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बुधवार, 3 अगस्त 2011

बगावत के लिए खड़ी हो जनता!



दरअसल में ये सभी मिलकर ‘‘मछली.मछली कितना पानी’’ का खेल, खेल रहें हैं। इस खेल का परिणाम इनको पहले से ही मालूम है कि क्या होने वाला है। जनता चारों तरफ से खुद को ठगी सी महसूस करने लगी। एक तरफ लोकतांत्रिक ढांचे के द्वारा चुने हुए तानाशाहों की जमात तो दूसरी तरफ आम जनता आमने-सामने हो चुकी है। कल की बहस हमने देख ली और आज समाचार पत्रों में पढ़ भी लिया होगा। कल का दिन मंहगाई के बली चढ़ गया। भाजपा के नेताओं को बोलते-बोलते भूख लग गई सो देश की जनता अपने टी.वी.सेट को ताकती रह गई।


बचपन में हम एक खेल खेला करते थे। ‘‘मछली.मछली कितना पानी’’ पानी का स्तर जैसे-जैसे कम होते जाता, मछली जल के लिए तड़फने लगती और अंत में मर जाती है। कल जो संसद के भीतर सत्तापक्ष और तमाम विपक्ष ने जो खेल खेला इससे कम से कम हमें तो यही प्रतीत होता है कि इस देश को इन चुने हुए सांसदों ने मिलकर देश को तमाशा बना दिया है। बढ़ती मंहगाई और चारों तरफ व्याप्त भ्रष्टाचार पर किस तरह काबू पाया जाए इसकी किसी को चिंता नहीं दिखी धारा 184 के तहत इस बहस को लेकर न तो सत्ता पक्ष, ना ही विपक्ष गंभीर दिखाई दिया। मत विभाजन मात्र आम जनता को धोखा देने का एक नाटक बन कर रह गया संसद में। सवाल उठता है कि यदि पक्ष और विपक्ष का यही हाल हमें संसद में देखने को मिला तो संसद को बनाने और इसे चलाने के सवाल पर सीधा सा प्रश्न चिन्ह क्यों न खड़ा किया जा सकता है कि फिर हमें इसे बनाने और इसे चलाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने की जरूरत ही क्या है? देश के चुने हुए सांसदों के बयानों से अब आम जनता को बड़ी निराशा होने लगी है। संसद के अंदर और संसद के बाहर जैसे शब्दों का प्रयोग कर सत्ता और विपक्ष ने यह प्रमाणित कर दिया कि अब संसद के अंदर जाने वाले लोग देश के हित में सोच ही नहीं सकते उनका उद्देश्य न सिर्फ जनता को गुमराह करना है बल्की संसद का प्रयोग भी खुद के राजनैतिक स्वाथों की पूर्ति के लिए करना है। सबके सब इस बात पर चिंता व्यक्त करते दिखे कि अन्ना हजारे संसद के बहार खड़ा होकर संसद को चुनौती दे रहे हैं जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुका है।
दरअसल में ये सभी मिलकर ‘‘मछली.मछली कितना पानी’’ का खेल, खेल रहें हैं। इस खेल का परिणाम इनको पहले से ही मालूम है कि क्या होने वाला है। जनता चारों तरफ से खुद को ठगी सी महसूस करने लगी। एक तरफ लोकतांत्रिक ढांचे के द्वारा चुने हुए तानाशाहों की जमात तो दूसरी तरफ आम जनता आमने-सामने हो चुकी है। कल की बहस हमने देख ली और आज समाचार पत्रों में पढ़ भी लिया होगा। कल का दिन मंहगाई के बली चढ़ गया। भाजपा के नेताओं को बोलते-बोलते भूख लग गई सो देश की जनता अपने टी.वी.सेट को ताकती रह गई। नेतागण खाने चले गये। पुनः संसद की कार्यवाही शुरू हुई तो 90प्रतिशत सांसद पक्ष-प्रतिपक्ष नेता, उपनेता सबके सब संसद से नदारत दिखे। आज लोकपाल बिल पर भी कुल इसी प्रकार की बहस की उम्मिद हम इन भूखरों से करते है जो न सिर्फ संसद क अंदर मुफ्त का माल गटगते हैं देश को भी भीतर ही भीतर खोखला करते जा रहें हैं।
ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि क्या जिस चुनावी ढांचे के अंर्तगत हम इन बेईमानों को चुनकर संसद में भेजते है क्यों न हम इस व्यवस्था को ही मूलरूपेन बदल डालें? इसके लिए जनता को बगावत करनी होगी और यह तभी संभव हो सकेगा जब कोई छोटी सी ही सही एक इमानदार राजनैतिक दल को इस आंदोलन से जुड़कर न सिर्फ सत्ता परिवर्तन की बात करनी होगी। देश की वर्तमान संसदीय प्रणाली को भी बदलने के लिए कारगार कदम उठाने के वादे जनता से करे तभी इन बेइमानों को पूर्ण रूप से बदला जा सकेगा। अन्त में मेरी एक कविता के कुछ अंश से अपनी बात को आज विराम दूँगा-


जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हे से पहरेदारों में।


न्यायपालिका जब यहाँ पर,
हो जायेगी गूँगी तब,
संसद में बैठे नेतागण,
चिर का हरण करेगें तब।
कौन बनेगा ‘कृष्ण’ यहाँ,
किसकी सामत आयी है,
कलियुग के भीम-गदा को देखो,
युधिष्ठर, नकुल, सहदेव कहाँ
‘अर्जून’ की तरकश में अब,
वाणों का वह वेग कहाँ,
भीष्मपितामह की वाणी में,
ममता-व- स्नेह कहाँ,
‘धृतराष्ट्र’ ढग-ढग पे देखों,
सत्ता के गलियारों में,
दुर्योधन की गिनती कर लो,
चाहे हर मंत्रालयों में।।


शम्भु चौधरी का संक्षिप्त परिचयः
श्री शम्भु चौधरी का जन्म 15 अगस्त 1956 को कटिहार (बिहार) में हुआ। गत 30 वर्षों से कोलकाता में ही स्थाई निवास। आपकी एक पुस्तक "मारवाड़ी देस का ना परदेस का" प्रकाशित। बचपन से ही कविता, लघुकथा, व सामाजिक लेख लिखना, देश के कई पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा, कविताओं, सामाजिक व राजनैतिक विषयों पर लेखों का प्रकाशन। स्वतंत्र पत्रकारिता करना व सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनमानस को जगाना। "देवराला सती काण्ड" के विरुद्ध कलकत्ता शहर में जुलूस निकालकर कानून में संसोधन कराने में सक्रिय भूमिका का निर्वाह। सामाजिक विषय पर चिन्तनशील कई पुस्तकों का सम्पादन। समाज के युवाओं को संगठित कर उनको विकासमूलक कार्यों में लगाना, राजनीति का सामाजिकरण करना, व स्वतंत्र पत्रकारिता में रुचि। कोलकात्ता से प्रकाशित "समाज विकास" सामाजिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक पद पर कार्य कर चुके श्री चौधरी जी के कई लेखों ने सामाजिक और राजनीतिक समिकरण में बदलाव लाया है। वर्तमान में आपने श्री अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को अपना नैतिक समर्थन देते हुए अपनी कलम को इस आन्दोलन से जोड़ दिया है। आपके द्वारा 2ब्लाग भी संचालित किये जातें हैं जिनके पते निम्न हैं।


  • ehindisahitya.blogspot.com



  • samajvikas.blogspot.com

  • शुक्रवार, 24 जून 2011

    लोकतंत्र के प्रहरी - शम्भु चौधरी



    चाळो केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री या बात तो कबूल करी कि वे समाज का सदस्यावां साथे कुछ मुद्दा म अभी भी असहमत है। यानी कि बिना के ही मुंडा से आ बात निकली कि वे ‘‘कुछ बिंदुओं पर हम असहमत होने के लिए सहमत हो गए हैं।’’ आ बात पढ़ मेरो तो माथो ही ठिनकगो। भ्रष्टाचार का मुख्य-मुख्य जो स्त्रोत हा सबने वे बिल से हठा दिया या जान संगळा का पौ-बारह हो गया। सारा भारत में दीपावली मनाने को एलान कर दियो। कई लोग राजना कहता कि दिल्ली भ्रष्टलोगां की नगरी है दिल्ली के संसद के शीतकालिन सभागार में जो नये-नये विचार पैदा होते हैं वह तो बंगाल में भी नहीं हो सकते। बंगाल वाले को बड़ा गुमान था ‘‘बंगाल जो आज सोचता है, भारत उसे कल सोचता है।’’ अब देखो आपने कभी सपने में भी यह सोचा था इतना तगड़ा बयान सरकार की तरफ से आयेगा कि लोग सोचते ही रह जायेगें कि आखिर जब सरकार सहमत हो चुकी तो फिर विवाद का प्रश्न ही कहाँ बचा। समाज के सदस्यों को तो सिर्फ धमकी देना आता है। देश के तमाम अखबार जिनको सरकारी रिश्वत बतौर विज्ञापन मिलते हैं उन सबको सूचना भेज दी गई कि वे सरकार का पक्ष मजबूती के साथ जनता के सामने रखें और जो सरकार को अधिक खुश यानी अन्ना के खिलाफ सरकारी पक्ष का साथ देगें उनका कोटा डबल कर दिया जायेगा। अब आप ही सोचिये घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या? खासकर उन समाचार पत्रों को तो सोचना ही पड़ता है जो डरपोक किस्म के प्रजाति के प्राणी हैं। जिनको समाचार की भूख से ज्यादा विज्ञापनों की भूख रहती है। जिस पर सरकारी विज्ञापन न मिले तो इनके प्राण पखेरू ही उड़ जायेगें। अखबार हालां कि या हालत देख मुझे कबीरदास की दो लाइनें याद आने लगी-


    माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
    एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥


    रोजना सरकार को भला बुरा कहने वाले मीडिया और समाचार वाले भ्रष्टाचार बिल पर इस कदर चुहे की तरह बिल में जा छुपे कि कोई इनको लोकतंत्र का रक्षक कहे तो सुनने में भी अब शर्म आने लगी। बेचारे कबीरदास ने भी नहीं कल्पना की होगी की उनके दोहे का मट्टी से भी बुरा हाल कर देगें ये राजनीतिज्ञों के दलाल जो खुद को लोकतंत्र का प्रहरी बताते हैं और आम जनता के पीठ पर ही कलम की धार से वार करने में नहीं चुकते। इस लेख के माध्यम से एक सीध सा सवाल सबसे करना चाहता हूँ देश में पिछले पांच-दस सालों में भ्रष्टाचार के जो मामले मीडिया और समाचार पत्र वालों न मिलकर उजागर किये वे सभी के सभी किस समूह से जुड़े हुए थे? जिसमें सत्ता पक्ष से जुड़े कितने थे और अन्य मामाले जिसमें सरकारी अधिकारियों के कितने थे? चाहे वो राज्य सत्ताधारियों के मामले रहे हों या केंद्र सत्ताधारी के हों। सरकार किसकी रही हो या नहीं रही हो। देश के तमाम राजनैतिज्ञों को खुली चुनोती देता हूँ कि वे इस बात के आंकड़े प्रस्तुत करें कि पिछले 10 सालों में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आयें हैं उनमें कोई भी सांसद, विधायक, मंत्री का नाम शामिल नहीं है और जो भी मामले सामने आये हैं वे सभी झूठे और मनगढ़ंत मामले हैं जिनमें भ्रष्टाचार का कोई मामला बनता ही नहीं। आपके उत्तर का मुझे बेसब्री से इंतजार रहेगा।

  • Q-1: हाँ! उन समाचार वाले से भी एक प्रश्न करता हूँ- सरकार, अन्ना हजारे की बात को जरा भी तबज्जू न दें पर सरकार जिस बिल को संसद में लाना चाहती है उन बिल के दायरे में इन भ्रष्टाचारी लोगों को होना जरूरी हो कि नहीं? जो इस बात का जबाब दे सकेगा उनकी गुलामी जिंदगी भर करूँगा, यह मेरा वादा रहा। प्रश्न - "देश के तमाम राजनैतिज्ञों/समाचार वाले को खुली चुनोती देता हूँ कि वे इस बात के आंकड़े प्रस्तुत करें कि पिछले 10 सालों में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आयें हैं उनमें कोई भी सांसद, विधायक, मंत्री का नाम शामिल नहीं है और जो भी मामले सामने आये हैं वे सभी झूठे और मनगढ़ंत मामले हैं जिनमें भ्रष्टाचार का कोई मामला बनता ही नहीं।"

  • Q-2: दूसरा प्रश्न देश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग विशेष से भी करना चाहता हूँ कि आप लोगों की ‘‘कुछ बिंदुओं पर हम असहमत होने के लिए आपसे सहमत होते हुए’’ एक सरल सा सवाल करता हूँ- देश में कानून किस लिए बनाया जाता है? और कानून की परिभाषा क्या कहती है? देश के सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों के लिए भ्रष्टाचार कानून तो बने पर सरकारी पक्ष और सांसदों को इससे दूर रखा जाय। कहने का अर्थ है कि भ्रष्टाचार के अलग-अलग दो अर्थ कैसे हो सकते हैं? आने वाली पीढ़ी को भ्रष्टाचार के कितने अर्थ पढ़ने पड़ेगें जरा शब्दकोष में इसको भी परिभाषित कर देगें तो पाठ्यक्रमों में बच्चों को समझने में सुविधा रहेगी।
  • Q-3: तीसरा और अन्तीम प्रश्न देश के तमाम सांसदों से भी है जिनको लेकर 3 जुलाई को सरकार सर्वदलीय बैठक का आयोजन कर राजनीति का नया मोहरा फेंका है। आम सहमती का। भाई! किस बात की आम सहमती? सरकार पहले यह तो स्पष्ट करे की देश में किस वर्ग को वो भ्रष्टाचारी मानती है और किस वर्ग को नहीं जिनको नहीं मानती उनकी सूची तो जरा जारी करें सरकार। तब तो पता चले कि इस बिल को किन पर लागू किया जाय और किन पर नहीं।

  • रविवार, 19 जून 2011

    लोकपाल चक्रव्यूह - शम्भु चौधरी



    कोलकाता-20जून,2011: कांग्रेस पार्टी की लोकपाल बिल को लेकर नई व्यूह रचना की तैयारी जोरों से चल रही है। अर्थात योजनानुसार कार्य को इंजाम देना।
    लोकपाल चक्रव्यूह क्या है-
    1. कांग्रेस पार्टी देश में चारों तरफ सहयोगी मीडिया व समाचार संपादकों के माध्यम से इस बात को प्रचारित करेगी कि सिविल सोसाइटी के सदस्य तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। उनकी सभी मांगे नहीं मानी जा सकती।
    2. सभी विपक्षी पार्टी को भी भयभीत करना ताकी सिविल सोसाइटी के अड़ियल रूख को नजरअंदाज किया जा सके।
    3. चुने हुए सदस्यों की परिभाषा के सामने में रखते हुए तमाम चुने हुए सदस्यों का एक अलग समूह का निर्माण करना। अर्थात सभी सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कांग्रेस पार्टी का साथ दें यानी कि ‘‘चोर-चोर मौसेरे भाई’’ का नारा देकर सिविल सोसाइटी को अलग-थलग करना।
    4. सिविल सोसाइटी से दो-दो हाथ करना।


    अब इसी क्रम में सरकार ने हमला बोल की राजनीति शुरू करते हुए देश के तमाम बड़े समाचार समूह को प्रलोभन दिया जा चुका है। कि ये लोग सरकारी बात को महत्व प्रदान कर सिविल सोसाइटी सदस्यों को भिलन के तौर पर जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। माननीय श्री प्रणव मुखर्जी, श्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम मानती है कि देश की जनता नासमझ है उनको बिल के किसी भी प्रावधान की कोई जानकारी नहीं है। और चुने हुए सांसदों की देश के प्रति जिम्मेदारी है। साथ ही गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी भी फरमाते हैं कि गांधीजी के सत्याग्रह के हथियार से किसी देश में कानून नहीं बनाया जा सकता। अन्ना का अनशन गांधीजी के अनशन से भिन्न है। अब कांग्रेस सहित प्रायः सभी दल को इस बात कि चिन्ता सताने लगी कि यदि सिविल सोसाइटी की बातें को मान ली गई तो संभतः एक समय ऐसा भी आ सकता है जब देश के आधे से अधिक सांसदों को जेल की सलाखों के अन्दर जाना पडे। श्री अरविन्द केजरीवाल ने भी माना कि भला कोई अपना सुसाइडल नोट भला क्यों लिखेगा? सरकारी पक्ष अब अन्ना समूह से दो-दो हाथ करने का मन बना चुकि है। इस चक्रव्यूह योजना के तहत कांग्रेस अब तमाम राजनैतिक दलों को साथ लेकर चलना चाहती है। कांग्रेस पार्टी मानती है कि वो खुद तो इस बिल को लेकर बुरी तरह उलझ ही चुकि है अब देश के तमाम पार्टियों को भी इसमें 30 जून से पहले ही उलझा दिया जाये ताकि संसद के सत्र में उसकी पोल न खुले। कांग्रेस पार्टी अब जानबुझ कर बिल का विवादित हिस्से को बेतुके सवालों में उलझाने कि योजना बना चुकी है। ताकी बिल संसद के पटल पर रखने से पूर्व ही विवादों में घिर जाय और भ्रष्टाचार निरोधक लोकपाल बिल बैगर किसी अधिक बहस के सदन से बाहर कर दिया जाए। जिस तरह महिला आरक्षण बिल संसद में अपनी लम्बी सांसें भर रहा है लोकपाल बिल का भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। देश के 70 प्रतिशत सासंद और विधायक इस बिल के किसी भी प्रावधन से सहमत नहीं होगें। संसद या विधानसभाओं में जिस धारा के अंर्तगत उनको वोट देने और बोलने का अधिकार प्राप्त है समाज का मानना है कि इस अधिकार के तहत ही संसद और विधानसभाओं में भ्रष्टाचार व्याप्त है। जबकि सरकार का कहना है कि यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही है। उनके स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन है। इस तरह के प्रस्ताव लाने का अर्थ है संसद के आधे से अधिक सांसद पर किसी भी समय मुकद्दमा चलाया जा सकेगा। जबकि सिवलि सोसाइटी कहती है कि जबतक कानून बनाने वाले सही आचरण या वर्ताव नहीं करेगें तब तक देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके कहने का सरल सा अर्थ है जो भी कड़े कानून बने उसे ऊपर से ही लागू किया जाना चाहिये। अन्यथा लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि चोर प्रधानमंत्री बरी संत्री को कड़ी। जैसा कि 3जी मामले में साफ छवि की आड़ में डा. मनमोहन सिंह बचते आ रहे हैं। गृहमंत्री का नाम अब सामने आ ही गया। कुछ दिनों में प्रधानमंत्री को भी सीबीआई के समक्ष प्रस्तुत होना पड़ सकता है चुंकि कांग्रेस इस बात को पहले से ही जानती है कि इस बिल के पारित होते ही उनकी सरकार 3जी मामले में खतरे में पड़ती दिखाई देती है तो इन लोगों ने प्रधानमंत्री को एक संस्था का नाम देकर बचाव की मुद्रा में पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। अब सिविल सोसाइटी के सामने एक ही विकल्प बचा है कि वे देश के तथाकतित चुने हुए प्रतिनिधियों को साफ कर दें कि जनता ने उनको चुन कर भेजा है इसका अर्थ है वे जनता के प्रति न सिर्फ जिम्मेदार हैं उनका दायित्व भी बनता है कि वे जनता की बातों पर अमल भी करें। सरकारी पक्ष अपनी बैतुकी बातों से जनता को गुमराह करने की जगह बिल के सभी पक्षों पर ईमानदारी से बहस करें। क्या सही है और क्या गलत पर पहले ही बहस न कर खुले दिमाग से बिल को संसद के सामने प्रस्तुत करें न कि खुद को स्थापित करने के लिए बिल को संसद में प्रस्तुत व बहस करने से पूर्व ही बिल के मूलभूत संरचना से छेड़छाड़ और खिलवाड़ करना शुरू कर दें। कुछ काम संसद के अन्दर चुने हुए सांसदों के उपर भी छोड़ दें वे भी आपके जैसे चुने हुए ही सांसद हैं जो लोकपाल बिल को पारित करेगें या उनको आपलोगों द्वारा सुझाये हुए प्रावधानों पर अपनी राय देगें। सारा काम आपकी समिति के पांच सदस्य ही तय कर लेगें तो संसद के अन्दर बाकी बचे 540 सदस्य क्या खाख करेगें। लोकपाल बिल के मूल प्रस्तावों के साथ सदन में प्रस्तावित करना ही देश की प्रगति का नया अघ्याय होगा। कांग्रेस पार्टी इस बात को गंभीरता से लेकर अपने शातिरों पर लगाम कसे।

    शुक्रवार, 17 जून 2011

    Suggestions Letter To Lokpal



    आदरणीय अध्यक्ष महोदय,
    लोकपाल बिल ड्राफ्ट समिति,
    नई दिल्ली, भारत।


    महोदय,
    आपने देश के सभी राजनैतिक दलों व राज्य सरकारों को एक पत्र लिख कर निम्न बिन्दूओं पर उनकी राय जाननी चाही। मैं समझता हूँ कि भारत सरकार इस पत्र को आम जनता के लिए जारी करेए कारण कि जिन दलों को या सरकार की राय आपने जाननी चाही उनको देश की जनता ही चुनती है। आप इस बात को स्वीकार करेगें कि पिछले 15-20 सालों में संसद व विधानसभा की गरिमा को गहरा आघात लगा है।
    किस प्रकार संसद के भीतर नोटों के बण्डल उछाल कर भाजपा संसदों ने लोकतंत्र की धजी उड़ाई थी। प्रायः विश्वास मत प्राप्त करते समय संसदों व विधायकों की खुले आम खरीद-फरोक्त होती रही है। जिसके चलते स्वण्भजनलाल की भजन मंण्डली की कहानी अथवा शिबु सोरेन की सौदेबाजी से संसद शर्मसार होता रहा है। कुछ ऐसा ही हाल देश के सभी प्रान्तों में है। आपने जो प्रश्न उठाये उन सभी का यदि एक उत्तर दिया जाय तो यह कि कम से कम भ्रष्टाचार निरोधक इस बिल को बनाते समय दोंनो पक्ष ईमानदारी से जनता के सामने पेश आये। यह काम सिर्फ कांग्रेस के बुते का ही है। आपकी पार्टी में आज भी आप जैसे कुछक ईमानदार लोग बचे हैं। बल्की मैं मानता हूँ इस बिल में सभी कड़े से कड़े प्रवाधान शामिल कर लिये जाने चाहिये कि जिससे संसद व विधानसभाओं की मर्यादाओं को धन-बल की ताकत से चलाने वाले राजनैतिक दलों का नकाब उतारा जा सके। बात काफी है पर इशारा एक ही है देश का भविष्य कैसे सुरक्षित हाथों में रहे इस बात को ध्यान में रखते हुए आपके निम्न प्रश्नों पर मेरी राय आप सभी सदस्यों के समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूँ। आशा है मेरे पत्र को लोकपाल बिल ड्राफ्ट समिति के पटल पर रखा जायेगा।


    Suggestions Letter To Joint Drafting Committee in April 2011







    (i) There have been demands from the Civil society members that one single Act should provide for both the Lokpal in the Centre and Lokayukta in the State. Would your State Government be willing to accept a draft provision for the Lokayukta on the same lines as that of the Lokpal ?
    1. राज्य सरकारों को यह अधिकार देने का अर्थ होगा कि बिल के मूल को अपनी जरूरतों के अनुसार कमजोर करना होगा। अतः मेरी राय होगी कि इस बिल के ड्राफ्ट के मूल से कोई समझौता न किया जाना चाहिये।

    (ii) Should the Prime Minister be brought within the purview of the Lokpal? If the answer is in the affirmative, should there be a qualified inclusion (in which case you may also suggest qualifications for such an inclusion).
    2. आप इस बात से सहमत होंगे जब-जब हंग संसद का गठन हुआ है उस समय प्रधानमंत्री बनने के लिए सांसदों में एक प्रकार से Horse Riding होने लगती है। इस तरह के मुद्दे प्रधानमंत्री की छवि को कई बार विवाद में डाल चुकि है। अतः इस प्रश्न को खुले दिमाग से हल करने की जरूरत है। मेरा उत्तर हाँ है।

    (iii) Should judges of the Supreme Court / High Court be brought within the purview of the Lokpal?

    3. देश का अदालती इतिहास इस बात का गवाह है कि आज अदालतों में न्याय बिकना षुरू हो गया है। अदालत को ईमानदार बनाये रखने के लिये इसे उन पर लागू करना निहायत ही जरूरी है।

    (iv) Should the conduct of Members of Parliament inside Parliament 1 (speaking on voting in the House) be brought within the purview of the Lokpal? (Presently such actions are covered under Article 105 (2) of the Constitution).

    4. आप इस बात से सहमत होगें जब भी सरकार किसी मुद्दे में अल्पमत में आ जाती है तो सरकार को बचाने को लेकर जो मत विभाजन होता है इस समय साफ तौर पर संसदों की खरीद-फरोक्त का मामला सामने आता ही है। इस प्रवाधान से संदिग्ध संसदों की जाँच लोकपाल द्वारा निहायत ही जरूरी है।

    (v) Whether articles 311 and 320 (3) (c) of the Constitution notwithstanding members of a civil service of the Union or an all lndia service or a civil service of a State or a person holding a civil post under the Union or State, be subject to enquiry and disciplinary action including miss all removal by the Lokpal/Lokayukta, as the case may be?

    Yes it Must be


    (vi) What should be the definition of the Lokpal, and should it itself exercise quasi-judicial powers also or delegate these powers to its subordinate officers?

    Yes it Must be


    अन्त में आप सभी सदस्यों से अनुरोध रहेगा कि यह सुनहरा अवसर जो कांग्रेस की सरकार को मिला है इस पर ईमानदारी व जिम्मेदारी पूर्ण दायित्वों का निर्वाह करते हुए इस बिल का सर्वमान्य रास्ता निकालते हुए मजबूती के साथ बिल के प्रारूप न सिर्फ तैयार ही करें सोसाइटी सदस्यों को सम्मान भी देंवे। उनका स्वार्थ सिर्फ देश को भ्रष्टमुक्त करना है न कि आपकी सरकार को गिराना। यह लड़ाई कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं जिसके लिये आप लोगों ने विभिन्न तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये। सभी सदस्य या तो इतिहास के हिस्से बन जायेगें और देश की आनेवाल पीढ़ी आपलोगों को हमेशा याद करेगी या फिर आप लोगों का नाम सदैव काले अक्षरों में अंकित होकर रह जायेगा। आईये हम प्रण लें कि देश का हमसब मिलकर नव निर्माण करें। जय हिन्द!

    - शम्भु चौधरी

    मंगलवार, 7 जून 2011

    कांग्रेस की घिनौनी रणनीति

    तीन जून को दिल्ली के होटल के अन्दर काग्रेस नंगी हो कर बैठी थी। बाबा रामदेव तीन दिन की कांग्रसी मेहमानबाजी का आनन्द उठा रहे थे, मन ही मन सोच रहे थे कि ये चमत्कार कैसे और क्यों हो रहा है। एक बार तो इनको सपने में भी विश्वास नहीं हुआ कि ये भ्रष्ट और बेईमान लोग इतनी आसानी से कैसे उनकर मांगे मान रहें हैं। कहावत है ‘‘चोर चोरी से जाए - हैरा फेरी से न जाए’’ इस बात को आज पत्रकारों के लिए कोट करता हूँ कि ‘‘कलम जब चलती है तो उसकी स्याही खुद व खुद निकलती है, जब रुक जाती है तो स्याही सुख जाती है।’’ भारतीय पत्रकारिता विदेशी पत्रकारिता की तर्ज पर काम न करें। भ्रष्टाचार मिटाने का सारा जिम्मा अन्ना हजारे, बाबा रामदेव जी व अरविन्द केजरीवाल ने ही नहीं उठा रखा है। इस यज्ञ में हमारी भी आहुति होनी चाहिये। देश भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के जाल से जकड़ा हुआ है। उनकी इच्छाशक्ति कभी भी इस व्यवस्था को समाप्त करने की नहीं होगी। हमें चौतरफा हमला करना होगा ताकी तमाम राजनीतिज्ञों के नकाबपोश को उतारा जा सके। 2जी, या कॉमनवेल्थ घोटाले का हमें कभी पता न चलता यदि हमारे पास ‘‘सूचना का अधिकार कानून’’ नहीं होता। हमें जनता को बताना होगा कि ये कितने नकाबपोश देश के गद्दार हैं जो देश को भीतर ही भीतर खोखला किये जा रहें है। बाबा रामदेव जी के साथ 3 जून को दिल्ली के होटल के भीतर क्या घटना घटी इस सच को उजागर करते मेरे पत्रकार मित्र श्री हंसराज सुज्ञ जी का लेख यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया आप अपने समाचार व ब्लॉग पर इसे स्थान दें। - शम्भु चौधरी


    - हंसराज सुज्ञ -


    बाबा रामदेव ने जबसे चार जून को आंदोलन का ऐलान किया था। तब से ही सरकार ने अपनी घिनौनी रणनीति बनानी शुरु कर दी थी। रही बात माँगो की तो मांगे तो कांग्रेस कभी भी किसी भी हालत में नही मान सकती थी। क्यों कि क्या कोई चोर और उसके साथी कभी भी ये मान सकते है कि वो अपनी चोरी का खुलासा करें।
    जब सुप्रीम कोर्ट कह कह के थक गया कि कालेधन जमा करने वालो की सूची जारी करें। जब इस भ्रष्ट सरकार ने आज तक सूची तक नही जारी की। तो काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना और उसको वापस लाना तो बहुत दूर की बात है। क्यों कि ये बात 100 % सही है की खुद इस गांधी फैमिली का अकूत धन स्विस बैँक में जमा है। इस बारे में सनसनी खेज खुलासे बाबा रामदेव की 27 फरवरी की रामलीला मैदान की विशाल रैली में भी हुये थे। जिसमें विशाल जनसमूह उमड़ा था और इस बिके मीडिया ने उस रैली को प्रसारित नही किया था। और जब आस्था चैनल ने उस रैली को दिखाया तो तुरंत इस सरकार ने आस्था चैनल पर इस रैली को दिखाने पर प्रतिबंध लगा दिया। उसके बाद से कांग्रेस का केवल एक ही उददेश्य था कि कुछ ऐसा किया जाये जिससे बाबा रामदेव पे लोगों का विश्वास उठ जाये।
    क्यों कि कांग्रेस जानती थी की उसको किसी भी विपक्षी पार्टी से इतना खतरा नही है जितना बाबा रामदेव से है। क्यों कि उनके साथ विशाल जन समर्थन है। इसलिये कांग्रेस ने एक ऐसी घिनौनी साजिश रची । कि जिससे लोगों का विश्वास रामदेव से उठ जाये। एक जून को जब चार मंत्री एयरपोर्ट पर बाबा को लेने गये तो आम जनता या मीडिया को तो छोड़ो । स्वयं बाबा रामदेव भी नही समझ पाये। कि ये उल्टी गंगा कैसे बही? जब कि कांग्रेस के इस पैतरें का केवल एक ही उद्देश्य था। कि किसी तरह बाबा को प्रभावित करके एक चिटठी लिखवा ली जाये। ताकि बाद में ये साबित किया जा सके। कि अनशन फिक्स था और लोगों का विश्वास बाबा से उठ जाये।
    लेकिन बाबा ने कोई पत्र नही लिखा।
    कांग्रेस ने हार नही मानी दुबारा मीटिँग की फिर भी असफल रही। और फिर उसने तीसरी मीटीँग होटल में की । वहाँ उन नेताओं के पास बाबा की गिरफ्तारी का आदेश भी था। और होटल के बाहर काफी फोर्स भी पहुच गयी थी। नेताओं ने बाबा पर बहुत दबाब बनाया। और ये कहा कि आप की सारी मांगे मान ली जायेँगी लेकिन आप एक पत्र लिखे कि आप अपना अनशन खत्म कर देँगे। आपको ये पत्र लिखना बहुत जरुरी है। क्यों कि ये पत्र प्रधानमंत्री को दिखाना है।और ये एक आवश्यक प्रक्रिया है।
    बिना पत्र लिखे वो बाबा को छोड़ ही नही रहे थे। इसीलिये उस मीटीँग में 6 घंटे का समय लग गया। उस समय बाबा रामदेव ये समझ गये थे कि कुछ षडयंत्र बुना जा रहा है। तब उन्होने संयम से काम लेते हुये पत्र लिखवाने पर तो मान गये लेकिन खुद साइन नही किया बल्कि आचार्य बालक्रष्ण से करवाया। हालाकि कांग्रेस बाबा से खुद साइन करने का दबाब डालते रहे लेकिन बाबा ने समझदारी से काम लेते हुये खुद साइन नही किया।
    तब जाकर बाबा उस होटल से बाहर निकल पाये। उन्होने रामलीला मैदान पहुचते ही ये बता दिया कि उनके खिलाफ षडयंत्र रचा जा रहा है और वक्त आने पर खुलासा करेँगे। उसके बाद चार तारीख को नेताओं ने बाबा को फोन करके झूठ बोल दिया। कि आपकी अध्यादेश लाने की मांगे मान ली गयी है और आप अनशन खत्म करने की घोषणा कर दे। कांग्रेस इस बात का इंतजार कर रही थी कि एक बार बाबा अनशन खत्म की घोषणा कर दे तो उसके बाद वो पत्र मीडिया में जारी कर दिया जाये जिससे ये साबित हो जाये की अनशन फिक्स था और लोगों की नजर में बाबा नीचे गिर जाये। बाबा ने फिर घोषणा भी कर दी की सरकार ने हमारी माँगे मान ली है और वो जैसे ही हमें लिखित में दे देगी ।हम अनशन खत्म कर देँगे। सरकार फिर फस गयी क्यों कि उसने बाबा से झूठ बोला था कि वो अध्यादेश लाने की बात
    लिख कर देगी ।जब कि वास्तव में उसने कमेंटी बनाने की बात लिखी थी। और बाबा जब तक अध्यादेश लाने की बात लिखित रुप से नही देखेँगे। तब तक वो आंदोलन नही खत्म करेँगे। तब कांग्रेस के चालाक वकील मंत्री सिब्बल ने तुरंत मीडिया को पत्र दिखाया और ये जताया कि ये अनशन पहले से फिक्स था। क्यों कि
    सिब्बल जानता था कि मीडिया बिना कुछ सोचे समझे बाबा की धज्जियाँ उड़ाने में लग जायेगा। हुआ भी यही मीडिया ने बिना कुछ समझे चिल्लाना शुरु कर दिया की बाबा ने धोखा किया। लोगों की भावनाओं से खेला आदि।
    जब बाबा को पता चला कि सिब्बल ने एक कुटिल चाल खेली है। तब उन्होने बड़ी वीरता से उस धज्जियाँ उड़ाने को आतुर मीडिया को सारे सवालो के जबाब दिये और स्थिति को संभाल लिया। कांग्रेस अपनी इतनी बड़ी चाल को फेल होते हुये देख बौखला गयी। और उस मूर्ख कांग्रेस ने मैदान में रावणलीला मचा कर अपनी कब्र खोदने की शुरुआत कर दी।

    सोमवार, 6 जून 2011

    सत्याग्रह की नई व्याख्या अन्ना हजारे लिखेगें - शम्भु चौधरी, कोलकाता


    अपनी बातः कांग्रेसी चरित्र
    कोलकाताः 7 जून 2011;
    देश की आजादी से लेकर आज तक कांग्रसी लोगों का एक ही चरित्र सामने उभर कर आया है। पहले नेहरु जी, बापूजी को गुमराह किया करते थे आज सारे के सारे कांग्रसी देश को गुमराह करने के फिराक में लगे रहते हैं। इनके पास तीन प्रमुख हथियार है।
    1. सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम,
    2. लोकपाल बिल व भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की कल्पना एवं
    3. नई-नई व्याख्या करना।

    1. सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम:
    सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम किसी दूसरे के मुंह से सुनना या उनके नाम पर की जाने वाली किसी भी टिप्पणियों पर तत्काल आपे से बहार आकर सबके सब यह दिखाने का अवसर तलाशते रहते हैं कि कैसे वे भी कांग्रेसी दरबार के विश्वास पात्र बन जाये। स्व. सीताराम केसरी, बापू जगजीवन राम और अब हमारे प्रियतम प्रधानमंत्री श्री श्री 420 मनमोहन सिंह जी की कड़ी बनने की ताक में सभी के सभी कतार लगाये खड़े हैं। कब किसका नम्बर आ जाये? बेचारे प्रणब दा इस फिराक में दो बार फिसल चुके हैं। एकबार तो इनको कांग्रेस तक छोड़ना पड़ा, बाद में कहीं दाल न गली तो वापस उसी कचरे के डब्बे में जाकर शामिल हो गये। अब तो उनको नम्बर2 से ही संतोष करना पड़ता है। चुंकि इस बीच कई दूसरे 1नम्बर में स्थान प्राप्त कर लिए। शरद पवार की गर्त आपके सामने है। यह तो रहा कांगे्रसी नेताओं की नौकरी का सवाल। अब देखिये इनके प्रांतीय नेताओं के हाल- बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बंगाल, उडीसा एवम् महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों की हालत। सारे के सारे प्रान्तीय नेताओं के पर कुतर-कुतर कर इन प्रान्तों को दूसरे राजनैतिक दल या खुद के दल से टूटे हुए नेताओं के सहारे किसी प्रकार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाये रखने में लगे हैं। अभी बंगाल में ही देखिये एक समय ममता दीदी को प्रणब दा एण्ड पार्टी ने कांग्रेस से बहार निकाल फेंक, बामपंथियों का हाथ थामे बंगाल का 35 साल तक बंटाधार करते रहने वाले श्रीमान् महोदय को ममता दीदी ने एक बार कह दिया सो कह दिया लेना हो तो लो नहीं तो जाओ। झक मरवाकर इनको ममता दीदी से समझौता करना पड़ा। ठीक ऐसी ही हालात कम व वैसी अन्य प्रान्तों की हो चुकी है। अब तो इस डूबती नैया को सहारा मात्र सांप्रदायिकता की आड़ में एक धर्म विशेष को बार-बार याद करना इनका मुख्य और एक मात्र एजेन्डा बचा गया है।
    अब इनके दूसरे चरित्र को देखें-
    2. लोकपाल बिल व भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की कल्पनाः
    श्री अन्ना हजारे एवं उनके सहयोगियों द्वारा बनाये जा रहे लोकपाल बिल को किसी तरह एक तरफा बिल बनाकर देश को थोपने की रणनीति के तहत कांग्रेसी शातिर दिमाग के धनी श्री कपिल सिब्बल साहेब ने पहले बाबा रामदेव को उकसाया, उन्हें सर पर बैठाया। फिर देखे कि यह बन्दर तो पेड़ से नीचे ही नहीं उतर रहा तो पेड़ को ही रातों रात काट डाला। यह एक सोची समझी साजिश का एक हिस्सा है। सरकार की मंशा कभी भी भ्रष्टाचारियों को सजा देना है ही नहीं, सरकार उनको बचाने के उपाय इस बिल के माध्यम से लाने का प्रयास कर रही है। कल की लोकपाल बिल विधयेक की बैठक में जब ‘समाज’ ने भाग न लेने का फैसला कर लिया तो सरकार ने एक तरफा बैठक कर अपने निर्णय सुना दिये। सरकार को पता है कि यह जो समिति के नाम का जो नाटक उसने रचा है उसके क्या परिणाम निकलने वाले हैं। इस बिल के एक हिस्से पर ‘समाज’ के सदस्यों के विरोध को देखते हुए ही शातिर दिमागी श्री सिब्बल जी ने बाबा रामदेव जी सामने खड़ा कर उनसे एक बयान दिलवाया था कि प्रधानमंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को लोकपाल बिल से अलग रखा जाए। इस बात को लेकर श्री अरविन्द केजरीवाल नाराज भी हुए एवं कहा कि हम बाबा रामदेव जी से बात करेगें। परन्तु तब बाबा रामदेव जी को राजनीति के शातिरों की चालाकी नहीं समझ में आ रही थी। खर! अब बाबा के साथ जो हुआ इसे हम किसी भी दृष्टि से जायज नहीं ठहरा सकते। लोकतंत्र में राजनीति चालें जब तक चली जाती है तब तक जनता लाचार होती है परन्तु जब प्रशासनिक हथियार जब सरकार उठा लेती है तो जनता उसका जबाब देकर रहती है। कांग्रेस अब इसे राजनैतिक रंग देने के लिए कहना शुरू कर दिया कि बाबा रामदेव के पीछे भाजपा एवं संघ के लोग हैं। यह बात कांग्रेस को पाँच दिन पहले नहीं दिखाई दे रही थी क्या? आज अचानक से उन्हें वोट बैंक की राजनीति शुरू करनी पड़ गई। कांग्रेस का यह दूसरा और सबसे खतरनाक कार्ड होता है मुसलमानों को डराना एवं उनके वोट को अपनी झौली में बनाये रखना। यही कारण है जब भी इनको अवसर मिलता है वे हर मुद्दे को सांप्रदायिकाता से जोड़ने का प्रयास करते हैं। अब जरा आप ही सोचिये यह जो विदेशों में कालाधन एवम् देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से सांप्रदायिकता या मकपा, भापका, भाजपा, धर्म-जाति से क्या लेना? हां है लेना-देना है। कांग्रेस की सत्ता इस एक बिल से भारत से समाप्त हो जायेगी। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना मात्र से कांग्रेस का इस जमीन से सफाया हो जायेगा। भला आप भी कल्पना किजियेगा। हां! एक बात और कल माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को दिल्ली के रामलीला मैदान में आधी रात को सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियों की बरसात एवं अंश्रू गैस छोड़े जाने की घटना पर संज्ञान लेते हुए नोटीस जारी की है। कांग्रेसीगण जरा यह बतायेगें कि यह सुप्रीम कोर्ट कौन सी पार्टी के सदस्य हैं?
    इनका तीसरा चरित्र-
    3. नई-नई व्याख्या करनाः
    कांग्रेसियों ने अपने तरह से सत्याग्रह के नये तरिके से मापदण्ड तय करने का प्रयास किया जैसे कांग्रेसियों के अलावा किसी ने आन्दोलन किया ही नहीं हो। बल्कि कांग्रेसियों ने तो सिर्फ सत्याग्रह के नाम पर अपनी रोटी सैंकी है। सिर्फ भारत की ही बात करें तो गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के बाद कोई भी कांगे्रसी ने कभी भी कोई सत्याग्रह किया ही नहीं। न तो आजादी के पहले का कोई इतिहास है ना ही आजादी के बाद का। जो भी आन्दोलन या सत्याग्रह हुए हैं वे सभी गांधीजी के समय के हैं। इसके बाद केवल लाश बेचने, सांप्रदायिकता भड़काने, मुसलमानों को डराने व उनको एकत्रित कर उनके वोट पर सत्ता प्राप्त कर उनका कभी भी विकास न करना और नेहरु परिवार के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हुए अपनी राजनीति धरातल को बनाये रखना यही कांग्रसियों का कुल मिलाकर इतिहास रहा है। कांग्रेसियों की व्याख्या से अब भारत का निर्माण नहीं किया जायेगा। सत्याग्रह की नई व्याख्या अब अन्ना हजारे लिखेगें। जयहिन्द! वन्देमातरम्!

    रविवार, 5 जून 2011

    अपनी बातः ढाक के तीन पाँत - शंभू चौधरी

    Anna Ham Tumare Sath


    कोलकाता, दिनांक 6जून 2011;
    आज निम्न तीन बिन्दुओं पर आपसे बात करूँगाः
    1. भाजपा का अन्धापन,
    2. बाबा रामदेव बनाम लोकपाल बिल एवम्
    3. लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशा।


    1. भाजपा का अन्धापनः
    इस देश में गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, मंहगाई, महिलाओं पर अत्याचार, अराजकता, सांप्रदायिकता, कुपोषन, चिकित्सा, आर्थिक अपराधिकरण, असामाजिक आचरण वालों का राजनैतिक संरक्षण, शिक्षा, किसानों द्वारा आत्महत्या, किसानों की उपजाओ जमीन का व्यवसायीकरण, अनैतिक अधिग्रहण जैसे सैकड़ों मुद्दे भारत के कण-कण में विखरे पड़े हैं, परन्तु पता नहीं संसद के अन्दर पैसे लेकर प्रश्न उठाने वाले भाजपा सांसदों को ये मुद्दे क्यों नहीं वक्त से पहले दिखाई देते। जब कोई इन मुद्दों पर आन्दोलन करता है तो भाजपा वाले सबसे पहले यहाँ पहुँच कर अपनी छवि बनाने का प्रयास करती रही है। रामजन्म भूमि विवाद से लेकर भ्रष्टाचार सहित सभी आन्दोलनों में भाजपा का एक ही चरित्र देखने को मिला कि वो अपने 90 साल के प्रधानमंत्री प्रत्यासी को लेकर लकड़ी से घास खिलाने का काम करती रही है। कभी जिन्ना के नाम पर तो कभी राम के नाम सत्ता का स्वाद लेने की नकाम दौड़ जारी है। पिछले दिनों सरकार ने पेट्रोल के 5 रु. दाम बढा दिये, भाजपा ने एक दिन सांकेतिक हल्ला कर लोगों को सड़कों पर परेशान किया। फिर वही ढाक के तीन पाँत। क्या हुआ? बाबा रामदेव को सबसे पहले मलहम लगाने दौड़ने चाली भाजपा के नेताओं से एक सीधा सा प्रश्न है कि नियत साफ है तो संसद से सारे सदस्यों को इस्तीफा देने को कह कर देश में मध्याविधि चुनाव के लिए जनता के बीच में जाएं और एक शपथ लें कि वे भ्रष्टमुक्त राष्ट्र की कल्पना को मुर्तरूप देने के लिए देश की जनता के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलेगी।

    2. बाबा रामदेव बनाम लोकपाल बिल
    अब बाबा को यह स्वीकार कर लेना चाहिये कि भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के लिए सभी को साथ लेने की जरूरत है। जिसमें किसी भी राजनैतिक दल का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सहयोग इस लड़ाई को कमजोर करना है। बाबा को मान लेना चाहिये कि यदि राजनेताओं में इतनी ही ईमानदारी हुई होती तो बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल या किरण बेदी की कोई जरूरत नहीं होती। देश को आपलोगों से काफी अपेक्षाऐं हैं। बस एक मंच से एक होकर लड़ने कि हमें जरूरत है। आज से ही आप एह ऐलान कर दें कि यह देश की लड़ाई है इसे हम सब मिलकर लड़ेगें।

    3. लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशाः
    जिस प्रकार कांग्रेसी सरकार के शातिर दिमाग ने बाबा रामदेव को अपने जाल में फांस अपने कांटे को निकालने के लिए जनता के दिमाग का 'आईवास' कर रामदेवजी क आन्दोलन को कुचलने की साजिश रची और आंशिक सफल भी रहे माना जा सकता है। हमको यह मान लेना चाहिये कि लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशा को लेकर जनता के बीच जाने की जरूरत है। इसके लिए हमें अब मध्याविधि चुनाव का मार्गा अपनाने की तरफ कदम बढा़ना होगा।