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शनिवार, 6 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता बनाम भगवा आतंकवाद -शम्भु चौधरी

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इतनी विवेकशील हो चुकी है कि देश की देशभक्ति इनको सांप्रदायिक लगने लगी है। देशभक्ति की बात करने वाले, इस देश के हर नागरिक इनकी नजर में देश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने वाला माना जाने लगे हैं उनकी परिभाषा में सिर्फ वे लोग देशभक्त हैं जो देश को अंदर से खोखला करने में उनकी मदद कर रहें हैं। जो लोग देश की एकता और अखंडता की बात करते हैं उसको भगवा आंतकवाद का नाम दिया जा रहा है, इससे स्पष्ट परिलक्षित हो जाता कि देश में धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद उनके सर चढ़कर बोल रहा है। यह सब बातें हमारी पौंगी धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती है। जो इनके बचाव में गाहे-बगाहे कुछ दलील देश के सामने रखते हैं जो निम्न प्रकार है -

इस परिपेक्ष में जो दलीलें दी जाती है-

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना। 2. देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोकना। 3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना।

हमें देखना होगा कि इन दलीलों के पीछे किन स्वार्थी तत्वों का दिमाग कार्य कर रहा है? दरअसल देश में जिन-जिन स्थानों में दंगों के खतरे ज्यादा महसूस किये जाते रहे हैं वैसे अधिकतर स्थान मुस्लीम बाहुलता वाले होते हैं। दंगों की शुरुआत ऐसे ही तत्वों द्वारा होती है जो देश में खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानती रही है। इसका स्पष्ट संकेत है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानने वाले तत्व देश की धर्मनिरपेक्षता को न सिर्फ खतरा साबित हो चुके हैं वे राजनीति स्वार्थपुर्ति के लिए बार-बार इस तरह का वातावरण भी सृजन करते रहें हैं।

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना -   आजादी के पश्चात अबतक हम जिन्हें अल्पसंख्यक मानते रहें हैं वे अपने-अपने क्षेत्र में अब न सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके हैं उन क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं के उनके साथ विवाह के भी कई मामले सामने आने लगे हैं। सही अर्थों मे कहा जाए तो अब इस कौम के अंदर भय नाम की कोई बात नहीं रह गई कारण कि इनको दोहरे कानून का समर्थन प्राप्त हो रहा है। पहला इस्लामिक कानून जो हिन्दुओं की लड़कियों को मुस्लीम बनाने की इज्जाजत देता है। दूसरा भारतीय संविधान जो वयस्कों धर्म-जाति के बंधन से परे रहकर शादी करने की इज्जाजत। जबकि इसके विपरित कोई अन्य प्रकार की घटना घटते ही सांप्रदायिकता व कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती हैं। आनन-फानन में ऐसे संबन्धों का जो भी हर्ष निकले पर यह बात तय है कि उस समय भारत का संविधान गौन हो जाता है। चुकीं मामला एक विशेष धर्म से जुड़ा होता है। जहां से सांप्रदायिक दंगे फैलने की प्रवल संभावनाएं बनी रहती है। यह इस बात की ओर संकेत देता है कि भयभीत होने वाली कोई बात इस कौम पर लागू नहीं होती।

2. सांप्रदायिक दंगों की आग -   प्रायः राजनैतिक दलों द्वारा इस बात की चेतावनी दी जाती है कि कोई भी बात जो उनको पसंद न हो न करें, अन्यथा दंगा होने की संभावना जताई जाती रही है। हर बात में इस खौफ को पैदा किया जाता रहा है। कोई भी व्यक्ति ऐसी बात न करें या ऐसा कार्यक्रम न करें जिससे सांप्रदायिक सदभावना का खतरा पैदा हो जाए। यह बात किसे कहा जाता है? क्या यही बात हमारे राजनैतिक दलों ने कभी मुसलमानों को भी कहा है? जो लोग सांप्रदायिकता की बात करतें हैं वे लोग ही खुद सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं चुंकि उनका उद्देश्य न सिर्फ राजनीति करना रहा है इसके माध्यम से वे कई बार सत्ता भी प्राप्त करने में सफल रहें हैं।

3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना-   जो लोग बार-बार देश के टूकरे करने की बात कर देश की जनता को भयभीत करते रहते हैं उनके लिए एक बात याद आती है कि जो रोज-रोज शेर आया शेर आया करते रहते हैं ऐसे ही लोगों को एक दिन सच में शेर आकर खा जाता है। ऐसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों को मोहरा बनाकर अपनी सत्ता का दावा मजबूत करने में लगें हैं वे ही वास्तव में देश को पुनः विभाजन की कगार पर ले जाने का कार्य कर रहें हैं। जब एकबार धर्म के नाम पर देश के तीन बंटवारे हो चुके, तो प्रमाणित आंकड़े कहते हैं कि अब जो लोग देश को पुनः बांटने की धमकी देकर देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर एक विशेष संप्रदाय के वोट बैंक को अपने पक्ष में एकत्रित करने का काम कर रहें है। वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने में लगे हैं। ऐसी ताकतें जो खुद की राजनीति में लगा हो वह किसी भी सांप्रदाय का कभी भी भला नहीं सोच सकती।

आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इन तत्वों की ताकतों में इजाफा होगा। देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता चला जाएगा और इसके लिए एक मात्र वे ही लोग जिम्मेदार माने जाएंगें या धर्मनिरपेक्ष ताकतों का वह चेहरा ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा जो देश में धर्मनिरपेक्ष की आड़ में वोट की राजनीति करते रहें है।।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

संसद की पवित्रता - शम्भु चौधरी

66वें स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या परः

66वें स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर देश के 13वें राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी ने देश के नाम अपने संदेश में कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार होने से देश में अव्यवस्था फैल जाएगी। आपने स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का आंदोलन जायज है। जहां एक तरफ आपने विधायिका के महत्व को समझाने का प्रयास किया वहीं दूसरी तरफ आपने जनता के आक्रोश को भी जायज ठहराते हुए संसद को ही नसीहत दे डाली कि कभी-कभी जनता अपना धैर्य खो देती है पर इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार का बहाना नहीं बनाया जा सकता। उपरोक्त संदेश कई तरह से उलझाव पैदा करने वाला है कि महामहिम जी किसे यह बताना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के लिए कौन जिम्मेदार है। संसद का कतरा-कतरा भ्रष्टाचार के बलि चढ़ चुका है। प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी एक हाथ में अपने खुद के ईमानदार होने का प्रमाण पत्र लिए, देश को गठबंधन धर्म की मजबूरी बताते नहीं थकते। मानो हमने यह स्वीकार कर लिया है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी लचर और लाचार हो चुकी है कि चोरों को चुनना ही लोकतंत्र का लक्ष्य रह जाता है। जो लोग इस लोकतंत्र के रक्षक बन अपनी आहुति दें वे चोर और जो चुनकर या पिछले दरवाजे से संसद में पंहुच जाए वे सभी ईमानदार और लोकतंत्र के रक्षक एवं विधायिका के निर्माता बन जाते हैं। संभवतः लोकतंत्र की इसी परिभाषा को अपने संदेश के माध्यम से चिन्हीत करना चाहते हैं हमारे राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी जी।

पिछले दिनों श्री अण्णा हजारे व उनकी टीम ने रामलीला मैदान में अपना दम तौड़ दिया। कल बाबा रामदेव व उनकी टीम भी दम तौड़ती नजर आई। प्रश्न यह नहीं है कि किसने बाजी मारी या किसने हारी। प्रश्न यह है कि संसद इतने संवेदनशील मामले पर चुप क्यों? संसद के अन्दर चुनकर गये और खुद को चुनावा कर गये नेताओं की लम्बी कतार देश को गुमराह क्यों कर रही है? आश्चर्य की बात है कि लोकतंत्र के प्रहरी संसद के अन्दर 543 सांसद जो जनता के सीधे प्रतिनिधि होते हैं और 245 सांसद जो पिछले दरवाजे से देश के कर्णधार बनकर संसद में पंहुचते है। इन सब ईमानदार और देशभक्तों को आखिर उस समय सांप क्यों सूंध जाता है जब भ्रष्टाचार और काले धन की बात सामने आती है? संसद की गरिमा और इसकी मर्यादा की रक्षा करने वाले ये चुने हुए सांसदों पर जब जनता द्वारा विचारों का हमला होता है तो वे संसद और संसदों की गरिमा की की दुहाई देते नहीं थकते। वहीं जब यही सांसद जनता पर तीखे व्यंग्य करते हैं तो जैसे ‘हम भी रोजा कर रहें हैं। या रामलीला तो हर साल हाती है।’’ जैसी अपमानजनक टिप्पणी करते नहीं थकते तो उस समय इनको अपनी ईमानदारी और संसद की मर्यादा का ख्याल क्यों नहीं आता। वहीं जब कुछ सांसदों पर कोई आक्षेप आता है या इनको चोर-बेईमान कहा जाता है तो इनको संसद की पवित्रता का आभास होने लगता है। संसद लोकतंत्र का पवित्र मंदिर जरूर है पर इसमें बैठे लोगों की मंशा ने इसकी पवित्रता को हर तरह से अपवित्र करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। पता नहीं इनकी देश भक्ति व इनका स्वाभिमान भी उस समय कहां चरने चला जाता है जब चंद लोगों के चलते पूरी संसद अपवित्र नजर आने लगती है?

शम्भु चौधरी
सचिव, राजनैतिक चेतना मंच

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? - शम्भु चौधरी



अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’


बाबा अम्बेदकर द्वारा रचित संविधान में राम का नाम लिखना-जपना सांप्रदायिकता है सो हमने इस लय को नई धुन देने का प्रयास कर रहा हूँ। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ आज देश में हर राजनेताओं की भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बू झलकती है। जिसे देखो हर मामले को सांप्रदायिकता से जोड़ रहा है। कालेधन की बात हो या राष्ट्र में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार जरा सी कोई चूँ-चपड़ किया की बस उसे सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने और चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश का हिस्सा मानने लगते हैं। इनकी भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बात साफ झलकती है। मानो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही सिर्फ 35 करोड़ अल्पसंख्यकों को बली चढ़ा दी गई हो। इस कतार में सबके सब लगे हुऐं हैं, धक्कमपेल चल रहा है। 65 सालों से उल्लू बनते आ रहे मुसलमानों के विकास, शिक्षा, कुरीतियों, रूढ़ीवादी परम्पराओं, कट्टरवादी धार्मिकता पर बोलने और उन्हें सुधारने का काम किसी ने नहीं किया। सिर्फ उन्हें हिन्दू कट्टरपंथियों से बचाये रखने व उनकी असामाजिक व कट्टरवादी धार्मिक गतिविधियों का संरक्षण कर वोट बैंक को सुरक्षित करना हमारे देश के राजनेताओं का एक मात्र लक्ष्य रह गया है। इसके लिए मुसलमानों के धार्मिक कट्टरवादी भी विशेष रूप से जिम्मेदार हैं, जो समाज के विकास को रोक राजनेताओं के पक्ष में अपने बयान देते नजर आते हैं। जब इमाम किसी दल विशेष को वोट देने या न देने की अपील जारी करता है तो वह धर्मनिरपेक्ष है। परन्तु जब बाबा रामदेव देश के लुटे हुए धन की बात करता हो या अन्ना हजारे देश की संसद को भ्रष्टमुक्त करने के कानून पर चर्चा करता हो तो या तो इन लोगों को यह सलाह दी जाती है कि वे जनता के प्रतिनिधि नहीं है पहले वे चुनकर आयें तब चुने हुए बेईमानों से बात करें या फिर उन्हें सांप्रदायिक शक्ति करार दे दिया जाता है। मानो इस देश में आतंकवादी हमला करने वाली ताकतें तो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बचती रहे और राष्ट्र के उन्नति व इसके उत्थान की बात करने वाला या तो देश का गद्दार है या देश में सांप्रदायिकता का जहर फैला रहा हो। मजे की बात यह है कि इससे न तो कभी किसी इमाम का भला हुआ न ही इनकी कौम को हाँ! कभी कभार वह भी चुनाव के वक्त उनके प्रसाद के बतौर थोड़ा बतासा खाने को जरूर मिल जाता है। जैसे कुछ असमाजिक तत्वों की रिहाई या किसी कानून को उनके पक्ष में समाप्त कर देना या बना देना या फिर बंग्लादेशियों को राशनकार्ड व वोटर कार्ड देकर उसे खुद की झौली में जमा कर लेना। इससे इस देश के मुसलमानों का क्या भला हुआ? मुसलमानों के वोट बढ़ने से यदि सत्ता उनको मिलती हो तो बात मेरी समझ में आती पर किसी कांग्रसी ने कभी भी सत्ता मुसलमानों को सोपने की बात कभी नहीं की व सत्ता किसे सोपना चाहतें हैं राहुल गांधी को.... सोनिया जी को या खुद उनसे चिपके रह कर देश को लुटने के फिराक में रहते हैं। अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी?प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ (लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

गुरुवार, 23 जून 2011

व्यंग्यः कांग्रेसी दांत - शम्भु चौधरी



जिस शख्स ने भी इस कहावत को ‘‘हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और’’ लिखा, शायद उसे पता भी नहीं होगा कि भारत में एक राजनैतिक दल जिसका नाम कांग्रेस पार्टी है उसके लिए भी इस कहावत को लागू कर दिया जायेगा। जब से कांग्रेस जोंकपाल बनाम लोकपाल बिल बनाने के कसरत में लगी है कांग्रेस पार्टी नये-नये शब्दों का गठन कर कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव पर हमला कर रही है तो कभी खुद का बचाव करने में। अब कांग्रेसियों ने दावा किया है कि पिछले 6 माह में इन लोगों ने 68 हजार करोड़ काले धन को सफेद बना दिया है। कांग्रेसीगण इस बात का जबाब हमें शायद नहीं देगी कारण की ‘‘हमरी कलमवा किसी भी चुनावी मैदान से चुन कर पैदा नहीं हुई। साली भ्रष्टाचार के काले कमाई से पैदा होल’वाणी। अब ईंमे हमनी’के का दोष बाड़े? सारे देसवां में’ईं ईईई... धनवा सूरा आआअ...साळा चलते-चलते काला हो गईंल’बां। ऐई..में कांग्रेसियां लोगण’का का दोष देवे का कोणु बात नैईखे बां।’’
अब लो भाई बंगाल में रह कर हमारी कलम भी माकपा की तरह गरीबों की मसीहा बन गई। दिते हुबे...दिते हुबे- पुरिये देबो...पुरिये दिबो... करते-करते किसानों की जमीन ही डकारने लगी। एई तो ममता दीदी छीलो ना होले कांग्रेसी’रा तो चुप कोरे बोसे’ही छिलो। टाटा हो या जैकोनू’क न हो अमार बाबा होअ..क जैखाने साले दूटा फसल होसछिळो सेई जमीनटा के बाममांर्चा सरकार जोर जर्बदस्ती कोरे निये, टाटा के दिये दिळो। दिल्ली'तिके कांग्रेसी'रा बोललो... कार..खा....ना तो लगाते होबे ना होले काज खोथाई पावे? कोनो स्पे..से (चांद) तो नैनोकार बनाते पारेबे ना। ऐखून कांग्रेसीरा, बामदले लोग’रा ताकते ही थाकलो। टाटा गुजराते नरेन्द्र मोदी गोदीते गिए बोसेगिलो आई....रे बाबा ईं कि होळो? खासकोरे बामदले’र लोग भांपते ही पारळो ना की टाटा चुप कोरे गुजराते पालिये जाबे। अब ममता दीदी की सरकार में आते ही सारी अनियमितताओं को दुरस्त करने में लगी है तो कुछ लोग कोर्ट के चक्कर लगाने लगे तो कुछ लोकपाल बिल को भुनाने के लिए सड़कों पर दावा ठोकने में लग गये कि देश में हम कांग्रेसी लोग ही भ्रष्टाचार को मिटाने में दिल से लगे हैं और बाकी के सब या तो नाटक कर रहें हैं या अड़ंगा लगा कर विवाद खड़ा कर रहें हैं। भला विवाद हो भी क्यों नहीं? देश में शायद यह पहला कानून बनेगा जिसमें सरकार की तरफ से नाकाम कोशिशों के वाबजूद के बाद कि बिल के सभी प्रवधानों को इतना जटील बना दिया जाय कि जिसमें भ्रष्टाचारी को कम सजा और भ्रष्टाचारी को पकड़ाने में मदद करने वालों का अधिक सजा मिलेगी। न सिर्फ सजा की मियाद अधिक होगी, अपराधी को निर्दोष साबित होने के लिए उसकी दो बार सुनवाई सुननी होगी। सुनावाई में वरी हो जाने पर सरकारी खर्च पर उस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा लड़ा जायेगा जो भ्रष्टाचारी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जायेगी। सरकार से जरा कोई चुने हुए सांसदों में कोई एक माई का लाल संसद में पूछे कि भाई! इतनी दया किस बात की इन भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए? देश की आम जनता पर तो आप इतनी दया नहीं दिखाते? दस-बीस मुकदमें में भ्रष्टाचारी यदि तथ्य के अभाव में बरी हो भी जाएं तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अपराध कम हो गया। दरअसल कांग्रेस आम जनता को पहले से ही डरा देना चाहती है कि सोच लो बेटा मुकद्दमा किये तो हम तो बरी हो ही जायेगें पर तेरी खैर नहीं।
जब से बाबा रामदेव जी अचानक सूं दिल्ली म अनशन करणे’री सोची मेरी तो नींद ही गुमगी। म सोचन लाग्यो कि ‘कि’म’की’ दाळ में काळो है। दिल्ली म बाबा की अगवाई से तो सारी बात दर्पण सूं भी साफ-सुथरी झळकण लाग्गी। भाया! व्यापारी से बड़ों भ्रष्टाचारी थाने कुण मिलसी। एक तो व्यापारी ऊपर से संत, वा कहावत थे सुणी थी कि न’इ थाणे फेर सूं ठाह करा दूँ - ‘‘एक तो करेला ऊपर से नींम चढ़ा’’ खैर बाबा रामदेव बेचारा को तो कांग्रेसी’रां जो कियो सो किया निर्दोष जनता ण’भी ळाठियां मुफ्त म खानी पड़गी। चाळो आपां तो यूँ ही थारो दिमाग चाट लियों अब मेरे मनकी तो म निकाळ’ळी। थे थारो सर भीत सूँ फोड़ता फिरो।

मंगलवार, 21 जून 2011

भ्रष्टमत सरकार के भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री कपिल सिब्बल-शम्भु चौधरी



1. सरकार से बात करने के लिए पहले चुनकर आयें-
सरकार के चुने हुए सांसदों और सिविल सोसाईटी के तानाशाहों के बीच कल मैराथन बैठकों का दौड़ समाप्त हो गया। चुने हुए केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने बैठक के बाद मीडिया के माध्यम से अचुने हुई जनता को जानकारी दी की सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार संरक्षक कानून संसद के अगले मानसून सत्र में ले आयेगी। कांग्रेसी सरकार के चुने हुए केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कल पुनः प्रमाणित कर दिया कि समाज के सदस्यों के साथ बैठकों का वे सिर्फ नाटक का रहे थे करना उनको वही है जो कांग्रेस का गुप्त एजेण्डा है। इसके लिए अब कांग्रेस किसी से भी हाथापाई करने को तैयार है। भला हो भी क्यों नहीं लोकतंत्र में किसी दूसरे को समानान्तर सरकार चलाने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। सरकार को गुमान हो गया है कि वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि है जिन लोगों को सरकार से बात करना हो चाहे वे पत्रकार ही क्यों न हो पहले उनको भी चुन कर आना होगा। ये मीडिया और अखबार वाले हमेशा सरकार से किसी न किसी बात पर बवाल मचाती है कि देश की जनता यह जानना चाहती है! वह जानना चाहती है! अब आपको इस तरह के सवाल करने का कोई हक नहीं बनता। आप चुने हुए जन-प्रतिनिधि तो है नहीं? फिर सरकारी पक्ष से आपको बात करने का कोई हक नहीं बनता। आपको जो कुछ पूछना हो चुनाव के समय ही पूछ लिया किजिये। सरकार गठन कर लेने के बाद वे चुने हुए प्रतिनिधि बन जाते हैं। अब हर कोई आकर उनसे कानून बनाने के लिए कहेगा तो कैसे होगा। जैसे मानो 64 सालों में सरकार को कानून बनाने के लिए हर बार जनता ही आकर ही कहती रही। अब देखिये कानून तो जनता बना नहीं सकती सलाह और सूझाव भी नहीं दे सकती और आन्दोलन भी नहीं कर सकती।


2. पोलियोग्रस्त लोकपाल बिल लायेगी केन्द्र की भ्रष्ट सरकार-
Anna-Hazare at Pariament House on 21st June 2011
चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल का मानना है कि टीम अन्ना की मांगे देश में समानान्तर सरकार चलाने की है जो किसी भी स्थिति में मानी नहीं जा सकती। इसलिए वे लोकपाल बिल के टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावित उन सभी पहलुओं को खुद ही समाप्त करते हुए इसे समानान्तर सरकार चलाने की संज्ञा दे दी। संसद में इस बात की बहस की कोई जरूरत उनको नहीं लगती। शब्दों के खिलाड़ी कांग्रेस के चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल को बिल बनने से पुर्व ही अन्ना का भूत उनको सताने लगा कि कहिं इस बिल के आते ही उनके उस बयान की भी जाँच शुरू न हो जाय जिसमें उन्होंने 3जी मामले में केग की जाँच रिर्पोट को पलक झपकते ही गलत करार दे दिया था। आज जब उसी रिर्पोट के आधार पर संयुक्त संसदीय जाँच समिति बैठ गई और सत्ता पक्ष के एक के बाद एक मंत्री जेलों में बन्द होते जा रहें है और श्री मान् भ्रष्टतम सरकार के गृहमंत्री श्री पी. चिदम्बरम जी का नम्बर आने ही वाला है को लेकर इनको अभी से ही चिन्ता सताने लगी की कहीं उनकी पोल भी न खुल जाए। शायद इसीलिए चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल व इनकी टीम ने मन बना लिया है कि लोकपाल बिल तो लाया जाय चुंकि जनता की आंखों में धूल अब तो झोंकना तो पड़ेगा ही अन्यथा इससे पिंड नहीं मिलेगा। अतः बिल के सभी प्रवाधनों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर संसद में पेश किया जाए कि लोकपाल बिल की भ्रूणहत्या न भी की जा सके तो उसे पोलियोग्रस्त तो बनाया ही जा सकता है।

लेख आगे भी जारी रहेगा.....2

रविवार, 19 जून 2011

लोकपाल चक्रव्यूह - शम्भु चौधरी



कोलकाता-20जून,2011: कांग्रेस पार्टी की लोकपाल बिल को लेकर नई व्यूह रचना की तैयारी जोरों से चल रही है। अर्थात योजनानुसार कार्य को इंजाम देना।
लोकपाल चक्रव्यूह क्या है-
1. कांग्रेस पार्टी देश में चारों तरफ सहयोगी मीडिया व समाचार संपादकों के माध्यम से इस बात को प्रचारित करेगी कि सिविल सोसाइटी के सदस्य तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। उनकी सभी मांगे नहीं मानी जा सकती।
2. सभी विपक्षी पार्टी को भी भयभीत करना ताकी सिविल सोसाइटी के अड़ियल रूख को नजरअंदाज किया जा सके।
3. चुने हुए सदस्यों की परिभाषा के सामने में रखते हुए तमाम चुने हुए सदस्यों का एक अलग समूह का निर्माण करना। अर्थात सभी सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कांग्रेस पार्टी का साथ दें यानी कि ‘‘चोर-चोर मौसेरे भाई’’ का नारा देकर सिविल सोसाइटी को अलग-थलग करना।
4. सिविल सोसाइटी से दो-दो हाथ करना।


अब इसी क्रम में सरकार ने हमला बोल की राजनीति शुरू करते हुए देश के तमाम बड़े समाचार समूह को प्रलोभन दिया जा चुका है। कि ये लोग सरकारी बात को महत्व प्रदान कर सिविल सोसाइटी सदस्यों को भिलन के तौर पर जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। माननीय श्री प्रणव मुखर्जी, श्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम मानती है कि देश की जनता नासमझ है उनको बिल के किसी भी प्रावधान की कोई जानकारी नहीं है। और चुने हुए सांसदों की देश के प्रति जिम्मेदारी है। साथ ही गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी भी फरमाते हैं कि गांधीजी के सत्याग्रह के हथियार से किसी देश में कानून नहीं बनाया जा सकता। अन्ना का अनशन गांधीजी के अनशन से भिन्न है। अब कांग्रेस सहित प्रायः सभी दल को इस बात कि चिन्ता सताने लगी कि यदि सिविल सोसाइटी की बातें को मान ली गई तो संभतः एक समय ऐसा भी आ सकता है जब देश के आधे से अधिक सांसदों को जेल की सलाखों के अन्दर जाना पडे। श्री अरविन्द केजरीवाल ने भी माना कि भला कोई अपना सुसाइडल नोट भला क्यों लिखेगा? सरकारी पक्ष अब अन्ना समूह से दो-दो हाथ करने का मन बना चुकि है। इस चक्रव्यूह योजना के तहत कांग्रेस अब तमाम राजनैतिक दलों को साथ लेकर चलना चाहती है। कांग्रेस पार्टी मानती है कि वो खुद तो इस बिल को लेकर बुरी तरह उलझ ही चुकि है अब देश के तमाम पार्टियों को भी इसमें 30 जून से पहले ही उलझा दिया जाये ताकि संसद के सत्र में उसकी पोल न खुले। कांग्रेस पार्टी अब जानबुझ कर बिल का विवादित हिस्से को बेतुके सवालों में उलझाने कि योजना बना चुकी है। ताकी बिल संसद के पटल पर रखने से पूर्व ही विवादों में घिर जाय और भ्रष्टाचार निरोधक लोकपाल बिल बैगर किसी अधिक बहस के सदन से बाहर कर दिया जाए। जिस तरह महिला आरक्षण बिल संसद में अपनी लम्बी सांसें भर रहा है लोकपाल बिल का भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। देश के 70 प्रतिशत सासंद और विधायक इस बिल के किसी भी प्रावधन से सहमत नहीं होगें। संसद या विधानसभाओं में जिस धारा के अंर्तगत उनको वोट देने और बोलने का अधिकार प्राप्त है समाज का मानना है कि इस अधिकार के तहत ही संसद और विधानसभाओं में भ्रष्टाचार व्याप्त है। जबकि सरकार का कहना है कि यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही है। उनके स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन है। इस तरह के प्रस्ताव लाने का अर्थ है संसद के आधे से अधिक सांसद पर किसी भी समय मुकद्दमा चलाया जा सकेगा। जबकि सिवलि सोसाइटी कहती है कि जबतक कानून बनाने वाले सही आचरण या वर्ताव नहीं करेगें तब तक देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके कहने का सरल सा अर्थ है जो भी कड़े कानून बने उसे ऊपर से ही लागू किया जाना चाहिये। अन्यथा लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि चोर प्रधानमंत्री बरी संत्री को कड़ी। जैसा कि 3जी मामले में साफ छवि की आड़ में डा. मनमोहन सिंह बचते आ रहे हैं। गृहमंत्री का नाम अब सामने आ ही गया। कुछ दिनों में प्रधानमंत्री को भी सीबीआई के समक्ष प्रस्तुत होना पड़ सकता है चुंकि कांग्रेस इस बात को पहले से ही जानती है कि इस बिल के पारित होते ही उनकी सरकार 3जी मामले में खतरे में पड़ती दिखाई देती है तो इन लोगों ने प्रधानमंत्री को एक संस्था का नाम देकर बचाव की मुद्रा में पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। अब सिविल सोसाइटी के सामने एक ही विकल्प बचा है कि वे देश के तथाकतित चुने हुए प्रतिनिधियों को साफ कर दें कि जनता ने उनको चुन कर भेजा है इसका अर्थ है वे जनता के प्रति न सिर्फ जिम्मेदार हैं उनका दायित्व भी बनता है कि वे जनता की बातों पर अमल भी करें। सरकारी पक्ष अपनी बैतुकी बातों से जनता को गुमराह करने की जगह बिल के सभी पक्षों पर ईमानदारी से बहस करें। क्या सही है और क्या गलत पर पहले ही बहस न कर खुले दिमाग से बिल को संसद के सामने प्रस्तुत करें न कि खुद को स्थापित करने के लिए बिल को संसद में प्रस्तुत व बहस करने से पूर्व ही बिल के मूलभूत संरचना से छेड़छाड़ और खिलवाड़ करना शुरू कर दें। कुछ काम संसद के अन्दर चुने हुए सांसदों के उपर भी छोड़ दें वे भी आपके जैसे चुने हुए ही सांसद हैं जो लोकपाल बिल को पारित करेगें या उनको आपलोगों द्वारा सुझाये हुए प्रावधानों पर अपनी राय देगें। सारा काम आपकी समिति के पांच सदस्य ही तय कर लेगें तो संसद के अन्दर बाकी बचे 540 सदस्य क्या खाख करेगें। लोकपाल बिल के मूल प्रस्तावों के साथ सदन में प्रस्तावित करना ही देश की प्रगति का नया अघ्याय होगा। कांग्रेस पार्टी इस बात को गंभीरता से लेकर अपने शातिरों पर लगाम कसे।

शनिवार, 18 जून 2011

लोकपाल बिलः कांग्रसी अलाप - शम्भु चौधरी



आखिरकर जैसे-जैसे 30जून सामने आते जा रही है, कांग्रसी शातिरों का असली चेहरा भी सामने आने लगा। पहले यही काम वे बाबा रामदेव को अपना मोहरा बनाकर सिविल सोसाइटी के लोगों को मुर्ख बनाने एवं फूट डालो राज करो कि अंग्रजी चाल का पासा चला जब वो चेहरा बेनकाब होकर जनता के सामने उसके परचे-परचे उखड़ गये तो अब कांग्रसी लोगों को गांधीवादी अन्ना हजारे तानाशाह नजर आने लगे। चलिये पहले हम पिछले दिनों तेजी से बदलते स्वर पर एक नजर डाल लेते है। अन्ना के अनशन से उठे जनसैलाब के भय से कांग्रेस की सरकार शुरू में इस बात पर जोर देने लगी वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता के साथ है और ईमानदारी पूर्वक वो भी इस बिल को संसद में लाने की पक्षधर है। परन्तु इसके लिए एक प्रक्रिया है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंर्तगत जरूरी है कि समाज और सरकार के सदस्य मिलकर इस बिल के ड्राफ्ट को बना संसद में पारित करने हेतु भेजे। सरकार ने आनन-फानन में अन्ना हाजारे के अनशन को समाप्त कराने के लिए रातों-रात सरकारी छापाखाना खुलवा गजट भी जारी करवा दिया। दरअसल में सरकार का यह चेहरा उनके शकुनि विजय का था जिसको लेकर वे राहत की सांस लेने लगे थे कि बड़ी सावधानी से उनलोगों ने सिविल सोसाइटी के सदस्यों को एक पिंजरे में बन्द कर दिया है।
बैठकें शुरू हुई सरकार की मंशा एवं लोकपाल बिल को लेकर उनका नेक इरादा सामने आने लगा। एक-दो बैठकों के बाद ही इन लोगों ने अन्ना से नाराज खेमे बाबा रामदेव की महत्वकांक्षी भूख को मिटाने के लिए योजनाबध तरिके को अपनाकर उनसे सरकारी बयान दिला दिया। सरकार के पांच-पांच मंत्री बाबा के आवभगत में भेजे गये। खैर बाबा का क्या हर्ष कांग्रेसी तानाशाहों ने किया उसे सारी दुनिया ने देख ही लिया। तानाशाह का अर्थ क्या होता है इससे बड़ा उदाहरण और क्या दिया जा सकता है कि आधी रात को सोई हुई जनता पर लांठियां बरसाई गई। रातों-रात हीलन से भीलन बना दिये गये बाबा रामदेव। कारण स्पष्ट था गुप्त समझौते के अनुसार बाबा का कांग्रसी आदेशों का पालन न करना था। आधीरात को गहरी नींद में सोई हुई निर्दोष जनता के न सिर्फ कपड़े व तिरपाल से बने पंडाल के भीतर आंसू गैस के गोले दागे, बिजली व संचार के सारे तार काट दिये गये पंडाल को खाली करने का समय न देते हुए लाठियों की बरसात शुरू कर दी। जबतक जनता या प्रेस के कर्मी कुछ समझ पाते चारों तरफ भगदड़ मच गई। पंडाल में आग लग जाने से बाबा को पंडाल से झलांग भी लगानी पड़ी कारण की पंडाल के पिछले मार्गा में आंसू गैस के गोले से आग तो लग ही चुकी थी, धुंआ भी भर चुका था। बाबा भीड़ का फायदा लेकर भागने में असफल रहे। इस स्थिति का कुल आंकलन किया जाय तो सरकार एंव बाबा रामदेव के समझौते में शाम ढलते-ढलते श्रीमान कपिल सिब्बल के पेट में दर्द शुरू हो गया और उन्होंने सोचा कि अब बाबा का भांडा फोड़ दिया जाय। सरकार ने जैसे ही बाबा रामदेव के एक सहयोगी का पत्र प्रेस-मीडिया को जारी किया, इससे सरकारी की मंशा साफ हो गई कि वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कितनी गंभीर नजर आती है। तब तक इस प्रकरण से दो बातें साफ हो चुकी थी कि 1. सरकार ऐन-केन प्रकारेण लोकपाल बिल के ड्राफ्ट समिति को विवादों में डालकर किसी भी प्रकार से अपने गुप्त ऐजेंडे के तहत खानापूर्ती करना। 2. कांग्रेस खुद के काले करनामे को उजागर न कर जनता के सामने खुद को पाक-साफ रखना इनका लक्ष्य रहा है।
बाबा का प्ररकरण पर शतरंजी विजय प्राप्त कर लेने वाले कांग्रसी के हौसले अब तक बुलंदियों पर पंहुच चुके थे। श्रीमती सोनिया गांधी सहित भ्रष्टाचार में लिप्त देश के तमाम राजनेताओं ने होली मनाई। मानो इनके खुशी के ठिकाने भी न रहे। कुछ बिकाओ पत्रकार व संपदकों ने भी अपनी शैतानी कलम का रूख अन्ना की तरफ मोड़ दिया।
कांग्रेस इस सफलता का दूसरा निशाना अन्ना और सिविल सोसाइटी की तरफ मोड़ दिया। बैठकों में खुलकर अपने गुप्त ऐजेंडे को लेकर बोलने लगे। बैठक के बहार और अन्दर अभद्र शब्दों का प्रयोग और संसद के चुने हुए प्रतिनिधि और न चुने हुए प्रतिनिधि की बात कहने में भी संकोच नहीं किया। ये तो गनीमत थी कि सरकारी गजट हो चुका है अन्यथा कांग्रेस इनको (समाज के सदस्यों को) बैठक में आमंत्रित भी न करती।


संसद के चुने हुए प्रतिनिधि और न चुने हुए प्रतिनिधि -
सरकारी प्रवक्ता इस बात पर बार-बार जोर दे रहें है कि वे चुने हुए जनता के प्रतिनिधि हैं। इसका क्या अर्थ होता है? कि वे जनता की बात सुनने या मानने से इंकार कर दें? आखिर में सरकार और सरकारी चापलूसी करने वाले मीडियाकर्मी व संपादक ये भी बताये कि चुने हुए इस भ्रष्ट लागों का रोल क्या है? इनकी संवैधानिक जिम्मेदारियां क्या-क्या है? संसद के अन्दर इनकी क्या जिम्मेदारी है और संसद के बाहर क्या-क्या है? उल्फा या गोरखालेंड के प्रतिनिधियों में से कितने चुने हुए सांसद है जिनकी मांगे मानी गई। उल्फा को तो सरकार ने आर्थिक पैकेज तक दे दिया। सांसद जनता के प्रति भी जिम्मेदार है कि सिर्फ संसद के प्रति? सांसदों को जो सुविधा प्रदान की जाती है वो सभी उनको मौज-मस्ती करने के लिए ही दी जाती है क्या? भ्रष्टाचार देश की समस्या है कि नहीं? यदि है तो इसके लिए सरकार ने इसे समाप्त करने के लिए अबतक क्या-क्या उपाय किये? ऐसे सैकड़ों सवाल हैं, जिसे लिखा जा सकता है।


सरकार की मंशा में खोटः
गत पांच बैठकों के अब तक मिले परिणामों और आपसी तालमेल की कमी से सरकारी पक्ष के बयान काफी निराशाजनक नजर आते हैं। सिविल सोसाइटी की बात काटने के जो विकल्प सरकारी पक्ष ने रखें हैं उनमें सबसे बड़ी बात सरकार ने कही की "सोसाइटी के लोग धमकी के स्वर में बात कर रहे हैं ये दोनों बातें अर्थात बात और धमकी साथ-साथ नहीं हो सकती।" अच्छा एक बात बताइये सरकार न क्या किया? पांच जून की रात सरकार ने जनता के साथ क्या सलूक किया। आप कहेगें उसे छोड़ दिजिये वो बाबा रामदेव की कहानी थी, तो आपने आठ जून को एकतरफा बैठक कर क्या ऐलान किया? कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बैगर भी वे 30 जून तक ड्राफ्ट संसद में भेज देगें। इसे क्या समझा जाए? रही 16 अगस्त को अनशन की बात तो यह बात तो अन्ना ने गजट बनने के तुरन्त बाद ही कह दी थी कि यदि सरकार बिल के मौसेदे को सही तरह से नहीं लाती तो वे पुनः अनशन करेगें। अब इसे सरकार बार-बार सुनती है और डर जाती है तो इसका क्या अर्थ निकाला जा सकता है? साफ तौर पर सरकारी पक्ष को लग रहा है कि वे अपने गुप्त ऐजेंडे को किसी प्रकार लागू करवा सके इसीलिए सरकारी पक्ष बैठकों में उनके द्वारा किये जा रहे व्यवहार को जनता के सामने लाने हिचक रही है। जबकि सिविल सोसाइटी का मानना है कि यदि सरकारी पक्ष बिल के प्रति ईमानदारी से पेश आना चाहती है तो इसका सीधा प्रसारण से डर क्यों रही है? दरअसल बात कुछ ओर है कांग्रेस की सरकार न तो कभी इस बिल को लेकर गंभीर रही है न आज है। इनका सीधा सा मकशद है किसी तरह जनता और मीडियाकर्मी को भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा कर लें। कांग्रेस सहित तमाम पार्टी जिसमें भाजपा, माकपा, भाकपा, राकंपा, समाजवादी, तृणमूल, करुणनिधि, जयललिता, लालू-माया जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं ये सभी जानते है कि इस बिल के पारित हो जाने से सबसे ज्यादा उनको क्षति होने वाली है। अर्थात इससे देश का व्योरोकेट अधिकारियों को कम उनको सबसे अधिक इसका सामना करना पड़ेगा। कारण साफ है सरकार बनती और बिगड़ती है और भ्रष्टाचार की शुरूआत संसद और विधानसभाओं में बहुमत को लेकर ही होती है। अब आप कल्पना किजिए कोई अपने पांव पर ही कुल्हाड़ी क्यों मारेगा। इसलिए सब के सब इस मामले को इतिश्री का इंतजार बड़ी बेसब्री कर रहे हैं। इसलिए ज्यों-ज्यों दिन गुजरता जा रहा अन्ना की बात कांग्रेस को धमकी लगने लगी।

गुरुवार, 16 जून 2011

लोकपाल बिल की भ्रूण हत्या - शम्भु चौधरी


ड्राफ्ट कमिटि के सरकारी शातिरों ने एक नई पहल शुरू कर बिल को मूल रूप में न सिर्फ परिवर्तन करने का प्रयास किया उन लोगों ने बाबा रामदेव को जिस हथियार से लहूलूहान किया अब उनके दिमाग ने एक नई पहल शुरू कर दी है। उनको देश के संसद की अब बहुत याद सताने लगी। उनका यह मानना है कि संसद में इस अपूर्ण बिल को प्रस्तावित कर वे एक पंथ दो काज करने में सफल भी हो जायेगें। संभवतः उनका यह भी मानना है कि सिविल सोसाईटी के पांच सदस्य खुद को संसद से उपर न समझे। आखिर में संसद को हथियार बनाकर देश की जनता को गुमराह करने का राजनीतिक हथकंडा अपनाया जाने की तैयारी जोरों से शुरू हो चुकी है। एक पर एक लगातार जनता व मीडिया को गुमराह कर भ्रष्टाचारी व्यवस्था को संसद के भीतर बिल को भैंट चढ़ाने की तैयारी सरकार ने कर ली है। यह बात गत बैठक से ही सामने आने लगी जब सिविल सोसाइटी के सदस्यों द्वारा एक बैठक में गैरहाजीर रहने पर सरकारी पक्ष ने सीधे से एक प्रकार से घोषणा कर दी थी कि वे बैगर समाज के सदस्य के भी बिल को 30 जून तक संसद को बनाकर भेज देगें। यानी एकतरफा ऐलान की घोषणा साफ तौर पर सरकारी पक्ष की गुंडागर्दी सामने आ गई। सरकारी पक्ष की सोच है कि ड्राफ्ट कमिटि गठित हो जाने के बाद अब वे अपनी मनमानी कर एक तरह से लोकपाल बिल की आड़ में सरकारी भ्रष्टाचारी बचाव बिल संसद के पटल पर पटक देंगे, जिस पर संसद बहस करे और एक अपंग और लंगड़ा बिल देश के माथे ठोक कर अपनी गिरती हुई शाख को बचा लेंगे। देश की आजादी से लेकर आज तक कांग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकों के मामाले में ईमानदार रही बाकी कोई भी एक काम जिसे ईमानदारी का तगमा दिया जा सके मेरी नजर में तो नहीं है जो लोग सिविल सोसाईटी के सदस्यों या अन्ना हजारे को कठघरे में लाने का प्रयास कर रहें हैं वे वही लोग हैं जो पक्ष भ्रष्ट व्यवस्था के प्रवल समर्थक माने जाते हैं। देश किस प्रकार भ्रष्ट लोगों के हाथ से मुक्त हो इस पर उनके कोई राय नहीं है। कोलकाता के एक समाचार ने तो लिख ही दिया कि सरकार सिविल सोसाईटी की बात न माने न ही उन्हें कोई महत्व दिया जाय । इस संपादक का मानना ह कि देश संसद सदस्य चलाते हैं। सिविल सोसाईटी नहीं। जिन सदस्यों को जनता चुनकर संसद में भेजती है। जी संपादक जी! यह आपको बताने की जरूरत नहीं कि किसे कौन चुन कर संसद में भेजता है। सिविल सोसाईटी की बात भी जनता की आवाज है आपको इसका पैमाना तय करना है कि देश में भ्रष्टाचार काई मुद्दा है कि नहीं तो आप संसद को भंग कर जनता के बीच इस बात का फैसला करने का अधिकार सौंप दें। और एक बात कांग्रेसी को भी बता देना उचित होगा कि अन्ना हजारे बाबा रामदेव नहीं जिसे आप पांच सितारे होटल में बुलाकर ब्लेकमेल कर सको। सिविल सोसाईटी का आन्दोलन बाबा रामदेव का अनशन समझने की भूल न करें। इसे न सिर्फ आम जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त है कांग्रेस के परचे-परचे सड़क पर लड़खड़ाने लगेगें। संसद की आड़ में जनता को गुमराह करने की आदत से बाज आये कांग्रेसीगण लोकपाल बिल की सभी पहलुओं पर ईमानदारी से अपना पक्ष रखें जो बात आपकी सही होगी जनता स्वतः आपको समर्थन करेगी। मीडिया वाले दोस्तों से भी अपील है कि एक घर तो डायन भी छोड़ती है। भारत देश, अपना देश कैसे भ्रष्टमुक्त हो इस पर अपनी राय दें न कि जो लोग इस नेक कार्यों का अपना तन-मन-धन लुटाकर सामने आयें हैं उनके मजबूत इरादों को कमजोर करने जैसी टिप्पनियों की बोछार सिर्फ अपने तुक्ष्य इरादे की पूर्ति करने के लिये न करें। बिल पास हो न हो इससे सिविल सोसाईटी को क्या फर्क पड़ेगा? कांग्रेस के भ्रष्टी जो चाहतें हैं वही बिल संसद में आ जाय तो देश का क्या भला हो जायेगा? आज देश को एकतरफा फैसला लेना होगा कि हम देश को भ्रष्टमुक्त देखना चाहते हैं कि नहीं? यदि आपका उत्तर हाँ में हो तो सरकारी पक्ष की वकालत छोड़ कर जनता के बीच में खड़े हो जाएं इसी में देश का भला है।