आपके ताजा बयान जिसमें आपने सरकार और सिविल सोसायटी के बीच मतभेदों को बढ़ावा न देने की अपील की है हम इसका स्वागत करते हैं। हम सरकार से भी चाहते हैं कि वे सिविल सोसायटी के सदस्यों की भीतरी जांच जैसी कायरता पूर्ण कार्रवाई से बाज आये। नहीं तो देश भर के सांसदों और नेताओं की भी जांच शुरू कराने के लिए व्यापक जन आन्दोलन शुरू किया जा सकता है। हम जानते हैं कि वर्तमान सरकार में कुछ अच्छे सदस्य भी हैं जो देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहें हैं। संसदीय समिति के अध्यक्ष एवं स्व.लक्ष्मीमल सिंघवी जी के पुत्र श्री मनु सिंघवी जी पर भी हमें पूरा भरोसा है कि वे जो भी निर्णय लेगें वह देश के व्यापक हितों को ध्यान में रख कर लेगें। देश की भावना को महत्व देगें न कि भ्रष्ट नेताओं के चक्कर में पड़ कर पुनः आन्दोलन का रास्ता खोल दें जैसा कि हमारे पूर्व एक भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री जी ने किया जिसके चलते देश को 12 दिन का प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ा था।
सिविल सोसायटी के सदस्यों की जांच कर आप देश भर में एक जहर का सृजन करने का प्रयास कर रहें हैं। आपको यह ध्यान रखना चाहिये कि कोई दूध का धुला नहीं है। यदि आपकी सरकार का यही रवैया रहा तो आपकी सरकार जाने के बाद किस-किस की जांच होगी तब इसके लिए आपको भी तैयार रहना चाहिए। नेक कार्य को नेक ही रहने दें। किसी का नुकसान कर देश में एक नई परंपरा कायम की जा रही है। हाँ! इतना ज़रुर याद रखियेगा कि जिस तरह से श्रीमती किरण जी और अरविन्द केजरीवाल को परेशान किया जा रहा है इससे काँग्रेसी का भला तो कुछ नहीं होगा देश को इससे काफी क्षति होगी। जरा मन की अंतरात्मा को पूछ कर देख लिजिऐगा। इस तरह कि कार्यवाही से हमलोगों काफी आहत हुएं हैं कि किन बेईमानों को देश सौंप दिया गया है। इस तरह भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री हमें न तो कमजोर कर सकते हैं न ही देश लूटने लाइसेंस ही हम देगें इनको। -एक सदस्य
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011
सलमान खुर्शीद जी का ताजा बयान -
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:01 pm 0 विचार मंच
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सोमवार, 29 अगस्त 2011
लोकतंत्र के प्रहरी?- शम्भु चौधरी
श्री रामचन्द्र गुहा सहित देश के तमाम विद्वानों को मेरी खुली चुनौती है कि वे अपने विचार इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए दें। किसी व्यक्ति विशेष की कार्यशैली आपको हमको भले ही पसंद न आती हो, श्री अन्ना के आंदोलन से अलग-अलग मतभेद हो सकते है परन्तु संसद की मर्यादा के प्रश्न पर किसी को भी कोई मतभेद नहीं होना चाहिए। जो बात संसद के अन्दर और बहार राजनैतिक तरीके से लड़ी जा सकती थी उसको संसद की मर्यादा के साथ जोड़कर आखिरकार क्यों लड़ी गई? क्या सरकार यह बताना चाहती है कि संसद सिर्फ चुने हुए चन्द सांसदों की ही धरोहर है? या सिर्फ राजनेताओं की जमींदारी है संसद? कि वे जैसा चाहे वहाँ बैठकर करते रहे जनता कुछ भी आवाज उठायेगी तो संसद की मर्यादा समाप्त हो जाऐगी तो फिर यह कैसा लोकतंत्र है?
कोलकातः 29 अगस्त 2011
संसद ने आखिरकार एक मजबूत लोकपाल बिल लाने का मार्ग प्रशस्त कर ही दिया। लगातार पाँच माह की आना-कानी के बाद सरकार सहित तमाम विपक्ष को लोकतंत्र के आगे सर झूकाना पड़ा। जिस संसद में जनता के द्वारा जनता के लिए जनता के प्रतिनिधि को देश की जनता चुन कर भेजती है उसी संसद के भीतर पंहुचकर यही सांसद, संसद को ढाल बनाकर खुद की नाकामी को छुपाने या जनता के जबाबों से बचने का प्रयास करती है तो हमें यह मान लेना चाहिए कि ये लोग देश की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करने में पूर्णतः असक्षम हैं। श्री कपिल सिब्बल एवं गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी के कुतर्क ने पिछले एक माह से देश की जनता को झकझोर कर रख दिया था।
देश के इतिहास में संसद को इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में लाने के लिए पूरी संसद ही इसकी जिम्मेदार है। मजबूत लोकपाल बिल बनाने पर गत चार-पांच माह से सरकार सिविल सोसाएटी से बातें कर रही थी। एक सरकारी गजट के माध्यम से ड्राफ्टींग समिति भी बनाई गई। दो माह इस समिति में चर्चा भी की गई।
जैसे-जैसे सरकार की कलाई संसद में खुलती चली गई सरकारी लोकपाल बिल के मुद्दे पर घिरती चली गई और सड़कों पर जनता उतरने लगी। एक तरफ सरकार देश की जनता को गुमराह करने के लिए न सिर्फ कमजोर व अपंग लोकपाल बिल संसद में प्रस्तुत किया तो दूसरी तरफ श्रीमती अरुणा राय को अचानक से सामने ला खड़ा कर श्री अन्ना हजारे के एवं सिविल सोसायेटी के बिल को उलझाने का प्रयास करती दिखी। साथ ही इन दोनों स्थिति का बचाव करने के लिए सरकार ने अपने तर्क, सिद्धांत, संसद में बहस, जनता की राय को अनदेखा कर एक साथ पूरी संसद की प्रतिष्ठा को ही दाव पर लगा दिया। सरकार के इस तर्क को कि संसद की मर्यादा ही सर्वोच्चय है और संसद में ही बिल पर बहस होनी चाहिए अथवा संसद ही कानून बनाएगा आदि जैसे बयान से साफ होता दिख रहा था कि सरकार ऐन-केन-प्रकारेण का रास्ता अख्तियार कर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का प्रयास करती दिखाई दे रही है। जिस संसद के अन्दर आधे से अधिक सांसद पूर्णरूपेण न सिर्फ भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं सत्ता के सौदागर बने हुए हैं। खुद प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंहजी ने भी संसद में स्वीकार किया की उनकी सरकार गठबंधन धर्म के आगे विवश है। इस संकेत से साफ जाहिर होता है कि देश की सत्ता सौदागरों के हाथों गिरवी रखी जा चुकी है। जो देश को हर कोने से नोच कर खा रहे हैं। अब चुकिं सरकार के सामने कोई विकल्प नहीं बचा तो इन लोगों ने संसद को ही दाव पर लगा दिया।
मुझे तब अत्याधिक आश्चर्य होता है जब समाज का बुद्धिजीवी तबके के कुछ लोग भी जो खुद को लोकतंत्र का प्रहरी बताते नहीं थकते और सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से सरकार का पक्ष प्रस्तुत करने में लगे हैं सरकार की इस चालाकी पर अभी तक कोई सवाल नहीं खड़े किए। मुझे समाज के उस तबके से भी बहुत निराशा हाथ लगी जो संसद की मर्यादा की बात तो करते दिखे पर लोकतंत्र को एक भीड़ की संज्ञा देने से नहीं चुके। सबसे दुखद तब लगा कि जो लोग राजनैतिक रूप से देश के संचालन का भार संभाले हुए हैं ये लोग संसद को अपनी जागिर समझ बैठे हैं। आम जनता की भावना से किसी को कुछ भी लेना देना नहीं। श्री अन्ना के विचारों से या जन लोकपाल से सबका सहमत होना या एकमत होना जरूरी नहीं। विचारों की टकराहट हो सकती है परन्तु सरकारी लोकपाल बिल पर किसी भी दृष्टि से टकराहट की भी कोई संभावना नहीं बनती इसे संसद में प्रस्तुत कर और संसद को ढाल बना भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नये-नये तर्क देना कहाँ तक उचित है इसपर कोई कुछ नहीं कह पा रहा है।
श्री रामचन्द्र गुहा सहित देश के तमाम विद्वानों को मेरी खुली चुनौती है कि वे अपने विचार इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए दें। किसी व्यक्ति विशेष की कार्यशैली आपको हमको भले ही पसंद न आती हो, श्री अन्ना के आंदोलन से अलग-अलग मतभेद हो सकते है परन्तु संसद की मर्यादा के प्रश्न पर किसी को भी कोई मतभेद नहीं होना चाहिए। जो बात संसद के अन्दर और बहार राजनैतिक तरीके से लड़ी जा सकती थी उसको संसद की मर्यादा के साथ जोड़कर आखिरकार क्यों लड़ी गई? क्या सरकार यह बताना चाहती है कि संसद सिर्फ चुने हुए चन्द सांसदों की ही धरोहर है? या सिर्फ राजनेताओं की जमींदारी है संसद? कि वे जैसा चाहे वहाँ बैठकर करते रहे जनता कुछ भी आवाज उठायेगी तो संसद की मर्यादा समाप्त हो जाऐगी तो फिर यह कैसा लोकतंत्र है?
सरकार ने मजबूत लोकपाल बिल बहस के मुद्दे को संसद की गरिमा के साथ जोड़कर न सिर्फ अपनी अक्षमता का परिचय दिया, बल्कि देश के लोकतंत्र पर एक प्रश्न चिन्ह भी लगा दिया है। अपनी नाकामी को संसद की मर्यादा का जामा पहना कर सरकार ने एक गहरी साजिश देश की जनता के साथ की है। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की या न कसने के इरादे को सरकार ने राजनीति तरीके से लड़ा होता तो कुछ बात समझ में आती है। परन्तु जिस प्रकार सरकार ने संसद की मर्यादा को ढाल बना कर विपक्ष सहित देश के तमाम बुद्धिजीवियों को बहकावे में लाने का प्रयास किया है यह इस सरकार के लिए ही नहीं देश की तमाम राजनैतिक दलों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।
सरकार ने मजबूत लोकपाल बिल बहस के मुद्दे को संसद की गरिमा के साथ जोड़कर न सिर्फ अपनी अक्षमता का परिचय दिया, बल्कि देश के लोकतंत्र पर एक प्रश्न चिन्ह भी लगा दिया है। अपनी नाकामी को संसद की मर्यादा का जामा पहना कर सरकार ने एक गहरी साजिश देश की जनता के साथ की है। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की या न कसने के इरादे को सरकार ने राजनीति तरीके से लड़ा होता तो कुछ बात समझ में आती है। परन्तु जिस प्रकार सरकार ने संसद की मर्यादा को ढाल बना कर विपक्ष सहित देश के तमाम बुद्धिजीवियों को बहकावे में लाने का प्रयास किया है यह इस सरकार के लिए ही नहीं देश की तमाम राजनैतिक दलों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।
सरकार के इस दुर्भाग्य पूर्ण प्रयास को अभी तक किसी ने नहीं सोचा कि यह जिस आग से वे खेल रहे थे उनके ही हाथ जल गये इस हवन में। जिस संसद में सरकार को राजनैतिक निर्णय लेने थे सरकार संसद ही दांव पर लगा कर अपने राजनीति हितों की रक्षा करने में जूट गई थी। षुरू में ही यदि सराकर ईमानदारी से चाहती तो पिछले चार-पांच माह में जितनी बहस इस बिल को लेकर सरकार से हो चुकी थी सरकार एक सक्षम लोकपाल बिल संसद में प्रस्तुत कर सकने में आसानी से सक्षम हो सकती थी, परन्तु देश का यह दुर्भाग्य ही कह लें सरकार तर्क का सहारा लेती रही और देखते ही देखते जनता सड़कों पर उतर गई। संसद की गरिमा को ताक पर रख सरकार ने लोकपाल बिल का बचाव षुरू कर दिया। जबकि देश की जनता मंहगाई और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सरकार के साथ खड़ी थी परंतु सरकार ने उसे अपना दुश्मन मान कर जो व्यवहार करती दिखी। इससे न सिर्फ सरकार को, विपक्ष को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। संसद को ढाल बना कर सांसदों की बयानबाजी सरकार व विपक्ष को कितना मंहगा पड़ा इसे सारी दुनिया ने देख लिया कि भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए सरकारी पक्ष ने संसद की गरिमा के साथ किस प्रकार खिलवाड़ किया। अन्ना के इस आंदोलन ने लोकतंत्र के प्रहरियों की कलाई खोलकर रख दी है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:21 pm 0 विचार मंच
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मंगलवार, 23 अगस्त 2011
जनता सड़कों पर क्यों?
फेसबुक पर दुनिया भर के युवक इस तरह के प्रश्न पूछते नजर आ रहें हैं कि क्या वैगेर किसी रक्त-पात के किसी आन्दोलन को आम जनता तक पंहुचाया जा सकता है? या फिर सरकार झूक जाएगी? जो खुद ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट व्यवस्था की शिकार है?, या फिर यह भी पूछा जा रहा है कि विपक्ष इस मामले में दोहरा मापदण्ड क्यों अपना रही है? साथ ही राजनेताओं से जुड़े कई सवाल जो फेसबुक के माध्यम से जानने की चेष्टा कर रहे हैं।
इन सबके बीच ये लोग यह भी जानकारी करना चाह रहें हैं कि इस आंदोलन को किस तबके का समर्थन मिल रहा है। राजनैतिक पार्टीयों की भूमिका पर भी प्रश्न पूछे जा रहें हैं। यह भी प्रश्न किया जा रहा है कि सिर्फ हाथों में तिरंगा झण्डा और गांधी टोपी लगा कर आंदोलन करने से सरकार आपलोगों की बात मान जाऐगी?
जनता सड़कों पर क्यों?
अब होगा कि कल होगा,
लोकतंत्र का है देश ये यारो!
जब मन होगा क्या तब होगा।
क्या भ्रष्टाचार कम होगा?
होगा-होगा कल होगा।
क्या देश लूटना बंद होगा?
होगा-होगा कल होगा। (स्वरचित)
आज श्री अन्नाजी के अनशन का आठवां दिन होने जा रहा है उनकी सेहत में भी तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है। भारतीय लोकतंत्र को दुनिया भर में आश्चर्य की निगाहों से देखा जा रहा है। भारत सहित विश्वभर में प्रदर्शन होने लगे। जन सैलाब उमड़ता जा रहा है। कल आघी रात के समय भी दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों की संख्या में समर्थक हाथों में फूल लिए ईश्वर से प्रार्थना करते देखे गये। देश भर में प्रर्दशन हो रहे हैं। सांसदों के घरों के बहार भी आंदोलनकारी जूटने लगे। अबतक देश के विभिन्न हिस्सों से 100 से भी अधिक सांसदों के घर के बहार विरोध प्रर्दशन किया जा चुका है।
कोलकात स्थित जिस जगह मेरा निवास है यहाँ भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति के पास (सेन्ट्रल पार्क) पिछले पांच दिनों से नियमित रूप से रोजाना रात्रि 8 बजे सैकड़ों युवक एकत्रित हो मशाल जुलूस निकाल रहे हैं। गांधी टोपी पर लिखा होता है- ‘‘मैं अन्ना हूँ’’ कोलकाता शहर में चारों तरफ छोटी-छोटी टूकरियों में शांतिपूर्ण आन्दोलन-प्रर्दशन करते लोगों को देखा जा सकता है। शहर के आस-पास के ईलाकों में, जैसे रिसड़ा-हिन्दमोटर, बारासात, दमदम, हवड़ा आदि सभी जगहों पर जन लोकपाल व श्री अन्ना के समर्थन में नारे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही यहाँ इस बात का भी जिक्र जरूरी है कि कोलकाता से प्रकाशित एक-दो समाचार पत्रों को अब कुछ कहने को नहीं मिला तो उसने विशाल जन समुह में होने वाली छोटी-मोटी हरकतों को ही छापना शुरू कर दिया ताकी यहाँ एक खास वर्ग को खुश रखा जा सके। वैसे भी अभी तक सरकारी कर्मचारी और राजनैतिक दलों का परोक्ष रूप से इस आंदोलन को समर्थन न के बराबर ही है। इसलिए इस आंदोलन को विशुद्ध सामाजिक आंदोलन कहा जाना मुझे ज्यादा उपयुक्त लगता है।
भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने की इस जन आन्दोलन में उमड़ता जन-सैलाब न सिर्फ लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है दुनिया भर में इस आंदोलन पर बहस भी छिड़ चुकी है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में हिस्सा ले रहे जन सैलाब पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही है। भारत के भ्रष्टाचार जन आंदोलन से आज दुनिया भर की युवा पीढ़ी प्रभावित दिखती है।
विश्व के कई देश भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में जकड़ चुके हैं। फेसबुक पर दुनिया भर के युवक इस तरह के प्रश्न पूछते नजर आ रहें हैं कि क्या वैगेर किसी रक्त-पात के किसी आन्दोलन को आम जनता तक पंहुचाया जा सकता है? या फिर सरकार झूक जाएगी? जो खुद ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट व्यवस्था की शिकार है?, या फिर यह भी पूछा जा रहा है कि विपक्ष इस मामले में दोहरा मापदण्ड क्यों अपना रही है? साथ ही राजनेताओं से जुड़े कई सवाल जो फेसबुक के माध्यम से जानने की चेष्टा कर रहे हैं।
इन सबके बीच ये लोग यह भी जानकारी करना चाह रहें हैं कि इस आंदोलन को किस तबके का समर्थन मिल रहा है। राजनैतिक पार्टीयों की भूमिका पर भी प्रश्न पूछे जा रहें हैं। यह भी प्रश्न किया जा रहा है कि सिर्फ हाथों में तिरंगा झण्डा और गांधी टोपी लगा कर आंदोलन करने से सरकार आपलोगों की बात मान जाऐगी? जिसने एक लम्बी चर्चा के बावजूद विवादित बिल ही सदन के पटल पर प्रस्तुत कर संसद की स्थाई समिति को भेज दी हो ऐसी सरकार से आपलोग किस तरह की अपेक्षा रखते हैं। भारत सरकार की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े किए जा रहे हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि स्थाई समिति पुनः समय लेकर इस आंदोलन को शांत कर दे, जैसा सरकार ने पहले भी किया था ज्वांईड ड्राफ्टींग कमेटी बना कर। जिसका परिणाम सिर्फ उनकी भ्रष्ट मानसिकता ही निकली सरकारी लोकपाल बिल के रूप में।
साथ ही यह भी जानकार ली जा रही है कि जिस संसद में भ्रष्ट लोगों का ही बहुमत है और विपक्ष भी जन लोकपाल पर पूरी तरह सहमत नहीं तो यह कैसे संभव हो पायेगा कि यही संसद जन लोकपाल को संसद में स्वीकार कर पारित कर देवें? साथ ही यह शंका भी जाहिर की जा रही है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही मजबूत व प्रभावी लोकपाल की बात कर रही है। तब फिर देश की जनता सड़कों पर क्यों उतर गई?
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 6:17 am 0 विचार मंच
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गुरुवार, 18 अगस्त 2011
देख लो सारा वतन!
"देश की जनता जब अपने मूंह पर पटी बांध ले तो या तो आप इसे विरोध कह दिजीए या इन्हें गूंगा इसके दोनों ही अर्थ निकाले जा सकते हैं। यह सोचने और समझने की बात है। अन्ना आज यदि देश को गुमराह कर रहे हैं तो देश का कोई एक नेता तो सामने आकर जनता को समझा सके कि अन्ना की बात पर आपलोग अपने घरों से न निकले। कल मैंने अपनी आंखों से कोलकाता शहर में देखा कि जो लोग कभी राजनीति पर बोलना नहीं चाहते वे गांधी टोपी पहने कर मरने मारने को तैयार खड़े थे। इस सरकार को अन्ना व उनकी टीम का शुक्रगुजार होना चाहिये कि आज के युवाओं के माथे पर गांधी टोपी पहनाकर केन्द्र की लापरवाही से विकाराल रूप धारण करते इस आंदोलन को अहिंसा का पाठ पढ़ा दिया। जबकि जयप्रकाश जी का आन्दोलन या श्री वी.पी.सिंह के आंदोलन में सिर्फ हिंसा के अलावा कुछ नहीं था। "
एक गांधी फिर यहाँ जन्म लेकर चल पड़ा है,
देख लो सारा वतन!
देश, फिर से उसके पीछे ही खड़ा है।
सरकार यह मानती है कि जैसे ही मां के पेट में बच्चा गर्भ धारन कर लेता है उसका सीधे आपरेशन कर दिया जाना चाहिए ताकी माँ की जान को कोई खतरा न हो। श्री अन्ना हजारे की सोच भी इसी खतरे की आशंका जाहिर कर रही थी कि कहीं श्री अन्ना हजारे गर्भ से निकलकर संसद की गरिमा के लिए खतरा न पैदा कर दें। कारण साफ था वाममोर्चा संसद इसलिए चलाना चाहती थी कि वे श्री जस्टीस सेन पर महा अभियोग ला सके। दूसरी तरफ भाजपा ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे श्री अन्ना द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल बिल के कई बिन्दूओं से सहमत नहीं है। सत्ता पक्ष को इनके दरार का न सिर्फ लाभ ही मिल रहा है साथ ही सत्ता पक्ष श्री अन्ना को व इनके लाखों समर्थकों को भी कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। इसी क्रम में कांग्रसी प्रवक्ता श्री मनीष तिवारी जी का श्री अन्ना के प्रति जहर उगलना व केंद्रीय मंत्री श्री सुबोध कांत सहाय ने उन्हैं तो पागल तक कह डाला। जरा आप ही सोचिए यदि मनमोहन सरकार के प्रायः सभी मंत्रीगण जिसमें प्रमुख रूप से श्री कपिल सिब्बल जी, प्रणब दा, अम्बीका सोनी जी और विद्वान वोट बैंक की चिन्ता करने वाले श्री मान् दिग्विजय सिंह जी जैसे समझदारों की जमात भरी हो तो उसकी नैया खुद ही भगवान डूबा देगा। इसके लिए किसी पागल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
डा.मनमोहन सिंह ने लाल किले से 15 अगस्त को देश के नाम हिन्दी में एक संदेश पढ़ा। उनकी बात विपक्षी सदस्यों को समझ में नहीं आयी या उनकी बात को वे शायद समझ नहीं सके। इसीलिए पुनः अगले ही दिन फिर उनको संसद में आकर बयान देने को कहा गया। विपक्ष सोचते हैं कि वें संसद को कभी न चलने देने के नाम पर, कभी चलने देने के नाम पर, देश की जनता को जिस प्रकार मुर्ख बनाते रहें हैं। उसी प्रकार कभी संसद की व्यवस्था धारा 72, तो कभी 184, कभी गृहमंत्री जी के बयान के नाम पर देश को गुमराह कर देश में लोकतंत्र की रक्षा कर रहें हैं।
महिला बिल हो या लोकपाल बिल, कभी सहमति तो कभी असहमति, कभी दुहाई तो कभी गुमराह करते रहते हैं मानो देश की सारी जनता तो अनपढ़ और गंवार है। कुछ समझती तो है नहीं? अब तो ऐसा आभास भी होने लगा कि जो लोग चुन कर संसद में जाते हैं या जिनकी राज्यसभा में लाटरी खुल जाती है वे ही देश के भाग्य निर्माता हैं बाकी सारे लोग या तो पागल हैं या उनके विचारों का कोई मूल्य नहीं है। कारण साफ है देश में संसद की मर्यादा ही सर्वापरि है, इसके बाद देश के मंत्री-संत्री आते हैं जिसकी आवभगत में सारा हिन्दुस्तान पलकें विछाए खड़े रहता है। चुनाव मे जीत क्या दर्ज हो जाती है ये रातों-रात अपने घर की छतों से ही छलांग लगाकर अकाश में पंहुच जातें हैं फिर तो पांच साल देश को लूटने का एक प्रकार से सरकारी आदेश इनकें हाथों में चुनाव आयोग थमा देता है। कभी-कभी राज्यों में भी ऐसा ही देखने को मिला है। जिसमें कुछ वर्षों पहले बिहार और अभी कर्नाटका राज्य में हमें देखने को मिला है।
खैर ! प्रधानमंत्री जी संसद में आये एक अंग्रजी में छपा-छपाया अपने बयान की प्रति संसद में खड़े होकर वितरित करवा दिए। उसको पढे़ और चल गये। कारण साफ था न तो विपक्ष में इतनी क्षमता है कि वे प्रधानमंत्री को कह सके कि साहेब अभी जातें कहां है? जनता की बात भी सुनते जाइए न ही इनमें कोई खुद की इच्छा शक्ति ही थी की वे संसद के अन्दर बैठे सांसदों का मान रख पाते। विपक्षी भाषण की कड़ी में एक मात्र श्री शरद यादव के भाषण को छोड़ कर सबने अपनी दाल ही गलाने की चेष्टा की बस। सरकार बार-बार चिल्लाती है कि श्री अन्ना संसदीय कार्यों पर अलोकतांत्रिक तरिके से दबाब बनाने का प्रयास कर रही है। कानून बनाने का कार्य संसद का है। तो किसने कहा कि आप कानून अन्ना जी के घर जाकर बनाऐं। जब लोकतंत्र के रक्षक देश की जनता के साथ अलोकतंत्रिक व्यवहार करने लगते हैं तब-तब देश की जनता सामने हो मुखर होती रही है। सरकार को देश के विकास की चिन्ता अचानक से सताने लगी। मंहगाई सर उठाकर सीना ताने खड़ी है। भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पार कर चुका है। देश के प्रधानमंत्री जी खुद अर्थशास्त्री हैं इसलिए देश की अर्थ व्यवस्था भी इनके चिन्ता का कारण है। इन सबमें सबसे बड़ी चिन्ता इनको लोकतंत्रिय ढांचे को चुनौति की है। जब इतनी सारी चुनौतियों का सामना इनको करना ही था तो एक नई चुनौति और क्यों पैदा कर ली सरकार ने। अभी भी समय है कि संसद के बेइमानों को विश्वास में न लेकर प्रधानमंत्री जी जनता को विश्वास में लें। संसद का अर्थ होता है लोकतंत्र और लोकतंत्र में जनता सर्वोच्य होती है न कि मंत्रिमंडल। बाबा रामदेव को जिस लाठी से आपके शातिरों ने हांकने की चेष्टा की उसी रणनीति को आप अन्नाजी पर प्रयोग करने की भूल कर रहें हैं। संभवतः कहीं यह आपकी सरकार की कब्र न खोद डाले।
मेरे बहुत सारे पत्रकार संपादकों ने भी यह प्रश्न खड़ा किया कि ‘‘पांच सदस्यों की टीम की बात आखिर क्यों सुनी जाए? इस प्रकार तो हर कोई खड़ा होकर बोलने लगेगा कि अमूक कानून बनाओ।’’ भाई! या तो इनलोगों ने अपनी कलम को सरकार के पास गिरवी कर रखी है या फिर इनका दिमाग खाली हो चुका है। देश में पाँच की बात तो छोड़िये जनाब एक दो राज्य सरकारें भी मिलकर चेष्टाकर के दिखा दिजिए की वे संसद से अपने मन चाहा कानून पास करवा लेवें। महिला बिल पर पूरी संसद एक है सिर्फ 20-25 सांसदों ने धमकी क्या दी सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए। जिस बात को लेकर ये लोग बहस चला रहें है उसमें जयप्रकाश जी के आन्दोलन से अन्ना के आन्दोलन की तूलना भी की जा रही है। शायद या तो ये लोग जानबूझ कर अनजान बने हुए हैं या सोचते है कि वे जो कहते हैं जनता सिर्फ इतना ही पढ़ती और जानती है।
स्व.जयप्रकाश नारायण जी का आन्दोलन आपातकाल की स्थिति से पैदा हुआ था, जिसमें तमाम विपक्ष को सरकार ने जेलों में बन्द कर दिया था इसलिए तमाम विपक्ष एकजूट होकर स्व.जयप्रकाश के आंदोलन को अपने स्वार्थ के लिए हवा दे रही थी। जबकि आज के आंदोलन को एक मात्र अन्ना हजारे चला रहें हैं और सारा देश एक रात में अन्ना-अन्ना हो गया। इसमें न तो किसी विपक्ष का ही सहयोग है ना ही किसी राजनैतिक पार्टी से श्री अन्ना ने सहयोग ही मांगा है। हां! लोकतंत्र में आस्था यदि नहीं होती तो वे अपना पहला अनशन समाप्त ही क्यों करते? सरकार के साथ टेबल पर बैठने का सीधा सा अर्थ था कि लोकतंत्र में आस्था व्यक्त करना। न सिर्फ अन्ना की टीम सरकार से बातें की। विपक्ष के सभी प्रमुख दलों से भी मिलकर अपनी बातों को उनके सामने रखा। इसके बावजूद सरकार ने संसद मे बिल प्रस्तावित कर दिया तो इस पर बहार बहस नहीं हो सकती यह किस कानून में लिखा है? दहेज कानून तो आज भी बन जाने के बाद बहस का मुद्दा बना हुआ है इसी प्रकार जमीन अधिग्रहण कानून अपनी मुंह के बल चारों खाने चित होकर रो रहा है। उच्चतम न्यायालय जो कभी इस कानून के पक्ष में एकतरफा फैसला दिया करता था आज उसने भी कह दिया कि यह कानून देश के साथ एक धोखा है।
देश की जनता जब अपने मूंह पर पटी बांध ले तो या तो आप इसे विरोध कह दिजीए या इन्हें गूंगा इसके दोनों ही अर्थ निकाले जा सकते हैं। यह सोचने और समझने की बात है। अन्ना आज यदि देश को गुमराह कर रहे हैं तो देश का कोई एक नेता तो सामने आकर जनता को समझा सके कि अन्ना की बात पर आपलोग अपने घरों से न निकले। कल मैंने अपनी आंखों से कोलकाता शहर में देखा कि जो लोग कभी राजनीति पर बोलना नहीं चाहते वे गांधी टोपी पहने कर मरने मारने को तैयार खड़े थे। इस सरकार को अन्ना व उनकी टीम का शुक्रगुजार होना चाहिये कि आज के युवाओं के माथे पर गांधी टोपी पहनाकर केन्द्र की लापरवाही से विकाराल रूप धारण करते इस आंदोलन को अहिंसा का पाठ पढ़ा दिया। जबकि जयप्रकाश जी का आन्दोलन या श्री वी.पी.सिंह के आंदोलन में सिर्फ हिंसा के अलावा कुछ नहीं था। हाँ! देश की संसद में बैठ कर खुद को जो लोग सुपर पावर समझ बैंठे हैं उनके पास अभी भी समय है कि वे देश के कुछ जाने-माने लोगों को विश्वास में लेकर टीम अन्ना के सदस्यों से राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए उनके सूझाए गए प्रस्तावों पर गंभीर चर्चा जल्द से जल्द प्रारंभ करें अन्यथा यह आग संसद की मर्यादा पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ी कर सकती है। आज इसे जो लोग फेसबुक का फैशन समझ रहे हैं उनकी जमीन न हिला दे यह फेसबुक। अभी हाल ही दो देशों में इसका जमकर युवाओं ने प्रयोग किया और सरकार 21 दिनों में ही सतह पर खड़ी दिखाई देने लगी। जबकि वहां लोकतंत्र था ही नहीं सारे मीडिया वाले व पत्रकार सरकार के बंधुवा मजदूर थे। भारत में तो लोकतंत्र है इस बात को मेरे मित्र जरा ध्यान में रखेगें तो अच्छा रहेगा। जय हिन्द!
-- कोलकात, दिनांकः 17 अगस्त’2011 द्वारा - शम्भु चौधरी
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 6:56 pm 0 विचार मंच
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सोमवार, 15 अगस्त 2011
संसद को भ्रष्टाचारियों का ग्रहण
‘‘जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका मन आया इसको नचाया मन भर गया तो दूसरे को भी मजा लेने का मौका दे दिया गया। एक गया दूसरा आया जनता सोचती ये हमारे लोग हैं जो चुन कर दिल्ली में जातें हैं पर दिल्ली पंहुचते ही ये सत्ता के दलाल बनकर देश को बेचने का सौदा इसी लोकतंत्र के मंदिर में करने लगतें हैं। तब इन बेशर्मों को संसद की मर्यादाओं का तनिक भी ख्याल नहीं आता, उस वक्त देश की कौन कितनी बड़ी बोली लगाता है इसकी जोड़-तोड़ शुरू कर देते हैं यही लोग।’’
जल जायेगी धरती जब सत्ता के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला तब नन्हे से पहरेदारों में।(स्वरचित)
दोस्तों! यह लेख देश की दूसरी आजादी के पूर्व संध्या की लड़ाई के अवसर पर लिख रहा हूँ। आज हम आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाने के लिए जैसे ही छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में तिरंगा झंडा थमाऐ बच्चे जोर से चिल्ला पड़े ‘‘अन्ना हजारे हम आपके साथ हैं।’’ हम खड़े देखते ही रह गए मानो किसी ने बच्चों के दिमाग को पागल बना दिया हो। देश की इस स्थिति के लिए हम सबके सब जिम्मेदार हैं। जिस संसद की मर्यादा रखना हम सबका न सिर्फ कर्तव्य, दायित्व भी बनता है, दुनिया के लोकतंत्रिय इतिहास के सबसे बड़े मंदिर के अन्दर चोर-बेइमानों का जमावड़ा हो चुका है। हमारी चुनाव प्रणाली बेइमानों को चुनने का मात्र एक साधन बनकर रह गयी है। जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका मन आया इसको नचाया मन भर गया तो दूसरे को भी मजा लेने का मौका दे दिया गया। एक गया दूसरा आया जनता सोचती ये हमारे लोग हैं जो चुन कर दिल्ली में जातें हैं पर दिल्ली पंहुचते ही ये सत्ता के दलाल बनकर देश को बेचने का सौदा इसी लोकतंत्र के मंदिर में करने लगतें हैं। तब इन बेशर्मों को संसद की मर्यादाओं का तनिक भी ख्याल नहीं आता, उस वक्त देश की कौन कितनी बड़ी बोली लगाता है इसकी जोड़-तोड़ शुरू कर देते हैं यही लोग। जिसे लोकतंत्र का नाम देकर देश के लुटने का जरिया बनाकर जनता पर हुक्म चलाते हैं जब इनकी बात न सुनी जाती तो संसद को चलने नहीं देते तब इनकी सभी कुकृत्य लोकतांत्रिक है। परन्तु जब जनता कुछ कहे तो उसको चुनकर आने या अर्मायदित शब्दों का प्रयोग कर संसद की गरिमा की दुहाई देते हैं। मानो संसद इनकी बपौती हो गई हो।
उसने कहा मैं पगल, मैं सोचा कि ‘मैं’ पागल।
जब सच में हुआ मैं पागल, तो मुझको दिखा हम सब पागल।।
दोस्तों! बैगर पागलपन के कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। आज हम जिस चौराहे पर खड़ें हैं इसका एक रास्ता सीधा हम सबको खाई में धकेल देगा। हम जिसे लोकतंत्र समझतें रहें हैं वही लोकतंत्र घून की तरह हमारे देश को गत 64 वर्षों से लुटने का माध्यम बना हुआ है। आज उस पर ताला जड़ने और इन तमाम बेईमानों की काली कमाई को बन्द करने की आवाज उठाने की देश के कुछ ही लोगों ने थोड़ी सी हिम्मत ही की थी, कि इनकी बौखलाहट देखिये किस प्रकार देश की सारी ताकतों को चार-पाँच लोगों की जाँच करने के लिए झौंक डाली। संसद में बैठे किसी चोर ने उफ तक न की सारे के सारे जबान पर ताला लगा कर इनकी करतुतों का समर्थन करने लगे। जब इन बेईमानों का लेखा-जोखा और पिछले 64 सालों का खाया पीया निकाला जाएगा तब इनको कौन बचायेगा? अब समय आ गया है इन बेइमानों के सारे काले कारनामें का एक लम्बा इतिहास लिखा जाए।
आज संसद से ज्यादा जरूरी है देश को इन बेइमानों से बचाना। इसके लिए संसद के इनके काली कमाई करने के कार्यों पर ताला लगा कर देश में एक नए संविधान रचने के लिए जनता को कुर्बानी देनी ही होगी। शायद दुष्यंत कुमार ने इसी दिन के लिए यह लिखा था-
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख, पर अंधेरा देख तू- आकाश के तारे न देख।
ऐ दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।
दोस्तों जिस भाषा का प्रयोग कांग्रसीगणों ने समाजसेवी आदरणीय श्री अन्ना जी के लिए किया यह इनका अहम है। इनको इस बात का गुमान हो चला है कि सत्ता के सिर्फ वे ही मालिक है एवं सिर्फ इनको ही देश सेवा का अवसर मिला है। जिस संविधान ने हमें देश में सिर्फ भ्रष्टाचारों की फौज भर दी हो उसको बदल डालना जरूरी हो गया है। अब सिर्फ लोकपाल बिल से इस देश को नहीं बचाया जा सकता। चाहे जन लोकपाल हो या सरकारी लुटेरों का सरकारी लोकपाल। इस देश को इससे कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है देश के नये संविधान लिखने की और यह इस संसदीय व्यवस्था के अंर्तगत कदापी नहीं लिखा जा सकता। अतः जबतक हम किसी नए संविधान को लिखने में समर्थ न हो जाते तब तलक देश के इस मंदिर को बंद कर सामने ताला लगा दिया जाना चाहिए। मानो अब देश को एक प्रकार से संसद को भ्रष्टाचारियों का ग्रहण लग चुका है।
पुनः दुष्यंत जी कि इस पंक्ति के साथ अपनी कलम को आज विराम दूँगा-
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 5:51 pm 0 विचार मंच
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मंगलवार, 26 जुलाई 2011
भ्रष्टाचार लोकतंत्र का लोकमंत्र - शम्भु चौधरी

सरकार समझती है कि मीडिया वाले मूर्ख हैं उनको जैसे उल्लू बनायेगें वे बन जाते हैं सो रोजना उसे पंतजली और उनके सहयोगियों की पोल खोलते रहेगें तो ये मूर्ख लोग उसी में उलझ कर रह जायेगें। देश की जनता बाबा रामदेव व उनकी संपति का लेख-जोखा सरकार से नहीं मांग रही है सरकार उन बेइमानों की जाँच करें जिसके लिए उच्चतम न्यायालय गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है और जिनकी वकालत सरकार कर रही है देश की जनता यह जानना चाहती है कि सरकार उनपर क्या कार्रवाई करने जा रही है।
जब हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपनी पैनी नजर डालतें हैं तो हम पाते है कि वर्तमान सरकार पूरी तरह से भ्रष्टाचारियों के गिरफ्त में कैद हो चुकी है तो दूसरी तरफ विपक्ष भी पूरी तरह से पाक-साफ नहीं इसके अन्दर भी बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछ वाले पांव फैलाये बैठें हैं। आंचलिक व क्षेत्रीय दलों के अन्दर भी राष्ट्र के संचालन की कोई इच्छा शक्ति दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती सभी अपने राजनैतिक हितों और सत्ता सुख-स्वाद लेने में लगी है। कुल मिला-जुला कर हम पातें हैं कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र का लोकमंत्र बन चुका है। इनको बदले तो लायें किसको? यह एक आम प्रश्न हमारे जेहन में कोंध रहा है। रावन ने रामदूत हनुमान की पूँछ में आग लगा दी परिणाम क्या हुआ सोने की लंका पलकों में ही धू-धूकर धधकने लगी। बाबा रामदेव के जाँच प्रकरण से ऐसा प्रतित होता है कि देश में अब कालेधन की बात करने व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों की खैर नहीं। सरकार की ताकत मानानीय उच्च न्यायलय के लाख फटकार के बावजूद कालेधन के अपराधियों को बचाने का प्रयास करती रही। खुद की जाँच एजेन्सियों को देश के लूटे धन को देश में लाने के लिए तो नहीं लगा पाई हाँ! बाबा रामदेव व उनके सहयागी श्री बालकृष्ण की डिग्रियों और उनकी जन्म प्रमाणिकता जाँच करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सरकार किसे डराना चाहती है? कालेधन के अपराधियों की जाँच में सरकार ने इतनी सक्रियता दिखाई होती तो बात समझ में आती पर सरकार समझती है कि मीडिया वाले मूर्ख हैं उनको जैसे उल्लू बनायेगें वे बन जाते हैं सो रोजना उसे पंतजली और उनके सहयोगियों की पोल खोलते रहेगें तो ये मूर्ख लोग उसी में उलझ कर रह जायेगें। देश की जनता बाबा रामदेव व उनकी संपति का लेख-जोखा सरकार से नहीं मांग रही है सरकार उन बेइमानों की जाँच करें जिसके लिए उच्चतम न्यायालय गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है और जिनकी वकालत सरकार कर रही है देश की जनता यह जानना चाहती है कि सरकार उनपर क्या कार्रवाई करने जा रही है।
बाबा रामदेव की जाँच कर सरकार बेईमानों की वकालत करती दिखाई दे रही है। सरकारी ताकतों का प्रयोग करना है तो सरकार देश में बस गये बंग्लादेशियों के हजारों जाली पासपोर्ट की भी जाँच करें जो देश में घुसपैठ कर न सिर्फ देश की अर्थ व्यवस्था को भारी क्षति पंहुचा रहें हैं। देश की सुरक्षा को भी खतरा बना हुआ है। बाबा रामदेव व पंतजलि को नुकसान पंहुचाकर सरकार परोक्ष रूप से उन विदेशी ताकतों का मनोबल मजबूत करने में लगी है जो नहीं चाहती कि भारतीय उद्योग व भी खासकर भारतीय दवा उद्योग उनका मुकाबला करे। सरकार की इस प्रकार की बदले से परिपूर्ण कार्रवाई को हम किसी भी रूप में सही नहीं ठहरा सकते। भले ही बालकृष्ण की सारी डिग्रीयों जाली हों वह हमारे देश के नागरिकों की भलाई में संलग्न है न कि आंतकवादी कार्य में संलिप्त है। इस तरह की कार्रवाई की हम खुले शब्दों में निन्दा करते हैं। सरकार आंतकवादियों के लिए इतनी सक्रियता दिखती तो हमें थोड़ा संतोष होता परन्तु सरकार की मंशा न तो आंताकवदियों को सजा दिलाने की है न ही कालेधन के मामाले में सरकार पाक-साफ नजर आती है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 10:29 am 2 विचार मंच
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गुरुवार, 14 जुलाई 2011
आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? - शम्भु चौधरी
अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी? प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’
बाबा अम्बेदकर द्वारा रचित संविधान में राम का नाम लिखना-जपना सांप्रदायिकता है सो हमने इस लय को नई धुन देने का प्रयास कर रहा हूँ। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ आज देश में हर राजनेताओं की भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बू झलकती है। जिसे देखो हर मामले को सांप्रदायिकता से जोड़ रहा है। कालेधन की बात हो या राष्ट्र में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार जरा सी कोई चूँ-चपड़ किया की बस उसे सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने और चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश का हिस्सा मानने लगते हैं। इनकी भाषा में अल्पसंख्यकवाद सांप्रदायिकता की बात साफ झलकती है। मानो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही सिर्फ 35 करोड़ अल्पसंख्यकों को बली चढ़ा दी गई हो। इस कतार में सबके सब लगे हुऐं हैं, धक्कमपेल चल रहा है। 65 सालों से उल्लू बनते आ रहे मुसलमानों के विकास, शिक्षा, कुरीतियों, रूढ़ीवादी परम्पराओं, कट्टरवादी धार्मिकता पर बोलने और उन्हें सुधारने का काम किसी ने नहीं किया। सिर्फ उन्हें हिन्दू कट्टरपंथियों से बचाये रखने व उनकी असामाजिक व कट्टरवादी धार्मिक गतिविधियों का संरक्षण कर वोट बैंक को सुरक्षित करना हमारे देश के राजनेताओं का एक मात्र लक्ष्य रह गया है। इसके लिए मुसलमानों के धार्मिक कट्टरवादी भी विशेष रूप से जिम्मेदार हैं, जो समाज के विकास को रोक राजनेताओं के पक्ष में अपने बयान देते नजर आते हैं। जब इमाम किसी दल विशेष को वोट देने या न देने की अपील जारी करता है तो वह धर्मनिरपेक्ष है। परन्तु जब बाबा रामदेव देश के लुटे हुए धन की बात करता हो या अन्ना हजारे देश की संसद को भ्रष्टमुक्त करने के कानून पर चर्चा करता हो तो या तो इन लोगों को यह सलाह दी जाती है कि वे जनता के प्रतिनिधि नहीं है पहले वे चुनकर आयें तब चुने हुए बेईमानों से बात करें या फिर उन्हें सांप्रदायिक शक्ति करार दे दिया जाता है। मानो इस देश में आतंकवादी हमला करने वाली ताकतें तो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बचती रहे और राष्ट्र के उन्नति व इसके उत्थान की बात करने वाला या तो देश का गद्दार है या देश में सांप्रदायिकता का जहर फैला रहा हो। मजे की बात यह है कि इससे न तो कभी किसी इमाम का भला हुआ न ही इनकी कौम को हाँ! कभी कभार वह भी चुनाव के वक्त उनके प्रसाद के बतौर थोड़ा बतासा खाने को जरूर मिल जाता है। जैसे कुछ असमाजिक तत्वों की रिहाई या किसी कानून को उनके पक्ष में समाप्त कर देना या बना देना या फिर बंग्लादेशियों को राशनकार्ड व वोटर कार्ड देकर उसे खुद की झौली में जमा कर लेना। इससे इस देश के मुसलमानों का क्या भला हुआ? मुसलमानों के वोट बढ़ने से यदि सत्ता उनको मिलती हो तो बात मेरी समझ में आती पर किसी कांग्रसी ने कभी भी सत्ता मुसलमानों को सोपने की बात कभी नहीं की व सत्ता किसे सोपना चाहतें हैं राहुल गांधी को.... सोनिया जी को या खुद उनसे चिपके रह कर देश को लुटने के फिराक में रहते हैं। अब आप ही सोचिये स्वयं प्रधानमंत्री जी (चोरों के सरदार) ने ही खुद स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार उनकी गठबंधन धर्म की मजबूरी है और वे पार्टी के वफादार नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं तो आपका जमीर कहाँ गया सरदार जी?प्रधानमंत्री पद व सोनिया से कहीं अच्छा होगा कि आप पत्नी के साथ रोजाना गुरुद्वारे में जाकर अपने पापों का पश्चाताप करें। ‘‘अल्लाह तेरी गंगा (संसद) मेली हो गइइईं-पापीयों के पाप धोते-धोते...2’’ (लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:21 pm 7 विचार मंच
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रविवार, 3 जुलाई 2011
व्यंग्यः सांप भी मर जाय.. - शम्भु चौधरी
मेरी माने तो संसद में लोकपाल बिल पर कानून लायें या न लायें जल्दी से एक अनशन कानून तो बना ही डालें। ताकी लोकतंत्र में इस हथियार का प्रयोग भविष्य में कोई न कर सके। खास कर सरकार के खिलाफ तो बिल्कुल भी नहीं। जिसे इस हथियार का प्रयोग करना है वह पहले संबन्धित सरकार से अनुमति प्राप्त कर लें अन्यथा इसे लोकतंत्र के खिलाफ और संसद की अवमान्यना मानते हुए उन लोगों पर देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जायेगा। रवाअअआ वोअ कहावत सुनलेअअ हैय कि नाहीं ‘‘सांप भी मर जाय और लाठी भी न भाजनी पड़े।’’
सावन का महीना पवन करे सोर अरे ssss बाबा सोsssर नहीं शोर... शोर हाँ! ऐसे। जियरा’रे झूमे ऐसे जैसे मनवा नाचे मोर। अब रवा’के गाना सूझेतानी कोsss? तब तूहिये बोलो बबवा का करी। लोकतंत्र में जै चुने जात है सैहिये ने देश के सिपाही बाड़े देश कै रक्षा करे खातीर बाकी सब तो हिजड़ा बानी उके बोले के कोनो अधिकार नैखे....तब गाना न गोsssई तो कोsss कर’री। कुछ लिखो- पढ़अ...। भारत के संविधान पढ़ले बानी की नाईsss? ‘‘अखनी देश में 64 साल बाद बाबा अम्बेदकर कै याद कर रहैल तानी सब कोsssई खास कर कांग्रेसियन लोग।’’ इsss कोsssअ बोले तानी? बतावह न कोsss बात बा पहेली न बुझावह। ‘‘देखे इमें पहेली बुझे कै कोनु बात नैइखे बा। ‘‘तब कोsss लिखले बाड़े जल्दी बतावह’’ उमें लिखले बोsss -‘‘कोsss’’ छोड़ो अनपढ़ गांवार के ई सब नैखे पढ़े कै और सुने कै... देश के पवित्र संविधान बाड़े। चुप करह केहु सुन ली... दीवार के भी कान बानी... जेल जाअअवे के मन है काअअ? जिकरा कसम खाईके देश के लुटल जाअअई। उमें साफ-साफ लिखले है कि लोकतंत्र कैअअ मतलब बाअअ ‘‘जनता की सरकार, जनता के लिए और जनता द्वारा’’ इमें आगे पीछे कोनो माने लिखल नैईखे। सो जै सरकार में रही वही देश के लुटे के अधिकारी बानी। ‘अच्छअअआ’ अब हमनी कै साफ होग्यैल ईं चुने शब्द पर बार-बार जोर काहे को देत रहैल बाड़ै।
ई..साला भोजपुरी लिखे के चक्कर में हमनी तो असली बातें करना ही भूल गये। रामलीला मैदान में आधी रात को चोर की तरह सरकारी सिपाही आये लाठियां बरसाई अश्रु गैस के गोले दागे। भ्रष्टाचार संरक्षक समिति के सदस्यों की दलील है कि बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान योग के लिए भाड़े पर लिया था उस पर तम्बू लगाकर सरकार को गाली देने के लिए नहीं दिया गया था, सो उनको समय दिया गया कि वे शाम तक अपना सरकारी सह पर किया गया नाटक समाप्त कर दें। जब उन्होंने हमारी बात मानने से इंकार कर दिया तो हमें लाचारी में यह कार्रवाई करनी पड़ी। तो भाई! रात को ही क्या जल्दी थी यह काम तो सुबह पाँच बजे के बाद भी किया जा सकता था। ये अलग बात है कि सरकार की मंशा अंधेरे में देश को अंधेरे में रखना था तो अपनी बात को अब जायज ठहराने के लिए कुछ तो कहना ही है। चलिये ये बात आपकी मान लेतें हैं कि बाबा रामदेव का यह अनशन कानूनी रूप से अवैध था। पर अन्ना हजारे के आगामी अनशन पर जबकि अभी तो सिर्फ आपको चमका रहें हैं, अभी से ही आपलोग क्यों बिदके हुए हैं कोई इसे लोकतंत्र पर हमला करार दे रहा है तो कोई इसे संसद को चुनौती देना मान रहा है। कोई अभी से धमका रहा है तो कोई बाबा अम्बेदकर को सामने ला रहा है। मानो देश की 130 करोड़ जनता मुर्ख और चुने हुए चतुरानन्द सांसद चालाक? कपिल जी, प्रणब जी, सलमान साहेब, 3जी के घेरे में आने वाले हमारे गृहमंत्री श्री चिदम्बरम जी सबके-सब बारी-बारी से अन्ना व उनकी टीम पर हमला करने में लगे हैं। अभी से अनशन पर बहस चला रहें है कि इसका इस्तेमाल कैसे और कौन कर सकता है। मेरी माने तो संसद में लोकपाल बिल पर कानून लायें या न लायें जल्दी से एक अनशन कानून तो बना ही डालें। ताकी लोकतंत्र में इस हथियार का प्रयोग भविष्य में कोई न कर सके। खास कर सरकार के खिलाफ तो बिल्कुल भी नहीं। जिसे इस हथियार का प्रयोग करना है वह पहले संबन्धित सरकार से अनुमति प्राप्त कर लें अन्यथा इसे लोकतंत्र के खिलाफ और संसद की अवमान्यना मानते हुए उन लोगों पर देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जायेगा। रवाअअआ वोअ कहावत सुनलेअअ हैय कि नाहीं ‘‘सांप भी मर जाय और लाठी भी न भाजनी पड़े।’’
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 11:17 pm 1 विचार मंच
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ये हुई मर्दों वाली बात
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:20 pm 0 विचार मंच
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हम भी अपनी आहुति से सींच देगें

वर्तमान काल की भाषा में सिर्फ सरकारी तानाशाहों को ही पूरी आजादी प्राप्त है देश की बात कहने की। बाकी कोई व्यक्ति अब कुछ भी कहने का अधिकार ही नहीं रखता अन्यथा संसद की मर्यादा भंग हो जायेगी, मानो लग रहा हो कि हम किसी गुप्त आपातकाल के दौर से गुजर रहे हैं। जबकि भारतीय संविधान के तहत ‘‘ जनता के प्रतिनिधि- जनता के द्वारा और जनता के लिए ही खुद को चुने हुए एवं बाकी को अलग मानते हैं।’’
आदरणीय पंकज जी आज के संमार्ग (कोलकाता) में आपका एक लेख प्रकाशित हुआ पढ़कर अच्छा लगा कि अभी भी लोकतंत्र की नींव काफी मजबूत है जहाँ आप जैसे कलमकार जीवित हैं, इसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। एक बार तो संमार्ग के एक संपादकिय लेख को पढ़कर बड़ी निराशा हुई इससे पहले भी सन्मार्ग के कुछ संपादकीय मुर्खता पूर्ण मानसिकता से भरे हुए थे। खैर! छोड़िये इन बातों को। वर्तमान काल की भाषा में सिर्फ सरकारी तानाशाहों को ही पूरी आजादी प्राप्त है देश की बात कहने की। बाकी कोई व्यक्ति अब कुछ भी कहने का अधिकार ही नहीं रखता अन्यथा संसद की मर्यादा भंग हो जायेगी, मानो लग रहा हो कि हम किसी गुप्त आपातकाल के दौर से गुजर रहे हैं। जबकि भारतीय संविधान के तहत ‘‘ जनता के प्रतिनिधि- जनता के द्वारा और जनता के लिए।’’ ही खुद को चुने हुए एवं बाकी को अलग मानते हैं और इसी भाषा का प्रयोग कुछ मीडिया और समाचार पत्र वाले करें तो क्या कहा जा सकता है। इनकी तो रोजी-रोटी का सवाल जुड़ा हुआ है इनसे। भला इनसे पंगा लेकर ये लोग अपना धन्धा कैसे चला पायेगें? सो रोजी रोटी से समझौता करके भला कोई अन्ना हजारे और अरविन्द केजड़ीवाल की इस लड़ाई को क्यों साथ देगा। परन्तु आपकी इस पंक्ति से अपनी बातों को विराम दूंगा -
इन्हें मत रोप देना ये फसल बर्बाद कर देंगे
ये हैं वो बीज भीतर से गले या के सड़े हैं जी।
आपके इस बीज रोपन कार्य को हम भी अपनी आहुति से सींच देगें।
शुभकामनाओं के साथ आपका ही- शम्भु चौधरी
सेवा में
गिरीश पंकज, संपादक सदभावना दर्पण
इमेलः girishpankaj1@gmail.com
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 2:24 am 0 विचार मंच
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011
चुनौती पर चुनौती - शम्भु चौधरी
कांग्रेस के लाचार और ईमानदारी का चौला पहने देश के इतिहास में सबसे भ्रष्टतम प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह मानते है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी है और वे सिर्फ इस मजबूरी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी पार्टी में इस मुद्दे को लेकर उनके विचार कुछ अलग हैं। चोरों का सरदार कहता है कि मैंने माँस नहीं खाया? जो जेलों की सलाख़ों में बन्द हैं सिर्फ उसने ही खाया? किसी को लग रहा है कि अन्ना संसद को चुनौती दे रहें हैं तो किसी को लग रहा कि ये लोकतंत्र को ही चुनौती हैं? अब इनसे कौन बात करे?
पिछले 35 सालों से कांग्रेस पार्टी बंगाल में माकपा की पिछलग्गू पार्टी के रूप में कार्य करती रही। एक समय वाममोर्चा के खिलाफ लड़ाई में ममता दीदी को पार्टी से धक्का देने वाले कांग्रेसी चम्मचे आज प्रायः सभी एक-एक कर ममोता दीदी के चरणों में जाप करना शुरु कर दिये। ज्यों-ज्यों ममता दीदी का प्रभाव बंगाल की राजनीति में सत्ता के करीब आने लगा त्यों-त्यों कांग्रेसी सूर-ताल भी बदलने लगे। जो प्रणब दा एक प्रकार से कहा जाय तो बंगाल में कांग्रेस की राजनीति सफाया के एकमात्र सूत्रधार माने जा सकतें हैं ने कल कोलकाता शहर में गत विधानसभा में हुई जीत का जश्न चुनाव के दो माह गुजर जाने के बाद मनाया। शहर के आस-पास के उपनगरिय ईलाकों से कुल मिलाकर भी पांच हजार लोगों की भीड़ भी नहीं जुटा पाये ये कांग्रसी।
जीत के इस जिस जश्न को मनाने की असली हकदार तृणमूल कांग्रेस की नेत्री सूश्री ममता दीदी ने जबकि इस जश्न को मनाने की जगह अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा की ‘‘काज कोरोंन’’ और हर रोज खुद भी देर रात तक काम कर रही है, सुबह घर से निकलते समय ममता का सीधा संपर्क किसके ऊपर गाज गिरायेगा किसी को पता नहीं। रातों-रात गत 35 सालों से चरमराई हुई व्यवस्था खुद व खुद पटरी पर आने लगी। दूसरी तरफ इनकी सहयोगी कांग्रेस जीत का जश्न मनाने में लगी है। पर अचानक से चुनाव के दो माह गुजरने के बाद यह इस जश्न की भूमिका पर नजर डालें तो प्रणब दा का पूरा आक्रोश भ्रष्टाचार को लेकर ही रहा। केंद्रीय सरकार के मंत्रीगण मानते हैं कि देश में इस मुद्दे के लेकर जो भी बात करेगा वह ‘‘देश का शत्रु’’ है। वे लोग लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं। केंद्रीय सरकार के मंत्रीगण एक के बाद एक लोकतंत्र की नई व्याख्या देने में जुटे है। प्रणब दा देश की बढ़ती कीमतों पर जो बयान दिये थे वह तो आपको याद होगा ही] नहीं तो आपको पुनः याद दिला देता हूँ - ‘‘देश में लोगों की आमदनी बढ़ गई है इसलिए चीजों के दाम बढ़ गये।’’ अब इनका नया फरमान भी सामने आ गया कि ‘‘अन्ना हजारे तथा बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर वे लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं।’’ वैसे भी लोकतंत्र पर बात करने का अधिकार सिर्फ चुने हुए सांसदों को ही है चूंकि उनको देश को लूटने का सरकारी अधिकार प्राप्त है। ये सड़क छाप अन्ना हजारे बार-बार धमकी देगा तो सरकार यही न समझेगी।
कांग्रेस के लाचार और ईमानदारी का चौला पहने देश के इतिहास में सबसे भ्रष्टतम प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह मानते है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी है और वे सिर्फ इस मजबूरी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी पार्टी में इस मुद्दे को लेकर उनके विचार कुछ अलग हैं। चोरों का सरदार कहता है कि मैंने माँस नहीं खाया? जो जेलों की सलाख़ों में बन्द हैं सिर्फ उसने ही खाया? किसी को लग रहा है कि अन्ना संसद को चुनौती दे रहें हैं तो किसी को लग रहा कि ये लोकतंत्र को ही चुनौती हैं? अब इनसे कौन बात करे? हम उनसे पूछ रहे हैं कि आपका जो ड्राफ्ट है आप उसी के बारे में जनता को बतायें कि आप देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व्यवस्था पर लगाम लगाने के लिए कैसा जन लोकपाल बिल में ला रहे हैं। इस पर तो बोल नहीं रहे। धमकी इस बात की दे रहे हैं कि हमारी काली करतूतों को कोई जगजाहिर करेगें तो अच्छा नहीं होगा। चुनौती पर चुनौती अब एक और चुनौती। साहब! लोकपाल बिल पर बहस कीजिए लोकतंत्र की चिंता छोड़ दीजिए। देश की जनता को साफ करें कि आप जो बिल लाने की बात कर रहे हैं उसमें क्या-क्या है? और उससे किन-किन श्रेणी के लोगों पर अंकुश लगाया जा सकेगा? क्या उन लुटेरों पर भी इसका कोई प्रभाव होगा जो संसद के अन्दर ही देश को लूटने में लगें हैं? इसका संचलान व्यवस्था किन लोगों के हाथ में रहेगी?
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 6:58 pm 0 विचार मंच
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बुधवार, 29 जून 2011
संपादक भी मुँह चुराकर भागे -शम्भु चौधरी
लोकपाल बिल पर सरकार इतनी ईमानदार दिखती है तो केन्द्रीय कानून मंत्री बिल में सुझाये गये सरकारी प्रवधानों की जानकारी प्रेस के माध्यम से जनता को दें और बताये कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जन आन्दोलन में किस तरह से वे भी जनता के साथ हैं। बजाय इसके गोलबंध की राजनीति करें। कल जिन संपादकों को प्रधानमंत्री की गुप्त दावात खाने मिली वे लोग जब बाहार आये तो मुँह छुपाते फिरे मानो किसी बदनाम महखाने से निकले हों कि कोई इनको देख न लें। देश आज नये युग की तरफ करवट बदल रहा है एक तरफ लोकतंत्र को बेचने वालों की जमात है तो दूसरी तरफ लाचार और बेबस आवाज। हमें अब तय करना है कि हमें किसका साथ देना है।
अब तो आपको यह बात साफ हो गई होगी कि मैंने पिछले लेख में समाचार पत्र व मीडिया पर यह आरोप क्यों लगाया कि - ‘‘कोई इनको लोकतंत्र का रक्षक कहे तो सुनने में भी अब शर्म आने लगी’’ कल कि घटना से अब तो आपको विश्वास हो गया होगा कि ये शेर की घाल में भेड़िये छुपें हैं जो पत्रकारिता की आड़ में सत्ता के सौदागर बन गये हैं आज देश में एक तरफ भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पंहुच गया है सत्ता पक्ष के मंत्रीगण, व्यापारी और दर्जनों अधिकारी लाखों की हेरा-फेरी में जेलों में बन्द हैं और देश के सबसे कमजोर भ्रष्टों के सरदार निर्लज प्रधानमंत्री संसद में बयान देते हैं कि ‘‘यह गठबंधन धर्म की मजबूरी है।’’ मजे की बात लोकपाल बिल का जो ड्राफ्ट सरकारी पक्ष ने तैयार किया है उनमें इन पर मुकद्दमा चलाने का कोई प्रवधान ही नहीं दिया गया है। मजे कि बात तो यह है कि सारा मामला संसद की प्रतिष्ठा से जोड़ कर या समानान्तर सरकार चलाने जैसी बातों में तो सांप्रदायिकता से जोड़ कर देश के पढ़े-लिखे समझदार संपादकों से राय ली जा रही है कि वे देश को किसी तरह बचायें अन्यथा सिविल सोसाइटी के चन्द लोग देश में संसद की मर्यादा को ही समाप्त कर देगें? भाई! किस बात की मर्यादा? क्या समाज क सदस्य संसद का रास्ता रोक रहें हैं या संसद के अधिकार क्षेत्र में दखल दे रहें हैं? देश में संविधान बनाने का अधिकार जिनको प्राप्त है समाज के सदस्य सिर्फ उनकों ही तो अपनी बात कह रहें हैं। तो वे सांप्रदायिक कैसे हो गये? इसका अर्थ है कि संसद में सिर्फ वे ही लोग जा सकते हैं जो साम्प्रदायिक नहीं हो। ये वोट बैंक की राजनीति छोड़े कांग्रसी। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सीध-सीधी बात करें। अब वे नहीं मानते तो समाज के सदस्य संसद में तो जाकर चिल्ला तो नहीं सकते। संसद के बाहार ही अपनी बात कहेगें तो इसमें कौन सा अपराध हो गया? क्या देश की जनता को इतना भी अधिकार नहीं है कि वे जनता को यह बता सके कि लोकपाल बिल में जो बात जनता चाहती है वह नहीं बल्कि जनता को ही सजा देने का प्रवाधान उसमें है। लोकपाल बिल पर सरकार इतनी ईमानदार दिखती है तो केन्द्रीय कानून मंत्री बिल में सुझाये गये सरकारी प्रवधानों की जानकारी प्रेस के माध्यम से जनता को दें और बताये कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जन आन्दोलन में किस तरह से वे भी जनता के साथ हैं। बजाय इसके गोलबंध की राजनीति करें। कल जिन संपादकों को प्रधानमंत्री की गुप्त दावात खाने मिली वे लोग जब बाहार आये तो मुँह छुपाते फिरे मानो किसी बदनाम महखाने से निकले हों कि कोई इनको देख न लें। देश आज नये युग की तरफ करवट बदल रहा है एक तरफ लोकतंत्र को बेचने वालों की जमात है तो दूसरी तरफ लाचार और बेबस आवाज। हमें अब तय करना है कि हमें किसका साथ देना है।
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:45 pm 0 विचार मंच
Labels: लोकपाल बिल, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Congress, Govt. Draft Lokpal Bill २०११, Govt. Draft Lokpal Bill 2011, Lokpal Bill
रविवार, 26 जून 2011
जन लोकपाल बनाम सरकारी लोकपाल
HIGHLIGHTS
२ जी, कॉमनवेल्थ, आदर्श जैसे घोटालें इसके बावजूद चलते रहेंगे क्योंकि प्रधानमंत्री इसकी जाँच से बाहर रहेंगे और मंत्री या अफसरों के खिलाफ जाँच बड़ी मुश्किल से होगी।
यदि कोई सरकारी कर्मचारी, अपने खिलाफ शिकायत करने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाना चाहेगा तो वकील की फीस व अन्य खर्चे सरकार भरेगी।
- मुद्दे : 1. प्रधानमंत्री
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल के पास प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने की ताकत हो.. लेकिन इसमें फालतू और निराधार शिकायतों को रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल के दायरे से बाहर।
- टिप्पणी: आज की व्यवस्था में प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार की जांच भ्रष्टाचार निरोधी कानून के तहत की जा सकती है। सरकार चाहती है कि इसकी जांच निष्पक्ष और स्वायत्त लोकपाल की जगह प्रधानमंत्री के अधीन आने वाली सीबीआई ही करे।
- मुद्दे : 2. न्यायपालिका
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल के पास न्यायपालिका के खिलाफ भष्टाचार के आरोपों की जांच करने की ताकत हो.. लेकिन इसमें फालतू और निराधार शिकायतों को रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: न्यायपालिका के भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल के दायरे से बाहर
- टिप्पणी: सरकार इसे ज्यूडिशियल अकाउण्टेबिलिटी बिल में लाना चाहती है। इस बिल के मुताबिक किसी जज के भ्रष्टाचार की जांच की इजाज़त तीन सदस्यीय पैनल देगा (जिसमें से दो उसी अदालत से वर्तमान जज होंगे और एक उसी अदालत के रिटायर मुख्य न्यायधीश होंगे।)ज्यूडिशियल अकाउण्टेबिलिटी बिल में बहुत सी और खामियां हैं। हमें न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को इसके दायरे में लाने पर कोई आपत्ति नही है बशर्ते कि यह सख्त हो और लोकपाल के साथ साथ बनाया जाए। न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से मुक्ति को आगे के लिए लटकाना ठीक नहीं है।
- मुद्दे : 3. सांसद
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: अगर किसी सांसद पर रिश्वत लेकर संसद में वोट देने या सवाल पूछने के आरोप लगते हैं तो लोकपाल के पास उसकी जांच करने का अधिकार होना चाहिए।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: सरकार ने इसे लोकपाल के दायरे से बाहर रखा है।
- टिप्पणी: रिश्वत लेकर संसद में वोट डालने या सवाल उठाने का काम किसी भी लोकतन्त्र की नींव हिला सकता है। इतने संगीन भ्रष्ट आचरण को निष्पक्ष जांच के दायरे से बाहर रखकर सरकार सांसदों को संसद में रिश्वत लेकर बोलने का लाईसेंस देकर उन्हें संरक्षण प्रदान करना चाहती है।
- मुद्दे : 4. जनता की आम शिकायतों का निवारण
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: यदि कोई अधिकारी सिटीज़न चार्टर में निर्धारित समय सीमा में जनता का काम पूरा नहीं करता है तो लोकपाल उसके ऊपर ज़ुर्माना लगाएगा और भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाएगा।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: सिटीज़न चार्टर का उल्लंघन करने वाले अधिकारी पर ज़ुर्माने का कोई प्रावधान नहीं। अत: सिटीज़न चार्टर की समय सीमा सिर्फ कागज़ पर लिखने के लिए होगी।
- टिप्पणी: 23 मई की बैठक में सरकार ने हमारी ये मांग स्वीकार कर ली थी लेकिन यह दुर्भाग्यजनक है कि सरकार अपनी बात से पलट गई।
- मुद्दे : 5. सीबीआई
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को लोकपाल में मिला देना चाहिए।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: सरकार सीबीआई को अपने हाथ में रखना चाहती है।
- टिप्पणी: केन्द्र सरकारें सीबीआई का दुरुपयोग विपक्षी दलों और उनकी राज्य सरकारों के खिलाफ करती रही हैं। सरकार ने सीबीआई को सूचना अधिकार के दायरे से भी निकाल लिया है जिससे इस संस्था में भ्रष्टाचार को और बढ़ावा मिलेगा। जब तक सीबीआई सरकार के अधीन रहेगी इसी तरह भ्रष्ट बनी रहेगी।
- मुद्दे : 6. लोकपाल के सदस्यों का चयन
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: . एक व्यापक आधार वाली चयन समिति जिसमें दो राजनेता, 4 जज और 2 संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख शामिल हैं।
2. चयन समिति के लिए सम्भावित उम्मीदवारों की सूची बनाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं के अवकाशप्राप्त प्रमुखों वाली एक सर्च कमेटी जो चयन समिति से स्वतन्त्र होगी। 3. चयन की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और जनभागीदारी वाली होगी। - सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: 1. सरकारी बिल में दस सदस्यों वाली चयन समिति में से पांच लोग सत्ता पक्ष से होंगे, कुल मिलाकर 6 राजनेता होंगे। इससे यह तय है कि लोकपाल सदस्य पद पर बेईमान, पक्षपाती और कमज़ोर लोग ही पहुंच पाएंगे।
2. सर्च कमेटी बनाने का काम चयन समिति करेगी अत: यह पूरी तरह चयन समिति के अनुसार काम करेगी।
3. चयन की कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं यह पूरी तरह चयन समिति पर निर्भर करेगी। - टिप्पणी: सरकार के प्रस्ताव में साफ है कि सरकार जिसे चाहे लोकपाल सदस्य और अध्यक्ष बना सकेगी। आश्चर्यजनक है कि सरकार 7 मई की बैठक में चयन समिति के स्वरूप और चयन की प्रक्रिया पर सहमत हो गई थी। केवल सर्च कमेटी में किसे होना इस मुद्दे पर असहमति थी। लेकिन सरकार आश्चर्यजनक रूप से अपनी बात से पलट गई है।
- मुद्दे : 7. लोकपाल किसके प्रति जवाबदेह होगा?
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: देश के आम लोगों के प्रति। कोई भी नागरिक सुप्रीम कोर्ट में शिकायत कर लोकपाल को हटाने की मांग कर सकता है।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: सरकार के प्रति। केवल सरकार ही लोकपाल को हटाने की मांग कर सकती है।
- टिप्पणी: लोकपाल के चयन और उसे हटाने की ताकत सरकार के हाथ में होने से यह सरकार के हाथों की कठपुतली बनकर ही रह जाएगा। इसका भविष्य उन्हीं सीनियर अफसरों के हाथों में होगा जिसके खिलाफ इसे जांच करनी है। यह अपने आप में विरोधभासी है।
- मुद्दे : 8. लोकपाल के कर्मचारियों की निष्ठा
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल के कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतें सुनने का काम एक स्वायत्त व्यवस्था
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल खुद अपने कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ जांच करेगा। इससे उसके काम में ज़बर्दस्त विरोधाभास पैदा होगा।
- टिप्पणी: सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल या तो स्वयं के प्रति जवाबदेह होगा या फिर सरकार के प्रति। हम इसे देश के आम लोगों के प्रति जवाबदेह बनाना चाहते हैं।
- मुद्दे : 9. जांच का तरीका
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल द्वारा जांच करने का तरीका सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार वही होगा जो किसी अपराध के मामले में होता है। शुरुआती जांच के बाद एक एफ.आई.आर. दर्ज होगी। जांच के बाद मामला अदालत के सामने रखा जाएगा जहां इस पर सुनवाई होगी।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: सरकार सीआरपीसी को बदल रही है। आरोपी को विशेष संरक्षण प्रदान किया जा रहा है। शुरुआती जांच के बाद तमाम सबूत आरोपी को दिखाए जाएंगे और उससे पूछा जाएगा कि उसके खिलाफ एफ.आई.आर क्यों न दर्ज की जाए। जांच पूरी होने के बाद, एक बार फिर सारे सबूत उसके सामने रखे जाएंगे और सुनवाई करके उससे पुछा जाएगा कि उसके खिलाफ मुकदमा क्यों न चलाया जाए। जांच के दौरान अगर किसी और व्यक्ति के खिलाफ भी जांच शुरू की जानी है तो उसे भी अब तक के तमाम सबूत दिखाकर उसकी सुनवाई की जाएगी।
- टिप्पणी: सरकार ने जांच प्रक्रिया को पूरा का पूरा मज़ाक बना कर रख दिया है। यदि आरोपियों को हर स्तर पर इस तरह सबूत दिखाए गए तो इससे न सिर्फ उन्हें बाकी के सबूत मिटाने में मदद मिलेगी बल्कि उनके खिलाफ गवाही देने वालों एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों की जान भी खतरे में पड़ जाएगी। जांच का ऐसा अनोखा तरीका दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता। इससे हरेक मामले को शुरू में ही दफना दिया जाएगा।
- मुद्दे : 10. निचले स्तर के अधिकारी
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: भ्रष्टाचार निरोधी कानून में लोकसेवक की परिभाषा में शामिल सभी लोग इसके दायरे में आएंगे। जिसमें निचले स्तर के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हैं।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: इसमें केवल केन्द्र सरकार के क्लास-1 अधिकारियों को ही शामिल किया जा रहा है।
- टिप्पणी: निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सरकार की मंशा समझ से परे है। इसका कारण हो सकता है कि सरकार सीबीआई को अपने अधीन बनाए रखना चाहती है। क्योंकि अगर सभी कर्मचारी लोकपाल के अधीन आ जाएंगे तो सरकार के पास सीबीआई को अपने अधीन बनाए रखने का कोई आधार नहीं बचेगा।
- मुद्दे : 11. लोकायुक्ता
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों का गठन एक ही कानून बनाकर किया जाए।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: इस कानून से केवल केन्द्र में लोकपाल का गठन होगा।
- टिप्पणी: प्रणब मुखर्जी के अनुसार कुछ मुख्यमन्त्रियों ने इस कानून के तहत लोकायुक्तों के गठन पर आपत्ति जताई है। लेकिन उन्हें याद दिलाया गया कि सूचना के अधिकार के एक कानून के तहत ही केन्द्र और राज्यों में एक साथ सूचना आयोगों का गठन हुआ था तो इसका कोई जवाब वे नहीं देते।
- मुद्दे : 12. भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की सुरक्षा
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल भ्रष्टाचार उजागर करने वालों, गवाहों और भ्रष्टाचार से पीड़ित लोगों को सुरक्षा मुहैया करायेगा
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: इसके बारे में कुछ नहीं कहा गया है
- टिप्पणी: सरकार का कहना है कि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की सुरक्षा के लिए अलग से क़ानून बनाया जा रहा है। लेकिन वो क़ानून इतना कमजोर है कि पिछले महीने संसद की स्टैण्डिंग कमेटी ने भी इसे बेकार बताया है। इस कमेटी की अध्यक्ष जयन्ती नटराजन हैं। लोकपाल बिल की संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी की 23 मई की बैठक में यह तय किया गया था कि लोकपाल को एक अलग क़ानून के तहत भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी जायेगी और उस क़ानून पर चर्चा और उसमें सुधार इसी कमेटी में किया जायेगा। लेकिन यह नहीं किया गया।
- मुद्दे : 13. उच्च न्यायालयों में स्पेशल बेंच
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: सभी उच्च न्यायालयों में भ्रष्टाचार के मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए स्पेशल बेंच बनाये जाएंगे
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: इसका प्रावधान नहीं है
- टिप्पणी: एक अध्ययन के अनुसार भ्रष्टाचार से सम्बंधित मामलों की सुनवाई पूरी होने में 25 साल लगते हैं। अब समय आ गया है कि इसका समाधान निकाला जाये।
- मुद्दे : 14. सीआरपीसी
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई पूरी होने में कोर्ट में इतना समय क्यों लगता है और क्यों हमारी जांच एजेंसियां इस तरह के मामले हार जाती हैं? इस तरह के पुराने अनुभवों के आधार पर और हर मामलें लगातार स्टे लेने से बचने के लिए सीआरपीसी के कुछ प्रावधानों में बदलाव की बात कही गई है
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: नहीं शामिल किया गया है
- टिप्पणी: No Comments
- मुद्दे : 15. भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों का निलम्बन
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: जांच पूरी होने के बाद भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ कोर्ट में मुक़दमा दायर करने के साथ साथ लोकपाल की एक बेंच खुली सुनवाई करते हुए उस अधिकारी को नौकारी से निकालने का निर्णय दे सकती है।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: मंत्री यह तय करेंगे कि भ्रष्ट अधिकारी को नौकरी से निकाला जाये या नहीं। देखा यह गया है कि इस तरह के ज्यादातर मामलों में मंत्री भ्रष्टाचार का लाभ उठा रहे होते हैं, खास तौर पे जब बडे़ अधिकारी इसमें शामिल हों, ऐसी स्थिति में पुराने अनुभव बताते है कि भ्रष्ट अधिकारी को नौकरी से निकालने की जगह मंत्री उसे सम्मानित करते हैं।
- टिप्पणी: भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों को नौकरी से हटाने का अधिकार लोकपाल को दिया जाना चाहिए ना कि उसी विभाग के मंत्री को।
- मुद्दे : 16. भ्रष्टाचार करने वालों के लिए दण्ड
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: अधिकतम आजीवन कारावास बडे़ अधिकारियों को अधिक सजा अगर दोषी उद्योगपति हो तो अधिकतम जुर्माना लगाया जायेगा अगर किसी उद्योगपति को एक बार सजा हो जाती है तो उसे भविष्य में हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया जायेगा
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: इनमें से कोई नहीं स्वीकार किया गया। केवल अधिकतम सजा 7 से बढ़ा कर 10 साल कर दी
- टिप्पणी: No Comments
- मुद्दे : 17. वित्तीय स्वतन्त्रता
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल के 11 सदस्य यह तय करेंगे कि उन्हें कितना बजट चाहिए
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: वित्त मन्त्रालय यह तय करेगा कि लोकपाल को कितना बजट दिया जाये
- टिप्पणी: यह लोकपाल की वित्तीय स्वतन्त्रता से बड़ा समझौता है
- मुद्दे : 18. भविष्य में होने वाले नुकासन को रोकना
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: अगर लोकपाल के समक्ष वर्तमान में चल रहे किसी प्रोजेक्ट से सम्बंधित भ्रष्टाचार का कोई मामला आता है तो लोकपाल की यह जिम्मेदारी होगी कि वो भ्रष्टाचार रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई करे। ऐसी स्थिति में जरूरत पड़ने पर लोकपाल उच्च न्यायालये से आदेश भी प्राप्त कर सकता है
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है।
- टिप्पणी: 2 जी घोटाले के सम्बन्ध् में यह कहा जाता है कि जब इसकी प्रक्रिया चल रही थी उस समय ही इससे सम्बंधित जानकरियां बाहर आ गई थीं। क्या कुछ एजेंसियों की यह जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए कि इस तरह के मामलों में जब भ्रष्टाचार चल रहा था तभी रोकने के लिए कार्रवाई करें ना कि बाद में लोगों को सजा दी जाए।
- मुद्दे : 19. फोन टैपिंग
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल की बेंच फोन टैपिंग का आदेश दे सकती है
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: गृह सचिव अनुमति देंगे
- टिप्पणी: गृह सचिव उन्हीं लोगों के नियन्त्रण में काम करते है जिनके खिलाफ कार्रवाई करनी होती है। इससे जांच करने का कोई फायदा नहीं होगा।
- मुद्दे : 20. अधिकारों का बटवारा
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: लोकपाल के सदस्य केवल बड़े अधिकारियों और नेताओं या बड़े स्तर पर हुए भ्रष्टाचार के मामलों की हीं सुनवाई करेंगे। बाकी मामलों की जांच लोकपाल के अन्दर के अधिकारी करेंगे।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: सभी तरह के काम केवल लोकपाल के 11 सदस्य ही करेंगे। वास्वत में अधिकारों का कोई बटवारा ही नहीं है।
- टिप्पणी: इससे यह तय है कि लोकपाल आने से पहले ही समाप्त हो जायेगा। केवल 11 सदस्य सभी मामलों पर कार्रवाई नहीं कर सकते हैं। कुछ ही समय में शिकायतों के बोझ से लोकपाल दब जायेगा।
- मुद्दे : 21. एनजीओ
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: केवल सरकारी सहायता प्राप्त गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ही दायरे में
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: छोटे, बड़े सभी तरह के एनजीओ और संगठन होंगे
- टिप्पणी: भ्रष्टाचार के आन्दोलनों और गैर सरकारी संगठनों को दबाने का नया तरीका है
- मुद्दे : 22. फालतू और निराधार शिकायतें
- जनलोकपाल के प्रस्ताव: किसी तरह की कैद नहीं केवल जुर्मानें का प्रावधान। लोकपाल यह तय करेंगे कि कोई शिकायत फालतू और निराधार है या नहीं।
- सरकारी लोकपाल के प्रस्ताव: 2 से 5 साल तक की कैद और जुर्माना। आरोपी शिकायतकर्ता के खिलाफ कोर्ट में शिकायत दायर कर सकता है। दिलचस्प बात यह है कि आरोपी को कोर्ट में केस करने के लिए वकील और उस पर होने वाले सभी खर्चे सरकार वहन करेगी। साथ ही शिकायतकर्ता को आरोपी को क्षतिपूर्ति भी देनी पड़ सकती है।
- टिप्पणी: इससे अरोपी अधिकारियों को एक हथियार मिल जायेगा जिससे वो शिकायतकर्ता को धमका सकते हैं। हर मामले में वो शिकायतकर्ताओं के खिलाफ कोर्ट केस दायर कर देंगे जिससे कोई भी भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पायेगा। एक और दिलचस्प बात यह है कि भ्रष्टाचार साबित होने पर न्यूनतम कैद 6 महीने की है, लेकिन गलत शिकायत करने पर 2 साल की कैद होगी।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:54 am 0 विचार मंच
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शुक्रवार, 24 जून 2011
लोकतंत्र के प्रहरी - शम्भु चौधरी
चाळो केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री या बात तो कबूल करी कि वे समाज का सदस्यावां साथे कुछ मुद्दा म अभी भी असहमत है। यानी कि बिना के ही मुंडा से आ बात निकली कि वे ‘‘कुछ बिंदुओं पर हम असहमत होने के लिए सहमत हो गए हैं।’’ आ बात पढ़ मेरो तो माथो ही ठिनकगो। भ्रष्टाचार का मुख्य-मुख्य जो स्त्रोत हा सबने वे बिल से हठा दिया या जान संगळा का पौ-बारह हो गया। सारा भारत में दीपावली मनाने को एलान कर दियो। कई लोग राजना कहता कि दिल्ली भ्रष्टलोगां की नगरी है दिल्ली के संसद के शीतकालिन सभागार में जो नये-नये विचार पैदा होते हैं वह तो बंगाल में भी नहीं हो सकते। बंगाल वाले को बड़ा गुमान था ‘‘बंगाल जो आज सोचता है, भारत उसे कल सोचता है।’’ अब देखो आपने कभी सपने में भी यह सोचा था इतना तगड़ा बयान सरकार की तरफ से आयेगा कि लोग सोचते ही रह जायेगें कि आखिर जब सरकार सहमत हो चुकी तो फिर विवाद का प्रश्न ही कहाँ बचा। समाज के सदस्यों को तो सिर्फ धमकी देना आता है। देश के तमाम अखबार जिनको सरकारी रिश्वत बतौर विज्ञापन मिलते हैं उन सबको सूचना भेज दी गई कि वे सरकार का पक्ष मजबूती के साथ जनता के सामने रखें और जो सरकार को अधिक खुश यानी अन्ना के खिलाफ सरकारी पक्ष का साथ देगें उनका कोटा डबल कर दिया जायेगा। अब आप ही सोचिये घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या? खासकर उन समाचार पत्रों को तो सोचना ही पड़ता है जो डरपोक किस्म के प्रजाति के प्राणी हैं। जिनको समाचार की भूख से ज्यादा विज्ञापनों की भूख रहती है। जिस पर सरकारी विज्ञापन न मिले तो इनके प्राण पखेरू ही उड़ जायेगें। अखबार हालां कि या हालत देख मुझे कबीरदास की दो लाइनें याद आने लगी-
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥
रोजना सरकार को भला बुरा कहने वाले मीडिया और समाचार वाले भ्रष्टाचार बिल पर इस कदर चुहे की तरह बिल में जा छुपे कि कोई इनको लोकतंत्र का रक्षक कहे तो सुनने में भी अब शर्म आने लगी। बेचारे कबीरदास ने भी नहीं कल्पना की होगी की उनके दोहे का मट्टी से भी बुरा हाल कर देगें ये राजनीतिज्ञों के दलाल जो खुद को लोकतंत्र का प्रहरी बताते हैं और आम जनता के पीठ पर ही कलम की धार से वार करने में नहीं चुकते। इस लेख के माध्यम से एक सीध सा सवाल सबसे करना चाहता हूँ देश में पिछले पांच-दस सालों में भ्रष्टाचार के जो मामले मीडिया और समाचार पत्र वालों न मिलकर उजागर किये वे सभी के सभी किस समूह से जुड़े हुए थे? जिसमें सत्ता पक्ष से जुड़े कितने थे और अन्य मामाले जिसमें सरकारी अधिकारियों के कितने थे? चाहे वो राज्य सत्ताधारियों के मामले रहे हों या केंद्र सत्ताधारी के हों। सरकार किसकी रही हो या नहीं रही हो। देश के तमाम राजनैतिज्ञों को खुली चुनोती देता हूँ कि वे इस बात के आंकड़े प्रस्तुत करें कि पिछले 10 सालों में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आयें हैं उनमें कोई भी सांसद, विधायक, मंत्री का नाम शामिल नहीं है और जो भी मामले सामने आये हैं वे सभी झूठे और मनगढ़ंत मामले हैं जिनमें भ्रष्टाचार का कोई मामला बनता ही नहीं। आपके उत्तर का मुझे बेसब्री से इंतजार रहेगा।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 11:42 am 0 विचार मंच
Labels: अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, लोकपाल बिल, शंभू चौधरी, Govt. Draft Lokpal Bill 2011, Lokpal Bill
Govt. Draft Lokpal Bill 2011:
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:44 am 0 विचार मंच
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गुरुवार, 23 जून 2011
व्यंग्यः कांग्रेसी दांत - शम्भु चौधरी
जिस शख्स ने भी इस कहावत को ‘‘हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और’’ लिखा, शायद उसे पता भी नहीं होगा कि भारत में एक राजनैतिक दल जिसका नाम कांग्रेस पार्टी है उसके लिए भी इस कहावत को लागू कर दिया जायेगा। जब से कांग्रेस जोंकपाल बनाम लोकपाल बिल बनाने के कसरत में लगी है कांग्रेस पार्टी नये-नये शब्दों का गठन कर कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव पर हमला कर रही है तो कभी खुद का बचाव करने में। अब कांग्रेसियों ने दावा किया है कि पिछले 6 माह में इन लोगों ने 68 हजार करोड़ काले धन को सफेद बना दिया है। कांग्रेसीगण इस बात का जबाब हमें शायद नहीं देगी कारण की ‘‘हमरी कलमवा किसी भी चुनावी मैदान से चुन कर पैदा नहीं हुई। साली भ्रष्टाचार के काले कमाई से पैदा होल’वाणी। अब ईंमे हमनी’के का दोष बाड़े? सारे देसवां में’ईं ईईई... धनवा सूरा आआअ...साळा चलते-चलते काला हो गईंल’बां। ऐई..में कांग्रेसियां लोगण’का का दोष देवे का कोणु बात नैईखे बां।’’
अब लो भाई बंगाल में रह कर हमारी कलम भी माकपा की तरह गरीबों की मसीहा बन गई। दिते हुबे...दिते हुबे- पुरिये देबो...पुरिये दिबो... करते-करते किसानों की जमीन ही डकारने लगी। एई तो ममता दीदी छीलो ना होले कांग्रेसी’रा तो चुप कोरे बोसे’ही छिलो। टाटा हो या जैकोनू’क न हो अमार बाबा होअ..क जैखाने साले दूटा फसल होसछिळो सेई जमीनटा के बाममांर्चा सरकार जोर जर्बदस्ती कोरे निये, टाटा के दिये दिळो। दिल्ली'तिके कांग्रेसी'रा बोललो... कार..खा....ना तो लगाते होबे ना होले काज खोथाई पावे? कोनो स्पे..से (चांद) तो नैनोकार बनाते पारेबे ना। ऐखून कांग्रेसीरा, बामदले लोग’रा ताकते ही थाकलो। टाटा गुजराते नरेन्द्र मोदी गोदीते गिए बोसेगिलो आई....रे बाबा ईं कि होळो? खासकोरे बामदले’र लोग भांपते ही पारळो ना की टाटा चुप कोरे गुजराते पालिये जाबे। अब ममता दीदी की सरकार में आते ही सारी अनियमितताओं को दुरस्त करने में लगी है तो कुछ लोग कोर्ट के चक्कर लगाने लगे तो कुछ लोकपाल बिल को भुनाने के लिए सड़कों पर दावा ठोकने में लग गये कि देश में हम कांग्रेसी लोग ही भ्रष्टाचार को मिटाने में दिल से लगे हैं और बाकी के सब या तो नाटक कर रहें हैं या अड़ंगा लगा कर विवाद खड़ा कर रहें हैं। भला विवाद हो भी क्यों नहीं? देश में शायद यह पहला कानून बनेगा जिसमें सरकार की तरफ से नाकाम कोशिशों के वाबजूद के बाद कि बिल के सभी प्रवधानों को इतना जटील बना दिया जाय कि जिसमें भ्रष्टाचारी को कम सजा और भ्रष्टाचारी को पकड़ाने में मदद करने वालों का अधिक सजा मिलेगी। न सिर्फ सजा की मियाद अधिक होगी, अपराधी को निर्दोष साबित होने के लिए उसकी दो बार सुनवाई सुननी होगी। सुनावाई में वरी हो जाने पर सरकारी खर्च पर उस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा लड़ा जायेगा जो भ्रष्टाचारी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जायेगी। सरकार से जरा कोई चुने हुए सांसदों में कोई एक माई का लाल संसद में पूछे कि भाई! इतनी दया किस बात की इन भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए? देश की आम जनता पर तो आप इतनी दया नहीं दिखाते? दस-बीस मुकदमें में भ्रष्टाचारी यदि तथ्य के अभाव में बरी हो भी जाएं तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अपराध कम हो गया। दरअसल कांग्रेस आम जनता को पहले से ही डरा देना चाहती है कि सोच लो बेटा मुकद्दमा किये तो हम तो बरी हो ही जायेगें पर तेरी खैर नहीं।
जब से बाबा रामदेव जी अचानक सूं दिल्ली म अनशन करणे’री सोची मेरी तो नींद ही गुमगी। म सोचन लाग्यो कि ‘कि’म’की’ दाळ में काळो है। दिल्ली म बाबा की अगवाई से तो सारी बात दर्पण सूं भी साफ-सुथरी झळकण लाग्गी। भाया! व्यापारी से बड़ों भ्रष्टाचारी थाने कुण मिलसी। एक तो व्यापारी ऊपर से संत, वा कहावत थे सुणी थी कि न’इ थाणे फेर सूं ठाह करा दूँ - ‘‘एक तो करेला ऊपर से नींम चढ़ा’’ खैर बाबा रामदेव बेचारा को तो कांग्रेसी’रां जो कियो सो किया निर्दोष जनता ण’भी ळाठियां मुफ्त म खानी पड़गी। चाळो आपां तो यूँ ही थारो दिमाग चाट लियों अब मेरे मनकी तो म निकाळ’ळी। थे थारो सर भीत सूँ फोड़ता फिरो।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 11:13 pm 0 विचार मंच
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बुधवार, 22 जून 2011
Govt. Lokpal Bill vs Jan Lokpal Bill Table Chart
Date: June 22, 2011
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 12:21 pm 0 विचार मंच
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मंगलवार, 21 जून 2011
भ्रष्टमत सरकार के भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री कपिल सिब्बल-शम्भु चौधरी
1. सरकार से बात करने के लिए पहले चुनकर आयें-
सरकार के चुने हुए सांसदों और सिविल सोसाईटी के तानाशाहों के बीच कल मैराथन बैठकों का दौड़ समाप्त हो गया। चुने हुए केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने बैठक के बाद मीडिया के माध्यम से अचुने हुई जनता को जानकारी दी की सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार संरक्षक कानून संसद के अगले मानसून सत्र में ले आयेगी। कांग्रेसी सरकार के चुने हुए केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कल पुनः प्रमाणित कर दिया कि समाज के सदस्यों के साथ बैठकों का वे सिर्फ नाटक का रहे थे करना उनको वही है जो कांग्रेस का गुप्त एजेण्डा है। इसके लिए अब कांग्रेस किसी से भी हाथापाई करने को तैयार है। भला हो भी क्यों नहीं लोकतंत्र में किसी दूसरे को समानान्तर सरकार चलाने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। सरकार को गुमान हो गया है कि वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि है जिन लोगों को सरकार से बात करना हो चाहे वे पत्रकार ही क्यों न हो पहले उनको भी चुन कर आना होगा। ये मीडिया और अखबार वाले हमेशा सरकार से किसी न किसी बात पर बवाल मचाती है कि देश की जनता यह जानना चाहती है! वह जानना चाहती है! अब आपको इस तरह के सवाल करने का कोई हक नहीं बनता। आप चुने हुए जन-प्रतिनिधि तो है नहीं? फिर सरकारी पक्ष से आपको बात करने का कोई हक नहीं बनता। आपको जो कुछ पूछना हो चुनाव के समय ही पूछ लिया किजिये। सरकार गठन कर लेने के बाद वे चुने हुए प्रतिनिधि बन जाते हैं। अब हर कोई आकर उनसे कानून बनाने के लिए कहेगा तो कैसे होगा। जैसे मानो 64 सालों में सरकार को कानून बनाने के लिए हर बार जनता ही आकर ही कहती रही। अब देखिये कानून तो जनता बना नहीं सकती सलाह और सूझाव भी नहीं दे सकती और आन्दोलन भी नहीं कर सकती।
2. पोलियोग्रस्त लोकपाल बिल लायेगी केन्द्र की भ्रष्ट सरकार-
चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल का मानना है कि टीम अन्ना की मांगे देश में समानान्तर सरकार चलाने की है जो किसी भी स्थिति में मानी नहीं जा सकती। इसलिए वे लोकपाल बिल के टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावित उन सभी पहलुओं को खुद ही समाप्त करते हुए इसे समानान्तर सरकार चलाने की संज्ञा दे दी। संसद में इस बात की बहस की कोई जरूरत उनको नहीं लगती। शब्दों के खिलाड़ी कांग्रेस के चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल को बिल बनने से पुर्व ही अन्ना का भूत उनको सताने लगा कि कहिं इस बिल के आते ही उनके उस बयान की भी जाँच शुरू न हो जाय जिसमें उन्होंने 3जी मामले में केग की जाँच रिर्पोट को पलक झपकते ही गलत करार दे दिया था। आज जब उसी रिर्पोट के आधार पर संयुक्त संसदीय जाँच समिति बैठ गई और सत्ता पक्ष के एक के बाद एक मंत्री जेलों में बन्द होते जा रहें है और श्री मान् भ्रष्टतम सरकार के गृहमंत्री श्री पी. चिदम्बरम जी का नम्बर आने ही वाला है को लेकर इनको अभी से ही चिन्ता सताने लगी की कहीं उनकी पोल भी न खुल जाए। शायद इसीलिए चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल व इनकी टीम ने मन बना लिया है कि लोकपाल बिल तो लाया जाय चुंकि जनता की आंखों में धूल अब तो झोंकना तो पड़ेगा ही अन्यथा इससे पिंड नहीं मिलेगा। अतः बिल के सभी प्रवाधनों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर संसद में पेश किया जाए कि लोकपाल बिल की भ्रूणहत्या न भी की जा सके तो उसे पोलियोग्रस्त तो बनाया ही जा सकता है।
लेख आगे भी जारी रहेगा.....2
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 6:18 pm 0 विचार मंच
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सोमवार, 20 जून 2011
Let me make it clear: - शम्भु चौधरी
Let me make it clear THE CONGRESS VIEW ON PRESENT SITUATION - 1 JUNE 2011 AICC :
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भारत के सबसे बड़े घोटाले के जिम्मेदार चुने हुए देश के सबसे बड़े ईमानदार कांग्रसी प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ जाए कि ‘‘भाया नाव तो चालती देखी पर पानी में चाल रही थी कि बालू पर सो मणे कोणी दिखी म तो गठबंधन का गांठ से बन्धो पड्यो थो’’।
कोलकाता-21जून,2011:
Let me make it clear: - शम्भु चौधरी
Point-12. कांग्रेस पार्टी खुद कितनी दूध की धुली है यह भी साथ में इनको लिखना चाहिये कि रक्षा सौदों से लेकर खेल के मैदानों तक में अरबों का खपला वह खुद कर चुकी है। चुनी हुई सरकारी पक्ष का बयान है कि हाल के दिनों में जितने भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आयें हैं जिसमें 3जी, हो या कामनवेल्थ के खेल हों या खाद्य प्रदाथों में वृद्धि का मामला हो सभी के सभी गठबंधन धर्म के कारण हुए हैं। जब कांग्रेस की सरकार इस बात से सहमत है कि सरकार में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पंहुच चुका है जो गठबंधन की मजबूरियों का परिणाम है। कहने का अर्थ कांग्रसी चोर नहीं कांग्रेस की सरकार को मदद देने वाले चोर हैं तो सरकार इसका कोई नया समाधान क्यों नहीं खोजती? कांग्रेस पार्टी जब खुद स्वीकार करती है कि सरकार बनाने के लिए देश के चुने हुए सभी चोर, लुटेरे और बेईमानों को साथ लेकर उन्होंने सरकार बनाई है तो इस सरकार में इन चुने हुए सांसदों से देश की जनता अब क्या अपेक्षा कर सकती है।
देश की जनता के द्वारा चुने हुए लोग हैं आप लोग भला जनता की बात अब क्यों सुनेगें? जिस जनता ने इनको चुन कर संसद में भेजा है वे पहले से ही इनको बहुत सारे काम दे रखें हैं। अब हर व्यक्ति आकर कहेगा कि अमूक कानून बनाओं तो भला ऐसे कैसे हो सकता है? आखिर चुने हुए सांसद हैं। कोई मजाक थोड़े ही है भाई! जनता के प्रति इनकी बस इतनी ही जबाबदेही है कि वे उन्हें लाठियों से हांक दें बस। अनपढ़ गांवार जनता भला लोकपाल के बारे में क्या जानती है? ये चार-पांच आदमी झूठ-मुठ का खुद को जनता का प्रतिनिधि बताते हैं। ये तो इनकी भली मानसिकता है कि कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता करने वाली एक नादान लेडी है जो देश के भ्रष्ट नेताओं के दांव-पेंच नहीं जनती सो बेचारी अन्नाजी की इज्जत के चक्कर में इस पचड़े में फंस गई वरणा अन्नाजी को जेल के भीतर बन्द कर 2-4 दिनों में ही होश ठिकाने लगा देते।
Point-13. ये लो चुने हुए कांग्रेसी सांसदों का एक नया बयान क्या कह रहें हैं जनाब - "In recent months, the Congress party has taken a number of steps that will clearly manifest its intentions. For example, the Government is engaged in drafting a strong and sound Lokpal Bill that will be introduced in the monsoon session of Parliament. It has entrusted grave allegations of corruption that may involve people in high places to investigation by the CBI." इनकी ईमानदारी पर जरा नजर डालिये "Government is engaged in drafting a strong and sound Lokpal Bill" लोकपाल बिल का ड्राफ्ट का सारा श्रेय खुद को दे रहें हैं। अन्ना हजारे के पूरे आन्दोलन को दरकिनार कर दिया। यही कांग्रेसी चरित्र है जो देश की आजादी के हजारो शहिदों के इतिहास को डकारती रही है। आज अन्ना की बलदानी को भी उनके सामने ही डकार गई। इतनी जल्दी भी क्या थी भाई! इस बात को लिखने की कम से कम अन्ना को मर तो जाने देते। तब तक जनता भी सारी बातें भूल जाती। खैर! लोकपाल बिल को कांग्रेस के योगदान में जमा कर लियो हो ता अब थोड़ी तो शर्म करो कि इस बिल को शख्ती के साथ संसद में लाकर पारित करवा दो। ना जाने फिर कहीं गठबंधन धर्म आड़े हाथ न आ जाए और भारत के सबसे बड़े घोटाले के जिम्मेदार चुने हुए देश के सबसे बड़े ईमानदार कांग्रसी प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ जाए कि ‘‘भाया नाव तो चालती देखी पर पानी में चाल रही थी कि बालू पर सो मणे कोणी दिखी म तो गठबंधन का गांठ से बन्धो पड्यो थो’’।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:32 pm 0 विचार मंच
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रविवार, 19 जून 2011
लोकपाल चक्रव्यूह - शम्भु चौधरी
कोलकाता-20जून,2011: कांग्रेस पार्टी की लोकपाल बिल को लेकर नई व्यूह रचना की तैयारी जोरों से चल रही है। अर्थात योजनानुसार कार्य को इंजाम देना।
लोकपाल चक्रव्यूह क्या है-
1. कांग्रेस पार्टी देश में चारों तरफ सहयोगी मीडिया व समाचार संपादकों के माध्यम से इस बात को प्रचारित करेगी कि सिविल सोसाइटी के सदस्य तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। उनकी सभी मांगे नहीं मानी जा सकती।
2. सभी विपक्षी पार्टी को भी भयभीत करना ताकी सिविल सोसाइटी के अड़ियल रूख को नजरअंदाज किया जा सके।
3. चुने हुए सदस्यों की परिभाषा के सामने में रखते हुए तमाम चुने हुए सदस्यों का एक अलग समूह का निर्माण करना। अर्थात सभी सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कांग्रेस पार्टी का साथ दें यानी कि ‘‘चोर-चोर मौसेरे भाई’’ का नारा देकर सिविल सोसाइटी को अलग-थलग करना।
4. सिविल सोसाइटी से दो-दो हाथ करना।
अब इसी क्रम में सरकार ने हमला बोल की राजनीति शुरू करते हुए देश के तमाम बड़े समाचार समूह को प्रलोभन दिया जा चुका है। कि ये लोग सरकारी बात को महत्व प्रदान कर सिविल सोसाइटी सदस्यों को भिलन के तौर पर जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। माननीय श्री प्रणव मुखर्जी, श्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम मानती है कि देश की जनता नासमझ है उनको बिल के किसी भी प्रावधान की कोई जानकारी नहीं है। और चुने हुए सांसदों की देश के प्रति जिम्मेदारी है। साथ ही गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी भी फरमाते हैं कि गांधीजी के सत्याग्रह के हथियार से किसी देश में कानून नहीं बनाया जा सकता। अन्ना का अनशन गांधीजी के अनशन से भिन्न है। अब कांग्रेस सहित प्रायः सभी दल को इस बात कि चिन्ता सताने लगी कि यदि सिविल सोसाइटी की बातें को मान ली गई तो संभतः एक समय ऐसा भी आ सकता है जब देश के आधे से अधिक सांसदों को जेल की सलाखों के अन्दर जाना पडे। श्री अरविन्द केजरीवाल ने भी माना कि भला कोई अपना सुसाइडल नोट भला क्यों लिखेगा? सरकारी पक्ष अब अन्ना समूह से दो-दो हाथ करने का मन बना चुकि है। इस चक्रव्यूह योजना के तहत कांग्रेस अब तमाम राजनैतिक दलों को साथ लेकर चलना चाहती है। कांग्रेस पार्टी मानती है कि वो खुद तो इस बिल को लेकर बुरी तरह उलझ ही चुकि है अब देश के तमाम पार्टियों को भी इसमें 30 जून से पहले ही उलझा दिया जाये ताकि संसद के सत्र में उसकी पोल न खुले। कांग्रेस पार्टी अब जानबुझ कर बिल का विवादित हिस्से को बेतुके सवालों में उलझाने कि योजना बना चुकी है। ताकी बिल संसद के पटल पर रखने से पूर्व ही विवादों में घिर जाय और भ्रष्टाचार निरोधक लोकपाल बिल बैगर किसी अधिक बहस के सदन से बाहर कर दिया जाए। जिस तरह महिला आरक्षण बिल संसद में अपनी लम्बी सांसें भर रहा है लोकपाल बिल का भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। देश के 70 प्रतिशत सासंद और विधायक इस बिल के किसी भी प्रावधन से सहमत नहीं होगें। संसद या विधानसभाओं में जिस धारा के अंर्तगत उनको वोट देने और बोलने का अधिकार प्राप्त है समाज का मानना है कि इस अधिकार के तहत ही संसद और विधानसभाओं में भ्रष्टाचार व्याप्त है। जबकि सरकार का कहना है कि यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही है। उनके स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन है। इस तरह के प्रस्ताव लाने का अर्थ है संसद के आधे से अधिक सांसद पर किसी भी समय मुकद्दमा चलाया जा सकेगा। जबकि सिवलि सोसाइटी कहती है कि जबतक कानून बनाने वाले सही आचरण या वर्ताव नहीं करेगें तब तक देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके कहने का सरल सा अर्थ है जो भी कड़े कानून बने उसे ऊपर से ही लागू किया जाना चाहिये। अन्यथा लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि चोर प्रधानमंत्री बरी संत्री को कड़ी। जैसा कि 3जी मामले में साफ छवि की आड़ में डा. मनमोहन सिंह बचते आ रहे हैं। गृहमंत्री का नाम अब सामने आ ही गया। कुछ दिनों में प्रधानमंत्री को भी सीबीआई के समक्ष प्रस्तुत होना पड़ सकता है चुंकि कांग्रेस इस बात को पहले से ही जानती है कि इस बिल के पारित होते ही उनकी सरकार 3जी मामले में खतरे में पड़ती दिखाई देती है तो इन लोगों ने प्रधानमंत्री को एक संस्था का नाम देकर बचाव की मुद्रा में पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। अब सिविल सोसाइटी के सामने एक ही विकल्प बचा है कि वे देश के तथाकतित चुने हुए प्रतिनिधियों को साफ कर दें कि जनता ने उनको चुन कर भेजा है इसका अर्थ है वे जनता के प्रति न सिर्फ जिम्मेदार हैं उनका दायित्व भी बनता है कि वे जनता की बातों पर अमल भी करें। सरकारी पक्ष अपनी बैतुकी बातों से जनता को गुमराह करने की जगह बिल के सभी पक्षों पर ईमानदारी से बहस करें। क्या सही है और क्या गलत पर पहले ही बहस न कर खुले दिमाग से बिल को संसद के सामने प्रस्तुत करें न कि खुद को स्थापित करने के लिए बिल को संसद में प्रस्तुत व बहस करने से पूर्व ही बिल के मूलभूत संरचना से छेड़छाड़ और खिलवाड़ करना शुरू कर दें। कुछ काम संसद के अन्दर चुने हुए सांसदों के उपर भी छोड़ दें वे भी आपके जैसे चुने हुए ही सांसद हैं जो लोकपाल बिल को पारित करेगें या उनको आपलोगों द्वारा सुझाये हुए प्रावधानों पर अपनी राय देगें। सारा काम आपकी समिति के पांच सदस्य ही तय कर लेगें तो संसद के अन्दर बाकी बचे 540 सदस्य क्या खाख करेगें। लोकपाल बिल के मूल प्रस्तावों के साथ सदन में प्रस्तावित करना ही देश की प्रगति का नया अघ्याय होगा। कांग्रेस पार्टी इस बात को गंभीरता से लेकर अपने शातिरों पर लगाम कसे।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:07 pm 0 विचार मंच
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