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मंगलवार, 4 मार्च 2014

अण्णाजी की राजनीति? - शम्भु चौधरी

संसद में लोकपाल बिल पारित करते समय अण्णाजी को जिन व्यक्तियों ने गुमराह किया उनमें से एक चौथी दुनिया के प्रधान संपादक श्री संतोष भारतीय भी हैं, जिन्होंने  अपने नये संपादकिया देखें 24 फरवरी का अंक ‘‘लोकतंत्र को तमाशा ना बनने दें’’ में श्री अण्णा हजारे के उस 17 सूत्रीय कार्यक्रम का जिक्र करते हुए आपने ममता बनेर्जी की काफी प्रसंशा की है। 
कोलकाताः (दिनांक 04 मार्च 2014) 
अण्णाजी जी ने जिस प्रकार ममता दीदी को लेकर राजनीति शुरू की है यह भी ठीक उसी राजनीति का हिस्सा है जिसप्रकार अण्णाजी ने जी ने रालेगणसिद्धी में बैठकर अनशण किया और पलकों में ही केन्द्र की कांग्रेस सरकार और भाजपा के दो एजेण्टों ने मिलकर अण्णाजी को गुमराह किया था। अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि वे दो एजेण्ट कौन थे। खुद अभी भाजपा में शामिल हुए जनरल वि.के.सिंह ने स्वीकारा किया कि ‘अण्णाजी’ एक सशक्त 'लोकपाल बिल' लाना चाहते थे। फिर देश को गुमराह क्यों किया गया? इसका जबाब अभी रहस्य बना हुआ है। परन्तु जिस प्रकार लोकपाल समिति के चयन पर रोजाना उठ रहे विवाद और चयनित सदस्यों के द्वारा पद से त्यागपत्र इस बात पर संकेत तो दे ही रहा है कि कहीं दाल में काला है जिसे कांग्रेस और भाजपा दोनों मिलकर छुपाना चाहते हैं।

संसद में लोकपाल बिल पारित करते समय अण्णाजी को जिन व्यक्तियों ने गुमराह किया उनमें से एक चौथी दुनिया के प्रधान संपादक श्री संतोष भारतीय भी हैं, जिन्होंने  अपने नये संपादकिया देखें 24 फरवरी का अंक ‘‘लोकतंत्र को तमाशा ना बनने दें’’ में श्री अण्णा हजारे के उस 17 सूत्रीय कार्यक्रम का जिक्र करते हुए आपने ममता बनेर्जी की काफी प्रसंशा की है।  

आप लिखते हैं कि 30 जनवरी को कोलकाता के पैरेड ग्राउंड में ममताजी की रैली में 30 लाख लोग आये थे।  20 लाख मैदान में 5 लाख मैदान के बहार और 5 लाख लोग कोलकाता की सड़कों पर। मुझे ताजूब होता है कि श्रीमान संपादकजी को कोलकाता की भौगोलिक स्थिति का कोई अंदाजा तक नहीं है। शहर में 15 लाख लोग यदि एक साथ प्रवेश कर जाएं तो टॉलिगंज से श्यामबजार और हवड़ा स्टेशन से सियालदाह स्टेशन के सभी मार्ग व सभी मैदान जाम हो जायेगें।  वैसे बिग्रेड पैरेड मैदान की अधिकतम क्षमता ही 5 लाख लोगों की है यदि अंदर और बहार चारों तरफ आदमियों से पट जाए।

 खैर! यह इनके सोचने का नजरिया है। जहाँ तक अण्णाजी के 17 सूत्रीय पत्र की बात है तो संपादक जी ने ‘अपने संपादकिय में कहीं भी ‘आप’ पार्टी का जिक्र तक नहीं किया जबकि इनको इस बात का पता था कि अरविंदजी ने इस पत्र पर पहले ही अण्णाजी से मिलकर अपनी स्वीकृति दे दी थी। ना तो संपादक ने अपने पत्रकारिता के धर्म को निभाने के प्रयास किया ना ही वे भारतीय राजनीति में ‘आप’ का अपने लेख में चिन्हीत तक ही किया। यदि अरविंद जी किसी समाचार मीडिया की बात करते है तो उनमें "चौथी दुनिया" समूह का विद्वेष साफ झलकता है। 

संपादक की माने तो ‘भारतीय राजनीति में ममता बनेर्जी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। सुश्री ममता बनेर्जी स्वयं एक कुशल नेत्री है परन्तु उनकी टीम में आज भी बहुत से ऐसे लोग हे जिस पर बंगाल की जनता को पूरा विश्वास नहीं है।  इससे साफ हो जाता है कि अण्णाजी और ममता जी को राजनीति फायदे के लिय इस्तमाल किया जा रहा है "संतोष भारतीय" ने इन दोनों को अपने राजनीति फायदे और केजरीवाल को नूकशान पंहुचाने के लिये प्रयोग करना शुरू कर दिया है। जो कहीं न कहीं नीच मनसिकता का परिचायक है।  इससे ममता बनेर्जी को कोई फायदा नहीं होगा। ना ही ममता बनर्जी का बंगाल से बहार कोई कद बनने की संभावना वर्तमान राजनीति में दिखाई देती है। - शम्भु चौधरी

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

व्यंग्य: अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त - शम्भु चौधरी

 बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।  कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।   तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। 

वैसे तो मॉर्निंग वॉक के समय हंसी-मजाक को दौर रोजाना चलता ही रहता है, कभी धर्म और राजनीति को लेकर तो कभी महिलाओं से छेड़-छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज, बलात्कार, बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह, स्वास्थ, जीना-मरना आदि आदि।

धीरे-धीरे इन विषयों के वक्ता भी हमारी टीम में जमा हो गए। मुंगेरीलाल रोजना कोई नई बात (समाचार) लाते और व्यायाम के पश्चात शुरु हो जाती बहस की परम्परा। कुछ दिनों से मुंगेरीलाल बिस्तर पर ही पड़े थे लगभग एक सप्ताह हो गया। उनका अन्न-पानी सब छूट सा गया था। वजन भी कम होने लगा था। सबने मिलकर मन बनाया कि क्यों ना आज मुंगेरीलाल के पास ही मिलने को चला जाए। एक ने कुछ नाश्ता के पैकेट खरीद लिये, एक ने दो पैकट दूध ले लिया बोले- ‘‘यार लगा तो काम आ जाएगा नहीं तो घर लेते जाएंगे।’’

घर पंहुते ही एक ने व्यंग्य कसा ‘‘ कैसे हो भाई!! अब तो ‘जल’-‘पानी’ ग्रहण कर लो, लोकपाल बिल पास हो गया है।’’
मानो किसी ने मुंगेरीलाल की दुखती नब्ज को ही छेड़ दिया हो। बोले क्या खाक पास हो गया? अन्ना ने देश के साथ धोखा किया है। सब कुछ पहले से ही तय था यह सब  आप लोगों ने सुना नहीं!! हमलोगों कि तरफ देखते हुए कहने लगे... मेरी तो तबियत खराब चल रही है नहीं तो....

तभी उनको बीच में ही टोकते हुए रामप्रसाद जी बोल पड़े... ‘‘अरे भाई अभी थोड़ा आराम भी कर लो, फिर लिखना जो मन आयें वैसे भी तेरे लिखे को पढ़ते ही कितने लोग हैं? अपने मुंह मियाँ मिठू खुद ही बनते रहो, खुद ही लडू बनाओ और खुद ही खाओ। फिर बात को बदलते हुए ‘‘हम तो बस आपकी सेहत का हाल जानने आ गये, कैसी है अभी आपकी सेहत?’’ पास ही भाभी जी खड़ी थी बोलने लगी - इनको कल ही डाक्टर के पास दिखाने ले गई थी बोले अभी भी थोड़ा बुखार है एक दो दिन में उतर जायेगी। सर्दी-जूकाम लग गई थी।’’

सीताराम जी को पिछले रात की घटना याद थी भाभी जी को बीच में ही रोकते हुए बोल - ‘‘ वह तो लगनी ही थी, अब भला कोई सुबह चार बजे ही इस ठंडी के समय घर से बहार किसी से लड़ने निकल जाए तो सर्दी नहीं लगेगी तो और क्या लगेगी?’’

तभी भाभी ने वैहिचक होते हुए हमारे हाथ से नाश्ते का पैकेट लेते हुए बोली- ‘‘इनसब की क्या जरूरत थी! थोड़ी सकुचाती हुई बोली दूध तो अभी आने ही वाला है...’’ तभी रामप्रसाद ने बात को संभालते हुए बोले ‘‘नहीं भाभीजी हमारे मॉर्निंग वॉकर क्लब का यह नियम ही है कि सुबह किसी से मिलने जाना हो तो वहां भी हमें अपना नाश्ता और चाय पीनी हो तो दूध साथ ही ले जाना होगा। बस आप तो इसमें अपना प्यार मिला कर हमें परोस दिजिए’’

भाभी मुसकराती हुई नाश्ते के पैकेट लेकर भीतर जाते-जाते एक तीर चला गई - हां!! हां!! अभी लाती हूँ थोड़ी इनको भी अक्ल दे देते कि कैसे बात संभाली जाती है’’ और भीतर चली गई।

तभी ने एक ने मुंगेरलाल के हालचाल पूछने के लिये पुनः उसकी दुखती नब्ज को सहलाया ‘‘तो आपने अनाज क्यों छोड़ दिया?’’ हमने तो सुना कि आप भी अन्ना के साथ अनशन में बैठे हो।

अब मुंगेरीलाल का पारा सातवें आसमान को छूने लगा। बोले- ‘‘ अरे यार मेरा अन्ना से कोई लेना-देना नहीं ना ही मेरी इस बीमारी से उनके लोकपाल बिल का कोई संबंध है। हां! एक पत्रकार के हैसियत से मैं उस आदमी की जरूर खबर लूंगा।

‘‘क्यों? क्या कर दिया अन्ना ने बीच में ही रामप्रसाद जी ने उन्हें रोकते हुए पूछ डाला।’’

क्या किया? अब मुंगेरीलाल आपे से बहार हो गया था। उसका पूरा चेहरा लाल तपतपाने लगा। ये लोग सब मिलकर संसद को ड्रामा मंच बना दिये हैं लगता ही नहीं कि कोई देश चला रहा है। सारे बिल ऐसे पास हो रहे हैं कि  जैसे मनमोहन मुद्रा में पूरी संसद सोई हुई हो ... बिल्ली जैसी आंख से टूकूर-टूकूर देखता है बोलता ऐसे है जैसे कोई दैहाती औरत अपने पति के सामने घीघीयाती हो।
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
फिर थोड़ा रुककर सोचते हुए। दिल्ली चुनाव में भाजपा की भी सांस फूलने लगी। इनको लगा कि ये केजरीवाल ने कांग्रेस पार्टी का जो हर्ष दिल्ली में किया कहीं दोनो राजनीति पार्टियों की भी बैंड ना बजा दे?

बस अन्ना के दो दलाल (नाम नहीं लिया) पर इशारा काफी था को इस काम में लगा दिया। उधर अन्ना को इस बात के लिए मना लिया कि वह जनता का ध्यान बंटाने में कांग्रेस की मदद करे और कांग्रेस उनके बिल को संसद में पास कर देगी। बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।

कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।  

तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। कह दिया ने ‘‘अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त‘‘ जब तक कि हमारी बात समाप्त होती चाय-नाश्ता आ गया था।  

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता बनाम भगवा आतंकवाद -शम्भु चौधरी

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इतनी विवेकशील हो चुकी है कि देश की देशभक्ति इनको सांप्रदायिक लगने लगी है। देशभक्ति की बात करने वाले, इस देश के हर नागरिक इनकी नजर में देश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने वाला माना जाने लगे हैं उनकी परिभाषा में सिर्फ वे लोग देशभक्त हैं जो देश को अंदर से खोखला करने में उनकी मदद कर रहें हैं। जो लोग देश की एकता और अखंडता की बात करते हैं उसको भगवा आंतकवाद का नाम दिया जा रहा है, इससे स्पष्ट परिलक्षित हो जाता कि देश में धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद उनके सर चढ़कर बोल रहा है। यह सब बातें हमारी पौंगी धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती है। जो इनके बचाव में गाहे-बगाहे कुछ दलील देश के सामने रखते हैं जो निम्न प्रकार है -

इस परिपेक्ष में जो दलीलें दी जाती है-

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना। 2. देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोकना। 3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना।

हमें देखना होगा कि इन दलीलों के पीछे किन स्वार्थी तत्वों का दिमाग कार्य कर रहा है? दरअसल देश में जिन-जिन स्थानों में दंगों के खतरे ज्यादा महसूस किये जाते रहे हैं वैसे अधिकतर स्थान मुस्लीम बाहुलता वाले होते हैं। दंगों की शुरुआत ऐसे ही तत्वों द्वारा होती है जो देश में खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानती रही है। इसका स्पष्ट संकेत है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानने वाले तत्व देश की धर्मनिरपेक्षता को न सिर्फ खतरा साबित हो चुके हैं वे राजनीति स्वार्थपुर्ति के लिए बार-बार इस तरह का वातावरण भी सृजन करते रहें हैं।

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना -   आजादी के पश्चात अबतक हम जिन्हें अल्पसंख्यक मानते रहें हैं वे अपने-अपने क्षेत्र में अब न सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके हैं उन क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं के उनके साथ विवाह के भी कई मामले सामने आने लगे हैं। सही अर्थों मे कहा जाए तो अब इस कौम के अंदर भय नाम की कोई बात नहीं रह गई कारण कि इनको दोहरे कानून का समर्थन प्राप्त हो रहा है। पहला इस्लामिक कानून जो हिन्दुओं की लड़कियों को मुस्लीम बनाने की इज्जाजत देता है। दूसरा भारतीय संविधान जो वयस्कों धर्म-जाति के बंधन से परे रहकर शादी करने की इज्जाजत। जबकि इसके विपरित कोई अन्य प्रकार की घटना घटते ही सांप्रदायिकता व कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती हैं। आनन-फानन में ऐसे संबन्धों का जो भी हर्ष निकले पर यह बात तय है कि उस समय भारत का संविधान गौन हो जाता है। चुकीं मामला एक विशेष धर्म से जुड़ा होता है। जहां से सांप्रदायिक दंगे फैलने की प्रवल संभावनाएं बनी रहती है। यह इस बात की ओर संकेत देता है कि भयभीत होने वाली कोई बात इस कौम पर लागू नहीं होती।

2. सांप्रदायिक दंगों की आग -   प्रायः राजनैतिक दलों द्वारा इस बात की चेतावनी दी जाती है कि कोई भी बात जो उनको पसंद न हो न करें, अन्यथा दंगा होने की संभावना जताई जाती रही है। हर बात में इस खौफ को पैदा किया जाता रहा है। कोई भी व्यक्ति ऐसी बात न करें या ऐसा कार्यक्रम न करें जिससे सांप्रदायिक सदभावना का खतरा पैदा हो जाए। यह बात किसे कहा जाता है? क्या यही बात हमारे राजनैतिक दलों ने कभी मुसलमानों को भी कहा है? जो लोग सांप्रदायिकता की बात करतें हैं वे लोग ही खुद सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं चुंकि उनका उद्देश्य न सिर्फ राजनीति करना रहा है इसके माध्यम से वे कई बार सत्ता भी प्राप्त करने में सफल रहें हैं।

3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना-   जो लोग बार-बार देश के टूकरे करने की बात कर देश की जनता को भयभीत करते रहते हैं उनके लिए एक बात याद आती है कि जो रोज-रोज शेर आया शेर आया करते रहते हैं ऐसे ही लोगों को एक दिन सच में शेर आकर खा जाता है। ऐसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों को मोहरा बनाकर अपनी सत्ता का दावा मजबूत करने में लगें हैं वे ही वास्तव में देश को पुनः विभाजन की कगार पर ले जाने का कार्य कर रहें हैं। जब एकबार धर्म के नाम पर देश के तीन बंटवारे हो चुके, तो प्रमाणित आंकड़े कहते हैं कि अब जो लोग देश को पुनः बांटने की धमकी देकर देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर एक विशेष संप्रदाय के वोट बैंक को अपने पक्ष में एकत्रित करने का काम कर रहें है। वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने में लगे हैं। ऐसी ताकतें जो खुद की राजनीति में लगा हो वह किसी भी सांप्रदाय का कभी भी भला नहीं सोच सकती।

आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इन तत्वों की ताकतों में इजाफा होगा। देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता चला जाएगा और इसके लिए एक मात्र वे ही लोग जिम्मेदार माने जाएंगें या धर्मनिरपेक्ष ताकतों का वह चेहरा ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा जो देश में धर्मनिरपेक्ष की आड़ में वोट की राजनीति करते रहें है।।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

संसद की पवित्रता - शम्भु चौधरी

66वें स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या परः

66वें स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर देश के 13वें राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी ने देश के नाम अपने संदेश में कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार होने से देश में अव्यवस्था फैल जाएगी। आपने स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का आंदोलन जायज है। जहां एक तरफ आपने विधायिका के महत्व को समझाने का प्रयास किया वहीं दूसरी तरफ आपने जनता के आक्रोश को भी जायज ठहराते हुए संसद को ही नसीहत दे डाली कि कभी-कभी जनता अपना धैर्य खो देती है पर इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार का बहाना नहीं बनाया जा सकता। उपरोक्त संदेश कई तरह से उलझाव पैदा करने वाला है कि महामहिम जी किसे यह बताना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के लिए कौन जिम्मेदार है। संसद का कतरा-कतरा भ्रष्टाचार के बलि चढ़ चुका है। प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी एक हाथ में अपने खुद के ईमानदार होने का प्रमाण पत्र लिए, देश को गठबंधन धर्म की मजबूरी बताते नहीं थकते। मानो हमने यह स्वीकार कर लिया है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी लचर और लाचार हो चुकी है कि चोरों को चुनना ही लोकतंत्र का लक्ष्य रह जाता है। जो लोग इस लोकतंत्र के रक्षक बन अपनी आहुति दें वे चोर और जो चुनकर या पिछले दरवाजे से संसद में पंहुच जाए वे सभी ईमानदार और लोकतंत्र के रक्षक एवं विधायिका के निर्माता बन जाते हैं। संभवतः लोकतंत्र की इसी परिभाषा को अपने संदेश के माध्यम से चिन्हीत करना चाहते हैं हमारे राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी जी।

पिछले दिनों श्री अण्णा हजारे व उनकी टीम ने रामलीला मैदान में अपना दम तौड़ दिया। कल बाबा रामदेव व उनकी टीम भी दम तौड़ती नजर आई। प्रश्न यह नहीं है कि किसने बाजी मारी या किसने हारी। प्रश्न यह है कि संसद इतने संवेदनशील मामले पर चुप क्यों? संसद के अन्दर चुनकर गये और खुद को चुनावा कर गये नेताओं की लम्बी कतार देश को गुमराह क्यों कर रही है? आश्चर्य की बात है कि लोकतंत्र के प्रहरी संसद के अन्दर 543 सांसद जो जनता के सीधे प्रतिनिधि होते हैं और 245 सांसद जो पिछले दरवाजे से देश के कर्णधार बनकर संसद में पंहुचते है। इन सब ईमानदार और देशभक्तों को आखिर उस समय सांप क्यों सूंध जाता है जब भ्रष्टाचार और काले धन की बात सामने आती है? संसद की गरिमा और इसकी मर्यादा की रक्षा करने वाले ये चुने हुए सांसदों पर जब जनता द्वारा विचारों का हमला होता है तो वे संसद और संसदों की गरिमा की की दुहाई देते नहीं थकते। वहीं जब यही सांसद जनता पर तीखे व्यंग्य करते हैं तो जैसे ‘हम भी रोजा कर रहें हैं। या रामलीला तो हर साल हाती है।’’ जैसी अपमानजनक टिप्पणी करते नहीं थकते तो उस समय इनको अपनी ईमानदारी और संसद की मर्यादा का ख्याल क्यों नहीं आता। वहीं जब कुछ सांसदों पर कोई आक्षेप आता है या इनको चोर-बेईमान कहा जाता है तो इनको संसद की पवित्रता का आभास होने लगता है। संसद लोकतंत्र का पवित्र मंदिर जरूर है पर इसमें बैठे लोगों की मंशा ने इसकी पवित्रता को हर तरह से अपवित्र करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। पता नहीं इनकी देश भक्ति व इनका स्वाभिमान भी उस समय कहां चरने चला जाता है जब चंद लोगों के चलते पूरी संसद अपवित्र नजर आने लगती है?

शम्भु चौधरी
सचिव, राजनैतिक चेतना मंच

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

सलमान खुर्शीद जी का ताजा बयान -


आपके ताजा बयान जिसमें आपने सरकार और सिविल सोसायटी के बीच मतभेदों को बढ़ावा न देने की अपील की है हम इसका स्वागत करते हैं। हम सरकार से भी चाहते हैं कि वे सिविल सोसायटी के सदस्यों की भीतरी जांच जैसी कायरता पूर्ण कार्रवाई से बाज आये। नहीं तो देश भर के सांसदों और नेताओं की भी जांच शुरू कराने के लिए व्यापक जन आन्दोलन शुरू किया जा सकता है। हम जानते हैं कि वर्तमान सरकार में कुछ अच्छे सदस्य भी हैं जो देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहें हैं। संसदीय समिति के अध्यक्ष एवं स्व.लक्ष्मीमल सिंघवी जी के पुत्र श्री मनु सिंघवी जी पर भी हमें पूरा भरोसा है कि वे जो भी निर्णय लेगें वह देश के व्यापक हितों को ध्यान में रख कर लेगें। देश की भावना को महत्व देगें न कि भ्रष्ट नेताओं के चक्कर में पड़ कर पुनः आन्दोलन का रास्ता खोल दें जैसा कि हमारे पूर्व एक भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री जी ने किया जिसके चलते देश को 12 दिन का प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ा था।
सिविल सोसायटी के सदस्यों की जांच कर आप देश भर में एक जहर का सृजन करने का प्रयास कर रहें हैं। आपको यह ध्यान रखना चाहिये कि कोई दूध का धुला नहीं है। यदि आपकी सरकार का यही रवैया रहा तो आपकी सरकार जाने के बाद किस-किस की जांच होगी तब इसके लिए आपको भी तैयार रहना चाहिए। नेक कार्य को नेक ही रहने दें। किसी का नुकसान कर देश में एक नई परंपरा कायम की जा रही है। हाँ! इतना ज़रुर याद रखियेगा कि जिस तरह से श्रीमती किरण जी और अरविन्द केजरीवाल को परेशान किया जा रहा है इससे काँग्रेसी का भला तो कुछ नहीं होगा देश को इससे काफी क्षति होगी। जरा मन की अंतरात्मा को पूछ कर देख लिजिऐगा। इस तरह कि कार्यवाही से हमलोगों काफी आहत हुएं हैं कि किन बेईमानों को देश सौंप दिया गया है। इस तरह भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री हमें न तो कमजोर कर सकते हैं न ही देश लूटने लाइसेंस ही हम देगें इनको। -एक सदस्य

सोमवार, 29 अगस्त 2011

लोकतंत्र के प्रहरी?- शम्भु चौधरी




श्री रामचन्द्र गुहा सहित देश के तमाम विद्वानों को मेरी खुली चुनौती है कि वे अपने विचार इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए दें। किसी व्यक्ति विशेष की कार्यशैली आपको हमको भले ही पसंद न आती हो, श्री अन्ना के आंदोलन से अलग-अलग मतभेद हो सकते है परन्तु संसद की मर्यादा के प्रश्न पर किसी को भी कोई मतभेद नहीं होना चाहिए। जो बात संसद के अन्दर और बहार राजनैतिक तरीके से लड़ी जा सकती थी उसको संसद की मर्यादा के साथ जोड़कर आखिरकार क्यों लड़ी गई? क्या सरकार यह बताना चाहती है कि संसद सिर्फ चुने हुए चन्द सांसदों की ही धरोहर है? या सिर्फ राजनेताओं की जमींदारी है संसद? कि वे जैसा चाहे वहाँ बैठकर करते रहे जनता कुछ भी आवाज उठायेगी तो संसद की मर्यादा समाप्त हो जाऐगी तो फिर यह कैसा लोकतंत्र है?


कोलकातः 29 अगस्त 2011
संसद ने आखिरकार एक मजबूत लोकपाल बिल लाने का मार्ग प्रशस्त कर ही दिया। लगातार पाँच माह की आना-कानी के बाद सरकार सहित तमाम विपक्ष को लोकतंत्र के आगे सर झूकाना पड़ा। जिस संसद में जनता के द्वारा जनता के लिए जनता के प्रतिनिधि को देश की जनता चुन कर भेजती है उसी संसद के भीतर पंहुचकर यही सांसद, संसद को ढाल बनाकर खुद की नाकामी को छुपाने या जनता के जबाबों से बचने का प्रयास करती है तो हमें यह मान लेना चाहिए कि ये लोग देश की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करने में पूर्णतः असक्षम हैं। श्री कपिल सिब्बल एवं गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी के कुतर्क ने पिछले एक माह से देश की जनता को झकझोर कर रख दिया था।
देश के इतिहास में संसद को इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में लाने के लिए पूरी संसद ही इसकी जिम्मेदार है। मजबूत लोकपाल बिल बनाने पर गत चार-पांच माह से सरकार सिविल सोसाएटी से बातें कर रही थी। एक सरकारी गजट के माध्यम से ड्राफ्टींग समिति भी बनाई गई। दो माह इस समिति में चर्चा भी की गई।


जैसे-जैसे सरकार की कलाई संसद में खुलती चली गई सरकारी लोकपाल बिल के मुद्दे पर घिरती चली गई और सड़कों पर जनता उतरने लगी। एक तरफ सरकार देश की जनता को गुमराह करने के लिए न सिर्फ कमजोर व अपंग लोकपाल बिल संसद में प्रस्तुत किया तो दूसरी तरफ श्रीमती अरुणा राय को अचानक से सामने ला खड़ा कर श्री अन्ना हजारे के एवं सिविल सोसायेटी के बिल को उलझाने का प्रयास करती दिखी। साथ ही इन दोनों स्थिति का बचाव करने के लिए सरकार ने अपने तर्क, सिद्धांत, संसद में बहस, जनता की राय को अनदेखा कर एक साथ पूरी संसद की प्रतिष्ठा को ही दाव पर लगा दिया। सरकार के इस तर्क को कि संसद की मर्यादा ही सर्वोच्चय है और संसद में ही बिल पर बहस होनी चाहिए अथवा संसद ही कानून बनाएगा आदि जैसे बयान से साफ होता दिख रहा था कि सरकार ऐन-केन-प्रकारेण का रास्ता अख्तियार कर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का प्रयास करती दिखाई दे रही है। जिस संसद के अन्दर आधे से अधिक सांसद पूर्णरूपेण न सिर्फ भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं सत्ता के सौदागर बने हुए हैं। खुद प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंहजी ने भी संसद में स्वीकार किया की उनकी सरकार गठबंधन धर्म के आगे विवश है। इस संकेत से साफ जाहिर होता है कि देश की सत्ता सौदागरों के हाथों गिरवी रखी जा चुकी है। जो देश को हर कोने से नोच कर खा रहे हैं। अब चुकिं सरकार के सामने कोई विकल्प नहीं बचा तो इन लोगों ने संसद को ही दाव पर लगा दिया।


मुझे तब अत्याधिक आश्चर्य होता है जब समाज का बुद्धिजीवी तबके के कुछ लोग भी जो खुद को लोकतंत्र का प्रहरी बताते नहीं थकते और सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से सरकार का पक्ष प्रस्तुत करने में लगे हैं सरकार की इस चालाकी पर अभी तक कोई सवाल नहीं खड़े किए। मुझे समाज के उस तबके से भी बहुत निराशा हाथ लगी जो संसद की मर्यादा की बात तो करते दिखे पर लोकतंत्र को एक भीड़ की संज्ञा देने से नहीं चुके। सबसे दुखद तब लगा कि जो लोग राजनैतिक रूप से देश के संचालन का भार संभाले हुए हैं ये लोग संसद को अपनी जागिर समझ बैठे हैं। आम जनता की भावना से किसी को कुछ भी लेना देना नहीं। श्री अन्ना के विचारों से या जन लोकपाल से सबका सहमत होना या एकमत होना जरूरी नहीं। विचारों की टकराहट हो सकती है परन्तु सरकारी लोकपाल बिल पर किसी भी दृष्टि से टकराहट की भी कोई संभावना नहीं बनती इसे संसद में प्रस्तुत कर और संसद को ढाल बना भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नये-नये तर्क देना कहाँ तक उचित है इसपर कोई कुछ नहीं कह पा रहा है।


श्री रामचन्द्र गुहा सहित देश के तमाम विद्वानों को मेरी खुली चुनौती है कि वे अपने विचार इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए दें। किसी व्यक्ति विशेष की कार्यशैली आपको हमको भले ही पसंद न आती हो, श्री अन्ना के आंदोलन से अलग-अलग मतभेद हो सकते है परन्तु संसद की मर्यादा के प्रश्न पर किसी को भी कोई मतभेद नहीं होना चाहिए। जो बात संसद के अन्दर और बहार राजनैतिक तरीके से लड़ी जा सकती थी उसको संसद की मर्यादा के साथ जोड़कर आखिरकार क्यों लड़ी गई? क्या सरकार यह बताना चाहती है कि संसद सिर्फ चुने हुए चन्द सांसदों की ही धरोहर है? या सिर्फ राजनेताओं की जमींदारी है संसद? कि वे जैसा चाहे वहाँ बैठकर करते रहे जनता कुछ भी आवाज उठायेगी तो संसद की मर्यादा समाप्त हो जाऐगी तो फिर यह कैसा लोकतंत्र है?


सरकार ने मजबूत लोकपाल बिल बहस के मुद्दे को संसद की गरिमा के साथ जोड़कर न सिर्फ अपनी अक्षमता का परिचय दिया, बल्कि देश के लोकतंत्र पर एक प्रश्न चिन्ह भी लगा दिया है। अपनी नाकामी को संसद की मर्यादा का जामा पहना कर सरकार ने एक गहरी साजिश देश की जनता के साथ की है। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की या न कसने के इरादे को सरकार ने राजनीति तरीके से लड़ा होता तो कुछ बात समझ में आती है। परन्तु जिस प्रकार सरकार ने संसद की मर्यादा को ढाल बना कर विपक्ष सहित देश के तमाम बुद्धिजीवियों को बहकावे में लाने का प्रयास किया है यह इस सरकार के लिए ही नहीं देश की तमाम राजनैतिक दलों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।


सरकार ने मजबूत लोकपाल बिल बहस के मुद्दे को संसद की गरिमा के साथ जोड़कर न सिर्फ अपनी अक्षमता का परिचय दिया, बल्कि देश के लोकतंत्र पर एक प्रश्न चिन्ह भी लगा दिया है। अपनी नाकामी को संसद की मर्यादा का जामा पहना कर सरकार ने एक गहरी साजिश देश की जनता के साथ की है। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की या न कसने के इरादे को सरकार ने राजनीति तरीके से लड़ा होता तो कुछ बात समझ में आती है। परन्तु जिस प्रकार सरकार ने संसद की मर्यादा को ढाल बना कर विपक्ष सहित देश के तमाम बुद्धिजीवियों को बहकावे में लाने का प्रयास किया है यह इस सरकार के लिए ही नहीं देश की तमाम राजनैतिक दलों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।


सरकार के इस दुर्भाग्य पूर्ण प्रयास को अभी तक किसी ने नहीं सोचा कि यह जिस आग से वे खेल रहे थे उनके ही हाथ जल गये इस हवन में। जिस संसद में सरकार को राजनैतिक निर्णय लेने थे सरकार संसद ही दांव पर लगा कर अपने राजनीति हितों की रक्षा करने में जूट गई थी। षुरू में ही यदि सराकर ईमानदारी से चाहती तो पिछले चार-पांच माह में जितनी बहस इस बिल को लेकर सरकार से हो चुकी थी सरकार एक सक्षम लोकपाल बिल संसद में प्रस्तुत कर सकने में आसानी से सक्षम हो सकती थी, परन्तु देश का यह दुर्भाग्य ही कह लें सरकार तर्क का सहारा लेती रही और देखते ही देखते जनता सड़कों पर उतर गई। संसद की गरिमा को ताक पर रख सरकार ने लोकपाल बिल का बचाव षुरू कर दिया। जबकि देश की जनता मंहगाई और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सरकार के साथ खड़ी थी परंतु सरकार ने उसे अपना दुश्मन मान कर जो व्यवहार करती दिखी। इससे न सिर्फ सरकार को, विपक्ष को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। संसद को ढाल बना कर सांसदों की बयानबाजी सरकार व विपक्ष को कितना मंहगा पड़ा इसे सारी दुनिया ने देख लिया कि भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए सरकारी पक्ष ने संसद की गरिमा के साथ किस प्रकार खिलवाड़ किया। अन्ना के इस आंदोलन ने लोकतंत्र के प्रहरियों की कलाई खोलकर रख दी है।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

जनता सड़कों पर क्यों?




फेसबुक पर दुनिया भर के युवक इस तरह के प्रश्न पूछते नजर आ रहें हैं कि क्या वैगेर किसी रक्त-पात के किसी आन्दोलन को आम जनता तक पंहुचाया जा सकता है? या फिर सरकार झूक जाएगी? जो खुद ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट व्यवस्था की शिकार है?, या फिर यह भी पूछा जा रहा है कि विपक्ष इस मामले में दोहरा मापदण्ड क्यों अपना रही है? साथ ही राजनेताओं से जुड़े कई सवाल जो फेसबुक के माध्यम से जानने की चेष्टा कर रहे हैं।
इन सबके बीच ये लोग यह भी जानकारी करना चाह रहें हैं कि इस आंदोलन को किस तबके का समर्थन मिल रहा है। राजनैतिक पार्टीयों की भूमिका पर भी प्रश्न पूछे जा रहें हैं। यह भी प्रश्न किया जा रहा है कि सिर्फ हाथों में तिरंगा झण्डा और गांधी टोपी लगा कर आंदोलन करने से सरकार आपलोगों की बात मान जाऐगी?


जनता सड़कों पर क्यों?

अब होगा कि कल होगा,
लोकतंत्र का है देश ये यारो!
जब मन होगा क्या तब होगा।
क्या भ्रष्टाचार कम होगा?
होगा-होगा कल होगा।
क्या देश लूटना बंद होगा?
होगा-होगा कल होगा। (स्वरचित)


आज श्री अन्नाजी के अनशन का आठवां दिन होने जा रहा है उनकी सेहत में भी तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है। भारतीय लोकतंत्र को दुनिया भर में आश्चर्य की निगाहों से देखा जा रहा है। भारत सहित विश्वभर में प्रदर्शन होने लगे। जन सैलाब उमड़ता जा रहा है। कल आघी रात के समय भी दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों की संख्या में समर्थक हाथों में फूल लिए ईश्वर से प्रार्थना करते देखे गये। देश भर में प्रर्दशन हो रहे हैं। सांसदों के घरों के बहार भी आंदोलनकारी जूटने लगे। अबतक देश के विभिन्न हिस्सों से 100 से भी अधिक सांसदों के घर के बहार विरोध प्रर्दशन किया जा चुका है।


कोलकात स्थित जिस जगह मेरा निवास है यहाँ भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति के पास (सेन्ट्रल पार्क) पिछले पांच दिनों से नियमित रूप से रोजाना रात्रि 8 बजे सैकड़ों युवक एकत्रित हो मशाल जुलूस निकाल रहे हैं। गांधी टोपी पर लिखा होता है- ‘‘मैं अन्ना हूँ’’ कोलकाता शहर में चारों तरफ छोटी-छोटी टूकरियों में शांतिपूर्ण आन्दोलन-प्रर्दशन करते लोगों को देखा जा सकता है। शहर के आस-पास के ईलाकों में, जैसे रिसड़ा-हिन्दमोटर, बारासात, दमदम, हवड़ा आदि सभी जगहों पर जन लोकपाल व श्री अन्ना के समर्थन में नारे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही यहाँ इस बात का भी जिक्र जरूरी है कि कोलकाता से प्रकाशित एक-दो समाचार पत्रों को अब कुछ कहने को नहीं मिला तो उसने विशाल जन समुह में होने वाली छोटी-मोटी हरकतों को ही छापना शुरू कर दिया ताकी यहाँ एक खास वर्ग को खुश रखा जा सके। वैसे भी अभी तक सरकारी कर्मचारी और राजनैतिक दलों का परोक्ष रूप से इस आंदोलन को समर्थन न के बराबर ही है। इसलिए इस आंदोलन को विशुद्ध सामाजिक आंदोलन कहा जाना मुझे ज्यादा उपयुक्त लगता है।


भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने की इस जन आन्दोलन में उमड़ता जन-सैलाब न सिर्फ लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है दुनिया भर में इस आंदोलन पर बहस भी छिड़ चुकी है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में हिस्सा ले रहे जन सैलाब पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही है। भारत के भ्रष्टाचार जन आंदोलन से आज दुनिया भर की युवा पीढ़ी प्रभावित दिखती है।


विश्व के कई देश भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में जकड़ चुके हैं। फेसबुक पर दुनिया भर के युवक इस तरह के प्रश्न पूछते नजर आ रहें हैं कि क्या वैगेर किसी रक्त-पात के किसी आन्दोलन को आम जनता तक पंहुचाया जा सकता है? या फिर सरकार झूक जाएगी? जो खुद ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट व्यवस्था की शिकार है?, या फिर यह भी पूछा जा रहा है कि विपक्ष इस मामले में दोहरा मापदण्ड क्यों अपना रही है? साथ ही राजनेताओं से जुड़े कई सवाल जो फेसबुक के माध्यम से जानने की चेष्टा कर रहे हैं।


इन सबके बीच ये लोग यह भी जानकारी करना चाह रहें हैं कि इस आंदोलन को किस तबके का समर्थन मिल रहा है। राजनैतिक पार्टीयों की भूमिका पर भी प्रश्न पूछे जा रहें हैं। यह भी प्रश्न किया जा रहा है कि सिर्फ हाथों में तिरंगा झण्डा और गांधी टोपी लगा कर आंदोलन करने से सरकार आपलोगों की बात मान जाऐगी? जिसने एक लम्बी चर्चा के बावजूद विवादित बिल ही सदन के पटल पर प्रस्तुत कर संसद की स्थाई समिति को भेज दी हो ऐसी सरकार से आपलोग किस तरह की अपेक्षा रखते हैं। भारत सरकार की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े किए जा रहे हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि स्थाई समिति पुनः समय लेकर इस आंदोलन को शांत कर दे, जैसा सरकार ने पहले भी किया था ज्वांईड ड्राफ्टींग कमेटी बना कर। जिसका परिणाम सिर्फ उनकी भ्रष्ट मानसिकता ही निकली सरकारी लोकपाल बिल के रूप में।


साथ ही यह भी जानकार ली जा रही है कि जिस संसद में भ्रष्ट लोगों का ही बहुमत है और विपक्ष भी जन लोकपाल पर पूरी तरह सहमत नहीं तो यह कैसे संभव हो पायेगा कि यही संसद जन लोकपाल को संसद में स्वीकार कर पारित कर देवें? साथ ही यह शंका भी जाहिर की जा रही है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही मजबूत व प्रभावी लोकपाल की बात कर रही है। तब फिर देश की जनता सड़कों पर क्यों उतर गई?

रविवार, 21 अगस्त 2011

हम लाये हैं तूफान से...

कोलकाता: 21 अगस्त 2011 रविवार रात्रि 11 बजे।




देश के हर जिम्मेदार नागरिक का यह दायित्व बनता है कि पहले हम अपने देश को इस जन-सुनामी से बचाऐं। इस वक्त राजनीति और राजनैतिक दलों की विचारधाराओं को ताक पर रखकर सबको सामने आना चाहिए। जो दल आज के समय इसमें राजनीति करने का प्रयास करेगा वह देश को जन-सैलाब को आग में धकेलने का काम करेगा। अभी तक यह आन्दोलन श्री अन्ना हजारे व इनके सदस्यों के नियंत्रण में है। अहिंसक है। गांधी टोपी में है। यदि किसी ने भी किसी भी तरह से बचकानी हरकतें की या जैसे पूर्व में कांग्रेस की तरफ से बचकाने बयान दिए गए। एक छोटी सी भी चुक चाहे वह किसी भी राजनैतिक दल से ही क्यों न हो देश को उदेल कर रख देगी।


श्री कुंवर प्रीतम जी की एक मुक्तक से आज का लेख शुरू करता हूँ-
सितम की वादियों में गुल नया हमको खिलाना है
चमन को आज माली से खुद हमको ही बचाना है।
नुमाइंदे बने दुश्मन अपने देश के यारो,
हरेक आघात का प्रतिघात अब करके दिखाना है।। -कुंवर प्रीतम


इस लेख को अब कोई अपनी आंखें बन्दकर के भी पढ़ेगा तो ईश्वर उसको भी सम्मति देगा। कलतक जो लोग अन्ना हजारे पर अंगुलियां उठाने का साहस कर रहे थे। आज मुम्बई के आजाद मैदान और दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर भारत के शहर-शहर, गांव-गांव में उमड़ा जैन सैलाब एक ही नारे से सारा दिन गूंजता रहा ‘‘अन्ना तुम आगे बढ़ो - हम तुम्हारे साथ हैं।’’ रामलीला मैदान से श्री अन्ना हजारे ने फिर से यह बता दिया कि यह लड़ाई इतनी आसान नहीं है। इसके लिए उन्होंने देश की जनता को कहा - शुद्ध आचार-शुद्ध विचार, निष्कलंक जीवन और थोड़ा सा त्याग करना। साथ ही देश की जनता को आह्वान किया की अभी हमको देश के किसानों की लड़ाई भी मिलकर लड़नी होगी। हमें देश में परिवर्तन की क्रांति लानी होगी। उमड़ते जनसैलाब ने सारे देश को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। जो लोग कल तक श्री अन्ना और सिविल सोसायटी के सदस्यों को एक भीड़ की संज्ञा देकर अपने तर्क से देश के कानून की दुहाई दे रहे थे, आज ऐसे लोगों की जबानों पर माना किसी ने ताला जड़ दिया है।


लिखने वाले कलमकारों को देश की सच्चाई लिखने के लिए बाध्य होना पड़ा। कल तक जो पत्र सरकारी दलाल बने हुऐ थे उनके समाचार पत्रों को भी सारे समाचार मजबूरन छापने पड़े। सरकार सोचती रही कि देश की जनता गूंगी है उसको सिर्फ राजनैतिज्ञ ही जबान दे सकते हैं के सारे मनसुबे पर पानी फिर गया। कांग्रेस सहित तमाम राजनैतिक दलों की जमीन सरकती नजर आने लगी। देश के पिछले 100 वर्षों के इतिहास में या आजादी के पहले और आजादी के बाद न किभी किसी ने इस तरह का जन सैलाब देखा है न आगे देखने को मिलेगा। यह एक नया इतिहास भारत की धरती पर रचा जाने लगा है। जो विशुद्ध देश के राजनेताओं के वैगेर लड़ा जा रहा है। जिसमें देश की तमाम सियासी पार्टियां अभी तक खुद को इस आंदोलन से अलग-थलग पाती है। इसे इस तरह लिखा जाए तो ज्यादा उचित प्रतीत होता है कि श्री अन्ना जी ने अपने मंच का प्रयोग इन राजनैतिक नेताओं को नहीं करने दिया।
आज जब रामलीला मैदान से श्री अन्ना जी कहा कि ‘‘जन लोकपाल लाओ या फिर जाओ’’ तो सारा हिन्दुस्तान तालियों की गूंज से गूंज उठा। श्रीश्री रविशंकर जी ने यहाँ तक कह दिया ‘‘समय हाथ से निकलते जा रहा है।’’ देश में इस बात के कई मायने लगाये जाने लगे हैं। इस समय जो लोग नियम कायदे की बात कर रहे हैं वे ही लोग दिनभर उसी संसद में बैठकर सारे कायदे-कानून तौड़ते रहे हैं। जो लोग नैतिकता का पाठ जनता को सिखा रहे हैं। उनकी खुद की नैतिकता तब कहाँ चली जाती जब वे सरकारी मेहमान नबाजी का लुफ्त उठाते हैं?


दोस्तों! कुछ बातें इतिहास तय करती है कि क्या गलत हुआ और क्या सही। जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस से खुद को अलग कर ‘‘आजाद हिन्द फौज’’ का गठन कर यह नारा दिया कि ‘‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’ तो इसी तरह उस समय भी कांग्रसियों ने उनका जमकर मजाक उड़ाया था। जब खुदीराम बोस मुज्जफ्फरपुर जाकर अंग्रेज के एक जज पर गोली चलाई तो इन लोगों ने उसे पागल करार दे दिया था। कोई भी स्व.बोस को बचाने के लिए एक शब्द तक नहीं कहा यहाँ तक की गांधी जी ने भी नहीं। लोगों को यह विश्वास था कि शायद अंग्रेज गांधी जी के कहने से खुदीराम की सजा आजीवन कारावास में बदल दें, परन्तु किसी ने जबान तक नहीं खोली।
दोस्तों! समझदारों की हद हो सकती है परन्तु पागलपने की कोई हदें नहीं हुआ करती। सोच समझकर कोई जनसैलाब न तो कभी खड़ा किया गया है न ही किया जा सकता है। देश में उमड़ता यह जन सैलाब इस बात का प्रमाण है कि एक तरफ सरकार के समझदार व पढ़े लिखे लोग हैं जिनको नियम कायदें का पालन करना है व दूसरी तरफ पागलपन। देश में उमड़ता जन सैलाब, मानो जन-सुनामी बन गया है जो भारत में किस-किसको अपने आगोश में बहा ले जायेगी किसी को पता भी नहीं चलेगा। सबके सब सोचते ही रह जाएंगें और कब इस सुनामी के भैंट चढ़ जाएंगें।


आज न सिर्फ सोचने का समय है हमें सावधान होकर लिखने का भी वक्त है। देश के हर जिम्मेदार नागरिक का यह दायित्व बनता है कि पहले हम अपने देश को इस जन-सुनामी से बचाऐं। इस वक्त राजनीति और राजनैतिक दलों की विचारधाराओं को ताक पर रखकर सबको सामने आना चाहिए। जो दल आज के समय इसमें राजनीति करने का प्रयास करेगा वह देश को जन-सैलाब को आग में धकेलने का काम करेगा। अभी तक यह आन्दोलन श्री अन्ना हजारे व इनके सदस्यों के नियंत्रण में है। अहिंसक है। गांधी टोपी में है। यदि किसी ने भी किसी भी तरह से बचकानी हरकतें की या जैसे पूर्व में कांग्रेस की तरफ से बचकाने बयान दिए गए। एक छोटी सी भी चुक चाहे वह किसी भी राजनैतिक दल से ही क्यों न हो देश को उदेल कर रख देगी। अतः बड़ी सावधानी से हमें इस अंगड़ाई लेते जन-सैलाब के सामना करना होगा। मुझे आज यह लिखना पड़ रहा है। कल तक मेरी कलम की धार बहुत तीखे और नुकेली थी परन्तु आज मैं देश के युवकों से इन पंक्तियों के साथ निवेदन करुंगा -



हम लाये हैं तूफान से किस्ती निकाल कर,
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल कर।

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

देख लो सारा वतन!




"देश की जनता जब अपने मूंह पर पटी बांध ले तो या तो आप इसे विरोध कह दिजीए या इन्हें गूंगा इसके दोनों ही अर्थ निकाले जा सकते हैं। यह सोचने और समझने की बात है। अन्ना आज यदि देश को गुमराह कर रहे हैं तो देश का कोई एक नेता तो सामने आकर जनता को समझा सके कि अन्ना की बात पर आपलोग अपने घरों से न निकले। कल मैंने अपनी आंखों से कोलकाता शहर में देखा कि जो लोग कभी राजनीति पर बोलना नहीं चाहते वे गांधी टोपी पहने कर मरने मारने को तैयार खड़े थे। इस सरकार को अन्ना व उनकी टीम का शुक्रगुजार होना चाहिये कि आज के युवाओं के माथे पर गांधी टोपी पहनाकर केन्द्र की लापरवाही से विकाराल रूप धारण करते इस आंदोलन को अहिंसा का पाठ पढ़ा दिया। जबकि जयप्रकाश जी का आन्दोलन या श्री वी.पी.सिंह के आंदोलन में सिर्फ हिंसा के अलावा कुछ नहीं था। "


एक गांधी फिर यहाँ जन्म लेकर चल पड़ा है,
देख लो सारा वतन!
देश, फिर से उसके पीछे ही खड़ा है।


सरकार यह मानती है कि जैसे ही मां के पेट में बच्चा गर्भ धारन कर लेता है उसका सीधे आपरेशन कर दिया जाना चाहिए ताकी माँ की जान को कोई खतरा न हो। श्री अन्ना हजारे की सोच भी इसी खतरे की आशंका जाहिर कर रही थी कि कहीं श्री अन्ना हजारे गर्भ से निकलकर संसद की गरिमा के लिए खतरा न पैदा कर दें। कारण साफ था वाममोर्चा संसद इसलिए चलाना चाहती थी कि वे श्री जस्टीस सेन पर महा अभियोग ला सके। दूसरी तरफ भाजपा ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे श्री अन्ना द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल बिल के कई बिन्दूओं से सहमत नहीं है। सत्ता पक्ष को इनके दरार का न सिर्फ लाभ ही मिल रहा है साथ ही सत्ता पक्ष श्री अन्ना को व इनके लाखों समर्थकों को भी कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। इसी क्रम में कांग्रसी प्रवक्ता श्री मनीष तिवारी जी का श्री अन्ना के प्रति जहर उगलना व केंद्रीय मंत्री श्री सुबोध कांत सहाय ने उन्हैं तो पागल तक कह डाला। जरा आप ही सोचिए यदि मनमोहन सरकार के प्रायः सभी मंत्रीगण जिसमें प्रमुख रूप से श्री कपिल सिब्बल जी, प्रणब दा, अम्बीका सोनी जी और विद्वान वोट बैंक की चिन्ता करने वाले श्री मान् दिग्विजय सिंह जी जैसे समझदारों की जमात भरी हो तो उसकी नैया खुद ही भगवान डूबा देगा। इसके लिए किसी पागल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
डा.मनमोहन सिंह ने लाल किले से 15 अगस्त को देश के नाम हिन्दी में एक संदेश पढ़ा। उनकी बात विपक्षी सदस्यों को समझ में नहीं आयी या उनकी बात को वे शायद समझ नहीं सके। इसीलिए पुनः अगले ही दिन फिर उनको संसद में आकर बयान देने को कहा गया। विपक्ष सोचते हैं कि वें संसद को कभी न चलने देने के नाम पर, कभी चलने देने के नाम पर, देश की जनता को जिस प्रकार मुर्ख बनाते रहें हैं। उसी प्रकार कभी संसद की व्यवस्था धारा 72, तो कभी 184, कभी गृहमंत्री जी के बयान के नाम पर देश को गुमराह कर देश में लोकतंत्र की रक्षा कर रहें हैं।


महिला बिल हो या लोकपाल बिल, कभी सहमति तो कभी असहमति, कभी दुहाई तो कभी गुमराह करते रहते हैं मानो देश की सारी जनता तो अनपढ़ और गंवार है। कुछ समझती तो है नहीं? अब तो ऐसा आभास भी होने लगा कि जो लोग चुन कर संसद में जाते हैं या जिनकी राज्यसभा में लाटरी खुल जाती है वे ही देश के भाग्य निर्माता हैं बाकी सारे लोग या तो पागल हैं या उनके विचारों का कोई मूल्य नहीं है। कारण साफ है देश में संसद की मर्यादा ही सर्वापरि है, इसके बाद देश के मंत्री-संत्री आते हैं जिसकी आवभगत में सारा हिन्दुस्तान पलकें विछाए खड़े रहता है। चुनाव मे जीत क्या दर्ज हो जाती है ये रातों-रात अपने घर की छतों से ही छलांग लगाकर अकाश में पंहुच जातें हैं फिर तो पांच साल देश को लूटने का एक प्रकार से सरकारी आदेश इनकें हाथों में चुनाव आयोग थमा देता है। कभी-कभी राज्यों में भी ऐसा ही देखने को मिला है। जिसमें कुछ वर्षों पहले बिहार और अभी कर्नाटका राज्य में हमें देखने को मिला है।


खैर ! प्रधानमंत्री जी संसद में आये एक अंग्रजी में छपा-छपाया अपने बयान की प्रति संसद में खड़े होकर वितरित करवा दिए। उसको पढे़ और चल गये। कारण साफ था न तो विपक्ष में इतनी क्षमता है कि वे प्रधानमंत्री को कह सके कि साहेब अभी जातें कहां है? जनता की बात भी सुनते जाइए न ही इनमें कोई खुद की इच्छा शक्ति ही थी की वे संसद के अन्दर बैठे सांसदों का मान रख पाते। विपक्षी भाषण की कड़ी में एक मात्र श्री शरद यादव के भाषण को छोड़ कर सबने अपनी दाल ही गलाने की चेष्टा की बस। सरकार बार-बार चिल्लाती है कि श्री अन्ना संसदीय कार्यों पर अलोकतांत्रिक तरिके से दबाब बनाने का प्रयास कर रही है। कानून बनाने का कार्य संसद का है। तो किसने कहा कि आप कानून अन्ना जी के घर जाकर बनाऐं। जब लोकतंत्र के रक्षक देश की जनता के साथ अलोकतंत्रिक व्यवहार करने लगते हैं तब-तब देश की जनता सामने हो मुखर होती रही है। सरकार को देश के विकास की चिन्ता अचानक से सताने लगी। मंहगाई सर उठाकर सीना ताने खड़ी है। भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पार कर चुका है। देश के प्रधानमंत्री जी खुद अर्थशास्त्री हैं इसलिए देश की अर्थ व्यवस्था भी इनके चिन्ता का कारण है। इन सबमें सबसे बड़ी चिन्ता इनको लोकतंत्रिय ढांचे को चुनौति की है। जब इतनी सारी चुनौतियों का सामना इनको करना ही था तो एक नई चुनौति और क्यों पैदा कर ली सरकार ने। अभी भी समय है कि संसद के बेइमानों को विश्वास में न लेकर प्रधानमंत्री जी जनता को विश्वास में लें। संसद का अर्थ होता है लोकतंत्र और लोकतंत्र में जनता सर्वोच्य होती है न कि मंत्रिमंडल। बाबा रामदेव को जिस लाठी से आपके शातिरों ने हांकने की चेष्टा की उसी रणनीति को आप अन्नाजी पर प्रयोग करने की भूल कर रहें हैं। संभवतः कहीं यह आपकी सरकार की कब्र न खोद डाले।


मेरे बहुत सारे पत्रकार संपादकों ने भी यह प्रश्न खड़ा किया कि ‘‘पांच सदस्यों की टीम की बात आखिर क्यों सुनी जाए? इस प्रकार तो हर कोई खड़ा होकर बोलने लगेगा कि अमूक कानून बनाओ।’’ भाई! या तो इनलोगों ने अपनी कलम को सरकार के पास गिरवी कर रखी है या फिर इनका दिमाग खाली हो चुका है। देश में पाँच की बात तो छोड़िये जनाब एक दो राज्य सरकारें भी मिलकर चेष्टाकर के दिखा दिजिए की वे संसद से अपने मन चाहा कानून पास करवा लेवें। महिला बिल पर पूरी संसद एक है सिर्फ 20-25 सांसदों ने धमकी क्या दी सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए। जिस बात को लेकर ये लोग बहस चला रहें है उसमें जयप्रकाश जी के आन्दोलन से अन्ना के आन्दोलन की तूलना भी की जा रही है। शायद या तो ये लोग जानबूझ कर अनजान बने हुए हैं या सोचते है कि वे जो कहते हैं जनता सिर्फ इतना ही पढ़ती और जानती है।


स्व.जयप्रकाश नारायण जी का आन्दोलन आपातकाल की स्थिति से पैदा हुआ था, जिसमें तमाम विपक्ष को सरकार ने जेलों में बन्द कर दिया था इसलिए तमाम विपक्ष एकजूट होकर स्व.जयप्रकाश के आंदोलन को अपने स्वार्थ के लिए हवा दे रही थी। जबकि आज के आंदोलन को एक मात्र अन्ना हजारे चला रहें हैं और सारा देश एक रात में अन्ना-अन्ना हो गया। इसमें न तो किसी विपक्ष का ही सहयोग है ना ही किसी राजनैतिक पार्टी से श्री अन्ना ने सहयोग ही मांगा है। हां! लोकतंत्र में आस्था यदि नहीं होती तो वे अपना पहला अनशन समाप्त ही क्यों करते? सरकार के साथ टेबल पर बैठने का सीधा सा अर्थ था कि लोकतंत्र में आस्था व्यक्त करना। न सिर्फ अन्ना की टीम सरकार से बातें की। विपक्ष के सभी प्रमुख दलों से भी मिलकर अपनी बातों को उनके सामने रखा। इसके बावजूद सरकार ने संसद मे बिल प्रस्तावित कर दिया तो इस पर बहार बहस नहीं हो सकती यह किस कानून में लिखा है? दहेज कानून तो आज भी बन जाने के बाद बहस का मुद्दा बना हुआ है इसी प्रकार जमीन अधिग्रहण कानून अपनी मुंह के बल चारों खाने चित होकर रो रहा है। उच्चतम न्यायालय जो कभी इस कानून के पक्ष में एकतरफा फैसला दिया करता था आज उसने भी कह दिया कि यह कानून देश के साथ एक धोखा है।


देश की जनता जब अपने मूंह पर पटी बांध ले तो या तो आप इसे विरोध कह दिजीए या इन्हें गूंगा इसके दोनों ही अर्थ निकाले जा सकते हैं। यह सोचने और समझने की बात है। अन्ना आज यदि देश को गुमराह कर रहे हैं तो देश का कोई एक नेता तो सामने आकर जनता को समझा सके कि अन्ना की बात पर आपलोग अपने घरों से न निकले। कल मैंने अपनी आंखों से कोलकाता शहर में देखा कि जो लोग कभी राजनीति पर बोलना नहीं चाहते वे गांधी टोपी पहने कर मरने मारने को तैयार खड़े थे। इस सरकार को अन्ना व उनकी टीम का शुक्रगुजार होना चाहिये कि आज के युवाओं के माथे पर गांधी टोपी पहनाकर केन्द्र की लापरवाही से विकाराल रूप धारण करते इस आंदोलन को अहिंसा का पाठ पढ़ा दिया। जबकि जयप्रकाश जी का आन्दोलन या श्री वी.पी.सिंह के आंदोलन में सिर्फ हिंसा के अलावा कुछ नहीं था। हाँ! देश की संसद में बैठ कर खुद को जो लोग सुपर पावर समझ बैंठे हैं उनके पास अभी भी समय है कि वे देश के कुछ जाने-माने लोगों को विश्वास में लेकर टीम अन्ना के सदस्यों से राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए उनके सूझाए गए प्रस्तावों पर गंभीर चर्चा जल्द से जल्द प्रारंभ करें अन्यथा यह आग संसद की मर्यादा पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ी कर सकती है। आज इसे जो लोग फेसबुक का फैशन समझ रहे हैं उनकी जमीन न हिला दे यह फेसबुक। अभी हाल ही दो देशों में इसका जमकर युवाओं ने प्रयोग किया और सरकार 21 दिनों में ही सतह पर खड़ी दिखाई देने लगी। जबकि वहां लोकतंत्र था ही नहीं सारे मीडिया वाले व पत्रकार सरकार के बंधुवा मजदूर थे। भारत में तो लोकतंत्र है इस बात को मेरे मित्र जरा ध्यान में रखेगें तो अच्छा रहेगा। जय हिन्द!

-- कोलकात, दिनांकः 17 अगस्त’2011 द्वारा - शम्भु चौधरी

सोमवार, 15 अगस्त 2011

संसद को भ्रष्टाचारियों का ग्रहण




‘‘जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका मन आया इसको नचाया मन भर गया तो दूसरे को भी मजा लेने का मौका दे दिया गया। एक गया दूसरा आया जनता सोचती ये हमारे लोग हैं जो चुन कर दिल्ली में जातें हैं पर दिल्ली पंहुचते ही ये सत्ता के दलाल बनकर देश को बेचने का सौदा इसी लोकतंत्र के मंदिर में करने लगतें हैं। तब इन बेशर्मों को संसद की मर्यादाओं का तनिक भी ख्याल नहीं आता, उस वक्त देश की कौन कितनी बड़ी बोली लगाता है इसकी जोड़-तोड़ शुरू कर देते हैं यही लोग।’’


जल जायेगी धरती जब सत्ता के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला तब नन्हे से पहरेदारों में।(स्वरचित)


दोस्तों! यह लेख देश की दूसरी आजादी के पूर्व संध्या की लड़ाई के अवसर पर लिख रहा हूँ। आज हम आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाने के लिए जैसे ही छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में तिरंगा झंडा थमाऐ बच्चे जोर से चिल्ला पड़े ‘‘अन्ना हजारे हम आपके साथ हैं।’’ हम खड़े देखते ही रह गए मानो किसी ने बच्चों के दिमाग को पागल बना दिया हो। देश की इस स्थिति के लिए हम सबके सब जिम्मेदार हैं। जिस संसद की मर्यादा रखना हम सबका न सिर्फ कर्तव्य, दायित्व भी बनता है, दुनिया के लोकतंत्रिय इतिहास के सबसे बड़े मंदिर के अन्दर चोर-बेइमानों का जमावड़ा हो चुका है। हमारी चुनाव प्रणाली बेइमानों को चुनने का मात्र एक साधन बनकर रह गयी है। जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका मन आया इसको नचाया मन भर गया तो दूसरे को भी मजा लेने का मौका दे दिया गया। एक गया दूसरा आया जनता सोचती ये हमारे लोग हैं जो चुन कर दिल्ली में जातें हैं पर दिल्ली पंहुचते ही ये सत्ता के दलाल बनकर देश को बेचने का सौदा इसी लोकतंत्र के मंदिर में करने लगतें हैं। तब इन बेशर्मों को संसद की मर्यादाओं का तनिक भी ख्याल नहीं आता, उस वक्त देश की कौन कितनी बड़ी बोली लगाता है इसकी जोड़-तोड़ शुरू कर देते हैं यही लोग। जिसे लोकतंत्र का नाम देकर देश के लुटने का जरिया बनाकर जनता पर हुक्म चलाते हैं जब इनकी बात न सुनी जाती तो संसद को चलने नहीं देते तब इनकी सभी कुकृत्य लोकतांत्रिक है। परन्तु जब जनता कुछ कहे तो उसको चुनकर आने या अर्मायदित शब्दों का प्रयोग कर संसद की गरिमा की दुहाई देते हैं। मानो संसद इनकी बपौती हो गई हो।


उसने कहा मैं पगल, मैं सोचा कि ‘मैं’ पागल।
जब सच में हुआ मैं पागल, तो मुझको दिखा हम सब पागल।।



दोस्तों! बैगर पागलपन के कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। आज हम जिस चौराहे पर खड़ें हैं इसका एक रास्ता सीधा हम सबको खाई में धकेल देगा। हम जिसे लोकतंत्र समझतें रहें हैं वही लोकतंत्र घून की तरह हमारे देश को गत 64 वर्षों से लुटने का माध्यम बना हुआ है। आज उस पर ताला जड़ने और इन तमाम बेईमानों की काली कमाई को बन्द करने की आवाज उठाने की देश के कुछ ही लोगों ने थोड़ी सी हिम्मत ही की थी, कि इनकी बौखलाहट देखिये किस प्रकार देश की सारी ताकतों को चार-पाँच लोगों की जाँच करने के लिए झौंक डाली। संसद में बैठे किसी चोर ने उफ तक न की सारे के सारे जबान पर ताला लगा कर इनकी करतुतों का समर्थन करने लगे। जब इन बेईमानों का लेखा-जोखा और पिछले 64 सालों का खाया पीया निकाला जाएगा तब इनको कौन बचायेगा? अब समय आ गया है इन बेइमानों के सारे काले कारनामें का एक लम्बा इतिहास लिखा जाए।
आज संसद से ज्यादा जरूरी है देश को इन बेइमानों से बचाना। इसके लिए संसद के इनके काली कमाई करने के कार्यों पर ताला लगा कर देश में एक नए संविधान रचने के लिए जनता को कुर्बानी देनी ही होगी। शायद दुष्यंत कुमार ने इसी दिन के लिए यह लिखा था-


आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख, पर अंधेरा देख तू- आकाश के तारे न देख।
ऐ दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।



दोस्तों जिस भाषा का प्रयोग कांग्रसीगणों ने समाजसेवी आदरणीय श्री अन्ना जी के लिए किया यह इनका अहम है। इनको इस बात का गुमान हो चला है कि सत्ता के सिर्फ वे ही मालिक है एवं सिर्फ इनको ही देश सेवा का अवसर मिला है। जिस संविधान ने हमें देश में सिर्फ भ्रष्टाचारों की फौज भर दी हो उसको बदल डालना जरूरी हो गया है। अब सिर्फ लोकपाल बिल से इस देश को नहीं बचाया जा सकता। चाहे जन लोकपाल हो या सरकारी लुटेरों का सरकारी लोकपाल। इस देश को इससे कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है देश के नये संविधान लिखने की और यह इस संसदीय व्यवस्था के अंर्तगत कदापी नहीं लिखा जा सकता। अतः जबतक हम किसी नए संविधान को लिखने में समर्थ न हो जाते तब तलक देश के इस मंदिर को बंद कर सामने ताला लगा दिया जाना चाहिए। मानो अब देश को एक प्रकार से संसद को भ्रष्टाचारियों का ग्रहण लग चुका है।
पुनः दुष्यंत जी कि इस पंक्ति के साथ अपनी कलम को आज विराम दूँगा-


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।



गुरुवार, 4 अगस्त 2011

सोनिया का इलाजः अनसुलझे सवाल?




सत्तारुढ़ दल की महानायिका जिसके बेगैर कांग्रेस का कोई प्यादा पानी पीने भी नहीं जाता, सारे के सारे संसद की चौकीदारी करने में लगे थे यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह भी जो सोनिया के बेगैर अपनी सांस तक नहीं लेते। ऐसे में इस रहस्यमय लापता यात्रा कई गंभीर सवाल खड़ा करता है।


कल जब एक तरफ संसद चल रही थी देश ही नहीं पूरे विश्व की मीडिया तंत्र एकतरफ संसद के अन्दर लोकपाल बिल के प्रस्तुत करने व मंहगाई पर वित्तमंत्री श्री प्रणब मुखर्जी के बयान की तरफ टकटकी लगाये हुए थी तो दूसरी तरफ संसद के बहार अन्ना हजारे की तरफ लोकपाल बिल का विरोध चल रहा था, ऐसे में अचानक से एक समाचार कांग्रेस पार्टी की तरफ से आया कि कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी किसी गुप्त इजाल के लिए देश के बहार चली गई है। पार्टी प्रवक्ता श्री मनीष तिवारी ने देश को वे तमाम जानकारी देने से भी इंकार कर दिया कि सोनिया जी किस देश में इलाज के लिए गई?, कब गई? क्यों गई? कैसे गई? जैसे कई अनसुलझे सवालों का पिटारा छोड़कर अचानक से देश से विदेश रवाना हो गई। इस भ्रम को बनाये रखने के लिए जो समय का चुनाव किया गया इससे देश में कई तरह की शंकाएं लगाये जाने लगी है। किस डाक्टर की सलाह पर गई, कौन सा ऑपरेशन होने वाला है? और किस अस्पताल में होने वाला न तो देश का पता बताया गया, न ही इनकी किसी बीमारी का। सारी बातें कुछ इस प्रकार से गुप-चुप, गुप-चुप हो रही थी कि किसी को कानों-कान भी पता न चला और देश की सत्तारुढ़ दल की महानायिका जिसके बेगैर कांग्रेस का कोई प्यादा पानी पीने भी नहीं जाता, सारे के सारे संसद की चौकीदारी करने में लगे थे यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह भी जो सोनिया के बेगैर अपनी सांस तक नहीं लेते। ऐसे में इस रहस्यमय लापता यात्रा कई गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर सोनिया जैसी शख़्सियत जिसके बिना कांग्रेस पार्टी और वर्तमान सरकार का पत्ता भी नहीं हिलता चुप-चाप देश के बहार सिर्फ प्राइवेसी के आधार पर चली जाए? सोचने की बात है। सारे प्रकरण और कांग्रसियों के तमाम बयानों में कोई स्पष्ट झलक दिखाई नहीं दी कि अचानक से ऐसा क्या हो गया कि सोनिया गांधी को, देश को भ्रम में रखकर चुपचाप विदेश भेज दिया गया, जिसकी जरा भी भनक न तो मीडिया को लगने दी गई ना ही किसी काँग्रेसी नेताओं को भी। यहां तक कि कांग्रेस के कर्मचारियों को भी इसकी भनक नहीं लगने दिया गया। ईश्वर से हम इनके जल्द स्वास्थ्य लाभ की मंगल कामना करते हुए कांग्रेस पार्टी से यह सवाल भी करते हैं कि देश को अंधेरे में रखकर इस तरह की सोनिया गांधी को चुप-चाप देश से बहार क्यों भेजा गया? सारी सूचनाऐं सरकार आज ही जारी करे। - शम्भु चौधरी

बुधवार, 3 अगस्त 2011

बगावत के लिए खड़ी हो जनता!



दरअसल में ये सभी मिलकर ‘‘मछली.मछली कितना पानी’’ का खेल, खेल रहें हैं। इस खेल का परिणाम इनको पहले से ही मालूम है कि क्या होने वाला है। जनता चारों तरफ से खुद को ठगी सी महसूस करने लगी। एक तरफ लोकतांत्रिक ढांचे के द्वारा चुने हुए तानाशाहों की जमात तो दूसरी तरफ आम जनता आमने-सामने हो चुकी है। कल की बहस हमने देख ली और आज समाचार पत्रों में पढ़ भी लिया होगा। कल का दिन मंहगाई के बली चढ़ गया। भाजपा के नेताओं को बोलते-बोलते भूख लग गई सो देश की जनता अपने टी.वी.सेट को ताकती रह गई।


बचपन में हम एक खेल खेला करते थे। ‘‘मछली.मछली कितना पानी’’ पानी का स्तर जैसे-जैसे कम होते जाता, मछली जल के लिए तड़फने लगती और अंत में मर जाती है। कल जो संसद के भीतर सत्तापक्ष और तमाम विपक्ष ने जो खेल खेला इससे कम से कम हमें तो यही प्रतीत होता है कि इस देश को इन चुने हुए सांसदों ने मिलकर देश को तमाशा बना दिया है। बढ़ती मंहगाई और चारों तरफ व्याप्त भ्रष्टाचार पर किस तरह काबू पाया जाए इसकी किसी को चिंता नहीं दिखी धारा 184 के तहत इस बहस को लेकर न तो सत्ता पक्ष, ना ही विपक्ष गंभीर दिखाई दिया। मत विभाजन मात्र आम जनता को धोखा देने का एक नाटक बन कर रह गया संसद में। सवाल उठता है कि यदि पक्ष और विपक्ष का यही हाल हमें संसद में देखने को मिला तो संसद को बनाने और इसे चलाने के सवाल पर सीधा सा प्रश्न चिन्ह क्यों न खड़ा किया जा सकता है कि फिर हमें इसे बनाने और इसे चलाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने की जरूरत ही क्या है? देश के चुने हुए सांसदों के बयानों से अब आम जनता को बड़ी निराशा होने लगी है। संसद के अंदर और संसद के बाहर जैसे शब्दों का प्रयोग कर सत्ता और विपक्ष ने यह प्रमाणित कर दिया कि अब संसद के अंदर जाने वाले लोग देश के हित में सोच ही नहीं सकते उनका उद्देश्य न सिर्फ जनता को गुमराह करना है बल्की संसद का प्रयोग भी खुद के राजनैतिक स्वाथों की पूर्ति के लिए करना है। सबके सब इस बात पर चिंता व्यक्त करते दिखे कि अन्ना हजारे संसद के बहार खड़ा होकर संसद को चुनौती दे रहे हैं जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुका है।
दरअसल में ये सभी मिलकर ‘‘मछली.मछली कितना पानी’’ का खेल, खेल रहें हैं। इस खेल का परिणाम इनको पहले से ही मालूम है कि क्या होने वाला है। जनता चारों तरफ से खुद को ठगी सी महसूस करने लगी। एक तरफ लोकतांत्रिक ढांचे के द्वारा चुने हुए तानाशाहों की जमात तो दूसरी तरफ आम जनता आमने-सामने हो चुकी है। कल की बहस हमने देख ली और आज समाचार पत्रों में पढ़ भी लिया होगा। कल का दिन मंहगाई के बली चढ़ गया। भाजपा के नेताओं को बोलते-बोलते भूख लग गई सो देश की जनता अपने टी.वी.सेट को ताकती रह गई। नेतागण खाने चले गये। पुनः संसद की कार्यवाही शुरू हुई तो 90प्रतिशत सांसद पक्ष-प्रतिपक्ष नेता, उपनेता सबके सब संसद से नदारत दिखे। आज लोकपाल बिल पर भी कुल इसी प्रकार की बहस की उम्मिद हम इन भूखरों से करते है जो न सिर्फ संसद क अंदर मुफ्त का माल गटगते हैं देश को भी भीतर ही भीतर खोखला करते जा रहें हैं।
ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि क्या जिस चुनावी ढांचे के अंर्तगत हम इन बेईमानों को चुनकर संसद में भेजते है क्यों न हम इस व्यवस्था को ही मूलरूपेन बदल डालें? इसके लिए जनता को बगावत करनी होगी और यह तभी संभव हो सकेगा जब कोई छोटी सी ही सही एक इमानदार राजनैतिक दल को इस आंदोलन से जुड़कर न सिर्फ सत्ता परिवर्तन की बात करनी होगी। देश की वर्तमान संसदीय प्रणाली को भी बदलने के लिए कारगार कदम उठाने के वादे जनता से करे तभी इन बेइमानों को पूर्ण रूप से बदला जा सकेगा। अन्त में मेरी एक कविता के कुछ अंश से अपनी बात को आज विराम दूँगा-


जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हे से पहरेदारों में।


न्यायपालिका जब यहाँ पर,
हो जायेगी गूँगी तब,
संसद में बैठे नेतागण,
चिर का हरण करेगें तब।
कौन बनेगा ‘कृष्ण’ यहाँ,
किसकी सामत आयी है,
कलियुग के भीम-गदा को देखो,
युधिष्ठर, नकुल, सहदेव कहाँ
‘अर्जून’ की तरकश में अब,
वाणों का वह वेग कहाँ,
भीष्मपितामह की वाणी में,
ममता-व- स्नेह कहाँ,
‘धृतराष्ट्र’ ढग-ढग पे देखों,
सत्ता के गलियारों में,
दुर्योधन की गिनती कर लो,
चाहे हर मंत्रालयों में।।


शम्भु चौधरी का संक्षिप्त परिचयः
श्री शम्भु चौधरी का जन्म 15 अगस्त 1956 को कटिहार (बिहार) में हुआ। गत 30 वर्षों से कोलकाता में ही स्थाई निवास। आपकी एक पुस्तक "मारवाड़ी देस का ना परदेस का" प्रकाशित। बचपन से ही कविता, लघुकथा, व सामाजिक लेख लिखना, देश के कई पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा, कविताओं, सामाजिक व राजनैतिक विषयों पर लेखों का प्रकाशन। स्वतंत्र पत्रकारिता करना व सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनमानस को जगाना। "देवराला सती काण्ड" के विरुद्ध कलकत्ता शहर में जुलूस निकालकर कानून में संसोधन कराने में सक्रिय भूमिका का निर्वाह। सामाजिक विषय पर चिन्तनशील कई पुस्तकों का सम्पादन। समाज के युवाओं को संगठित कर उनको विकासमूलक कार्यों में लगाना, राजनीति का सामाजिकरण करना, व स्वतंत्र पत्रकारिता में रुचि। कोलकात्ता से प्रकाशित "समाज विकास" सामाजिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक पद पर कार्य कर चुके श्री चौधरी जी के कई लेखों ने सामाजिक और राजनीतिक समिकरण में बदलाव लाया है। वर्तमान में आपने श्री अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को अपना नैतिक समर्थन देते हुए अपनी कलम को इस आन्दोलन से जोड़ दिया है। आपके द्वारा 2ब्लाग भी संचालित किये जातें हैं जिनके पते निम्न हैं।


  • ehindisahitya.blogspot.com



  • samajvikas.blogspot.com

  • गुरुवार, 28 जुलाई 2011

    लोकपाल बिलः भ्रमाक प्रचार का सहारा



    सरकार ने धोखेबाजी के साथ यह सब नाटक रच देश की जनता के साथ न सिर्फ धोखा किया है। संसद में कमजोर लोकपाल बिल लाकर वह लोकपाल बिल को एक तमाशा बना देने पर तुली है। इसके साथ ही अब यह तय हो गया कि टीम अन्ना द्वारा सूझाये गये सभी प्रस्तावों को कचरे के डब्बें में फेंक दिया गया है। यह एक खोखला प्रचार किया जा रहा है कि सरकार ने अन्ना के सूझावों को ध्यान में रखते हुए बिल में काफी परिवर्तन किये हैं। हाँ! परिवर्तन इस बात का किया गया है कि किसी भी प्रकार से मनमोहन की पिछली और वर्तमान सरकार के पापों की जाँच लोकपाल न कर सके इस बात को ध्यान में रखते हुए बिल के सभी प्रावधानों को सावधानी पूर्वक प्रस्तावित बिल में संजोया गया है ताकी निकट भविष्य में इन बेइमानों को कोई जेल में न भेज सके।


    पिछले 65 सालों के इतिहास में देश की सबसे बड़ी भ्रष्ट सरकार के केबिनेट स्तर की बैठक में आज एक प्रकार से भ्रमित प्रचार का सहारा लेते हुए प्रस्तावित सरकारी लोकपाल बिल को केबिनेट की मंजूरी प्रदान कर दी। जिसे संसद के अगले सत्र में बहस के लिए प्रस्तुत किया जाना है और यह भी तय है कि सरकार का यह सरकारी ड्रामा संसद के गलियारे में या तो दम तोड़ देगा या ऐसा बिल पारित हो जायेगा जो न सिर्फ देश के लोकतंत्र को अंगूठा दिखा अपनी तामाम काली करतूतों पर परदा डाल देगा कि किसी भ्रष्टाचारी सजा मिलने की जगह उसे क्लिन चिट दे दिया जायेगा। मसलन 2जी घोटाला, कामनवेल्थ घोटाला, जैसे मामालों को तथाकथित लोकपाल बिल के दायरे में लाकर उसे न सिर्फ पाक-साफ कर दिया जायेगा। घोटालेबाजों पर अंगूली दिखाने वाले को जेल की हवा भी खानी पड़ेगी। आपने अभी देखा ही है कि भ्रष्ट सरकार किस प्रकार रामदेव बाबा व उनके सहयोगियों को न सिर्फ झूठे और मनगढ़ंत मामाले में उलझाकर देश को गुमराह करने में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है।


    1. सरकार द्वारा भ्रमाक प्रचार -
    सरकारी पक्ष देश में यह भ्रम फैला रही है कि अन्ना हजारे संसद के ऊपर होकर लोकपाल बिल को खुद ही पास करना चाहतें हैं जबकि बिल को संसद के अन्दर संसद सदस्य पारित करेगें अन्ना उनके अधिकार क्षेत्र में दखलअंदाजी कर रहे हैं। उनका यह भ्रम आज कुछ मंत्रियों के बयानों से साफ झलकने लगा कि सरकार अपने केबिनेट को यह समझाने में सफल हो गई कि संसद के चुने हुए सांसदों के ऊपर कोई नहीं। ये भी जनता के प्रतिनिधि ही हैं। सिविल सोसायटी के चन्द लोग मिलकर सरकार को डराने का काम कर संसदीय प्रणाली की मर्यादा को भंग कर उन पर हावी होने का प्रयास कर रही है जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जायेगा। यह मिथ्या प्रचार न सिफ्र भ्रमक है देश कि जनता के साथ-साथ अपने साथियों को लामबंद करने का एक प्रयास भी है। अन्ना हजारे व सिविल सोसायटी के सदस्य मजबूत लोकपाल बिल लाने के पक्ष में अपनी राय जनता से शेयर कर रहें है। जबकि सरकार ने जनता के द्वारा किये आन्दोलन को दबाने का नाटक रच जनता की आंखों में धूल झोंक कर सिविल सोसायटी के सदस्यों के साथ बैठकें की। अब उसे ही कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर एक प्रकार से अभी से ही जनता के आन्दोलन का कूचलने की रणनीति बना रही है। जिसके तहत वह संसद की मर्यादा को भी ताक में रखने को तैयार दिखती है।


    2. सरकार द्वारा भ्रमाक प्रचार -
    सरकार जिस तरह से अन्ना हाजारे व बाबा रामदेव को अपने जाल में फंसाने का प्रयास कर न सिर्फ अनैतिक दबाब बनाये रखने के लिये इन लोगों के द्वारा संचालित ट्रस्टों की जाँच व अन्य धोखाबाजी वाली चालें चल रही है इससे इस सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है कि सरकार की नियत देश को गुमराह करने की है न कि मजबूत लोकपाल बिल लाने की अतः इस सरकार के रहते हम एक मजबूत लोकपाल बिल की कल्पना किसी भी कीमत पर नहीं कर सकते। चुंकि सरकार भ्रष्टचारियों के सहयोग से चल रही है अतः यह भी कल्पना करना कि सरकार को निकट भविष्य में कोई क्षति होगी वह भी संभव नहीं।


    3. सरकार द्वारा भ्रमाक प्रचार -
    सरकारी पक्ष का मानना है कि वे देश की जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं फिर भी वे बेगेर चुने हुए लोगों के साथ लोकपाल बिल पर चर्चा कर उनके द्वारा सूझाये गये सूझावों को लोकपाल बिल में शामिल कर लिए जाने के बाबजूद अन्ना हजारे व उनकी टीम संसद को चुनोती देने का कार्य कर रही है। जबकि सरकार ने धोखेबाजी के साथ यह सब नाटक रच देश की जनता के साथ न सिर्फ धोखा किया है। संसद में कमजोर लोकपाल बिल लाकर वह लोकपाल बिल को एक तमाशा बना देने पर तुली है। इसके साथ ही अब यह तय हो गया कि टीम अन्ना द्वारा सूझाये गये सभी प्रस्तावों को कचरे के डब्बें में फेंक दिया गया है। यह एक खोखला प्रचार किया जा रहा है कि सरकार ने अन्ना के सूझावों को ध्यान में रखते हुए बिल में काफी परिवर्तन किये हैं। हाँ! परिवर्तन इस बात का किया गया है कि किसी भी प्रकार से मनमोहन की पिछली और वर्तमान सरकार के पापों की जाँच लोकपाल न कर सके इस बात को ध्यान में रखते हुए बिल के सभी प्रावधानों को सावधानी पूर्वक प्रस्तावित बिल में संजोया गया है ताकी निकट भविष्य में इन बेइमानों को कोई जेल में न भेज सके।


    - शम्भु चौधरी

    गुरुवार, 14 जुलाई 2011

    आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? - शम्भु चौधरी



    अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’


    बाबा अम्बेदकर द्वारा रचित संविधान में राम का नाम लिखना-जपना सांप्रदायिकता है सो हमने इस लय को नई धुन देने का प्रयास कर रहा हूँ। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ आज देश में हर राजनेताओं की भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बू झलकती है। जिसे देखो हर मामले को सांप्रदायिकता से जोड़ रहा है। कालेधन की बात हो या राष्ट्र में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार जरा सी कोई चूँ-चपड़ किया की बस उसे सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने और चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश का हिस्सा मानने लगते हैं। इनकी भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बात साफ झलकती है। मानो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही सिर्फ 35 करोड़ अल्पसंख्यकों को बली चढ़ा दी गई हो। इस कतार में सबके सब लगे हुऐं हैं, धक्कमपेल चल रहा है। 65 सालों से उल्लू बनते आ रहे मुसलमानों के विकास, शिक्षा, कुरीतियों, रूढ़ीवादी परम्पराओं, कट्टरवादी धार्मिकता पर बोलने और उन्हें सुधारने का काम किसी ने नहीं किया। सिर्फ उन्हें हिन्दू कट्टरपंथियों से बचाये रखने व उनकी असामाजिक व कट्टरवादी धार्मिक गतिविधियों का संरक्षण कर वोट बैंक को सुरक्षित करना हमारे देश के राजनेताओं का एक मात्र लक्ष्य रह गया है। इसके लिए मुसलमानों के धार्मिक कट्टरवादी भी विशेष रूप से जिम्मेदार हैं, जो समाज के विकास को रोक राजनेताओं के पक्ष में अपने बयान देते नजर आते हैं। जब इमाम किसी दल विशेष को वोट देने या न देने की अपील जारी करता है तो वह धर्मनिरपेक्ष है। परन्तु जब बाबा रामदेव देश के लुटे हुए धन की बात करता हो या अन्ना हजारे देश की संसद को भ्रष्टमुक्त करने के कानून पर चर्चा करता हो तो या तो इन लोगों को यह सलाह दी जाती है कि वे जनता के प्रतिनिधि नहीं है पहले वे चुनकर आयें तब चुने हुए बेईमानों से बात करें या फिर उन्हें सांप्रदायिक शक्ति करार दे दिया जाता है। मानो इस देश में आतंकवादी हमला करने वाली ताकतें तो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बचती रहे और राष्ट्र के उन्नति व इसके उत्थान की बात करने वाला या तो देश का गद्दार है या देश में सांप्रदायिकता का जहर फैला रहा हो। मजे की बात यह है कि इससे न तो कभी किसी इमाम का भला हुआ न ही इनकी कौम को हाँ! कभी कभार वह भी चुनाव के वक्त उनके प्रसाद के बतौर थोड़ा बतासा खाने को जरूर मिल जाता है। जैसे कुछ असमाजिक तत्वों की रिहाई या किसी कानून को उनके पक्ष में समाप्त कर देना या बना देना या फिर बंग्लादेशियों को राशनकार्ड व वोटर कार्ड देकर उसे खुद की झौली में जमा कर लेना। इससे इस देश के मुसलमानों का क्या भला हुआ? मुसलमानों के वोट बढ़ने से यदि सत्ता उनको मिलती हो तो बात मेरी समझ में आती पर किसी कांग्रसी ने कभी भी सत्ता मुसलमानों को सोपने की बात कभी नहीं की व सत्ता किसे सोपना चाहतें हैं राहुल गांधी को.... सोनिया जी को या खुद उनसे चिपके रह कर देश को लुटने के फिराक में रहते हैं। अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी?प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ (लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

    शनिवार, 2 जुलाई 2011

    धन्य हो गया बिहार - शम्भु चौधरी




    आज इस बात को लिखने में मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है कि हमें नीतीश कुमार भी इन्ही भ्रष्टाचारियों के बीच से ही मिला है जिसने गर्त में डूबे बिहार का न सिर्फ चन्द सालों में काया ही बदल डाली। अल्पसंख्यकों की रहनुमाई कर बार-बार सत्ता पर काबिज होने वाले सत्ता के दलालों के दरवाजों पर अलीगढ़ी ताले भी लटका डाले। चारों तरफ कुशासन, अपहरण हत्या पर न सिर्फ इन्होंने लगाम लगा दी, राज्य में पूंजी निवेश के भी कई नये विकल्प खोल दिये। मानो बिहार श्री नीतीश जी के शासन व्यवस्था से धन्य हो गया हो।


    कल जब श्री अन्ना हजारे एवं उनके सहयोगी सदस्य बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार से मिले तो एक तरफ नीतीश जी ने लोकपाल बिल को प्रभावी तथा व्यापक बनाने की वकालत की तो दूसरी तरफ बिहार में जल्द ही इस तरह का कानून लाने का आश्वासन भी दे डाला। आज इस बात को लिखने में मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है कि हमें नीतीश कुमार भी इन्ही भ्रष्टाचारियों के बीच से ही मिला है जिसने गर्त में डूबे बिहार का न सिर्फ चन्द सालों में काया ही बदल डाली। अल्पसंख्यकों की रहनुमाई कर बार-बार सत्ता पर काबिज होने वाले सत्ता के दलालों के दरवाजों पर अलीगढ़ी ताले भी लटका डाले। चारों तरफ कुशासन, अपहरण हत्या पर न सिर्फ इन्होंने लगाम लगा दी, राज्य में पूंजी निवेश के भी कई नये विकल्प खोल दिये। मानो बिहार श्री नीतीश जी के शासन व्यवस्था से धन्य हो गया हो। अब जब देश में जन लोकपाल बिल पर एक लम्बी लड़ाई लड़ी जा रही है। केन्द्र में भ्रष्टों की सरकार इसे लोकतंत्र पर प्रहार मानती है और कुत्ते की तरह भौंकना आरम्भ कर दिया है कोई इसे संसद पर हमला बता रहा है तो कोई इसे लोकतंत्र पर, कोई समानान्तर सरकार की संज्ञा दे रहा है तो काई सांप्रदायिक ताकतों की साजिश मान लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आयी हुई बहुमत की सरकार को गिराने की षडयंत्र मानती है। सरकार के कुछ भ्रष्टाचार संरक्षक अभियान के मंत्री ऐन-केन प्रकारेण बिल की मूल को ही बिल से निकाल कर देश को गुमराह करने की योजना पर कार्य कर रहें हैं। इन सबके बीच बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने एक अच्छी पहल कर पुनः यह प्रमाणित कर दिया कि देश में अभी भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार का मुद्दा भले ही कांग्रेसियों के गले न उतरे पर बिहार की इस सकारात्मक पहल से देश के अन्य राज्यों को भी काफी बल मिलेगा।

    शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

    चुनौती पर चुनौती - शम्भु चौधरी



    कांग्रेस के लाचार और ईमानदारी का चौला पहने देश के इतिहास में सबसे भ्रष्टतम प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह मानते है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी है और वे सिर्फ इस मजबूरी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी पार्टी में इस मुद्दे को लेकर उनके विचार कुछ अलग हैं। चोरों का सरदार कहता है कि मैंने माँस नहीं खाया? जो जेलों की सलाख़ों में बन्द हैं सिर्फ उसने ही खाया? किसी को लग रहा है कि अन्ना संसद को चुनौती दे रहें हैं तो किसी को लग रहा कि ये लोकतंत्र को ही चुनौती हैं? अब इनसे कौन बात करे?


    पिछले 35 सालों से कांग्रेस पार्टी बंगाल में माकपा की पिछलग्गू पार्टी के रूप में कार्य करती रही। एक समय वाममोर्चा के खिलाफ लड़ाई में ममता दीदी को पार्टी से धक्का देने वाले कांग्रेसी चम्मचे आज प्रायः सभी एक-एक कर ममोता दीदी के चरणों में जाप करना शुरु कर दिये। ज्यों-ज्यों ममता दीदी का प्रभाव बंगाल की राजनीति में सत्ता के करीब आने लगा त्यों-त्यों कांग्रेसी सूर-ताल भी बदलने लगे। जो प्रणब दा एक प्रकार से कहा जाय तो बंगाल में कांग्रेस की राजनीति सफाया के एकमात्र सूत्रधार माने जा सकतें हैं ने कल कोलकाता शहर में गत विधानसभा में हुई जीत का जश्न चुनाव के दो माह गुजर जाने के बाद मनाया। शहर के आस-पास के उपनगरिय ईलाकों से कुल मिलाकर भी पांच हजार लोगों की भीड़ भी नहीं जुटा पाये ये कांग्रसी।
    जीत के इस जिस जश्न को मनाने की असली हकदार तृणमूल कांग्रेस की नेत्री सूश्री ममता दीदी ने जबकि इस जश्न को मनाने की जगह अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा की ‘‘काज कोरोंन’’ और हर रोज खुद भी देर रात तक काम कर रही है, सुबह घर से निकलते समय ममता का सीधा संपर्क किसके ऊपर गाज गिरायेगा किसी को पता नहीं। रातों-रात गत 35 सालों से चरमराई हुई व्यवस्था खुद व खुद पटरी पर आने लगी। दूसरी तरफ इनकी सहयोगी कांग्रेस जीत का जश्न मनाने में लगी है। पर अचानक से चुनाव के दो माह गुजरने के बाद यह इस जश्न की भूमिका पर नजर डालें तो प्रणब दा का पूरा आक्रोश भ्रष्टाचार को लेकर ही रहा। केंद्रीय सरकार के मंत्रीगण मानते हैं कि देश में इस मुद्दे के लेकर जो भी बात करेगा वह ‘‘देश का शत्रु’’ है। वे लोग लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं। केंद्रीय सरकार के मंत्रीगण एक के बाद एक लोकतंत्र की नई व्याख्या देने में जुटे है। प्रणब दा देश की बढ़ती कीमतों पर जो बयान दिये थे वह तो आपको याद होगा ही] नहीं तो आपको पुनः याद दिला देता हूँ - ‘‘देश में लोगों की आमदनी बढ़ गई है इसलिए चीजों के दाम बढ़ गये।’’ अब इनका नया फरमान भी सामने आ गया कि ‘‘अन्ना हजारे तथा बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर वे लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं।’’ वैसे भी लोकतंत्र पर बात करने का अधिकार सिर्फ चुने हुए सांसदों को ही है चूंकि उनको देश को लूटने का सरकारी अधिकार प्राप्त है। ये सड़क छाप अन्ना हजारे बार-बार धमकी देगा तो सरकार यही न समझेगी।
    कांग्रेस के लाचार और ईमानदारी का चौला पहने देश के इतिहास में सबसे भ्रष्टतम प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह मानते है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी है और वे सिर्फ इस मजबूरी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी पार्टी में इस मुद्दे को लेकर उनके विचार कुछ अलग हैं। चोरों का सरदार कहता है कि मैंने माँस नहीं खाया? जो जेलों की सलाख़ों में बन्द हैं सिर्फ उसने ही खाया? किसी को लग रहा है कि अन्ना संसद को चुनौती दे रहें हैं तो किसी को लग रहा कि ये लोकतंत्र को ही चुनौती हैं? अब इनसे कौन बात करे? हम उनसे पूछ रहे हैं कि आपका जो ड्राफ्ट है आप उसी के बारे में जनता को बतायें कि आप देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व्यवस्था पर लगाम लगाने के लिए कैसा जन लोकपाल बिल में ला रहे हैं। इस पर तो बोल नहीं रहे। धमकी इस बात की दे रहे हैं कि हमारी काली करतूतों को कोई जगजाहिर करेगें तो अच्छा नहीं होगा। चुनौती पर चुनौती अब एक और चुनौती। साहब! लोकपाल बिल पर बहस कीजिए लोकतंत्र की चिंता छोड़ दीजिए। देश की जनता को साफ करें कि आप जो बिल लाने की बात कर रहे हैं उसमें क्या-क्या है? और उससे किन-किन श्रेणी के लोगों पर अंकुश लगाया जा सकेगा? क्या उन लुटेरों पर भी इसका कोई प्रभाव होगा जो संसद के अन्दर ही देश को लूटने में लगें हैं? इसका संचलान व्यवस्था किन लोगों के हाथ में रहेगी?

    बुधवार, 29 जून 2011

    संपादक भी मुँह चुराकर भागे -शम्भु चौधरी


    लोकपाल बिल पर सरकार इतनी ईमानदार दिखती है तो केन्द्रीय कानून मंत्री बिल में सुझाये गये सरकारी प्रवधानों की जानकारी प्रेस के माध्यम से जनता को दें और बताये कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जन आन्दोलन में किस तरह से वे भी जनता के साथ हैं। बजाय इसके गोलबंध की राजनीति करें। कल जिन संपादकों को प्रधानमंत्री की गुप्त दावात खाने मिली वे लोग जब बाहार आये तो मुँह छुपाते फिरे मानो किसी बदनाम महखाने से निकले हों कि कोई इनको देख न लें। देश आज नये युग की तरफ करवट बदल रहा है एक तरफ लोकतंत्र को बेचने वालों की जमात है तो दूसरी तरफ लाचार और बेबस आवाज। हमें अब तय करना है कि हमें किसका साथ देना है।


    अब तो आपको यह बात साफ हो गई होगी कि मैंने पिछले लेख में समाचार पत्र व मीडिया पर यह आरोप क्यों लगाया कि - ‘‘कोई इनको लोकतंत्र का रक्षक कहे तो सुनने में भी अब शर्म आने लगी’’ कल कि घटना से अब तो आपको विश्वास हो गया होगा कि ये शेर की घाल में भेड़िये छुपें हैं जो पत्रकारिता की आड़ में सत्ता के सौदागर बन गये हैं आज देश में एक तरफ भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पंहुच गया है सत्ता पक्ष के मंत्रीगण, व्यापारी और दर्जनों अधिकारी लाखों की हेरा-फेरी में जेलों में बन्द हैं और देश के सबसे कमजोर भ्रष्टों के सरदार निर्लज प्रधानमंत्री संसद में बयान देते हैं कि ‘‘यह गठबंधन धर्म की मजबूरी है।’’ मजे की बात लोकपाल बिल का जो ड्राफ्ट सरकारी पक्ष ने तैयार किया है उनमें इन पर मुकद्दमा चलाने का कोई प्रवधान ही नहीं दिया गया है। मजे कि बात तो यह है कि सारा मामला संसद की प्रतिष्ठा से जोड़ कर या समानान्तर सरकार चलाने जैसी बातों में तो सांप्रदायिकता से जोड़ कर देश के पढ़े-लिखे समझदार संपादकों से राय ली जा रही है कि वे देश को किसी तरह बचायें अन्यथा सिविल सोसाइटी के चन्द लोग देश में संसद की मर्यादा को ही समाप्त कर देगें? भाई! किस बात की मर्यादा? क्या समाज क सदस्य संसद का रास्ता रोक रहें हैं या संसद के अधिकार क्षेत्र में दखल दे रहें हैं? देश में संविधान बनाने का अधिकार जिनको प्राप्त है समाज के सदस्य सिर्फ उनकों ही तो अपनी बात कह रहें हैं। तो वे सांप्रदायिक कैसे हो गये? इसका अर्थ है कि संसद में सिर्फ वे ही लोग जा सकते हैं जो साम्प्रदायिक नहीं हो। ये वोट बैंक की राजनीति छोड़े कांग्रसी। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सीध-सीधी बात करें। अब वे नहीं मानते तो समाज के सदस्य संसद में तो जाकर चिल्ला तो नहीं सकते। संसद के बाहार ही अपनी बात कहेगें तो इसमें कौन सा अपराध हो गया? क्या देश की जनता को इतना भी अधिकार नहीं है कि वे जनता को यह बता सके कि लोकपाल बिल में जो बात जनता चाहती है वह नहीं बल्कि जनता को ही सजा देने का प्रवाधान उसमें है। लोकपाल बिल पर सरकार इतनी ईमानदार दिखती है तो केन्द्रीय कानून मंत्री बिल में सुझाये गये सरकारी प्रवधानों की जानकारी प्रेस के माध्यम से जनता को दें और बताये कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जन आन्दोलन में किस तरह से वे भी जनता के साथ हैं। बजाय इसके गोलबंध की राजनीति करें। कल जिन संपादकों को प्रधानमंत्री की गुप्त दावात खाने मिली वे लोग जब बाहार आये तो मुँह छुपाते फिरे मानो किसी बदनाम महखाने से निकले हों कि कोई इनको देख न लें। देश आज नये युग की तरफ करवट बदल रहा है एक तरफ लोकतंत्र को बेचने वालों की जमात है तो दूसरी तरफ लाचार और बेबस आवाज। हमें अब तय करना है कि हमें किसका साथ देना है।
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    मंगलवार, 28 जून 2011

    सरकार भी संसद से ऊपर नहीं - शम्भु चौधरी



    आज सत्तापक्ष के 4-5 मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हवा खा रहें हैं ऐसे में जनता एक सीधा सा सवाल जानना चाहती है कि जिस भ्रष्टाचार की बात देश की जनता करना चाह रही है, क्या सरकार द्वारा सुझाये गये लोकपाल विधेयक में उसी बातों का उल्लेख है? यदि हाँ! तो सरकार साफ तौर पर उसका जिक्र करें न कि कभी सांप्रदायिकाता की आड़ लें तो कभी संसद की आड़ लेकर देश को गुमराह करने का काम करें।


    भारत जब से आजाद हुआ इसके आजादी के मायने ही बदल गये। सांप्रदायिकता के नये-नये अर्थ शब्द कोश में भरने लगे। इसका सबसे ताजा उदाहरण है भ्रष्टाचार की बात करने वाले भी अब सांप्रदायिक तकतों से हाथ मिला लिये। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के लिए लाला कारपेट बीछाने वाली कांग्रेस को अचानक से एक ही दिन में सांप्रदायिक नजर आने लगे। अब अन्ना हजारे पर भी आरोप मढ़ दिया कि वे भ्रष्टाचार की लड़ाई में सांप्रदायिक ताकतों को साथ लेकर सरकार से लड़ाई कर रहे हैं। जब तक कांग्रेसियों का मन होगा और आप उनकी बात मानते रहेगें वो धर्मनिरपेक्ष नहीं तो सांप्रदायिक।
    इस लेख को पढ़ने से पहले हम इस बात पर बहस शुरु करें कि हमें बात किस विषय पर करनी है? हमारी बातों का मुख्य मुद्दा क्या है? भ्रष्टाचार है कि सांप्रदायिकता।
    सरकार जो जन लोकपाल बिल संसद के सदन में रखने जा रही है उसमें किन-किन बातों का उल्लेख सरकार करना चाहती है और कौन से मुद्दे को वो अलोकतांत्रिक मानती है? और किसे लोकतांत्रिक।
    सरकार के जो बयान हमें पढ़ने और सुनने को मिल रहें हैं वे न सिर्फ तानाशाही बयान है बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दे की उन सभी बातों को सांप्रदायिकता के साथ जोड़ मुसलमानों के एक वर्ग को इस आन्दोलन से अलग-थलग रखना चाहती है। कांग्रेस एक तरफ असम का उदाहरण देती है तो दूसरी तरफ तामिलनाडू के चुनाव परिणामों को बताना भूल जाती है। एक तरफ देश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शाती है तो दूसरी तरफ अपंग जन लोकपाल बिल की वकालत करती है। एक तरफ विधेयक के प्रारूप पर चर्चा करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुला रही है तो दूसरी तरफ सिविल सोसाईटी के सदस्यों को सांप्रदाकिता से जोड़ कर देश को गुमराह करना चाहती है। भला हो भी क्यों नहीं? पिछले 30 सालों में देश के अन्दर धर्मनिपेक्षता के मायने काफी बदल गये। देश में बुद्धिजीवियों की एक बहुत बड़ी जमात पैदा हो गई जो देश को सांप्रदायिक ताकतों से बचाकर रखना चाहती है। ये वही है जो एक समय देश को गांधी परिवार से बचा कर रखना चाहती थी। सरकार चाहती है कि वे अपनी सभी बातों को सांप्रदायिकता की आड़ लेकर मना लें। भला हो भी क्यों नहीं हम जब अन्ना को तानाशाह के रूप में स्वीकार कर सकतें हैं तो सरकार के सभी बातों को जायज क्यों नहीं मान सकते। सिविल सोसाईटी के सदस्य क्या चाहतें हैं और इनके द्वारा सूझाये गये सुझावों को कौन संसद में कानून की मान्यता देगा? जब मान्यता देने वाले ही वे लोग है जो खुद को चुने हुए देश के प्रतिनिधि मानते हैं तो उनको इतना भय किस बात का हो गया कि वे 16 अगस्त के अनशन को संसद की चुनौती मान रहे हैं? जब सरकार अपने सूझाये गये बिल पर इतनी ईमानदार है तो बजाय बिल में सूझाये गये अपने पक्ष को मजबूती से रखने के समाज सदस्यों पर बयानबाजी करने की क्या जरूरत पड़ गई? जब सरकार खुद ही मानती है कि संसद से ऊपर कोई नहीं, तो इसमें यह भी जोड़ दें कि सरकार भी संसद से ऊपर नहीं है। जन लोकपाल का विधेयक संसद में सरकार लायेगी और गलत विधेयक का संसद के बाहर विरोध करना और उसके विरोध में जनता के बीच अपनी बातों को पंहुचाना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है। परन्तु सरकार शब्दों के प्रयोग से देश को भ्रमित करने का प्रयास कर रही है। माना कि भारत की अदालतें शब्दों के बाजीगर को महत्व देती है पर यहाँ अदालत में बहस नहीं देश की संसद के भीतर सांसदगण अपना पक्ष रखेगें। देश की जनता से जुड़े कई सवाल इस लोकपाल बिल से जुड़ चुकें हैं। आज सत्तापक्ष के 4-5 मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हवा खा रहें हैं ऐसे में जनता एक सीधा सा सवाल जानना चाहती है कि जिस भ्रष्टाचार की बात देश की जनता करना चाह रही है, क्या सरकार द्वारा सुझाये गये लोकपाल विधेयक में उसी बातों का उल्लेख है? यदि हाँ! तो सरकार साफ तौर पर उसका जिक्र करें न कि कभी सांप्रदायिकाता की आड़ लें तो कभी संसद की आड़ लेकर देश को गुमराह करने का काम करें।

    गुरुवार, 23 जून 2011

    व्यंग्यः कांग्रेसी दांत - शम्भु चौधरी



    जिस शख्स ने भी इस कहावत को ‘‘हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और’’ लिखा, शायद उसे पता भी नहीं होगा कि भारत में एक राजनैतिक दल जिसका नाम कांग्रेस पार्टी है उसके लिए भी इस कहावत को लागू कर दिया जायेगा। जब से कांग्रेस जोंकपाल बनाम लोकपाल बिल बनाने के कसरत में लगी है कांग्रेस पार्टी नये-नये शब्दों का गठन कर कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव पर हमला कर रही है तो कभी खुद का बचाव करने में। अब कांग्रेसियों ने दावा किया है कि पिछले 6 माह में इन लोगों ने 68 हजार करोड़ काले धन को सफेद बना दिया है। कांग्रेसीगण इस बात का जबाब हमें शायद नहीं देगी कारण की ‘‘हमरी कलमवा किसी भी चुनावी मैदान से चुन कर पैदा नहीं हुई। साली भ्रष्टाचार के काले कमाई से पैदा होल’वाणी। अब ईंमे हमनी’के का दोष बाड़े? सारे देसवां में’ईं ईईई... धनवा सूरा आआअ...साळा चलते-चलते काला हो गईंल’बां। ऐई..में कांग्रेसियां लोगण’का का दोष देवे का कोणु बात नैईखे बां।’’
    अब लो भाई बंगाल में रह कर हमारी कलम भी माकपा की तरह गरीबों की मसीहा बन गई। दिते हुबे...दिते हुबे- पुरिये देबो...पुरिये दिबो... करते-करते किसानों की जमीन ही डकारने लगी। एई तो ममता दीदी छीलो ना होले कांग्रेसी’रा तो चुप कोरे बोसे’ही छिलो। टाटा हो या जैकोनू’क न हो अमार बाबा होअ..क जैखाने साले दूटा फसल होसछिळो सेई जमीनटा के बाममांर्चा सरकार जोर जर्बदस्ती कोरे निये, टाटा के दिये दिळो। दिल्ली'तिके कांग्रेसी'रा बोललो... कार..खा....ना तो लगाते होबे ना होले काज खोथाई पावे? कोनो स्पे..से (चांद) तो नैनोकार बनाते पारेबे ना। ऐखून कांग्रेसीरा, बामदले लोग’रा ताकते ही थाकलो। टाटा गुजराते नरेन्द्र मोदी गोदीते गिए बोसेगिलो आई....रे बाबा ईं कि होळो? खासकोरे बामदले’र लोग भांपते ही पारळो ना की टाटा चुप कोरे गुजराते पालिये जाबे। अब ममता दीदी की सरकार में आते ही सारी अनियमितताओं को दुरस्त करने में लगी है तो कुछ लोग कोर्ट के चक्कर लगाने लगे तो कुछ लोकपाल बिल को भुनाने के लिए सड़कों पर दावा ठोकने में लग गये कि देश में हम कांग्रेसी लोग ही भ्रष्टाचार को मिटाने में दिल से लगे हैं और बाकी के सब या तो नाटक कर रहें हैं या अड़ंगा लगा कर विवाद खड़ा कर रहें हैं। भला विवाद हो भी क्यों नहीं? देश में शायद यह पहला कानून बनेगा जिसमें सरकार की तरफ से नाकाम कोशिशों के वाबजूद के बाद कि बिल के सभी प्रवधानों को इतना जटील बना दिया जाय कि जिसमें भ्रष्टाचारी को कम सजा और भ्रष्टाचारी को पकड़ाने में मदद करने वालों का अधिक सजा मिलेगी। न सिर्फ सजा की मियाद अधिक होगी, अपराधी को निर्दोष साबित होने के लिए उसकी दो बार सुनवाई सुननी होगी। सुनावाई में वरी हो जाने पर सरकारी खर्च पर उस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा लड़ा जायेगा जो भ्रष्टाचारी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जायेगी। सरकार से जरा कोई चुने हुए सांसदों में कोई एक माई का लाल संसद में पूछे कि भाई! इतनी दया किस बात की इन भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए? देश की आम जनता पर तो आप इतनी दया नहीं दिखाते? दस-बीस मुकदमें में भ्रष्टाचारी यदि तथ्य के अभाव में बरी हो भी जाएं तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अपराध कम हो गया। दरअसल कांग्रेस आम जनता को पहले से ही डरा देना चाहती है कि सोच लो बेटा मुकद्दमा किये तो हम तो बरी हो ही जायेगें पर तेरी खैर नहीं।
    जब से बाबा रामदेव जी अचानक सूं दिल्ली म अनशन करणे’री सोची मेरी तो नींद ही गुमगी। म सोचन लाग्यो कि ‘कि’म’की’ दाळ में काळो है। दिल्ली म बाबा की अगवाई से तो सारी बात दर्पण सूं भी साफ-सुथरी झळकण लाग्गी। भाया! व्यापारी से बड़ों भ्रष्टाचारी थाने कुण मिलसी। एक तो व्यापारी ऊपर से संत, वा कहावत थे सुणी थी कि न’इ थाणे फेर सूं ठाह करा दूँ - ‘‘एक तो करेला ऊपर से नींम चढ़ा’’ खैर बाबा रामदेव बेचारा को तो कांग्रेसी’रां जो कियो सो किया निर्दोष जनता ण’भी ळाठियां मुफ्त म खानी पड़गी। चाळो आपां तो यूँ ही थारो दिमाग चाट लियों अब मेरे मनकी तो म निकाळ’ळी। थे थारो सर भीत सूँ फोड़ता फिरो।

    बुधवार, 22 जून 2011

    Govt. Lokpal Bill vs Jan Lokpal Bill Table Chart




    Date: June 22, 2011


    This law will have jurisdiction over 65,000 central government employees, 4.5 lakh registered NGOs, lakhs of movements (and unregistered NGOs) and no companies.
    It applies to only Group A officers of central government, but does not apply to other central government employees.
    It does not apply to any state government employee. However, it applies to all state and central NGOs – whether registered or not.
    Minimum punishment against a corrupt person is six months.
    Minimum punishment against false complainant is two years. Government will provide the lawyer and expenses to the corrupt officer to file a case against his complainant.

    Please See below Table .....

    Please click this Link....


































































































































    Issue
    Our viewGovernment’s viewComments
    Prime MinisterLokpal should have power to investigate allegations of corruption against PM.
    Special safe guards provided against frivolous and mischievous complaints
    PM kept out of Lokpal’s purview.As of today, corruption by PM can be investigated under Prevention of Corruption Act. Government wants investigations to be done by CBI, which comes directly under him, rather than independent Lokpal
    JudiciaryLokpal should have powers to investigate allegation of corruption against judiciary.
    Special safe guards provided against frivolous and mischievous complaints
    Judiciary kept out of Lokpal purview.Government wants this to be included in Judicial Accountability Bill (JAB).
    Under JAB, permission to enquire against a judge will be given by a three member committee
    (two judges from the same court and retd. Chief justice of the same court).
    There are many such flaws in JAB. We have no objections to judiciary being included in JAB if a strong and effective JAB were considered and it were enacted simultaneously.
    MPsLokpal should be able to investigate allegations that any MP had taken bribe to vote or speak in Parliament.Government has excluded this from Lokpal’s purview.Taking bribe to vote or speak in Parliament strikes at the foundations of our democracy. Government’s refusal to bring it under Lokpal scrutiny virtually gives a license to MPs to take bribes with impunity.
    Grievance redressalViolation of citizen’s charter (if an officer does not do a citizen’s work in prescribed time) by an officer should be penalized and should be deemed to be corruption.No penalties proposed. So, this will remain only on paper.Government had agreed to our demand in the Joint committee meeting on 23rdMay. It is unfortunate they have gone back on this decision.
    CBIAnti-corruption branch of CBI should be merged into Lokpal.Government wants to retain its hold over CBI.CBI is misused by governments. Recently, govt has taken CBI out of RTI, thus further increasing the scope for corruption in CBI. CBI will remain corrupt till it remains under government’s control
    Selection of Lokpal members1. Broad based selection committee with 2 politicians, four judges and two independent constitutional authorities.
    2. An independent search committee consisting of retd. Constitutional authorities to prepare first list.
    3. A detailed transparent and participatory selection process.
    1. With five out of ten members from ruling establishment and six politicians in selection committee, government has ensured that only weak, dishonest and pliable people would be selected.
    2. Search committee to be selected by selection committee, thus making them a pawn of selection committee
    3. No selection process provided. It will completely depend on
    Government’s proposal ensures that the government will be able to appoint its own people as Lokpal members and Chairperson. Interestingly, they had agreed to the selection committee proposed by us in the meeting held on 7thMay. There was also a broad consensus on selection process. However, there was a disagreement on composition of search committee. We are surprised that they have gone back on the decision.
      Selection Committee 
    Who will Lokpal be accountable to?To the people.
    A citizen can make a complaint to Supreme Court and seek removal.
    To the Government. Only government can seek removal of LokpalWith selection and removal of Lokpal in government’s control, it would virtually be a puppet in government’s hands, against whose senior most functionaries it is supposed to investigate, thus causing serious conflict of interest. Cont…..Page-3
    Integrity of Lokpal staffComplaint against Lokpal staff will be heard by an independent authorityLokpal itself will investigate complaints against its own staff, thus creating serious conflicts of interestGovernment’s proposal creates a Lokpal, which is accountable either to itself or to the government. We have suggested giving these controls in the hands of the citizens.
    Method of enquiryMethod would be the same as provided in CrPC like in any other criminal case. After preliminary enquiry, an FIR will be registered. After investigations, case will be presented before a court, where the trial will take place CrPC Being amended. Special protection being provided to the accused. After preliminary enquiry, all evidence will be provided to the accused and he shall be heard as to why an FIR should not be regd against him. After completion of investigations, again all evidence will be provided to him and he will be given a hearing to explain why a case should not be filed against him in the court.
    During investigations, if investigations are to be started against any new persons, they would also be presented with all evidence against them and heard.
    Investigation process provided by the government would severely compromise all investigations. If evidence were made available to the accused at various stages of investigations, in addition to compromising the investigations, it would also reveal the identity of whistleblowers thus compromising their security. Such a process is unheard of in criminal jurisprudence anywhere in the world. Such process would kill almost every case.
    Lower bureaucracyAll those defined as public servants in Prevention of Corruption Act would be covered. This includes lower bureaucracy.Only Group A officers will be covered.One fails to understand government’s stiff resistance against bringing lower bureaucracy under Lokpal’s ambit. This appears to be an excuse to retain control over CBI because if all public servants are brought under Lokpal’s jurisdiction, government would have no excuse to keep CBI.
    LokayuktaThe same bill should provide for Lokpal at centre and Lokayuktas in statesOnly Lokpal at the centre would be created through this Bill.According to Mr Pranab Mukherjee, some of the CMs have objected to providing Lokayuktas through the same Bill. He was reminded that state Information Commissions were also set up under RTI Act through one Act only.
    Whistleblower protectionLokpal will be required to provide protection to whistleblowers, witnesses and victims of corruptionNo mention in this law.According to govt, protection for whistleblowers is being provided through aseparate law. But that law is so bad that it has been badly trashed by standing committee of Parliament last month. The committee was headed by Ms Jayanthi Natrajan. In the Jt committee meeting held on23rdMay, it was agreed that Lokpal would be given the duty of providing protection to whistleblowers under the other law and that law would also be discussed and improved in joint committee only. However, it did not happen.
    Special benches in HCHigh Courts will setup special benches to hear appeals incorruption cases to fast track themNo such provision.One study shows that it takes 25 years at appellate stage in corruption cases. This ought to be addressed.
    CrPCOn the basis of past experience on why anti-corruption cases take a long time in courts and why do ouragencies lose them, some amendments to CrPC have been suggested to prevent frequent stay orders.Not included 
    Dismissal of corrupt government servantAfter completion of investigations, in addition to filing a case in a court for prosecution, a bench of Lokpal will hold open hearings and decide whether to remove the government servant from job.The minister will decide whether to remove a corrupt officer or not. Often, they are beneficiaries of corruption, especially when senior officer are involved. Experience shows that rather than removing corrupt people, ministers have rewarded them.Power of removing corrupt people from jobs should be given to independent Lokpal rather than this being decided by the minister in the same department.
    Punishment for corruption1. Maximum punishment is ten years
    2. Higher punishment if rank of accused is higher
    3. Higher fines if accused are business entities
    4. If successfully convicted, a business entity should be blacklisted from future contracts.
    None of these accepted. Only maximum punishment raised to 10 years.  
    Financial independence Lokpal 11 members collectively will decide how much budget do they needFinance ministry will decide the quantum of budget This seriously compromises with the financial independence of Lokpal
    Prevent further lossLokpal will have a duty to take steps to prevent corruption in any ongoing activity, if brought to his notice. If need be, Lokpal will obtain orders from High Court.No such duties and powers of Lokpal2G is believed to have come to knowledge while the process was going on. Shouldn’t some agency have a duty to take steps to stop further corruption rather than just punish people later?
    Tap phonesLokpal bench will grant permission to do soHome Secretary would grant permission.Home Secretary is under the control of precisely those who would be under scanner. It would kill investigations.
    Delegation of powersLokpal members will only hear cases against senior officers and politicians or cases involving huge amounts. Rest of the work will be done by officers working under LokpalAll work will be done by 11members of Lokpal. Practically no delegation. This is a sure way to kill Lokpal. The members will not be able to handle all cases. Within no time, they would be overwhelmed.
    NGOsOnly government funded NGOs coveredAll NGOs, big or small, are covered. A method to arm twist NGOs
    False, Frivolous and vexatious complaintsNo imprisonment. Only fines on complainants. Lokpal would decide whether a complaint is frivolous or vexatious or false. Two to five years of imprisonment and fine. The accused can file complaint against complainant in a court. Interestingly, prosecutor and all expenses of this case will be provided by the government to the accused. The complainant will also have to pay a compensation to the accused. This will give a handle to every accused to browbeat complainants. Often corrupt people are rich. They will file cases against complainants and no one will dare file any complaint. Interestingly, minimum punishment for corruption is six months but for filing false complaint is two years.