यदि इन सभी बयानों को परखा जाए तो ममता बनर्जी के साथ-साथ, देश की सर्वोच्य अदालत (सुप्रीम कोर्ट), देश के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री, असम के राज्यपाल वे सभी देशद्रोही है जो इन 40 लाख धुसपैठियों को सूची में शामिल करने पूरा अवसर देने की वकालत कर रहें। परन्तु अमित शाह का बयान है कि ये सभी घुसपैठियें हैं । तो फिर इन सभी घुसपैठियों को भाजपा अध्यक्ष सूट-एट-साइट आदेश क्यों नहीं दे देते? क्या जरूरत है संसद की? क्या जरूरत है सुप्रीम कोर्ट की?
रविवार, 12 अगस्त 2018
एनआरसी: भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संसद और सुप्रीम कोर्ट से भी बड़े हैं ?
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 1:31 am 0 विचार मंच
Labels: नरेन्द्र मोदी, भाजपा पार्टी, सुप्रीम कोर्ट, Amit shah, NRC
मंगलवार, 11 जून 2013
आडवाणी जी का इस्तीफा नाटक
देश को दो बार संप्रदायिकता की आग में झौंकने वाले भाजपा के कदवार नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने आखिरकार मानमनुवल के पश्चात अपना इस्तीफा वापस ले ही लिया। इस इस्तीफा वापसी के पीछे भी इस अति महत्वकांक्षी व्यक्ति की सौदावाजी को नकारा नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार इन्होंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को बाध्य किया था कि वे लिखकर देंवे कि देश का अगला ‘‘पी.एम इन वेटिंग’’ आडवाणी जी ही होंगे। कई सालों तक वे अपने नाम के साथ इस तगमे को लगाये जनता के सामने फिरते रहे कि ‘‘अगला प्रधानमंत्री मैं ही हूँ’’। जब देश की जनता ने इनके इस कद को दो बार सिरे से नकार दिया और पूरी की पूरी गठबंधन दल मिलकर भी माननीय आडवाणी जी को प्रधानमंत्री के पद तक नहीं पंहुचा पाई। आज इस भाजपा के लिबरल चेहरे को लगता है कि उनका ‘‘पी.एम इन वेटिंग’’ का सपना अधुरा ही रह जाएगा। इस बीच जब भाजपा में नये चेहरे उभरकर खुद-व-खुद सामने आयें हैं तो आडवाणी जी को लग रहा कि उनके पी.एम. पद को कोई दूसरा व्यक्ति जो उनके कद से छोटा है हड़पने जा रहा है। जिसके लिये उन्होंने जिन्ना की मजार पर भी मन्नतें मांगी थी और उनको धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के सम्मान से नबाजा था। मानो एक सांप्रदायिक व्यक्ति दूसरे सांप्रदायिक व्यक्ति को प्रमाण पत्र दे रहा हो। वर्तमान में हुए इस्तीफा नाटक ‘‘खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे’’ मुहावरा को सत्य साबित कर देने में सक्षम हो गया। इस इस्तीफा प्रकरण से आडवाणी के कई इरादे को स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है जैसा कि इन्होंने अपने पत्र में भाजपा पर यह आरोप लगाया कि ‘‘पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है। इसमें व्यक्ति विशेष का महत्व बढ़ता जा रहा है। लगता नहीं कि यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के आदर्शों पर चलने वाली पार्टी है।’’ इनका स्पष्ट संकेत है कि भाजपा में इनके कद को कोई भी व्यक्ति छोटा करने का प्रयास किया तो वे पार्टी लाईन से हटकर एक नई पार्टी तक बनाने की बात भी सोच सकते थे। श्री राजनाथ सिंह जी खैर मनायें कि उनका ( आडवाणी जी का ) तीसरा धमाका बीच में ही रूक गया अन्यथा भाजपा नेताओं को सत्ता के सपने देखने का अवसर भी नहीं देते अडवाणी जी। इस त्यागपत्र प्रकरण से किसे लाभ होगा किसे नहीं यह तो आने वाला 2014 का लोकसभा चुनाव ही बता पायेगा कि जनता ने इस प्रकरण को किस प्रकार लिया है। हाँ! एक बात जरूर है कि इससे श्री आडवाणी जी का कद बहुत छोटा हो गया। आज देशभर से आवज उठ रही है कि ‘‘नरेन्द्र मोदी को आगे लाया जाए - कांग्रेस को हटाया जाए’’ एनडीए के कुछ दलों का यह अहंकार कि यदि मोदीजी को भाजपा ने प्रजोक्ट किया तो वे दल को छोड़ देगें । वे होते कौन हैं मोदीजी को हटाने वाले? यदि देश की जनता मोदीजी को लाना चाहती है तो मोदी जी को कोई नहीं रोक सकता। गठबंधन जनता की आवाज के साथ रहना चाहे तो रहे। जाना चाहते हों तो कल क्यों आज ही छोड़कर जा सकतें हैं। धर्मनिरपेक्षता की कतार में खड़े होकर अपना दामन भी साफ कर लेवें। यही मौका है उनको धर्मनिपेक्षता का प्रमाणपत्र प्राप्त करने का। मुसलमानों के वोटों को बटोरने का।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:36 pm 1 विचार मंच
Labels: आडवाणी, इस्तीफा, भाजपा, भाजपा पार्टी, राजनाथ सिंह, शंभू चौधरी, BJP, Congress, CPI, CPM, Nitish kumar
बुधवार, 24 अगस्त 2011
लोकतंत्र ने लोकतंत्र को ललकारा...
मानो संसद के अंदर एक ऐसी भीड़ जमा हो गई है जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस बात को पुख्ता कर रही है कि संसद के अंदर सारे सांसद देश को लूटने में लगे हैं। हमें आज इस बात को सोचने के लिए मजबूर कर रही है कि देश में लोकतंत्र को अब किस प्रकार बचाया जा सके। अब दो लोकतंत्र की लड़ाई आमने-सामने होती दिखाई देने लगी है। इस देश में अब साफ होता जा रहा है कि तमाम राजनैतिक दल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक होकर लोकतंत्र के माध्यम से ही लोकतंत्र पर कब्जा कर लोकतंत्र को ही ललकार रहे हैं।
आज श्री अन्ना जी के अनशन का 10वां दिन है। इस बात में अब कोई विवाद नहीं दिखता कि देश दो भागों में बंट चुका है। इतिहास के पन्नों में हर पल को बड़ी बैचेनी से देखा और लिखा जा रहा है। एक तरफ श्री अन्नाजी के समर्थन में जन सैलाब का उभरता आक्रोश है तो दूसरी तरफ लोकतंत्र की दुहाई देने वालों की जमात। इस देश की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि संसद में जिन सांसदों को जनता चुनकर भेजती है, संसद तक पंहुचते-पंहुचते उनके विचार किसी बंद दरवाजे में जाकर कैद हो जाते हैं। और लोकतंत्र सिर्फ चन्द सौदागरों के हाथों कठपुतली बनकर रह जाती है। मुझे अब ऐसा लगने लगा है कि जिस प्रकार इस देश में दो कानून, दो गीत, दो नाम हैं उसी प्रकार देश में दो लोकतंत्र भी है। एक संसद के भीतर का लोकतंत्र जो देश को लूटने में लगा है। जिसके अन्दर देश के सारे के सारे चोर, बेईमान और भ्रष्टाचारियों की जमात भरी हुई है जो आपस में मिलकर देश को भीतर ही भीतर खोखला किये जा रही है। दूसरी तरफ लाचार और वेबस लोकतंत्र जो अपनी बात कहने में डरती है। परन्तु आज जनता सामने आने का कदम उठा चुकी है। अब आर-पार की लड़ाई की शुरू होनी तय दिखती है।
यहाँ राजनैतिक रूप से तीन प्रमुख राजनैतिक विचारधाराओं का संक्षिप्त विश्लेशन करने का भी प्रयास करूगाँ।
कांग्रेस पार्टी: कांग्रेस पार्टी के लोकपाल बिल पर खुद के और श्रीमती सोनिया जी, प्रधानमंत्री श्री मनमोहान सिंह जी के बयान भले ही एक मजबूत लोकपाल के पक्ष में रहें हो परन्तु लगातार दो माह की जद्दो-जहद के पश्चात लोकसभा के पटल पर जो बिल प्रस्तुत किया गया उसे सिविल सोसायटी के सदस्यों ने पहले ही खारिज कर दिया था। इससे सरकार की न सिर्फ मंशा पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हुआ साथ ही साथ सरकार ने जनता के साथ विश्वासघात भी किया है। सरकार ने पिछले अनशन के समय जिस विश्वास का पूल जनता के साथ निर्माण किया था जो एक धोखा निकाला। जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार संसद को एक करने में जूटी वह आंसिक रूप से सरकार के साथ तो दिखी पर अपनी राजनीति भी इस बीच तलाशते दिखे। संसद के भीतर मानो एक अलग लोकतंत्र चलता है और संसद के बहार का लोकतंत्र अलग हो। शाहबानू या आपातकाल के समय कांग्रेसी सरकार ने संसद में जिस प्रकार नियम कायदे तौड़े सब भूल चुकी है। जहाँ वोट बैंक की राजनीति हो वह लोकतंत्र अलग है और जहाँ मंहगाई, भ्रष्टाचार की बात हो वहाँ सरकार को सारे नियम-कायदे और संसद की मर्यादा दिखने लगती है। इससे साफ जाहिर होता है कि लोकतंत्र को कांग्रेस पार्टी अलग-अलग चश्में से देखती है।
भाजपा पार्टी:
हिन्दूवादी विचारधारा को लेकर जन्मी भाजपा में राजनैतिक रूप से स्पष्ट विचारधारा की शून्यता साफ झलकती है। अब न तो इसके पास हिंदू विचारधारा बची ना ही राष्ट्रीय विचारधारा। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अब तक इस पार्टी के नेताओं के संसद के अन्दर और बहार जो भी बयान आयें हैं वे न सिर्फ निराशाजनक स्थिति की एक झलक दर्शाती है। लोकपाल या जन लोकपाल बिल को लेकर इस पार्टी ने कई बार इस तरह के बयान दिये जैसे इनके बोलने से भूचाल आ जाएगा परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक बार तो इसने यह भी कहा कि इनकी पार्टी लोकपाल पर सिर्फ संसद के अन्दर ही बोलगी। अब इसने सारी बात संसद में बोल दी है संसद में इनके बयान आते ही इस दल की न सिर्फ विश्वनियता समाप्त हो चुकी आने वाले समय में भाजपा का राजनैतिक सफाया निश्चित लगता है। जिसने राम को बेच डाला उसके मुंह से राष्ट्रीयता की बात कुछ भी समझ से परे है। इनके ‘‘प्रधानमंत्री-इन-वेटिंग’’ वोट लेने के लिए कांग्रेसियों से भी दो कदम आगे निकल गए। कायदे-आजम मो. जिन्ना जी की मजार पर भी फूल चढ़ा आये। यदि ये अजमेर चले जाते तो कम से कम इनको सच में ईश्वर का आर्शीवाद प्राप्त होता।
माकपा पार्टी:
पिछले 30 सालों से बंगाल में मुझे इस दल को काफी नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिला है। फिर भी आजतक इस दल मैं नहीं समझ सका। पिछले 35 साल बंगाल में राज की और इन 35सालों में 35 हिन्दीभासी को भी राष्ट्रीय स्तर पर नहीं जोड़ पाई। मजे की बात खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहती है? जिन मजदूरों के हितों की बात करती है यह उनके परिवारों को ही खा जाती है। जिन किसानों के हक की बात करती रही आज उन किसानों की जमीनों को भी हड़प कर गई। जब भी देश को आतंकवाद से खतरा हुआ इसने कुछ भी नहीं कहा। जब भी देश पर विदेशी हमला हुआ इस दल ने चीन की भाषा का प्रयोग किया। मंहगाई की बात पर सड़क पर कुछ और, संसद में कुछ और बयान देती रही। जो खुद सड़कों से देश की सत्ता को चुनौती देती रही है आज देश का लोकतांतित्रक प्रक्रिया समझाने चली है।
मानो संसद के अंदर एक ऐसी भीड़ जमा हो गई है जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस बात को पुख्ता कर रही है कि संसद के अंदर सारे सांसद देश को लूटने में लगे हैं। हमें आज इस बात को सोचने के लिए मजबूर कर रही है कि देश में लोकतंत्र को अब किस प्रकार बचाया जा सके। अब दो लोकतंत्र की लड़ाई आमने-सामने होती दिखाई देने लगी है। इस देश में अब साफ होता जा रहा है कि तमाम राजनैतिक दल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक होकर लोकतंत्र के माध्यम से ही लोकतंत्र पर कब्जा कर लोकतंत्र को ही ललकार रहे हैं। जयहिन्द!
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:55 pm 1 विचार मंच
Labels: कांग्रेस पार्टी, भाजपा पार्टी, माकपा पार्टी, लोकतंत्र
