यह बात सही है कि पीड़ित मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक को लेकर जानवर की जिंदगी जीने के लिये मजबूर हो जाती है । मुस्लिम समाज में तलाक के बाद उसकी गुहार सुनने के तमाम रास्ते बंद कर दिए जाते । न्याय देने की बात तो दूर की, कई महिलायें तो भेंट भी चढ़ जाती । एक प्रकार से समाज में दरिंदगी का माहौल बना हुआ है।
बुधवार, 19 सितंबर 2018
तीन तलाक: साला मैं तो शाह बन गया !
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:30 pm 1 विचार मंच
Labels: तीन तलाक
शनिवार, 15 सितंबर 2018
2024 के बाद मोदी हिटलर शासक?
इन सबके बीच भाजपा की तरफ से एक बयान यह भी आया कि 2019 के चुनावी विजय के बाद भाजपा को अगले 50 साल तक सत्ता से कोई नहीं हटा पायेगा । क्या सच में ऐसा संभव है? या किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बयान है। इन दिनों मीडिया जगत में एक बात देखी जा रही है - सरकार को बचाने के लिये उनके सरकार के मंत्री नदारत रहतें हैं पर मीडिया सरकार का ऐसे बचाव करती है जैसे मोदी की सरकार मीडिया की मेहरबानी पर चल रही हो ।
इन सबके बीच भाजपा की तरफ से एक बयान यह भी आया कि 2019 के चुनावी विजय के बाद भाजपा को अगले 50 साल तक सत्ता से कोई नहीं हटा पायेगा । क्या सच में ऐसा संभव है? या किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बयान है। इन दिनों मीडिया जगत में एक बात देखी जा रही है - सरकार को बचाने के लिये उनके सरकार के मंत्री नदारत रहतें हैं पर मीडिया सरकार का ऐसे बचाव करती है जैसे मोदी की सरकार मीडिया की मेहरबानी पर चल रही हो ।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 3:29 am 2 विचार मंच
Labels: नरेन्द्र मोदी, मोदी
रविवार, 12 अगस्त 2018
‘मास्टरस्ट्रोक’: पंतजलि के विज्ञापनों का सच?
यदि बाबा के विज्ञापन महज एक विज्ञापन होते तो काई बात नहीं पर किसी ऐसे पत्रकार को हटाने में इस विज्ञापन हाथ होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह सभी विज्ञापन जो 2014 के बाद प्रकाश में आयें हैं । इन विज्ञापनों के धन का अज्ञात स्त्रोत कोई ओर है जो इन विज्ञापनों के माध्यमों से लोकतंत्र को गुलाम बनाने की योजना पर कार्य कर रहा है ।
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी और उनके झूठ को उजागर करते हुए एबीपी न्यूज़ से दो वरिष्ठ पत्रकारों ने के हटाने के पीछे पंतजलि के विज्ञापन का क्या रोल हो सकता है? यह सोचने की बात हो सकती है।
‘द वायर’ के द्वारा पूछे गये सवालों के जवाब में पतंजलि के प्रवक्ता एस.के. तिजारावाला ने एबीपी न्यूज चैनल से विज्ञापन हटाने की पुष्टि करते हुए स्वीकार किया कि पंतजलि के विज्ञापन हटाये गये हैं। दरअसल में इसके पीछे पुण्य प्रसुन बाजपेयी के एक कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ की चोट से मोदी सरकार इतनी बैचेन हो गई कि उनके कालेधन के इस विज्ञापन का स्त्रोत अंदर से बोल ही पड़ा ।
पिछले चार सालों से रामदेव बाबा के व्यवसाय के विज्ञापनों की बाढ़ के आंकड़े जो सच बताने के लिये काफी है। बीएआरसी इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक पतंजलि आयुर्वेद ने टेलीविज़न चैनलों में 1.14 मिलियन विज्ञापन दिये, 161 चैनलों में 7,221 घंटों के लिए टीवी चैनलों पर पतंजलि विज्ञापन प्रदर्शित किए गए थे। यह प्रति दिन औसतन 19 घंटे 43 मिनट के विज्ञापनों का भूगतान पंतजलि कर रही है । इसके साथ ही प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों में पतंजलि के विज्ञापनों की बाढ़ के धन का स्त्रोत क्या है? चार साल पहले जो कंपनी 2013-14 में महज 850 करोड़ की थी रातों-रात ऐसा क्या ऐसा क्या गुल बाबा ने खिला दिया कि देखते ही देखते 2016-17 में 11526 करोड़ो की कम्पनी बंन गई । दरअसल बाबा आरएसएस का एक मुखौटा है जो स्वदेशी अभियान के बहाने बाबा ने देश का गुमराह कर रहें हैं एवं भाजपा के कालेधन को असली धन बनाकर विज्ञापन का रोजगार कर रही है । जरा आप भी सोचियेगा किस विदेशी कम्पनी ने च्यवनप्रास, शहद, घी और आटा का व्यवसाय भारत में किया है? जरा दिमाग पर जोर देकर साचियेगा । स्वदेशी के नाम पर देश की भावना से खिलवाड़ की यह प्रणालि आरएसएस का एक हिस्सा मात्र है। व्यवसाय करना अपराध नहीं पर व्यवसाय की आड़ में देश के लोकतंत्र को पंगु बना देने की योजना अपराध है। एक समय ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जो किया वही बाबा के विज्ञापनों के माध्यम से मोदीजी करने जा रहें हैं । यदि बाबा के विज्ञापन महज एक विज्ञापन होते तो काई बात नहीं पर किसी ऐसे पत्रकार को हटाने में इस विज्ञापन हाथ होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह सभी विज्ञापन जो 2014 के बाद प्रकाश में आयें हैं । इन विज्ञापनों के धन का अज्ञात स्त्रोत कोई ओर है जो इन विज्ञापनों के माध्यमों से लोकतंत्र को गुलाम बनाने की योजना पर कार्य कर रहा है । दरअसल बाबा का यह विज्ञापन का खेल कुछ ओर ही ज्ञात होता है जो मीडिया को धमकाने के कार्य में मोदीजी प्रयोग कर रहें हैं बाबा तो बस एक मोहरा है।
नोटः यह लेखक के अपने विचार हैं। इसे लेख को प्रकाशित और पुनः प्रकाशित करने के लिये सभी स्वतंत्र है। । लेखक विधिज्ञाता व स्वतंत्र पत्रकार हैं। - शंभु चौधरी
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:06 am 0 विचार मंच
Labels: एबीपी न्यूज, पतंजलि, पुण्य प्रसुन बाजपेयी, मास्टरस्ट्रोक’, modi
एनआरसी: भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संसद और सुप्रीम कोर्ट से भी बड़े हैं ?
यदि इन सभी बयानों को परखा जाए तो ममता बनर्जी के साथ-साथ, देश की सर्वोच्य अदालत (सुप्रीम कोर्ट), देश के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री, असम के राज्यपाल वे सभी देशद्रोही है जो इन 40 लाख धुसपैठियों को सूची में शामिल करने पूरा अवसर देने की वकालत कर रहें। परन्तु अमित शाह का बयान है कि ये सभी घुसपैठियें हैं । तो फिर इन सभी घुसपैठियों को भाजपा अध्यक्ष सूट-एट-साइट आदेश क्यों नहीं दे देते? क्या जरूरत है संसद की? क्या जरूरत है सुप्रीम कोर्ट की?
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 1:31 am 0 विचार मंच
Labels: नरेन्द्र मोदी, भाजपा पार्टी, सुप्रीम कोर्ट, Amit shah, NRC
बुधवार, 8 अगस्त 2018
एनआरसी: तब भारतीय नागरिक कौन ?
पिछले दिनों असम के गुवाहाटी शहर में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के संगठनों ने मिलकर सरकार के इस व्यवहार पर और नाम काटे जाने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 25 लाख हिन्दू हिन्दी व बांग्ला भाषी समाज के नाम एनआरसी की सूची से ग़ायब बतायें जा रहें हैं जिसे भाजपा के अध्यक्ष श्री अमित शाह बांग्लादेशी घुसपैठिये बताते नहीं थक रहे ।
एक आंकड़े को यदि सही माना जाए तो असम के जिन-जिन इलाकों में 50 प्रतिशत की संख्या में मुसलमानों की आबादी हो चुकी है वहां की आबादी का महज 10 प्रतिशत नाम ही चिन्हीत किये गये अर्थात 45 प्रतिशत मुसलमानों को भारतीय मान लिया गया व इलाके हैं। हैलाकांदी, साउथ सालमारा, धुबड़ी व करीमगंज । ऐसे ही सैकड़ों गांव है जहां मुस्लिमों को खुले रूप में एनआरसी में दर्ज कर लिया गया जबकि हिन्दू भारतीयों के नाम सूची में नहीं शामिल किये गये। उदाहरण के लिये शोणितपुर जिले की ही बात कर लें इस क्षेत्र में लगभग 20 से 45 प्रतिशत प्रवासी भारतीय पुश्तों से अपना जीवन बसर कर रहें हैं यहां की लगभग आधी आबादी का नाम ही एनआरसी से ग़ायब कर दिया गया। भाजपा एक प्रकार से भारतीय संवेदना के नाम पर देश के विभिन्न राज्यों में रमे बसे लोगों के बीच असुरक्षा की भावना का सृजन करने में सफल हो चुकी है। जिसे भले आज हम घुसपैठिये के नाम पर समर्थन दे लें, दरअसल जमीनी हकिकत कुछ ओर ही बयान कर रही है। इसका परिणाम अंततः संपूर्ण भारतीयों को भोगना पड़ सकता है । शायद आप जिस राज्य में हैं आने वाले समय में आप भी एक दिन विदेशी बना दिये जायेगें। - शंभु चौधरी
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:07 am 0 विचार मंच
रविवार, 25 फ़रवरी 2018
जादूगोड़ा की जादू की गुड़िया
आओ एक स्वर में जादूगोड़ा के बच्चों की आव़ाज बने।
|
1. जादूगोड़ा की जादू की गुड़िया
एक नन्ही सी जादूगोड़ा की जादू की गुड़िया,
डाक्टरों की जुबां नहीं,
समझें कुछ?
रोजाना बहती है हवाओं में
जहरीला बना दिया जीवन को
जीती जागती यह कहानी |
2. ‘जादूगोड़ा’
झारखंड राज्य का |
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 2:50 am 2 विचार मंच
गुरुवार, 30 जून 2016
दिल्ली में दिल्ली पुलिस का जंगल राज
दिल्ली पुलिस की वेवसाइट पर अपराध के जो आंकड़े दिये गये उसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भाजपा के राज में दिल्ली पुलिस का जंगलराज किस चरम सीमा तक पंहुच गया है। 2015 में डकैती कि 75 घटना हुई और 2016 में अब तक 21 घटना पुलिस थाने में दर्ज हो चुकी है। इसी प्रकार हत्या के मामले में 570 और जनवरी 2016 से अब तक 219, रोबरी में 2199 व 2016 में 2556, रेप 2199/ 2016 में अब तक 999, चोरी 56385/ 2016 में अब तक 6247, इसी प्रकार छिनताई 9896/ 2016 में अब तक 4625 कुल अन्य सभी प्रकार के अपराधों की संख्या सुन कर आप सदमें में आ जाएंगे वह आंकड़ा 191377 व 2016 में अब तक 2016 में अब तक 90818 यह सभी आंकंड़े दिल्ली पुलिस की वेवसाइट पर उपलब्ध है।
जब से दिल्ली में भाजपा की केन्द्र में सरकार हुई है दिल्ली पुलिस का अब एक ही काम रह गया है कि केजरीवाल को ऐन-केन प्रकारेण परेशान किया जाए, उनके साथियों पर झूठे मुकद्दमे लगाये जाये और तो और दिल्ली पुलिस को इतनी आजादी दे दी गई कि वह कानून व्यवस्था के नाम पर सरेआम गुंडागर्दी भी करे तो कोई उसे रोकने-टोकने वाला भी नहीं।
भारत के गृहमंत्रालय के अंर्तगर्त दिल्ली पुलिस का सीधा खूनी खेल चल रहा है। दिल्ली कि आम जनता लाचार और निःसहाय होती जा रही है। दिल्ली में दिल्ली पुलिस पर सीधा नियंत्रण भारत सरकार का है। जिसके मुखिया गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह जी है। परन्तु पता नहीं बिहार में जंगलराज का हल्ला करनेवाले भाजपा के साथीगण के नाक के नीचे सरेआम रेप, हत्या , लूटपाट, दिनताई, डकैती चोरी की घटना आम बन गई है। भापजा के किसी भी नेता को दिखाई नहीं दे रहीं।
पिछले दिनों दिल्ली में दिल को दहला देने वाली कई वारदात सामने आई। तमाम समाचार पत्रों में दिल को दहला देने वाली कई वारदातें छाई रही पर ना जाने इन गृहमंत्रालय को क्या सुंघ गया कि दिल्ली पुलिस पर कोई कार्यवाही न करने के, उल्टे उसे दिल्ली की जनता को लूटने का लाइसेंस प्रदान कर दिया। मजे की बात यह कि दिल्ली की एंटी क्रप्सन ब्योरो को भी पंगु बना दिया गया ताकी कोई कार्यवाही उसकी मदद से भी ना की जा सके। दिल्ली में मानो दिल्ली पुलिस को सिर्फ एक ही काम दे दिया गया है कि पुरी दिल्ली पुलिस केवल केजरीवाल व 'आप’ की सरकार के विधायकों के के पीछे लगी रहे। जनता मरे तो मरे। कानून व्यवस्था के नाम पर पूरी दिल्ली में एक प्रकार से जंगलराज कायम हो चुका है। दिल्ली के उपराज्पाल नजीब जंग साहेब , केन्द्र सरकार का गृहुमंत्रालय सब के सब दिल्ली पुलिल की काली करतुतों को चुपचाप मौन सहमती दिये हुए है कि भले ही दिल्ली की महिलाओं के साथ रेप हो, हत्या हो, डकैती हो, केन्द्र की भाजपा सरकार चुप रहेगी।
दिल्ली पुलिस की वेवसाइट पर अपराध के जो आंकड़े दिये गये उसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भाजपा के राज में दिल्ली पुलिस का जंगलराज किस चरम सीमा तक पंहुच गया है। 2015 में डकैती कि 75 घटना हुई और 2016 में अब तक 21 घटना पुलिस थाने में दर्ज हो चुकी है। इसी प्रकार हत्या के मामले में 570 और जनवरी 2016 से अब तक 219, रोबरी में 2199 व 2016 में 2556, रेप 2199/ 2016 में अब तक 999, चोरी 56385/ 2016 में अब तक 6247, इसी प्रकार छिनताई 9896/ 2016 में अब तक 4625 कुल अन्य सभी प्रकार के अपराधों की संख्या सुन कर आप सदमें में आ जाएंगे वह आंकड़ा 191377 व 2016 में अब तक 2016 में अब तक 90818 यह सभी आंकंड़े दिल्ली पुलिस की वेवसाइट पर उपलब्ध है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 5:44 am 0 विचार मंच
Labels: अरविन्द केजरीवाल, आप, आम आदमी पार्टी, दिल्ली पुलिस, भाजपा
रविवार, 26 जून 2016
'आप’ की जीत पचा नहीं पा रही मीडिया?
कोलकाताः 26 जून 2016 पिछले साल दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार परिणाम ईपीएम मेशीन से ज्यंू-ज्यूं बहार आने लगे, कई दलाल मीडिया हाउस की जवान लड़खराने लगी और ईपीएम मेशीन से निकल के आंकड़े बोलने लगे आप-67’ और ‘भाजपा-3’ कांग्रेस-शुन्य। इसके पहले भी पिछले चुनाव में जब कांग्रेस की केन्द्र में सरकार थी तब भी आप को 28 सीटें मिली थी ‘आप’ को । जिसे लाचारीवश कांग्रेस के सहयोग से ही सरकार बनानी पड़ी जो महज चंद दिनों में ही कांग्रेस पार्टी के व्यवहारों के चलते गिर गई। तबसे मीडिया का एक वर्ग केजरीवाल के पीछे कुत्ते की तरह पड़ गई साथ ही साथ कुछ दलाल किस्म के साहित्यकार व पत्रकार, जो किसी न किसी राजनैतिक दलों के टूकड़ों पर पलते या उनकी विचारधारा के पोषक बने फिरते हैं भी नहीं चाहते कि देश में कोई ऐसी राजनैतिक पार्टी का उदय हो जो उनके पुश्तैनी धन्धों को बंद करा दे।
दिल्ली के गत दो चुनावों में एक बार केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी तो दूसरी बार भारी बहुमत से लोकसभा में विजयी भापजा केन्द्र की सरकार रही। दोनों तकतों को मुंहतोड़ जबाब देकर जिस प्रकार आम आदमी पार्टी ने अपना विजयी पताका दिल्ली में लहराया वह सबके गले का फांस बनता जा रहा है। दिल्ली में भाजपा की केन्द्र सरकार एक प्रकार से पूरी दिल्ली के प्रशासन को, पुलिस, एसीबी, उपराज्यपाल को अपने नियंत्रण में ले रखा है साथ ही केजरीवाल के सभी विधायकों व उनके विभाग के कर्मचारियों को डराया जा रहा है। सीबीआई की रेड कराई जा रही है। ‘आप’ के विधायकों व मंत्री के ऊपर अपने चम्मचों से एफआईआर कराई जा रही है। इसका विरोध करने पर दलाल मीडिया का वही वर्ग इसे नौटंकी करार देकर प्रचारित करने में लग जातें हैं।
दिल्ली पुलिस की खूनी खेल जारी है। केन्द्र सरकार ने इसे बेलगाम कर दिया है । पिछले दिनों दिल्ली MCD के एक ईमानदार आफिसर मो.खान को दिल्ली पुलिस, भाजपा की केन्द्र सरकार व उपराज्यपाल की नाक के नीचे सरे आम भून दिया गया। एक नावालिग लड़की को बिना उनके परिवार के सहमति के दिल्ली पुलिस ने जला डाला। कानून के नाम पर दिल्ली में कानून को नंगा करने का शर्मसार खेल भाजपा की सह पर बदसूरत जारी है। दिल्ली में रोजना लूट, हत्या, महिलाओं से छेड़छाड़ आम बात हो गई हैं मानों बिहार का जंगलराज दिल्ली में आ गया है। जो भाजपा बिहार में जंगलराज का हल्ला मचा रही है वही भाजपा के नाक के नीचे दिल्ली पुलिस की सह से दिल्ली में जंगलराज कायम है वह किसी मीडिया को क्यों नहीं दिखाई देता?
जनहित में लिये गये सभी फैसलों की फाइलों को रोका जा रहा है। उपराज्यपाल उन फाइलों पर हस्तक्षर करने से इंकार कर रहें हैं। किसी भी निर्णय को लागू कराना एक प्रकार से दिल्ली में पहाड़ सा बनता जा रहा है। यह सब कानून और संविधान की आड़ में नाटक रचा जा रहा है ताकी आम आदमी की सरकार के सभी अच्छे कार्यों को न सिर्फ रोका जाए। इनके विधायकों को किसी न किसी अपराधिक मामलों में फंसा कर जेल भेज दिया जाए ऐसा प्रयास लगातार जारी है। मजे की बात है कि इन सब बातों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर देश की जनता को गुमराह करने के लिये मीडिया को सक्रिय भी कर दिया गया है। ताकी दिल्ली में आम आदमी सरकार के कार्यों का प्रभाव पंजाव व गोवा के आगामी चुनाव पर न पड़ जाए।
इस सब हालातों से लोहा लेते हुए भी आम आदमी पार्टी के सभी विधायक व कार्यकत्र्ता दिल्ली की जनता के भलाई में कई फैसले लेते जा रहें है। जबकी भाजपा व कांग्रेस दोनों ही पार्टी नहीं चाहती कि आप’ की सरकार कोई भी जनहित का फैसल ले। पंजाब का चुनाव सामने है। भाजपा की हार निश्चित मानी जा रही है। मोदी सरकार व आर.एस.एस नहीं चाहती है कि वहां [पंजाब में] किसी हालात में ‘आप’ की सरकार सत्ता में आये। इसके लिये भापजा, कांग्रेस से भी हाथ मिलाने को तैयार दिखाई दे रही है। देश में एक नई राजनीति की शुरूआत हुई है। जिसमें देश को लुटनेवालों या सांप्रदायिक राजनीति करने वालों दलों को इससे खतरा पैदा होता जा रहा है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:00 am 0 विचार मंच
Labels: अरविन्द केजरीवाल, कांग्रेस पार्टी, शंभु चौधरी, BJP
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016
फतवा क्यों? ‘‘भारतमाता की जय पर’’
भले ही उनका तर्क ‘‘भारतमाता की जय’’ पर कुछ भी रहे। यह फतवा सीधे तौर पर भारत की अखण्डता पर एक सांप्रदायिक हमला है। यह फतवा उस समय आया जब संघ प्रमुख ने लगभग अपनी बात को वापस ले ली थी। देश को सोचना होगा कि इस फतवे के अंदर छुपा संदेश आखिर में क्या कहता है?
कोलकाताः ( 1 अप्रैल,2016) आज धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते देश की यह हालात बना दी कि भारत में, भारत का ही एक वर्ग भारत में रह कर भारत को गाली दे रहा है कोई भारत मां डायन कह रहा है तो कोई कुछ है। मजे की बात यह है कि इसे बोलने वाले सभी एक विशेष समुदाय के हैं।
आज तो हद कि उस सीमा को भी इन लोगों ने पार कर दी दारुम-उलूम देवबंद के द्वारा एक फ़तवा जारी कर कहा गया है कि भारत माता की जय कहना मूर्ति पूजा के बराबर है। ‘‘इस्लाम में किसी भी तरीके से मूर्ति पूजा नहीं की जा सकती। अतः भारत माता की जय बोली जाए या वंदना की जाए तो इस्लाम में ये मना है, नाजायज है।’’
इसके पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख श्री मोहन भागवतजीने देशभर में आलोचना के शिकार हो जाने के कारण अपने सूर बदलते हुए ‘‘भारतमाता की जय’’ पर दो बार सफाई दी कहा कि ‘‘हमें ऐसा कार्य करना है कि, पूरी दुनियाँ भारत माता की जय का नारा लगायेगी’’ जब इससे भी बात नहीं बनी तो कहा कि ‘‘ हम ऐसा भारत बनाएँगे जहां लोग खुद-ब-खुद भारत माता की जय हो.... हम नहीं चाहते कि किसी पर इसके लिये दबाव डाला जाए, इसे थोपा ना जाए।’’
देश की आज़ादी के पश्चात भारत की नींव को संविधान निर्माताओं ने भारत के मांस के टुकड़े को चन्द गिद्धों के खाने के लिए छोड़ दिया, ताकि सत्ता स्वार्थ बना रहें। दुर्भाग्य की बात है कि एक तरफ हमें ऐसे फतवे पढ़ने-सुनने को मिल रहें हैं। यह फतवा उस कौम की मानसिकता को दर्शाता है कि वे मौका मिलते ही भारत की बर्बादी का नया इतिहास लिख डालेगें।
भले ही उनका तर्क ‘‘भारतमाता की जय’’ पर कुछ भी रहे। यह फतवा सीधे तौर पर भारत की अखण्डता पर एक सांप्रदायिक हमला है। यह फतवा उस समय आया जब संघ प्रमुख ने लगभग अपनी बात को वापस ले ली थी। देश को सोचना होगा कि इस फतवे के अंदर छुपा संदेश आखिर में क्या कहता है? - भारतमाता की जय!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:07 am 0 विचार मंच
Labels: धर्मनिरपेक्षता, फतवा, भारतमाता
शनिवार, 12 मार्च 2016
छद्म धर्मनिरपेक्ष वनाम संघीय राष्ट्रवाद?
एक तरफ गाय का मांस खानेवालों की जमात इस बात पर बहस कर रही थी गाय के मांस खाना ही धर्मनिरपेक्षता का उनका पहला सिद्धांत है तो दूसरी तरफ राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति कर देश में नये संघवाद के प्रयोग में लगी है कि संघ की विचारधारा जिसमें संघ का राष्ट्रवाद भी शामिल है उसके नाम पर सर्मथकों को साथ लेकर अन्य सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की आवाज को देशद्रोही बना दिया जाए।
कोलकाताः ( 28 फरवरी ,2016) संसद व राज्यसभा में जोरदार बहस छड़ी हुई थी एक तरफ धर्मनिपेक्षता का चोला पहने वे लोग थे जो देश में पिछले 60 सालों से धर्मनिपेक्षता की आड़ में राज करते आ रहे थे तो दूसरी तरफ देश पिछले 60 सालों से देश में सत्ता का सपना देखने वाली आज की सत्ताधारी दल संघ विचारधारा द्वारा संचालित भाजपा की सरकार। बहस का मुद्दा था वोट की आड़ में चलाये जा रहे छद्म धर्मनिरपेक्षता का कैसे वचाव किया जाए तो दूसरी तरफ सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार चाहती थी कि धर्मनिरपेक्षता की आड़ में संघीय ( आर.एस.एस ) राष्ट्रवाद को कैसे हवा दी जा सके।
एक तरफ गाय का मांस खानेवालों की जमात इस बात पर बहस कर रही थी गाय के मांस खाना ही धर्मनिरपेक्षता का उनका पहला सिद्धांत है तो दूसरी तरफ राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति कर देश में नये संघवाद के प्रयोग में लगी है कि संघ की विचारधारा जिसमें संघ का राष्ट्रवाद भी शामिल है उसके नाम पर सर्मथकों को साथ लेकर अन्य सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की आवाज को देशद्रोही बना दिया जाए।
जो भाजपा महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में हिन्दूवादी विचारधारा को जम कर गाली देने व एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बाद सत्ता के लिये उसी थूक को चाटने लगी। जम्मू-कश्मीर में जिसे चुनाव के वक्त देशद्रोही बोलती नहीं थक रही थी, दूम हिलाने लगी । यह तो है "संघ का संघिय राष्ट्रवाद जो उनका साथ दे वह तो देशभक्त बाकी सारे के सारे देशद्रोही। " कहने का अभिप्राय है कि भाजपा देश के मिजाज को कभी धर्म के नाम पर, कभी देशभक्ती के नाम पर नोचाने में लगी है तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कांग्रेस सहित वे तमाम ताकतें देश में अल्पसंख्यकों को राजनैतिक ताकत के प्रयोग से प्रत्यक्ष रूप से स्नेहः स्नेहः देश के लिये खतरा बनता जा रहा है। हमें किसे चुनना है अब इस बात की बहस है।
पिछले दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में देश विरोधी नारे लगाये गये, भारत की बर्बादी के नारे लगे कांग्रेस का धर्मनिरपेक्ष इसे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सही ठहराने में लगी है। कश्मीर में देश विरोधी नारे लगाये जातें है, पाकिस्तानी झंडे दिखाये जाते हैं भाजपा की आंख में चश्मा लग जाता है। भाजपा का राष्ट्रवाद तब बुट लादने चला जाता हैं
परन्तु जेएनयूएसयू अध्यक्ष छात्र कन्हैया कुमार को इसलिये भाजपा देशद्रोही बना देने में पलक भी नहीं झपकती। विभिन्न प्रकार के प्रजाती जमात में देश अब यह सोचने को विवश हो चुका कि हम अब किसे राष्ट्रवादी समझें और किसे धर्मनिरपेक्षवादी ? क्या जो धर्मनिरपेक्षवादी हैं व राष्ट्रवादी नहीं? या जो राष्ट्रवादी हैं वह धर्मनिरपेक्षवादी नहीं?
यदि देश को इस प्रकार बांट दिया जायेगा कि राष्ट्रवादी का सिर्फ वही मायने रह जायेगा जो संघ की विचारधारा से सहमत होगा या धर्मनिरपेक्षवादी उसे ही समक्षा जायेगा जो संधवाद का विरोधी होगा तो इसे देश का दुर्भाग्य ही हम मानेगें । जयहिन्द!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:48 pm 0 विचार मंच
Labels: आर.एस.एस, शंभु चौधरी, BJP, Prime Minister धर्मनिरपेक्षता
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015
मेक इन इंडिया की पाक यात्रा?
कल की ही बात लें मोदी जी ने एक बहाना खोजा अटल जी के जन्मदिन की बात उनको याद नहीं आये, नवाज शरीफ साहेब का जन्म दिन याद आ गया और अपने विदेश कूट नीति में तत्काल बदलाव करते हुए तत्काल पंहुच गये पाकीस्तान, नवाज शरीफ जी को जन्मदिन की बधाई देने। अब इसमें कोन सी राजनीति? कैसी विदेशनीति। कैसा शिष्टाचार? मित्र देश है देश में भाजपा के नेता गाली देते रहें। विपक्ष आलोचना करता रहे। देश की सेना/जवान मरते रहें। सर काटकर पाकिस्तान ले जाता रहे। हम शिष्टाचार निभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़नेवाले।
परन्तु हमें यह सोच लेना चाहिये कि भारत का प्रधानमंत्री सिर्फ अपनी इच्छा से नही, भारत की सुरक्षा, राजनैतिक दृष्टि से, विदेश नीति के तहत , संविधान के तहत, और सबसे बड़ी बात है जनता की भावना को विश्वास में लेकर कार्य करे तभी वह भारत का प्रधानमंत्री है नहीं तो वह सिर्फ मोदी है।
मोदी जी के अबतक कार्यकाल में सबकुछ उलटा हो रहा है। तेल के दाम में कोई गिरावट नहीे हुई, उलटे डालर के दाम में 10 प्रतिशत की वृद्धि अर्थात तेल के दाम का जो फायदा देश की जनता को होना था उसका फायदा दलालों को होने लगा।
मेक इन इंडिया के नाम से देश को भीतर से खोखला करना। देश की सेना के मनोबल को निराश करना। किसानों के लिये कुछ नहीं करना। रोजाना कभी टैक्स के नाम पर कभी सरचार्य के बहाने कर का बोझ बढ़ा देना, रेल भाड़ा को बढ़ा देना, तत्काल को टिकट को महंगा कर देना, सभी व्यवसायियों को वे वजह नोटीश भेजना । कंपनियों की जांच-पड़ताल करना। विदेश से काले धन लाने की जगह देश के व्यापारियों को ही तंग करना। महंगे सूट पहनना, गैर भाजपा शासित राज्य सरकारों को जरूरत से ज्यादा तंग करना। कुछ चुनिंदा व्यापारी के हित में जमीं अधिग्रहण पाॅलिसी लागू कराना। मोदी सरकार की पहचान बन गई है। अब जरूरत वे जरूरत विदेश यात्रा मोदी जी की कूट नीति का हिस्सा बन चुका है। इसे भले ही भाजपा के चापलूस नेतागण स्पोर्ट्समेन स्प्रीट मानते हों। परन्तु यह अचानक भारत के प्रधानमंत्री की पाक यात्रा कितनी भी नज़दीकी क्यो न हो देश हित में कदापि सही कदम नहीं माना जायेगा।
जयहिन्द - शम्भु चौधरी 26/012/2015 kolkata
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:30 pm 2 विचार मंच
Labels: नरेन्द्र मोदी, शंभु चौधरी, BJP
रविवार, 15 नवंबर 2015
दीपावली की शुभकामना -शंभु चौधरी
एक ‘रावण’ को मरते ही एक साथ कई और ‘रावण’ पैदा हो जाते हैं। ‘भारत माता’ को इस ‘रावण रूपी राक्षक’ ने हर तरफ से बंधक बना लिया है। पूरी कानून व्यवस्था, सिस्टम इसके अधीन कार्य करने लगी है। संविधान को अपनी सुविधानुसार इन लोगों ने व्याख्यित किया है। हर तरफ लूटतंत्र को सही ठहराया जा रहा है। इस लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र का उद्योग फलफूल रहा है। इसके समर्थन में कुछ अर्थशास्त्री लूटतंत्र की व्यवस्था के पक्षधर भी हैं। ये तथाकथित अर्थशास्त्री लूटतंत्र आर्थिक ढांचे पर अपनी रटी-रटाई थेसिस सुना कर देश में आर्थिक आतंक फैलाने में लगे हैं।
रामायण में राम, सीता, लक्ष्मण की कई कथाओं का वर्णन हमें पढ़ने को मिलता है। राम के वनवास से लेकर रावण के अंत तक कई कथाओं में राम के सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रायः प्रत्येक घटनाओं का विधिवत उसके मूल स्वरूप में हमें पढ़ने को मिलता है। भगवान राम को सभी घटनाओं में एक पवित्र पात्र के रूप में दिखाया गया है। राम के 14 साल बनवास में इनके ईर्द-गिर्द घूमती सभी घटनाओं में ‘सीता माता’ का ही जिक्र है। ‘सीता माता’ को यदि ‘रामायण’ से अलग कर दिया जाए तो ‘राम’ के चरित्र को ना सिर्फ उभारना उसे लिखना भी असंभव है।‘राम’ एक क्रिया है जिसे क्रियान्वित किया जाना है। ‘सीता’ एक घटना है जिसके कारण क्रिया को संपादित किया जाना है। हम यदि सोचते हैं कि सिर्फ ‘राम’ के आ जाने से रावण का अंत हो जायेगा, जो असंभव है। ‘राम’ के साथ हमें उस पात्र को भी खोजना होगा जिसके बहाने ‘रावण’ को मारा जाना है। अन्यथा सिर्फ ‘राम’ से पूरी व्यवस्था नहीं बदली जा सकती।
आज भारत की पूरी क्रिया प्रणाली ‘रावण’ के गिरफ़्त हो चुकी है। इस रावण को मारने के लिये बंदर सेना की फौज तैयार होती जा रही है। एक ‘रावण’ को मरते ही एक साथ कई और ‘रावण’ पैदा हो जाते हैं। ‘भारत माता’ को इस ‘रावण रूपी राक्षक’ ने हर तरफ से बंधक बना लिया है। पूरी कानून व्यवस्था, सिस्टम इसके अधीन कार्य करने लगी है। संविधान को अपनी सुविधानुसार इन लोगों ने व्याख्यित किया है। हर तरफ लूटतंत्र को सही ठहराया जा रहा है। इस लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र का उद्योग फलफूल रहा है। इसके समर्थन में कुछ अर्थशास्त्री लूटतंत्र की व्यवस्था के पक्षधर भी हैं। ये तथाकथित अर्थशास्त्री लूटतंत्र आर्थिक ढांचे पर अपनी रटी-रटाई थेसिस सुना कर देश में आर्थिक आतंक फैलाने में लगे हैं। उनसे एक छोटा सा सवाल है कि
1. ‘‘ जो किसान जमीन में सोना पैदा करता है- वह आत्महत्या करने को क्यों मजबूर हो जाता है? क्यों नहीं कोई उद्योगपति अथवा व्यापारी अपने व्यापार घाटे के चलते आत्महत्या करता है?’’
2. ‘‘जो मज़दूर दिन-रात कल कारखानों में या सड़कों पर मजदूरी करके अपने परिवार/बच्चों को भरण-पोषण करते हैं, किसी प्रकार अपनी जीविका चलाने के लिये मजबूर हैं, इनके पास उपयुक्त संसाधन की सुविधा, बच्चों की शिक्षा, उचित चिकित्सा क्यों नहीं है? जबकि ये सभी सुविधा, संसाधन उपलब्ध है।’’ क्या अर्थव्यवस्था का सही पैमाना इसी को ही कहते हैं?
3. जो छात्र अपनी मेहनत से विदेशी मुद्रा अर्जित कर भारत में जमा करते हैं उनके इस धन का इस्तेमाल देश को लूटने वाले लोगों की सुख-सुविधा के लिये क्यों किया जा रहा है?
4. भारतीय उद्योग जगत का भारत के प्रति क्या जिम्मेवारी बनती है? सिवा इसके की वे सरकार को लूट का एक हिस्सा देकर खुद का एंपायर स्टेट खड़ा करने के अलावा क्या करते रहें ?
5. मैं धन के एकतित्रकरण या पूंजीकरण के विरूद्ध नहीं हूँ। पूंजीकरण समृद्ध अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। परन्तु इसमें किसानों की मज़दूरों की समान हिस्सेदारी तय करने की जरूरत है। जिससे हम उन्हें दैनिक आधार भूत सुविधायें भी प्रदान कर सकें। भारत में कुछ कंपनियां इस जिम्मेदारी को आज भी निभा रही है जबकि देश की 99प्रतिशत कंपनियों मुनाफे को अपना माल समझती है।
मित्रों !
ये कुछ सवाल है जिसे हमें इन्हीं लोगों के बीच से तलाशना होगा। जिसे ये लोग नक्सलवादी कहते हैं वे नक्सलवादी सिर्फ वे इस लिये नहीं बने कि उन लोगों ने हथियार उठा लिया है। शहरी व्यवस्था ने उनके घरों को लूटने का कार्य किया है। यह बात उस सच की हक़ीकत है। हमारे आलीशान भवनों की दीवारों पर लाखों की पैंटींग इस बात का बयान करती है। हमारी इसी मानसिकता ने पूरी व्यवस्था को जकड़ लिया है। जबकि देश की 88 प्रतिशत आबादी का जनजीवन अस्त-व्यस्त होता जा रहा है। अर्थशस्त्रियों के अलमिरों में सजी किताबों से सिर्फ धन की 'बू' आती है। कोई अंबानी बना हुआ है कोई गडकरी। कोई मनमोहन बन कर लूटरों को साथ दे रहा है तो कोई मोदी बनकर इस व्यवस्था को सरे आम निलाम कर रहा है। ये सबके सब ‘रावण’ का भेष धारण कर चुके हैं। सीता मईया तो इनके कैद में बंद है। जो कंद-मूल खाकर किसी प्रकार अपना जीवन गुजार ही है। इनके चुंगल से ‘भारत माता’ को छुड़ाना सिर्फ राम की जिम्मेदारी नहीं, हम सबको राम बनना होगा। किसी को हनुमान, किसी को विभीषण बनना होगा। कोई लक्ष्मण बने, कोई भरत के रूप में साथ दे।
जयहिन्द। 15.11.2015
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:41 pm 0 विचार मंच
Labels: शंभु चौधरी
शुक्रवार, 29 मई 2015
केजरीवाल को संवैधानिक इनकांडन्टर में मरवा देगी भाजपा?
जैसे ही दिल्ली सरकार के नियंत्रण में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ईमानदारी से कार्य करना क्या आरम्भ किया मानो केंद्र की मोदी सरकार सकते में आ गई महज 15 दिनों में 500 से भी अधिक भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ गये। इधर कार्यवाही होनी शुरू ही हुई कि उधर भाजपा ने ट्रांसफर-पोस्टींग का खेल शुरू कर दिया। यह सब अब तक जो भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था उसे छुपाने के लिये और खुद व कांग्रेस के पापों को बचाने के लिये किया जाने लगा। संविधान की दुहाई दी जाने लगी। कुछ दलाल पत्रकारों को बहस के लिये सामने लाया गया। कुछ मीडिया को हायर किया गया ताकि वे केजरीवाल को बदनाम करने का सिलसिला जारी रखें।
कोलकाताः ( 30 मई ,2015) जिस प्रकार दिल्ली में आप सरकार के भ्रष्टाचार से लड़ने के एक मात्र हथियार ‘‘भ्रष्टाचार निरोधक शाखा’’ को केंद्र की भाजपा सरकार ने उसके अधिकार क्षेत्र को सिमित करने का कुप्रयास कर भ्रष्टाचारियों को बचाने में लगी है, इससे साफ प्रतीत होता है कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली में ना सिर्फ भ्रष्टाचारियों के साथ मिली हुई है इन भ्रष्टाचारी अधिकारियों को मुख्य पदों पर आसीन कर केजरीवाल सरकार को असफल और बदनाम करने कर प्रयास भी कर रही है ताकि वह किसी भी प्रकार से केजरीवाल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप जड़ सके और केजरीवाल को जेल भेज सके या उसकी राजनैतिक रूप से हत्या करवा दी जाए ताकी जनता के सामने वह भाजपा का विकल्प न बन सके। मानो संघ का नौटंकी राष्ट्रवाद संगठन एक अदने से आदमी के सामने बौना साबित होता जा रहा है। इसी लिये अब संघ चाहती है कि केंद्र की मोदी सरकार किसी भी प्रकार संवैधानिक अड़चनें पैदा कर केजरीवाल को संवैधानिक इनकांडन्टर में मरवा दिया जाए?
कहावत है चोर को बचाने वाला भी चोर होता है। उच्चतम न्यायालय के पास एक चोर ने इस आशा के साथ फरियाद की है कि उसको इस कार्य में साथ देने वाले सभी भ्रष्टाचारी साथी बच जाए। माननीय न्यायालय को रूख स्पष्ट करना होगा कि वह भ्रष्टाचार के मामले में देश कि अदालतों से क्या अपेक्षा रखती है? सवाल यह नहीं उठता कि किस सरकारी एजेंसी ने किस भ्रष्टाचारी को पकड़ा। सवाल यह उठता है कि क्या हम इन भ्रष्टाचारियों को इसी प्रकार बचाने का प्रयास करते रहेंगें? यदि कोई व्यक्ति किसी भ्रष्टाचारी को पकड़वता है तो वह पहले यह पता लगाये कि ईमानदार अधिकारी कौन है?
जैसे ही दिल्ली सरकार के नियंत्रण में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ईमानदारी से कार्य करना क्या आरम्भ किया मानो केंद्र की मोदी सरकार सकते में आ गई महज 15 दिनों में 500 से भी अधिक भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ गये। इधर कार्यवाही होनी शुरू ही हुई कि उधर भाजपा ने ट्रांसफर-पोस्टींग का खेल शुरू कर दिया। यह सब अब तक जो भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था उसे छुपाने के लिये और खुद व कांग्रेस के पापों को बचाने के लिये किया जाने लगा। संविधान की दुहाई दी जाने लगी। कुछ दलाल पत्रकारों को बहस के लिये सामने लाया गया। कुछ मीडिया को हायर किया गया ताकि वे केजरीवाल को बदनाम करने का सिलसिला जारी रखें।
महज चंद दिनों में दिल्ली पुलिस के 100 से भी अधिक सिपाही घुस लेते, गरीब जनता को लुटते पकड़े गये। मानो दिल्ली में लुट का यह व्यवसाय राजनैतिक आकाओं की कमाई का बहुत बड़ा स्त्रोत था जिसे केजरीवाल की ‘आप’ सरकार ने आते ही बंद कर दिया।
आज हमें सोचना होगा कि क्या हम इसी प्रकार भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ेगें कि इसे समाप्त करने के लिये एक स्वर में ‘केजरीवाल’ का साथ देगें? जिस आनन-फानन में केंद्र की भाजपा सरकार ने 21 मई 2015 को एक नोटीफिकेसन जारी कर खुद के पापों को जायज़ ठहराने को प्रयास किया और भ्रष्टाचार से लड़ने के केजरीवाल सरकार के मनसुबे पर पानी फेरने का प्रयास किया, माननीय उच्चतम और दिल्ली उच्च न्यायालय को चाहिये कि वे भ्रष्टाचार के मामले में कोई समझौता ना करें।
- जयहिन्द!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:32 pm 0 विचार मंच
Labels: अरविन्द केजरीवाल, आम आदमी पार्टी, AAP
रविवार, 24 मई 2015
मीडिया: राजनैतिक दलों की दलाल?
सवाल उठता है पत्रकारिता का सिद्धांत क्या है? पत्रकारिता का प्रथम और अंतिम सिद्धांत घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनना और उसकी हुबहु तस्वीर को देश-विदेश के लोगों तक पंहुचाना ना कि किसी एक पक्ष या विपक्ष में राग अलापना। परन्तु आज का समाचार समूह खासकर मीडिया हाऊसेस के शब्द साफ दर्शते हैं कि वे किसी एक पक्ष के खिलाफ या किसी विशेष व्यक्ति का प्रचार करने में लगी हैं। इन हाऊसेस को समाचार दिखाने से कहीं अधिक रुचि राजनीति करने में है।
कोलकाताः ( 25’मई ,2015) पिछले कई लेखों में मेैं मीडिया को सवालों के कठघरे में खड़ा करता आया हूँ। आज कई दिनों के बाद पुनः इसी विषय पर अपने विचार रख रहा हूँ। देश के कुछ मीडिया घराने न सिर्फ सत्ता के दलाल बन चुकें हैं कुछ तो उन राजनैतिक पार्टियों के रहमों-करम पर ही चलती अन्यथा उनको सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाता है। इन समूह को सिर्फ इतनी ही आजादी दी जाती है कि वे विपक्ष पर यदि 10 कीचड़ उझालते हैं तो उन राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ एक या अधिकतम दो वह भी उसकी इजाज़त उनको पहले अपने आला कमान से ले लेनी होती है।
देश में कुछ मीडिया हाउस के बिकाऊ पत्रकारों का एक वर्ग इस पूरे प्रकरण को संचालित करता है जो चुनाव से लेकर सरकार बनाने और गिराने के राजनैतिक आंकड़ें जोड़ते और घटाते रहते हैं। पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त हमने स्पष्ट देखा था कि किस प्रकार भाजपा वालों ने पैसे के बल पर स्थानीय समाचार समूह, पत्रकारों और मीडिया समूह को चाँदी के जूते मारे थे। ‘‘मुंह में राम बगल में छूरी’’ लिये दिन भर इन चैनलों ने (इक्का-दुक्का) को छोड़ के अरविंद केजरीवाल को जी’ भर-भर सभ्य भाषा में गाली देने में लगे थे। मानो एक प्रकार से वे खुद ही चुनाव लड़ रहे थे।
सवाल उठता है पत्रकारिता का सिद्धांत क्या है? पत्रकारिता का प्रथम और अंतिम सिद्धांत घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनना और उसकी हुबहु तस्वीर को देश-विदेश के लोगों तक पंहुचाना ना कि किसी एक पक्ष या विपक्ष में राग अलापना। परन्तु आज का समाचार समूह खासकर मीडिया हाऊसेस के शब्द साफ दर्शते हैं कि वे किसी एक पक्ष के खिलाफ या किसी विशेष व्यक्ति का प्रचार करने में लगी हैं। इन हाऊसेस को समाचार दिखाने से कहीं अधिक रुचि राजनीति करने में है।
पत्रकारिता के आड़ में दरअसल इन समूहों ने मीडिया हिजड़ों की दुकान खोल रखी है जो पैसा देगा उसके लिये ये लोग सड़क पर नंगा होकर नाचेगें। जो नहीं देगा उसको नंगा करेगें। -जयहिन्द
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:44 pm 0 विचार मंच
Labels: शंभु चौधरी, media
मंगलवार, 31 मार्च 2015
आतंकवादी पत्रकारिता ?
ये पत्रकार दिन-रात पूरे देश की गंदगी को पाठकों के मानस पटल पर अपनी थोपी गई विकलांग मानसिकता से एक साजिश के तहत हमें परोसनेवाली पत्रकारिता खुद को लोकतंत्र की प्रहरी मानती है परन्तु इसके कार्य तो समाज में गंदगी फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं रह गया। विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर रोज़ाना ये पत्रकार इतने गुनाह करतें हैं कि इनके गुनाह पर बोलनेवाले वाले भी उस समय चुप हो जातें हैं जब ये पत्रकार एक साथ उस व्यक्ति पर धावा बोल उसे इतना घायल कर देते हैं कि वह खुद को समाज का अपराधी समझने लगता है। दरअसल भारत में पत्रकारिता अब विचारप्रधान ना रहकर हमला प्रधान बन गई है।
नईदिल्ली/कोलकाताः (1’अप्रेल,2015) गत् 28’ मार्च 2015 को ‘आप’ की राष्ट्रीय परिषद की बैठक बहुमत प्रस्ताव से श्री प्रशांत भूषण, श्री योगेन्द्र यादव, प्रो. आनन्द कुमार और श्री अजित झा को क्या हटाया गया जैसे पूरे हिन्दूस्तान के राजनीति दलों द्वारा पोषित पत्रकार व मीडिया समूह, व शिवसेना की थूकचाटू पत्रिका ‘सामना’ सबके सब केजरीवाल पर ऐसे पिल गये जैसे कोई बहुत बड़ा जूल्म हो गया। मानो शिवसेना में कभी विभाजन ही ना हुआ हो। भाजपा, कांग्रेस या माकपा में कभी वगावत के स्वरों को दबाया ही ना गया हो। इन राजनीति दलों में किसी व्यक्ति को पार्टी विरोधी कार्याें के लिये दंडित ही ना किया गया हो? इनकी पार्टी में तो लोकतंत्र बचा है और कल कि जन्मी पार्टी के लोकतंत्र को बचाने की चिन्ता इनको ऐसे हो गई जैसे किसी अकेले व्यक्ति ने इनके राजनीति विचारधाराओं पर हमला कर दिया हो।
ऐसे लगता है जैसे भारत के लोकतंत्र की रक्षा का लाइसेंस सिर्फ इनके पास ही हो और केजरीवाल इस लाइसेंस को भी हथिया लेना चाहता है। जो माकपा खुद को मजदूरों कर पार्टी बताती रही, देश और विश्व की आर्थिक स्थिति पर इनके पास कोई विचारधारा नहीं कि जिन मज़दूरों के अधिकार की लड़ाई वे (माकपा, भाकपा) लड़ना चाहतें हैं उन्हें रोजगार कैसे प्रदान किया जा सकेगा।
बंगाल में 35 सालों से सत्ता पे काबिज रही माकपा के शासनकाल में 60 हजार से अधिक छोटे-बड़े कल-कारखाने बंद हो गये। सैकड़ों मज़दूरों ने माकपा के लाल डंडे को ढोते-ढोते अपनी जान दे दी। उनके बच्चों ने आत्महत्या कर ली । पर इनके पोषित पत्रकारों ने ज़ुबान तक नहीं खोली की यह गलत हो रहा है। जिन राजनैतिक विचारें के सिद्धांत 320 कमरे के आलीशान महल से बनता है वे लोग मजदूरों की, किसानों के हक की बात करतें हैं। जो लेखक आजतक सोना पैदा करने वाले किसानों का मरता देखता रहा। जो पत्रकार बैंकों के ‘एनपीए’ के नाम पर बैंकों की लाखों -करोंडों की लूट को दिनदहाड़े औद्योगिक जगत द्वारा सरेआम लूटते देखते रहे वे पत्रकार केजरीवाल के ‘स्वराज’ पर ऐसे हमला कर रहें है कि जैसे इनके खूनपसिने की कमाई को केजरीवाल लूटा देगा?
सवाल उठता है केजरीवाल की तुलना आज इंदिरागांधी के एमेरजेंसी जैसी हालात से करने की नौबत इन पत्रकारों को क्यों आन पड़ी? क्या इनके पास दूसरे उदाहरण की कमी पड़ गई थी? या जानबुझ कर देश को भ्रमित करना चाहतें हैं कि केजरीवाल किसी निरंकुश शासक की तरह बन गया है। वो भी उस सत्ता की कमान पाने के बाद जिस सत्ता के पांच पति है। ये पत्रकार दिन-रात पूरे देश की गंदगी को पाठकों के मानस पटल पर अपनी थोपी गई विकलांग मानसिकता से एक साजिश के तहत हमें परोसनेवाली पत्रकारिता खुद को लोकतंत्र की प्रहरी मानती है परन्तु इसके कार्य तो समाज में गंदगी फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं रह गया। विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर रोज़ाना ये पत्रकार इतने गुनाह करतें हैं कि इनके गुनाह पर बोलनेवाले वाले भी उस समय चुप हो जातें हैं जब ये पत्रकार एक साथ उस व्यक्ति पर धावा बोल उसे इतना घायल कर देते हैं कि वह खुद को समाज का अपराधी समझने लगता है। दरअसल भारत में पत्रकारिता अब विचारप्रधान ना रहकर हमला प्रधान बन गई है। अतः अब इस पत्रकारिता को आतंकवादी पत्रकारिता का नाम दिया जा सकता है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:40 pm 0 विचार मंच
Labels: पत्रकारिता, AAP
शनिवार, 28 मार्च 2015
आप’का लोकतंत्र? लेखक: शम्भु चौधरी
श्री प्रशांत भूषण जी यह भी चाहते थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित की जा सके इसके लिये इन तथाकथित आप’ के नेताओं ने संघ से सांठगांठ कर ली आवाम के बहाने पार्टी पर राजनीति हमला करना और भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती किरणवेदी की प्रशंसा कर केजरीवाल को हर कदम पर नीचा दिखाने की गंदी राजनीति करते रहे। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है?
नईदिल्ली/कोलकाताः (28’ मार्च 2015) ‘आप’ की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में वही हुआ जो लगभग जो पहले से तय था। आम आदमी पार्टी के तीन वरिष्ठ नेता सहित चार सदस्यों को राष्ट्रीय से बहार का रास्ता दिखा दिया गया। एक शायर की कि एक शायरी है- बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। आज की हुई आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने बहुमत प्रस्ताव से श्री प्रशांत भूषण, श्री योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और श्री अजित झा को पार्टी में बगावत करने और पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में हराने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए इन चारों नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निष्कासित कर दिया। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पीएसी से पहले ही निकाला जा चुका था।
बैठक से निकलकर श्री योग्रेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि लोकतंत्र की हत्या हो गई। सवाल उठता है कि योगेंद्र जी किसे लोकतंत्र मानते हैं। जो उनके समर्थन में खड़े थे या वे जिसे अरविंद केजरीवाल फूटी आंखों नहीं सुहाते? उसे? राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अलग-थलग पड़े इन नेताओं ने बैठक के दौरान सिवा आरोप लगाने और अपने चंद समर्थकों के लेकर धरने में बैठने के अलावा सिर्फ इतना ही किया कि पूरी देश को यह बता दिया कि हम कितने जिम्मेदार नेता हैं।
जो प्रशांत जी कहते हैं कि उनको राजनीति नहीं आती वे कमरे के भीतर से लगातार केजरीवाल के खिलाफ साज़िश पे साज़िश रचने में लगे थे। विभिन्न प्रांतों के अपने प्रभाव में आने वाली तमाम ताकतों को पार्टी को बदनाम करने की रणनीति बनाने में जुटे थे। इसे क्या कहते हैं?
यह बात उसी समय तय हो गई थी जब दिल्ली में श्री केजरीवाल ने 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर जीत दर्जकर सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि वे 5 साल सिर्फ दिल्ली की जनता से किये वादों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करगें। इसी बात से बौखलाये श्री योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जी ने सवाल उठाने शुरू कर दिये कि दिल्ली का चुनाव ‘‘5 साल केजरीवाल ’’ के नारे से क्यों लड़ा गया? श्री प्रशांत भूषण जी यह भी चाहते थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित की जा सके इसके लिये इन तथाकथित आप’ के नेताओं ने संघ से सांठगांठ कर ली आवाम के बहाने पार्टी पर राजनीति हमला करना और भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती किरणवेदी की प्रशंसा कर केजरीवाल को हर कदम पर नीचा दिखाने की गंदी राजनीति करते रहे। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है? जो प्रशांत जी कहते हैं कि वे एक स्वस्थ्य राजनीति विकल्प के लिये ‘आम आदमी पार्टी’ में आये थे तो ये ओछी हरकत क्यों? इन सब सवालों का जबाब इन्हें देना ही पड़ेगा। जयहिन्द!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:48 pm 0 विचार मंच
Labels: आम आदमी पार्टी, AAP
रविवार, 1 मार्च 2015
गद्दार कौन? आतंकवादी या मोदी?
प्रमाणित हो गया कि कभी 'राम' तो कभी 'देशभक्ति' को बेचने में भाजपा से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं जो आंस्तीन के सांप की तरह हिन्दुस्तानियों की भावना को भंजाकर सत्ता पर काबिज होते ही अपनी दौगली 'जात' दिखा देता है। आज जिस प्रकार से देश को चलाने का प्रयास भाजपा कर रही है इससे देश की जनता में भारी असंतोष पनपने लगा है कि स्पष्ट शब्दों में लोग कहने लगे है कि ‘‘यह भी गद्दार निकला’’
कोलकाताः 3 मार्च 2015, लेखक- शम्भु चौधरी ; जम्मू-कश्मीर में चुनाव परिणाम के पश्चात सरकार बनाने हेतु हुए एक लंबी सौदाबाजी के बाद भाजपा ने पीडीपी के साथ ठीक वैसे ही समझौता कर सरकार बना ली जैसे दूध और दही का मिश्रण। अब जम्मू-कश्मीर के नये मुख्यमंत्री जनाब मुफ्ती मोहम्मद सईद आखिरकार अपना दाव खेलने में सफल रहे। मुख्यमंत्री बनते ही आपने एक रहस्य का पर से पर्दा उठाकर कम से कम देश की जनता को बता दिया कि आप जिस इंसान पर भरोसा कर रहे हैं वह कितना भरोसेमंद है? मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने बता दिया था कि ‘‘मैं ऑन रेकॉर्ड कहना चाहता हूं मैंने प्रधानमंत्री से कहा है कि राज्य में विधानसभा चुनावों के लिए हमें हुर्रियत, आतंकवादी संगठनों और पाकिस्तान को श्रेय देना चाहिये’’ इनके इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री यह सब बात पहले से ही जानते हुए चुप रहकर देश की जनता से गद्दारी कर रहे थे।
जिस 370 को लेकर संध (RSS) हमेशा से देश की जनता को गुमराह करती रही, वह रामजादे आज चुप क्यों? सोचने की बात है। शायद अपनी मां का श्राद्ध कराने लगे थे? भारत सरकार को सरकारी बयान देना पड़ा कि वे धारा 370 पर कोई विचार नहीं कर रहीं। इस बयान का क्या अर्थ निकाला जाय कि यह भाजपा सरकार की तरफ से एक लिखित दस्तावेज है जो मोदी ने पीडीपी का दिया है। क्या भाजपा इस बात का जबाब देगी? या संघ के रामजादे इस पर भी चुप रहेगें? संध की बोलती पर ताला लगानेवाले मोदी की जबान में जहर ही जहर भरा है अब तो हमें लगता है कि मोदी जिताना पाकिस्तान के लिये खतरा नहीं उससे भी कहीं अधिक हिन्दुस्तान के लिये खतरनाक साबित होते जा रहा है।
मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ गठबंधन कर भाजपा भले ही कांग्रेस को सत्ता से अलग करने की राजनीति में सफल रही हो पर इस बात से यह तो प्रमाणित हो गया कि कभी 'राम' तो कभी 'देशभक्ति' को बेचने में भाजपा से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं जो आंस्तीन के सांप की तरह हिन्दुस्तानियों की भावना को भंजाकर सत्ता पर काबिज होते ही अपनी दौगली 'जात' दिखा देता है। आज जिस प्रकार से देश को चलाने का प्रयास भाजपा कर रही है इससे देश की जनता में भारी असंतोष पनपने लगा है कि स्पष्ट शब्दों में लोग कहने लगे है कि ‘‘यह भी गद्दार निकला’’। जयहिन्द!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:15 pm 0 विचार मंच
Labels: नरेन्द्र मोदी, शम्भु चौधरी
बुधवार, 11 फ़रवरी 2015
आप’की ऐतिहासिक जीत
10 तारीख के दिन 11.00 बजते-बजते ‘‘5 साल केजरीवाल’’ के नारे से दिल्ली गुंज उठा। एक के बाद एक भाजपा के उम्मीदवार मैदान में धूल चाटते नजर आये। जैसे ही चुनाव परिणाम 'आम आदमी' के पक्ष में आने लगे तो लगा कि किसी तरह 40 तक पंहुच जायेगा। जब 35...36.. 40.. के बाद अचानक 50..51.. पर विजयी होने के आंकड़े आने लगे तो कई लोगों के नीचे की जमीन घिसकने लगी। भाजपा दलाल सटोरियों ने अपने मोबाईल को स्वीचआॅफ कर दिये।
कोलकाताः (10 फरवरी 2015) दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम ईपीएम मेशीन से ज्यूं-ज्यूं बहार आने लगे, कई मीडिया हाउस जो झूटे ही भाजपा को शुरू में बढ़त दिखाने का ढोंग रचते रहे दिन सुबह के 10 बजते-बजते उनकी जुबान लड़खराने लगी और ईपीएम मेशीन से निकल के आंकड़े बोलने लगे। कलतक जो लोग ‘आम आदमी पार्टी’ के दफ्तर में ताला लगाने की बात बोलते थकते नहीं थे। लोकतंत्र की ताकत ने उनके जुबान पर ऐसा ताला जड़ दिया कि पांच साल तक रह-रहकर सरकार को ब्लैकमेल भी नहीं पायेगें।। मेरी रचना -
दिल्ली के चुनाव में आम आदमी की जीत ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में अहंकार की कोई जगह नहीं है। आम आदमी पार्टी की सफलता ‘जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये’ भारत के संविधान में सत्य को साकार कर दिया। भाजपा के नाकारात्मक प्रचार, धन की बर्वादी, अर्मादित और असभ्य भाषा का प्रयोग, 200 से अधिक सांसदों, कई केन्द्रीय मंत्री, प्रधानमंत्री स्वयं, भाजपा के अध्यक्ष की पूरी ताकत, संध परिवार, कई राज्यों के मंत्री-मुख्यमंत्री सबके-सब एक परिंदे के सामने धूल चाटते नजर आये।
मोदी जी ने लोकसभा चुनाव जीतने के लिये जिन जुमले का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से वेदखल किया था, उन्हीं जुमलों ने मोदीजी के अश्वमेध विजयी घोड़े को दिल्ली में रोक दिया। जिस विजयी यात्रा ने भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह सह प्रधानमंत्री श्री मोदीजी को अहंकारी बना दिया था, यही अहंकार भाजपा को दिल्ली में डूबा दिया। भाजपा और संघ की केडर बेस ताकत, किरण बेदी का मास्टर स्ट्रोक, चपलुस मीडिया का एक वर्ग, नाकारात्मक विज्ञापनों की झड़ी ये सब प्रहार केजरीवाल के मजबूत इरादों के सामने पानी भरते नजर आये। केजरीवाल के एक-एक शब्द इनलोगों पर भारी पड़ने लगे। त्रिकोणात्मक संर्घष में किसी एक राजनीति दल को 54.2 प्रतिशत मतों का मिलना भारत के चुनावी इतिहास अबतक सभी आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया।
10 तारिख के दिन 11.00 बजते-बजते ‘‘5 साल केजरीवाल’’ के नारे से दिल्ली गुंज उठा। एक के बाद एक भाजपा के उम्मीदवार मैदान में धूल चाटते नजर आये। जैसे ही चुनाव परिणाम 'आम आदमी' के पक्ष में आने लगे तो लगा कि किसी तरह 40 तक पंहुच जायेगा। जब 35...36.. 40.. के बाद अचानक 50..51.. पर विजयी होने के आंकड़े आने लगे तो कई लोगों के नीचे की जमीन घिसकने लगी। भाजपा दलाल सटोरियों ने अपने मोबाईल को स्वीचआॅफ कर दिये। परिणाम देखते-देखते कई लोगों की सांसे फूलने लगी। अबतक कांग्रेस पार्टी मैदान से बहार हो चुकी थी। तभी चुनाव आयोग की तरफ से एक सूचना आई कि ‘आम आदमी पार्टी’ को 54.2 प्रतिशत मिले हैं। तबतक रूझान अपने अंतिम चरण की तरफ कदम रख चुका था। आम आदमी -61, भाजपा-9, कांग्रेस - 0, और अन्य -0 । सभी की सांसें थम सी गई थी। आम आदमी पार्टी के दफ्तर में जश्न को माहौल था, भाजपा कार्यलय के बहार हल्की चहल-पहल थी और कांग्रेस के कार्यालय के बहार सन्नाटा छाया हुआ था। अंतिम चरण में मुकाबला एक तरफा हो गया था। ‘आप-65’ , ‘भाजपा -5’ ...आप-66, भाजपा-4 समाचार आया किरण बेदी चुनाव हार गई। अंतिम परिणाम ‘आप-67’ और ‘भाजपा-3’ केजरीवाल अपने मित्रों व धर्मपत्नी के साथ जनता के सामने आते हैं कहते हैं - यह आप‘की’ जीत है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:58 am 0 विचार मंच
Labels: आम आदमी पार्टी, AAP, Arvind Kejriwal
रविवार, 8 फ़रवरी 2015
हिन्दू ‘भाजपा’ के बंधवा वोटर? -शम्भु चौधरी
बुखारी साब के समर्थन को ठुकरातेे हुए ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने जो साहासिक कदम उठाया यह भारत की राजनीति के लिये एक सबक है। चुनाव परिणाम में इसका क्या प्रभाव होगा यह अलग बात है लेकिन यह जरूर है ‘आप’ ने भारतीय राजनेताओं को दर्पण दिखा दिया है कि मजबूत ईरादे से यदि चुनाव लड़ा जाये तो सांप्रदायिक ताकतों को तमाचा जड़ा जा सकता है।
कोलकाताः (08 फरवरी 2015) दिल्ली विधानसभा का चुनाव प्रचार कल शाम थम गया परन्तु चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर धर्म की राजनीति करने वाले नकाबपोश चेहरे सामने आ गये। ऐसा प्रायः हर चुनाव के समय होता है। राजनैतिक ताकतें भी अपने फायदे की बात सोच उन बयानों का लाभ लेने में लग जाती है। विश्वनाथ प्रताप सिंह के दौर से कई फिरकाफरस्ती ताकतें अमूमन हर चुनाव के वक्त इस तरह के बयानबाजी करतें हैं और जनता के मतों के ठेकेदार बनकर राजनीति दलों को अपने फायदे के लिये इस्तमाल करती रही हैं।
दिल्ली के इस चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। भाजपा को जहाँ डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम का समर्थन मिला जिसमें उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में 10 लाख सिख उनके समर्थक हैं। 'भाजपा' ने इसे स्वीकार कर लिया तो दूसरी तरफ दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी साब एक अपील जारी कर कहे कि ‘‘मुसलमान ‘आप’ को वोट दें’’। जबकि ‘आप’ ने इस तरह के समर्थन को ठुकराते हुए कहा कि उन्हें आम लोगों का समर्थन चाहिये धर्म-जाति के आधार पर सर्मथन देने वालों से उन्हें समर्थन नहीं चाहिये। ‘आप’ ने इसे अवसरवाद की राजनीति करार दिया।
‘आप’ के इस निर्णय से चुनाव के वक्त शाही इमाम बुखारी साब के दरबार पर घुटने टेकने वाले भारत की तमाम राजनीति दलों को मानो सांप सूंघ गया कि ‘आप’ की यह कैसी राजनीति? सामने आयी हुई थाली को ठुकरा दिया जबकि दूसरी तरफ ‘आप’ पर सांप्रदायिकता की राजनीति का आरोप लगाने वाली भाजपा के प्रवक्ता ने हिन्दुओं को भड़काने का बयान देकर कहा कि ‘‘इस फतवे के खिलाफ हिन्दू एकतरफा मतदान करें’’ भाजपा हमेशा से ही धर्म को चुनाव जीतने का एक हथकंडा मानती रही है। वहीं 'आप' ने एक नई लकीर खींच दी और धर्म को एक किनारे करते हुए आम लोगों की समस्या को अधिक महत्व दिया।
दूसरे पर सांप्रदायिकता का आरोप जड़नेवाली भाजपा भीतर से कितनी जहरीली है कि इसका इस बात से ही पता चलता है कि एक तरफ वह जब खुद धर्म के आधार पर किसी का समर्थन लेती है या बयानबाजी करती है तो उसे उसमें इसे सांप्रदायिकता की ‘बू’ नहीं झलकती। वहीं कोई दूसरे सांप्रदाय के लोग खासकर मुसलमान समाज के बयान पर तिलमिला जाती है। भाजपा को मुसलमान समर्थन दे तो वह तो वह भारतीय नहीं तो पाकिस्तानी? कलतक जिस बंगलादेशी को लेकर भाजपा सांप की तरह फुफकार मारती नहीं थकती थी आज ये सारे मुद्दे कहां चले गये?
बुखारी साब के समर्थन को ठुकरातेे हुए ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने जो साहासिक कदम उठाया यह भारत की राजनीति के लिये एक सबक है। चुनाव परिणाम में इसका क्या प्रभाव होगा यह अलग बात है लेकिन यह जरूर है ‘आप’ ने भारतीय राजनेताओं को दर्पण दिखा दिया है कि मजबूत ईरादे से यदि चुनाव लड़ा जाये तो सांप्रदायिक ताकतों को तमाचा जड़ा जा सकता है।
दिल्ली के चुनाव में इमाम बुखारी के प्रस्वात को ठुकरा देने के पश्चात भी मसलमानों ने बड़ी संख्या में ‘आप’ के पक्ष में मतदान किया वहीं भाजपा के हुक्म को किनारे करते हुए हिन्दुओं ने भी यह स्वीकार किया की ‘केजरीवाल’ की राजनीति में कुछ तो नया जरूर है। जो भाजपा हिन्दुओं को अपना बंधवा वोटर समझती है उसके इस भ्रम को भी चकनाचुर कर दिया दिल्ली की जनता ने। जयहिन्द!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 3:39 am 0 विचार मंच
Labels: AAP, BJP, Prime Minister धर्मनिरपेक्षता
बुधवार, 4 फ़रवरी 2015
स्वच्छ भारत का निर्माण -शम्भु चौधरी
यह लड़ाई अकेले ‘केजरीवाल’ की नहीं है। आम आदमी यही चाहता है कि भारत की राजनीति में अच्छे लोग आयें। भले ही वह किसी भी दल से क्यों न जूड़ा हो। राजनीति के इस गंदे प्रदुषित वातावरण में 'आम आदमी पार्टी' का छोटा सा प्रयास है कितना कारगार सिद्ध हुआ हम और आप इस बात से ही अंदाज लगा लें कि दिल्ली चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर कांग्रेस और भाजपा को साफ छवि के चेहरे को जनता के सामने रखना पड़ा। चुनाव में हार-जीत होती रहेगी। राजनीति को स्वच्छ बनाकर ही हम ‘‘स्वच्छ भारत का निर्माण’’ कर सकतें हैं।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 4:55 pm 0 विचार मंच
Labels: अरविन्द केजरीवाल, आम आदमी पार्टी, AAP
सोमवार, 17 नवंबर 2014
धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आंतकवाद को पनाह ?
पंडित जवाहरलाल नेहरू की आलिशान कब्र को ढोहने वाली कांग्रेसी जमात की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने पंडित नेहरू के 125वी जयंती के अवसर पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘नेहरू के विचार पर आज खतरा पैदा हो गया है। क्योंकि तथ्याों को गलत ढंग से रखा जा रहा है और तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को भारत के लिये अकाट्य जरूरत पर भी जोर दिया।’’
हाँ! यदि कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया जी यह मानती है कि पंडित नेहरू के यही बिचार थे कि भारत को आतंकवदियों को भरोसे सुपुर्द कर दिया जाय तो ऐसे विचारों को आज ना तो कल तो खतरा पैदा होना ही था। धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर ईस्लामिक आतंकवाद को भारत में संरक्षण देना यदि पंडित नेहरू की विचारधारा का मूल मंत्र है तो ऐसी विचारधारा किसी भी रूप में भारत को कभी भी स्वीकार नहीं।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:25 pm 0 विचार मंच
Labels: कांग्रेस पार्टी, सोनिया गांधी, BJP, Prime Minister धर्मनिरपेक्षता
गुरुवार, 6 मार्च 2014
‘आप’ फूंक-फूंक कर चले।
यह लड़ाई अंग्रेजों से लड़ने की नहीं, कि देश की जनता भावनात्मक रूप से ‘आप’ के साथ हो जायेगी। यह लड़ाई उस व्यवस्था से जो हमारे जीवन का अंग बन चुकी है। इस भ्रष्ट व्यवस्था में हर किसी का स्वार्थ छुपा हुआ है। चाहे वह पत्रकार हो या संपादक, सिपाही हो या ऑफिसर, मंत्री हो या चपरासी। चेन की तरह सबके सब इस व्यवस्था के हिस्सेदार बन चुकें हैं।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:44 am 0 विचार मंच
Labels: शंभु चौधरी, AAP, BJP, Congress
मंगलवार, 4 मार्च 2014
अण्णाजी की राजनीति? - शम्भु चौधरी
संसद में लोकपाल बिल पारित करते समय अण्णाजी को जिन व्यक्तियों ने गुमराह किया उनमें से एक चौथी दुनिया के प्रधान संपादक श्री संतोष भारतीय भी हैं, जिन्होंने अपने नये संपादकिया देखें 24 फरवरी का अंक ‘‘लोकतंत्र को तमाशा ना बनने दें’’ में श्री अण्णा हजारे के उस 17 सूत्रीय कार्यक्रम का जिक्र करते हुए आपने ममता बनेर्जी की काफी प्रसंशा की है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:23 am 0 विचार मंच
Labels: शंभु चौधरी, संतोष भारतीय, Anna Hazare
रविवार, 2 मार्च 2014
"संसद" बहुमत की बपौती नहीं!
ऐसा बहुमत जो लोकतंत्र की मूल भावना को तहसनहस करता हो, ऐसा बहुमत जो देश को लूटने के लिये बनाया जाता हो और लुटरों को सुरक्षा प्रदान करता हो उसे कदापी बहुमत नहीं माना जा सकता भले ही पूरी की पूरी संसद उसके पक्ष में ही क्यों ना खड़ी हो। हमें इसके उन पहलुओं पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि ‘अल्पमत’ की जायज बातों को कहीं ‘बहुमत’ से दबाया तो नहीं जा रहा? यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं है।
Please Read And Like me "BAAT PATE KI"
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 10:00 pm 0 विचार मंच
Labels: शंभु चौधरी
16वीं लोकसभा की उलटी गिनती शुरू
https://www.facebook.com/baatpatekii
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:57 pm 0 विचार मंच
Labels: शंभु चौधरी








