बुधवार, 12 मई 2021

विनाशकारी मोदी कोविड:

 लेखक-शंभु चौधरी

जब पिछले साल देश में चाइनीज कोविड का कहर अपने चरम पर था तो इसके नियंत्रण में भारत के विनाश पुरुष थाली बजाने के मानसिक उपज को वैज्ञानिक आधार बता,  देश की वाट्सएप युनिवर्सिटी के प्रोफेसर दनादन वाट्सएप, ट्विटर पर ट्वीट करने वाले दो टकिया समर्थक और गोदी मीडिया देश को ऐसे समझा रहे थे कि यदि यह थाली न बजती तो देश में अनर्थ हो जाता और वहीं सेनाओं की तीनों जमात लाखों गरीब के जख्मों पर फूलों की बरसात, ढोल तबला बजा कर या आतिशबाजी से अपनी बहादुरी के ताल ठोक रही थी। 


मोदी समर्थकों को छोड़कर आप मेरी इस बात को कतई नहीं स्वीकार करेगें कि मोदी की मूर्खता पूर्ण नोटबंदी की तरह ही बिना सोच-विचारे, विद्वानों की सलाह लिए, लॉकडाउन के अप्रत्याशित निर्णय के चलते देश के लाखों मजदूरों को रातों-रात मोदी ने उनको सड़कों पर ला खड़ा कर दिया।

सैकडों मजदूर विभिन्न हादसों के शिकार हो गए या मारे गए, छोटे-छोटे बच्चों के निवाले छिन्न लिए।

रास्ते पर पुलिस के लोगों को उन गरीब मजदूरों को मदद करने की बात तो दूर, राज्य सरकारों ने उन्हें लूटने, पीटने रास्ता रोकने  में लगा दी । हजारों मजदूर ट्रेन की लाईनों के सहारे छुप-छुप कर गांव भाग रहा थे, कोई  जरूरी कार्य के लिए भाड़े की गाड़ी से गांव के रास्ते, परिणाम कुछ लोग ट्रेन के नीचे कट गए, तो कुछ को डकैत समझ गांव के हिन्दुओं ने मिलकर स्थानीय पुलिस के सामने ही पीट-पीटकर मार डाला। यह सब भारत सरकार के वाट्सएप यूनिवर्सिटी के हिन्दू - मुस्लिम करने वाले सूचना-प्रसारण विभाग का कमाल था।

सब दृश्य आजतक आंखों के सामने दिख रहें हैं। 

एक तरफ मजदूरों का मानो घर ही उजड़ गया, पर भारत के प्रधानमंत्रीऔर इनकी टीम ठस से मस नहीं की। गृहमंत्री का तो कोई आता-पता ही नहीं था।  

आप एक बात गौर किजिए- भारत के वर्तमान गृहमंत्री श्री अमित शाह या तो हिन्दू-मुस्लिम एजेंडा जैसे एन.आर.सी या सीएए, दंगा कराने के समय या फिर बंगाल के चुनाव में ही दिखाई दिये, बाकीे समय वे किस गुफा में चले जातें हैंं, किसी को कुछ पता नहीं। पूरा मौन धारण कर लेतें हैं या फिर किस राज्य की राजनीति पार्टियों के सदस्यों के घर छापा डलवाना है। किसे तौड़ना या फैक समाचारों को कैसे  फैलाना है या सांप्रदायिक माहौल का सृजन, इन सब कामों में भारत के गृहमंत्री जी को महारथ हासिल है।

चानी कोविड कुछ कम हुई तो मोदी जी, गृहमंत्री जी फिर दिखाई देने लगे। पिछले 2020 के लॉकडाउन के समय, जब मजदूर सड़कों पर मर रहा था , तब देश का प्रधानमंत्री संगीत की धुन सुनकर अपने पांव थरका रहे थे। यह हमने देखा है।

वहीं सत्ता के धुरंधर, चापलूसी में गिरगिट को भी मात देने वाले 

उत्तर प्रदेश, बिहार के मुख्यमंत्री योगी और नीतीश कुमार, शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुंह छुपाते फिर रहे थे।

इन लोगों ने वेशर्मी की हद तब पार  कर दी जब विभिन्न प्रान्तों के बच्चे अपने घरों से दूर हॉस्टल'स में रहकर पढाई कर रहे थे। मोदी के लॉकडाउन से स्कूल तो बंद हो ही गए। खाना देने वाले पहले तो किसी प्रकार एक माह खाना देते रहे, फिर उन लोगों ने भी हाथ खड़े कर दिये। 

बच्चों का आपात मेसेज से पूरा भारत कांप गया, पर इन हरामियों का दिल नहीं कांपा। बिहार के मुख्यमंत्री का अधिकारिक बयान आया कि बिहार से बाहर जो बच्चे पढ़ने गए हैंं सब सपन्न परिवार के हैं उसके लिये सरकार कोई व्यवस्था नहीं करेगी।  मानो इसने मजदूरों के आने-जाने की सारी व्यवस्था कर दी हो?

भगवान का शुक्र था कि संसद अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला जी को रेलमंत्री को, मुख्यमंत्री से आग्रह करना पड़ा, तब जाकर रात को राहत की खबरें आने लगी, पर इन सबक के  बाद भी का प्रधानमंत्री मोर से खेल रहे थे और गृहमंत्री हिन्दू-मुस्लिम करने में व्यस्त थे।

जैसे कोविड का प्रथम चरण कुछ हद तक नियंत्रण में आया नहीं था कि मोदी सरकार चुनाव आयोग का इस्तेमाल कर देशभर में नंगा नाच करने लगी। गृहमंत्री पैसे की ताकत से ना सिर्फ बड़ी-बड़ी रैलियां करने लगे, विभिन्न राज्यों से अपने अंधभक्तों को बंगाल में भरकर सांप्रदायिक भावनाओं को झूठी और मनगढंत खबरों को बनाकर, बंग्लादेश की या अन्य मारपीट की नकली वीडियो बनाकर बंगाल में, धन,बल, अर्धसैनिक बलों और चुनाव आयोग के सहारे पूरे बंगाल में तनाव का माहौल पैदा कर दिया था। बिहार का चुनाव से लेकर वर्तमान में हुए पांच राज्यों के चुनाव और उत्तर प्रदेश में पंचायतों के चुनावों में मोदी ने, योगीजी ने, गृहमंत्री ने ना सिर्फ पूरी ताकत झौंक डाली, देश को पुनः मौत के मुंह में धकेल डाला। 

यदि मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी का ही सिर्फ उल्लेख करें तो भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित चुनाव आयोग के ऊपर देश को इस संकट में डालने के लिए इन लोगों पर नरसंहार करने जैसे जघन्यतम अपराध का मुकदमा चलना चाहिए था।

आज देश के चारों तरफ मौत का तांडव नृत्य देखा जा सकता है। क्या अस्पताल हो या गांव सब तरफ दम घुटने से लोगों की लाशें पड़ी सड़ रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार से रोजाना दर्दनाक दृश्य, समाचारों से रूहें कांप उठी है।



एक-एक गांव से रोजाना 5-10लोगों की मरने के समाचार, हिन्दुओं की लाशों को जमीन में दफनाया भी जाने लगा, लकड़ी के अभाव से कई जगहों पर नदियों में लाशों को बहाया जा रहा है। वहीं अस्पतालों की बात करे तो लूट बस लूट चल रहा है। दोनों हाथों से लूट का व्यापार हो गया है। सरकारी है तो दलालों की लूट, प्राइवेट है तो मालिकों की लूट। 

रोजाना हर तरफ त्राहिमाम .. त्राहिमाम.. बचाओ.. बचाओ.. के मेसेजों से सोशल मीडिया भर जाता है। कुछ लोग अपनी क्षमता के अनुसार उनकी मदद कर रहें हैं को भी भाजपा के वफादार सिपाही उनके (मदद करने वालों पर) झूठे आरोप गढ़ कर उन्हें फंसाने के मामले भी सामने आने लगे तो देश की सर्वोच्च अदालत को आदेश देना पड़ा कि आपात स्थिति में मदद की गुहार को सार्वजनिक रूप से मांगना या मदद करने पर उन्हें परेशान ना किया जाए। इसके बावजूद योगी आदित्यनाथ की सरकार खुले आम ना सिर्फ़ पत्रकारों पर गरीब जनता को भी धमाका कर , उन पर एफआईआर कर, राज्य की छवि बचाने में लगे हैं। ऐसी छवि के फोटोज भी लेना अपराध मान लिया गया है योगी जी पर प्रकृतिक आपदा पर आप नियंत्रण ना करने का ऊपाय कर लोगों की लाशों को कब तक छुपा  पाओगे? 


बिहार-यूपी की नदियों में लाशों की बाढ़ आ गई है। हर गांव की दहलीज पर मौत मुंहबांये खड़ी है। खेतों में लाशों के बीज भी लोग बोने लगे अब ।

दूसरी तरफ देश की भारत सरकार आक्सीजन, दवा, वैक्सीन को लेकर देश की जनता को बांट दिया है। हर राज्य दूसरे राज्य का दुश्मन हो गया है। 

कोई आक्सीजन को रोक रहा तो कोई वैक्सीन पहले पाना चाहता है। 

मुझे अभी तक वैक्सीन की नीति ही नहीं समझ में आ रही। बचपन से लेकर आजतक कभी वैक्सीन को लेकर इतनी समझ नहीं थी कि भारत सरकार की वैक्सीन और राज्यों की वैक्सीन अलग होती है। और इंसान भी अलग।। ..जारी..




रविवार, 9 मई 2021

व्यंग्य: कद्दू सौ रुपये किलो

 व्यंग्यकार, शंभु चौधरी


रामप्रसाद जी गांव जा रहे थे। रास्ते में बस रूकी रामप्रसाद जी भी हल्का होने के लिये नीचे उतर गये। सड़क के एक किनारे बस के पीछे खड़ा होकर जैसे ही हल्का हो रहे थे उनके कान खड़े हो गए।

कोई जोर-जोर से चिल्ला रहा था - "कद्दू ले लो कद्दू" !

रामप्रसाद जी को लगा कि बस की सवारी के पास आम, लिच्चू, केला, खीरा, शर्बत, चाय बेचते तो बहुत बार देखा पर आज कद्दू बेचते पहली बार ही सुना।

रामप्रसाद जी हल्का होकर पैजामा का नारा ठीक करते हुए कद्दू वाले की तरफ लपक लिए।.. भाई! अरे भाई!  जोर से आवाज लगाई, अरे ओअअअ कद्दू वाले भाईईईईई... 

कद्दूवाला हो हल्ला में कुछ नहीं सुन रहा था। बस यात्रियों के चारों तरफ बेचने वालों का अजीब सा वातावरण था, जिसमें बेचने वाले की आवाज तो सुनी जा सकती थी, पर आपकी आवाज उनकी तेज आवाज में गुम हो जाती। जैसे रात के एक बजे जब लोग गहरी नींद में थ्री टायर के डब्बे में सोते हुए यात्रा कर रहें हों और किसी प्लेटफार्म पर चाय वाला अंदर घुस कर आवाज लगाने लगता है - चाय पी लो चाय, तभी कोई यात्री अपनी कंबल से मुंह निकाल कर चाय वाले से पूछता है - ओ चाय वाले भाईईईईई. - कौन सा टेशन आया है? 

चाय वाले की मन में लगा कि यह चाय मांगेगा, पर जैसे ही उसका पूरा सवाल सुना, चाय वाले का पांव प्रोटोकॉल की तरह अकड़ गया। बेरुखी से जबाब देते हुए .. बोला  "बथुआ".. और आगे बढ़ गया.. चाय.. चाय....

रामप्रसाद आवाज देते सोचने लगे.. तभी फिर कद्दू वाला पास आया पूछा बाबू काहे चिल्ला रहे थे? 

रामप्रसाद जी उसके कुतर्क से थोड़ा संभलकर अरे नहीं कद्दू का भाव पूछ रहा था। गांव जा रहा हूँ, सोचा बच्चों के लिए कुछ खरीद लूं। कद्दू वाले ने जबाब दिया सौ रुपये किलो, अब रामप्रसाद जी को काटो तो खून नहीं, शहर में तो कद्दू 20-30रुपये का एक मिलता है। पलट के उससे फिर पूछ लिए शायद सुनने में भूल हुई होगी। आवाज की उस भीड़ में फिर जोर से  "कितना"? 

कद्दू वाले ने फिर वही उत्तर दोहरा दिया। 100रुपये... किलो।

किलो? कद्दू किलो से कब बिकने लगा। बाबू जबसे देश में फ्री की वैक्सीन लगेगी सबको बोल कर 1200-1500 में बिक रही है उससे सवाल करने में आपलोगों की फटती है। गरीब से हजार सवाल? बोल कर आगे बढ़ गया।

व्यंग्य: वैक्सीन गधे की सींग

जब से देश में प्रधानमंत्री श्री दामोदरदास नरेन्द्र मोदी जी ने यह ऐलान किया कि अब देश के युवाओं को भी वैक्सीन दी जायेगी। वैक्सीन कम्पनियों ने भी आनन-फानन में रातोंरात वैक्सीन की दरों में चौतरफा मुनाफा बढ़ा दिया।

एक सवाल के जबाब में कम्पनी के संवाद तंत्र ने गोदी मीडिया के माध्यम से जानकारी दी कि सरकार से उनको सहमति मिल गई है कि आप मेरी सरकार -तेरी सरकार और उसकी सरकार के अनुसार दाम तय कर दे। 

अब कम्पनी करे तो क्या करे। जब राजा ही देश लूटने की इजाजत देता हो तो, आपदा में अवसर भला कौन नहीं लेना चाहता।

मानो किसी मुर्दा के शरीर से कफन को को लूट लेना या मुर्दे की लाश को गिद्धों के आगे नोचने के लिए फैंक देना। 

मैंने तो देश के कपड़े उतार दिया अब तुम इसकी खाल नोच लो।

हर तरफ लूट का तांडव हो रहा है। दवा के नाम पर, ईलाज के नाम पर, आक्सीजन के नाम पर, तो भला वैक्सीन के नाम पर क्यों न हो।

पास में  मां बैठी हुई थी, बीच में बोल पड़ी -" बबुआ...आ.. हमनी के वैक्सीन दिला लाओ।"

मां को क्या पता कि वैक्सीन का आकाल पड़ चुका है। वैक्सीन तो मोदीजी पूरे विश्व में मुफ्त में बांट आये। भारत को बोल दिये खरीदो और लगाओ। 

बिहारियों को चुनाव में वादा किये थे सबको मुफ्त वैक्सीन मिलेगी, पर जब तक मिलेगी, तब तक मरते रहो। यह वादा तो नहीं किया था कब तक मिलेगी। जल्दी है तो खरीद लो बाजार से। 

मां ने फिर कहराते हुए कहा- " बैटा मुझे वैक्सीन लगवा दो, नहीं तो मैं मर जाऊँगी। " 

अब मां को कौन  समझाये.. वैक्सीन तो गधे का सींग हो गयी, कब उगेगी, कब लगेगी, यह तो गधे के मालिक को भी नहीं पता। बस रोज कोविन पर खोजते रहो। -शंभु चौधरी

शनिवार, 8 मई 2021

नोटबंदी, लॉकडाउन अब वैक्सीन

लेखक- शंभु चौधरी

12 Doctors list by SC

आज भारत सरकार की विफलता का ताजा उदाहरण सामने आया है। देश की उच्चतम न्यायालय को भारत सरकार की कार्य प्रणाली पर से विश्वास ही उठ गया। जो काम सरकार को करना चाहिए था, आज देश की अदालतों को करना पड़ रहा है। देश में लगातार हो रही मौतों व आक्सीजन की सुचारू व्यवस्था के संचालन हेतु उच्चतम न्यायालय ने आज  12 सदस्यों की एक टीम गठित कर दी, जो भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता था। अब इसका सारा नियंत्रण यह टीम करेगी। सूचना एएनआई द्वारा प्राप्त ।


सफलता या असफलता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, परन्तु मुर्खतापूर्ण और किसी स्वार्थसिद्धि या आनन-फानन में  लिए फैसलों से और जब उससे पूरा परिवार ही नहीं, समाज, देश भी प्रभावित हो तो ऐसे निर्णय ना सिर्फ घातक होते हैं इससे परिवार, समाज व देश को भी कीमत चुकानी पड़ती है।

जिस कालाधन को विदेशों के बैंकों से भारत लाने की बात थी, वह तो आज भी पांच सितारा बैंकों की तिजोरी में सुरक्षित है।

नोटबंदी

नोटबंदी को लेकर देश को यह बताया गया था कि बस अब नकली नोट, आतंकवाद, नक्सलवाद को समाप्त करने में तो मदद मिलेगी, साथ ही बड़ी संख्या में नोटों के अदला-बदली में देश को लाखों अरब रुपयों का फायदा भी होगा। नोटबंदी को लोगों ने साकारात्मक लिया। हजारों लोगों को लाईन में खड़ा होना पड़ा। कई गरीब परिवार डर कर सदमें से मर गए। पर ना तो इससे देश में आतंकवाद ठहरा, ना ही नक्सलियों पर लगाम लगाया जा सका। कलाधन और नकली नोटों का व्यापार जस का तस बना हुआ है। कालाधन का करोबार जिसमें मुख्यतः शेयर बाजार की बड़ी भूमिका होती है। उसके सूचकांक आकाश पर हैं। 

अर्थात देश का पूरा करोबार शेयर बाजार के दलालों ने हड़प लिया। मजदूरी करने वाले छोटे-छोटे व्यापारी नोटबंदी, जीएसटी, लॉकडाउन, अब करोना के कारण परेशान हैं, जबकि इस महामारी के बीच जब देश में मौत का तांडव नाच हो रहा हो, शेयर बाजार खुशी से झूम रहा है।

अर्थात देश की अर्थव्यवस्था को पिछले सात सालों में छोटे-छोटे व्यापारियों से छीन कर चंद पूंजीवादी व्यवस्था को सोंप दिया गया है।

कलाधन पर तो लगाम आज भी नहीं लगी। बैंकों का ब्याज आधा कर उन लुटेरों को जो अरबों रुपए लूट कर विदेश भाग रहें हैं उनके नूकसान की भरपाई अप्रत्यक्ष रूप से देश की जनता से किया जा रहा है।

लॉकडाउन

देश ने देखा है कि भारत के वही प्रधानमंत्री ने किस प्रकार बिना किसी पूर्व योजना के अचानक से जिस प्रकार नोटबंदी की घोषणा की थी, ठीक उसी प्रकार देश को पूर्ण लॉकडाउन की तरफ ना सिर्फ तीन महीना धकेल दिया, साथ ही भारत सरकार की अधिकृत रोजाना बुलेटिन में हिन्दू-मुस्लिम भी काफी किया गया, जिसे रोकने के लिए अंत में आर.एस.एस को सामने आना पड़ा था। लाखों मजदूर रातों-रात सडकों पर आ गए। भारतीय सेना उनकी मददगार ना बन फूल बरसाती हुई उनके जख्मों को गहरा कर रही थी। हजारों लोग विभिन्न हादसों में मारे गये, आजतक भारत का प्रधानमंत्री इस कृत्य पर ना सिर्फ चुप है। अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं ली। 

देश जब करोना के संकट से उबरने लगा था तो इस मुर्खता ने फिर चुनाव आयोग का दुरुपयोग कर चुनाव में ना सिर्फ बड़ी-बड़ी रैलियां की, सभाओं का आयोजन किया, अपनी सुविधानुसार चुनावों की तारीखें तय की। विभिन्न प्रांतों के संक्रमित लोगों को गाड़ी में भर-भर कर बिहार-बंगाल लूटने के लिए भेजा गया। पैसों, पावर, विभिन्न एजेंसियों, चुनाव आयोग, राज्यपाल, अर्धसैनिक बलों, गोदी मीडिया व राजनीतिक गुण्डों की टीम मिलकर बिहार-बंगाल में भाजपा की सरकार बनाने में जुट गई। बिहार तो किसी प्रकार बचा लिए परन्तु बंगाल की जनता को मुर्ख बनाने में मोदी की टीम असफल हो गई।


वैक्सीन

अब फिर वही गलती जो भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी,  पूर्ण लॉकडाउन के समय की थी, वैक्सीन को लेकर वही गलती को दोहरा रहें हैं। कहावत है, मुर्ख की गलती से लाखों की जान को खतरा में पड़ सकता है। 


आज फिर वही हो रहा है। देश में चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। अलग-अलग उच्च न्यायालय लगातार कड़ी टिप्पणियां कर रही है । कोई इसे नरसंहार से कम नहीं आंक रहा , तो कोई  चुनाव आयोग को इस नरसंहार के लिए अपराधी मान रही है। बिहार की निर्लज्ज सरकार को तो सेना तक बुला देने की चेतावनी देनी पड़ी तो वहीं केंद्र सरकार पर अदालत की अवमानना का मामला तक करना पड़ा। 


अब मोदी की सरकार सिस्टम को दोष दे रहें, जो 70 साल पहले नेहरु ने बनाया था। अब शायद लोगों की कब्र पर बन रहे नये विशाल प्रधानमंत्री निवास से कोई नया सिस्टम बनकर सामने आयेगा।


चुनाव के मध्य युवाओं को लुभाने के लिए अचानक से मोदीजी ने 18+ को वैक्सीन लगाने की घोषणा तो कर दी , साथ ही वैक्सीन के दाम को लेकर देश को असमंजस में डाल दिया। जो वैक्सीन केंद्र को 150/- में मिलेगा, राज्य, प्राइवेट को 400/- 600/- क्रमशः, अब कम कर 300/-, 500/-(कोवीशिल्ड) वहीं दूसरी वैक्सीन का दाम 600/-1200/- , इसे आपदा में अवसर ही तो कहा जायेगा। 


एक तरफ लोग को आक्सीजन की कमी से दम घुटने से दम तौड़ रहें हैं, तो दूसरी तरफ सरकार, दवा निर्माताओं के कमाने की सोच रही है।


आज देश में वैक्सीन की जरूरत है, विदेशी वैक्सीन की भीख भारत सरकार मांग रही है। वहीं भारत का प्रधानमंत्री को वैक्सीन दुनिया में मुफ्त में बांटते भी हमने देख लिया।


जो भी हो, आलोचक, आलोचनात्मक लेख सिर्फ़ सरकार की आंखें खोलने लिखता रहेगा। चाहे किसी की भी सरकार क्यों न हो। अच्छे काम के लिए अच्छी आलोचना होती है तो गलत निर्णय की आलोचना कड़ी, कड़वी लगेगी ही।


अब देश में वैक्सीन की कमी चारों तरफ हो गई। निर्माता भाग कर अपनी जान बचा रहा है। दवा, हवा, अब वैक्सीन की किल्लत फिर हमें मोदी की असफलता को उजागर कर रहा है। सच यह है कि भले ही इसे कितनी भी राजनीति की समझ हो, है तो गुड़-गोबर।

जयहिंद।

शुक्रवार, 7 मई 2021

मुसलमानों को सोचना है-

 

शंभु चौधरी

गृहमंत्री जी अभी भी बंगाल के सदमें से उबर नहीं पायें है। दस हजार करोड़ रुपये का जूआ इतना मंहगा पड़ेगा, गृहमंत्री जी ने कभी सोचा नहीं था। 

दीदी-ओ-दीदी 

बंगाल में अपनी कु-मानसिकता की पूरी ताकत मोदी जी और गृहमंत्री ने थोप दी थी। दीदी-ओ-दीदी बोल कर संघी विचारधारा ने बता दिया कि उसके लिए बीबी-बच्चों, औरतों के सम्मान के लिए कोई जगह नहीं है।

एक से एक हथकंडे अपनाये जाने लगे। स्थानीय विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों के द्वारा डरा-धमका कर , पैसों से खरीद कर अफवाहों और गोदी मीडिया का सहारा लेकर देश में इन लोगों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया था मानों पश्चिम बंगाल, मुसलमानों से भर गया है। जबकि बिहार में कटिहार, फारबिसगंज, किसनगंज, अररिया, आदि जिले में पिछले 15सालों में बंग्लादेशी मुसलमानों की संख्या में काफी तेजी से इजाफा हुआ है, पर देश के गृहमंत्री शुतुरमुर्ग की तरह मुंह को छुपा रखें हैं। 



इस बात से कोई इंकार नहीं की भारत के सभी प्रांतों में कट्टरपंथी मुसलमानों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है, जो ना सिर्फ भारत की संस्कृति वरण भारत की अस्मिता के लिये भी घातक बनते जा रहा है। इसी कारण देश में कट्टरपंथी व चरमपंथियों का बोल-बाला होता जा रहा है। भारत के मदरसों में शिक्षा के नाम पर बच्चों को कट्टरवाद का पाठ पढ़ाया जाना भी अन्ततः मुसलमानों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है और मुसलमानों का यह व्यवहार , भारत के हिन्दुओं को संगठित करने में बड़ी आसानी से और गुणात्मक रूप से कार्य किया है। जो इन दिनों हम देख पा रहें हैं। 


भारत में मुसलमानों की संख्या सरकार के अनुसार 20 करोड़ से ऊपर है। यदि इसे ही सही मान लिया जाए तो उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की संख्या ना सिर्फ़ बढ़ी है। जनसंख्या के हिसाब से भी पूरे भारत में अधिक है। वहीं बंगाल दूसरे स्थान पर बिहार तीसरे स्थान पर और असम चौथे स्थान पर है। यानि मुसलमानों की कुल आबादी का आधा हिस्सा इन  चार राज्यों में जीवन यापन करता है और इन चार राज्यों में से दो राज्यों में अभी भाजपा की सरकार है एवं बिहार में भाजपा समर्थित नीतीश कुमार की सरकार कार्यरत है। परन्तु देश के गृहमंत्री सहित भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं को लगता है कि इन चार राज्यों में से सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही मुसलमान रहते हैं।  झूठे फैक समाचारों के सहारे खुद देश के भाजपा की आई.टी सेल बंगाल को अशांत करने की तरह - तरह की योजनाओं को अंजाम देने में लगी है। इन दिनों सैकड़ों मनगढंत धार्मिक सहिष्णुता को तार-तार कर अपना राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने का जी तौड़ प्रयास किया गया, जो असफल भी हो गया। चुनाव में हार के बाद तो इसमें और तेजी आ गई।


भारतीय मुसलमानों को इन हालतों का अध्ययन करना जरुरी है कि क्या वे खुद के मुस्लिम कट्टरपंथी समूहों का हिस्सा बनकर हिन्दू वादी संघी कट्टरवाद को मजबूत करना चाहते हैं कि, उनको देश की राजनीति से अलग-थलग करना। 

यह तभी संभव हो सकेगा जब भारतीय मुसलमान, भारत की बहू-बेटियों की ईज्जत करें। इन दिनों कुछ प्रान्तों में मुसलमानों के द्वारा लव जेहाद के रास्ते हिन्दुओं की बेटियों को शिकार बनाया जाना कहीं न कहीं  भाजपा को राजनीति रूप से मजबूत करती है।

अब देश के मुसलमानों को सोचना है कि वह भारतीयता को स्वीकार कर अपने धर्म के कट्टर विचारधारा को दरकिनार कर खुद को नई शताब्दी में ले जाना पसंद करते हैं कि अभी भी 14वीं शताब्दी में जीना पसंद करते हैं और कट्टरवादी तत्व के हाथों का मोहरा बनना पसंद करेंगे। 

एक बात और इन दिनों देखने में आया है कि मुसलमान का एक वर्ग मुस्लिम राजनीति को अलग से सक्रिय करना चाहता है। लोकतंत्र में कोई प्रतिबंध तो नहीं है पर यही लोग साथ ही हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों को गुणात्मक रूप से मजबूत भी कर रहें हैं। भले ही वह यह ना चाहते हों।  यह मान कर चलना होगा कि क्रिया की प्रतिक्रिया होगी ही।

"भारत का संविधान धर्म की आजादी देता है, पर साथ ही धार्मिक कट्टरपंथी विचारधारा को भले ही वह किसी भी धर्म का क्यों न हो।.इसकी इजाजत कभी नहीं देता। "

परन्तु मुसलमानों के पिछले कुछ सालों के व्यवहार ने देश को मोदी-योगी जैसे लोगों को सत्ता पर बैठा दिया। 

आज देश की 70 प्रतिशत आबादी इनके व्यवहार से असहमत होते हुए भी इनको सर पर बैठा रखी है। ।

मंगलवार, 4 मई 2021

नरसंहार- मोदी-योगी-गोदी

कोलकाता: दिनांक 5  May,2021. 



जरूरी सूचना: वैक्सीन की दूसरी डोज लेने के बाद भी 15 दिनों तक सावधानी तो रखें ही। आगे भी सावधानी करें। अभी इसके डाटा उपलब्ध नहीं है कि यह कितनी रक्षात्मक है। हां दुनिया भर में इससे कोविड को कुछ हद तक नियंत्रण करने में सफलता मिली है।


पिछले 10 दिनों से देश के सभी राज्यों की उच्च अदालतों में कोरोना-19 फेज-2   ( covid-19 2nd wave) एक के बाद एक कड़ी टिप्पणियों से हमें यह सोचना पड़ रहा है कि इन हिन्दू वादी दलालों ने  देश को महज छह-सात सालों में कहां से कहां पंहुचा दिया। 

मद्रास उच्च अदालत ने कोरोना फेज-2 के लिए सीधे रूप में भारत के चुनाव आयोग को जिम्मेदार / कसूरवार ठहराते हुए टिप्पणी करते हुए पूछा की आपने जो काम किया है क्यों न हत्या का मामला आप पर दर्ज होना चाहिए? 

हांलाकि देश के कानून में इन अपराधियों पर मुकदमा करने का कोई प्रावधान सुनिश्चित नहीं किया गया है। 

वैसे ही कल इलाहाबाद उच्च अदालत ने भाजपा की योगी सरकार के कारनामों से परेशान हो चुकी है। योगी सरकार, एक दूसरे की मदद की गुहार लगाने वालों पर अपराधिक मामले ठोक रही है। परेशान लोगों को प्रसाशन की तरफ से धमकाया और डराया भी जा रहा है। 

आक्सीजन की कमी, अव्यवस्था से लोग कीड़ें-मकोड़ों की तरह गांव, शहर, अस्पतालों में मर रहें हैं। बहुत दर्दनाक हालात है पूरे उत्तर प्रदेश में,  को लेकर अदालत ने कहा 

"हम अस्पतालों में ऑक्सीजन की गैर आपूर्ति के लिए कोविद रोगियों की मृत्यु को देखते हुए दर्द में हैं, एक आपराधिक कृत्य है और उन लोगों द्वारा नरसंहार से कम नहीं है।"


यही हालात, केरल, तामिलनाडु, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात, बिहार, व महाराष्ट्र सहित कई राज्यों की है। अब बंगाल व असम में भी तेजी से कोरोना के मामले बढ़ाने लगे हैं। आंकड़ों पर नजर देना व लिखना अपराध हो चुका है।


इस बात से अब इंकार नहीं किया जा सकता कि बिहार चुनाव के पूर्व देश में हम सबने करोना को काफी हद तक नियंत्रण में कर लिया था। अर्थ व्यवस्था धीरे-धीरे पटरियों पर आने लगी थी। चुनाव की प्रक्रिया संवैधानिक जरूरी है परन्तु जिस प्रकार देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित भाजपा के तमाम नेताओं ने देश में लाखों लोगों की भीड़ जमा कर रैलियों और सभाओं का आयोजन कर रहे थे, असभ्य भाषाओं का प्रयोग कर, हिन्दुओं को भड़काकर वोटों का धूर्वीकरण कर रहें थे।  अपने राजनीतिक फायदे के लिए चुनाव आयोग का गलत इस्तेमाल करना, साईबर क्राईम (झूठी धर्म आधारित खबरों बनाना, अफवाहों को फैलाना) जैसे अपराध अक्षम्य है।  इन सब अपराधों पर चुनाव आयुक्त की चुप्पी, प्रश्न तो खड़ा करती है।

वहीं कल ही बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को निर्लज्ज बताते हुए पटना हाईकोर्ट ने कहा कि लोगों को सड़कों पर मरते हम नहीं देख सकते। पिछले 14 अप्रैल से आप कोर्ट के आदेशों की अनदेखी कर रहें है, हमें विवश न करें अन्यथा हमें सेना को बुलाना पड़ेगा। कल 6 मई को फिर सुनवाई होगी।

विशेष कर अब बात दिल्ली की कर लेते हैं। दिल्ली में भाजपा के सात सांसद है। सारे के सारे लापता हैं। केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली को जानबूझकर कर कम आक्सीजन दे रही थी, परिणाम हजारों लोगों की मौत सिर्फ दम घुटने से होने लगी। केंद्र सरकार दिल्ली सरकार पर अदालत में झूठे आरोप गढ़ती गई। जब उन आरोपों से परत उठी तो पता चला कि जिस आठ आक्सीजन प्लांट के दिल्ली में लागाने के पैसे दिल्ली सरकार को देने की बात कही गई, वह सरासर झूठ था। दरअसल केंद्र की सरकार ने ही देश के विभिन्न प्रान्तों में 150 आक्सीजन प्लांट लगाने का टेन्डर पिछले साल अपने किसी व्यापारी को दिया था। उनमें से अभी तक 33 प्लांट ही लगाये गए हैंं, 54 प्लाट लागाये जा रहें। बाकी ? जिसमें 14 में 1 उत्तर प्रदेश में, इसी प्रकार दिल्ली में 8 में 1 प्लांट लगा है। जो भी हो। सच इतना ही है कि इन प्लांट का ठेकेदार भारत सरकार है।

इसी प्रकार आक्सीजन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट को बोलना पड़ा कि केन्द्र सरकार दिल्ली को उसके जरूरत के अनुसार आक्सीजन की आपूर्ति करें अन्यथा यह कोर्ट की अवमानना मानी जायेगी। 

भगवान ही मालिक है अब

मोदी-योगी-गोदी से

लेखक-शंभु चौधरी

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

सुप्रीम कोर्ट को देश को बताना होगा कि देश कैसे चलेगा?

 सुप्रीम कोर्ट को देश को बताना होगा कि देश कैसे चलेगा?

शंभु चौधरी

आज देश में चारों तरफ लोग हाहाकार कर रहें हैं। मरने वालों की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है किसी भी राज्य की स्थिति ले लें, सब तरफ हाहाकर मचा है। योगी सरकार तो एक कदम आगे ही निकल चुकी है मदद की गुहार लगाने वालों पर एफ.आई.आर कर रही है पुलिस के द्वारा परेशान किया जा रहा है। भारत सरकार  विभिन्न सोशल प्लेटफार्म को नोटिस भेज रही है कि वे सभी सूचनाओं को हटा दे जो सरकार के  विरुद्ध है । कुल मिलाकर देश आपातकाल की तरफ बढ़ चुका है।


NCT of Delhi (Amendment) Act, 2021

क्या जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के द्वारा या किसी मुनिम के द्वारा जो केन्द्र सरकार का मुनिम है। आज से केन्द्र सरकार ने दिल्ली एनसीटी (संशोधन) अधिनियम, 2021 एक्ट दिल्ली में लागू कर दिया। ऐसे में दो महत्वपूर्ण बातों की तरफ आपका ध्यान लेना चाहूंगा।

पहला कि भारत के संविधान में ‘‘स्टेट’’ की क्या परिभाषा  दी गई है
दूसरा लोकतंत्र की प्रक्रिया में विधान-सभा के रहते राज्यपालों की क्या भूमिका होनी चाहिए।

पहला

भारत के संविधान का क्या कहता है?

अनुच्छेद 12
"परिभाषा: ‘राज्य’ इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, ‘राज्य’ के अंतर्गत भारत की सरकार और संसद तथा राज्यों में से प्रत्येक राज्य को सरकार और विधान-मंडल तथा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी हैं।"

अनुच्छेद 361-
"राष्ट्रपति और राज्यपालों और राज प्रमुखों का संरक्षण - राष्ट्रपति और किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी व उनके पदावधि के दौरान उनकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई आदेश ही जारी किया जा सकेगा।"
यहां महत्वपूर्ण शब्द है नोटिश  जिसे कोई नहीं जारी कर सकता तो दिल्ली के उपराज्यपाल की जिम्मेदारी कैसे और कौन तय करेगी?

दूसरा 
एस.आर.बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 356 और इससे जुड़े विभिन्न प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की थी। अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को इस फैसले के द्वारा रोक दिया था।  इस ऐतिहासिक फैसलों के कारण  केन्द्र सरकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार को गिरा तो नहीं सकती क्योंकि बहुमत के आंकड़ों से कई गुण अधिक का समर्थन केजरीवाल सरकार के पास है, इसलिए चोर दरवाजे से दिल्ली की जनता को परेशान करने का रास्ता अख्तियार किया है । यह लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए कितना घातक होगा समय ही बता पायेगा।

आज देश में चारों तरफ लोग हाहाकार कर रहें हैं। मरने वालों की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है किसी भी राज्य की स्थिति ले लें, सब तरफ हाहाकर मचा है। योगी सरकार तो एक कदम आगे ही निकल चुकी है मदद की गुहार लगाने वालों पर एफ.आई.आर कर रही है पुलिस के द्वारा परेशान किया जा रहा है। भारत सरकार  विभिन्न सोशल प्लेटफार्म को नोटिस भेज रही है कि वे सभी सूचनाओं को हटा दे जो सरकार के  विरुद्ध है । कुल मिलाकर देश आपातकाल की तरफ बढ़ चुका है।

देश की सभी बड़ी अदालतें दिन-रात देश के लोगो  का सुरक्षा उनके प्राणों को बचाने के लिए अपने-अपने स्तर पर आदेश भी दे रही है । पर सोचना यह कि क्या सरकार केवल इसी काम के लिए है कि वह किसे कैसे परेशान किया जाए?
आज पूरा देश पागलों की तरह एक दूसरे से मदद मांग रहा हैं कोई मदद करेगा कि नहीं यह भी उनको पता नहीं । वहीं केन्द्र की मोदी सरकार अपने दलालों के माध्यम से पूरी घटनाक्रम को भटकाने में ताकि मरने वालों की बात गौण हो जाए ।
जयहिन्द।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

आक्सिजन प्लांट का सच

 

 लेखक- शंभु चौधरी


सच क्या है-
1. इसे लगाने की जिम्मेदारी भारत सरकार के "स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (भारत सरकार)"  की सहयोगी संस्था "केन्द्रीय चिकित्सा सेवा समाज" (CENTRAL MEDICAL SERVICES SOCIETY) पास है ।
2. यह योजना प्रधानमंत्री केयर फंड के द्वारा लाई गया गई है।
3. इसका ठेका भारत सरकार ने दिया है।
4. 162 में 150 को टेंडर मुझे मिला है 12 के विषय में  केन्द्र सरकार ही बता पायेगी कब और किसे या टेंडर दिया गया है।

कल भाजपा के कई नेताओं ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर आरोप लगाया कि उसे  पिछले साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री केयर फण्ड से  8 ऑक्सीजन प्लांट लगाने के पैसे दिए थे पर उसने अभी तक 1 प्लांट ही लगाया। इस सच की खोज करने लगा तो मुझे यह परिणाम मिले।


इस ऑक्सीजन प्लांट को लगाने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (भारत सरकार)  की सहयोगी संस्था केन्द्रीय चिकित्सा सेवा समाज (CENTRAL MEDICAL SERVICES SOCIETY) 162 में से 150 ऑक्सीजन प्लांट  का टेन्डर  के द्वारा दिनांक  21.10.2020 को जारी किया गया था। जिसकी सूची निम्न प्रकार है -


1. Assam - 6, 2. Manipur - 3, 3. Meghalaya - 3,  4. Mizoram - 1, 5. Nagaland - 3,  6. Sikkim - 1,
7. Tripura - 2, 8. Himachal Pradesh - 7, 9. Uttarakhand - 7, 10. Bihar - 5, 11. Chhattisgarh  - 4,
12. Madhya Pradesh - 8, 13. Odisha - 7, 14. Uttar Pradesh - 14, 15. West Bengal - 5.
16. Chandigarh - 3, 17. Lakshadweep - 2, 18. Puducherry - 6, 19. Delhi - 8, 20. Andhra Pradesh - 5,
21.  Haryana - 6, 22. Goa - 2, 23. Punjab - 3, 24. Rajasthan - 4, 25.Jharkhand - 4, 26. Kerala - 5,
27. Telangana - 5, 28. Ladakh - 3, 29. Gujarat - 8,  and 30. Maharashtra - 10. Total -150 Units


देखें टेन्डर लिंक को-
http://www.cmss.gov.in/sites/default/files/PSAPLANTTENDERDOCUMENT.pdf


जिसमें से भारत सरकार की सूचना के अनुसार 162 ऑक्सीजन प्लांट (PSA oxygen plants) में से  33 ऑक्सीजन प्लांट ही लगाये जा सके हैं। जिसकी सूची भारत सरकार के द्वारा जारी की गई है।
33 स्थापित हो चुके हैं -
5 एमपी में,
4 हिमाचल प्रदेश में
3 प्रत्येक चंडीगढ़, गुजरात और उत्तराखंड में
2 प्रत्येक बिहार, कर्नाटक और  तेलंग्ना में
और आंध्र प्रदेश , छत्तिसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, पुदुचेरी, पंजाब और यूपी प्रत्येक में एक-एक


सच क्या है-
1. इसे लगाने की जिम्मेदारी भारत सरकार के "स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (भारत सरकार)"  की सहयोगी संस्था "केन्द्रीय चिकित्सा सेवा समाज" (CENTRAL MEDICAL SERVICES SOCIETY) पास है ।
2. यह योजना प्रधानमंत्री केयर फंड के द्वारा लाई गया गई है।
3. इसका ठेका भारत सरकार ने दिया है।
4. 162 में 150 को टेंडर मुझे मिला है 12 के विषय में  केन्द्र सरकार ही बता पायेगी कब और किसे या टेंडर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश में 14 प्लांट हैं जिसमें अभी तक मात्र एक ही लगा है। इसी प्रकार दिल्ली में  8 प्लांट की जगह अभी तक 1 प्लांट लगाया गया है । जिसमें दिल्ली सरकार का कोई संबंध नहीं है।  हां यह ऑक्सीजन प्लांट (PSA oxygen plants) भारत सरकार के द्वारा दिल्ली में लगाया जा रहा है जैसे अन्य सभी प्रदेशों में लगाया जा रहा है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि केंद्र सरकार लोगों को भ्रमित करने का काम कर रही है। खुद की जवाबदेही को दूसरे पर थोपना एवं बाद में  झूठे आरोप लगाना इनका एकमात्र उद्देश्य बन चुका है।

 
लेखक- शंभु चौधरी, कोलकाता।
Date: 25/04/2021

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

India #Covid-2

 डायरी

दूसरी तरफ देश की मोदी सरकार शून्य विहिन बातें बोल कर देश को भ्रमित करने में लगी है। एक तरफ सोशल मीडिया पर हर तरफ से दवा, वेड, इलाज, आक्सिजन की गुहार लगाने वालों की भरमार लग गई है। कई संस्था इन सूचनाओं को एक दूसरे तक पंहुचाने में मदद कर रही है पर इससे क्या होगा।



शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

जयश्रीराम’ के नाम से देश में गुण्डागर्दी ?

 जो संबोधन युगों से हिन्दुओं का अभिवादन देने व स्वीकार करने का माध्यम था आज पूरी तरह से राजनीति रूप ले चुका है। जिसका परिणाम हमें पिछले दिनों कोलकाता के एक सामाजिक कार्यक्रम में  प्रधानमंत्री की उपस्थिति में ही देखने को मिल गया।  इसके बाद जिस तरह के चित्र सोशल मीडिया में पोस्ट किये गए और अपमानजनक भाषाओं को  प्रयोग  किया गया । यह सब इस बात का सूचक है कि अब देश में ठीक वही कट्टरपनतता जन्म ले चुकी है जो अब तक पाकिस्तानी मुसलमानों का हिस्सा हुआ करती थी।

सदियों से भारतीय संनातनी धर्म के अनुयाई आपस में संबोधन में, भाई-चारे का इजहार करने में या आपस में मिलने पर एक-दूसरों को ‘‘जय श्रीराम’’ बोलकर  अभिवादन किया करते थे।  परन्तु आजकल जब से मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई है भाजपा ने इस नारे को राजनीतिक हथकण्डे के रूप में अपना लिया है। संघवादी संगठन  इस नारे का  प्रयोग  हिन्दू कट्टरवाद के प्रदर्शन के रूप में जमकर किया जाने लगा है। गौरक्षा के नाम से गुण्डागर्दी, मोब लंचिंग  से लेकर दिल्ली के दंगों के समय हो या किसान आंदोलन इस  उदघोष का प्रयोग खुल कर राजनीति रूप से होने लगा है। 

कभी भारत माता की जय ना बालेने पर मारना पिटना तो कभी ‘जय श्री राम’ बोल कर लोगों को भयभीत करना इनका एक मात्र लक्ष्य बन चुका है। राजनैतिक प्रायोजित व सत्ताधारी दल के समर्थन से जगह-जगह धमाकने, राजनीतिक विचारधारा के विरोधियों को, उनकी माँ-बहनों को अपशब्दों से संबोधित करना, ना जाने कितने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना इनका एक मात्र उद्देश्य बन चुका है। 

This picture from Bhopal (M.P) Dated 14.02.2021 Rulling 10-15 BJP Worker chanting "Jaishree Ram" and doing gundagardi like this..


जो संबोधन युगों से हिन्दुओं का अभिवादन देने व स्वीकार करने का माध्यम था आज पूरी तरह से राजनीति रूप ले चुका है। जिसका परिणाम हमें पिछले दिनों कोलकाता के एक सामाजिक कार्यक्रम में  प्रधानमंत्री की उपस्थिति में ही देखने को मिल गया।  इसके बाद जिस तरह के चित्र सोशल मीडिया में पोस्ट किये गए और अपमानजनक भाषाओं को प्रयोग किया गया । यह सब इस बात का सूचक है कि अब देश में ठीक वही कट्टरपनतता जन्म ले चुकी है जो अब तक पाकिस्तानी मुसलमानों का हिस्सा हुआ करती थी।

इन तथाकथित ‘जयश्रीराम’ के नाम से देश में गुण्डागर्दी करने का जैसे इनको सरकारी लाइसेंस मिल चुका हो, पर भारत का संविधान इस  बात की इजाजत  इनको कदापी नहीं देता कि वे धर्म की आढ़ में राजनीति करें। सभी धर्मावलम्बियों को अपने-अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता है। उन पर किसी अन्य विचारधारा को थोपना या उनको परेशान करना किसी भी रूप में संवैधानिक नहीं माना जा सकता है। 

यह इस बात को प्रमाणित करता है कि आज की भाजपा देश के किसी भी धर्मावलंबियों की पार्टी नहीं है। जिसे अभी किसान आंदोलन के समय हमें देखने मिला जब पंजाबियों को उनके देश के प्रति सेवा को एक सिरे से नकार दिया गया।   मानो भाजपा अब राष्ट्रीय विचारधारा की आढ़ में एक उग्रवादी विचारधारा की पोषक बन चुकी है जो हर बात में अपने विरोधी विचारधारा को मामने वालों पर धार्मिक हमला करने से भी नहीं चुकती, भले ही वह आंदोलन या राजनीतिक दल किसी भी धर्म के लोगों का क्यों न जुड़ा हो ।

यह खेल कितना खतरनाक  है जो हमें बंग्लादेश की उत्पति की याद दिलती है । पाकिस्तान एक धर्म के  होते हुए भी दो हिस्सों में बंट गया, यह जो खेल भाजपा खेल रही है उसका आने वाले दिनों में कितने गंभीर परिणाम होगें यह मेरे सोच के परे है। 

राजनीति में सत्ता का आना-जाना लगा रहता है। भारतीय लोकतंत्र की यही खुबसूरती है कि  कई बार असमाजिक तत्व भी चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंच जाते हैं।  अपराधिक रिकोर्ड वाले तो लोकसभा या विभिन्न राज्यों के विधान सभाओं  में भरे पड़ें हैं। कोई भी राजनीति दल इन अपराधिक तत्वों से अछुता नहीं है। 

अदालतों की कई बार कड़ी टिप्पणियाँ इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में ऐसे तत्वों को कोई जगह नहीं है,  फिर भी राजनीति दलों की मजबूरी है कि वे इनके बिना चुनाव लड़ने में खुद को असमर्थ पाते हैं।   परन्तु पिछले दो कार्यकाल में  सोलहवीं व सत्रहवीं लोकसभा इन तत्वों के साथ-साथ हिन्दूधर्म के अनुयायियों के कट्टरपनतता का अदभूत मिश्रण देखने को मिलता है। 

भारत में विभिन्न धर्म के लोग बड़ी संख्या में बास करते हैं। जिसमें मुसलमानों के अलाव भी पंजाबी, जैन, बुद्ध व हिन्दुओं में कई  प्रजातियां जो कोई ‘राम’ को मानती है तो किसी के लिये कृष्ण लोकप्रिय ।  असम से लेकर दक्षिण भारत तक इसके स्वरूप  में तेजी से बदलाव देखा जा सकता है। जो लोग आज ‘जय श्रीराम’ को राजनीतिक रूप में इस्तमाल करने में लगे हैं उनको यह तो पता ही होगा  कि भारत में सिर्फ ‘राम’ के अनुयायी नहीं हैं। मुसलमानों को छोड़ कर भी बहुत सारे अन्य धर्म के मानने वाले लोगों की बहुतायत भी है इस देश में । _shambhu Choudhary

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

किसानों की हत्या

आज देश के किसान सड़कों पर हैं,

एक दिन गांधीजी,

किसानों की समस्या को लेकर
अंग्रेजों से लड़ाई लड़े थे
आज उसी के पुत्रों ने मिलकर
किसनों की हत्या कर डाली । -शंभु

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

लघु कथा: डिग्री के ताने

‘‘आपको ही जल्दी लगी थी इसकी शादी करने की, पोता-पोती से खेलने की । कुछ तो शर्म करो अपने पाप पर पर्दा डाल कर सारा दोष बेटे पर लाद दिए ।’’ 

श्यामा को दो बच्चे पढ़ते-पढ़ते ही हो गए, मां-बाप ने सोचा कि जल्दी शादी कर देगें तो काम में लग जाएगा, पर हुआ कुछ उल्टा ही ।

श्याम (घर का नाम श्यामा) की शादी को अभी दो साल ही हुए होंगे, पर इस दो साल में उसकी जिन्दगी नरक के समान होती चली गई, ऊपर से दो बच्चों की जिम्मेदारी अलग से। रोज मां-बाप के ताने सुन-सुन कर श्याम के कान पकने लगे थे । 

प्राइवेट स्कूल की एक नौकरी बड़ी मुश्किल से मिली भी तो सैलरी इतनी कम की बस काम चलाया जा सकता था । अच्छी नौकरी मिल नहीं रही थी जो मिल रही थी उससे परिवार के साथ बहार जाना व रहाना, गुजर-बसर करना भी मुश्किल होगा। घर में कम से कम खेत का अनाज तो मिल जाता है खाने को। यह सब सोचकर श्याम की पत्नी चुप ही रहती । 

सोचती एक दिन हमारे अच्छे दिन जरूर आयेंगे।

आज सुबह की बात, बार-बार श्याम के दिमाग में घुम रही थी ।

उसके पापा इन दिनों रोजाना उसको और उसकी बीबी को ताना कसने लगे -

बात-बात में बड़ा आया है ‘‘भीख मांग लुंगा - भीख मांग लुंगा’’ पढ़ा-लिखा कर तुमको बड़ा किया कि मां-बाप का सहारा बनेगा, पर खुद के बीबी-बच्चों को भी संभाल लो तब समझूं  .... 

अरे काम नहीं करना था,  तो पढ़ा किस लिए?  स्कूल की चार टके की नौकरी से एक आदमी का पेट नहीं भरेगा तुम तो चार हो, फिर थोड़ा सांस लेते हुए काम करना ही नही था, तो दो-दो बच्चे करने को किसने कहा था ? इनको खिला नहीं सकते तो बच्चा पैदा ही क्यों किए ? 

हमारी तो जैसे-तैसे कट जाएगी - माँ-बाप को ख्याल तो दूर की बात अपने बच्चों को लेकर कहीं जाता भी नहीं... यह कह कर रामप्रसाद जी हाँफने लगते हैं । 

श्यामा की पत्नी जल्दी से पानी का एक ग्लास लेकर आई उनको देते हुए बोली ‘‘पापा जी थोड़ा आराम कर लीजिए ।’’ 

बहु के हाथ से पानी का ग्लास लेते हुए- "बेटा तू मेरी बात का बुरा मत मानना। मैंने अपने साथ तेरा भी भविष्य खराब कर दिया। तू ही इस नालायक को कुछ समझा । पानी पीते हुए "

मैं तो जलती लकड़ी हूँ, कब बुझ जाऊँगा कुछ पता नहीं, तेरे बाप को बड़े सपने दिखाये थे मैंने, अब किस मुँह से आंख मिलाऊँगा ?

तभी दरवाजे के चौखट से रामप्रसादजी की पत्नी ने अपने सन्नाटे को तौड़ते हुए बीच में बोली -

‘‘आपको ही जल्दी लगी थी इसकी शादी करने की, पोता-पोती से खेलने की । कुछ तो शर्म करो अपने पाप पर पर्दा डाल कर सारा दोष बेटे पर लाद दिए ।’’ 

लड़की के बाप ने चारा क्या डाला बस लगे बेटे को बेचने, कितना मना किया था इसको काम पर लग जाने दो फिर कर लेना शादी । पर किसी की सुनते ही कब हो जिन्दगी भर दूसरों को दोष देते आये। 

कभी अपनी गलती को भी देख लिए होते तो आज शमा की जिन्दगी बर्वाद नहीं होती। अब किसी के साथ सुलाओगे तो बच्चा तो होगा ही न ! तुम क्या सबको अपनी तरह समझते हो क्या शादी के 5 साल तक मेरे से मिलने से भी डरते थे ।

श्यामा की माँ बहु के हाथ उसका बच्चा थमाते हुए बोली - ‘‘बहु तू अंदर जा देख बबुआ कितना भूखा हो गया’’

बहु के अंदर जाते ही श्यामा की माँ लगी रामप्रसाद जी का कच्चा चिट्ठा खोलने । दहेज का लालच जितना कर लो काम तो बेटे की कमाई ही आएगी, एक मोटर साईकिल से पेट नहीं भरने वाला । 

जब तक दिमाग की सोच नहीं बदलोगो तब तक बच्चे को कोसते रहो।

मानो श्यामा के पक्ष को मजबूती से रखने माँ खड़ी हो गई थी । माँ का हृदय जो ठहरा, बेटा कितना भी नालायक्र क्यों न हो, माँ उसका बचाव करेगी ही।


आज रात श्याम बिस्तर पर काफी बेचैन था, पत्नी ने उसके सर पर हाथ रखा तो देखा उसको हल्की बुखार भी है। उसने श्याम को सहारा दिया, हिम्मत बंधाई बोली आप किसी दूसरे शहर की नौकरी खोजो, 

मैं आपके साथ रहूंगी। आप बोले तो पापा से बात कर लेती हूँ उनके जान-पहचान से कोई नौकरी मिल जाए ।

श्याम एक बार उठा, अपनी डिग्री को खोल कर देखने लगा ।

सोच रहा था क्या यह डिग्री कभी कुछ बोल पायेगी कि ऐसे ही ताने सुनाएगी ?

लेखक - शंभु चौधरी, कोलकाता।

शनिवार, 7 नवंबर 2020

जो बाइडेन A sleepy Joe...

बधाई!!!

डोनाल्ड ट्रम्प जिसे ‘sleepy Joe’ कहते हैं। आज वह चंद घंटों के बाद ही अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बनने की तैयारी कर रहे होगें।  
अमेरिका का अगला 
राष्‍ट्रपति बनने के करीब
"जो बाइडेन"
सन् 1942 में जन्मे जो बाइडेन का गृहनगर, स्क्रैंटन जहां  वे ग्रीन रिज पड़ोस में पले-बढ़े । वे बचपन से ही काफी साहसी हैं। उनके लड़कपन के पलायन में एक गर्म कोयले के ढेर पर चढ़ना और भारी मशीनरी के नीचे भागना शामिल था। 
बिडेन को हकलाने की भी आदत है, उनके स्कूल के एक शिक्षक ने उनका मजाक उड़ाने के लिए ‘‘बीआई ब्लैक ब्लैकबर्ड’’ नाम गढ़ा। बिडेन ने इस अपमान को बहादुरी से समना किया और अच्छे से बोलना सिख लिया ।

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

मेरे ही स्वरूपों को.. - अंकिता सिंह, कोलकाता।

मत कहो देवी अपने मुख से

क्यूकि और सहा नहीं जाता है

मेरे ही स्वरूपों को

हर पल रूलाया जाता है।


मत दो प्रलोभन अपनी श्रद्धा का

अपनी भक्ति, अपनी पूजा का

ये सब आडम्बर लगते हैं

ऐसा लगता है जैसे

मुझे रिझाया जाता है ।

मेरे ही स्वरूपों को

हर पल रूलाया जाता है ।


"मत करो गर्व अपने पराक्रम का

अपनी वुद्धि और अपनी मान का

ये सब क्षणिक होते हैं, पलभर में नष्ट होते हैं,

मेरे द्वारा तुमको आज, यही सिखाया जाता है

मेरे ही स्वरूपों को, हर पल रूलाया जाता है ।"


मत करो गर्व अपने पराक्रम का

अपनी वुद्धि और अपनी मान का

ये सब क्षणिक होते हैं, 

पलभर में नष्ट होते हैं,

मेरे द्वारा तुमको आज

यही सिखाया जाता है

मेरे ही स्वरूपों को

हर पल रूलाया जाता है ।


पुरुष बनकर मान रखो तुम पुरुषार्थ का

कार्य करो वह, जो हो जग कल्याणार्थ का,

मेरे मन को तो, ये ही सब भाते हैं

पाते हैं मेरी कृपा, जो इसे निभाते हैं

इन पथ पर चलकर ही

मुझे पाया जाता है

मेरे ही स्वरूपों को

हर पल रूलाया जाता है ।

______


रविवार, 18 अक्तूबर 2020

क्रांति की आवाज... -शंभु चौधरी

 


आज भारत में फिर जगेगी क्रांति की आवाज है,

वही ‘बिहार’ फिर जगा है, 

लेकर हाथ में मशाल है।

इसी भूमि पर जन्म लिये थे,

वीर कुवंर, गांधी, सुभाष और जयप्रकाश है।



                

                            कुछ गद्दारों ने मिलकर,

                            किया ‘बिहार’ बर्बाद है। 

                            कमर तौड़ डालो उन

                            गद्दारों का, 

                            जो बात-बात में करते कहीं,

                            हिन्दू-मुस्लीम,

                            कहीं राजपूत-भूमियार,

                            कहीं कुर्मी और चमार है।


इनका धर्म जो पूछो तो,

ये हैं - सारे के सारे गद्दार

ना तो इनका  धर्म है कोई,

ना इनका कोई गांव है।

ना इनका दोस्त है कोई,

ना इनका कोई परिवार है।

झूठ-फरैब, चलाकी-मक्कारी,

जुमला और बेईमानी

बात-बात में भ्रमित करना

इनका बस यही व्यवसाय है।


                            आज मौका है पलट के मारो

                            पैदल जिसने दौड़ाया था हमको,

                            उसको, दौड़ा-दोड़ा के मारो

                            जिसने हमारा रोजगार जो छिना

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जिसने हमारे बच्चों को अनाथ किया,

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जिसने हमारी फसल को छिना

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जिसने हमको भूखा मारा,

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जिसने हमको सड़कों पर प्यासा मारा,

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जिसके मुह में आवाज नहीं थी,

                            जो बरसा रहा था भूखों पर फूल

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जो लूट रहा है बहनों की इज्जत।

                            उसको अपने वोट से मारो।

                            जो मार रहा है गोली हम पर

                            उसको अपने वोट से मारो।


आज भारत में फिर जगेगी क्रांति की आवाज है,

वही ‘बिहार’ फिर जगा है, 

लेकर हाथ में मशाल है।

इसी भूमि पर जन्म लिये थे,

वीर कुवंर, गांधी, सुभाष और जयप्रकाश है।

-शंभु चौधरी

रविवार, 27 सितंबर 2020

भारतीय मुद्रा का चलन

भारतीय मुद्रा का चलन

फूटी कौड़ी - कौड़ी

कौड़ी - दमड़ी

दमड़ी - धेळा

धेळा - पाई

पाई - पैसा

पैसा - आना

आना - रुपया

256 दमड़ी - 192 पाई - 128 धेळा

4 पैसा - एक आना

8 पैसा - दो आना

6 पैसा - चार आना

इसी प्रकार चार आना, आठ आना, बारह आना औ सौलह आना

16 आना या 64 पैसे का / एक आना 1/16 - एक रुपया 

3 फूटी कौड़ी - 1 कौड़ी

10 कौड़ी - 1 दमड़ी

2 दमड़ी - 1 धेळा

1.5 पाई - 1 धेळा

3 पाई - 1 पुराना पैसा तांबा का पैसा

इस प्रकार एक रुपये में 192 पाइयाँ होती थीं ।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

प्रवासी प्रान्तों के साहित्य व संस्कृति में कितना योगदान किये?

 यह बात सही है कि मारवाड़ी समाज विकास मूलक,समाजसेवा के बहुत से कार्य करता रहा है, परन्तु यह बात भी उतनी ही कटु सत्य है कि अब इस समाज में समाज सेवा का रोजगार चल पड़ा है। हर तरफ एक समाजसेवा की दुकान ही खुल चुकी हो, रोजना महानगरों के हिन्दी समाचार पत्र इन सेवा कार्यों से भरा पड़ा है, मानो सेवा के नाम पर विज्ञापन का कारोबार चल रहा हो। हमें यह बात आज सोचनी होगी, कि इन सेवा कार्यों से मारवाड़ी समाज चाहता क्या है? पिछले कुछ वर्ष पूर्व  कोलकाता के एक समाजसेवी ने खुद को चांदी में तुलवाने का नाटक रचा, उनकी समाजसेवा करोड़ों में खरीदी और बेची जाती है। समाज की कई संस्थाओं के लेखा-जोखा का काई अता-पता नहीं, धन का क्या इस्तेमाल हो रहा किसी को कुछ पता नहीं, जो जहां चिपक गया, वो उस संस्था को छोड़ने का नाम ही नहीं लेता, वो ही समाज में एक मात्र ईमानदार समाजसेवी है, दूसरे लोग संस्था में यदि किसी प्रकार आ गये तो ऐसे लोग पुनः एक नई संस्था बना लेते हैं। मारवाड़ियों में दान देने की भावना है, बस यह धन कौन पहले ले, इस बात की समाज में दौड़ चल रही है। जिसका जितना बड़ा नाम उसके यहां उतनी ही बड़ी लाइन लगी है। पहले के लोग समाजसेवा में क्या देते थे इस बात का किसी को कानों-कान भी खबर नहीं होती, आज समाज के समाजसेवी लोग दान देने से पहले अपना नाम चाहते हैं। शादी या अन्य समारोह में समाज सड़क पर नाचकर या स्वागत समारोह के नाम पर अपनी वैभवता का प्रदर्शन कर रहा है, कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं, मारवाड़ी समाज का समस्त वर्ग छोटा हो या बड़ा, सभी एक ही हमाम में नहा रहें हैं।

यह बात सही है कि हमें ऐसी बात नहीं करनी चाहिये जो इतर समाज को बोलने का हम ही मौक़ा दें, परन्तु हम कब तक इस तरह बच पायेंगे? हम समाज की बात नहीं सोचते, केवल अपने फायदे के लिए कुछ भी कर जाते हैं, जब कोई मारवाड़ी किसी इतर समाज की जमीन लेकर उस पर मकान बनाता है, उसके सामने ही वह उस जगह को लाखों में बैच रहा होता, और उसे दाम देने के नाम पे कानूनी दस्तावेज दिखाता हो, या पुलिस-थाने की धमकी देता हो तो, पैसे के बल पे कानून साथ तो दे देता है, परन्तु समाज यह बात भूल जाता है कि साथ देने वाला भी इतर समाज का ही होता है, और जब वह घर जाता है तो उसके मन में मारवाड़ी समाज के प्रति केवल घृणा ही षेश रह जाती है। समय-समय पर यह घृणा ही उनके शब्दों से उजागर होती है।

मारवाड़ी समाज यदी यह सोचता है कि उसे इन बातों से कोई लेना-देना नहीं तो उसे आने वाले दिनों में हिन्दुस्तान का कोई कानून नहीं बचा पायेगा। हमको किसी के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले अपने घर को भी तलाशना होगा, कि हमारा समाज इसके लिये किस हद तक जिम्मेदार है, और है भी कि नहीं? हमने बंगाल, असम, उड़ीसा या अन्य प्रवासी प्रान्तों के साहित्य व संस्कृति में कितना योगदान किये, यह बात किसी से बोलने की नहीं, केवल और केवल धन बटोरने के हमने कुछ भी नहीं किया, जो कुछ पूर्वजों ने किया आज हम उन्हीं के बदौलत बचे हुए हैं, नहीं तो कब का बोरिया-बिस्तर समेट कर राजस्थान जाना पड़ता। हमें किसी की भावना के साथ खिलवाड़ करने का कोई हक नहीं बनता।

परन्तु समाज का हर तबक़ा आज हर कदम पे इस तरह की हरकत करता पाया जा रहा है, इसमें समाज के ही कुछ मीडिया कर्मी इनका सहयोग करते पाये जातें हैं, समाज को समय रहते इन बातों पर सोचना होगा। आज हम सबके सामने वक्त है, कि हम सोच सकें, यदि समाज अभी नहीं चेता तो हमें इस तरह की मानसिकता का बार-बार शिकार होना पड़ सकता है। जो किसी भी खतरनाक परिणाम का सूचक बन सकता है। लेख प्रकाशित - समाज विकास, कोलकाता, अंकः  अप्रैल 2008  लेखक - शंभु चौधरी

गुरुवार, 4 जून 2020

Hamne Jag Ki Ajab Tasveer Dekhi...

Hamne Jag Ki Ajab Tasveer Dekhi
Song by Kavi Pradeep

 

बुधवार, 3 जून 2020

राजस्थानी कहावत कोश


राजस्थानी कहावत कोश

संपादकः भागीरथ कानोड़िया, गोविन्द अग्रवाल ।
पुस्तकाल पुस्तक संख्या 79973
साभार: राजकीय महाविद्यालय पुस्तकालय, कोटा (राजस्थान)
प्रथम प्रकाशन: पंचशील प्रकाशन, फिल्म कालोनी, जयपूर- 302003
संक्षिप्त इंटरनेट प्रकाशन:- 
शंभु चौधरी, कोलकाता के द्वारा श्रद्धेय भागीरथ कानोडिया व श्रद्धेय गोविन्द अग्रवाल की स्मृति में।



जननी जणै तो भक्त जण, कै दाता कै सूर ।
नातर रहजे बांझड़ी,  मनी गंवाजे नूर  ।। 


राजस्थानी कहावत कोशयह कहावत राजस्थान के शौर्य की कहानी बयान करती है। उस समय राजस्थान में मुसलमानों ने आतंक  फैला दिया था। मुगल शासक घर की माँ’ बहूओं - बेटियों को उठा के ले जाते थे। राजस्थान के हर घर में मुसलमानों का आतंक था। घर-घर में शौर्य की गाथाएं रची जा रही थी। मुसलमानों ने चारों तरफ से भारत को गुलाम बना लिया था। उस समय संचार का उतने साधन भी नहीं थे। तब इस प्रकार के लोकोक्तिओं के माध्यम से संदेश का प्रसारण किया जाता था। इस लोकोक्ति में एक औरत दूसरी औरत ( राजस्थान में औरत को लुगाई बोला जाता है।) को कहती है। या तो तुम बांझ ही रहना, समाज की इज्जत मत खोना, तुम ऐसी योग्य संतान जन्म देना जो सबकी रक्षा कर सके। जननी - गर्भवती मां, जणै - जन्म देना, कै दाता - सबकी भलाई करने वाला, कै सूर - वीर पुरुष जो मुगलों से लड़ सके।


नोट: उपरोक्त पुस्तक लॉकडाउन के मध्य नेट के माध्यम से मेरे प्रकाश में आई, चुंकि मैं स्व. भागिरथ कानोडिया जी के कार्य से जिनका ‘‘भारतीय भाषा परिषद’’ की स्थापना में उनके योगदान व उनकी विभिन्न सामाजिक व साहित्यि सेवाओं से परिचित रहा हूँ व साथ ही स्व. गोविन्द अग्रवाल जी के राजस्थानी साहित्य को पढ़ने का भी अवसर मुझे मिला है, इसलिए मेरा यह दायित्व बन जाता है कि इस कार्य को आप विज्ञ-पाठकों तक पंहुचा दूँ । मेरी पूरी क्षमता भी नहीं कि संपूर्ण कहावतों को कम्पोज कर सकूँ , फिर भी जितना संभव हो सका, मैं यहाँ मुख्य-मुख्य प्रचलित कुछ कहावतों को देने का प्रयास किया हूँ । हांलाकि इस पुस्तक को प्रकाशित हुए काफी लंबा अरसा निकल चुका है अतः कहीं-कहीं आज के भावार्थ को समझने के लिए नये शब्दों को जोड़ दिया हूँ। कई मुहावरों को दोहे के रूप में कहा गया है तो कई मुहावरों के भाव लघुकथा पर भी आधारित है । राजस्थान में बरसात को लेकर कई कहावतें बनी है ।  जैसे - ‘‘अम्मर पीळो, मे सीलो - आसमान का रंग पीला पड़ने से वर्ष की संभावना कम हो जाती है’’ या ‘‘अम्मर रातो, मे सीलो - वर्षा ऋतु में आसमान का रंग में लालीमा छाई हो तो वर्ष की प्रवलता हो जाती है’’ या फिर ‘‘अम्मर हरियो, चुवै टपरियो (छत से पानी का टपटपाना) - वर्षा ऋतु में आकाश का हरापन सामान्य वर्षा का द्योतक माना गया है। ’’ दरअसल इसे कहावतें नहीं कह कर इसे लोकोक्ति कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ।  इसी प्रकार माह के नाम से भी कई कहावतें बनी है । जैसे - असाढ चूक्यो करसो अर डाल चूक्यो वांदरो - आसाढ़ में खेती से चुकना जैसे बंदर का डाली पकड़ने से चूक जाना, अर्थात समय पर चूक जाने से पश्चताना । असाढां सुद नौमी, घण बादल घण बीज, कोठा खेर खखेरेल्यों, झोली राखौ बीज । आषाढ शुक्ल नवमी को यदि आकाश में बादल और बिजली  खूब हो तो कोठों में भरे अनाज को झाड़-पौछ के बेच डालो । केवल खेत में बोने के लिए बीज रख लो ।  आसोजां में मोती बरसै - आश्विन मास में होने वाली थोड़ी वर्ष भी खेती के लिए बड़ी मूल्यवान होती है। आदि । इसी प्रकार लोककथा को भी मुहावरों में प्रचलित किये जाने की परम्परा राजस्थानी भाषा में काफी प्रयोग किया गया है । उदाहरण के लिए - ‘‘इन घर आही रीत, दुरगो सफरां दागियो । - यह कहावत मारवाड़ के राठौर वीर दुर्गादास से जुड़ी है । दुर्गादास ने मारवाड़ राज्य की काफी सेवा की लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों के चलते उसे राज्य से निकाल दिया गया और मृत्यु हो जाने पर उनका अंतिम संस्कार ‘सफरा नदी’ के तट पर कर दिया गया । यानि इस घर की यही रीत चली आई है वफादार को निकाल दो ।’’

इस पुस्तक का प्रकथन व भूमिका का संपूर्ण भाग विद्याथियों व शोधकर्ताओं के लिए नीचे दे दिया हूँ साथ ही प्रकाशक तथा पुस्तक उपलब्ध पुस्तकालय का पूरा विवरण मूल प्रति का पीडीएफ फाइल का लिंक व अन्य सभी जानकारी प्रथम भाग में ही दे दी गई है जिससे आपको पुस्तक देखने व पढ़ने का अवसर आसानी से मिल जाए ।  
- शंभु चौधरी, कोलकाता  
दिनांक 03 जून 2020 



आमुख :

लोक संस्कृति शोध संस्थान, नगर-श्री, चुरू के यशस्वी लेखक श्री गोविन्द अग्रवाल ने एक ओर महत्वपूर्ण कृति साहित्य-जगत को प्रेषित की है । यह है ‘राजस्थानी कहावत कोश’ ।
कहावत या लोकोक्ति लोक-क्षेत्र की अपूर्व वस्तु है ।  रेवरेंड जेम्स लौंग ने सन् 1875 में  Oriental Proverbs  में लिखा था - ‘‘ लोकोक्ति या कहावत नीचे गहराइयों से उछाली हुई स्फुलिंग है ।’’ लार्ड बेकन ने लिखा है कि ‘‘ किसी जाति की प्रतिभा, आत्मा और वाक्-वैदग्ध्य उसकी लोकोक्तियों में से उद्घाटित होता है ।’’
लौंग की पुस्तक के ग्यारह वर्ष बाद सन् 1886 में प्रकाशित एस. डब्ल्यू. फैलन की पुस्तक, A Dictionary of Hindustani Proverbs की भूमिका में टेम्पल महोदय ने लिखा कि,
‘‘स्पेन की तरह भारत भी कहावतमय वार्तालापी देश है । कहावतें प्रमाण भी हैं एवं उनका उपयोग निरन्तर होता है और अनंत होता है। यहां के निवासी कहावतों का उपयोग दैनिक बात-चीत में, वाणिज्य-व्यवसाय में सामाजिक पत्राचार में और जीवन की विविध प्रवृत्तियों में, यहाँ तक कि न्यायालयों में भी करते रहतें हैं ।’’
इसमें संदेह नहीं कि भारत कहावतों का देश है । इन कहावतों का पहला संग्रह भी फैलन महोदय ने ही प्रस्तुत किया । फैलन महोदय के उक्त कहावत कोश को इधर सन् 1968 (मार्च) में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने देवनागरी लीपि में प्रस्तुत किया । इसके प्रकाशकीय वक्तव्य में श्री बालकृष्ण केसकर महोदय ने बताया है कि फैलन के पहले इस प्रकार की कोई कृति हिन्दी भाषा के संबंध में मौजूद नहीं थी । यह स्मरण रहे कि फैलन ने इस कोश में मारवाड़ी, पंजाबी, मराठी, भोजपुरी और तिरहुती कहावतों, प्रचलित वाक्य-खण्डों, सूत्रों एवं नीति-वाक्यों का संग्रह किया । इस प्रकार बहुत से तथ्य जीते चले जाते हैं । जिस इलाके में कहावत प्रचलित है, कई बार उसके इतिहास, रीति-नीति पर इन कहावतों, मुहावरों से नई रोशनी पड़ती है । 
फैलन के बाद इस ग्रंथ का संपादन और परिशोधन कप्तान आर.सी. टेम्पल महोदय ने किया । उन्होंने दिल्ली निवासी लाला फकीरचंद वैश की सहायता ली, जो बंगाल सरकार के प्रथम उर्दू सहायक अनुवादक थे ।
यह ‘कोश’ अकारादि क्रम से प्रस्तुत किया गया है । इस हिन्दी संस्करण का संपादन हिन्दी लोक-साहित्य के जाने-माने विद्वान् श्री कृष्णानंद गुप्त ने किया है । तो, फैलन महोदय का यह कोश हिन्दी-हिन्दुस्तानी कहावतों का पहला कोश है । 
इसमें कोई संदेह नहीं कि फैलन ने मार्ग-दर्शक कार्य किया । इसके बाद हिन्दी क्षेत्र में ही बहुत काम हुआ है, यद्यपि इस क्षेत्र अभी बहुत करना शेष है ।
राजस्थान भी इस क्षेत्र में पीछे नहीं रहा और राजस्थानी कहावतों के कतिपय संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। साथ ही यह बात भी ध्यान आकिर्षित करती है कि राजस्थान के ओर भी कई क्षेत्र अभी ऐसे पड़े हुए हैं जो किसी संग्रहकर्ता की बाट जोह रहे हैं जैसे मेवाती बोली की कहावतें, जयपुरी की कहावतें, शेखावाटी की कहावतें, भरतपुर- करौली की कहावतें आदि-आदि ।

राजस्थानी कहावतों पर प्रथम शोधकर्ता विद्वान् डॉ. कन्हैयालाल सहल से सभी परिचित है । अब यह ‘राजस्थानी कहावत कोश’ पाठकों के सामने है । इसके संपादक है श्री (अब स्व.) गोविन्द अग्रवाल एवं भागीरथ कानोड़िया । यों तो श्री भागीरथ कानोड़िया जैसे लोक-वार्ता और लोक-साहित्य के महान् धनी का आशीर्वाद भी मिल जाता तो भी कार्य की संपन्नता में चार चांद लग जाते, किन्तु यहां तो वे स्वयं भी एक संपादक हैं, अतः इसमें संदेह के लिए स्थान नहीं रहा कि कोश बहुत उपयोगी सिद्ध होगा ।

फिर, श्री गोविंद अग्रवाल स्वयं लोक-साहित्य और इतिहास के क्षेत्र में बहुत उपयेगी कृतित्व दे चुके हैं और बहुत यश अर्जित कर चुके हैं । इस कोश का काम उन्होंने एक संपादक के रूप में संपन्न किया है, यह एक और ठोस उपलब्धि उनके यश-बर्द्धक कार्यों में जुड़ी है ।

इनका यह कार्य ऐसा है कि वस्तुतः इसे किसी भूमिका की आवश्यकता नहीं थी । इस कोश में 3209 कहावतें एवं लगभग 350 संदर्भ कथाएँ भी यथा-स्थान दी गई है। ये संदर्भ कथाएँ इस कोश की उपयोगिता को और बढ़ा देती है । साथ ही जिस कहावत के रूपान्तर या पाठान्तर मिलते हैं, वे भी दे दिये गये हैं । अर्थ भी सरल भाषा में दिये गये हैं । इस प्रकार संपादकों ने इसे सर्वतोभावेन उपयोगी बनाने का प्रयत्न किया है । मेरी दृष्टि में यह अभिनंदनीय कार्य है ।
मुझे पूरा भरोसा है कि इस कोश का अच्छा स्वागत होगा । 
- डॉ. सत्येन्द्र

दो शब्द

कहावतें या लोकोक्तियां अत्यन्त प्राचीन काल से ही संसार की विभिन्न भाषाओं में चलती आ रही हैं एवं इनका क्षेत्र बड़ा व्यापक रहा है । भारत के अन्य प्रदेशों की तरह राजस्थान में भी कहावतों का विपुल भण्डार है। ये कहावतें बड़ी सजीव तथा सार्थक हैं और देश-विदेश की किसी भी भाषा की कहावतों से होड़ लेने में समर्थ हैं।
राजस्थान शताब्दियों तक विभिन्न राजनीतिक इकाइयों में बटा रहा है, अतः स्थान एवं बोली भेद के कारण इन कहावतों के स्वरूप में थोड़ा-बहुत अंतर अवश्य परिलिक्षित होता है । प्रस्तुत संग्रह में मुख्य रूप से राजस्थानी कहावतों के चूरू एवं शेखावाटी क्षेत्र में प्रचलित स्वरूप को ही लिया गया है ।
इस संग्रह में खेती-पाती, व्यापार-वाणिज्य, खान-पान, वेश-भूषा, पर्व-त्यौहार, रीति-रिवाज, पशु-पक्षी, घर-परिवार एवं देश व समाज आदि पहलुओं से संबंधित कहावतें हैं जिनमें मानव-जीवन के कड़वे-मीठे अनुभव समाये हुए हैं ।
सुदीर्घ काल से ये कहावतें लोक-मुख पर आसीन रह कर ही पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी मंजिलें तय करती आ रही हैं । लेकिन अब इनका मार्ग अवरुद्ध होने लगा है और ये तेजी से विस्मृति के गर्त में समाती जा रही है । आधुनिक शिक्षा-प्रणाली के कारण आज का छात्र एवं युवा वर्ग इन कहावतों से कटता जा रहा है । पिछली पीढ़ी को याद हैं, उतनी भावी-पीढ़ी को याद नहीं रहेंगी । इसलिए लोक-मुख पर अवस्थित जितनी भी कहावतें लिपिवद्ध हो सकें उतना ही श्रेयकर है।
राजस्थान के जो लोग इस प्रदेश को छोड़कर अन्यत्र चले गये हैं और वहीं बस गये हैं वे भी इन कहावतों के माध्यम से राजस्थान की धरती एवं यहां के जन-जीवन के साथ अपना संपर्क बनाये रख सकेंगे, राजस्थान की स्मृतियों को संजोये रख सकेगें, ऐसी आशा है।
इन्ही सब बातों को दृष्टिगत रखते हुए यह ‘राजस्थानी कहावत कोश’ प्रस्तुत किया जा रहा है । यदि यह आंशिक रूप में भी अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सका तो हम अपने प्रयत्न को सफल समझेंगे ।
प्रस्तुत कहावत कोश में 3209 कहावतें दी गई हैं एवं अधिकांश कहावतों के सरल अर्थ या भावार्थ भी दे दिये गये हैं । लगभग 350 कहावतों की संदर्भ कथाएँ भी संक्षेप में दी गई हैं, जिससे संबंधित कहावत का आशय पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है । इनमें एक-दो प्रतिशत कहावतें ऐसी भी हैं जिनका भाव हमारे लिए भी एकदम स्पष्ट नहीं था, लेकिन ऐसी कहावतें के अर्थ खींच-तान कर बिठाने की चेष्टा नहीं की गई है । कहावत और मुहावरे का चोली-दामन का साथ है अतः संभव है कि एक-दो प्रतिशत मुहावरे भी इस कोश में पा गये हों।
यद्यपि प्रूफ संशोधन में प्रर्याप्त सावधानी बरती गई है, तथापि डाक द्वारा प्रूफ आने-जाने की व्यवस्था के कारण हम स्वयं केवल एक बार ही प्रूफ देख पाये हैं, अतः प्रूफ विषयक जो भी भूलें इस कोश में रह गई हों, उन्हें विज्ञ-पाठक सुधार लेने की कृपा करेगें।
प्रस्तुत कोश से पूर्व राजस्थानी कहावतों के कुछ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । यद्यपि ये सभी कहावत-संग्रह हमारे देखने में नहीं आये, तथापि जिन प्रकाशित पुस्तकों या पत्र-पत्रिकाओं से सहायता ली गई है उनकी सूची अंत में दे दी गई है।
लोक-साहित्य के मूर्द्धन्य विद्वान् श्रद्धास्पद डा. सत्येन्द्र जी ने प्रस्तुत कोश की भूमिका लिख देने की कृपा की है, इसके लिए उनके अत्यन्त कृतज्ञ हैं । प्रूफ संशोधन में चि. नन्दकिशोर अग्रवाल (सुपुत्र श्री गोविन्द अग्रवाल) ने पूरा समय व सहयोग दिया है ।   
- भगीरथ कानोड़िया,  गोविन्द अग्रवाल ।
  


राजस्थानी कहावतें: 


 ♦  अंजळ बड़ौ बलवान  -   दाना-पानी बड़ा बलवान होता है। जहां का दाना-पानी लिखा होता है, मनुष्य को वहीं  जाना पड़ता है।
कित कासी कित कासमीर, खुरासाण गुजरात।
दाणों पाणी परसराम बांह पकड़ लेजात।

♦  अंत भलै को भलो  -   दूसरों की भलाई करने वाले का अंत में भला ही होता है।

♦  अंत भलो सो भलो  -   जिसका अंत सुधर जाए, वही भला है।

♦  अंधाधुंध की सायवी, घटा टोप को राज  -   सत्ता पर मुर्ख के शासन से राज्य में अंधेर गर्दी और अराजकता का वातावरण फैल जाता है। सायवी - सत्ता

♦  अंधेरी रात में मूंग काळा - अज्ञान व्यक्ति को वस्तुस्थिति का सही ज्ञान नहीं हो सकता।

♦  अंवळचंडी रांड, खावै लूण बतावै खांड-  राजस्थान में रांड शब्द विधवा का पर्यायवाची है।  इस कहावत का भावार्थ  है कि ‘‘रांड करती कुछ है, कहती कुछ है।’’

♦  अक्कल अर अक्खड़ एक घर कोनी खटावै - अक्खड़ (उद्धत या निर्बुद्धि) आदमी का निर्वाह कभी समझदारों के बीच  नहीं हो सकता। कोनी - नहीं, खटावै - जैसे दाल में कंकर, नहीं मिलान होना।

♦  अक्कल को न दाणो, मन को भोत स्याणो- निपटआदमी अपने आप को बड़ा बुद्धिमान समझता है।
दाणो - दाना, भोत - बहुत, स्याणो - चालाक, निपट - अनपढ़, मुर्ख।

♦  अक्कल तो आई, पण आई धणी मर्यां पीछै - विनाश हो जाने के बाद अक्ल का आना। औरत को लक्ष्य कर कही गयी कहावत है जिसमें औरत को ताना कसा जाता है कि उसके पति के मरने क बाद उसे बुद्धि आई।
धणी - स्वामी, पति।

♦  अक्कल दुनियां में ड्योढ ईं है, एक आप में आधी दुनियां में- पूरे संसार में अक्ल डेढ ही है, एक अति चालाक व्यक्ति  में और आधी बाकी दुनियां में।

♦  अक्कल न बाड़ी नीपजै, हैत न हाट विकाय- ना तो अक्ल घर में पैदा होती है ना ही प्रेम बाजार में विकता है।

♦  अड़ी-बड़ी में आडो आवे जिको ई आप को- मुसिबत के समय जो काम आये वहीं सच्चा मित्र है।
अड़ी-बड़ी - संकट के समय।

♦  अणहोणी होणी नहीं, होणी हो सो होय -  अनहोनी कभी नहीं होती, परन्तु होनी को कोई टाल भी नहीं सकता।

♦  अणी चूकी, धार मारी -  जरा सी चूक पर दुर्घटना हो सकती है।
अणी - नाई द्वारा उपयोग में आने वाला उस्तरा।

♦  अम्मर पीळो, मे सीलो - आसमान का रंग पीला पड़ने से वर्ष की संभावना कम हो जाती है।

♦  अम्मर रातो, मे सीलो - वर्षा ऋतु में आसमान का रंग में लालीमा छाई हो तो वर्ष की प्रवलता हो जाती है।

♦  अम्मर हरियो, चुवै टपरियो (छत) - वर्षा ऋतु में आकाश का हरापन सामान्य वर्षा का द्योतक माना गया है।

♦  अति लोभ न किजिए, लोभ पाप की धार।
  एक नारेल कै कारणै, पड़्या कुवै में च्यार।

संदर्भ कथा - एक पंडित बहुत लोभी था। वह एक दिन नारियल खरीदने बाजार गया। मौल-भाव करने लगा, एक दुकानदार ने चार रुपये बोले तो उससे तीन रुपये में मांगा। तीन वाले से दो रुपये में, इसी प्रकार दो रुपये बोलने वाले दुकानदार से एक रुपये में अंत में वह नारियल के गाछ पर चढ़कर मुफ्त का नारियल तौड़ने लगा और धड़ाम से नीचे गिड़ पड़ा। उसकी हड्डी-पसली तुट कर चार हो गई। ईलाज कराने में रुपये खर्च हुए वह अलग से।

♦  अतै सो खपै -  अति का एक दिन विनाश अवश्यंभवी है।

♦  अतौताई बेटो जायो, नाळै पैली नाक कटायो - अति उतावलापन नूकशानदेह होता है।
नाळै - बच्चा जन्म के समय जच्चा-बच्चा को अलग करने की नली, जेर, आंवल-नाल भी कहते हैं।

♦  अनाड़ी को गुरु अनाड़ी होवै -  मुर्ख आदमी का गुरु भी मुर्ख ही होता है।

♦  अन्न मुगतां, घी जुगतां -  अनाज पैट भर कर खायें पर घी अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही खाना चाहिये।

♦  असली लाजै, छिनाल गाजै-  सभ्य लोग असभ्य भाषा पर चुप रहते हैं वही असभ्य लोग गरजने लगते हैं।

♦  असाढ चूक्यो करसो अर डाल चूक्यो वांदरो -  समय पर चूक जाने से पश्चताना।
जैसे आषाढ़ माह में किसान खेती करने में चूक जाता है तो उसे साल भर पश्चताना पड़ाता है। वैसे ही जैसे वृक्ष पर छलांग लगाते बंदर की जरा सी चूक से वह जमीन पर गिर जाता है।

♦  आंख अर कान को च्यार आंगळ को आंतरो - ( चार आंगल को आंतरो काच्ची-पाकी बात।) आंख से देखी बात सच्ची होती है जबकि कान से सुनी बात कच्ची मानी जाती है। जैसे कान भरना, चुगली करना आदि।

♦  आंख न दीदा, काढै कसीदा - बड़ी-बड़ी बात हांकना। अक्ल तो भैंस चरने गई पर बात लंबी-लंबी हांकना।

♦  आंख में काजळ को के बोझ - जो अच्छा लगता है वह मन को संतोष देता है और जो व्यक्ति अच्छा नहीं लगता वह फूटी आंख भी नहीं सुहाता। जैसे सास को अपनी बेटी प्यारी लगती है और बहु चुडै़ल। जैसे सौतेले बच्चों के साथ माँ का व्यवहार। अपने बच्चे कैसे बड़े हो जाते हैं कुछ पता ही नहीं चलता। वहीं पराये बच्चों को पालना एक पहाड़ सा लगने लगता है।

♦  आंटे आई मरै बिलाई - अतिचालाक व धूर्त व्यक्ति को चालाकी से मारना होता है।
आंटे आई - आढ़े हाथ लेना।

♦  आंधो जाणौ, आंधै की बलाय जाणै - जिस पर संकट आता है वही उस संकट से निपटना सीख लेता है। अंधा व्यक्ति की आत्मा जानती है कि उसे क्या परेशानी होती है।

♦  आंधो बजाज तोल कर देखै - अंधा व्यक्ति भले किसी वस्तु को देख नहीं सकता हो, वह उसके वजन से उस वस्तु के मूल्य अथवा उसकी कीमत का अंदाज लगा लेता है।

♦   आई तो आवै जिकी आवै, अण आई भी आज्या - आपदा  के समय संकट चारों तरफ से आता है।
जिकी आवै -  जो आती है।

♦  आऊँ न जाऊँ, घरां बैठ्या मंगाल गाऊँ - हिन्दी में एक कहावत है ‘‘काम का धाम का सो मन अनाज का।’’
♦  अरकरै देव नै सै निमै - उग्र इंसान के आगे झूक कर बच जाना ही समझदारी है।
अरकरै - अकड़े, देव - देवता,  नै- को, सै- सब, निमै - झूकना ।

♦   आखा थोड़ा अर देव घणा -  आखा - अन्न के दाने, अक्षत थोड़ा दान देकर भगवान से अधिक की इच्छा करना।

♦  आग लगन्तै झूँपड़ै, जो निकसै सो लाभ - संकट के समय जो बच गया वही लाभ।

♦  आछी म्हारी टाटी, खावां दाल-बाटी - अपने घर की कच्ची-पक्की रोटी से ही गुजर-बसर करना।
टाटी- घर, दाल-बाटी - कच्चा-पक्का खाना, जैसे लिट्टी-चौखा।

♦  आज मरां, काल मरां, मर्या-मर्या फिरां।
    घाल कचोळै दळमळां, जद बनड़ा होयां फिरां।
- जिस प्रकार एक नशेड़ी, अफीम के बिना पागल से होने लगता है और जैसे ही उसे नशा खाने को मिल जाता है तो वह खुद को संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी समझने लगता है। घाल - प्राप्त हो जाना, कचोळै - अफीम जैसी नशली चीज, बनड़ा - बींद, जवांई, दुल्हा, होयां - होकर, फिरां - घुमना।

♦  आठ हाथ की कागड़ी, नौ हाथ को बीज - अपनी औकात से ज्यादा व्यवसाय कर लेना या काम करना।
कागड़ी - धागा, बीज - मोती  अर्थात जगह कम समान ज्यादा।

  आड़ू कै घी में कांकरा - आड़ू व्यक्ति हर काम में खोंच निकलेगा ही। अर्थात घी में भी उसको दोष दिखाई देगा।

♦  आड़ू नै टक्को दे देणो, अक्कल नई देणी - आड़ू व्यक्ति पैसा देकर विदा कर दो पर अक्ल नहीं दो, अन्यथा वह कुछ न कुछ क्षत्ति कर के ही मानेगा।

♦  आडै दिन रंगी-चंगी, वार-त्यौहार फिरै नंगी - कुछ लोगों को अच्छे वातावरण को खराब करने में ही मजा आता हे।
आडै दिन - रोजाना, रंगी-चंगी - सज-धज के रहना।

♦  आदमी बस्यां, सोनो कस्यां  - आदमी की परख समाज करता है जैसे सोना को घिस के परखा जाता है।

♦  आधी छोड़ पूरी न धावै, वींकी आधी मुँह से जावै - लालच के कारण आया हुआ धन भी चला जाता हे।

संदर्भ: एक कुत्ता आधी रोटी लेकर एक तलाब के पास खड़ा था, उसने तलाब में अपनी परछाई देखी, जिसमें सामने भी एक कुत्ता आधी रोटी लेकर खड़ा उसे दिखाई दिया। वह सोचा कि क्यों न उसकी रोटी भी छीन ली जाए पर जैसे ही वह उस परछाई वाले कुत्ते पर भौंका उसके मुँह की आधी रोटी भी तलाब में गिर गई।
हिन्दी में मुहाबरा है - लालच बुरी बला है।

♦  आप-आप की रोट्यां, नीचै सै खीरा देवै - हर लोग खुद के स्वार्थ को पहले देखता है यही स्वभाव है। जैसे हर व्यक्ति अपनी रोटी बनाने के लिए रोटी के नीचे ही लकड़ी जलाता है।
खीरा - आंच देना, आग जलाना। जैसे माँ अपने बच्चे का पक्ष ले तो दोष नहीं देखना चाहिये। यह मानव स्वभाव है।

♦  आप डूबतो पांडियो, ले डूब्यो जजमान - खुद तो डूबा सो डूबा- बचाने वाले को भी साथ में ले डूबना।

♦  आया तो लाख का, नई तो सवा लाख का - जो आया सो अच्छा, संतोष कर लेना।

♦  आय ए भांण लड़ाँ, ठाली बैठी कै करां - खाली बैठे लोग आपस में ही लड़ने लगते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर। भांण - बहन, ठाली - बैकार।

♦  आळस नींद किसान नै खोवै, चोर न खोवै खांसी।
    टक्को ब्याज मूल न खोवै, रांड नै खोवै हांसी।
- ये चार लक्षण आलसीपन, खांसी, ब्याज व हंसी  सबको लाभ नहीं देती। जैसे किसान खेत में आलस करे तो फसल खराब हो जायेगी। चोर, चोरी करते समय खांस दे तो पकड़ा जायेगा। वैसे ही महाजन का ब्याज, मूल से भी बड़ा हो जाता है। और विधवा के हंसने से उसके पीछे मर्द गिद्ध की तरह मंडराने लगते हैं।

♦  असाढां सुद नौमी, घण बादल घण बीज,
    कोठा खेर खखेरेल्यों, झोली राखौ बीज। 
- आषाढ शुक्ल नवमी को यदि आकाश में बादल और बिजली  खूब हों तो कोठों में भरे अनाज को झाड़-पौंछ के बेच डालो। केवल खेत में बोने के लिए बीज रख लो।

♦  आसोजां में मोती बरसै - आश्विन मास में होने वाली थोड़ी वर्षा भी खेती के लिए बड़ी मूल्यवान होती है।

  इक मत ‘के’ , दो मत ‘कै’ -  राजस्थानी भाषा को मुहावरों से बच्चों को कैसे याद कराया जाता है।  एक मात्रा से ‘के’ जिसे दो शब्दों को जोड़ने में प्रयोग किया जाता है। जैसे - राम के पास अपना घर है। या राजस्थानी में ‘के’ का अर्थ ‘क्या’ से भी लगाया जाता है और दो मात्रा के लगने से ‘कई’  हो जाता है।

♦  इसी खाट इसा ही पाया, इसी रांड इसा ही जाया - व्यंग्यात्मक शैली में नालायक संतान पर मुहावरा का प्रयोग। कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि जैसी घाट होगी उसका पाया भी वैसा ही होगा। औरत के स्वाभव के अनुरूप ही उसकी संतान का स्वाभव होता हे। नोट - राजस्थान में औरतों को ‘रांड’ बोल के गाली दी जाती है। रांड का अर्थ होता है बिना कसम की औरत।  ‘सांड’ शब्द से ‘रांड’ शब्द बना है। भारत में अन्य भाषाओं में ‘रण्डी’ शब्द तो काफी प्रचलित है परन्तु ‘राण्ड’ शब्द का प्रयोग राजस्थानी भाषा से जन्मा माना जाता है।

♦  ऊँट बिलाई ले गई, हांजी-हांजी कहणो - ठाकरां की इच्छा के विरूद्ध कुछ नहीं कहना।
इसे लोकदोहे में भी कहा गया है -
जाट कहे सुण जाटणी, अैई गांव में रहणो।
ऊँट बिलाई ले गई,  हांजी-हांजी कहणो।।
रहणो - रहना हो तो, हांजी - हां जी , ठाकरां - जमींदार, राजनेता।

♦  ऊंदरी का जाया तो बिल ई खौदै - चुगलखोर अपनी आदत से मजबूर होता है।
ऊंदरी - चूहिया, इदूर।

♦  ऊंता कै किसा सींग होवै ?- मूर्खों को कोई पशुओं की तरह अलग से सींग नहीं होते, लेकिन उसके व्यवहार से पता चलता है कि वह मूर्ख है।  ऊंता - मूर्ख ।

  ऊधो का न लेणो, माधो का न देणो-  न तो किसी से उधार लो ना ही किसी को उधार दो।

♦  ऊठौ सासूजी सांस ल्यो, मैं कातूं थे पीसल्यो- चर्खा कातती सास पर झूठा अहसान थोपती बहु कहती है - आप थोड़ा सांस ले लो, मैं चर्खा कात देती हूँ, तब तक आप चक्की पर आटा पीस लो। यानि अहसान भी, बदले में काम भी अपेक्षकृत भारी सौंप देना। अति धूर्त लोग।

  अेक घर तो डाकण ईं छोड़े -  दुष्ट प्रकृति के आदमी भी एक घर छोड़ के ही डाका डालते हैं।

♦  एक भेड़ कुवै में पड़ै तो लैर सै जा मड़ै -  एक भेड़ भूल से कुएँ में गिर गई तो उसके पीछे-पीछे सारी भेड़ें उसी कूएं में जा गिरती है। हिन्दी में इसे भेड़िया चाल भी कहा जाता है।  जब कोई व्यक्ति बिना सोचे समझे किसी की नकल कर उसी का अनुसरण करता है तो उसे ‘भेड़ चाल’ का नाम दे दिया जाता है।

♦  अेक सैर की सोळा पोई, सवा सैर की एक।
    वो निगोड़्यो सोळा खाग्यो, मैं वापड़ी अेक।।
- बंटवारा करते समय चालक व्यक्ति अपने हिस्से अधिक रख कर भी दूसरों को गिनाता फिरता है कि उसे तो कुछ नहीं मिला। जबकि सोलह रोटी का वजन एक रोटी से कम है। फिर भी ऐसा लगता है कि सोलह ज्यादा है एक कम है। इसे आंख का भ्रम भी कहा जाता है।

♦  अैरण की चोरी करी, कर्यो सुई को दान।
    ऊँचो चढ़ देखण लाग्यो, कद आवै वीवांण।।
- जिन्दगी भर छल-कपट किया, मरने के समय थोड़ा सा दान देकर स्वर्ग की कामना करने वाले व्यक्ति पर व्यंग्य। अैरण - जीवन भर, वीवांण - पुष्पक विमान।

♦  कटै ताऊ का, सीखै नाऊ का -  नवसिखिया, नये-नये नाई का काम करने वाले के उस्तरे से लोगों के गाल कट जाते हैं पर जिसका गाल कटा वह नवै को कोई दोष नहीं दे पाता। दूसरों का क्षति कर के ज्ञान प्राप्त करना।

♦  कपड़ा फाट गरीबी आई, जूती फाटी चाल गमाई -  कपड़ा फाड़ के गरीब तो बना जा सकता पर वही नकल जूते -चप्पल पर नहीं की जा सकती। क्योंकि जूता फटने से चला नहीं जा सकता। हर बनावटी काम सफल हो जरूरी नहीं।

♦  कपूत जायो, भलो न आयो -  कुपुत्र जन्म से पहले ही मर जाए तो भला है। जायो- जन्मना।

♦  ‘कम’ खाणो अर ‘गम’ खाणो चोखो -  कम भोजन व गम को खा जाना दोनों ही अच्छा है।

♦  करणी आपो आप की, के बेटो के बाप -  सबको अपने-अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ेगा।

♦  कलकत्तै को धारो, वाप सें बेटा न्यारो -  देस में यह कहावत प्रचलित थी कि कलकत्ते में बसने वाला परिवार से अलग हो जाता है।

♦  कळजुग में झूठ फळापै -  कलयुग में झूठ पर लोगों को जल्दी विश्वास हो जाता है। फलता-फूलता है।

♦  कलम दीवानी वह गई, के वंदे का सारा-  हुक्मरानों के मुँह से निकले शब्दों से किसी की जान भी जा सकती है।

♦  कढी होठां, चढी कोठां-  मुंह से निकली बात बिजली की तेज गति से फैल जाती है। कोठां - यहां कोठा शब्द का प्रयोग पूरे मकान से की गई है। उस कोठी में रहने वाले सभी लोग को पता हो जाना। जैसे कोई बहू यह बोल दे कि वह गर्भवती हो गई है। उसके होठ से निकलते ही यह बात पूरे मकान के लोगों को पता हो जाना।

♦  कमाई गैल समाई -  आय के अनुसार व्यव करने की सामर्थ्य होना।

♦  काख में छोरो, नगर में ढिंढोरो -  हिन्दी में गोदी में लड़का गांव में ढिंढोरा (खोजना)।

♦  कागा किसा धन हड़ै, कोयल किस कूं देय।
    जीभड़ल्यां कै कारणै, जग अपणो कर लेय।।
- लोगों के मुंह से निकले शब्दों का महत्व है। कौआ किसी का धन न तो लेता है ना कोयल किसी को धन देती है, पर दोनों की वाणी, एक लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है तो दूसरा विरक्त कर देता है। इस जीभ के कारण जग अपना या पराया हो जाता है।

♦  काच कटोरो नैण लळ, मोती दूध’र मन्न।
    इतणा फाट्या ना मिलै, लाखां करो जतन्न।।
- काँच का प्याला टूट जाने से, आंख का पाणी चले जाने से, दूध फट जाने से वापस उसे जोड़ा नहीं जा सकता चाहे कितना भी प्रयत्न कर लें।

♦  काचै कूंपो ऊंट को, या तो मीन न मेख।
    वामण कै सिर पर चढ्यो, संगत का फल देख।।
- मरे हुए ऊंट के चमड़े को स्पर्श करना यों तो ब्राह्मण पाप समझता है पर उसी चमड़े के कुप्पे (थेली) में घी भरा हो तो वही ब्राह्मण उस थेली को सर पर उठा कर घर ले जाता है। एक ही वस्तु संगत से अपना गुण बदल लेती है।

♦  कासी जी गया अर म्हेई जीत्या।
    म्है म्हारी ही म्हारी दली, दूसरे की सुणी ई कोणी ।।
- हमने काशीजी जा कर विद्वानों से शास्त्रार्थ किया तो जीत हमारी ही हुई। क्यों कि मैं अपनी ही अपनी दलता रहा किसी की सुनी ही नहीं। अर्थात मुर्खों से कभी भी सका नहीं जा सकता।

♦  कीड़ी चाली सासरै, नौ मण सुरमो सार - चींटी भी अपने आंख में सुरमा लगा के घुमे तो उसको कौन देखै। वैसे ही अकिंचन व्यक्ति अपनी औकाद से अधिक आडम्बर करे तो उसकी समाज में कोई पूछ नहीं होती। भले ही वह खुद में राजी हो जाए।

♦  के करै नर बांकड़ो, जद थैली को मुँह सांकड़ो ! - जब तंगी आती है तो मनुष्य लाचार/ असहाय हो जाता है।
♦  खर घू घू मूरख नरां, सदा सुखी प्रिथिराज - गधा, उल्लू और मुर्ख मनुष्य सदा सुखी रहता है क्योंकि उसे अपने किये का कभी पश्तावा नहीं होता।

♦  खाज पर आंगळी सीदी जावै - अपने स्वार्थ का घ्यान रखना।

♦  खाणो पीणो खेलणों, सोणो खूंटी ताण।
    आछी डोवी कंथड़ा, नामरदी कै पाण।। 
- पत्नी द्वारा अपने निठल्लू पति को ताना कसते हुए कहती है कि केवल दिन भर खाना, पीना, मौज मस्ती कर के घर आना और कुरता खूँटी पर टांग कर सो जाना बस आपका यही काम रह गया। यह सब आदत नामर्द लोगों की पहचान होती है। मेरा तो करम ही फूट गया। नालायक लोग के लिए उपयुक्त।

♦  खारी वोली मावड़ी, मीठा वोल्या लोग।
    खारी लागी मावड़ी, मीठा लाग्या लोग।। 
- माँ की बात बचपन में बहुत खारी लगती है पर जब समझदारी आती है तो  बचपन में माँ की कही सारी बात याद आती है। जबकि जिनकी बात बचपन में अच्छी लगती थी उन बातों को याद करने से लगता है कि वे लोग गलत थे। मावड़ी राजस्थान की एक बोली, जो बोलने-सुनने में तीखी लगती है पर वहाँ के लोगों का व्यवहार बहुत मधुर माना जाता है। जो लोग आपके मुंह पर ही खारा बोल दे वे आपके हितैशी हैं। उनके मन में कोई छल नहीं होता।

♦  खेती करै सो राखै गाडो, राड़ करै सो वोलै आडो - किसान अपने साथ वैलगाड़ी जरूर रखता है वैसे ही झगड़ा करने वाले लोग हमेशा टेढ़ा / उल्टे ही बात करतें हैं। राड़ - झगड़ा, आडो - उल्टा।

♦  खैरात बंटै जठै मंगता आपैई पूंच ज्यावै - जिस जगह मुफ्त (खैरात) का माल मिलता है वहाँ मांगने वाले अपने आप चले आते हैं।

♦  खोटो पीसो अर कपूत बेटो, आड़ी-बाड़ी आडो आवै - खोटा पैसा और बिगड़ी हुई संतान भी संकट के समय काम आता है।। आड़ी-बाड़ी - असमय, आडो - काम, आवै - आना।

♦  खोद्यो डूंगर, निकळयो ऊंदर - हिन्दी में प्रचलित कहावत ‘‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया। ’’

♦  खोयो ऊंट घड़ै में ढूंढे - खोया हुआ समान को खुद के हाथ के हथेली में भी खोजना चाहिये।

♦  गंगा गया गंगादास, जमना गया जमनादास - सिद्धांत हीन लोग की पहचान। जैसे आयाराम-गयाराम।

♦  गंडकां से गांव की गलियाँ छानी कोनी। गंडकां - कुत्ता - कुत्तों से गांव की गली छुपी नहीं होती। व्यंग्य के रूप में कहीं भी उपयुक्त प्रयोग किया जा सकता है।

♦  गई रांड सो घर-घर डोलै, गयो घर सो घुग्धू वोलै।
    गयो राज सो मानै गोलै, गयो साह सोघटू तोलै।। 
- घर-घर घुमने वाली औरत, जिस घर में उल्लू का वास हो, जिस राजा के पास चपलूसों की चलती हो और जो व्यापारी कम वजन तौलता हो उनका एक दिन नाश होना निश्चित है।

  गरज मिटी रै गांगला, गाँव सें आटो मांगल्या  - अपनी गरज समाप्त होते ही आदमी खड़ा अखड़ने लगता है। गुरु अपने चेला से दिनभर काम करवाता है जब काम नहीं होता तो उसे गांव से आटा मांगने भेज देता है।

♦  गोळी को घाव भरज्या पण बोली को कोनी भरै  - पिस्तौल की गोली का घाव भर जाता है परन्तु बोली का नहीं।

  ग्यानी से ग्यानी मिलै, करै ग्यान की बात।
    मूरख से मूरख मिलै, कै जूता कै लात।। 
- भावार्थ स्पष्ट है। दो ज्ञानी आपस में ज्ञान की बात करते हैं वहीं दो मुर्ख यदि आपस में मिल जाए तो मार-पीट होना तय है।

♦  घड़ी में तौला - घड़ी में मासा  - अपनी बात से पलटने वाला व्यक्ति।

♦  घणी सराई खीचड़ी, दांतां कै चिपज्या  - किसी की ज्यादा चापलूसी मत करो नहीं तो वह चिपक जाएगा। उल्टे गले पड़ना।

♦  घर का देव, घर का पुजारी, घर का ही धोक देवण आळा। - फर्जी संस्था का गठन कर लेना।

♦  घर का पूत कुंआरा डोलै, पाड़ोस्यां का फैरा  - अपने घर के काम के प्रति उदासीन रहना  व समाजसेवा का कार्य करना।

♦  घर की मुरगी दाळ बराबर - अपनो का कोई महत्व नहीं होता।

♦  घर को जोगी जोगनो, आण गांव को सिद्ध - अपने गांव के विद्वान की कोई कद्र नहीं करता जबकि दूसरे गांव से आया व्यक्ति के प्रवचन सुनने सब जमा हो जाते हैं।

♦  घर खोयो साळां, भींत खोई आळां - बहन के घर भाई का रहना व दीवार में मोखा का होना दोनों नूकसानदेह है।

♦  घाटो तो लूण को ई बुरो - दैनिक रूप से छोटा भी घाटा होना अच्छा नहीं।
लूण - नमक  (यहां शब्द का प्रयोग सांकेतिक है ‘चुटकी के बराबर नमक’ )

  घी सुंधारै खीचड़ी, नांव बहू को होय  - खीचड़ी में घी डालने से वह स्वयं स्वादिष्ट लगने लगती है। पर उसका यश बहु को मिलता है। अर्थात ‘‘काम कोई करे, यश कोई ओर उड़ा ले जाए।’’

♦  घूंघटै सें सती नईं, मूंड मुंडायां जती नईं - औरत के परदा (घूंघट निकालना) कर लेने से वह सती-सावित्री नहीं बन जाती। वैसे ही मां-वाप के मरने पर बेटा लोग के द्वारा मूंडण (सर के बाल देने से) करा लेने से वह उनकी समप्ति का वारिस /मालिक नहीं बन जाता।

  घोड़ो घास सें यारी करै तो के खावै ? - व्यापार में मुनाफा नहीं कमायेगा तो व्यापार का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा। हिन्दी में भी ‘‘घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या ?’’ प्रचलित है।

  चढ़ै सो पड़ै - जो काम करेगा उसी से गलती होगी। नहीं करने वाले सिर्फ गलती देखतें हैं।

♦  चमड़ी जा पर, दमड़ी नईं जा  - कंजूस व्यक्ति के लिये प्रयोग किया जाता है।

♦  चल सुंदर मंदर चालं, तो बिन चल्यो न जाय।
    माता देती आसका, बै दिन पूंच्या आय।। -
 यहां ‘सुन्दर नाम’ हाथ की लाठी को कह रही  है। जिसके सहारे बूढ़े लोग चलते हैं। ‘सुंदर’ चलो मंदिर जा कर आती हूँ। अब एक तेरा ही तो सहारा बचा है मुझे।  अब तो तेरे बिना तो चला भी नहीं जाता। भगवान का सारा आर्शिवाद तुम्हें ही मिलेगा। बस अब तो दिन काट रही हूँ।

  चांच दी है जिको चुग्यो भी देसी - माँ अपने बच्चे को मारती है तो खाना भी खिलाती है। उसका बच्चा यदि भूखा होता है तब माँ की वेदना देखे नहीं बनती। वही वेदना को वह कई बार अपने बच्चे को मार (डांटना-मारना) कर उतार देती है। चांच - चूंच से मारना।

♦  चांदी की मेख, खड़ी तमाशा देख। - चांदी के बल पर सभी काम अपने आप होने लगते हैं।
नोटः उस समय चांदी के सिक्के चला करते थे। अर्थात रुपयो के बल पर सभी काम आसानी से हो जाता है।

  चाकरी घणी आकरी  - आकरी शब्द रोटी को कड़ा कर के सैंकने को भी कहते हैं राजस्थान में। जैसे ‘‘अरे रोटी थोड़ी आकड़ी कर घी चपौड़ दिये।’’  अर्थात रोटी को थोड़ी अच्छे से सैंक कर उस पर घी लगा देना।
आकड़ी शब्द का अभप्रिायः कड़ा से है। चाकरी - नौकरी। घणी - बहुत।
नौकरी करना बड़ा कठीन कार्य है।

  चाकी मांय कर साबतो कोई कोनी निकळै - जैल के अंदर जाने के बाद उसके ऊपर जीवन भर दाग लग ही जाता है। चाहे भले ही उसने कोई अपराध ना किया हो। हिन्दी में ‘गेहूँ के साथ घुन पिसना’ मुहावरे का अर्थ समान नहीं है।  हिन्दी के इस मुहावरे अर्थ है  मतलब कि गुनाहगार के साथ रहने वाला निर्दोष भी कष्ट पाता है। परन्तु इस राजस्थानी कहावत का प्रयोग सुहागरात में के समय भी हंसी-मजाक में भी किया जाता है। अर्थात कोई बेदाग नहीं निकलना।

♦  चालणी में दूध दूवै, करमां नै दोस देवै - जो लोग मुर्खता करते हैं वे अपनी गलती नहीं स्वीकार करते और दोष दूसरों पर मंड देते हैं।

♦  चालै है तो चाल निगोड्यो म तो गंगा न्हाऊँगी। - चाहे कुछ भी हो अपनी जिद्द मनवा कर मानना। औरत अपने जिद्द अड़ जाये तो घर तुड़ावा कर ही दम लेगी। निगोड्यो - मर्द, पति को संबोधन। निठल्ला आदमी।

♦  चिड़ी चिड़ै की लड़ाई, चाल चिड़ा में आई - पति-पत्नी की आपसी झगड़े चलते ही रहते हैं इसमें पति को हर बार अपनी हार मान लेने में ही भलाई है। चिड़ा (पति) के मना लेने के बाद पत्नी शांत हो कर उनका निमंत्रण स्वीकार कर लेती हे। आपसी तू-तू मैं-मैं की बात तत्काल दिमाग से निकाल देना चाहिये।

♦  चूंटी चून, घड़ा दस पाणी - व्यर्थ का दिखावा, झूठी आन दिखाना।  एक चुटकी चूना में दस बाल्टी पानी मिलाकर दीवाल की पुताई करवाना।

♦  छा अर बेटी मांगणै में लंजण कोनी - जिस प्रकार छाछ मांगने में कोई बुरा नहीं मनता उसे ही किसी की बेटी को मांग कर अपनी बहू बनाने में भी शर्म नहीं करना चाहिये।

♦  छा रोटी रायतो, कहो बहू न खाय - घर की परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेना। छा- छाछ,रायतो - नमक मीला दही का घोल, जबकि चीनी मिला देने से लस्सी बोला जाता है।

♦  जद चोखा दिन बावड़ै, पाक्या पावै बोर।
    घर भूरी घोड़ो जणै, मरिया पावै चोर।। 
- अच्छे दिन आने से सब काम स्वतः होने लगते हैं।
बावड़े - संबोधन  ‘अरे सुनो’ , पाक्या - पका हुआ, पावै - पाना, बोर - राजस्थान की फसल कैर, बैर, संगरी, काकड़ी की फसल। चोखा दिन - अच्छे दिन, भूरी - कमजोर घोड़ी,  जणै - जन्म देना, मरिया - मरा हुआ।

♦  जननी जणै तो भक्त जण, कै दाता कै सूर।
    नातर रहजे बांझड़ी,  मनी गंवाजे नूर ।।
- यह कहावत राजस्थान के शौर्य की कहानी बयान करती है। उस समय राजस्थान में मुसलमानों ने आतंक  फैला दिया था। मुगल शासक घर की माँ’ बहूओं - बेटियों को उठा के ले जाते थे। राजस्थान के हर घर में मुसलमानों का आतंक था। घर-घर में शौर्य की गाथाएं रची जा रही थी। मुसलमानों ने चारों तरफ से भारत को गुलाम बना लिया था। उस समय संचार का उतने साधन भी नहीं थे। तब इस प्रकार के लोकोक्तिओं के माध्यम से संदेश का प्रसारण किया जाता था। इस लोकोक्ति में एक औरत दूसरी औरत ( राजस्थान में औरत को लुगाई बोला जाता है।) को कहती है। या तो तुम बांझ ही रहना, समाज की इज्जत मत खोना, तुम ऐसी योग्य संतान जन्म देना जो सबकी रक्षा कर सके। जननी - गर्भवती मां, जणै - जन्म देना, कै दाता - सबकी भलाई करने वाला, कै सूर - वीर पुरुष जो मुगलों से लड़ सके।
जननी - गर्भवती मां, जणै - जन्म देना, कै दाता - देने वाला, कै सूर - वीर पुरुष।

  जात-पांत पूछै न कोई, हरि भजै सो हरि ही होई - ईश्वर के दरवार में सब इंसान बराबर है।

♦  जायोड़ौ नै पोतड़ा होयां सरसी - जायोड़ो - जो जन्म लिया, पोतड़ा - बच्चों को लपेटने का कपड़ा। राजस्थान में दादा-दादी जी की पुरानी साड़ी-धोती को साफ कर कई हिस्सों में फाड़ कर त्रिकोणियां पोतड़ा बनाया जाता था। अर्थ भगवान जिसे संसार में भेजा है उसके लिए भोजन की भी व्यवस्था कर दी है। बच्चा जन्मते ही माँ के आंचल को भगवान दूध से भर देता है।

♦  ठण्डो सौ तातै’लौ नै फाटै -  तातै’लौ - गर्म लोहा। ठण्डा लोहा ही गर्म लोहे को काटता है।

♦  ठावां ठावां टापला बाकी का लंगोट - पद, प्रभाव और प्रतिष्ठा के अनुसार भैंट पूजा करना।

♦  डाकन बेटा दे’ क लै ?- शैतान आदमी हमेशा दूसरों का हड़पने में रहता है।
 डाकन - दुचरित्र व्यक्ति, दे’ क लै - देना कि लेना।

♦  तानो सीर को होवै - किसी व्यक्ति को सामाजिक ताना देना पूरे समाज को ताना देना माना जाता है।
सीर को - संयुक्त परिवार।

♦  तेरो जायोड़ा भी कदे पगां चालसी के ? - बच्चों की शैतानी भरी हरकतों से तंग आकर उसकी माँ को व्यंग्य करना ‘‘ तुम्हारा जन्मा बच्चा कभी अपने पांव पर चलेगा भी क्या?’’ अर्थात ऊँटपटांग काम करने वाला व्यक्ति कभी जवान नहीं होता वह किसी न किसी काम में नादानी कर ही बैठता है। कमजोर बुद्धि का इंसान।

♦  तेरी मेरी बणै नां तेरै बिना सरै नां - एक दूसरे की बनती भी नहीं और अलग रह भी नहीं सकती। दो बहनें, या अन्य कोई दो व्यक्ति पर भी इसका प्रयोग संभव है।

♦  तेरो तो घड़ो ईं फुट्यो, मेरो बण्यो बणायो घर ढहग्यो - किसी का नूकसान थोड़ा सा ही हुआ पर दूसरे का सबकुछ नष्ट हो जाना। कोई किसी का घर फुड़ावा दे। पति-पत्नी में दरार पैदा करा दे।

♦  तेल तो तिलां में सैं ही निकळसी - जिसके पास कुछ देने को ही नहीं वह क्या देकर निहाल करेगा। अर्थात देने को होगा तब न देगा।

♦  पढ़ले बेटा फारसी, तळै पड़्यो सो हारसी - कोई कितना ही विद्वान क्यों न हो, जो जमीन पर गिरा वही हार जाएगा।

♦  पाणी पीये छाण कर, सग्गो (संबंधी) करिये जाण कर।- पानी को छान कर पीना चाहिये और बच्चों को संबंध संबंधी को जान-पहचान कर करना चाहिये।

♦  पूत का पग पालणां ईं दिखज्या - बचपन में ही बच्चे की हरकतों से उसका आचरण कैसा होगा पता चल जाता है।

♦  थावर की थावर गाँव थोड़ा’ई बळै - थावर - शनिवार का दिन, यह मिथ्थक अंधविश्वास को तौड़ने के लिए कहावत प्रचलित है। राजस्थान में गर्मी प्रचंड पड़ती है। कईबार सुखे के चलते खेतों में आग भी लग जाती है जो लगभग एक सप्ताह जलती रहती है। लोगों का यह भ्रम है कि यह आग शनिवार को ही अधिकांशतः लगती है। उत्तर भारत में वर्षा को लेकर यही मिथ्थक प्रचलित है कि शनिवार को पानी बरसने से एक सप्ताह तक पानी बरसेगा। इस कहावत का अर्थ है हर शनिवार की शनिवार आग नहीं जलती। थोड़ा’ई - हमेशा नहीं, बळै - जलना।

♦  थोथो चणो वाजै घणो - हिन्दी में भी प्रचलित ‘‘थोथा चना बाजे घना’’  मुर्ख व्यक्ति अधिक का बोलना।

♦  दमड़ां को लोभी बातां सें कोनी रीझै - दमड़ां - रुपये-पैसे, धन का लोभी किसी की बात से संतुष्ट नहीं होता।

♦  दलाल कै दिवाळो नईं, मसीत कै ताळो नईं - जो दलाली करता है उसे कभी नूकसान नहीं हो सकता। वैसे ही जैसे मस्जिद में ताला नहीं लगाया जाता क्योंकि वहाँ चोरी करने को कुछ नहीं मिलता।

♦  दाई सें पेट छानो कोनी - जानकार आदमी से कुछ छुपा नहीं रहता। जैसे पेट को छूते ही दाई स्त्री के गर्भमें पलते बच्चे का आकार बता देती है। उदाहरण के लिए - "यार हमसे क्या छुपाना हम सब जानते हैं।"

♦  दिन जातां बार कोनी लागै - समय गुजरते समय नहीं लगता।

♦  दिल लाग्यो गधेड़ी सें तो परी के चीज - दिल किसी से लग जाने पर उसका कुल नहीं देखा जाता।

♦  दिल्ली की कमाई, दिल्ली में गुमाई - बड़े शहरों में खर्च अधिक होता है। इसलिए कहा गया है शहरों में कमाने वाले कभी धन जमा नहीं कर पाते। दिल्ली इस मुहावरें में बड़े शहरों का प्रतिनिधित्व करता है।

  दिवाळो काढै तीन जणां, हुण्डी, चिट्ठी व्योपार घणां
    तूं क्यूं काढै चौथा जणा ?  पैदा थोड़ी, खरच घणां।
- दिवाला तीन लोग ही निकालते हैं जो नगद जमा लेकर क्षमता से अधिक हुण्डी-चिट्ठी (रूका-पुर्जा) काटते हैं या फिर अपनी औकात से अधिक व्यापार कर लेते हैं, पर साथ ही चौथा आदमी जो अपनी औकात/क्षमता से अधिक खर्च करता है उसका भी दिवाला निकलना ही है। काढै - निकालना। घणां - अधिक।

♦  दूध पीवती बिल्ली गंडकड़ां में पजगी - गंडकड़ां - कुत्ता, पजगी - फंसना
  खाता-पीता भला आदमी को बुरी संगत का लग जाना।

♦  दूर का ढोल सुहावणा लागै - दूसरों की चिकनी-चुपड़ी बातें सबको प्रिय लगती है।

♦  दूर जंवाईं फूल बरोबर, गांव जंवाईं आधो
    घर जंवाईं गधै बरोबर, चायै जैयां लादो
  - घर-जंवाई पर व्यंग्य।

♦  दूसरै की थाळ में घी घणों दीखै - हर कोई को यह लगता कि दूसरों के व्यवसाय में ज्यादा कमाई है।

♦  देख पराई चोपड़ी, क्यों ललचावै जी ?
    रूखी-सूखी खाय कर ठंडो पाणी पी। 
- दूसरे लोगों के सुख से न जल का खुद के पास जो हो उसी पर संतोष करना चाहिये।

♦  देख पराई चोपड़ी, जा पड़ बेईमान
    एक घड़ी की सरमा-सरमी, दिन भर का आराम 
- दूसरे के भोजन पर टूट पड़ना। एक बार शर्म लगती है पर भोजन कर लेने के बाद दिन भर आराम से कट जायेगा।

♦  धन धन माता राबड़ी, जाड़ हालै न जावड़ी - राबड़ी - राजस्थान में बाजरे की राबड़ी (कढ़ी) बनाई जाती है। बाजरा राजस्थान में गेहूं के समतुल्य माना जाता है। बाजरे की खीचड़ी, राबड़ी बहुत प्रचलित है। शीतला माता को बाजरे से बनाये भोज्य प्रदार्थ का ही भोग लगाया जाता है। इसी को कई लोग व्यंग्य के रूप में प्रयोग करते हैं। यदि व्यवसाय में बैठे-बैठे आमदनी होने लगे तब इसका प्रयोग किया जाता है।

♦  धेलै की न्यूंतार, मांडै कै बांथ घालै - धेलै - नाममात्र, न्यूंतार - निमंत्रण देना, मांडै - विवाह के अवसर पर, बांथ - अंडंगा, घालै - डालना। जिसकी नाम मात्र की औकात नहीं उसे शुभकार्य के समय परिवार का सदस्य होने के नाते बुलाना तो पड़ता ही है। पर वही इस अवसर को अपने पुराने पारिवारिक विवाद को सामने ला कर नया बखेरा खड़ा कर देता है।
किसी भी शुभ कार्य को शांतिपूर्ण संपन्न ना होने देना।

♦  नणद अर नणदोई, गळे लाग कर रोई  - नणद - पति/ सोहर की बहन, नन्दोई - बहन का जंवाई/ सोहर
यानि जीजा-साली का रिश्ता। भाभी के लिए दोनों ननद और नणदोई। बस आगे आप आनन्द लिजिये। कितना दुखभरा माहौल होगा।

♦  नानी रांड कुँआरी मरगी, दोयती का फेरा - जब कोई निर्धन आदमी को अचानक से धन आ जाए तो वह ज्यादा दिखावा करता है। इसका अर्थ है जीवनभर कंकला बना फिरता था, अब मरने के समय सेठ बना फिरता है।

♦  नींद कै विछावण नईं, भूख कै लगावण नईं  - मुहावरा स्पष्ट है। इसका अर्थ बहुत गहरा है। नींद और भूख के सामने आदमी लाचार है। नींद आने पर वह कहीं भी लुड़क जायेगा। वैसे ही भूख लगने पर उसे कुछ भी खाने को चाहिये। इस मुहावरे को किसी भी उपयुक्त अवसर पर प्रयोग किया जा सकता है।

♦  नीचो कर्यो कांधो, देखण आळो आंधो  - कोई गलती कर के लज्जा से अपना सर झूका ले तो उसे अनदेखा कर देना चाहिये।  फिर भी कोई इसे देखता है तो वह मुर्ख है।

♦  बडै घरां बेटी देई, मिलणै का सांसा  - अपनी क्षमता से बड़े घर में बेटी ब्याह देने से बेटी से मिलने में भी आफत आ जाती है। क्योंकि बेटी के घर क्या ले जाए? उसकी क्षमता न रहते हुए भी ले जाना तो पड़ता ही है।

♦  बद चोखो, बदनाम बुरो - बुरा आदमी अच्छा पर बदनामी वाला आदमी अच्छा नहीं।

  बाबो सणै लड़ै, बाबा नै कुण लड़ै ? - बड़े तो सबको डांटतें हैं पर बड़ों को कौन डांटें ? धनी व्यक्ति की कोई गलती नहीं बोल सकता।

♦  बामण नै दी बूढ़ी गाय, धरम नईं तो दाळद जाय - ब्राह्मण को बुढ़ी गाय दान देकर धर्म भी कमा लिया और गाय से पिण्ड भी छुड़ा लिया। किसी की आढ़ में स्वार्थ पुर्ति करने वाले लोग।

♦  बिनां रोये मा ईं बोबा कोनी दे - बोबा - स्तन, बच्चे के रोये बिना माँ भी दूध नहीं पिलाती।

♦  मरे जिको तो बोली सैं ईं मरज्या, नईं गोळी सें ईं कोनर मरै  - लज्जाशील व्यक्ति तो अपमान जनक शब्द सून कर ही मर जाता है, लेकिन निर्लज्ज को कोई फर्क नहीं पड़ता भले ही उसे गोली से ही क्यों न मार दो।

♦  माया तेरो तीन नांव परसा, परसो, परसराम - धन आने से आदमी का मान स्वतः बढ़ने लगता है।

♦  मोर नाचै ईं नाचै, पण पगां कानी देख कर रोवै  - चाहे कितना भी धन हो जाए घर में शांति नहीं तो सब व्यर्थ है। जिस प्रकार मोर नाचती तो सुन्दर लगती हे पर जब वह खुद के पांव को देखती है तो रोती है। खुद की चिंता से परेशान होना।

♦  यो मेळो एक दिन खिंडणो ईं है। - इसे व्यंग्य में भी कहा जाता है। जब कोई प्रेम विवाह का तलाक हो जाय या अमेल संबंध होने पर तो यह मुहावरा प्रयोग किया जा सकता है। एक दिन इनको विछड़ना / विखड़ना ही है।
खिंडणा - बिखरना।

♦  रांड कै रांड पगां लागी, क मेरै जिसी तुं - एक विधवा दूसरी विधवा के पांव छूते हुए संतोष करती है कि अकेली मैं ही नहीं हूँ। तु भी तो विधवा है। एक बरादरी के लोगों का आपस में मिल कर खुश होना ।

♦  राड़ कै सिर-पग कोनी होवै  - लड़ाई-झगड़ों को कोई सिर-पैर नहीं होता।

♦  रामदेवजी नै मिल्या जिका ढेढ ईं ढेढ - राजस्थान में रामदेव पीर देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि रामदेवजी सभी प्रकार की बीमारी को ठीक कर देते हैं। तो उनके दरबार में रोजना बीमार लोगों का तांता लगा रहता है।  इसी को लेकर यह कहावत चल पड़ी। अब इसको कई जगह व्यंग्य के रूप में प्रयोग करते हैं। जैसे मुर्खों की मंडली में जमा लोग की बात सुन कर यह कहा जा सकता है। या बच्चों के क्लास में फैल होने वालों बच्चों की संख्या अधिक हो तब।

♦  लातां का देव बातां सें कोनी मानै - लातों का देवता बात से नहीं मानते।

♦  लाद दे लदायदे, लादण आळा साथ दे - अपना काम दूसरों से करवाना। धोबी अपने गघे से रास्ते भर बात करता है।

♦  सिर भलाईं कट ज्यावो, नाक नईं कटणी चाये- मान-सम्मान बनी रहे, भले ही जान देनी पड़े। राजस्थान में लोगों का इतना मान होता था कि वह मुगलों से लड़ने जा रहा है। यह सुनकर ही लोग गर्व से फूले नहीं समाते थे।

♦  सै आप-आप का भाग खावै  - सब अपना-अपना भाग्य का खाते हैं।

♦  हींजड़ां की कमाई, मूँछ मुँड़ाई में जाईं - मुफ्त की कमाई, झूठी शान दिखाने में ही चली जाती है।

Link PDF File :  राजस्थानी कहावत कोश

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