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शनिवार, 6 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता बनाम भगवा आतंकवाद -शम्भु चौधरी

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इतनी विवेकशील हो चुकी है कि देश की देशभक्ति इनको सांप्रदायिक लगने लगी है। देशभक्ति की बात करने वाले, इस देश के हर नागरिक इनकी नजर में देश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने वाला माना जाने लगे हैं उनकी परिभाषा में सिर्फ वे लोग देशभक्त हैं जो देश को अंदर से खोखला करने में उनकी मदद कर रहें हैं। जो लोग देश की एकता और अखंडता की बात करते हैं उसको भगवा आंतकवाद का नाम दिया जा रहा है, इससे स्पष्ट परिलक्षित हो जाता कि देश में धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद उनके सर चढ़कर बोल रहा है। यह सब बातें हमारी पौंगी धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती है। जो इनके बचाव में गाहे-बगाहे कुछ दलील देश के सामने रखते हैं जो निम्न प्रकार है -

इस परिपेक्ष में जो दलीलें दी जाती है-

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना। 2. देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोकना। 3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना।

हमें देखना होगा कि इन दलीलों के पीछे किन स्वार्थी तत्वों का दिमाग कार्य कर रहा है? दरअसल देश में जिन-जिन स्थानों में दंगों के खतरे ज्यादा महसूस किये जाते रहे हैं वैसे अधिकतर स्थान मुस्लीम बाहुलता वाले होते हैं। दंगों की शुरुआत ऐसे ही तत्वों द्वारा होती है जो देश में खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानती रही है। इसका स्पष्ट संकेत है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानने वाले तत्व देश की धर्मनिरपेक्षता को न सिर्फ खतरा साबित हो चुके हैं वे राजनीति स्वार्थपुर्ति के लिए बार-बार इस तरह का वातावरण भी सृजन करते रहें हैं।

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना -   आजादी के पश्चात अबतक हम जिन्हें अल्पसंख्यक मानते रहें हैं वे अपने-अपने क्षेत्र में अब न सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके हैं उन क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं के उनके साथ विवाह के भी कई मामले सामने आने लगे हैं। सही अर्थों मे कहा जाए तो अब इस कौम के अंदर भय नाम की कोई बात नहीं रह गई कारण कि इनको दोहरे कानून का समर्थन प्राप्त हो रहा है। पहला इस्लामिक कानून जो हिन्दुओं की लड़कियों को मुस्लीम बनाने की इज्जाजत देता है। दूसरा भारतीय संविधान जो वयस्कों धर्म-जाति के बंधन से परे रहकर शादी करने की इज्जाजत। जबकि इसके विपरित कोई अन्य प्रकार की घटना घटते ही सांप्रदायिकता व कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती हैं। आनन-फानन में ऐसे संबन्धों का जो भी हर्ष निकले पर यह बात तय है कि उस समय भारत का संविधान गौन हो जाता है। चुकीं मामला एक विशेष धर्म से जुड़ा होता है। जहां से सांप्रदायिक दंगे फैलने की प्रवल संभावनाएं बनी रहती है। यह इस बात की ओर संकेत देता है कि भयभीत होने वाली कोई बात इस कौम पर लागू नहीं होती।

2. सांप्रदायिक दंगों की आग -   प्रायः राजनैतिक दलों द्वारा इस बात की चेतावनी दी जाती है कि कोई भी बात जो उनको पसंद न हो न करें, अन्यथा दंगा होने की संभावना जताई जाती रही है। हर बात में इस खौफ को पैदा किया जाता रहा है। कोई भी व्यक्ति ऐसी बात न करें या ऐसा कार्यक्रम न करें जिससे सांप्रदायिक सदभावना का खतरा पैदा हो जाए। यह बात किसे कहा जाता है? क्या यही बात हमारे राजनैतिक दलों ने कभी मुसलमानों को भी कहा है? जो लोग सांप्रदायिकता की बात करतें हैं वे लोग ही खुद सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं चुंकि उनका उद्देश्य न सिर्फ राजनीति करना रहा है इसके माध्यम से वे कई बार सत्ता भी प्राप्त करने में सफल रहें हैं।

3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना-   जो लोग बार-बार देश के टूकरे करने की बात कर देश की जनता को भयभीत करते रहते हैं उनके लिए एक बात याद आती है कि जो रोज-रोज शेर आया शेर आया करते रहते हैं ऐसे ही लोगों को एक दिन सच में शेर आकर खा जाता है। ऐसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों को मोहरा बनाकर अपनी सत्ता का दावा मजबूत करने में लगें हैं वे ही वास्तव में देश को पुनः विभाजन की कगार पर ले जाने का कार्य कर रहें हैं। जब एकबार धर्म के नाम पर देश के तीन बंटवारे हो चुके, तो प्रमाणित आंकड़े कहते हैं कि अब जो लोग देश को पुनः बांटने की धमकी देकर देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर एक विशेष संप्रदाय के वोट बैंक को अपने पक्ष में एकत्रित करने का काम कर रहें है। वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने में लगे हैं। ऐसी ताकतें जो खुद की राजनीति में लगा हो वह किसी भी सांप्रदाय का कभी भी भला नहीं सोच सकती।

आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इन तत्वों की ताकतों में इजाफा होगा। देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता चला जाएगा और इसके लिए एक मात्र वे ही लोग जिम्मेदार माने जाएंगें या धर्मनिरपेक्ष ताकतों का वह चेहरा ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा जो देश में धर्मनिरपेक्ष की आड़ में वोट की राजनीति करते रहें है।।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार लोकतंत्र का लोकमंत्र - शम्भु चौधरी



सरकार समझती है कि मीडिया वाले मूर्ख हैं उनको जैसे उल्लू बनायेगें वे बन जाते हैं सो रोजना उसे पंतजली और उनके सहयोगियों की पोल खोलते रहेगें तो ये मूर्ख लोग उसी में उलझ कर रह जायेगें। देश की जनता बाबा रामदेव व उनकी संपति का लेख-जोखा सरकार से नहीं मांग रही है सरकार उन बेइमानों की जाँच करें जिसके लिए उच्चतम न्यायालय गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है और जिनकी वकालत सरकार कर रही है देश की जनता यह जानना चाहती है कि सरकार उनपर क्या कार्रवाई करने जा रही है।


जब हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपनी पैनी नजर डालतें हैं तो हम पाते है कि वर्तमान सरकार पूरी तरह से भ्रष्टाचारियों के गिरफ्त में कैद हो चुकी है तो दूसरी तरफ विपक्ष भी पूरी तरह से पाक-साफ नहीं इसके अन्दर भी बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछ वाले पांव फैलाये बैठें हैं। आंचलिक व क्षेत्रीय दलों के अन्दर भी राष्ट्र के संचालन की कोई इच्छा शक्ति दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती सभी अपने राजनैतिक हितों और सत्ता सुख-स्वाद लेने में लगी है। कुल मिला-जुला कर हम पातें हैं कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र का लोकमंत्र बन चुका है। इनको बदले तो लायें किसको? यह एक आम प्रश्न हमारे जेहन में कोंध रहा है। रावन ने रामदूत हनुमान की पूँछ में आग लगा दी परिणाम क्या हुआ सोने की लंका पलकों में ही धू-धूकर धधकने लगी। बाबा रामदेव के जाँच प्रकरण से ऐसा प्रतित होता है कि देश में अब कालेधन की बात करने व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों की खैर नहीं। सरकार की ताकत मानानीय उच्च न्यायलय के लाख फटकार के बावजूद कालेधन के अपराधियों को बचाने का प्रयास करती रही। खुद की जाँच एजेन्सियों को देश के लूटे धन को देश में लाने के लिए तो नहीं लगा पाई हाँ! बाबा रामदेव व उनके सहयागी श्री बालकृष्ण की डिग्रियों और उनकी जन्म प्रमाणिकता जाँच करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सरकार किसे डराना चाहती है? कालेधन के अपराधियों की जाँच में सरकार ने इतनी सक्रियता दिखाई होती तो बात समझ में आती पर सरकार समझती है कि मीडिया वाले मूर्ख हैं उनको जैसे उल्लू बनायेगें वे बन जाते हैं सो रोजना उसे पंतजली और उनके सहयोगियों की पोल खोलते रहेगें तो ये मूर्ख लोग उसी में उलझ कर रह जायेगें। देश की जनता बाबा रामदेव व उनकी संपति का लेख-जोखा सरकार से नहीं मांग रही है सरकार उन बेइमानों की जाँच करें जिसके लिए उच्चतम न्यायालय गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है और जिनकी वकालत सरकार कर रही है देश की जनता यह जानना चाहती है कि सरकार उनपर क्या कार्रवाई करने जा रही है।
बाबा रामदेव की जाँच कर सरकार बेईमानों की वकालत करती दिखाई दे रही है। सरकारी ताकतों का प्रयोग करना है तो सरकार देश में बस गये बंग्लादेशियों के हजारों जाली पासपोर्ट की भी जाँच करें जो देश में घुसपैठ कर न सिर्फ देश की अर्थ व्यवस्था को भारी क्षति पंहुचा रहें हैं। देश की सुरक्षा को भी खतरा बना हुआ है। बाबा रामदेव व पंतजलि को नुकसान पंहुचाकर सरकार परोक्ष रूप से उन विदेशी ताकतों का मनोबल मजबूत करने में लगी है जो नहीं चाहती कि भारतीय उद्योग व भी खासकर भारतीय दवा उद्योग उनका मुकाबला करे। सरकार की इस प्रकार की बदले से परिपूर्ण कार्रवाई को हम किसी भी रूप में सही नहीं ठहरा सकते। भले ही बालकृष्ण की सारी डिग्रीयों जाली हों वह हमारे देश के नागरिकों की भलाई में संलग्न है न कि आंतकवादी कार्य में संलिप्त है। इस तरह की कार्रवाई की हम खुले शब्दों में निन्दा करते हैं। सरकार आंतकवादियों के लिए इतनी सक्रियता दिखती तो हमें थोड़ा संतोष होता परन्तु सरकार की मंशा न तो आंताकवदियों को सजा दिलाने की है न ही कालेधन के मामाले में सरकार पाक-साफ नजर आती है।

गुरुवार, 23 जून 2011

व्यंग्यः कांग्रेसी दांत - शम्भु चौधरी



जिस शख्स ने भी इस कहावत को ‘‘हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और’’ लिखा, शायद उसे पता भी नहीं होगा कि भारत में एक राजनैतिक दल जिसका नाम कांग्रेस पार्टी है उसके लिए भी इस कहावत को लागू कर दिया जायेगा। जब से कांग्रेस जोंकपाल बनाम लोकपाल बिल बनाने के कसरत में लगी है कांग्रेस पार्टी नये-नये शब्दों का गठन कर कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव पर हमला कर रही है तो कभी खुद का बचाव करने में। अब कांग्रेसियों ने दावा किया है कि पिछले 6 माह में इन लोगों ने 68 हजार करोड़ काले धन को सफेद बना दिया है। कांग्रेसीगण इस बात का जबाब हमें शायद नहीं देगी कारण की ‘‘हमरी कलमवा किसी भी चुनावी मैदान से चुन कर पैदा नहीं हुई। साली भ्रष्टाचार के काले कमाई से पैदा होल’वाणी। अब ईंमे हमनी’के का दोष बाड़े? सारे देसवां में’ईं ईईई... धनवा सूरा आआअ...साळा चलते-चलते काला हो गईंल’बां। ऐई..में कांग्रेसियां लोगण’का का दोष देवे का कोणु बात नैईखे बां।’’
अब लो भाई बंगाल में रह कर हमारी कलम भी माकपा की तरह गरीबों की मसीहा बन गई। दिते हुबे...दिते हुबे- पुरिये देबो...पुरिये दिबो... करते-करते किसानों की जमीन ही डकारने लगी। एई तो ममता दीदी छीलो ना होले कांग्रेसी’रा तो चुप कोरे बोसे’ही छिलो। टाटा हो या जैकोनू’क न हो अमार बाबा होअ..क जैखाने साले दूटा फसल होसछिळो सेई जमीनटा के बाममांर्चा सरकार जोर जर्बदस्ती कोरे निये, टाटा के दिये दिळो। दिल्ली'तिके कांग्रेसी'रा बोललो... कार..खा....ना तो लगाते होबे ना होले काज खोथाई पावे? कोनो स्पे..से (चांद) तो नैनोकार बनाते पारेबे ना। ऐखून कांग्रेसीरा, बामदले लोग’रा ताकते ही थाकलो। टाटा गुजराते नरेन्द्र मोदी गोदीते गिए बोसेगिलो आई....रे बाबा ईं कि होळो? खासकोरे बामदले’र लोग भांपते ही पारळो ना की टाटा चुप कोरे गुजराते पालिये जाबे। अब ममता दीदी की सरकार में आते ही सारी अनियमितताओं को दुरस्त करने में लगी है तो कुछ लोग कोर्ट के चक्कर लगाने लगे तो कुछ लोकपाल बिल को भुनाने के लिए सड़कों पर दावा ठोकने में लग गये कि देश में हम कांग्रेसी लोग ही भ्रष्टाचार को मिटाने में दिल से लगे हैं और बाकी के सब या तो नाटक कर रहें हैं या अड़ंगा लगा कर विवाद खड़ा कर रहें हैं। भला विवाद हो भी क्यों नहीं? देश में शायद यह पहला कानून बनेगा जिसमें सरकार की तरफ से नाकाम कोशिशों के वाबजूद के बाद कि बिल के सभी प्रवधानों को इतना जटील बना दिया जाय कि जिसमें भ्रष्टाचारी को कम सजा और भ्रष्टाचारी को पकड़ाने में मदद करने वालों का अधिक सजा मिलेगी। न सिर्फ सजा की मियाद अधिक होगी, अपराधी को निर्दोष साबित होने के लिए उसकी दो बार सुनवाई सुननी होगी। सुनावाई में वरी हो जाने पर सरकारी खर्च पर उस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा लड़ा जायेगा जो भ्रष्टाचारी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जायेगी। सरकार से जरा कोई चुने हुए सांसदों में कोई एक माई का लाल संसद में पूछे कि भाई! इतनी दया किस बात की इन भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए? देश की आम जनता पर तो आप इतनी दया नहीं दिखाते? दस-बीस मुकदमें में भ्रष्टाचारी यदि तथ्य के अभाव में बरी हो भी जाएं तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अपराध कम हो गया। दरअसल कांग्रेस आम जनता को पहले से ही डरा देना चाहती है कि सोच लो बेटा मुकद्दमा किये तो हम तो बरी हो ही जायेगें पर तेरी खैर नहीं।
जब से बाबा रामदेव जी अचानक सूं दिल्ली म अनशन करणे’री सोची मेरी तो नींद ही गुमगी। म सोचन लाग्यो कि ‘कि’म’की’ दाळ में काळो है। दिल्ली म बाबा की अगवाई से तो सारी बात दर्पण सूं भी साफ-सुथरी झळकण लाग्गी। भाया! व्यापारी से बड़ों भ्रष्टाचारी थाने कुण मिलसी। एक तो व्यापारी ऊपर से संत, वा कहावत थे सुणी थी कि न’इ थाणे फेर सूं ठाह करा दूँ - ‘‘एक तो करेला ऊपर से नींम चढ़ा’’ खैर बाबा रामदेव बेचारा को तो कांग्रेसी’रां जो कियो सो किया निर्दोष जनता ण’भी ळाठियां मुफ्त म खानी पड़गी। चाळो आपां तो यूँ ही थारो दिमाग चाट लियों अब मेरे मनकी तो म निकाळ’ळी। थे थारो सर भीत सूँ फोड़ता फिरो।

मंगलवार, 21 जून 2011

भ्रष्टमत सरकार के भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री कपिल सिब्बल-शम्भु चौधरी



1. सरकार से बात करने के लिए पहले चुनकर आयें-
सरकार के चुने हुए सांसदों और सिविल सोसाईटी के तानाशाहों के बीच कल मैराथन बैठकों का दौड़ समाप्त हो गया। चुने हुए केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने बैठक के बाद मीडिया के माध्यम से अचुने हुई जनता को जानकारी दी की सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार संरक्षक कानून संसद के अगले मानसून सत्र में ले आयेगी। कांग्रेसी सरकार के चुने हुए केंद्रीय भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कल पुनः प्रमाणित कर दिया कि समाज के सदस्यों के साथ बैठकों का वे सिर्फ नाटक का रहे थे करना उनको वही है जो कांग्रेस का गुप्त एजेण्डा है। इसके लिए अब कांग्रेस किसी से भी हाथापाई करने को तैयार है। भला हो भी क्यों नहीं लोकतंत्र में किसी दूसरे को समानान्तर सरकार चलाने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। सरकार को गुमान हो गया है कि वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि है जिन लोगों को सरकार से बात करना हो चाहे वे पत्रकार ही क्यों न हो पहले उनको भी चुन कर आना होगा। ये मीडिया और अखबार वाले हमेशा सरकार से किसी न किसी बात पर बवाल मचाती है कि देश की जनता यह जानना चाहती है! वह जानना चाहती है! अब आपको इस तरह के सवाल करने का कोई हक नहीं बनता। आप चुने हुए जन-प्रतिनिधि तो है नहीं? फिर सरकारी पक्ष से आपको बात करने का कोई हक नहीं बनता। आपको जो कुछ पूछना हो चुनाव के समय ही पूछ लिया किजिये। सरकार गठन कर लेने के बाद वे चुने हुए प्रतिनिधि बन जाते हैं। अब हर कोई आकर उनसे कानून बनाने के लिए कहेगा तो कैसे होगा। जैसे मानो 64 सालों में सरकार को कानून बनाने के लिए हर बार जनता ही आकर ही कहती रही। अब देखिये कानून तो जनता बना नहीं सकती सलाह और सूझाव भी नहीं दे सकती और आन्दोलन भी नहीं कर सकती।


2. पोलियोग्रस्त लोकपाल बिल लायेगी केन्द्र की भ्रष्ट सरकार-
Anna-Hazare at Pariament House on 21st June 2011
चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल का मानना है कि टीम अन्ना की मांगे देश में समानान्तर सरकार चलाने की है जो किसी भी स्थिति में मानी नहीं जा सकती। इसलिए वे लोकपाल बिल के टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावित उन सभी पहलुओं को खुद ही समाप्त करते हुए इसे समानान्तर सरकार चलाने की संज्ञा दे दी। संसद में इस बात की बहस की कोई जरूरत उनको नहीं लगती। शब्दों के खिलाड़ी कांग्रेस के चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल को बिल बनने से पुर्व ही अन्ना का भूत उनको सताने लगा कि कहिं इस बिल के आते ही उनके उस बयान की भी जाँच शुरू न हो जाय जिसमें उन्होंने 3जी मामले में केग की जाँच रिर्पोट को पलक झपकते ही गलत करार दे दिया था। आज जब उसी रिर्पोट के आधार पर संयुक्त संसदीय जाँच समिति बैठ गई और सत्ता पक्ष के एक के बाद एक मंत्री जेलों में बन्द होते जा रहें है और श्री मान् भ्रष्टतम सरकार के गृहमंत्री श्री पी. चिदम्बरम जी का नम्बर आने ही वाला है को लेकर इनको अभी से ही चिन्ता सताने लगी की कहीं उनकी पोल भी न खुल जाए। शायद इसीलिए चुने हुए भ्रष्टाचार संरक्षक मंत्री श्री कपिल सिब्बल व इनकी टीम ने मन बना लिया है कि लोकपाल बिल तो लाया जाय चुंकि जनता की आंखों में धूल अब तो झोंकना तो पड़ेगा ही अन्यथा इससे पिंड नहीं मिलेगा। अतः बिल के सभी प्रवाधनों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर संसद में पेश किया जाए कि लोकपाल बिल की भ्रूणहत्या न भी की जा सके तो उसे पोलियोग्रस्त तो बनाया ही जा सकता है।

लेख आगे भी जारी रहेगा.....2

शनिवार, 18 जून 2011

लोकपाल बिलः कांग्रसी अलाप - शम्भु चौधरी



आखिरकर जैसे-जैसे 30जून सामने आते जा रही है, कांग्रसी शातिरों का असली चेहरा भी सामने आने लगा। पहले यही काम वे बाबा रामदेव को अपना मोहरा बनाकर सिविल सोसाइटी के लोगों को मुर्ख बनाने एवं फूट डालो राज करो कि अंग्रजी चाल का पासा चला जब वो चेहरा बेनकाब होकर जनता के सामने उसके परचे-परचे उखड़ गये तो अब कांग्रसी लोगों को गांधीवादी अन्ना हजारे तानाशाह नजर आने लगे। चलिये पहले हम पिछले दिनों तेजी से बदलते स्वर पर एक नजर डाल लेते है। अन्ना के अनशन से उठे जनसैलाब के भय से कांग्रेस की सरकार शुरू में इस बात पर जोर देने लगी वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता के साथ है और ईमानदारी पूर्वक वो भी इस बिल को संसद में लाने की पक्षधर है। परन्तु इसके लिए एक प्रक्रिया है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंर्तगत जरूरी है कि समाज और सरकार के सदस्य मिलकर इस बिल के ड्राफ्ट को बना संसद में पारित करने हेतु भेजे। सरकार ने आनन-फानन में अन्ना हाजारे के अनशन को समाप्त कराने के लिए रातों-रात सरकारी छापाखाना खुलवा गजट भी जारी करवा दिया। दरअसल में सरकार का यह चेहरा उनके शकुनि विजय का था जिसको लेकर वे राहत की सांस लेने लगे थे कि बड़ी सावधानी से उनलोगों ने सिविल सोसाइटी के सदस्यों को एक पिंजरे में बन्द कर दिया है।
बैठकें शुरू हुई सरकार की मंशा एवं लोकपाल बिल को लेकर उनका नेक इरादा सामने आने लगा। एक-दो बैठकों के बाद ही इन लोगों ने अन्ना से नाराज खेमे बाबा रामदेव की महत्वकांक्षी भूख को मिटाने के लिए योजनाबध तरिके को अपनाकर उनसे सरकारी बयान दिला दिया। सरकार के पांच-पांच मंत्री बाबा के आवभगत में भेजे गये। खैर बाबा का क्या हर्ष कांग्रेसी तानाशाहों ने किया उसे सारी दुनिया ने देख ही लिया। तानाशाह का अर्थ क्या होता है इससे बड़ा उदाहरण और क्या दिया जा सकता है कि आधी रात को सोई हुई जनता पर लांठियां बरसाई गई। रातों-रात हीलन से भीलन बना दिये गये बाबा रामदेव। कारण स्पष्ट था गुप्त समझौते के अनुसार बाबा का कांग्रसी आदेशों का पालन न करना था। आधीरात को गहरी नींद में सोई हुई निर्दोष जनता के न सिर्फ कपड़े व तिरपाल से बने पंडाल के भीतर आंसू गैस के गोले दागे, बिजली व संचार के सारे तार काट दिये गये पंडाल को खाली करने का समय न देते हुए लाठियों की बरसात शुरू कर दी। जबतक जनता या प्रेस के कर्मी कुछ समझ पाते चारों तरफ भगदड़ मच गई। पंडाल में आग लग जाने से बाबा को पंडाल से झलांग भी लगानी पड़ी कारण की पंडाल के पिछले मार्गा में आंसू गैस के गोले से आग तो लग ही चुकी थी, धुंआ भी भर चुका था। बाबा भीड़ का फायदा लेकर भागने में असफल रहे। इस स्थिति का कुल आंकलन किया जाय तो सरकार एंव बाबा रामदेव के समझौते में शाम ढलते-ढलते श्रीमान कपिल सिब्बल के पेट में दर्द शुरू हो गया और उन्होंने सोचा कि अब बाबा का भांडा फोड़ दिया जाय। सरकार ने जैसे ही बाबा रामदेव के एक सहयोगी का पत्र प्रेस-मीडिया को जारी किया, इससे सरकारी की मंशा साफ हो गई कि वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कितनी गंभीर नजर आती है। तब तक इस प्रकरण से दो बातें साफ हो चुकी थी कि 1. सरकार ऐन-केन प्रकारेण लोकपाल बिल के ड्राफ्ट समिति को विवादों में डालकर किसी भी प्रकार से अपने गुप्त ऐजेंडे के तहत खानापूर्ती करना। 2. कांग्रेस खुद के काले करनामे को उजागर न कर जनता के सामने खुद को पाक-साफ रखना इनका लक्ष्य रहा है।
बाबा का प्ररकरण पर शतरंजी विजय प्राप्त कर लेने वाले कांग्रसी के हौसले अब तक बुलंदियों पर पंहुच चुके थे। श्रीमती सोनिया गांधी सहित भ्रष्टाचार में लिप्त देश के तमाम राजनेताओं ने होली मनाई। मानो इनके खुशी के ठिकाने भी न रहे। कुछ बिकाओ पत्रकार व संपदकों ने भी अपनी शैतानी कलम का रूख अन्ना की तरफ मोड़ दिया।
कांग्रेस इस सफलता का दूसरा निशाना अन्ना और सिविल सोसाइटी की तरफ मोड़ दिया। बैठकों में खुलकर अपने गुप्त ऐजेंडे को लेकर बोलने लगे। बैठक के बहार और अन्दर अभद्र शब्दों का प्रयोग और संसद के चुने हुए प्रतिनिधि और न चुने हुए प्रतिनिधि की बात कहने में भी संकोच नहीं किया। ये तो गनीमत थी कि सरकारी गजट हो चुका है अन्यथा कांग्रेस इनको (समाज के सदस्यों को) बैठक में आमंत्रित भी न करती।


संसद के चुने हुए प्रतिनिधि और न चुने हुए प्रतिनिधि -
सरकारी प्रवक्ता इस बात पर बार-बार जोर दे रहें है कि वे चुने हुए जनता के प्रतिनिधि हैं। इसका क्या अर्थ होता है? कि वे जनता की बात सुनने या मानने से इंकार कर दें? आखिर में सरकार और सरकारी चापलूसी करने वाले मीडियाकर्मी व संपादक ये भी बताये कि चुने हुए इस भ्रष्ट लागों का रोल क्या है? इनकी संवैधानिक जिम्मेदारियां क्या-क्या है? संसद के अन्दर इनकी क्या जिम्मेदारी है और संसद के बाहर क्या-क्या है? उल्फा या गोरखालेंड के प्रतिनिधियों में से कितने चुने हुए सांसद है जिनकी मांगे मानी गई। उल्फा को तो सरकार ने आर्थिक पैकेज तक दे दिया। सांसद जनता के प्रति भी जिम्मेदार है कि सिर्फ संसद के प्रति? सांसदों को जो सुविधा प्रदान की जाती है वो सभी उनको मौज-मस्ती करने के लिए ही दी जाती है क्या? भ्रष्टाचार देश की समस्या है कि नहीं? यदि है तो इसके लिए सरकार ने इसे समाप्त करने के लिए अबतक क्या-क्या उपाय किये? ऐसे सैकड़ों सवाल हैं, जिसे लिखा जा सकता है।


सरकार की मंशा में खोटः
गत पांच बैठकों के अब तक मिले परिणामों और आपसी तालमेल की कमी से सरकारी पक्ष के बयान काफी निराशाजनक नजर आते हैं। सिविल सोसाइटी की बात काटने के जो विकल्प सरकारी पक्ष ने रखें हैं उनमें सबसे बड़ी बात सरकार ने कही की "सोसाइटी के लोग धमकी के स्वर में बात कर रहे हैं ये दोनों बातें अर्थात बात और धमकी साथ-साथ नहीं हो सकती।" अच्छा एक बात बताइये सरकार न क्या किया? पांच जून की रात सरकार ने जनता के साथ क्या सलूक किया। आप कहेगें उसे छोड़ दिजिये वो बाबा रामदेव की कहानी थी, तो आपने आठ जून को एकतरफा बैठक कर क्या ऐलान किया? कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बैगर भी वे 30 जून तक ड्राफ्ट संसद में भेज देगें। इसे क्या समझा जाए? रही 16 अगस्त को अनशन की बात तो यह बात तो अन्ना ने गजट बनने के तुरन्त बाद ही कह दी थी कि यदि सरकार बिल के मौसेदे को सही तरह से नहीं लाती तो वे पुनः अनशन करेगें। अब इसे सरकार बार-बार सुनती है और डर जाती है तो इसका क्या अर्थ निकाला जा सकता है? साफ तौर पर सरकारी पक्ष को लग रहा है कि वे अपने गुप्त ऐजेंडे को किसी प्रकार लागू करवा सके इसीलिए सरकारी पक्ष बैठकों में उनके द्वारा किये जा रहे व्यवहार को जनता के सामने लाने हिचक रही है। जबकि सिविल सोसाइटी का मानना है कि यदि सरकारी पक्ष बिल के प्रति ईमानदारी से पेश आना चाहती है तो इसका सीधा प्रसारण से डर क्यों रही है? दरअसल बात कुछ ओर है कांग्रेस की सरकार न तो कभी इस बिल को लेकर गंभीर रही है न आज है। इनका सीधा सा मकशद है किसी तरह जनता और मीडियाकर्मी को भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा कर लें। कांग्रेस सहित तमाम पार्टी जिसमें भाजपा, माकपा, भाकपा, राकंपा, समाजवादी, तृणमूल, करुणनिधि, जयललिता, लालू-माया जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं ये सभी जानते है कि इस बिल के पारित हो जाने से सबसे ज्यादा उनको क्षति होने वाली है। अर्थात इससे देश का व्योरोकेट अधिकारियों को कम उनको सबसे अधिक इसका सामना करना पड़ेगा। कारण साफ है सरकार बनती और बिगड़ती है और भ्रष्टाचार की शुरूआत संसद और विधानसभाओं में बहुमत को लेकर ही होती है। अब आप कल्पना किजिए कोई अपने पांव पर ही कुल्हाड़ी क्यों मारेगा। इसलिए सब के सब इस मामले को इतिश्री का इंतजार बड़ी बेसब्री कर रहे हैं। इसलिए ज्यों-ज्यों दिन गुजरता जा रहा अन्ना की बात कांग्रेस को धमकी लगने लगी।

रविवार, 5 जून 2011

अपनी बातः ढाक के तीन पाँत - शंभू चौधरी

Anna Ham Tumare Sath


कोलकाता, दिनांक 6जून 2011;
आज निम्न तीन बिन्दुओं पर आपसे बात करूँगाः
1. भाजपा का अन्धापन,
2. बाबा रामदेव बनाम लोकपाल बिल एवम्
3. लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशा।


1. भाजपा का अन्धापनः
इस देश में गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, मंहगाई, महिलाओं पर अत्याचार, अराजकता, सांप्रदायिकता, कुपोषन, चिकित्सा, आर्थिक अपराधिकरण, असामाजिक आचरण वालों का राजनैतिक संरक्षण, शिक्षा, किसानों द्वारा आत्महत्या, किसानों की उपजाओ जमीन का व्यवसायीकरण, अनैतिक अधिग्रहण जैसे सैकड़ों मुद्दे भारत के कण-कण में विखरे पड़े हैं, परन्तु पता नहीं संसद के अन्दर पैसे लेकर प्रश्न उठाने वाले भाजपा सांसदों को ये मुद्दे क्यों नहीं वक्त से पहले दिखाई देते। जब कोई इन मुद्दों पर आन्दोलन करता है तो भाजपा वाले सबसे पहले यहाँ पहुँच कर अपनी छवि बनाने का प्रयास करती रही है। रामजन्म भूमि विवाद से लेकर भ्रष्टाचार सहित सभी आन्दोलनों में भाजपा का एक ही चरित्र देखने को मिला कि वो अपने 90 साल के प्रधानमंत्री प्रत्यासी को लेकर लकड़ी से घास खिलाने का काम करती रही है। कभी जिन्ना के नाम पर तो कभी राम के नाम सत्ता का स्वाद लेने की नकाम दौड़ जारी है। पिछले दिनों सरकार ने पेट्रोल के 5 रु. दाम बढा दिये, भाजपा ने एक दिन सांकेतिक हल्ला कर लोगों को सड़कों पर परेशान किया। फिर वही ढाक के तीन पाँत। क्या हुआ? बाबा रामदेव को सबसे पहले मलहम लगाने दौड़ने चाली भाजपा के नेताओं से एक सीधा सा प्रश्न है कि नियत साफ है तो संसद से सारे सदस्यों को इस्तीफा देने को कह कर देश में मध्याविधि चुनाव के लिए जनता के बीच में जाएं और एक शपथ लें कि वे भ्रष्टमुक्त राष्ट्र की कल्पना को मुर्तरूप देने के लिए देश की जनता के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलेगी।

2. बाबा रामदेव बनाम लोकपाल बिल
अब बाबा को यह स्वीकार कर लेना चाहिये कि भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के लिए सभी को साथ लेने की जरूरत है। जिसमें किसी भी राजनैतिक दल का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सहयोग इस लड़ाई को कमजोर करना है। बाबा को मान लेना चाहिये कि यदि राजनेताओं में इतनी ही ईमानदारी हुई होती तो बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल या किरण बेदी की कोई जरूरत नहीं होती। देश को आपलोगों से काफी अपेक्षाऐं हैं। बस एक मंच से एक होकर लड़ने कि हमें जरूरत है। आज से ही आप एह ऐलान कर दें कि यह देश की लड़ाई है इसे हम सब मिलकर लड़ेगें।

3. लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशाः
जिस प्रकार कांग्रेसी सरकार के शातिर दिमाग ने बाबा रामदेव को अपने जाल में फांस अपने कांटे को निकालने के लिए जनता के दिमाग का 'आईवास' कर रामदेवजी क आन्दोलन को कुचलने की साजिश रची और आंशिक सफल भी रहे माना जा सकता है। हमको यह मान लेना चाहिये कि लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशा को लेकर जनता के बीच जाने की जरूरत है। इसके लिए हमें अब मध्याविधि चुनाव का मार्गा अपनाने की तरफ कदम बढा़ना होगा।

हम श्री अरविन्द जी को विश्वास दिलाते हैं


हमारी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ उस व्यवस्था से है जो इसका पोषन करती आ रही है। न कि किसी व्यक्ति विशेष या सरकार के नुमाईदों के साथ है। बाबा रामदेव ने जब काले धन और भ्रष्ट तंत्र की बात शुरू की तो एक विचारधारा के सभी लोगों का एक मंच पर जमा होना स्वभाविक सा था। इस क्रम में स्वामी अग्निवेश जी, श्री अन्ना हजारे, श्री अरविन्द केजरीवाल एवं किरण बेदी का एक साथ एक मंच पर आना इस लड़ाई को बल देने लगा।
अपने स्वभाव से उग्र श्री अन्ना हजारे ने इस लड़ाई को आर-पार की लड़ाई कर अनशन का मार्ग चुन लिया जबकि श्री बाबा रामदेव जी सरकार को सिर्फ खोखली धमकी देते रहे। अन्न जी ने जैसे ही इसका दिल्ली में अनशन शुरू किया बाबा को एकबार लगा कि उनका मुद्दा अन्ना जी ने हाईजेक कर उसे किनारे कर दिया है। वे एकबार मंच पर दिखे पर बड़े वेमन से मंच आये। तब तक देश की जनता पुरी तरह से अन्ना के आंदोलन से जुड़ चुकी थी। एक ही रात में अन्ना के नाम से केन्द्र सरकार हिल चुकी थी। पहले दिन आनाकानी करने वाल श्री सिब्बल जी एवं प्रनव दा के स्वर बदलने लगे। सरकार सभी बातों को क्रमवार मानते चली गई। बाबा को लगा कि उसे किनारा कर दिया गया हो, फिर ड्राफ्टींग कमिटि में खुद के नाम को न पाकर सिविल सोसाइटी द्वारा नामांकित कुछ नामों पर अपनी आपत्ति तक दर्ज करा दी। यही कसक बाबा को नागवार गुजरा जिसको लेकर वे एक योजना के तहत कार्य करने लगे। इस घटना के बाद अन्ना सहित उन सभी लोगों को बाबा के मंच पर आने न तो निमंत्रन दिया गया। न ही बाबा की तरफ से कोई ऐसी पहल की गई। कांग्रेस के चतुर राजनीतिज्ञों ने इस बीच के दरार को दो फाड़ करने के लिए जहाँ एक तरफ बाबा को एक ही मुद्दे पर तुल देने लगे तो दूसरी तरफ सिविल सोसाईटी के सदस्यों के साथ कड़ाई से पेश आने लगे। अन्ना के साथीगण इस दोहरी राजनीति के शिकार हाने लगे। इनको लगा कि बाबा की इस पहल से कांग्रस पार्टी इस ड्राफ्टिंग कमिटि की हवा निकाल देगी।
सबकुछ सिलसिले बार चल रहा था। बाबा को लगा कि अब वे कांग्रेस पार्टी के कहे चलकर अपना उल्लू सीधा कर लेगें। परन्तु वे अपने और पराये का फर्क नहीं समझ पाये। वे कांग्रेस के श्री कपिल सिब्बल एवं श्री सुबोधकांत सहाय को अपना विश्वासपात्र मान उनके बुलावे पर उनके मांद में वैगर किसी को बताये चुपचाप समझौता कर आये। मजे कि बात यह कि अपने एक सहयोगी द्वारा लिखित समझौते को पुरे दिनभर मीडिया से छुपाये रखा। खर! हम बाबा रामदेव की इस भूल को हमारी हार मानते हुए पुनः संगठित रूप से इस लडा़ई को आगे जारी रखेगें एवं बाबा रामदेव जी की प्रतिष्ठा को सम्मान करते हुए हम श्री अरविन्द जी को विश्वास दिलाते हैं कि हम सभी आपके साथ हैं। पूर्व में लिखे मेरे दोनों लेख को हटाने की घोषणा करते हुए आगे के आदेश की अपेक्षा करता हूँ। शम्भु चौधरी, कोलकाता

शनिवार, 4 जून 2011

बाबा रामदेव-ढोल की पोल

Baba Ramdev
यह बात उसी समय स्पष्ट हो गई थी जब राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले श्री कपिल सिब्बल एवमं श्री सुबोधकांत सहाय के साथ गुप्त रूप से समझौता कर लेने के बाद योगी-ढोंगी बाबा रामदेव का पांच सितारा सत्याग्रह विवाद के घेरे में आ गया। देश की करोड़ों जनता को धोखा देने वाले अविश्वासी बाबा के विश्वास पात्र आचार्य बालकृष्ण जी का लिखा पत्र देखकर सारी दुनिया चकित रह गई। पहले ही सत्याग्रह के नाम पांच सितारा पंडाल को लेकर एक लम्बी बहस को बाबा ने जन्म दे दिया। अब किस मुँह से ‘विश्वासघात और धोखेबाजी’ का आरोप सरकार पर मंढ़ रहे हैं? बाबा! । बाबा जी द्वारा अनशन के ठीक पहले दिन की गई गुप्त बैठक का गुप्त एजेन्डा सरकार की दो तरफा चाल का एक हिस्सा था। एक अन्ना हजारे समूह को कमजोर कर उनमें फूट डालना, दूसरा बाबा को सामने लाकर बाबा से गुप्त समझौते के तहत अन्ना हजारे द्वारा तैयार किये जा रहे मौसदे में विवाद पैदा करने के लिए तीसरे पक्ष को सामने खड़ा करना। जब बाबा ने इस गुप्त समझौते में इस बात की मांग रखी कि उनके द्वारा संचालित न्यास एवं ट्रस्ट को बैगर क्षति पंहुचाये सरकार उनको अन्ना हजारे के समकक्ष प्रधानता प्रदान करें। बस क्या था बाबा की कमजोर नस को राजनीति के खिलाड़ी तत्काल भांप गये कि यह योग बाबा योगी नहीं, ‘एक ढोंगी बाबा है।’ सरकार ने तत्काल अपने पैंतरे बदलने शुरू कर दिये। जैसे-जैसे दिन गुजरता गया ढोल की पोल खुलती गई।
कल मैंने चार प्रश्न किये थे उसे आज फिर से दोहरा रहा हूँ-

  • 1.बाबा को यह बताना चाहिये कि उनको गुप्त बैठक करने की क्या जरूरत पड़ गई जिसमें उनके साथ एक भी दूसरा जन प्रतिनिधि नहीं था? सिर्फ उनके संस्थान का ही एक सदस्य क्यों था?
  • 2.लाखों के इस भव्य पंडाल की योजना किसके अनुमति से और क्यों बनाई गई?
  • 3.बाबा जी के साथ एक भी सामाजिक कार्यकर्ता क्यों नहीं है, सिर्फ धार्मिक लोगों में भी तीसरी या चौथी श्रेणी के लोगों की ही भरमार है।
  • 4.बाबा के इस आंदोलन को किस समूह द्वारा चलाया जा रहा है। उनके नामों को अभी तक सामने क्यों नहीं लाया गया ?

    - निर्भिक पत्रकार शम्भु चौधरी, कोलकाता।

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