रविवार, 8 जून 2008

बन्धन

किताबों के पन्नों में,
धगे के बंधन में,
सहारा सिर्फ इतना सा,
भावना का, विचारों का,
रिश्ते जुड़ते हैं, टूटते हैं,
बनते और बिगड़ते हैं;
टूटता है दिल अपना
कुछ खुद टूटते हैं,
कुछ तोड़ दिये जाते हैं,
मैं तो दोषी सिर्फ इतना ही,
शब्दों को तोड़ता नहीं
जोड़ता हूँ।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

0 विचार मंच:

हिन्दी लिखने के लिये नीचे दिये बॉक्स का प्रयोग करें - ई-हिन्दी साहित्य सभा

एक टिप्पणी भेजें