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शनिवार, 17 सितंबर 2022

‘‘मेक इंडिया नम्बर-1’’

 ‘‘मेक इंडिया नम्बर-1’’

मैं यह नहीं कह रहा कि मेरे को सब कुछ पता है, इन सब लोगों से (देश की जनता से) पूछेगें, सारे लोग आगे आयेगें, तब ही यह देश आगे बढ़ेगा, मुझे जैसी शिक्षा मिली, वैसी शिक्षा देश के हर गरीब से गरीब बच्चों को देनी होगी, जबतक हम देश की सारी सरकारी स्कूलों को ठीक नहीं करेगें, तबतक देश को ‘‘मेक इंडिया नम्बर- 1’’ नहीं बनाया जा सकता । अभी प्रधानमंत्री जी ने एक योजना लागू की, 14500 स्कूलों को पी.एम.श्री योजना के तहत ठीक करने की, सोचिये देश में 18 करोड़ बच्चे सरकारी स्कूलों में हर साल पढ़ते हैं । 10 लाख 32 हजार सरकारी स्कूलों को तब तो ठीक करने में 100 साल से भी अधिक लग जायेगें। ऐसे तो देश कभी भी नहीं विश्वगुरु बनेगा। देश में गरीबी दूर करने के लिए नियत चाहिये। ईमानदारी चाहिये। जब गरीबों के बच्चे सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा लेकर इंजिनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक बनेगें तब उनके परिवार की गरीबी दूर हो सकेगी, जिससे देश के विकास में भी उनका योगदान होगा, देश की गरीबी को हम समाप्त कर सकेगें। हमने अब तक 70 साल खो दिये हैं अब हमें बिना वक्त गमाये बच्चों की अच्छी शिक्षा, लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सेवा, अच्छी सड़क, पानी की व्यवस्था करनी होगी। किसानों को उसके फसल की सही कीमत, मजदूरों को सम्मान देना होगा।

हमें स्वास्थ्य और शिक्षा को पूरे देश में मुफ्त देना होगा, तभी हमारा देश नंबर वन बन पाएगा । मैं चाहता हूं कि भारत एक अमीर देश बने, लेकिन भारत एक अमीर देश तब ही बन पाएगा जब हर एक भारतवासी अमीर होगा।

भारत को नंबर-वन देश बनाने की क्यों जरुरत

• हमें हर बच्चे को अच्छी शिक्षा का इंतजाम करना होगा ।

• हमें इस देश में हर भारतीय के लिए अच्छे इलाज का इंतजाम करना पड़ेगा ।

• बिजली, पानी और रोजगार का इंतजाम करना पड़ेगा ।

Make India No. 1
भारत में सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली लोग हैं। दुनिया की कंपनियों के टॉप पर भारतीय हैं फिर भी हम पीछे क्यों हैं? भारत में नदियां, समुद्र, पहाड़, जड़ी-बूटी सबकुछ है। भगवान ने हमें तीन-तीन मौसम दिये। 130 करोड़ लोगों की ताकत दी । मुझे लगता है कि 1947 में हम से सबसे बड़ी गलती हुई है। आजाद भारत को सबसे अधिक ध्यान शिक्षा पर देना चाहिए था। मगर दुख की बात यह है कि आजादी के वक्त भी ध्यान नहीं दिया और 75 साल बाद भी नहीं। मगर अब भारत और इंतजार नहीं कर सकता है। अब पूरे देश में वार मोड में अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करना होगा।

भारत में सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली लोग हैं। दुनिया की कंपनियों के टॉप पर भारतीय हैं फिर भी हम पीछे क्यों हैं? भारत में नदियां, समुद्र, पहाड़, जड़ी-बूटी सबकुछ है। भगवान ने हमें तीन-तीन मौसम दिये। 130 करोड़ लोगों की ताकत दी । मुझे लगता है कि 1947 में हम से सबसे बड़ी गलती हुई है। आजाद भारत को सबसे अधिक ध्यान शिक्षा पर देना चाहिए था। मगर दुख की बात यह है कि आजादी के वक्त भी ध्यान नहीं दिया और 75 साल बाद भी नहीं। मगर अब भारत और इंतजार नहीं कर सकता है। अब पूरे देश में वार मोड में अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करना होगा।

अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली में जरूरी सुधार करने की जरूरत है। यह शिक्षा हमारे बच्चों को क्लर्क बनाने की शिक्षा देते हैं। उनको एंटरप्रेन्योरशिप (उद्यमिता) बनाने पर जोर देना होगा । नौकरी लेने की जगह नौकरी देनेवाला बनाने पर ध्यान देना होगा ।

इनका मानना है कि कई देश हमारे बाद आजाद हुए, जैसे सिंगापुर 15 साल बाद आजाद हुआ, लेकिन वह हमसे आगे कैसे निकल गया।  दूसरे विश्वयुद्ध में जापान ध्वस्त हो गया था लेकिन आज हम से आगे निकल गया। जर्मनी भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद खत्म हो गया था आज हम से आगे निकल गया तो हम पीछे क्यों रह गए? हमारा सिस्टम खराब है पिछले पचहतर सालों में इन नेताओं और पार्टियों ने मिलकर सिर्फ और सिर्फ गंदी राजनीति ही की है। अब और  देश को इनके भरोसे अगर छोड़ दिया तो हम अगले 75 साल ऐसे ही पीछे रह जाएंगे। अब एक ही उम्मीद है कि लोग इकट्ठे होकर साथ आएं। हम लोग कोने-कोने में जाएंगे,  हर राज्य में जाएंगे और लोगों को जोड़ने की कोशिश करेंगे। 130 करोड़ लोगों को जोड़ने का हमारा मकसद है। हर अच्छी ताकत अपने-अपने स्तर पर हमें सहयोग देगी तभी देश बदल सकता है।  -अरविंद केजरीवाल

 

केजरीवाल पर लिखना यानी तलवार की धार पर चलना होगा । मैं उनकी विचारधारा को लेकर पिछले 10 सालों से अध्ययन करने में लगा हूँ। कई साहित्यकार-पत्रकार मित्र मानते हैं कि केजरीवाल कोई विचारधारा नहीं । उनका सोचना इसलिए भी सही हो सकता कि अबतक इन साहित्यकारों ने या पत्रकारों ने जोड़-तौड़ की राजनीति को ही देश की राजनीति मानी है। भारत में कांग्रेस की विचारधारा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टियों की कई शाखाओं की विचारधारा, समाजवादी विचारधारा और दक्षिणपंथी विचारधारा को ही देखा और पढ़ा है।  फ़्रांस की संसद में धर्मनिरपेक्षता चाहने वाले अक्सर बाई तरफ बैठते थे और पूँजीवाद से सम्बंधित विचारधाराओं फासीवाद या फ़ासिस्टवाद (फ़ासिज़्म) ताकतें जो धर्म की राजनीति में विश्वास रखते थे वे दांई तरफ बैठते थे ।

इसका मूल कारण यह था कि जनता के अंदर राजनीतिक रूप से विभाजन का दो ही मार्ग था, एक लोकतंत्र का चुनाव तो दूसरी तरफ राजतंत्र का चुनाव करना। एक तरफ मजदूर, शोषित वर्ग तो दूसरी तरफ शोषक वर्ग। एक का मानना था कि सरकार को जनता के प्रति जिम्मेदार होना चाहिये तो दूसरे पंथ का मानना था कि सरकार का अर्थ है पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत किया जाना । आगे चलकर लोकतंत्र ने अपना नया रास्ता बना लिया तब साम्यवाद, फासीवाद और लोकतंत्र की वैचारिक ताकतों के बीच एक त्रिकोणीय मुकाबला शुरू होने लगा ।

जब तक हम इनके (कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टियों की, समाजवादी विचारधारा और दक्षिणपंथी) विचारधारा को नहीं पढ़ेंगे तक तक केजरीवाल की विचारधारा को हम नहीं समझ सकते।

जनता को भ्रमित करने का एक छलावा कुछ लोगों ने बहुत चला रखा कि “पानी से बिजली निकाल लेसी तो मानख पी सी कै?  या खेतों में काम क्या आयेगा ? पानी से बिजली पैदा होने के बाद जो लोग यह मान लेते हैं कि पानी से एनेर्जी निकाल ली गई है वैसे ही कुछ साहित्यकार यह मानते हैं कि अबतक जो विचारधारा को उन लोगों ने देखा-सुना या पढ़ा है इसके बाद कुछ बचा ही नहीं । नई विचारधारा को संचार करने की इनमें न तो क्षमता है ना ही सोच । इसीलिए इन तथाकथित साहित्यकारों व पत्रकारों को केजरीवाल की विचारधारा कोई विचारधारा ही नहीं लगती या जानबूझकर केजरीवाल को राजनीतिक रूप से महत्व नहीं देना चाहते। इसका कारण भी है देश की अर्थ-व्यवस्था को भीतर ही भीतर खोखला बनाते जाना । जो केजरीवाल की राजनीति में संभव नहीं।

केजरीवाल की विचारधारा को समझने के लिए सर्वप्रथम हमें भारतीय संविधान के प्रस्तावना व उनके कई अनुच्छेदों को हम समझने का प्रयास करेगें। साथ ही सरकार के दायित्व सरकार की जनता के प्रति जबाबदेही को भी हमें समझना होगा । भारत का संविधान हमें इन बातों पर क्या निर्देश देता है?

“भारत के संविधान की भूमिका में कुछ शब्दों का चयन किया गया है। एक नजर देखें।-

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य, बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों कोः

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता, सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 0 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तती, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।“

यहां पर हम देखें कि -

1. हम भारत के लोग ।

2. भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य बनाने के लिए।

3. समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए।

अच्छा अब भारत की विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधाराओं को संविधान की कसौटी पर कसतें हैं।

 

भारतीय संविधान के प्रस्तावना की नजर से यदि देश के विभिन्न राजनैतिक दलों की विचारधाराओं को अध्ययन किया जाए तो हम पाते हैं कि कांग्रेस की विचारधारा और समाजवादी विचारधारा के कुछ अंश भारतीय संविधान मूलभूत संरचना के ढाँचे के अंदर बने हुए हैं ।

कांग्रेस की विचारधारा:

भारत की आजादी में देश के हजारों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी। स्व.महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में यह लड़ाई लड़ी गई । अहिंसक आंदोलन की एक नई मिशाल दुनियां में कायम हुई, आगे चलकर स्व.नेल्सन मंडेला ने  भी गांधीवादी विचारधारा को अपनाते हुए साउथ अफ्रीका में गोरे लोगों के वर्चस्व और अपनी अश्वेत आबादी के लिए लगातार 1960 के दशक से  से 1990 तक लड़ाई लड़ी । सफलता भी मिली । भारत में भी इस लड़ाई की शुरूआत गांधी जी की निजी कल्पना थी। इसी दौरान कांग्रेस पार्टी का जन्म दिसंबर 1885  में हुआ । यह पार्टी राजनीति रूप से गरीबों के हितों की बात तो करती रही, परन्तु इसका उद्देश देश में कल-कारखानों का लगाना, पूंजीवादी व्यवस्था को बढ़ावा देना और नये उद्योगों की स्थापना और मिक्सड अर्थनीति को अपनाना रहा ।  धार्मिक रूप से यह दल खुद को धर्मनिरपेक्ष मानती है। नीचले और पिछड़े तबके को उचित स्थान मिले यह भी प्रयास किये गए । परन्तु इस दल में एक सबसे बड़ी खामी यह रही कि यह दल परिवार वाद के अंदर सिमटता चला गया ।  पिछले 70 सालों में कोई भी ऐसा नेता उभर कर सामने नहीं आ सका, जो कांग्रेस पार्टी को नया नेतृत्व प्रदान कर सके। आज भी इसके परिवार वाद के कारण देश की राजनीति में शून्यता मंडरा रही है।

 

समाजवादी विचारधारा:

समाजवादी विचारधारा - स्व. राम मनोहर लोहिया की देन थी जो चाहते थे कि भारत जैसे विशाल देश में सभी वर्गों को समान अवसर मिले। मजदूरों को उसका हक मिले तो उद्योगपतियों को उचित सुरक्षा। लोहिया जी विकेन्द्रीकरण की राजनीति में विश्वास रखते थे । जहाँ से मार्क्सवाद समाप्त होता है वहाँ से समाजवाद शुरू हो जाता है। जहाँ मार्क्सवाद सत्ता के नियंत्रण में विश्वास करती थी, तो लोहिया जी के समाजवाद में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बात है। हालांकि इस विचारधारा को कुछ राजनीतिज्ञ दलों ने सत्ता में दलाली का औजार बना लिया है। जो भी दल आज भारत में इस विचारधारा को लेकर कार्य कर रही है वह सत्ताभोग से ज्यादा कुछ नहीं कर पाई।

 

वामपंथी विचारधारा:

वामपंथी विचारधारा पूर्ण रूप से मार्क्सवाद- कार्ल मार्क्स की ‘साम्यवादी विचारधाराके नाम से जानी जाती है। जिसकी उत्पत्ति मजदूर वर्ग के उत्थान को लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के बाद सामने आया जिसका मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से शोषण करने वालों (उद्योगपतियों) के खिलाफ़ आवाज उठाकर मजदूरों को उनका हक दिलाने में महत्वपूर्ण रोल अदा करना था, जिसने धर्म-जाति, ऊँच-नीच, गोरे-काले के भेद को समाप्त कर दुनिया में तेजी से मार्क्सवाद ने पांव पसारे थे कई देशों में सरकारें बनाने में भी इस विचारधारा की अहम भूमिका रही । वहीं माओवाद,  माओ-त्से-तुंग जो एक चीनी क्रान्तिकारी, राजनैतिक विचारक और साम्यवादी दल के नेता थे, जिसने जनवादी गणतन्त्र चीन की स्थापना की और मृत्यु पर्यन्त चीन का नेतृत्व किया। द्वारा विकसित साम्यवाद का एक रूप है। माओवाद में विपरित विचारधारा का कोई स्थान नहीं था, जिसके लाखों उदाहरण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। उपरोक्त दोनों विचारधारा में अंतर यह था कि मार्क्सवाद की विचारधारा मजदूरों के हितों के लिए उनके मालिकों से लड़ती थी तो माओवाद पूर्णतय राजनीति रूप से गरीबों व शोषीत वर्ग चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो, सत्ता से व शोषक वर्ग के विरूद्ध हिंसक आंदोलनों को बढ़ावा देती थी । ये दोनों ही विचारधारा भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों को कभी स्वीकार नहीं करती । इन विचारधारा के लोग भारतीय संविधान के दायरे से खुद को हमेशा अलग-थलग किये रहते। हालांकि दोनों ही विचारधारा समानांतर रूप से एक दूसरे की पूरक मानी जा सकती है इसका कारण स्पष्ट है कि इसमें शोषक-शोषित वर्ग ही समाहित है।

 

दक्षिणपंथी विचारधार:

दक्षिणपंथी विचारधार सीधे तौर पर शोषक वर्ग और धर्म आधारित राजनीति की समर्थक रही है। अर्थात धार्मिक उन्मांद बनाये रखने की चेष्टा करते रहना और बड़े घराने का साथ देना । स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने इस लकीर को बदलकर नई लकीर खींचने की भरपूर चेष्टा कि और भारतीय जनता पार्टी को गांधीवादी विचारधारा से जोड़ कर इसे कुछ हद तक नया स्वरूप देने का प्रयास किया था। परन्तु 2014 के बाद इसमें झूठ, फरेब, हिंसा और स्वभक्ति का बोलबाला हो गया । अब भारतीय जनता पार्टी न तो दक्षिणपंथी रही ना ही लोकतांत्रिक संस्था रही। भले ही बोलने को यह संगठन आर.एस.एस की विचारधारा को मानने वाली हो, परन्तु पिछले कुछ वर्षों के चाल-चलन से यह साफ हो गया कि आर.एस.एस विचारधारा के मानने वाले पुराने साथियों को दरकिनार करते हुए विभिन्न विचारधाराओं के लोगों का समूह बनता जा रहा है। अर्थात यदि कम शब्दों में लिखा जाए तो अब भाजपा की कोई निजी विचारधारा नहीं बची। विचारधारा के नाम पर पैसे की ताकत और सरकारी एजेंसियों से दबाव बनाकर किसी को भी भाजपा में शामिल करना और धार्मिक उन्माद के जरिये सत्ता पर बने रहना ही एक मात्र उद्देश्य रह गया है।  शोषक वर्ग और धर्म आधारित राजनीति को प्रमुखता देते हुए एक पंथी विचारधारा को मजबूत किया जाना है।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघः

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघः संघ से जुड़े इतिहासकारों का दावा है कि संघ के संस्थापक डाक्टर केशवराम बलिराम हेडगेवार एक स्वतंत्रता सेनानी थे । हेडगेवार पहले कांग्रेस से जुड़े हुए थे, बाद  में कांग्रेस छोड़कर उन्होंने 1925 में आरएसएस की स्थापना की। संघ से जुड़े इतिहासकारों की बात मानने लायक इसलिए भी नहीं कि ये 1925 के बाद का कोई प्रमाणित दस्तावेज प्रस्तूत करने में  ये लोग असफल रहें हैं। ये खूद मानते हैं कि संघ का पदाधिकारी रहते हुए कोई सदस्य किसी भी राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकता । कहने का अभिप्राय यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गिनती नगण्य के बराबर है और जो नाम ये लोग गिनाते हैं वे अप्रत्यक्ष रूप से अन्य-अन्य दलों या समूह से जूडें रहे।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बात को क्यों भूल जाती है कि संविधान में लिखी बात को ये लोग आज भी स्वीकार नहीं करते।  जन-गण-मन से लेकर तिरंगा फहराने तक में विवाद सामने आता रहा है। विनायक सावरकर जी की जेल यात्रा भी विवादों से घिरी रही ।  कभी कहते हैं कि 1920 में वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर उनकी रिहाई हो गई, तो कहीं इसके लिए महात्मा गांधी जी के नाम का उल्लेख किया जाता है।  सावरकर के बारे में सबसे बड़ी बात यह भी कही जाती है कि जब उन्हें इंग्लैंड से गिरफ्तार करके जहाज में ले जाया जा रहा था, तो वह समुद्र में कूद गए और अगले दो दिनों तक भूखे-प्यासे तैरते रहे और अंततः फ्रांस के समुद्र तट पर पहुंच गए। इसी घटना के आधार पर उन्हें वीर की उपाधि दी जाती है। लेकिन सावरकर ने अपनी आत्मकथा ‘‘मेरा आजीवन कारावास" के पेज 457 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि कई दिन तक समुद्र में तैरने की बात बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है। सावरकर ने लिखा-  एक सिपाही ने  उनसे पूछा- ‘‘आप कितने दिन और रात समुद्र में तैरते रहे थे।’’  इसमें हमने कहा- कैसे दिन-रात? बस 10 मिनट भी नहीं तैरा कि किनारा आ गया।

 

विचारधारा:

जब हम किसी विचारधारा को जन्म देते हैं तो उस विचारधारा के बीज बोये जाते हैं । चाहे वह आरएसएस की विचारधारा हो या मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा। महात्मा गांधीजी की अहिंसावादी विचारधारा हो या सुभाष चंद्र बोस की क्रांतिकारी विचारधारा। माओवाद की विचारधारा हो रूस में कम्युनिस्ट तानाशाहीवाद, इटली में फासिस्ट ताकतों की तानाशाही तो जर्मनी में हिटलर के तहत नाजी तानाशाही  भी एक विचार का जन्म देती है। सत्ता को हथियाना और  कोई क्रांति लाकर सत्ता पाना ठीक विपरीत स्थिति है। चाहे तालिबानी   विचारधारा हो या फिर आतंकवादी विचारधारा। सबके अपने गुण और दोष होते हैं।  ऐसा नहीं कि एक बार जो विचारधारा जन्म ले ले वह समाप्त नहीं होती। कालातंर वह समाप्त भी होती है तो समयानुसार उसमें परिवर्तन भी होता रहा है और नये विचार भी जनमते रहें हैं। भारत में  डा. लोहिया जी का समाजवाद इसका ताजा उदाहरण है। जनसंघ से जनता दल फिर भारतीय जनता पार्टी ने भी इस कालखंड में तीन अलग-अलग विचारधाराओं को अपनाया है। यह बताने के लिए कि जो साहित्यकार यह मानते हैं कि केजरीवाल की राजनीति को विचारधारा हीन पार्टी की संज्ञा देते हैं । यह लिखने या बोलने वाले लोगों के दिमाग की शून्यता इस बात को प्रतिपादित करते हैं। उनको केजरीवाल की विचारधारा तब तक समझ में नहीं आएगी जब तक उनके दिमाग में अन्य विचारधाराओं ने जगह बना रखी हो। बंद दरवाजे से हवा कैसे अंदर आयेगी?

 

मेक इन इंडिया बनाम मेक इंडिया नम्बर-1:

मेक इन इंडिया:

मेक इन इंडिया मोदी सरकार द्वारा भारत में बने उत्पादों के विकास, निर्माण और संयोजन के लिए कंपनियों को बनाने और प्रोत्साहित करने और विनिर्माण में समर्पित निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एक पहल है।  इसका उद्देश्य ‘‘भारत को एक वैश्विक डिजाइन और विनिर्माण निर्यात केंद्र में बदलना है।“ यानि  कि ‘मेक इन इंडिय’ का उद्देश्य भारत में बने उत्पादों के विकास और पूंजीवदी व्यवस्था को बढ़ावा देना है।  मोदी सरकार का उद्देश्य स्पष्ट तौर पर इस बात को इंगित करता है कि ‘मेक इन इंडिया देश-विदेश के चंद पूंजीपतियों को सरकारी मदद देकर उसके उत्पादों को वैश्विक लाभ देना ।  आज भारत में कुछ मोदी समर्थक उद्योगपतियों का दिन-दूनी, रात चौगुनी प्रगति भी रहस्यमय बन चुका है। वहीं ‘मेक इन इंडियाके नाम से भारत सरकार ने जो अब तक लाभार्थियों की श्रेणी तय की है इनमें -

1. विदेशी कंपनीः कोई भी विदेशी निवेशक भारत में इस प्रकार कारोबार शुरू कर सकता है।

2. भारतीय कंपनीः संयुक्त उद्यम या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी - कोई भी निवेशक कंपनी अधिनियम 2013 के अधीन प्राइवेट लिमिटेड या पब्लिक लिमिटेड कंपनी के रूप में संयुक्त उद्यम या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी में प्रवेश कर सकता है। जिसमें एक व्यक्ति कंपनी, प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पब्लिक लिमिटेड कंपनी, एकमात्र स्वामित्व, साझेदारी फर्म, सीमित देयता भागीदारी, विदेशी कंपनी शामिल है।

कहने का अर्थ है कि ‘मेक इन इंडियाका दायरा सिर्फ पूंजीपतियों के आस-पास तक सीमित है। जबकि

मेक इंडिया नम्बर-1’

मेक इंडिया नम्बर-1 का दायरा पूरे देश के विकास को कैसे आगे ले जाया जा सकता है उसे दिशा देने की बात करता है। जिसमें सर्वप्रथम जो क्षेत्र चुना गया है उसमें देश के 18 करोड़ देश के गरीब बच्चों का भविष्य निमार्ण की बात झलकती है। सरकारी स्कूलों में सुधार व शिक्षा के माध्यम से देश में गरीबों के जीवन स्थर में सुधार की बात कही गई है।

जो बेसिक परिवर्तन की बात है। भारत में जो काम आजादी के तत्काल बाद शुरू कर देना था, वह आज तक किसी भी सरकार ने नहीं सोचा । स्व. नेहरू जी ने ‘नहर योजना’, स्व. अटल जी ने ‘राष्ट्रीय राज मार्ग’ का निमार्ण तो आज केजरीवाल ने जो विजन देश को दिया है, देश के 18 करोड़ बच्चों प्रतिवर्ष अच्छी शिक्षा देकर, देश के समस्थ नागरिकों को अच्छी स्वास्थ्य सेवा, किसानों को उसके फसल की सही कीमत, उनके क्षति की भरपाई कर, मजदूर वर्ग को सम्मान देना और सुरक्षा में तैनात सैनिकों, सिपाहियों की सुरक्षा का दायित्व लेना, ना तो पूंजीवादी व्यवस्था का परिचायक है ना ही किसी वामपंथी विचारधारा का द्योतक है।

केजरीवाल की विचारधारा ना तो समाजवादी व्यवस्था को इंकार करता है ना ही वामपंथी विचारधारा को। ना ही दक्षिणपंथी विचारधारा को महत्व दे रहा है ना ही कोई असंभव बात कह रहा है।

स्वामी विवेकानंद जी को एक बार देश के तथाकथित धर्म-पंडितों ने मदद देने से यह बोलकर इंकार कर दिया कि लंदन की सड़कों पर उसे मर जाने दो। आज उनके सिद्धांतों को सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया भर में मान्यता प्राप्त है । मैं यहाँ केजरीवाल की तूलना विवेकानंद जी से नहीं कर रहा, परन्तु इससे अच्छा उदाहरण मिल भी नहीं सकता ।

छद्म राष्ट्रवाद बनाम पूंजीवादी व्यवस्था:

आज देश में केंद्र की राजनीति में दो केन्द्र बिंदु है एक वे लोग है जो छद्म राष्ट्रवाद, धर्मवाद की आढ़ में पूंजीवादी व्यवस्था को देश में थोपने में लगे हैं।  जो गरीबों के थाली में अनाज देने के बहाने उनकी थाली से अनाज को लूटने में लगी है। अच्छे दिन दिखाने के सपने दिखा कर लाखों-करोड़ों की दौलत अपने मित्रों में लूटा रही है। देश की अर्थव्यवस्था की ऐसी लूट, जिसने भ्रष्टाचार की सारी सीमाओं को मात कर दिया है।  अब तो सरकारी स्कूलों को बंद करने का भी सिलसिला शुरू कर दिया इनलोगों ने ।  ऐसी खुली लूट आजादी के 75 सालों में कभी नहीं देखी होगी किसी ने। तो दूसरी तरफ धर्मनिपेक्षता के नाम पर और गरीबी हटाओ का नारा देकर गरीबों के जीवन में कोई सुधार नहीं किया । सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया । आज इनके सारे मंत्री-संत्री धराधर बिकने लगे। देश के लोकतंत्र को इन दोनों दलों ने मिलकर संसद व विधानसभाओं को मंडी में तब्दील कर दिया है। जरूरत के अनुसार एक-दूसरे को खरीदने और बेचने लगे। क्या इसे ही विचारधारा कहा जाता है?

भारतीय राजनीति के इन दोनों दलों को कांग्रेस धर्मनिरपेक्षवादी गरीबी हटाओ विचारधारा व भाजपा की कट्टरवादी धार्मिक व पूंजीवादी व्यवस्था को जो कि आर.एस.एस विचारधारा के अधीन कार्य करती है को ही यदि विचारधारा कहा जाता है तो इस देश का दुर्भाग्य ही है। जो दल देश की आजादी की लड़ाई के पश्चात परिवारवाद से आगे नहीं निकल पर रही। जिन लोगों ने आजादी की लर्ड़ाइ में कोई भूमिका अदा नहीं की। वे राष्ट्रवाद का चौला पहनकर बुलबुल पर उड़कर रोजाना अरबों की दौलत लुटाकर जन्मदिन मना रहें हैं। आर.एस.एस की विचारधारा अपने को देश की राजनीति से अलग मानती है परन्तु इन दिनों जिस प्रकार संघ के सर-संघचालक ने केन्द्र सरकार का बचाव किया और विभिन्न राज्यों के चुनावों में इनका प्रचार करती है, इससे उनके राजनीतिक उद्देश्यों की झलक साफ दिखाई देती है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यदि सही में देश के विकास व गरीबों के उत्थान हेतु कार्य करने के प्रति सजग है तो सरकारी स्कूलों के बंद होने पर केन्द्र सरकार से सवाल कर सकती थी, लेकिन चुप है। छद्म राष्ट्रवाद की आढ़ में पूंजीवादी व्यवस्था कायम करने का दौर शुरू हो चुका है, जिसे हर हाल में रोकना ही होगा । इसके लिए सजग पत्रकारों को अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना ही होगा।

पूंजीवादी व्यवस्था और भारत की 130 करोड़ आबादी:

आज भारत में लगभग-लगभग करीब 130 करोड़ की आबादी हो चुकी है। इनमें  2 फीसदी लोग भी आयकर के दायरे में आते हैं यानि कि 98 फीसदी लोगों की आय, आयकर दायरे से बहार है यदि इसमें इजाफा भी कर दिया जाए तो यह 5 फीसदी तक ही जा पायेगा । अर्थात देश का 95 फीसदी को ऊपर उठाने की कोई कार्य योजना हमारे पास यानी की वर्तमान सरकार के पास नहीं है। हमारे पास योजना के नाम पर ‘मेक-इन-इंडिया है, जो खुद ही बोलती है कि वह 2 फीसदी लोगों के लिए ही बनी है। यानि कि जो आयकर देते हैं उनके लिए ही बनी है। जबकि ‘मेक-इन-इंडिया नम्बर.1’ देश के 98 फीसदी लोगों के जीवन स्तर में सुधार की बात करती है। अब आप ही अंदाजा लगाएं कि विचारधारा किसे कहते हैं? - लेखक शंभु चौधरी, कोलकाता । - लेखक शंभु चौधरी, कोलकाता ।

 

 

 

 

शुक्रवार, 29 मई 2015

केजरीवाल को संवैधानिक इनकांडन्टर में मरवा देगी भाजपा?

लेखक: शम्भु चौधरी
जैसे ही दिल्ली सरकार के नियंत्रण में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ईमानदारी से कार्य करना क्या आरम्भ किया मानो केंद्र की मोदी सरकार सकते में आ गई महज 15 दिनों में 500 से भी अधिक भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ गये। इधर कार्यवाही होनी शुरू ही हुई कि उधर भाजपा ने ट्रांसफर-पोस्टींग का खेल शुरू कर दिया। यह सब अब तक जो भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था उसे छुपाने के लिये और खुद व कांग्रेस के पापों को बचाने के लिये किया जाने लगा। संविधान की दुहाई दी जाने लगी। कुछ दलाल पत्रकारों को बहस के लिये सामने लाया गया। कुछ मीडिया को हायर किया गया ताकि वे केजरीवाल को बदनाम करने का सिलसिला जारी रखें।

कोलकाताः ( 30 मई ,2015) जिस प्रकार दिल्ली में आप सरकार के भ्रष्टाचार से लड़ने के एक मात्र हथियार ‘‘भ्रष्टाचार निरोधक शाखा’’ को केंद्र की भाजपा सरकार ने उसके अधिकार क्षेत्र को सिमित करने का कुप्रयास कर भ्रष्टाचारियों को बचाने में लगी है, इससे साफ प्रतीत होता है कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली में ना सिर्फ भ्रष्टाचारियों के साथ मिली हुई है इन भ्रष्टाचारी अधिकारियों को मुख्य पदों पर आसीन कर केजरीवाल सरकार को असफल और बदनाम करने कर प्रयास भी कर रही है ताकि वह किसी भी प्रकार से केजरीवाल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप जड़ सके और केजरीवाल को जेल भेज सके या उसकी राजनैतिक रूप से हत्या करवा दी जाए ताकी जनता के सामने वह भाजपा का विकल्प न बन सके। मानो संघ का नौटंकी राष्ट्रवाद संगठन एक अदने से आदमी के सामने बौना साबित होता जा रहा है। इसी लिये अब संघ चाहती है कि केंद्र की मोदी सरकार किसी भी प्रकार संवैधानिक अड़चनें पैदा कर केजरीवाल को संवैधानिक इनकांडन्टर में मरवा दिया जाए?

कहावत है चोर को बचाने वाला भी चोर होता है। उच्चतम न्यायालय के पास एक चोर ने इस आशा के साथ फरियाद की है कि उसको इस कार्य में साथ देने वाले सभी भ्रष्टाचारी साथी बच जाए। माननीय न्यायालय को रूख स्पष्ट करना होगा कि वह भ्रष्टाचार के मामले में देश कि अदालतों से क्या अपेक्षा रखती है? सवाल यह नहीं उठता कि किस सरकारी एजेंसी ने किस भ्रष्टाचारी को पकड़ा। सवाल यह उठता है कि क्या हम इन भ्रष्टाचारियों को इसी प्रकार बचाने का प्रयास करते रहेंगें? यदि कोई व्यक्ति किसी भ्रष्टाचारी को पकड़वता है तो वह पहले यह पता लगाये कि ईमानदार अधिकारी कौन है?

जैसे ही दिल्ली सरकार के नियंत्रण में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ईमानदारी से कार्य करना क्या आरम्भ किया मानो केंद्र की मोदी सरकार सकते में आ गई महज 15 दिनों में 500 से भी अधिक भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ गये। इधर कार्यवाही होनी शुरू ही हुई कि उधर भाजपा ने ट्रांसफर-पोस्टींग का खेल शुरू कर दिया। यह सब अब तक जो भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था उसे छुपाने के लिये और खुद व कांग्रेस के पापों को बचाने के लिये किया जाने लगा। संविधान की दुहाई दी जाने लगी। कुछ दलाल पत्रकारों को बहस के लिये सामने लाया गया। कुछ मीडिया को हायर किया गया ताकि वे केजरीवाल को बदनाम करने का सिलसिला जारी रखें।

महज चंद दिनों में दिल्ली पुलिस के 100 से भी अधिक सिपाही घुस लेते, गरीब जनता को लुटते पकड़े गये। मानो दिल्ली में लुट का यह व्यवसाय राजनैतिक आकाओं की कमाई का बहुत बड़ा स्त्रोत था जिसे केजरीवाल की ‘आप’ सरकार ने आते ही बंद कर दिया।

आज हमें सोचना होगा कि क्या हम इसी प्रकार भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ेगें कि इसे समाप्त करने के लिये एक स्वर में ‘केजरीवाल’ का साथ देगें? जिस आनन-फानन में केंद्र की भाजपा सरकार ने 21 मई 2015 को एक नोटीफिकेसन जारी कर खुद के पापों को जायज़ ठहराने को प्रयास किया और भ्रष्टाचार से लड़ने के केजरीवाल सरकार के मनसुबे पर पानी फेरने का प्रयास किया, माननीय उच्चतम और दिल्ली उच्च न्यायालय को चाहिये कि वे भ्रष्टाचार के मामले में कोई समझौता ना करें।

- जयहिन्द!

मंगलवार, 31 मार्च 2015

आतंकवादी पत्रकारिता ?

कोलकाताः 1’अप्रेल,2015, लेखक- शम्भु चौधरी

ये पत्रकार दिन-रात पूरे देश की गंदगी को पाठकों के मानस पटल पर अपनी थोपी गई विकलांग मानसिकता से एक साजिश के तहत हमें परोसनेवाली पत्रकारिता खुद को लोकतंत्र की प्रहरी मानती है परन्तु इसके कार्य तो समाज में गंदगी फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं रह गया। विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर रोज़ाना ये पत्रकार इतने गुनाह करतें हैं कि इनके गुनाह पर बोलनेवाले वाले भी उस समय चुप हो जातें हैं जब ये पत्रकार एक साथ उस व्यक्ति पर धावा बोल उसे इतना घायल कर देते हैं कि वह खुद को समाज का अपराधी समझने लगता है। दरअसल भारत में पत्रकारिता अब विचारप्रधान ना रहकर हमला प्रधान बन गई है।

नईदिल्ली/कोलकाताः (1’अप्रेल,2015) गत् 28’ मार्च 2015 को ‘आप’ की राष्ट्रीय परिषद की बैठक बहुमत प्रस्ताव से श्री प्रशांत भूषण, श्री योगेन्द्र यादव, प्रो. आनन्द कुमार और श्री अजित झा को क्या हटाया गया जैसे पूरे हिन्दूस्तान के राजनीति दलों द्वारा पोषित पत्रकार व मीडिया समूह, व शिवसेना की थूकचाटू पत्रिका ‘सामना’ सबके सब केजरीवाल पर ऐसे पिल गये जैसे कोई बहुत बड़ा जूल्म हो गया। मानो शिवसेना में कभी विभाजन ही ना हुआ हो। भाजपा, कांग्रेस या माकपा में कभी वगावत के स्वरों को दबाया ही ना गया हो। इन राजनीति दलों में किसी व्यक्ति को पार्टी विरोधी कार्याें के लिये दंडित ही ना किया गया हो? इनकी पार्टी में तो लोकतंत्र बचा है और कल कि जन्मी पार्टी के लोकतंत्र को बचाने की चिन्ता इनको ऐसे हो गई जैसे किसी अकेले व्यक्ति ने इनके राजनीति विचारधाराओं पर हमला कर दिया हो।

ऐसे लगता है जैसे भारत के लोकतंत्र की रक्षा का लाइसेंस सिर्फ इनके पास ही हो और केजरीवाल इस लाइसेंस को भी हथिया लेना चाहता है। जो माकपा खुद को मजदूरों कर पार्टी बताती रही, देश और विश्व की आर्थिक स्थिति पर इनके पास कोई विचारधारा नहीं कि जिन मज़दूरों के अधिकार की लड़ाई वे (माकपा, भाकपा) लड़ना चाहतें हैं उन्हें रोजगार कैसे प्रदान किया जा सकेगा।

बंगाल में 35 सालों से सत्ता पे काबिज रही माकपा के शासनकाल में 60 हजार से अधिक छोटे-बड़े कल-कारखाने बंद हो गये। सैकड़ों मज़दूरों ने माकपा के लाल डंडे को ढोते-ढोते अपनी जान दे दी। उनके बच्चों ने आत्महत्या कर ली । पर इनके पोषित पत्रकारों ने ज़ुबान तक नहीं खोली की यह गलत हो रहा है। जिन राजनैतिक विचारें के सिद्धांत 320 कमरे के आलीशान महल से बनता है वे लोग मजदूरों की, किसानों के हक की बात करतें हैं। जो लेखक आजतक सोना पैदा करने वाले किसानों का मरता देखता रहा। जो पत्रकार बैंकों के ‘एनपीए’ के नाम पर बैंकों की लाखों -करोंडों की लूट को दिनदहाड़े औद्योगिक जगत द्वारा सरेआम लूटते देखते रहे वे पत्रकार केजरीवाल के ‘स्वराज’ पर ऐसे हमला कर रहें है कि जैसे इनके खूनपसिने की कमाई को केजरीवाल लूटा देगा?

सवाल उठता है केजरीवाल की तुलना आज इंदिरागांधी के एमेरजेंसी जैसी हालात से करने की नौबत इन पत्रकारों को क्यों आन पड़ी? क्या इनके पास दूसरे उदाहरण की कमी पड़ गई थी? या जानबुझ कर देश को भ्रमित करना चाहतें हैं कि केजरीवाल किसी निरंकुश शासक की तरह बन गया है। वो भी उस सत्ता की कमान पाने के बाद जिस सत्ता के पांच पति है। ये पत्रकार दिन-रात पूरे देश की गंदगी को पाठकों के मानस पटल पर अपनी थोपी गई विकलांग मानसिकता से एक साजिश के तहत हमें परोसनेवाली पत्रकारिता खुद को लोकतंत्र की प्रहरी मानती है परन्तु इसके कार्य तो समाज में गंदगी फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं रह गया। विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर रोज़ाना ये पत्रकार इतने गुनाह करतें हैं कि इनके गुनाह पर बोलनेवाले वाले भी उस समय चुप हो जातें हैं जब ये पत्रकार एक साथ उस व्यक्ति पर धावा बोल उसे इतना घायल कर देते हैं कि वह खुद को समाज का अपराधी समझने लगता है। दरअसल भारत में पत्रकारिता अब विचारप्रधान ना रहकर हमला प्रधान बन गई है। अतः अब इस पत्रकारिता को आतंकवादी पत्रकारिता का नाम दिया जा सकता है।


शनिवार, 28 मार्च 2015

आप’का लोकतंत्र? लेखक: शम्भु चौधरी

कोलकाताः 28 मार्च 2015, लेखक- शम्भु चौधरी

श्री प्रशांत भूषण जी यह भी चाहते थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित की जा सके इसके लिये इन तथाकथित आप’ के नेताओं ने संघ से सांठगांठ कर ली आवाम के बहाने पार्टी पर राजनीति हमला करना और भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती किरणवेदी की प्रशंसा कर केजरीवाल को हर कदम पर नीचा दिखाने की गंदी राजनीति करते रहे। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है?

नईदिल्ली/कोलकाताः (28’ मार्च 2015) ‘आप’ की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में वही हुआ जो लगभग जो पहले से तय था। आम आदमी पार्टी के तीन वरिष्ठ नेता सहित चार सदस्यों को राष्ट्रीय से बहार का रास्ता दिखा दिया गया। एक शायर की कि एक शायरी है- बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। आज की हुई आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने बहुमत प्रस्ताव से श्री प्रशांत भूषण, श्री योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और श्री अजित झा को पार्टी में बगावत करने और पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में हराने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए इन चारों नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निष्कासित कर दिया। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पीएसी से पहले ही निकाला जा चुका था।

बैठक से निकलकर श्री योग्रेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि लोकतंत्र की हत्या हो गई। सवाल उठता है कि योगेंद्र जी किसे लोकतंत्र मानते हैं। जो उनके समर्थन में खड़े थे या वे जिसे अरविंद केजरीवाल फूटी आंखों नहीं सुहाते? उसे? राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अलग-थलग पड़े इन नेताओं ने बैठक के दौरान सिवा आरोप लगाने और अपने चंद समर्थकों के लेकर धरने में बैठने के अलावा सिर्फ इतना ही किया कि पूरी देश को यह बता दिया कि हम कितने जिम्मेदार नेता हैं।

जो प्रशांत जी कहते हैं कि उनको राजनीति नहीं आती वे कमरे के भीतर से लगातार केजरीवाल के खिलाफ साज़िश पे साज़िश रचने में लगे थे। विभिन्न प्रांतों के अपने प्रभाव में आने वाली तमाम ताकतों को पार्टी को बदनाम करने की रणनीति बनाने में जुटे थे। इसे क्या कहते हैं?

यह बात उसी समय तय हो गई थी जब दिल्ली में श्री केजरीवाल ने 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर जीत दर्जकर सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि वे 5 साल सिर्फ दिल्ली की जनता से किये वादों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करगें। इसी बात से बौखलाये श्री योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जी ने सवाल उठाने शुरू कर दिये कि दिल्ली का चुनाव ‘‘5 साल केजरीवाल ’’ के नारे से क्यों लड़ा गया? श्री प्रशांत भूषण जी यह भी चाहते थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित की जा सके इसके लिये इन तथाकथित आप’ के नेताओं ने संघ से सांठगांठ कर ली आवाम के बहाने पार्टी पर राजनीति हमला करना और भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती किरणवेदी की प्रशंसा कर केजरीवाल को हर कदम पर नीचा दिखाने की गंदी राजनीति करते रहे। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है? जो प्रशांत जी कहते हैं कि वे एक स्वस्थ्य राजनीति विकल्प के लिये ‘आम आदमी पार्टी’ में आये थे तो ये ओछी हरकत क्यों? इन सब सवालों का जबाब इन्हें देना ही पड़ेगा। जयहिन्द!

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

आप’की ऐतिहासिक जीत

लेखक: शम्भु चौधरी
10 तारीख के दिन 11.00 बजते-बजते ‘‘5 साल केजरीवाल’’ के नारे से दिल्ली गुंज उठा। एक के बाद एक भाजपा के उम्मीदवार मैदान में धूल चाटते नजर आये। जैसे ही चुनाव परिणाम 'आम आदमी' के पक्ष में आने लगे तो लगा कि किसी तरह 40 तक पंहुच जायेगा। जब 35...36.. 40.. के बाद अचानक 50..51.. पर विजयी होने के आंकड़े आने लगे तो कई लोगों के नीचे की जमीन घिसकने लगी। भाजपा दलाल सटोरियों ने अपने मोबाईल को स्वीचआॅफ कर दिये।

कोलकाताः (10 फरवरी 2015) दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम ईपीएम मेशीन से ज्यूं-ज्यूं बहार आने लगे, कई मीडिया हाउस जो झूटे ही भाजपा को शुरू में बढ़त दिखाने का ढोंग रचते रहे दिन सुबह के 10 बजते-बजते उनकी जुबान लड़खराने लगी और ईपीएम मेशीन से निकल के आंकड़े बोलने लगे। कलतक जो लोग ‘आम आदमी पार्टी’ के दफ्तर में ताला लगाने की बात बोलते थकते नहीं थे। लोकतंत्र की ताकत ने उनके जुबान पर ऐसा ताला जड़ दिया कि पांच साल तक रह-रहकर सरकार को ब्लैकमेल भी नहीं पायेगें।। मेरी रचना -

जल जायेगी धरती जब, सत्ता के गलियारों में, भड़क उठेगी ज्वाला तब, नन्हे से पहरेदारों में।

दिल्ली के चुनाव में आम आदमी की जीत ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में अहंकार की कोई जगह नहीं है। आम आदमी पार्टी की सफलता ‘जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये’ भारत के संविधान में सत्य को साकार कर दिया। भाजपा के नाकारात्मक प्रचार, धन की बर्वादी, अर्मादित और असभ्य भाषा का प्रयोग, 200 से अधिक सांसदों, कई केन्द्रीय मंत्री, प्रधानमंत्री स्वयं, भाजपा के अध्यक्ष की पूरी ताकत, संध परिवार, कई राज्यों के मंत्री-मुख्यमंत्री सबके-सब एक परिंदे के सामने धूल चाटते नजर आये।

मोदी जी ने लोकसभा चुनाव जीतने के लिये जिन जुमले का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से वेदखल किया था, उन्हीं जुमलों ने मोदीजी के अश्वमेध विजयी घोड़े को दिल्ली में रोक दिया। जिस विजयी यात्रा ने भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह सह प्रधानमंत्री श्री मोदीजी को अहंकारी बना दिया था, यही अहंकार भाजपा को दिल्ली में डूबा दिया। भाजपा और संघ की केडर बेस ताकत, किरण बेदी का मास्टर स्ट्रोक, चपलुस मीडिया का एक वर्ग, नाकारात्मक विज्ञापनों की झड़ी ये सब प्रहार केजरीवाल के मजबूत इरादों के सामने पानी भरते नजर आये। केजरीवाल के एक-एक शब्द इनलोगों पर भारी पड़ने लगे। त्रिकोणात्मक संर्घष में किसी एक राजनीति दल को 54.2 प्रतिशत मतों का मिलना भारत के चुनावी इतिहास अबतक सभी आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया।

10 तारिख के दिन 11.00 बजते-बजते ‘‘5 साल केजरीवाल’’ के नारे से दिल्ली गुंज उठा। एक के बाद एक भाजपा के उम्मीदवार मैदान में धूल चाटते नजर आये। जैसे ही चुनाव परिणाम 'आम आदमी' के पक्ष में आने लगे तो लगा कि किसी तरह 40 तक पंहुच जायेगा। जब 35...36.. 40.. के बाद अचानक 50..51.. पर विजयी होने के आंकड़े आने लगे तो कई लोगों के नीचे की जमीन घिसकने लगी। भाजपा दलाल सटोरियों ने अपने मोबाईल को स्वीचआॅफ कर दिये। परिणाम देखते-देखते कई लोगों की सांसे फूलने लगी। अबतक कांग्रेस पार्टी मैदान से बहार हो चुकी थी। तभी चुनाव आयोग की तरफ से एक सूचना आई कि ‘आम आदमी पार्टी’ को 54.2 प्रतिशत मिले हैं। तबतक रूझान अपने अंतिम चरण की तरफ कदम रख चुका था। आम आदमी -61, भाजपा-9, कांग्रेस - 0, और अन्य -0 । सभी की सांसें थम सी गई थी। आम आदमी पार्टी के दफ्तर में जश्न को माहौल था, भाजपा कार्यलय के बहार हल्की चहल-पहल थी और कांग्रेस के कार्यालय के बहार सन्नाटा छाया हुआ था। अंतिम चरण में मुकाबला एक तरफा हो गया था। ‘आप-65’ , ‘भाजपा -5’ ...आप-66, भाजपा-4 समाचार आया किरण बेदी चुनाव हार गई। अंतिम परिणाम ‘आप-67’ और ‘भाजपा-3’ केजरीवाल अपने मित्रों व धर्मपत्नी के साथ जनता के सामने आते हैं कहते हैं - यह आप‘की’ जीत है।

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

हिन्दू ‘भाजपा’ के बंधवा वोटर? -शम्भु चौधरी

बुखारी साब के समर्थन को ठुकरातेे हुए ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने जो साहासिक कदम उठाया यह भारत की राजनीति के लिये एक सबक है। चुनाव परिणाम में इसका क्या प्रभाव होगा यह अलग बात है लेकिन यह जरूर है ‘आप’ ने भारतीय राजनेताओं को दर्पण दिखा दिया है कि मजबूत ईरादे से यदि चुनाव लड़ा जाये तो सांप्रदायिक ताकतों को तमाचा जड़ा जा सकता है।

कोलकाताः (08 फरवरी 2015) दिल्ली विधानसभा का चुनाव प्रचार कल शाम थम गया परन्तु चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर धर्म की राजनीति करने वाले नकाबपोश चेहरे सामने आ गये। ऐसा प्रायः हर चुनाव के समय होता है। राजनैतिक ताकतें भी अपने फायदे की बात सोच उन बयानों का लाभ लेने में लग जाती है। विश्वनाथ प्रताप सिंह के दौर से कई फिरकाफरस्ती ताकतें अमूमन हर चुनाव के वक्त इस तरह के बयानबाजी करतें हैं और जनता के मतों के ठेकेदार बनकर राजनीति दलों को अपने फायदे के लिये इस्तमाल करती रही हैं।

दिल्ली के इस चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। भाजपा को जहाँ डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम का समर्थन मिला जिसमें उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में 10 लाख सिख उनके समर्थक हैं। 'भाजपा' ने इसे स्वीकार कर लिया तो दूसरी तरफ दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी साब एक अपील जारी कर कहे कि ‘‘मुसलमान ‘आप’ को वोट दें’’। जबकि ‘आप’ ने इस तरह के समर्थन को ठुकराते हुए कहा कि उन्हें आम लोगों का समर्थन चाहिये धर्म-जाति के आधार पर सर्मथन देने वालों से उन्हें समर्थन नहीं चाहिये। ‘आप’ ने इसे अवसरवाद की राजनीति करार दिया।

‘आप’ के इस निर्णय से चुनाव के वक्त शाही इमाम बुखारी साब के दरबार पर घुटने टेकने वाले भारत की तमाम राजनीति दलों को मानो सांप सूंघ गया कि ‘आप’ की यह कैसी राजनीति? सामने आयी हुई थाली को ठुकरा दिया जबकि दूसरी तरफ ‘आप’ पर सांप्रदायिकता की राजनीति का आरोप लगाने वाली भाजपा के प्रवक्ता ने हिन्दुओं को भड़काने का बयान देकर कहा कि ‘‘इस फतवे के खिलाफ हिन्दू एकतरफा मतदान करें’’ भाजपा हमेशा से ही धर्म को चुनाव जीतने का एक हथकंडा मानती रही है। वहीं 'आप' ने एक नई लकीर खींच दी और धर्म को एक किनारे करते हुए आम लोगों की समस्या को अधिक महत्व दिया।

दूसरे पर सांप्रदायिकता का आरोप जड़नेवाली भाजपा भीतर से कितनी जहरीली है कि इसका इस बात से ही पता चलता है कि एक तरफ वह जब खुद धर्म के आधार पर किसी का समर्थन लेती है या बयानबाजी करती है तो उसे उसमें इसे सांप्रदायिकता की ‘बू’ नहीं झलकती। वहीं कोई दूसरे सांप्रदाय के लोग खासकर मुसलमान समाज के बयान पर तिलमिला जाती है। भाजपा को मुसलमान समर्थन दे तो वह तो वह भारतीय नहीं तो पाकिस्तानी? कलतक जिस बंगलादेशी को लेकर भाजपा सांप की तरह फुफकार मारती नहीं थकती थी आज ये सारे मुद्दे कहां चले गये?

बुखारी साब के समर्थन को ठुकरातेे हुए ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने जो साहासिक कदम उठाया यह भारत की राजनीति के लिये एक सबक है। चुनाव परिणाम में इसका क्या प्रभाव होगा यह अलग बात है लेकिन यह जरूर है ‘आप’ ने भारतीय राजनेताओं को दर्पण दिखा दिया है कि मजबूत ईरादे से यदि चुनाव लड़ा जाये तो सांप्रदायिक ताकतों को तमाचा जड़ा जा सकता है।

दिल्ली के चुनाव में इमाम बुखारी के प्रस्वात को ठुकरा देने के पश्चात भी मसलमानों ने बड़ी संख्या में ‘आप’ के पक्ष में मतदान किया वहीं भाजपा के हुक्म को किनारे करते हुए हिन्दुओं ने भी यह स्वीकार किया की ‘केजरीवाल’ की राजनीति में कुछ तो नया जरूर है। जो भाजपा हिन्दुओं को अपना बंधवा वोटर समझती है उसके इस भ्रम को भी चकनाचुर कर दिया दिल्ली की जनता ने। जयहिन्द!

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

स्वच्छ भारत का निर्माण -शम्भु चौधरी

यह लड़ाई अकेले ‘केजरीवाल’ की नहीं है। आम आदमी यही चाहता है कि भारत की राजनीति में अच्छे लोग आयें। भले ही वह किसी भी दल से क्यों न जूड़ा हो। राजनीति के इस गंदे प्रदुषित वातावरण में 'आम आदमी पार्टी' का छोटा सा प्रयास है कितना कारगार सिद्ध हुआ हम और आप इस बात से ही अंदाज लगा लें कि दिल्ली चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर कांग्रेस और भाजपा को साफ छवि के चेहरे को जनता के सामने रखना पड़ा। चुनाव में हार-जीत होती रहेगी। राजनीति को स्वच्छ बनाकर ही हम ‘‘स्वच्छ भारत का निर्माण’’ कर सकतें हैं।
कोलकाताः (05 फरवरी 2015) आज दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरम पर है। शाम पांच बजे से चुनाव प्रचार पर विराम लग जायेगा। इसके साथ ही विराम लग जायेगा भारत में गंदी राजनीति करने वाले उन मुनसबों पर जो पिछले 10 दिनों से दिल्ली में नाकारात्मक प्रचार में लगे हुए थे। विराम लग जायेगा जिनके हाथ किचड़ में सने थे उन पर, विराम लग जायेगा जो किचड़ में पैदा होते हैं। देश के कुछ के युवाओं का एक छोटा सा सपना पुनः जीवित हो उठेगा जिसे कुचलने के लिये भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झौंक दी थी। चुनाव आयोग ने अपनी टिप्पणी पर राजनैतिक नेताओं की इस वयानबाजी पर काफी असंतोष व्यक्त किया है। हमें चुनाव आयोग की इस टिप्पणी को काफी गंभीरता से लेने की जरूरत है।
यह चुनाव भारत की राजनीति का एक आईना माना जायेगा। जिस मोदीजी को चंद दिनों पहले ही इसी जनता ने सर का ताज बनाया था, आज उसी जनता ने इनके घंमड को चकनाचूर करके रख दिया। एक चिराग को बुझाने के लिये ‘भाजपा’ ने क्या-क्या पापड़ नहीं सैंके। बल्की यह लिखा जाए कि क्या नहीं बेलन नहीं बेले। भारतीय संस्कृति की बात करने वाली ‘भाजपा’ ने व्यक्तिगत-जातिगत हमले तक करने से परहेज नहीं किया। चुनाव नहीं जैसे मोदीजी की ‘‘मूंछ की लड़ाई’’ हो गई। भाजपा मैदान से गौन हो चुकी थी।
‘स्वच्छ भारत अभियान’ के नाम पर सिर्फ सड़कों की गंदगी को दूर करने का ढोंग करने वाले मोदीजी ने दिल्ली के इस चुनाव नाकारात्मक विज्ञापनों भरमार कर दी। जो लोकतंत्र में किसी भी रूप में स्वीकार नहीं हो सकता। आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र में जरूरी है। लेकिन नाकारात्मक प्रचार और व्यक्तिगत-जातिगत हमले को जनता किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। आज लगता है आदरणीय श्री अटल जी के इस कथन को कि ‘‘किचड़ में फूल खिलेगा’’ का मायने को ही मोदीजी ने बदल डाला। दिल्ली के चुनाव में भाजपा खासकर मोदीजी के इस व्यवहार से देश को बड़ी निराशा ही हाथ लगी है। दिल्ली के चुनाव में देश की जनता ने यह देख लिया कि भाजपा के नेताओं में ठीक वैसा ही घंमड झलकने लगा जो कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस के नेताओं में देखा जा सकता था।
मोदीजी के सपने का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से कुछ हटकर केजरीवाल के ‘स्वच्छ भारत निर्माण’ पर लोगों ने अपनी मोहर लगा दी। मोदीजी सड़कों की गंदगी साफ करने की बात करतें हैं वहीं केजरीवाल जी कहते हैं ‘‘भारत को अच्छा माहौल देना है तो अच्छे लोगों को इस गंदी राजनीति के अंदर आना होगा, तभी हम इस गंदगी को दूर कर पायेगें। आज जब हम किसी युवा से राजनीति की बात करतें तो उसका सीधा सा जबाब होता है - ‘‘राजनीति बहुत गंदी है’’ हमारे अंदर भी यही भावना भरी हुई थी। लेकिन अन्नाजी के आंदोलन के दौरान हमने महसूस किया कि कहीं से तो हमें इसे साफ करने की शुरूआत करनी ही होगी। यह लड़ाई अकेले की नहीं है। हम सबकी है। किरण जी का राजनीति में आना भी ‘‘बूराई पर अच्छाई’’ की एक जीत मानता हूँ। उनका स्वागत करता हूँ। वह मेरी बड़ी बहन है। कोई भी व्यक्ति साफ-सुथरे छवि का चेहरा अपनी इच्छानुसार किसी भी राजनीति दल का सदस्य बने इसमें कोई अड़चन नहीं। हमें युवाओं के अंदर व्याप्त इस हीन भावना को दूर करना होगा कि ‘‘राजनीति बहुत गंदी है’’ राजनीति बहुत अच्छी है। इसे चंदलोगों ने गंदा बना डाला है।’’
यह लड़ाई अकेले ‘केजरीवाल’ की नहीं है। आम आदमी यही चाहता है कि भारत की राजनीति में अच्छे लोग आयें। भले ही वह किसी भी दल से क्यों न जूड़ा हो। राजनीति के इस गंदे प्रदुषित वातावरण में 'आम आदमी पार्टी' का छोटा सा प्रयास है कितना कारगार सिद्ध हुआ हम और आप इस बात से ही अंदाज लगा लें कि दिल्ली चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर कांग्रेस और भाजपा को साफ छवि के चेहरे को जनता के सामने रखना पड़ा। चुनाव में हार-जीत होती रहेगी। राजनीति को स्वच्छ बनाकर ही हम ‘‘स्वच्छ भारत का निर्माण’’ कर सकतें हैं। जयहिन्द! वंदे मातरम्

गुरुवार, 6 मार्च 2014

‘आप’ फूंक-फूंक कर चले।

यह लड़ाई अंग्रेजों से लड़ने की नहीं, कि देश की जनता भावनात्मक रूप से ‘आप’ के साथ हो जायेगी। यह लड़ाई उस व्यवस्था से जो हमारे जीवन का अंग बन चुकी है। इस भ्रष्ट व्यवस्था में हर किसी का स्वार्थ छुपा हुआ है। चाहे वह पत्रकार हो या संपादक, सिपाही हो या ऑफिसर,  मंत्री हो या चपरासी। चेन की तरह सबके सब इस व्यवस्था के हिस्सेदार बन चुकें हैं। 
कोलकाताः (दिनांक 06 मार्च 2014) 
कल गुजरात के राधनपुर में आम आदमी पार्टी के संयोजक श्री अरविंद केजरीवाल के साथ जो कुछ भी घटा और तुरन्त उसके बाद दिल्ली भाजपा कार्यालय के बाहर जो कुछ भी हुआ, उसकी नाकारात्मक प्रतिक्रिया स्वभाविक थी। कुछ निर्णय ‘आप’ के आंदोलन को कमजोर करने में काफी महत्वपूण रहें हैं जिसमें 1. खड़की एक्सटेनशन में आधी रात को बिना वारण्ट के छापा मारना, मुख्यमंत्री के रूप मे केजरीवालजी का धरना और कल का दिल्ली और लखनऊ में ‘आप’ का कदम। 
‘आप’ को समझना होगा कि देश की जनता ‘आप’ के हर कदम पर नजर रखे हुए है। कांग्रेस और भाजपा के पापों से देश को मुक्त कराने के लिये जनता में अजीब सी छटपटाहट है। जबकी भाजपा और कांग्रेस हर उस ताकत (सरकारी तंत्र) का प्रयोग ‘आप’ को कुचलने के लिये करना चाहेगी जिससे ‘आप’ की शक्ति क्षीण हो।
इन दिनों जिसप्रकार मोदी के उग्रवादी समर्थक सिर्फ ‘आप’ और केजरीवाल को तारगेट करने में लगें हैं इससे साफ हो जाता है कि भाजपा को कांग्रेस से कम, ‘आप’ से अधिक खतरा है। 
इसीलिये मुम्बई में नितीन गडकरीजी, राज ठाकरे को मनाने में जूटें हैं कि कहीं दिल्ली जैसा हाल इनका महाराष्ट्र में भी ना हो जाय। भाजपा (मोदी ग्रुप) का सारा अंकगणित ‘आप’ खराब कर सकती है। इस बात का इनको आभास हो चुका है। इसलिय भाजपा उस हर कदम का राजनीति लाभ लेने का प्रयास करेगी जिससे ‘आप’ की लहर को नूकशान  हो। ‘आप’ को इन सब बातों पर ध्यान देने की जरूरत है।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ‘आप’ भ्रष्टमुक्त व्यवस्था लाने के लिये सबसे दुश्मनी मोल लेता जा रहा है। ऐसे में कोई भी ऐसी व्यवस्था जो अधिकांशतः भ्रष्टाचार में लिप्त है वह हर उस अवसर के तलाश में है जिससे ‘आप’ को ना सिर्फ राजनीति रूप से क्षति पंहुचा सके। तमाम सरकारी दस्तावेजों में भी अदालत को भी गुमराह कर सके। कहाँ-कहाँ, और किस-किस को सफाई देते फिरेगें ‘आप’? 
यह लड़ाई अंग्रेजों से लड़ने की नहीं, कि देश की जनता भावनात्मक रूप से ‘आप’ के साथ हो जायेगी। यह लड़ाई उस व्यवस्था से जो हमारे जीवन का अंग बन चुकी है। इस भ्रष्ट व्यवस्था में हर किसी का स्वार्थ छुपा हुआ है। चाहे वह पत्रकार हो या संपादक, सिपाही हो या ऑफिसर,  मंत्री हो या चपरासी। चेन की तरह सबके सब इस व्यवस्था के हिस्सेदार बन चुकें हैं। 
संविधान इनके हाथों में कैद हैं। सरकारी तंत्र को पूरी तरह से इन अपराधियों ने कब्जे में कर रखा है। सबको एक साथ ललकार नहीं जा सकता। अभी सिर्फ सत्ता के दलालों को ही ललकारना सही रहेगा। बाकी सभी व्यवस्था को साथ लेना होगा। भले ही वह गलत ही क्यों न हो। जयहिन्द!!  - शम्भु चौधरी
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