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शनिवार, 15 जून 2019

व्यंग्य: दलाल बन जाओ

रामप्रसाद जी को ना जाने आज क्या भूत सवार हो गया था। बार-बार डाक्टरों की हड़ताल को लेकर विचलित हुए जा रहे थे। राज्य के मुख्यमंत्री ने डाक्टरों की सभी तरह की मांगों को स्वीकार कर लिया था पर डाक्टर अपने जिद पर अब भी अड़े हुऐ थे कह रहे थे नहीं-नहीं ऐसे नहीं हमें तो मरीजों की सेवा करनी है सो हमारे केम्पस में ही आकर मुख्यमंत्री जी को बात करनी होगी।
रामप्रसाद जी बता रहे थे कि किस प्रकार दिल्ली से मछलियों को पकड़ने की तैयारी हो रही थी, पिछले दिनों ही बंगाल में वकीलों ने हड़ताल कर दी थी वह हड़ताल भाजपा समर्थित वकीलों के द्वारा सोची समझी साजिश का ही एक हिस्सा था। नहीं तो जो हड़ताल 30 दिनों से चल रही थी चुनाव समाप्त होते ही क्यों खतम हो गई? और 4-5 माह चलनी चाहिये थी।
कल और आज में फर्क ही क्या पड़ गया था?
बंगाल में जिस प्रकार भाजपा एक सरकार को अस्तव्यस्त करने के लिये करोड़ों का धन झौंक दिया इससे तो यही लगता है अब लोकतंत्र धन के बल पर न सिर्फ खरीदा जा सकता है लोकतंत्र को बेचा भी जा सकता है।
रामप्रसाद जी ने एक समाचार लिखने की जगह एक कविता लिख डाली-

डाक्टरों की हड़ताल ? -शंभु
आज डाक्टर, अपने जिद्द पर अड़े थे
मरीज जिन्दगी और मौत के बीच सड़कों पर पड़े थे।
मांग रहे थे दया की भीख, खुन की बोतल लिये खड़े थे।
डाक्टर’स कोल्डड्रिंग्स पीते हुए, अपनी सुरक्षा की बात कर रहे थे।
दोनों तरफ से तनाव था,
मां के गोद में पांच साल का एक बच्चा तड़फ रहा था,
बुढ़े बाप को सहारा देती उसकी बेटी खड़ी थी।
एक मरीज स्टेचर पर पड़ा था,
दूसरा जमीन पर सड़ रहा था।
दिल्ली से मछलियों को चारा मिल रहा था,
राज्यपाल अपनी रिपोर्ट भेज रहे थे-
"बंगाल में लोकतंत्र भेंटिलेटरी पर है।"
दिल्ली से उसका ईलाज चल रहा था।
करोड़ों का धन पानी में बहाया जा रहा था।
तालाब का जल बदला जा रहा था।
जो भी हो, अच्छा हो रहा था
सबकी अपनी-अपनी
चांदी कट रही थी।
मरीज (लोकतंत्र) फांसी पर लटका खड़ा था।

मैंने रामप्रसाद जी से पूछ ही लिया-
रामप्रसाद जी ! कहां खोये हुए हो समाचार तैयार हो गया क्या? पेपर छोड़ने का समय हो गया।
बोले - ‘‘नहीं यार’’ आज समाचार नहीं जायेगा।
मैंने फिर उनसे पूछा - क्यों क्या हो गया आज?
अपना तो काम ही है कोई मरे, कोई जिये,
समाचार छापने का मजा तो तभी आता है जब एक साथ हजार मरे। "जितने मरेगें उतने बिकेगें।"

रामप्रसाद जी ने अपनी कलम एक तरफ रख दी बोले आज समाचार नहीं छपेगा, क्यों कि छपा तो दिल्ली नाराज हो जायेगा, विज्ञापन बंद हो जायेगा। किसी की नौकरी चली जायेगी या फिर सीबीआई पीछे लग जायेगी।
क्यों कि छपा तो डाक्टर नाराज हो जायेंगे, कल ना ईलाज के नाम पर उनकी जान ले लेगें तो? कौन बचाने आयेगा मुझे।  भाई !
किसी से पंगा नहीं लेने का । साल में 2-3 दिन अखबार ना निकले तो कोई बात नहीं पर किसी को नाराज कर दिया तो मानहानि हो जायेगी।
आपको पता नहीं कल ही हवालात में दो रात बिताकर आया हूँ। जज साहेब कि बात नहीं सुनी थी क्या? यदि सच लिखने से किसी की मानहानि होती हो तो ’सच’ लिखते ही क्यों हो?
आप ही सोचो उच्चतम अदालत के मुख्य न्यायाधीश को नहीं बख्शा गया, उनको भी फंसा दिया। हमारी तो औकात ही क्या है।
मैंने फिर उनसे पूछा - तो हम खायेंगे क्या? चाय-पकौड़ की दुकान तो चला नहीं सकते? कलम चला नहीं सकते?
तब...
रामप्रसाद जी ने बड़े सहजे शब्द में जबाब दिया -  दलाल बन जाओ, माल भी मिलेगा और दाम भी। 

गुरुवार, 13 जून 2019

व्यंग्य: सच’ का बोझ

बस क्या था मानहानि के मामले में 2 दिन की सजा सुना दी जज साहब ने। सजा देते वक्त जज साहब ने भी कहा - "भाई यह कानून ही ऐसा  है कि सच बोलने पर किसी की मानहानि हो सकती है। तो आपलोग ‘सच’ क्यों लिखते हो? "


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दो दिन से रामप्रसाद जी काम पर नहीं आये सुन कर बड़ी चिंता होने लगी। सुना कि वे बीमार हैं। आज मन बना ही लिया कि ऑफिस जाते समय उनसे मिलते चला जाऊँ।
सो बस रामप्रसाद जी के घर की बस पकड़ ली, बहुत पुराने मित्र हैं अपने।  ना उनमें कोई लाग-लपेट ना ही कोई छल-प्रपंच, उनके स्वभाव की जितनी भी चर्चा की जाए कम है। बिना सोचे कुछ भी बोल देते हैं। कोई बुरा माने या भला। रामप्रसाद जी को कुछ फर्क नहीं पड़ता। सच्चे मन के इंसान हैं । जो मन में आया बोल दिया जो अच्छा लगा बोल दिये। पिछले सप्ताह ही जेल से छुटकर आये थे  ‘‘बोलने लगे कि अदालत में उनसे जब जज साहब ने पूछा कि आपने ‘‘अमूक मंत्रीजी’’ के खिलाफ ऐसा क्यों लिखा? तो रामप्रसाद जी ने भी बिना कोई लाग-लपेट के कह दिये कि- ‘‘ वे ऐसे ही हैं तभी ऐसा लिखा है।’’
बस क्या था मानहानि के मामले में 2 दिन की सजा सुना दी जज साहब ने। सजा देते वक्त जज साहब ने भी कहा - "भाई यह कानून ही ऐसा  है कि सच बोलने पर किसी की मानहानि हो सकती है। तो आपलोग ‘सच’ क्यों लिखते हो? "
किसी जमाने में सच लिखा जाना पत्रकारिता का धर्म था अब तो भाई  ‘सच’  लिखना, बोलना मानो अपराध बन चुका है।
घड़ल्ले से झूठ परोस दो बस वाह-वाही हो जायेगी और बहुत वाह-वाही हो गई तो राज्यसभा में सीट भी मिल सकती है वशर्ते कि आप संपादक के पद पर विराजमान हो एवं एक साथ कई पत्रकारों से झूठ लिखवाने की क्षमता रखते हों। खैर... यह सब सोचते-सोचते रामप्रसाद जी के घर पंहुच गया। बस का भाड़ा 7/- रुपये कंडेक्टर को देते हुए बस से नीचे उतरा ही था कि देखा मेरे पीछे से कंडेक्टर ने मेरे ऊपर एक टिकट फैंक दी और आवाज देते हुए कहा - ‘‘भाईसाब! टिकट तो लेते जाओ’’
बस का भाड़ा देते समय मैंने मन ही मन यह सोचा था कि ‘‘ये लोग कितनी मेहनत करते हैं’’ और जानबुझ कर ही टिकट ना लेते हुए बस से नीचे उतर गया था, पर जैसे ही उसने टिकट मेरे सर पर दे मारी। मेरी सारी सोच माचीस की तिली की तरह जमीं पर धराशाही हो गई।

यह सब रास्ते में सोचते रामप्रसाद जी के घर पंहुच गया। देखा कि भाभीजी उनको दवा पिला रही थी।
 मुझे देखते ही रामप्रसाद जी मुसकराते हुए बोले -
"आईये-आईये चौधरी जी!" 
मुझे आते देख भाभी जी ने अपना पल्लु ठीक करते हुए प्रणाम किया और अंदर चली गई।

मैंने उनका हालचाल पूछा और सभी समाचार जानने के बाद उनको एक हफ्ता आराम करने की सलाह दे डाली।
तो रामप्रसाद जी कहने लगे- "चौधरी जी यह क्या मुसिबत आ गई?"
  कल ही ऑफिस से फोन आया था कि आप "वर्क फ्रोम होम" कर लें। यह क्या बला है?

मैंने उनको समझाया कि इससे आपको घर में आराम भी मिल जायेगा और लैपटॉप पर बैठ कर ऑफिस का काम भी हो जायेगा। इसमें हर्ज ही क्या है। छुट्टी भी मिल गई और तनख्वा भी नहीं कटेगा।
तभी भाभी जी अंदर से चाय लेकर आ गई। चाय का प्याला मेरी तरफ देते हुए कहा कि
"इनको आप समझाते क्यों नहीं ? अब इनकी उम्र तो रही नहीं दिनभर ‘सच’ का बोझ ढोहे फिरते हैं । चारों तरफ का माहौल नहीं देखते। "जैसा देश - वैसा भेष" बना लेना चाहिये पर मेरी एक भी नहीं सुनते। कल न इनको.... कहते  हुए वो फफ़क-फफ़क के रो पड़ी। रोते-रोते वह फिर अंदर चली गई।"
मैं और रामप्रसाद जी दोनों यह सुनकर अवाक थे।

शंभु चौधरी
बी.कॉम, एम.ए. (एमसी), एलएल.बी
कोलकाता-700106

शुक्रवार, 7 जून 2019

व्यंग्य - सत्य की जीत - शंभु चौधरी

व्यंग्य - सत्य की जीत    - शंभु चौधरी  

रामप्रसाद जी आज गदगद हुए चल रहे थे मानो देश के पहले स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे वही हो। भगत सिंह के बाद देश के लिए मर मिटनेवाले में उनका नाम भी कभी स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाऐगा। केदारनाथ की शिव नगरी में उनका स्वागत लाल कारपेट बिछा कर किया जाऐगा। काशी में उनके लिए भी दर्शन करने के लिए सैकडों पुरातत्व धरोहर घरों को दहा दिया जायेगा। तीन हजार करोड़ से कभी उनकी भी मूर्ति लगाई जायेगी   

‘रामप्रसाद’ जी कभी सपने में भी नहीं सोचे थे कि उनके साथ भी कभी पांच सितारा मेहमान जैसा व्यवहार किया जायेगा। पिछले साल एक लेख नेता जी के विरूद्ध क्या लिख दिया था कि कोई मालेगांव जैसा विस्फोट हो गया हो। एक साथ कई नेता मेरे ऊपर मानहानि का मुकदमा दाखिल कर दिये। ‘रामप्रसाद’ भी अपनी ज़िद पर उड़े रहे पर अदालत ने उनकी एक ‘न’ सुनी बोले यह नेताओं का अपमान है वे लोकतंत्र के दूसरे स्तंभ हैं आप पत्रकारों की क्या हैसियत जो लोकतंत्र के स्तंभ से सीधा टक्कर लेने की जुर्रत भी कैसे कर सकते हो। पत्रकारों को अपनी सरहदों के अंदर ही काम करना चाहिये। 

अब रामप्रसाद जी तो रहे पुराने ख्यालात के जो सच देखा वह लिख दिया और छप भी गया नहीं तो आजकल किस की मजाल जो सच को छाप दे। अखबारों को भी अपनी जान बचानी है, इनको विज्ञापन आना बंद हो गया तो क्या ‘रामप्रसाद’ की सैलरी से अखबार चलेगा? वहीं संपादक जी को भी दिन-रात इस बात की चिंता सताती रहती है कि ना जाने कब कौन सा समाचार, कार्टून, फिचर किसे बुरा लग जाए? और उनको अदालत में जाकर बार-बार ‘केजरीवाल’ की तरह उनको भी माफी मांगने की नौबत आ जाए। भाई व जमाना कुछ ओर था आज का जमाना कुछ ओर है।

कभी पत्रकारों से नेता डरा करते थे अब पत्रकारों को डर के, सहम के, घुटनों के बल रेंग कर चलना, जी‘सर’ जी‘सर’ करना यानि कि चमचागिरी करना, दलाली करना, बिकाऊ पत्रकार बन जाना, सरकारी आवास (संसद भवन) में तफ़री करने का, संसद भवन के कैंटीन में बैठकर देश की चिंता करने का जो आनंद होता है वह सच्ची पत्रकारिता करने में कहाँ है। अब देश की चिंता नेता और पत्रकार नहीं करेंगें तो कौन करेगा? भले ही कोई इनको ‘‘गोदी-गोदी’’ बोलता रहे। 

अब देखो बेचारे रामप्रसाद जी को ही ‘‘ आ बैल मुझे मार’’ वाली कहावत उनके ऊपर फिट बैठ गई। अदालत ने जैसे ही रामप्रसाद को तीन महीने की सजा सुना दी मानो ‘रामप्रसाद’ जी तो  फूले नहीं समा रहे थे, अब आप पूछो क्यों?
भाई ! कभी इतनी शोहरत रामप्रसाद ने न तो देखी थी ना सुनी थी । तीस साल से पत्रकारिता कर रहे थे शहर की छोड़ गांव का मुखिया तक उनको नहीं पहचानता था, बच्चों की बात ही करना बेईमानी होगी बच्चे तो अखबार पढ़ते ही नहीं तो जानने की बात ही कैसे लिख सकता हूँ।  तो बता रहा था कि आज जैसे ही कमर में रस्सा बांधे ‘रामप्रसाद’ जी को जेल ले जाया जा रहा था तो उनके चारों तरफ पत्रकारों की भीड़ लग गई कोई उनकी फोटो उतार रहा था तो कोई उनके बयान लेने में लगा था। 

रामप्रसाद जी आज गदगद हुए चल रहे थे मानो देश के पहले स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे वही हो। भगत सिंह के बाद देश के लिए मर मिटनेवाले में उनका नाम भी कभी स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाऐगा। केदारनाथ की शिव नगरी में उनका स्वागत लाल कारपेट बिछा कर किया जाऐगा। काशी में उनके लिए भी दर्शन करने के लिए सैकडों पुरातत्व धरोहर घरों को दहा दिया जायेगा। तीन हजार करोड़ से कभी उनकी भी मूर्ति लगाई जायेगी।
चलते-चलते एक पत्रकार ने उनसे पूछा - ‘‘ रामप्रसाद जी कैसा लग रहा है अब आपको?’’ 
रामप्रसाद ने सहजे हुए शब्दों में जबाब दिया - ‘‘सत्य की जीत हुई’’

लेखक स्वतंत्र  पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  

व्यंग्य - जयश्री राम गाओ


रामप्रसाद जी सुबह से ही अपने घर के बाहर खंभा गाड़ने में लगे थे। अचानक से मुझे देखते ही कुछ छल्ला गये।
मैंने उसे एक आवाज दी - ‘‘कैसे हो रामप्रसाद ! ’’
रामप्रसाद - अरे क्या खाख ठीक हूं लोकतंत्र का चौथा खंभा गाड़ रहा हूं।
क्यों क्या हो गया इस चौथे खंबे को? 
रामप्रसाद - यह बार-बार किसी के गोदी में जाकर बैठ जाता है। आज इसे गाड़ के ही दम लूंगा।
मैंने भी रामप्रसाद को और सुलगा दिया -  तेरे एक के गाड़ने से क्या होगा रामप्रसाद! यहां तो कुएं में ही भांग पड़ी है जिसको देखो वही 'गोदी मीडिया' के गोद में जाकर ऐसे इतरा रहा है जैसे अकबर बादशाह के बाद उसी ने जन्म लिया हो। चैनल पर एंकरी नहीं सरकार को चलाने का फरमान उसी के चैनल से निकलता है । मानो अमित शाह, मोदी तो बस इनके बनाये पुतले हैं। 
रामप्रसाद - देख भाई ! फ़िजूल का मेरा दिमाग खराब मत कर कल रात से मैं उसे ही परेशान हूं।
मैं भी कहां चुप होने वाला था। 
"दिमाग तो तेरा खराब ही है। तभी जो लोकतंत्र का स्तंभ है ही नहीं तुम उसे ही गाड़ने में लगे हो।"
कभी संविधान पढ़ा भी है कि अपने मियाँ मिठ्ठू बने फिर रहे हो?
रामप्रसाद - मेरी तरफ ताकते हुए - क्या अलाय-बलाय बोल रहे हो?
अरे अलाय-बलाय मैं नहीं तुम बोल रहे हो। जो चीज अस्तित्व में ही है नहीं, उसे पत्रकार बिरादरी के लोग चाहे कितना भी जोर लगा दे वह अस्तित्व में नहीं आ सकता । आज पत्रकारिता व्यापारिक घराने की रखैल बन चुकी है। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताना भी अब शर्मनाक है।
खोपड़िया घर के चौखट पर लटका के पत्रकारिता करोगे तो सुख पाओगे नहीं तो तोहर हाल भी ......
दाल-रोटी कमाओ और जयश्री राम गाओ। 
लेखक स्वतंत्र  पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  

शनिवार, 1 जून 2019

व्यंग्य: आम चुस के खाओ -


व्यंग्य: आम चुस के खाओ -

चुनाव समाप्त होते ही कई विद्वान पंडितों को मुंह की खानी पड़ी । मानो वे सभी चारों खाने चित्त हो चुके थे अब मौका था उनका जो तुका चलाने में शातिर थे। एक बार गांव में अकाल पड़ा । गांव के सभी लोगों ने मिलकर पास गांव के में एक पंडित के पास जाने की ठानी । जब सभी मिलकर यह विचार की ही रहे थे तो एक अनपढ़ विद्वान उसी गांव से गुजर रहा था, उसने समझ लिया कि ये सभी पानी को लेकर परेशान हैं। मौका अच्छा था। उसे पता था कि पानी तो अपनी मर्ज़ी से आयेगा, क्यों न तब तक इनके ध्यान को किसी दूसरी तरफ उलझा दिया जाए । उसने गांव वालों से कहा कि अगले दस दिनों में बारिश हो सकती है बशर्ते कि गांव के सभी लोग रोज़ाना नियम से भगवान का कीर्तन करें। 


अब क्या था लोग सब काम-धाम छोड़कर भजन-कीर्तन करने में लग गये। मेला जमने लगा। अनपढ़ विद्वान ने भी प्रवचन देना शुरू कर दिया। उसके भी मौज़ होने लगे। वह जानता था कि पानी आयेगा तब आयेगा जाएगा कहां? यह तो प्राकृतिक की देन है अपने समय से आ ही जायेगा। चंद ही दिनों में बादल घिरने लगे, गांव वालों में उत्साह देखे ना बन रहा था। भोज देने की तैयारी शुरू होने लगी । 

जिन टीवी चैनलों ने चुनाव परिणाम के ‘एक्जिट पोल’ किये उनको पता था कि वे कितने झूठे हैं तभी तो वे अपने दावे की तीन दिनों तक पुष्टि नहीं कर पा रहे थे। कोई सामने आकर यह नहीं बोल रहा था कि वे जो बता रहें हैं वे शत-प्रतिशत सही है। जैसे एक ज्योतिषी तुका चला देता है और बिहार में कहावत प्रचलित है ‘‘लह गया तो वाह... वाह... नहीं तो राम.. राम... ’’  चुनाव के समय यह सब आम बात है। काेई पत्रकार यह दावा नहीं  कर सकता कि वह जो आंकड़ें उठा रहा है वही सही है।  हर झूठ के भीतर एक ‘‘बड़ा झूठ’’ और हर सच के अंदर सिर्फ ‘सच’ ही छुपा रहता है। कई बार झूठ,  ‘सच’ साबित हो जाता है पर ‘सच’ तो ‘सच’ ही रहता उसे साबित नहीं किया जा सकता । हाँ कुछ समय के लिए उस सच पर परदा डाला जा सकता है।



ठीक यही हाल था इन टीवी चैनलों के एंकरों का।  चुनाव परिणाम आते ही इनके तो बांझे ऐसे खिल गई  जैसे कोई अनहोनी हो गया हो, उनको भी खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि क्या सच में ऐसा भी हो सकता है? यानि की चुनाव में कुछ भी असंभव नहीं। नामुमकिन को मुमकिन बनाने की कला का नया ज्ञान इन्हें प्राप्त हो गया था।

अब मौका था इनका पलटवार होना स्वाभाविक था। हर जगह आप ही सही हो यह जरूरी नहीं था। मेरे पास भी कुछ पत्रकार आने लगे। 

कल ही रामप्रसाद जी मेरे घर सुबह-सुबह आ टपके। आते ही बोले - और चौधरी जी ! क्या लिख रहे हो?

मैंने भी उनके व्यंग्य का जबाब व्यंग्य से ही दिया। ‘‘ नया कुछ नहीं ! बस सोच रहा हुँ कि पकौड़े की दुकान खोल लूँ। क्यों कैसा रहेगा?

रामप्रसाद - हैं... हैं... हंसते हुए अरे आप तो नाराज़ हो गये मैं तो बस यूँ ही पूछ लिया। 

मुझे समझाते हुए  ‘‘अब देखो भाई! समय के साथ चलो अपना क्या कोई चुनाव जीते हारे, तनख़्वाह तो उतनी ही मिलेगी जो कल मिलती थी।’’

मैंने भी बात को साकारत्मक ढंग से लेते हुए जबाब दिया - ‘‘ हां सो तो है पर एक बात समझ में नहीं आती कि भाई अमित शाह को सब कुछ पहले से ही कैसे पता था? .थोड़ा रूक कर.. कि ...

उसको 300 प्लस सीटें आयेंगी। बंगाल में 20-22 सीटें आ जायेगी? अभी तक गले से नीचे नहीं उतर रहा।

रामप्रसाद - पलटकर जबाब देते हुए छोड़ो यार इन पचरों में पड़ कर क्या होगा?। सुना नहीं मोदी जी ने चुनाव से पहले क्या कहा था ?

मैं फिर आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगा - क्या कहा था?  "कुछ समझा नहीं यार ... प्रश्न भरी निगाहों से रामप्रसाद को देखने लगा ..."

रामप्रसाद - अरे भाई ! आम चुस के खाओ, चुस के खाने के मजा ही कुछ ओर है।

जयहिन्द !

लेखक स्वतंत्र  पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी