात अचानक एक मिशन में बदल गयी और देखते ही देखते मात्र पन्द्रह दिनों के भीतर न सिर्फ़ बेहद आकर्षक रूप-रंग में पुस्तक का मुद्रण करा लिया गया अपितु एक गरिमापूर्ण समारोह में इसका लोकार्पण भी कर दिया गया। रंग शब्दों को लेकर हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला शोधकार्य है। इसके साथ ही साथ महाप्राण निराला के कालजयी काव्य का रंगशब्दों के आलोक में किया गया समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन भावी शोधार्थियों के लिए एक नया क्षितिज खोलता है। निश्चय ही यह पुस्तक हिदी साहित्य के अध्येताओं के लिए नयी विचारभूमि उपलब्ध कराएगी।
Dr.Kavita Vachaknavee's Book
इस समारोह में एकेडेमी की ओर से हिन्दी, संस्कृत एवम उर्दू के दस लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों प्रो. चण्डिकाप्रसाद शुक्ल, डॉ. मोहन अवस्थी, प्रो. मृदुला त्रिपाठी, डॉ. विभुराम मिश्र, डॉ. किशोरी लाल, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर को सम्मानित भी किया गया। यद्यपि इनमें से डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर अलग-अलग व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, तथापि सभागार में उपस्थित विशाल विद्वत्‌ समाज के बीच छः विद्वानों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए शाल, नारियल, व सरस्वती की अष्टधातु की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किए गए। एकेडेमी द्वारा अन्य अनुपस्थित विद्वानों के निवास स्थान पर जाकर उन्हें सम्मान-भेंट व प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर दिया जाएगा।
सम्मान स्वीकार करते हुए अपने आभार प्रदर्शन में डॊ. कविता वाचक्नवी ने कहा कि इस लिप्सापूर्ण समय में कृति की गुणवता के आधार पर प्रकाशन का निर्णय लेना और रचनाकार को सम्मानित करना हिन्दुस्तानी एकेडेमी की समृद्ध परम्परा का प्रमाण है, जिसके लिए संस्था व गुणग्राही पदाधिकारी निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं।
आरम्भ में हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव डॊ. एस. के. पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत किया। उल्लेखनीय है कि वे स्वयं संस्कृत के विद्वान हैं , उनके कार्यकाल में एकेडेमी का सारस्वत कायाकल्प हो गया है। इस अवसर पर समारोह के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त ने सरस्वती दीप प्रज्वलित किया और सौदामिनी संस्कृत विद्यालय के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया। एकेडेमी के ही अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने खचाखच भरे सभागार में उपस्थित गण्यमान्य साहित्यप्रेमियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। *

Saturday, February 14, 2009

यह भी एक युद्ध है - महाश्वेता देवी

Mahasweta Devi


इन दिनों मैं बेतरह उद्विग्न हूँ। इसकी वजह बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन का दु:ख है। वे वैध वीसा लेकर भारत में रह रही हैं फिर भी उन्हें दिल्ली की एक अज्ञात जगह पर दो महीने से नजरबंद कर रखा गया है। तसलीमा के दु:सह्य एकाकीपन, अनिश्चयता और मृत्युमय निस्तब्धता से उनकी मुक्ति की माँग को लेकर हम यथासाध्य आंदोलन कर रहे हैं और इसी तरह की मुहिम की देशव्यापी जरूरत भी शिद्दत से महसूस करते हैं।
मैं पूछना चाहती हूँ कि तसलीमा को आखिर बंदी जीवन-यापन क्यों करना होगा? उन्हें स्वाभाविक जीवन-यापन क्यों नहीं करने दिया जा रहा है? इन सवालों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को भी विचलित किया है। तसलीमा को कोलकाता लौटाने की माँग को लेकर इसी महीने 14 जनवरी को बंगाल के मुस्लिम बुद्धिजीवी सामने आए। डॉ. गियासुद्दीन और डॉ. शेख मुजफ्फर हुसैन सरीखे विशिष्ट बुद्धिजीवियों ने कोलकाता में एक सभा कर और उसमें सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि तसलीमा को तत्काल कोलकाता लौटाया जाए और उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए, पर सामान्य जीवन भी जीने दिया जाए। उस सभा में मैं भी उपस्थिति थी और यह बात मुझे अत्यंत प्रीतिकर लगी कि मुसलमान भी अब तसलीमा के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। उस सभा से यह भी स्पष्ट हो गया कि यह धारणा भ्रांत है कि सभी मुसलमान तसलीमा के विरुद्ध हैं। बंगाल के मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने 'धर्म मुक्त मानव मंच' नामक संस्था बनाकर इस मामले पर जल्द ही रैली और कनवेंशन करने का भी एलान किया है।
Taslima
रही, दूसरे बुद्धिजीवियों की बात, तो अपर्णा सेन, शंख घोष, सुकुमारी भट्टाचार्य, शुभ प्रसन्न, कौशिक सेन, जय गोस्वामी, विभाष चक्रवर्ती, साँवली मित्र समेत सैकड़ों बुद्धिजीवियों ने तसलीमा को कोलकाता लौटाने की माँग को लेकर पिछले महीने 22 दिसम्‍बर को कोलकाता में एक विशाल रैली की थी। उसके बाद दो जनवरी को इसी माँग को लेकर बुद्धिजीवियों ने कोलकाता के महाबोधि सोसाइटी सभागार में विशाल सभा की थी। उस दोनों में भी मैं शरीक हुई थी।
बंगाल के बुद्धिजीवी तसलीमा के लिए बहुत जल्द फिर सड़क पर उतरेंगे। मैं भी इस उम्र में भी पदयात्रा करूँगी और जो कुछ भी संभव है, करूँगी। मेरे लिए यह भी एक युद्ध है। एक स्त्री और एक लेखिका नजरबंद रहे, तो हम चैन की साँस आखिर कैसे ले सकते हैं? इसीलिए हम युद्धरत रहने का संकल्प लेते हैं और यही अपेक्षा भारत की सभी भाषाओं के लेखकों से करते हैं। पिछले महीने दिल्ली में भी भारतीय भाषाओं के लेखकों ने एक सभा की थी। मुझे बताया गया कि उस सभा में भी सर्वाधिक मुखर शमसुल इस्लाम थे। वे तसलीमा के पक्ष में ठोस आंदोलनात्मक कार्यक्रम के हिमायती थे। उस सभा में मलयालम के लेखक ए.अच्युतन, हिन्दी के राजेंद्र यादव, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, पंकज बिष्ट, अरुण कमल, रामशरण जोशी, संजीव, सुरेश सलिल, अनिल चमड़िया समेत कई लेखक जुटे थे। जिस दिन दिल्ली में यह सभा हुई थी, उसी दिन कुलदीप नैयर, खुशवंत सिंह, अरुंधती राय और एमए बेबी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिख कर तसलीमा को कोलकाता लौटाने की माँग की थी। हिन्दी लेखकों की तरफ से भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह माँग की गई है। तसलीमा के लिए आवाज केरल से भी उठ रही है और उत्तर प्रदेश से भी।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने राय की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को खुश करने के लिए तसलीमा को बंगाल से निर्वासित किया। मई में बंगाल में पंचायत चुनाव है और उस चुनाव में जीतने के लिए मुस्लिम वोटों की उन्हें दरकार है। केंद्र सरकार की तरफ से यह मामला देख रहे प्रणव मुखर्जी अपनी कुर्सी बचाने के लिए बुद्धदेव के खिलाफ जाहिर है, कोई काम नहीं करेंगे। मुझे पता है, प्रणव मुखर्जी ने तसलीमा को ‘द्विखंडित’ से कतिपय पृष्ठ वापस लेने के लिए बाध्य किया। तसलीमा ने वे पृष्ठ सिर्फ इसलिए वापस लिए, क्योंकि वह कोलकाता लौटना चाहती हैं, लेकिन प्रणव मुखर्जी और प्रियरंजन दासमुंशी इतने क्रूर और बर्बर हैं कि अब तसलीमा को कोलकाता लौटाने की बजाय, उनसे सार्वजनिक तौर पर मुसलमानों से माफी माँगने को कह रहे हैं। अपने संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के मुस्लिम वोटों के लिए वे इतना गिर सकते हैं, यह भी देश ने देख लिया। बुद्धदेव का ही नहीं, प्रणव और दासमुंशी का भी धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा उतर गया है। प्रणव मुखर्जी और दासमुंशी ने जो जघन्‍य सांस्‍कृतिक अपराध किया है, उसका जवाब उन्‍हें तसलीमा के पाठक और साहित्य के करोड़ों पाठक देंगे। हिन्‍दुस्‍तान से साभार

Friday, February 13, 2009

भारत में जो किसान सोना पैदा कर रहे हैं वे तो भूखों मर रहें हैं


Shambhu Choudharyभारत के अर्थशास्त्री जब तक वातानुकूलित चेम्बर में बन्द होकर विदेशी ज्ञान के बल पर भारत के भाग्य का फैसला करते रहेंगे तब तलक भारत के किसानों का कभी भला नहीं हो सकता। भारत में जो किसान सोना पैदा कर रहे हैं वे तो भूखों मर रहें हैं और जो लोग इसका व्यापार कर रहें हैं वे देश के सबसे बड़े धनवान होते जा रहें हैं। इसकी मूल समस्या है हमारे अन्दर का ज्ञान जो गलत दिशा से अर्जित की हुई है।
पूरा लेख इस लिंक को चटका कर देंखे।

महाश्वेता देवी से एक मुलाकात

Shambhu Choudhary<br />With Mahasewta Devi

चित्र में महाश्वेता जी, शम्भु चौधरी के साथ एक दुर्लभ मुद्रा में


कोलकाता, 13 फरवरी'2009: आज दिन के लगभग 11.30 बजे सहारा समय (कोलकाता) की वरिष्ठ पत्रकार सईदा सादिया अज़ीम , हिन्द-युग्म (दिल्ली से) श्री शैलेश भारतवासी और मैं खुद कोलकाता स्थित महाश्वेता देवी के घर उसने मिलने गये। उस समय की ली गई एक तस्वीर जिसमें महाश्वेता जी एक दुर्लभ मुद्रा में बात करती हुई। जिसे हम यहाँ अपने पाठकों के लिये जारी कर रहें हैं, इस अवसर पर महाश्वेता जी से लिये गये साक्षात्कार को जल्द ही "हिन्द-युग्म" और "ई-हिन्दी साहित्य सभा" पर जारी किया जायेगा। - शम्भु चौधरी

Thursday, February 12, 2009

बंगाल के दूत: कृपाशंकर चौबे

Kripa Shanker Chobey

कोलकाता : बांग्ला के सुपरिचित कथाकार सुनील गंगोपाध्याय का कहना है कि हिंदी के लेखक कृपाशंकर चौबे बंगाल की साहित्य, कला व संस्कृति के बारे में कई बंगालियों से ज्यादा जानते हैं। 20 वर्षो से शोध में जुटे डॉ चौबे ने 10 किताबें लिखी हैं। वे हिंदी प्रदेशों में बंगाल के दूत हैं। पुस्तक मेले में उन्होंने अपने लिखित बयान में ये बातें कहीं। कोलकाता पुस्तक मेले में आनंद प्रकाशन के स्टाल पर डॉ चौबे की दो नयी पुस्तकों-समाज, संस्कृति और समय तथा रंग, स्वर और शब्द के लोकार्पण समारोह में श्री गंगोपाध्याय की उक्तियों को पढ़ा गया। उन्होंने कहा कि बंगाल में हिंदी में लिखनेवाले डॉ चौबे हिंदी के मौलिक लेखक हैं, इसलिए दोनों ही भाषाएं उनकी ऋणी हैं। रंग, स्वर और शब्द का लोकार्पण साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि अरुण कमल ने किया, जबकि समाज, संस्कृति और समय का लोकार्पण इंद्रनाथ चौधरी ने किया। इस मौके पर श्री कमल व श्री चौधरी ने कहा कि दोनों ही किताबें समकालीन बांग्ला साहित्य, कला व संस्कृति का मुकम्मल परिचय कराती हैं। आलोचक श्रीनिवास शर्मा ने कहा कि डॉ चौबे ने हिंदी व बांग्ला के बीच सेतु बनाने का काम किया है। समारोह का संचालन वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर ने किया। आनंद प्रकाशन के दिनेश त्रिवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

Sunday, February 8, 2009

जीवन ही ऊर्जा है - शम्भु चौधरी


Shambhu Choudharyआप और हम सभी साधारण प्राणी मात्र हैं। हमारे जीवन में हर जगह महापुरुषों की उपस्थिति संभव नहीं हो सकती। यह कार्य खुद ही हमें करना होगा, जिसे हम इस "जीवन उर्जा" के स्त्रोत से पूरा करने का प्रयास करेंगे।
हमने देखा है कि कई बार परिवार में कोई घटना घटती है तो हम उस घटना की सूचना मात्र से ही रो पड़ते हैं या किसी खुशी के समाचार से मिठाईयाँ बाँटने लग जाते हैं। हम किसी भी झण या तो खुद को कमजोर अनुभव करने लगते हैं या दौड़ने लगते हैं। किसी इच्छा पूर्ति से जब हम परिवार में खुशियाँ बाँटते हैं तो आशानुकूल न होने पर गम में पूरे वातावरण को परिवर्तित कर देते हैं।
परन्तु श्री अर्जुन के समक्ष ऐसी कोई घटना अकस्मात नहीं घटती है, फिर भी श्री अर्जुन अपने आपको शिथिल क्यों समझने लगे थे। -
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Tuesday, January 27, 2009

साहित्य शिल्पी: प्ररेणा उत्सव


Rajiv Ranjan Prasadसाहित्य शिल्पी ने अंतरजाल पर अपनी सशक्त दस्तक दी है। यह भी सत्य है कि कंप्यूटर के की-बोर्ड की पहुँच भले ही विश्वव्यापी हो, या कि देश के पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण में हो गयी हो किंतु बहुत से अनदेखे कोने हैं, जहाँ इस माध्यम का आलोक नहीं पहुँचता। यह आवश्यकता महसूस की गयी कि साहित्य शिल्पी को सभागारों, सडकों और गलियों तक भी पहुचना होगा। प्रेरणा उत्सव इस दिशा में पहला किंतु सशक्त कदम था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करने लिये साहित्य शिल्पी ने 25/01/2009 को गाजियाबाद स्थित भारती विद्या सदन स्कूल में लोक शक्ति अभियान के साथ मिल कर प्रेरणा दिवस मनाया। सुभाष चंद्र बोस एसे व्यक्तित्व थे जिनका नाम ही प्रेरणा से भर देता है। साहित्य शिल्पी के लिये भी हिन्दी और साहित्य के लिये जारी अपने आन्दोलन को एसी ही प्रेरणा की आवश्यकता है। कार्यक्रम का शुभारंभ अपने नियत समय पर, प्रात: लगभग साढ़े दस बजे प्रसिद्ध विचारक तथा साहित्यकार बी.एल.गौड के आगमन के साथ ही हुआ। मंच पर प्रसिद्ध शायर मासूम गाजियाबादी तथा सुभाष के चिंतन पर कार्य करने वाले सत्यप्रकाश आर्य भी उपस्थित थे। मंच पर साहित्य शिल्पी का प्रतिनिधित्व चंडीगढ से आये शिल्पी श्रीकांत मिश्र ‘कांत’ ने किया।
नेताजी सुभाष की तस्वीर पर पुष्पांजलि के साथ कार्यक्रम का आरंभ किया गया। तत्पश्चात लोक शक्ति अभियान के मुकेश शर्मा ने आमंत्रित अतिथियों का अभिवादन किया एवं लोक शक्ति अभियान से आमंत्रितों को परिचित कराया। नेताजी सुभाष के व्यक्तित्व पर बोलते हुए तथा विचारगोष्ठी का संचालन करते हुए योगेश समदर्शी ने युवा शक्ति का आह्वान किया कि वे अपनी दिशा सकारात्मक रख देश को नयी सुबह दे सकते हैं। काव्य गोष्ठी का संचालन श्री राजीव रंजन प्रसाद ने किया।


Masum Gajiyavadiगाजियाबाद के शायर मासूम गाजियाबादी ने अपनी ओजस्वी गज़ल से काव्य गोष्ठी का आगाज़ किया। अमर शहीदों को याद करते हुए उन्होंने कहा :-
भारत की नारी तेरे सत को प्रणाम करूँ
दुखों की नदी में भी तू नाव-खेवा हो गई
माँग का सिंदूर जब सीमा पे शहीद हुआ
तब जा के कहा लो मैं आज बेवा हो गई


पाकिस्तान और सीमापार आतंकवाद पर निशाना साधते हुए मासूम गाजियाबादी आगे कहते हैं:
मियाँ इतनी भी लम्बी दुश्मनी अच्छी नहीं होती
कि कुछ दिन बाद काँटा भी करकना छोड़ देता है
Subhash Nirawसुभाष नीरव ने अपनी कविता सुना कर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया। उन्होने कहा -
राहो ने कब कहा हमें मत रोंदों
उन्होंने तो चूमे हमारे कदम और खुसामदीद कहा
ये हमीं थे ना शुकरे कि पैरों तले रोंदते रहे
और पहुंच कर अपनी मंजिल तक
उन्हें भूलते भी रहे....


मास फॉर अवेयरनेस मूवमेंट चलाने वाले नीरज गुप्ता ने सुभाष के व्यक्तित्व पर बोलते हुए राष्ट्रीय चेतना के लिये छोटे छोटे प्रयासों की वकालत की। उन्होने अपने कार्टूनो को उस देश भक्ति का हिस्सा बताया जो लोकतंत्र को बचाने व उसे दिशा देने में आवश्यक है।
उनके वक्तव्य के बाद कार्यक्रम को कुछ देर का विराम दिया गया और उपस्थित अतिथि कार्टून प्रदर्शिनी के अवलोकन में लग गये। कार्यक्रम का पुन: आरंभ किया गया और श्रीकांत मिश्र कांत सुभाष की आज आवश्यकता पर अपना वक्तव्य दिया।
Yogesh Samdarshiयोगेश समदर्शी ने इसके पश्चात बहुत तरन्नुम में अपनी दो कवियायें सुनायीं। एक ओजस्वी कविता में वे सवाल करते हैं:-
तूफानों से जिस किश्ती को लाकर सौंपा हाथ तुम्हारे
आदर्शों की, बलिदानों की बड़ी बेल थी साथ तुम्हारे
नया नया संसार बसा था, नई-नई सब अभिलाषाएं थीं
मातृभूमि और देश-प्रेम की सब के मुख पर भाषाएं थीं
फिर ये विघटन की क्रियाएं मेरे देश में क्यों घुस आईं
आपके रहते कहो महोदय, ये विकृतियाँ कहाँ से आईं


Avinash Vachspatiअविनाश वाचस्पति ने कार्यक्रम में विविधता लाते हुए व्यंग्य पाठ किया। उन्होंने व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “फुटपाथों पर पैदल चलने वालों की जगह विक्रेता कब्जार जमाए बैठे हैं और पैदलों को ही अपना सामान बेच रहे हैं। तो इतनी बेहतरीन मनोरम झांकियों के बीच जरूरत भी नहीं है कि परेड में 18 झांकियां भी निकाली जातीं, इन्हेंज बंद करना ही बेहतर है। राजधानी में झांकियों की कमी नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत मात्र दस रुपये खर्च करके आप लिखित में संपूर्ण देश में झांकने की सुविधा का भरपूर लुत्फं उठा तो रहे हैं। देश को आमदनी भी हो रही है, जनता झांक भी रही है। सब कुछ आंक भी रही है। देश में झांकने के लिए छेद मौजूद हैं इसलिए झांकियों की जरूरत नहीं है।
कार्यक्रम में स्थानीय प्रतिभागिता भी रही। गाजियाबाद से उपस्थित कवयित्री सरोज त्यागी ने वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष करते हुए कहा :-
बहन मिली, भैया मिले, मिला सकल परिवार
लाया मौसम वोट का, रिश्तों की बौछार
चुन-चुन संसद में गये, हम पर करने राज
सत्तर प्रतिशत माफ़िया, तीस कबूतरबाज
अल्लाह के संग कौन है, कौन राम के साथ
बहती गंगा में धुले, इनके उनके हाथ


Ajay Yadavकाव्यपाठ में सुनीता चोटिया ‘शानू’, शोभा महेन्द्रू, राजीव तनेजा,अजय यादव, राजीव रंजन प्रसाद, मोहिन्दर कुमार, पवन कुमार ‘चंदन’ एवं बागी चाचा ने भी अपनी कवितायें सुनायी।
Sunita Chotiaसुनीता शानू ने अपनी कविता में कहा:-
मक्की के आटे में गूंथा विश्वास
वासंती रंगत से दमक उठे रग
धरती के बेटों के आन बान भूप सी
धरती बना आई है नवरंगी रूप सी


Pawan Kumar Chandanपवन चंदन ने शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए प्रस्तुत किया-
चाहता हूं तुझको तेरे नाम से पुकार लूं
जी करता है कि तेरी आरती उतार लूं


Shobha Mahendroशोभा महेंद्रू ने नेताजी सुभाष पर लिखी पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं:-
२३ जनवरी का दिन एक अविष्मर्णीय दिन बन जाता है
और एक गौरवशाली व्यक्तित्त्व को हम लोगों के सामने ले आता है
एक मरण मांगता युवा आकाश से झाकता है
और पश्चिम की धुन पर नाचते युवको को राह दिखाता है


Rajiv Tanejaराजीव तनेजा ने कहा -
क्या लिखूं कैसे लिखूं लिखना मुझे आता नहीं ...
टीवी की झ्क झक मोबाईल की एसएमएस मुझे भाता नही ....
Bagi Chachaबागी चाचा ने सुनाया -
आज भी जनता शहीद हो रही है और वह डाक्टर के हाथो से शहीद हो रही थी
दीनू की किस्मत फूटनी थी सो फूट गई..


कार्यक्रम के मध्य में मोहिन्दर कुमार ने अपनी चर्चित कविता "गगन चूमने की मंशा में..." सुनायी साथ ही, साहित्य शिल्पी और उसकी गतिविधियों तथा उपलब्धियों से उपस्थित जनमानस का परिचय करवाया।
विचार गोष्ठी में सत्यप्रकाश आर्य ने सुभाष चंद्र बोस और उनके व्यक्तित्व पर बहुत विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने सुभाष के जीवित होने जैसी भ्रांतियों पर भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में स्थानीय विधायक सुनील शर्मा की भी उपस्थिति थी। सुनील जी ने समाज के अलग अलग वर्ग को भी देश सेवा के लिये आगे आने की अपील की। कार्यक्रम के अंत में अध्यक्ष बी.एल. गौड ने अपने विचार प्रस्तुत लिये। उन्होंने कार्य करने की महत्ता पर बल दिया और विरोधाभासों से बचने की सलाह दी।
उन्होने बदलते हुए समाज में सकारात्मक बदलावों की वकालत करते हुए रूढीवादिता को गलत बताया। अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने अपनी कविता की कुछ पंक्तियाँ भी प्रस्तुत की:


ऐ पावन मातृभूमि मेरी
मैं ज़िंदा माटी में तेरी
मैं जन्म-जन्म का विद्रोही
बागी, विप्लवी सुभाष बोस
अतिवादी सपनों में भटका
आज़ाद हिंद का विजय-घोष
मैं काल-निशाओं में भटका
भटका आँधी-तूफानों में
सागर-तल सभी छान डाले
भटका घाटी मैदानों में
मेरी आज़ाद हिंद सेना
भारत तेरी गौरव-गाथा
इसकी बलिदान-कथाओं से
भारत तेरा ऊँचा माथा


कार्यक्रम में साहित्यकारों विद्वानों और स्थानीय जन की बडी उपस्थ्ति थी।
साहित्य शिल्पी ने कार्यक्रम के अंत में यह संकल्प दोहराया कि साहित्य तथा हिन्दी को अभियान की तरह प्रसारित करने के लिये इस प्रकार के आयोजन जीयमित होते रहेंगे।
कार्यक्रम का समापन "जय हिन्द" के जयघोष के साथ हुआ।