प्रशांत किशोर - जन सुराज अभियान -4
यह कहानी शुरू होगी बिहार से, पर रुकेगी नहीं बिहार तक.. प्रशांत किशोर
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प्रशांत किशोर - जन सुराज अभियान -4
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आप खुद को बिहारी बोलतें है, आपको पता ही नहीं आपके बच्चों को कभी ट्रैन में, कभी शहर में धर-पकड़ के दूसरे प्रान्त के लोग मार रहें हैँ। अभी में पांच माह से घर-द्वार छोडें है तो लगे उसी में हम हैंकड़ी मारने, आपके-हमारे बच्चे मजदूर बनने के लिये कितने साल से घर-द्वार छोडें हैं, उनके दर्द को देखा है किसी ने? - प्रशांत किशोर (25/04/2023)
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:24 am 0 विचार मंच
Labels: जन सुराज, प्रशांत किशोर, Bihar
प्रशांत किशोर - जन सुराज अभियान -3
यह कहानी शुरू होगी बिहार से, पर रुकेगी नहीं बिहार तक.. प्रशांत किशोर
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(देखें पश्चिम बंगाल सीमा पर गैसाल रेलवे स्टेशन के समीप भीषण रेल हादसा हुआ था. गैसाल स्टेशन पर दो अगस्त 1999 को ब्रह्मपुत्र मेल और अवध आसाम एक्सप्रेस के बीच सीधी टक्कर हुई थी. दोनों ट्रेन एक ही लाइन पर आ गई थी. इस घटना में करीब 290-291 लोगों की मौत हुई थी. इस हादसे के बाद तत्कालीन रेलमंत्री नीतीश कुमार ने नैतिकता के आधार इस्तीफा दे दिया था।)
यदि सबको सही भी मान लीजियेगा तो भी आज बिहार, देश का सबसे गरीब और सबसे पिछड़ा, सबसे ज्यादा भुखमरी, अशिक्षा और बेरोजगारी वाला राज्य है। -प्रशांत किशोर
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 12:58 am 0 विचार मंच
Labels: जन सुराज अभियान, प्रशांत किशोर, Bihar
यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इतनी विवेकशील हो चुकी है कि देश की देशभक्ति इनको सांप्रदायिक लगने लगी है। देशभक्ति की बात करने वाले, इस देश के हर नागरिक इनकी नजर में देश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने वाला माना जाने लगे हैं उनकी परिभाषा में सिर्फ वे लोग देशभक्त हैं जो देश को अंदर से खोखला करने में उनकी मदद कर रहें हैं। जो लोग देश की एकता और अखंडता की बात करते हैं उसको भगवा आंतकवाद का नाम दिया जा रहा है, इससे स्पष्ट परिलक्षित हो जाता कि देश में धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद उनके सर चढ़कर बोल रहा है। यह सब बातें हमारी पौंगी धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती है। जो इनके बचाव में गाहे-बगाहे कुछ दलील देश के सामने रखते हैं जो निम्न प्रकार है -
इस परिपेक्ष में जो दलीलें दी जाती है-
1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना।
2. देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोकना।
3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना।
हमें देखना होगा कि इन दलीलों के पीछे किन स्वार्थी तत्वों का दिमाग कार्य कर रहा है? दरअसल देश में जिन-जिन स्थानों में दंगों के खतरे ज्यादा महसूस किये जाते रहे हैं वैसे अधिकतर स्थान मुस्लीम बाहुलता वाले होते हैं। दंगों की शुरुआत ऐसे ही तत्वों द्वारा होती है जो देश में खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानती रही है। इसका स्पष्ट संकेत है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानने वाले तत्व देश की धर्मनिरपेक्षता को न सिर्फ खतरा साबित हो चुके हैं वे राजनीति स्वार्थपुर्ति के लिए बार-बार इस तरह का वातावरण भी सृजन करते रहें हैं।
1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना - आजादी के पश्चात अबतक हम जिन्हें अल्पसंख्यक मानते रहें हैं वे अपने-अपने क्षेत्र में अब न सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके हैं उन क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं के उनके साथ विवाह के भी कई मामले सामने आने लगे हैं। सही अर्थों मे कहा जाए तो अब इस कौम के अंदर भय नाम की कोई बात नहीं रह गई कारण कि इनको दोहरे कानून का समर्थन प्राप्त हो रहा है। पहला इस्लामिक कानून जो हिन्दुओं की लड़कियों को मुस्लीम बनाने की इज्जाजत देता है। दूसरा भारतीय संविधान जो वयस्कों धर्म-जाति के बंधन से परे रहकर शादी करने की इज्जाजत। जबकि इसके विपरित कोई अन्य प्रकार की घटना घटते ही सांप्रदायिकता व कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती हैं। आनन-फानन में ऐसे संबन्धों का जो भी हर्ष निकले पर यह बात तय है कि उस समय भारत का संविधान गौन हो जाता है। चुकीं मामला एक विशेष धर्म से जुड़ा होता है। जहां से सांप्रदायिक दंगे फैलने की प्रवल संभावनाएं बनी रहती है। यह इस बात की ओर संकेत देता है कि भयभीत होने वाली कोई बात इस कौम पर लागू नहीं होती।
2. सांप्रदायिक दंगों की आग - प्रायः राजनैतिक दलों द्वारा इस बात की चेतावनी दी जाती है कि कोई भी बात जो उनको पसंद न हो न करें, अन्यथा दंगा होने की संभावना जताई जाती रही है। हर बात में इस खौफ को पैदा किया जाता रहा है। कोई भी व्यक्ति ऐसी बात न करें या ऐसा कार्यक्रम न करें जिससे सांप्रदायिक सदभावना का खतरा पैदा हो जाए। यह बात किसे कहा जाता है? क्या यही बात हमारे राजनैतिक दलों ने कभी मुसलमानों को भी कहा है? जो लोग सांप्रदायिकता की बात करतें हैं वे लोग ही खुद सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं चुंकि उनका उद्देश्य न सिर्फ राजनीति करना रहा है इसके माध्यम से वे कई बार सत्ता भी प्राप्त करने में सफल रहें हैं।
3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना- जो लोग बार-बार देश के टूकरे करने की बात कर देश की जनता को भयभीत करते रहते हैं उनके लिए एक बात याद आती है कि जो रोज-रोज शेर आया शेर आया करते रहते हैं ऐसे ही लोगों को एक दिन सच में शेर आकर खा जाता है। ऐसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों को मोहरा बनाकर अपनी सत्ता का दावा मजबूत करने में लगें हैं वे ही वास्तव में देश को पुनः विभाजन की कगार पर ले जाने का कार्य कर रहें हैं। जब एकबार धर्म के नाम पर देश के तीन बंटवारे हो चुके, तो प्रमाणित आंकड़े कहते हैं कि अब जो लोग देश को पुनः बांटने की धमकी देकर देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर एक विशेष संप्रदाय के वोट बैंक को अपने पक्ष में एकत्रित करने का काम कर रहें है। वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने में लगे हैं। ऐसी ताकतें जो खुद की राजनीति में लगा हो वह किसी भी सांप्रदाय का कभी भी भला नहीं सोच सकती।
आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इन तत्वों की ताकतों में इजाफा होगा। देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता चला जाएगा और इसके लिए एक मात्र वे ही लोग जिम्मेदार माने जाएंगें या धर्मनिरपेक्ष ताकतों का वह चेहरा ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा जो देश में धर्मनिरपेक्ष की आड़ में वोट की राजनीति करते रहें है।।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:12 pm 0 विचार मंच
Labels: धर्मनिरपेक्षता, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Baba Ramdeo, Baba Ramdev, Bihar, BJP, CPI, CPM
आज इस बात को लिखने में मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है कि हमें नीतीश कुमार भी इन्ही भ्रष्टाचारियों के बीच से ही मिला है जिसने गर्त में डूबे बिहार का न सिर्फ चन्द सालों में काया ही बदल डाली। अल्पसंख्यकों की रहनुमाई कर बार-बार सत्ता पर काबिज होने वाले सत्ता के दलालों के दरवाजों पर अलीगढ़ी ताले भी लटका डाले। चारों तरफ कुशासन, अपहरण हत्या पर न सिर्फ इन्होंने लगाम लगा दी, राज्य में पूंजी निवेश के भी कई नये विकल्प खोल दिये। मानो बिहार श्री नीतीश जी के शासन व्यवस्था से धन्य हो गया हो।
कल जब श्री अन्ना हजारे एवं उनके सहयोगी सदस्य बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार से मिले तो एक तरफ नीतीश जी ने लोकपाल बिल को प्रभावी तथा व्यापक बनाने की वकालत की तो दूसरी तरफ बिहार में जल्द ही इस तरह का कानून लाने का आश्वासन भी दे डाला। आज इस बात को लिखने में मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है कि हमें नीतीश कुमार भी इन्ही भ्रष्टाचारियों के बीच से ही मिला है जिसने गर्त में डूबे बिहार का न सिर्फ चन्द सालों में काया ही बदल डाली। अल्पसंख्यकों की रहनुमाई कर बार-बार सत्ता पर काबिज होने वाले सत्ता के दलालों के दरवाजों पर अलीगढ़ी ताले भी लटका डाले। चारों तरफ कुशासन, अपहरण हत्या पर न सिर्फ इन्होंने लगाम लगा दी, राज्य में पूंजी निवेश के भी कई नये विकल्प खोल दिये। मानो बिहार श्री नीतीश जी के शासन व्यवस्था से धन्य हो गया हो। अब जब देश में जन लोकपाल बिल पर एक लम्बी लड़ाई लड़ी जा रही है। केन्द्र में भ्रष्टों की सरकार इसे लोकतंत्र पर प्रहार मानती है और कुत्ते की तरह भौंकना आरम्भ कर दिया है कोई इसे संसद पर हमला बता रहा है तो कोई इसे लोकतंत्र पर, कोई समानान्तर सरकार की संज्ञा दे रहा है तो काई सांप्रदायिक ताकतों की साजिश मान लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आयी हुई बहुमत की सरकार को गिराने की षडयंत्र मानती है। सरकार के कुछ भ्रष्टाचार संरक्षक अभियान के मंत्री ऐन-केन प्रकारेण बिल की मूल को ही बिल से निकाल कर देश को गुमराह करने की योजना पर कार्य कर रहें हैं। इन सबके बीच बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने एक अच्छी पहल कर पुनः यह प्रमाणित कर दिया कि देश में अभी भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार का मुद्दा भले ही कांग्रेसियों के गले न उतरे पर बिहार की इस सकारात्मक पहल से देश के अन्य राज्यों को भी काफी बल मिलेगा।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 12:10 pm 0 विचार मंच
Labels: Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Bihar, Congress, Govt. Draft Lokpal Bill 2011, Nitish kumar
डा. मान्धाता सिंह, कोलकाता, भारत
Email to: Dr. Mandhata Singh
कोलकाता शहर के जाने माने पत्रकार डॉ.मान्धता सिंह ने बिहार के दर्दभरी कथा को एक पत्रकार के रूप में हमें भेजा, भले ही ये एक साहित्यिक मंच हो, परन्तु आज हमें सहित्य की नहीं बिहार के लोगों के दर्द के साथ खड़ा होना होगा। इसलिये इनके इस लेख को हम सहित्य मंच पर विशेष स्थान देने जा रहें हैं। - ई हिन्दी साहित्य सभा

मैं मुरलीगंज का रहने वाला हूं। मेरी बूढ़ी मां, मेरी बहन जिसकी गोंद में नवजात शिशु है, दो दिन से बिना कुछ खाए मेरे घर के छत पर पड़े हैं। नाववाले गांव के पास आकर भी उन्हें वहां से निकालने को राजी नहीं हुए। मैं यहां दूसरी नाव की तलाश में आया हूं ताकि अपने परिवार को बचा सकूं।....... इतना कहते-कहते एक नौजवान फफक कर रो पड़ता है। तभी माइक थमा दी जाती है एक महिला को जो अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर यत्र-तत्र भटक रही है। जिस जगह पर ये सभी लोग जुटे हैं वह एक उंची जगह है और सुदूर इलाके से यहां पहुंचकर लोग बेचैन हैं कि उनके परिजन कैसे होंगे। इन्हीं में एक शख्स पतरहा के थे। इन्होंने बताया कि उनके गांव में एक छत पर चार सौ के करीब लोग हैं। वहां चार लोगों की मौत हो चुकी है और उनके शव वहीं पड़े हुए हैं। अब उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। किसी हाजी की छत पर जमा इन लोगों को भी बचाने की गुहार माइक थामकर इस मौलाना ने भी लगाई।..........
ये सभी हिंदी समाचार चैनल स्टार न्यूज के संवाददाता के इर्दगिर्द जमा हैं। संवाददाता इनकी बात सीधे रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव और बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री नीतिश मिश्र से करवा रहा है। लोग यह सोचकर कि, सीधे मंत्री से गुहार लगाने पर शायद मौत के मुंह में खड़े उनके परिजनों को जीवन मिल जाए, वहां जमा हैं। एक बूढ़ा शख्स लपक कर संवाददाता के पैर पकड़ लेता है और अपने उन परिजनों को बचाने की मिन्नतें करता है जिन्होंने फोन करके इस शख्स से कहा कि ये आखिरी बातचीत है। अब हम लोगों की बिदाई होने वाली है। यानी अगर उन्हें बचाया नहीं गया तो किसी भी क्षण मौत के मुंह में जा सकते हैं। इन सबकी गुहार के बाद जब संवाददाता बोलने को मुखातिब हुआ तो वह भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं रहा। शायद आप भी यह देख रहे होते तो आपकी भी जुबां पर दर्द के ताले लग जाते। यह कोशी के प्रलय का छोटा सा दृश्य था। पूरी तस्वार कितनी भयावह है इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।
यहां पूछा गया कि आपको खाने के पैकेट तो मिल पा रहे हैं तो लगभग गुस्से में तमतमाते हुए एक नौजवान ने कहा कि हम दस दिन बिना खाए रह सकते हैं मगर हमें अभी ज्यादा से ज्यादा नावें चाहिए जिससे पानी में फंसे लोगों को निकाला जा सके। दरअसल इन कई लोगों ने शिकायत की कि नाववाले उनसे तीन हजार से लेकर पांच हजार रुपये तक मांग रहे है जबकि उनके पास कुछ नहीं बचा। वे सिर्फ जान बचाना चाहते हैं। आपदा प्रबंधन मंत्री ने भी माना कि नाववालों की बदमाशी की शिकायतें उन तक भी पहुंच रही हैं। ये नावें प्राइवेट नावें हैं।
इनकी त्रासदी यह भी है कि मौत सामने मुंह बाए खड़ी है फिर भी घर छोड़कर नहीं जा पा रहे हैं क्यों कि एक तो नावें उपलब्ध नहीं हैं और दूसरे लोग लूटपाट भी कर रहे हैं। खाली घरों के सामान व सामान के साथ जा रहे लोगों के सामान वगैरह लूट ले रहे हैं। यह शिकायत यहां पहुंचे कई लोगों ने की। इनकी मुसीबत तो देखिए कि कोशी इनसे जीने का अधिकार छीन रही है और जान बचाकर किसी तरह भागे भी तो बदमाशों व उचक्कों से भी नहीं बच पा रहे हैं। फिलहाल तो कोशी का यही प्रलय झेल रहा है बिहार। खौफ में गुजर रही हैं रातें और दिन भर अपने परिजनें को तलाशने के लिए दर -दर भटक रहे हैं उत्तर बिहार के २५ लाख लोग। कहा जा रहा है कि बाढ़ घट भी जाए तो इन लोगों को कम से कम दो साल तक कैंप में ही गुजारने होंगे। क्यों कि इस तबाही के बाद पुनर्वास में इतने समय तो लग ही जाएंगे।
साठ साल से चली आ रही है तबाही :
बाढ की यह तबाही तो बिहार साठ साल से झेल रहा है मगर तीस वर्षो के दौरान 1978, 1987, 1998, 2004 और 2007 नदियों से होने वाली व्यापक विनाशलीला वाले साल रहे। पिछले दस साल के आंकड़े बताते हैं कि 2005-06 को छोड़ दिया जाए तो लगभग हर साल इन इलाकों ने बाढ़ की तबाही झेली है और बर्बादी को जीया है। 1998 में बाढ़ की तबाही जुलाई के पहले हफ्ते ही शुरू हो गई थी। भारी बारिश से उत्तर बिहार से होकर गुजरने वाली लगभग सभी नदियों बूढ़ी गंडक, बागमती, अधवारा व कोसी ने जगह-जगह बांधों को तोड़ दिया था और भारी तबाही मचाई थी। इस प्रलय में 318 लोग काल-कवलित हो गए। नदियों का कहर अगले साल 1999 में भी जारी रहा।इस वर्ष अक्टूबर में अप्रत्याशित तौर पर भारी बारिश ने नदियों का मिजाज कुछ ऐसा बिगाड़ा कि उनके जलस्तर ने 1987 के रिकार्ड को भी तोड़ दिया। कमला बलान तो झंझारपुर [मधुबनी] रेलवे ब्रिज को पार कर गई थी। वर्ष 2000 के जुलाई में दो दफे भारी बारिश के बाद कमला बलान और भुतही बलान बौखलाई तो अगस्त में कोसी ने तबाही मचाई। इस बाढ़ में करीब 13 हजार गांव डूबे। साल 2001 में नेपाल जलग्रहण क्षेत्र में भारी बारिश के बाद कोसी ने जहां अपना पश्चिमी तटबंध तोड़ दिया, वहीं भुतही बलान ने दायां तटबंध तोड़ा। बागमती और बूढ़ी गंडक के बाएं तटबंध में कई जगह दरारें पड़ गई। 2002 भी बाढ़ की भीषण तबाही का ही गवाह बना। इस साल कमला बलान का बायां तथा खिरोई का दायां तटबंध टूटने से करीब 500 लोग मारे गए। 2003 में भागलपुर में 1978 की बाढ़ का रिकार्ड टूटा। इसी साल पटना के गांधीघाट के पास गंगा ने 1994 का रिकार्ड तोड़ा। 2004 की जुलाई में उत्तर बिहार में हुई भारी बारिश ने न केवल पिछले तीन साल का रिकार्ड तोड़ा, बल्कि इससे उफनाई नदियों की बाढ़ 1987 की तबाही से भी आगे निकल गई। 2005 और 2006 में स्थिति सामान्य रही। पर, 2007 में उत्तर बिहार में लगभग सभी नदियां लाल निशान को पार कर गई। विभिन्य स्थानों पर 28 तटबंध टूटे। बूढ़ी गंडक और बागमती के जल ग्रहण क्षेत्र में जुलाई और अगस्त महीने के दौरान लगातार बारिश होती रही। इससे लगातार जलस्तर बढ़ता रहा। पूरा उत्तर बिहार बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुआ। करीब 800 लोग मारे गए, जिनमें सर्वाधिक 140 लोग दरभंगा में मरे। साठ साल से चली आ रही तबाही का यह खेल इस साल भी कुछ ऐसी ही दास्तां छोड़ जाएगा।
बिहार का शोक कोसी और नेपाल :
नेपाल से निकलकर उत्तर बिहार होते हुए गंगा में मिलकर बंगाल की खाड़ी में समाने वाली कोसी को बिहार का शोक यूं ही नहीं कहा जाता। जानकारों की मानें तो कोसी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र [हिमालय] में प्राकृतिक और अन्य कारणों के चलते जमीन की ऊपरी परत अपनी जगह से हटती है और भूस्खलन के कारण मैदानी इलाके को हर साल बाढ़ से रूबरू होना पड़ता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालय की ऊपरी पहाड़ी इलाके से निकलने के कारण बारिश के मौसम में इस नदी का बहाव सामान्य से अठारह गुना तेज हो जाता है। ऐसे में यह सामान्य है कि नदी अपने साथ मिंट्टी की ऊपरी परत गाद के रूप में लेकर आए। मैदानी इलाके में बहाव की गति कम होने पर यह नदी की सतह पर जमा होने लगती है और उथला होने के कारण नदी का जलस्तर स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है। नदी के मार्ग बदलने का बड़ा कारण यह गाद ही है। पिछले सौ साल में ही नदी 200 किलोमीटर की लंबाई में अपना रास्ता बदल चुकी है।
नेपाल के सहयोग के बिना कोसी के कहर को कम करना संभव नहीं, इसलिए दोनों देशों के बीच 25 अप्रैल 1954 को एक समझौता हुआ, जिसके तहत दोनों देशों ने नेपाली क्षेत्र में हनुमाननगर के पास नदी पर बांध बनाने की योजना बनाई थी। इस समझौते पर भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और नेपाल की ओर से तत्कालीन नरेश के प्रतिनिधि मात्रिका प्रसाद कोइराला [गिरिजा प्रसाद कोइराला के बड़े भाई] ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते का उद्देश्य प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ को रोकना, जगह-जगह छोटे-छोटे बांधों का निर्माण करना और पनबिजली उत्पादित करने के साथ-साथ इलाके में कृषि को बढ़ावा देना था। इस समझौते के तहत कोसी बैराज बना। इसके बाद भी दोनों देशों ने संयुक्त प्रयास से कई बांधों का निर्माण किया। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि इन बांधों के निर्माण से भी बाढ़ से होने वाली तबाही नहीं रुकी।
नेपाल में बाढ़ के लिए वहां अब भारत को जिम्मेदार ठहराया जाता है तो इस इलाके में बाढ़ के लिए दोषारोपण नेपाल पर होता है। नेपाल का कहना है कि भारत ने नेपाल सीमा पर जिन ग्यारह बांधों का निर्माण कराया है उसमें आठ में नेपाल की सलाह नहीं ली गई। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी ख्याल नहीं रखा गया। दूसरी ओर भारत का कहना है कि नेपाल हमेशा समझौैते का उल्लंघन कर बैराज के जरिए अतिरिक्त पानी छोड़ देता है जिससे यहां तबाही बढ़ जाती है। इन सबके इतर दोनों देशों में बांधों का विरोध पर्यावरणविद से लेकर आम लोग तक करते हैं। उनके मुताबिक उत्तरी बिहार और नेपाल का दक्षिणी हिस्सा भूकंप जोन में हैं। बाढ़ रोकने के लिए अगर यहां बांध बनाए गए तो भूकंप आने की स्थिति में बांधों को संभाले रखना असंभव है और तब जो तबाही होगी उसका आकलन सामान्य परिस्थितियों में नहीं किया जा सकता। भूकंप की स्थिति में संपूर्ण उत्तरी बिहार और खासतौर पर मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया और सहरसा जिले जलमग्न हो सकते हैं। बांधों के खिलाफ एक तर्क और है कि चाहे ये जितने मजबूत बनाए जाएं, इनका टूटना या क्षतिग्रस्त होना तयशुदा है। पर्यावरणविद बांधों का इसी आधार पर विरोध करते हैं, लेकिन राजनीतिक दल अपने हित में विशेषज्ञों की अनदेखी कर मनमर्जी वाले स्थान पर बांधों का निर्माण करा देते हैं और जिससे इनकी सुरक्षा को लेकर हरदम संशय बना रहता है। इस बार कहा जा रहा है कि नेपाल में माओवादियों ने तटबंध की मरम्मत में अड़ंगा लगाया अन्यथा बांध को बचाया जा सकता था।
राष्ट्रीय आपदा घोषित:
कोसी नदी के तटबंध टूटने से इस बाढ़ से कोई 25 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ से कुल 15 ज़िले प्रभावित हुए हैं। 900 गांवों में बाढ़ का कहर है। नेपाल में तेज बारिश ने कोसी में उफान ला दी है, जिस वजह से उत्तरी बिहार के मधेपुरा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया के नए इलाकों में पानी भर गया है। कोसी में नेपाल से एक लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया है और बिहार सरकार को आशंका है कि आने वाले दिनों में नौ लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जा सकता है। नेपाल में तटबंध टूटने के बाद कोसी नदी ने 1922 की धारा पर दोबारा बहना शुरू कर दिया है, जिस वजह से इतने बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। राहत और बचाव कार्य के लिए सेना को बुला लिया गया है।
बिहार में आई बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा करार देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने २८ अगस्त को बचाव और राहत कार्य के लिए 1,000 करोड़ रुपये और मौजूदा स्थितियों से निपटने के लिए 1.25 लाख टन अनाज की फौरी सहायता देने की घोषणा की। संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ राज्य के सबसे अधिक प्रभावित चार जिलों (सुपौल, सहरसा, अररिया और मधेपुरा ) के हवाई सर्वेक्षण के बाद प्रधानमंत्री ने बिहार को इस स्थिति से निपटने के लिए हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया। मनमोहन सिंह और सोनिया के साथ गृहमंत्री शिवराज पाटिल और लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मौजूद थे।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 10:43 am 2 विचार मंच
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