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रविवार, 23 अक्टूबर 2022

गुजरात चुनाव-2022 -शंभु चौधरी

 गुजरात चुनाव-2022 -शंभु चौधरी


आगामी माह  गुजरात हिमाचल प्रदेश  की विधान सभाओं के चुनाव होने जा रहें हैं। इस बार के चुनाव में इन दोनों राज्यों में चुनाव त्रिकोणीय  होने  संभावना प्रवल बनती जा रही है। मेरे इस लेख को गुजरात चुनाव तक केंद्रित कर लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।  जैसा कि आप सभी जानते हैं कि बंगाल में वामपंथी  दलों को शासन 35 साल चलां, लोगों को लगता था कि इनकी जड़ें इतनी मजबूत है कि इसे बंगाल से उखाड़ फैंकना नामुमकिन ही नहीं असंभव भी प्रतित होता है। इसके बावजूद ममता के नये संगठन ने उसे मिट्टी में मिला दिया। आज बंगाल में वामपंथियों को राजनीतिक रूप से नई जमीन तलाशनी पड़ रही है।

वामपंथियों की तरह ही गुजरात में भी पिछले 27 सालों से मोदी समूह (भाजपा) का एक छत्र राज्य कायम है। पिछले चुनाव में कांग्रस पार्टी ने पाटीदारों के वोट शेयर प्राप्त करने के बाद भी भाजपा से पिछड़ गई और कांग्रेस पार्टी के कुछ विधायक साबीआई के खौफ से डर कर भाजपा में चले गए।  आज इस बात को लिखने में जरा भी हिचक नहीं, भाजपा पार्टी लोकतांत्रिक तरीके से ना तो चुनाव लड़ रही है ना ही लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता प्राप्त कर रही है। जिसके कई उदाहरण हमारे सामने है। विधायकों को तौड़ना, उन्हें विभिन्न एजेंसियों से धमका कर खरीदना, जिस दल के साथ समझौता करती है उसे तौड़ना, उसके संगठन को कमजोर करना और अपनी सत्ता की भूख मिटाना इस राजनीति दल का उद्देश्य बन चुका है। बिहार व महाराष्ट्र इसके ताजा उदाहरण है। दिल्ली व पंजाब में भी इसकी कोशिश की गई थी तो सफल नहीं हो सकी ।

गुजरात विधानसभा की 182 सीटों का चुनाव अगले माह होने जा रहा है यदि मोदी जी के गुजरात में या गुजरात चुनाव के संदर्भ में दिये गऐ ताजा बयानों का ही जिक्र करें तो उनके अनुसार गुजरात में कोई बाहरी ताकतें रेवड़ी बांट कर राज्य की अर्थव्यवस्था को चौपट कर देगी । इस बयान को गुजरात की जनसंख्या पर नजर डाल के देखतें हैं तो मैं पाता हूँ कि गुजरात में 90 प्रतिशत आबादी जिसमें ओबीसी 48 प्रतिशत, आदिवासी समाज 14.75 प्रतिशत, पाटीदार समाज 11 प्रतिशत,  दलित समाज 7 प्रतिशत, मुस्लीम समाज 9 प्रतिशत है । शेष 10.25 प्रतिशत  में  क्षत्रिय, ब्राह्मण समाज, व बनिया वर्ग के अलाव संपन्न वर्ग के लोग आते हैं।  यदि इन मतदाताओं को आर्थिक रूप से बांट दिया जाय तो गुजरात में 70 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के अंदर गुजर-बसर करती है। वहीं 20 से 25 प्रतिशत मतदाता मध्यम श्रेणी और शेष 5 प्रतिशत उच्च वर्ग में आतें हैं। उच्च वर्ग को तेल व गैस के दाम प्रभावित नहीं करते ना ही उनके घरों में होने वाली बिजली के बिल से उन्हें कुछ भी फर्क पड़ता है। इनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। इन्हें अच्छी चिकित्सा भी प्राप्त है। जबकि मध्यम वर्ग का एक तबका इससे प्रभावित होते हुऐ भी मोदी जी के हिन्दूवादी कार्ड का शिकार बन चुका है। मोदी के गुजरात मॉडल में शेष 70 प्रतिशत लोगों के लिए कोई सुविधा पिछले 27 सालों से मोदी की भाजपा सरकार ने नहीं दी, ऊपर से उनकी आमदनी कम कर दी गई, नौकरी से निकाल दिए गए या इनकी आय इतनी नहीं कि किसी भी प्रकार से परिवार का दैनिक खर्च वहन कर सके।

यह असंतोष पिछले चुनाव में साफ देखा जा रहा था। अब इन पांच सालों में स्थिति और खराब ही हुई है। इस बार के 15वीं विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी जिसका चुनाव चिन्ह झाड़ू है, ने गुजरात चुनाव में नये रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज की है। शुरूआती दौर में तो लगता था कि आम आदमी पार्टी की स्थिति सामान्य राजनीतिक दलों की तरह है जो चुनाव के समय सक्रिय दिखती है और चुनाव के बाद उस दल का कोई अता-पता नहीं होता। परन्तु आम आदमी पार्टी  ने जिस प्रकार पंजाब में जमी-जमाई राजनीतिक पार्टियों का सुपड़ा साफ कर दिया, दिल्ली में मोदी के प्रचंड बहुमत को घूल चटा दी, से लगता है गुजरात में इसबार के विधानसभा चुनाव में  कुछ नया हो सकता है। विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों की बात से यह तो अंदाज हो चुका कि गुजरात में एक तरफ कांग्रेस के मत प्रतिशत में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है वहीं आम आदमी पार्टी, भाजपा के वोट बैंक में भी सेंध लगाती सफल दिख रही है। जिस रफ्तार से आम आदमी पार्टी गुजरात की पहली पसंद होती जा रही है इससे मोदी के खेमें में हलचल तो पैदा हो ही चुकी है। 27 सालों से जिस शिक्षा की बात मोदी जी ने कभी नहीं कि इस बार उनको शिक्षा मॉडल के डेमो देना पड़ा।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता भी प्रश्नचिन्ह अभी से साफ दिख रहे हैं। हिमाचल में चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी गई जबकि गुजरात में अभी घोषणा की जानी है। कुल मिलाकर एक इंदिरा गांधी के आपातकाल जैसे हालात गुजरात में चारों तरफ देखा जा रहा है। लोकतंत्र के नाम पर डर ही बना हुआ है। जो एक ऑटो चालक को रातों-रात थाने में बुलाकर जिस प्रकार उसे डराया गया फिर उसे मोदी टोपी पहना कर सामने लाया गया और डेमो स्कूल के पर्दाफास हो जाने पर आम आदमी पार्टी के लोगों को घटनास्थल से उठाकर ले जाया गया।  यह सब आपातकाल की घटना को दर्शाता है।

चुनाव परिणाम जिस किसी के पक्ष में आये। यह बात तो मान लेनी होगी आम आदमी ने लोकतंत्र के पर्व में मोदी को खुली चुनौती तो ही डाली है। - जयहिन्द।

 लेखक: पेशे से अधिवक्ता और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर की शिक्षा प्राप्त की है एवं स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं।


 

 


 

बुधवार, 2 जनवरी 2019

चोर की दाढ़ी में तिनका - शंभु चौधरी



कोलकाता 03 जनवरी 2019 ( शंभु चौधरी ) - नये साल में प्रधानमंत्री मोदी का प्रिपेड भाषण एक खास संवाददाता के माध्यम से देश की जनता को सुनने को व प्रिंट मीडिया के माध्यम से पढ़ने को मिला । मोदी जी ने यह पहले से ही मान लिया कि 2019 का आगामी लोकसभा चुनाव में जनता का  वही प्यार मिलेगा जो उन्हें 2014 के लोकसभा के चुनाव में मिला था, परन्तु  मोदी जी यह भूल गये कि ठीक चंद महीनों के बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव भी हुए थे मोदी जी अपनी तमाम ताकत, भाजपा, आरएसएस, बजरंग दल, प्रिपेड मीडिया की जमात, सरकारी बल, दिल्ली पुलिस, सेक्स वीडियो, अफ़वाह, केजरीवाल के परिवार पर अशोभनीय, अभद्र, अपमान जनक भद्दे लाक्षण लगाना, भगोड़ा-भगोड़ा बोल कर अपमानित करना, पैसों को पानी की तरह बहाना, मानो मोदी  जी ने यह ठान लिया था कि दिल्ली की जनता को अपने झूठ-प्रपंच के जाल में फंसा कर उनको ठग लिया जाए । परन्तु इन सबके बावजूद परिणाम जो सामने आये वह ऐतिहासिक थे । 54.2 प्रतिशत वोट 70 में 67 सीटों पर केजरीवाल की वापसी, मोदीजी को यह बताने के लिये काफी है कि यही लोकतंत्र हैं जिसे धन-बल और छल से ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता, ना ही स्व. इंदिरा गांधी के आपातकाल  से ।

मोदी जी ने अपने उक्त प्रिपेड भाषण में पिछले अपने साढ़े चार सालों में किये कार्यों की चर्चा करते हुए  अपने कार्यों की  एक प्रकार से सफाई दे रहे थे। मानो उन्होंने जो कुछ भी किया वही सही था और जो गलत हुआ वह सब कांग्रेस के जमाने का था।
सर्जिकल स्ट्राइक पर साढ़े चार सालों के बाद  उन्हें  वे पल याद आने लगे जो सेना के जवानों के साथ गुजरे, मानो  सर्जिकल स्ट्राइक के समय, प्रधानमंत्री इतने भावुक थे कि एक भी सेना मर जाता  तो वे आत्महत्या कर लेते? वहीं उनके नाक के नीचे पाकिस्तान से चंद पाक आतंकवादी भारतीय सीमा के अंदर  'उरी' में आये और  सर्जिकल स्ट्राइक कर के चले गये। सेना के 18 जवानों को मौत के घाट सुला गये और भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तानी सेना से ‘उरी घटना’ जांच करने में लग गये। लगातार पाकिस्तान, भारतीय जवानों के साथ कायरता पूर्ण कार्यवाही करता रहा और मोदी जी देश को गुमराह कर छुप कर नवाज शरीफ से मिलते रहे। भारतीय सेनाओं को कश्मीर की सड़कों पर जूतों से पिटवाते रहे व खुद मुफ्ती की सरकार में अनुच्छेद 370 पर गुप्त समझौता करते रहे। पाकिस्तान से सेना के दो ‘सर’ वापस लाने की बात दूर, इनकी आंखों के सामने भारतीय सेना के कई जवानों के सर कलम कर के साथ ले गये।

दूसरा उन्होंने नोट बंदी पर कहा कि - वे इसकी चेतावनी कई बार देते रहे। काला धन निकालने के लिए सरकार ने डिस्क्लोजर स्कीम भी लाई । मोदी जी यह बताने का कष्ट करेंगें कि डिस्क्लोजर स्कीम का ग़रीबों से क्या लेना देना था? 120 लोगों की जान ले लेने के बाद, देश की अर्थव्यवस्था को खोखला बना देने या फिर किसानों की, व्यापारियों की कमर तोड़ देने को मोदी जी अपनी सफलता मानतें हों तो फिर तो इस तुगलकी फरमान का दर्ज देना कहीं ज्यादा उपयुक्त होगा।
तीसरा उन्होंने जीएसटी को लेकर यह सफाई दी - कि यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था। जब सर्वसम्मति का ही फैसला था और कांग्रेस कार्यकाल का ही निर्णय था तो इसमें मोदी की क्या भूमिका? अर्थात कांग्रेस की योजनाओं को लाभ मिले तो मेरा और हानि हो तो तेरा? अभी बंगाल के वित मंत्री अमित मित्रा ने एक चौंकाने वाला बयान दिया कहा कि ‘‘जीएसटी हवाला का कारोबार हो गया। चंद बड़े उद्योगपतियों ने इसे नकली रिफंड लेने का जरिया बना लिया  है।" अर्थात भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहीं जानबूझ इन हवाला कारोबारियों के लिये सुराख तो नहीं छोड़ दिया?
चौथा राफेल को लेकर आपने कहा कि वे काम करते रहेगें - मोदी जी ने उच्चतम अदालत का हवाला तो दे दिया पर यह नहीं बोले कि अदालत के "एकतरफ़ा निर्णय" में जिन ख़ामियों को भारत सरकार ने भी चिन्हित कर उच्चतम अदालत को अपमानीत करने का काम आपकी सरकार ने किया "कहीं यह क्या चोर की दाढ़ी में तिनका तो नहीं ?"
अंत में राम मंदिर को लेकर एक कहानी याद आ गई - एक किसान ने  एक तोता पाल रखा था । उनके परिवार के सभी सदस्य तोता को आते-जाते यही सिखाते ‘‘तोता ! राम-राम बोलो’’ तोता भी यह समझ जाता कि उसे ‘‘राम-राम’’ बोलने को कहा जा रहा है । परन्तु  तोता "राम-राम" बोलने के बदले "चोर-चोर"  चिल्लाने लगता । एक रात मोहल्ले का चौकीदार रात को, घर का आंगन सूना देखकर घुस आया । तोता जोर से ‘‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगा । किसान ने चौकीदार को धर-दबोचा। तब चौकीदार ने अपना बचाव करते हुए दलील दी कि वह तो मोहल्ले का चौकीदार है। वह तो चोर को पकड़ने के लिये आया था ना कि चोरी करने । जयहिन्द !
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र त्रकार हैं  आपने विधि स्नातक (LL.B)  और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से एम.ए. (एमसी) की है।

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

झूठ बोलना भी कला है

झूठ बोलना भी कला है
कोलकाता 18 दिसम्बर 2018

पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने एक रायबरेली में अपने भाषण में कहा कि ‘‘झूठ बोलने वालों पर सत्य बोलने वालों की विजय होती है। सच को श्रृंगार की जरूरत नहीं होती, झूठ चाहे जितना बोलो इसमें जान नहीं होती। झूठ की पंक्तियों को कुछ लोगों ने जीवन का मूल मंत्र बना लिया है।’’ इस बात से एक कहानी याद आ गई - 
‘‘राजस्थान के एक गांव में एक बहुत बड़ा व्यापारी रहता था उसके कारोबार का हिसाब-किताब देखने के लिये उसने एक मुनिम भी रख रखा था । मुनिम बहुत ही चालाक बुद्धि का था। वह उस व्यापारी को रोज फायदा करवाता। कभी जोड़ में भूल दिखा के, कभी दाम के भाव बढ़ा कर तो कभी गल्ले में सरप्लस दिखा के । व्यापारी को लगा कि यह आदमी तो बहुत काम का है । उसकी हर बात मानने लगा । इधर मुनिम जी ने जब व्यापारी को अपने जाल में फंसा लिया तो उसने उसके व्यापार को भीतर ही भीतर खोखला करने लगा । खाते में कुछ, हकिकत में कुछ दिखने लगा । एक दिन अचानक से व्यापारी को मंदी का सामना करना पड़ा, तब व्यापारी ने मुनिम को बुलाकर पूछा कि जो हर साल का मुनाफ़ा जमा होता था उसका हिसाब दो तब मुनिम ने जबाब दिया सेठ जी ! वह तो दो दिन के घाटे के भुगतान में ही समाप्त हो गया और आज के दिन तो आपके सर पर दस लाख का कर्ज चढ़ गया है । व्यापारी  ने अपना सर पीट लिया’’  कुछ ऐसा ही हाल आज हमारे देश का है।
पिछले साढ़े चार सालों में मोदी की सरकार में कुछ ऐसा ही हो रहा है । नोट बंदी से देश को जो घाटा हुआ उसे हमारे वित्तमंत्री जी जीएसटी से पूरा करने की हड़बड़ी की । जब जीएसटी से बात नहीं बनी तो वित्तमंत्री जी आरबीआई में जनता का जमा धन पर डाका डालने पंहुच गये ।
2014 के बाद से ही झूठ का व्यापार चल रहा है । झूठी अफवाहें फैला कर लोगों की हत्या करना। झूठे वायदे कर देश की जनता को गुमराह करना । चुनाव में किये सभी वायदे भले ही वह काला धन लाने का वायदा हो या 15 लाख रुपये लोगों के खातों में जमा करने का वायदा सब झूठ का पुलंदा साबित हुआ । युवाओं को नौकरी देने के नाम पर पकौड़े बेच के काम चलाने की सलाह से लेकर किसानों को न्यूनतम लागत मूल्य का भुगतान अथवा उनकी आमदनी को दोगुना करने की बात हो या फिर राफेल में सुप्रीम कोर्ट तक को झूठे दस्तावेज़ प्रस्तुत कर सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को तक ताक पर लगा देना, यह सब मोदी सरकार की झूठ बोलने वाली मशीन का कमाल है। 
मोदी जी के आने के बाद हर जगह झूठ बोलने के एटीएम लग गये हैं। मीडिया से लेकर संसद तक में झूठ का बोलबाला है । पिछले 70 सालों में झूठ पर इतना ज्ञान देते, आपने किसी प्रधानमंत्री को कभी ना सुना होगा, जितना मोदी के भाषणों से सुनने मिल रहा है । यह झूठ बोलने की कला ही तो है कि भक्तों को सब कुछ सच नजर आता है ।
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र त्रकार हैं  विधि विशेषज्ञ भी है।

रविवार, 12 अगस्त 2018

‘मास्टरस्ट्रोक’: पंतजलि के विज्ञापनों का सच?


केलकाता- 12 अगस्त 2018
यदि बाबा के विज्ञापन महज एक विज्ञापन होते तो काई बात नहीं पर किसी ऐसे पत्रकार को हटाने में इस विज्ञापन हाथ होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह सभी विज्ञापन जो 2014 के बाद प्रकाश में आयें हैं । इन विज्ञापनों के धन का अज्ञात स्त्रोत कोई ओर है जो इन विज्ञापनों के माध्यमों से लोकतंत्र को गुलाम बनाने की योजना पर कार्य कर रहा है ।
यह बात सच है कि जो बाबा कल तक कालेधन के खिलाफ अन्नाहजारे के विकल्प में अपनी एक अलग मुहिम छेड़ रखी थी, जो बाबा आंदोलन स्थल से कूदकर भाग खड़ा होता हो, जो औरत के भेष  में अपने गेहुया वस्त्र को त्यागकर जान बचा कर सभास्थल से भाग खड़ा होता है । जिसके उत्पादनों के विज्ञापन कभी भी इतनी बड़ी संख्या में नहीं आये । अचानक से मोदी की सरकार आते ही रामदेव बाबा के विज्ञापनों की एक प्रकार तमाम प्रिंट मीडिया से लेकर इल्केट्रोनिक मीडिया में बाढ़ सा आ जाना किसी बात का संकेत तो देता ही है, पर यह नहीं पता था कि इन विज्ञापनों का स्रोत सीधे देश के प्रधानमंत्री मोदी से जुड़ा हुआ है।
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी और उनके झूठ को उजागर करते हुए एबीपी न्यूज़ से दो वरिष्ठ पत्रकारों ने के हटाने के पीछे पंतजलि के विज्ञापन का क्या रोल हो सकता है? यह सोचने की बात हो सकती है।
‘द वायर’  के द्वारा  पूछे गये सवालों के जवाब में पतंजलि के प्रवक्ता एस.के. तिजारावाला ने एबीपी न्यूज चैनल से विज्ञापन हटाने की पुष्टि करते हुए स्वीकार किया कि पंतजलि के विज्ञापन हटाये गये हैं।  दरअसल में इसके पीछे पुण्य प्रसुन बाजपेयी के एक कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ की चोट से मोदी सरकार इतनी बैचेन हो गई कि उनके कालेधन के इस विज्ञापन का स्त्रोत अंदर से बोल ही पड़ा ।
पिछले चार सालों से रामदेव बाबा के व्यवसाय के विज्ञापनों की बाढ़ के आंकड़े जो सच बताने के लिये काफी है।  बीएआरसी इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक पतंजलि आयुर्वेद ने टेलीविज़न चैनलों में 1.14 मिलियन विज्ञापन दिये, 161 चैनलों में 7,221 घंटों के लिए टीवी चैनलों पर पतंजलि विज्ञापन प्रदर्शित किए गए थे। यह प्रति दिन औसतन 19 घंटे 43 मिनट के विज्ञापनों का भूगतान पंतजलि कर रही है ।  इसके साथ ही प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों में पतंजलि के विज्ञापनों की बाढ़ के धन का स्त्रोत क्या है?  चार साल पहले जो कंपनी 2013-14 में महज 850 करोड़ की थी रातों-रात ऐसा क्या ऐसा क्या गुल बाबा ने खिला दिया कि देखते ही देखते 2016-17 में 11526 करोड़ो की कम्पनी बंन गई । दरअसल बाबा आरएसएस का एक मुखौटा है जो स्वदेशी अभियान के बहाने बाबा ने देश का गुमराह कर रहें हैं एवं भाजपा के कालेधन को असली धन बनाकर विज्ञापन का रोजगार कर रही है । जरा आप भी सोचियेगा किस विदेशी कम्पनी ने  च्यवनप्रास, शहद, घी और आटा का व्यवसाय भारत में किया है? जरा दिमाग पर जोर देकर साचियेगा । स्वदेशी के नाम पर देश की भावना से खिलवाड़ की यह प्रणालि आरएसएस का एक हिस्सा मात्र है। व्यवसाय करना अपराध नहीं पर व्यवसाय की आड़ में देश के लोकतंत्र को पंगु बना देने की योजना अपराध है। एक समय ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जो किया वही बाबा के विज्ञापनों के माध्यम से मोदीजी करने जा रहें हैं । यदि बाबा के विज्ञापन महज एक विज्ञापन होते तो काई बात नहीं पर किसी ऐसे पत्रकार को हटाने में इस विज्ञापन हाथ होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह सभी विज्ञापन जो 2014 के बाद प्रकाश में आयें हैं । इन विज्ञापनों के धन का अज्ञात स्त्रोत कोई ओर है जो इन विज्ञापनों के माध्यमों से लोकतंत्र को गुलाम बनाने की योजना पर कार्य कर रहा है । दरअसल बाबा का यह विज्ञापन का खेल कुछ ओर ही ज्ञात होता है जो मीडिया को धमकाने के कार्य में मोदीजी प्रयोग कर रहें हैं बाबा तो बस एक मोहरा है।
 नोटः यह लेखक के अपने विचार हैं। इसे लेख को प्रकाशित और पुनः प्रकाशित करने के लिये सभी स्वतंत्र है। । लेखक विधिज्ञाता व स्वतंत्र पत्रकार हैं।  - शंभु चौधरी