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सोमवार, 20 जून 2011

Let me make it clear: - शम्भु चौधरी




Let me make it clear
THE CONGRESS VIEW ON PRESENT SITUATION - 1 JUNE 2011 AICC :


Congress party updated his Website by Saying that His party is very honest to Present Lokpal Bill to introduced for Curb the Crruption's of India. but Where his Honesty?
Point-12. Let us make it clear: The Congress party and the governments that it leads at the Centre and the States are committed to good governance. The Congress party is implacably opposed to corruption and will not hesitate to take stern and exemplary action against any one who is found to be corrupt. The party that should hang its head in shame is the BJP. Several ministers of the BJP have been charged with corruption in Punjab, Madhya Pradesh, Karnataka and Gujarat. A former National President of the BJP faces a charge of accepting bribes. The government in Karnataka today is a byword for corruption.
Point-13. In recent months, the Congress party has taken a number of steps that will clearly manifest its intentions. For example, the Government is engaged in drafting a strong and sound Lokpal Bill that will be introduced in the monsoon session of Parliament. It has entrusted grave allegations of corruption that may involve people in high places to investigation by the CBI. It has welcomed the Supreme Court’s oversight of the investigations. The Government has ratified the UN Convention Against Corruption. It has introduced a Bill to punish bribery of foreign public officials. Please Read My Reply Also....- Shambhu Choudhary


भारत के सबसे बड़े घोटाले के जिम्मेदार चुने हुए देश के सबसे बड़े ईमानदार कांग्रसी प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ जाए कि ‘‘भाया नाव तो चालती देखी पर पानी में चाल रही थी कि बालू पर सो मणे कोणी दिखी म तो गठबंधन का गांठ से बन्धो पड्यो थो’’।


कोलकाता-21जून,2011:
Let me make it clear: - शम्भु चौधरी
Point-12. कांग्रेस पार्टी खुद कितनी दूध की धुली है यह भी साथ में इनको लिखना चाहिये कि रक्षा सौदों से लेकर खेल के मैदानों तक में अरबों का खपला वह खुद कर चुकी है। चुनी हुई सरकारी पक्ष का बयान है कि हाल के दिनों में जितने भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आयें हैं जिसमें 3जी, हो या कामनवेल्थ के खेल हों या खाद्य प्रदाथों में वृद्धि का मामला हो सभी के सभी गठबंधन धर्म के कारण हुए हैं। जब कांग्रेस की सरकार इस बात से सहमत है कि सरकार में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पंहुच चुका है जो गठबंधन की मजबूरियों का परिणाम है। कहने का अर्थ कांग्रसी चोर नहीं कांग्रेस की सरकार को मदद देने वाले चोर हैं तो सरकार इसका कोई नया समाधान क्यों नहीं खोजती? कांग्रेस पार्टी जब खुद स्वीकार करती है कि सरकार बनाने के लिए देश के चुने हुए सभी चोर, लुटेरे और बेईमानों को साथ लेकर उन्होंने सरकार बनाई है तो इस सरकार में इन चुने हुए सांसदों से देश की जनता अब क्या अपेक्षा कर सकती है।

देश की जनता के द्वारा चुने हुए लोग हैं आप लोग भला जनता की बात अब क्यों सुनेगें? जिस जनता ने इनको चुन कर संसद में भेजा है वे पहले से ही इनको बहुत सारे काम दे रखें हैं। अब हर व्यक्ति आकर कहेगा कि अमूक कानून बनाओं तो भला ऐसे कैसे हो सकता है? आखिर चुने हुए सांसद हैं। कोई मजाक थोड़े ही है भाई! जनता के प्रति इनकी बस इतनी ही जबाबदेही है कि वे उन्हें लाठियों से हांक दें बस। अनपढ़ गांवार जनता भला लोकपाल के बारे में क्या जानती है? ये चार-पांच आदमी झूठ-मुठ का खुद को जनता का प्रतिनिधि बताते हैं। ये तो इनकी भली मानसिकता है कि कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता करने वाली एक नादान लेडी है जो देश के भ्रष्ट नेताओं के दांव-पेंच नहीं जनती सो बेचारी अन्नाजी की इज्जत के चक्कर में इस पचड़े में फंस गई वरणा अन्नाजी को जेल के भीतर बन्द कर 2-4 दिनों में ही होश ठिकाने लगा देते।
Point-13. ये लो चुने हुए कांग्रेसी सांसदों का एक नया बयान क्या कह रहें हैं जनाब - "In recent months, the Congress party has taken a number of steps that will clearly manifest its intentions. For example, the Government is engaged in drafting a strong and sound Lokpal Bill that will be introduced in the monsoon session of Parliament. It has entrusted grave allegations of corruption that may involve people in high places to investigation by the CBI." इनकी ईमानदारी पर जरा नजर डालिये "Government is engaged in drafting a strong and sound Lokpal Bill" लोकपाल बिल का ड्राफ्ट का सारा श्रेय खुद को दे रहें हैं। अन्ना हजारे के पूरे आन्दोलन को दरकिनार कर दिया। यही कांग्रेसी चरित्र है जो देश की आजादी के हजारो शहिदों के इतिहास को डकारती रही है। आज अन्ना की बलदानी को भी उनके सामने ही डकार गई। इतनी जल्दी भी क्या थी भाई! इस बात को लिखने की कम से कम अन्ना को मर तो जाने देते। तब तक जनता भी सारी बातें भूल जाती। खैर! लोकपाल बिल को कांग्रेस के योगदान में जमा कर लियो हो ता अब थोड़ी तो शर्म करो कि इस बिल को शख्ती के साथ संसद में लाकर पारित करवा दो। ना जाने फिर कहीं गठबंधन धर्म आड़े हाथ न आ जाए और भारत के सबसे बड़े घोटाले के जिम्मेदार चुने हुए देश के सबसे बड़े ईमानदार कांग्रसी प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ जाए कि ‘‘भाया नाव तो चालती देखी पर पानी में चाल रही थी कि बालू पर सो मणे कोणी दिखी म तो गठबंधन का गांठ से बन्धो पड्यो थो’’।

रविवार, 19 जून 2011

लोकपाल चक्रव्यूह - शम्भु चौधरी



कोलकाता-20जून,2011: कांग्रेस पार्टी की लोकपाल बिल को लेकर नई व्यूह रचना की तैयारी जोरों से चल रही है। अर्थात योजनानुसार कार्य को इंजाम देना।
लोकपाल चक्रव्यूह क्या है-
1. कांग्रेस पार्टी देश में चारों तरफ सहयोगी मीडिया व समाचार संपादकों के माध्यम से इस बात को प्रचारित करेगी कि सिविल सोसाइटी के सदस्य तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। उनकी सभी मांगे नहीं मानी जा सकती।
2. सभी विपक्षी पार्टी को भी भयभीत करना ताकी सिविल सोसाइटी के अड़ियल रूख को नजरअंदाज किया जा सके।
3. चुने हुए सदस्यों की परिभाषा के सामने में रखते हुए तमाम चुने हुए सदस्यों का एक अलग समूह का निर्माण करना। अर्थात सभी सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कांग्रेस पार्टी का साथ दें यानी कि ‘‘चोर-चोर मौसेरे भाई’’ का नारा देकर सिविल सोसाइटी को अलग-थलग करना।
4. सिविल सोसाइटी से दो-दो हाथ करना।


अब इसी क्रम में सरकार ने हमला बोल की राजनीति शुरू करते हुए देश के तमाम बड़े समाचार समूह को प्रलोभन दिया जा चुका है। कि ये लोग सरकारी बात को महत्व प्रदान कर सिविल सोसाइटी सदस्यों को भिलन के तौर पर जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। माननीय श्री प्रणव मुखर्जी, श्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम मानती है कि देश की जनता नासमझ है उनको बिल के किसी भी प्रावधान की कोई जानकारी नहीं है। और चुने हुए सांसदों की देश के प्रति जिम्मेदारी है। साथ ही गृहमंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी भी फरमाते हैं कि गांधीजी के सत्याग्रह के हथियार से किसी देश में कानून नहीं बनाया जा सकता। अन्ना का अनशन गांधीजी के अनशन से भिन्न है। अब कांग्रेस सहित प्रायः सभी दल को इस बात कि चिन्ता सताने लगी कि यदि सिविल सोसाइटी की बातें को मान ली गई तो संभतः एक समय ऐसा भी आ सकता है जब देश के आधे से अधिक सांसदों को जेल की सलाखों के अन्दर जाना पडे। श्री अरविन्द केजरीवाल ने भी माना कि भला कोई अपना सुसाइडल नोट भला क्यों लिखेगा? सरकारी पक्ष अब अन्ना समूह से दो-दो हाथ करने का मन बना चुकि है। इस चक्रव्यूह योजना के तहत कांग्रेस अब तमाम राजनैतिक दलों को साथ लेकर चलना चाहती है। कांग्रेस पार्टी मानती है कि वो खुद तो इस बिल को लेकर बुरी तरह उलझ ही चुकि है अब देश के तमाम पार्टियों को भी इसमें 30 जून से पहले ही उलझा दिया जाये ताकि संसद के सत्र में उसकी पोल न खुले। कांग्रेस पार्टी अब जानबुझ कर बिल का विवादित हिस्से को बेतुके सवालों में उलझाने कि योजना बना चुकी है। ताकी बिल संसद के पटल पर रखने से पूर्व ही विवादों में घिर जाय और भ्रष्टाचार निरोधक लोकपाल बिल बैगर किसी अधिक बहस के सदन से बाहर कर दिया जाए। जिस तरह महिला आरक्षण बिल संसद में अपनी लम्बी सांसें भर रहा है लोकपाल बिल का भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। देश के 70 प्रतिशत सासंद और विधायक इस बिल के किसी भी प्रावधन से सहमत नहीं होगें। संसद या विधानसभाओं में जिस धारा के अंर्तगत उनको वोट देने और बोलने का अधिकार प्राप्त है समाज का मानना है कि इस अधिकार के तहत ही संसद और विधानसभाओं में भ्रष्टाचार व्याप्त है। जबकि सरकार का कहना है कि यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही है। उनके स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन है। इस तरह के प्रस्ताव लाने का अर्थ है संसद के आधे से अधिक सांसद पर किसी भी समय मुकद्दमा चलाया जा सकेगा। जबकि सिवलि सोसाइटी कहती है कि जबतक कानून बनाने वाले सही आचरण या वर्ताव नहीं करेगें तब तक देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके कहने का सरल सा अर्थ है जो भी कड़े कानून बने उसे ऊपर से ही लागू किया जाना चाहिये। अन्यथा लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि चोर प्रधानमंत्री बरी संत्री को कड़ी। जैसा कि 3जी मामले में साफ छवि की आड़ में डा. मनमोहन सिंह बचते आ रहे हैं। गृहमंत्री का नाम अब सामने आ ही गया। कुछ दिनों में प्रधानमंत्री को भी सीबीआई के समक्ष प्रस्तुत होना पड़ सकता है चुंकि कांग्रेस इस बात को पहले से ही जानती है कि इस बिल के पारित होते ही उनकी सरकार 3जी मामले में खतरे में पड़ती दिखाई देती है तो इन लोगों ने प्रधानमंत्री को एक संस्था का नाम देकर बचाव की मुद्रा में पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। अब सिविल सोसाइटी के सामने एक ही विकल्प बचा है कि वे देश के तथाकतित चुने हुए प्रतिनिधियों को साफ कर दें कि जनता ने उनको चुन कर भेजा है इसका अर्थ है वे जनता के प्रति न सिर्फ जिम्मेदार हैं उनका दायित्व भी बनता है कि वे जनता की बातों पर अमल भी करें। सरकारी पक्ष अपनी बैतुकी बातों से जनता को गुमराह करने की जगह बिल के सभी पक्षों पर ईमानदारी से बहस करें। क्या सही है और क्या गलत पर पहले ही बहस न कर खुले दिमाग से बिल को संसद के सामने प्रस्तुत करें न कि खुद को स्थापित करने के लिए बिल को संसद में प्रस्तुत व बहस करने से पूर्व ही बिल के मूलभूत संरचना से छेड़छाड़ और खिलवाड़ करना शुरू कर दें। कुछ काम संसद के अन्दर चुने हुए सांसदों के उपर भी छोड़ दें वे भी आपके जैसे चुने हुए ही सांसद हैं जो लोकपाल बिल को पारित करेगें या उनको आपलोगों द्वारा सुझाये हुए प्रावधानों पर अपनी राय देगें। सारा काम आपकी समिति के पांच सदस्य ही तय कर लेगें तो संसद के अन्दर बाकी बचे 540 सदस्य क्या खाख करेगें। लोकपाल बिल के मूल प्रस्तावों के साथ सदन में प्रस्तावित करना ही देश की प्रगति का नया अघ्याय होगा। कांग्रेस पार्टी इस बात को गंभीरता से लेकर अपने शातिरों पर लगाम कसे।

शनिवार, 18 जून 2011

लोकपाल बिलः कांग्रसी अलाप - शम्भु चौधरी



आखिरकर जैसे-जैसे 30जून सामने आते जा रही है, कांग्रसी शातिरों का असली चेहरा भी सामने आने लगा। पहले यही काम वे बाबा रामदेव को अपना मोहरा बनाकर सिविल सोसाइटी के लोगों को मुर्ख बनाने एवं फूट डालो राज करो कि अंग्रजी चाल का पासा चला जब वो चेहरा बेनकाब होकर जनता के सामने उसके परचे-परचे उखड़ गये तो अब कांग्रसी लोगों को गांधीवादी अन्ना हजारे तानाशाह नजर आने लगे। चलिये पहले हम पिछले दिनों तेजी से बदलते स्वर पर एक नजर डाल लेते है। अन्ना के अनशन से उठे जनसैलाब के भय से कांग्रेस की सरकार शुरू में इस बात पर जोर देने लगी वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता के साथ है और ईमानदारी पूर्वक वो भी इस बिल को संसद में लाने की पक्षधर है। परन्तु इसके लिए एक प्रक्रिया है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंर्तगत जरूरी है कि समाज और सरकार के सदस्य मिलकर इस बिल के ड्राफ्ट को बना संसद में पारित करने हेतु भेजे। सरकार ने आनन-फानन में अन्ना हाजारे के अनशन को समाप्त कराने के लिए रातों-रात सरकारी छापाखाना खुलवा गजट भी जारी करवा दिया। दरअसल में सरकार का यह चेहरा उनके शकुनि विजय का था जिसको लेकर वे राहत की सांस लेने लगे थे कि बड़ी सावधानी से उनलोगों ने सिविल सोसाइटी के सदस्यों को एक पिंजरे में बन्द कर दिया है।
बैठकें शुरू हुई सरकार की मंशा एवं लोकपाल बिल को लेकर उनका नेक इरादा सामने आने लगा। एक-दो बैठकों के बाद ही इन लोगों ने अन्ना से नाराज खेमे बाबा रामदेव की महत्वकांक्षी भूख को मिटाने के लिए योजनाबध तरिके को अपनाकर उनसे सरकारी बयान दिला दिया। सरकार के पांच-पांच मंत्री बाबा के आवभगत में भेजे गये। खैर बाबा का क्या हर्ष कांग्रेसी तानाशाहों ने किया उसे सारी दुनिया ने देख ही लिया। तानाशाह का अर्थ क्या होता है इससे बड़ा उदाहरण और क्या दिया जा सकता है कि आधी रात को सोई हुई जनता पर लांठियां बरसाई गई। रातों-रात हीलन से भीलन बना दिये गये बाबा रामदेव। कारण स्पष्ट था गुप्त समझौते के अनुसार बाबा का कांग्रसी आदेशों का पालन न करना था। आधीरात को गहरी नींद में सोई हुई निर्दोष जनता के न सिर्फ कपड़े व तिरपाल से बने पंडाल के भीतर आंसू गैस के गोले दागे, बिजली व संचार के सारे तार काट दिये गये पंडाल को खाली करने का समय न देते हुए लाठियों की बरसात शुरू कर दी। जबतक जनता या प्रेस के कर्मी कुछ समझ पाते चारों तरफ भगदड़ मच गई। पंडाल में आग लग जाने से बाबा को पंडाल से झलांग भी लगानी पड़ी कारण की पंडाल के पिछले मार्गा में आंसू गैस के गोले से आग तो लग ही चुकी थी, धुंआ भी भर चुका था। बाबा भीड़ का फायदा लेकर भागने में असफल रहे। इस स्थिति का कुल आंकलन किया जाय तो सरकार एंव बाबा रामदेव के समझौते में शाम ढलते-ढलते श्रीमान कपिल सिब्बल के पेट में दर्द शुरू हो गया और उन्होंने सोचा कि अब बाबा का भांडा फोड़ दिया जाय। सरकार ने जैसे ही बाबा रामदेव के एक सहयोगी का पत्र प्रेस-मीडिया को जारी किया, इससे सरकारी की मंशा साफ हो गई कि वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कितनी गंभीर नजर आती है। तब तक इस प्रकरण से दो बातें साफ हो चुकी थी कि 1. सरकार ऐन-केन प्रकारेण लोकपाल बिल के ड्राफ्ट समिति को विवादों में डालकर किसी भी प्रकार से अपने गुप्त ऐजेंडे के तहत खानापूर्ती करना। 2. कांग्रेस खुद के काले करनामे को उजागर न कर जनता के सामने खुद को पाक-साफ रखना इनका लक्ष्य रहा है।
बाबा का प्ररकरण पर शतरंजी विजय प्राप्त कर लेने वाले कांग्रसी के हौसले अब तक बुलंदियों पर पंहुच चुके थे। श्रीमती सोनिया गांधी सहित भ्रष्टाचार में लिप्त देश के तमाम राजनेताओं ने होली मनाई। मानो इनके खुशी के ठिकाने भी न रहे। कुछ बिकाओ पत्रकार व संपदकों ने भी अपनी शैतानी कलम का रूख अन्ना की तरफ मोड़ दिया।
कांग्रेस इस सफलता का दूसरा निशाना अन्ना और सिविल सोसाइटी की तरफ मोड़ दिया। बैठकों में खुलकर अपने गुप्त ऐजेंडे को लेकर बोलने लगे। बैठक के बहार और अन्दर अभद्र शब्दों का प्रयोग और संसद के चुने हुए प्रतिनिधि और न चुने हुए प्रतिनिधि की बात कहने में भी संकोच नहीं किया। ये तो गनीमत थी कि सरकारी गजट हो चुका है अन्यथा कांग्रेस इनको (समाज के सदस्यों को) बैठक में आमंत्रित भी न करती।


संसद के चुने हुए प्रतिनिधि और न चुने हुए प्रतिनिधि -
सरकारी प्रवक्ता इस बात पर बार-बार जोर दे रहें है कि वे चुने हुए जनता के प्रतिनिधि हैं। इसका क्या अर्थ होता है? कि वे जनता की बात सुनने या मानने से इंकार कर दें? आखिर में सरकार और सरकारी चापलूसी करने वाले मीडियाकर्मी व संपादक ये भी बताये कि चुने हुए इस भ्रष्ट लागों का रोल क्या है? इनकी संवैधानिक जिम्मेदारियां क्या-क्या है? संसद के अन्दर इनकी क्या जिम्मेदारी है और संसद के बाहर क्या-क्या है? उल्फा या गोरखालेंड के प्रतिनिधियों में से कितने चुने हुए सांसद है जिनकी मांगे मानी गई। उल्फा को तो सरकार ने आर्थिक पैकेज तक दे दिया। सांसद जनता के प्रति भी जिम्मेदार है कि सिर्फ संसद के प्रति? सांसदों को जो सुविधा प्रदान की जाती है वो सभी उनको मौज-मस्ती करने के लिए ही दी जाती है क्या? भ्रष्टाचार देश की समस्या है कि नहीं? यदि है तो इसके लिए सरकार ने इसे समाप्त करने के लिए अबतक क्या-क्या उपाय किये? ऐसे सैकड़ों सवाल हैं, जिसे लिखा जा सकता है।


सरकार की मंशा में खोटः
गत पांच बैठकों के अब तक मिले परिणामों और आपसी तालमेल की कमी से सरकारी पक्ष के बयान काफी निराशाजनक नजर आते हैं। सिविल सोसाइटी की बात काटने के जो विकल्प सरकारी पक्ष ने रखें हैं उनमें सबसे बड़ी बात सरकार ने कही की "सोसाइटी के लोग धमकी के स्वर में बात कर रहे हैं ये दोनों बातें अर्थात बात और धमकी साथ-साथ नहीं हो सकती।" अच्छा एक बात बताइये सरकार न क्या किया? पांच जून की रात सरकार ने जनता के साथ क्या सलूक किया। आप कहेगें उसे छोड़ दिजिये वो बाबा रामदेव की कहानी थी, तो आपने आठ जून को एकतरफा बैठक कर क्या ऐलान किया? कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बैगर भी वे 30 जून तक ड्राफ्ट संसद में भेज देगें। इसे क्या समझा जाए? रही 16 अगस्त को अनशन की बात तो यह बात तो अन्ना ने गजट बनने के तुरन्त बाद ही कह दी थी कि यदि सरकार बिल के मौसेदे को सही तरह से नहीं लाती तो वे पुनः अनशन करेगें। अब इसे सरकार बार-बार सुनती है और डर जाती है तो इसका क्या अर्थ निकाला जा सकता है? साफ तौर पर सरकारी पक्ष को लग रहा है कि वे अपने गुप्त ऐजेंडे को किसी प्रकार लागू करवा सके इसीलिए सरकारी पक्ष बैठकों में उनके द्वारा किये जा रहे व्यवहार को जनता के सामने लाने हिचक रही है। जबकि सिविल सोसाइटी का मानना है कि यदि सरकारी पक्ष बिल के प्रति ईमानदारी से पेश आना चाहती है तो इसका सीधा प्रसारण से डर क्यों रही है? दरअसल बात कुछ ओर है कांग्रेस की सरकार न तो कभी इस बिल को लेकर गंभीर रही है न आज है। इनका सीधा सा मकशद है किसी तरह जनता और मीडियाकर्मी को भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा कर लें। कांग्रेस सहित तमाम पार्टी जिसमें भाजपा, माकपा, भाकपा, राकंपा, समाजवादी, तृणमूल, करुणनिधि, जयललिता, लालू-माया जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं ये सभी जानते है कि इस बिल के पारित हो जाने से सबसे ज्यादा उनको क्षति होने वाली है। अर्थात इससे देश का व्योरोकेट अधिकारियों को कम उनको सबसे अधिक इसका सामना करना पड़ेगा। कारण साफ है सरकार बनती और बिगड़ती है और भ्रष्टाचार की शुरूआत संसद और विधानसभाओं में बहुमत को लेकर ही होती है। अब आप कल्पना किजिए कोई अपने पांव पर ही कुल्हाड़ी क्यों मारेगा। इसलिए सब के सब इस मामले को इतिश्री का इंतजार बड़ी बेसब्री कर रहे हैं। इसलिए ज्यों-ज्यों दिन गुजरता जा रहा अन्ना की बात कांग्रेस को धमकी लगने लगी।

शुक्रवार, 17 जून 2011

Suggestions Letter To Lokpal



आदरणीय अध्यक्ष महोदय,
लोकपाल बिल ड्राफ्ट समिति,
नई दिल्ली, भारत।


महोदय,
आपने देश के सभी राजनैतिक दलों व राज्य सरकारों को एक पत्र लिख कर निम्न बिन्दूओं पर उनकी राय जाननी चाही। मैं समझता हूँ कि भारत सरकार इस पत्र को आम जनता के लिए जारी करेए कारण कि जिन दलों को या सरकार की राय आपने जाननी चाही उनको देश की जनता ही चुनती है। आप इस बात को स्वीकार करेगें कि पिछले 15-20 सालों में संसद व विधानसभा की गरिमा को गहरा आघात लगा है।
किस प्रकार संसद के भीतर नोटों के बण्डल उछाल कर भाजपा संसदों ने लोकतंत्र की धजी उड़ाई थी। प्रायः विश्वास मत प्राप्त करते समय संसदों व विधायकों की खुले आम खरीद-फरोक्त होती रही है। जिसके चलते स्वण्भजनलाल की भजन मंण्डली की कहानी अथवा शिबु सोरेन की सौदेबाजी से संसद शर्मसार होता रहा है। कुछ ऐसा ही हाल देश के सभी प्रान्तों में है। आपने जो प्रश्न उठाये उन सभी का यदि एक उत्तर दिया जाय तो यह कि कम से कम भ्रष्टाचार निरोधक इस बिल को बनाते समय दोंनो पक्ष ईमानदारी से जनता के सामने पेश आये। यह काम सिर्फ कांग्रेस के बुते का ही है। आपकी पार्टी में आज भी आप जैसे कुछक ईमानदार लोग बचे हैं। बल्की मैं मानता हूँ इस बिल में सभी कड़े से कड़े प्रवाधान शामिल कर लिये जाने चाहिये कि जिससे संसद व विधानसभाओं की मर्यादाओं को धन-बल की ताकत से चलाने वाले राजनैतिक दलों का नकाब उतारा जा सके। बात काफी है पर इशारा एक ही है देश का भविष्य कैसे सुरक्षित हाथों में रहे इस बात को ध्यान में रखते हुए आपके निम्न प्रश्नों पर मेरी राय आप सभी सदस्यों के समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूँ। आशा है मेरे पत्र को लोकपाल बिल ड्राफ्ट समिति के पटल पर रखा जायेगा।


Suggestions Letter To Joint Drafting Committee in April 2011







(i) There have been demands from the Civil society members that one single Act should provide for both the Lokpal in the Centre and Lokayukta in the State. Would your State Government be willing to accept a draft provision for the Lokayukta on the same lines as that of the Lokpal ?
1. राज्य सरकारों को यह अधिकार देने का अर्थ होगा कि बिल के मूल को अपनी जरूरतों के अनुसार कमजोर करना होगा। अतः मेरी राय होगी कि इस बिल के ड्राफ्ट के मूल से कोई समझौता न किया जाना चाहिये।

(ii) Should the Prime Minister be brought within the purview of the Lokpal? If the answer is in the affirmative, should there be a qualified inclusion (in which case you may also suggest qualifications for such an inclusion).
2. आप इस बात से सहमत होंगे जब-जब हंग संसद का गठन हुआ है उस समय प्रधानमंत्री बनने के लिए सांसदों में एक प्रकार से Horse Riding होने लगती है। इस तरह के मुद्दे प्रधानमंत्री की छवि को कई बार विवाद में डाल चुकि है। अतः इस प्रश्न को खुले दिमाग से हल करने की जरूरत है। मेरा उत्तर हाँ है।

(iii) Should judges of the Supreme Court / High Court be brought within the purview of the Lokpal?

3. देश का अदालती इतिहास इस बात का गवाह है कि आज अदालतों में न्याय बिकना षुरू हो गया है। अदालत को ईमानदार बनाये रखने के लिये इसे उन पर लागू करना निहायत ही जरूरी है।

(iv) Should the conduct of Members of Parliament inside Parliament 1 (speaking on voting in the House) be brought within the purview of the Lokpal? (Presently such actions are covered under Article 105 (2) of the Constitution).

4. आप इस बात से सहमत होगें जब भी सरकार किसी मुद्दे में अल्पमत में आ जाती है तो सरकार को बचाने को लेकर जो मत विभाजन होता है इस समय साफ तौर पर संसदों की खरीद-फरोक्त का मामला सामने आता ही है। इस प्रवाधान से संदिग्ध संसदों की जाँच लोकपाल द्वारा निहायत ही जरूरी है।

(v) Whether articles 311 and 320 (3) (c) of the Constitution notwithstanding members of a civil service of the Union or an all lndia service or a civil service of a State or a person holding a civil post under the Union or State, be subject to enquiry and disciplinary action including miss all removal by the Lokpal/Lokayukta, as the case may be?

Yes it Must be


(vi) What should be the definition of the Lokpal, and should it itself exercise quasi-judicial powers also or delegate these powers to its subordinate officers?

Yes it Must be


अन्त में आप सभी सदस्यों से अनुरोध रहेगा कि यह सुनहरा अवसर जो कांग्रेस की सरकार को मिला है इस पर ईमानदारी व जिम्मेदारी पूर्ण दायित्वों का निर्वाह करते हुए इस बिल का सर्वमान्य रास्ता निकालते हुए मजबूती के साथ बिल के प्रारूप न सिर्फ तैयार ही करें सोसाइटी सदस्यों को सम्मान भी देंवे। उनका स्वार्थ सिर्फ देश को भ्रष्टमुक्त करना है न कि आपकी सरकार को गिराना। यह लड़ाई कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं जिसके लिये आप लोगों ने विभिन्न तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये। सभी सदस्य या तो इतिहास के हिस्से बन जायेगें और देश की आनेवाल पीढ़ी आपलोगों को हमेशा याद करेगी या फिर आप लोगों का नाम सदैव काले अक्षरों में अंकित होकर रह जायेगा। आईये हम प्रण लें कि देश का हमसब मिलकर नव निर्माण करें। जय हिन्द!

- शम्भु चौधरी

गुरुवार, 16 जून 2011

लोकपाल बिल की भ्रूण हत्या - शम्भु चौधरी


ड्राफ्ट कमिटि के सरकारी शातिरों ने एक नई पहल शुरू कर बिल को मूल रूप में न सिर्फ परिवर्तन करने का प्रयास किया उन लोगों ने बाबा रामदेव को जिस हथियार से लहूलूहान किया अब उनके दिमाग ने एक नई पहल शुरू कर दी है। उनको देश के संसद की अब बहुत याद सताने लगी। उनका यह मानना है कि संसद में इस अपूर्ण बिल को प्रस्तावित कर वे एक पंथ दो काज करने में सफल भी हो जायेगें। संभवतः उनका यह भी मानना है कि सिविल सोसाईटी के पांच सदस्य खुद को संसद से उपर न समझे। आखिर में संसद को हथियार बनाकर देश की जनता को गुमराह करने का राजनीतिक हथकंडा अपनाया जाने की तैयारी जोरों से शुरू हो चुकी है। एक पर एक लगातार जनता व मीडिया को गुमराह कर भ्रष्टाचारी व्यवस्था को संसद के भीतर बिल को भैंट चढ़ाने की तैयारी सरकार ने कर ली है। यह बात गत बैठक से ही सामने आने लगी जब सिविल सोसाइटी के सदस्यों द्वारा एक बैठक में गैरहाजीर रहने पर सरकारी पक्ष ने सीधे से एक प्रकार से घोषणा कर दी थी कि वे बैगर समाज के सदस्य के भी बिल को 30 जून तक संसद को बनाकर भेज देगें। यानी एकतरफा ऐलान की घोषणा साफ तौर पर सरकारी पक्ष की गुंडागर्दी सामने आ गई। सरकारी पक्ष की सोच है कि ड्राफ्ट कमिटि गठित हो जाने के बाद अब वे अपनी मनमानी कर एक तरह से लोकपाल बिल की आड़ में सरकारी भ्रष्टाचारी बचाव बिल संसद के पटल पर पटक देंगे, जिस पर संसद बहस करे और एक अपंग और लंगड़ा बिल देश के माथे ठोक कर अपनी गिरती हुई शाख को बचा लेंगे। देश की आजादी से लेकर आज तक कांग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकों के मामाले में ईमानदार रही बाकी कोई भी एक काम जिसे ईमानदारी का तगमा दिया जा सके मेरी नजर में तो नहीं है जो लोग सिविल सोसाईटी के सदस्यों या अन्ना हजारे को कठघरे में लाने का प्रयास कर रहें हैं वे वही लोग हैं जो पक्ष भ्रष्ट व्यवस्था के प्रवल समर्थक माने जाते हैं। देश किस प्रकार भ्रष्ट लोगों के हाथ से मुक्त हो इस पर उनके कोई राय नहीं है। कोलकाता के एक समाचार ने तो लिख ही दिया कि सरकार सिविल सोसाईटी की बात न माने न ही उन्हें कोई महत्व दिया जाय । इस संपादक का मानना ह कि देश संसद सदस्य चलाते हैं। सिविल सोसाईटी नहीं। जिन सदस्यों को जनता चुनकर संसद में भेजती है। जी संपादक जी! यह आपको बताने की जरूरत नहीं कि किसे कौन चुन कर संसद में भेजता है। सिविल सोसाईटी की बात भी जनता की आवाज है आपको इसका पैमाना तय करना है कि देश में भ्रष्टाचार काई मुद्दा है कि नहीं तो आप संसद को भंग कर जनता के बीच इस बात का फैसला करने का अधिकार सौंप दें। और एक बात कांग्रेसी को भी बता देना उचित होगा कि अन्ना हजारे बाबा रामदेव नहीं जिसे आप पांच सितारे होटल में बुलाकर ब्लेकमेल कर सको। सिविल सोसाईटी का आन्दोलन बाबा रामदेव का अनशन समझने की भूल न करें। इसे न सिर्फ आम जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त है कांग्रेस के परचे-परचे सड़क पर लड़खड़ाने लगेगें। संसद की आड़ में जनता को गुमराह करने की आदत से बाज आये कांग्रेसीगण लोकपाल बिल की सभी पहलुओं पर ईमानदारी से अपना पक्ष रखें जो बात आपकी सही होगी जनता स्वतः आपको समर्थन करेगी। मीडिया वाले दोस्तों से भी अपील है कि एक घर तो डायन भी छोड़ती है। भारत देश, अपना देश कैसे भ्रष्टमुक्त हो इस पर अपनी राय दें न कि जो लोग इस नेक कार्यों का अपना तन-मन-धन लुटाकर सामने आयें हैं उनके मजबूत इरादों को कमजोर करने जैसी टिप्पनियों की बोछार सिर्फ अपने तुक्ष्य इरादे की पूर्ति करने के लिये न करें। बिल पास हो न हो इससे सिविल सोसाईटी को क्या फर्क पड़ेगा? कांग्रेस के भ्रष्टी जो चाहतें हैं वही बिल संसद में आ जाय तो देश का क्या भला हो जायेगा? आज देश को एकतरफा फैसला लेना होगा कि हम देश को भ्रष्टमुक्त देखना चाहते हैं कि नहीं? यदि आपका उत्तर हाँ में हो तो सरकारी पक्ष की वकालत छोड़ कर जनता के बीच में खड़े हो जाएं इसी में देश का भला है।

मंगलवार, 7 जून 2011

कांग्रेस की घिनौनी रणनीति

तीन जून को दिल्ली के होटल के अन्दर काग्रेस नंगी हो कर बैठी थी। बाबा रामदेव तीन दिन की कांग्रसी मेहमानबाजी का आनन्द उठा रहे थे, मन ही मन सोच रहे थे कि ये चमत्कार कैसे और क्यों हो रहा है। एक बार तो इनको सपने में भी विश्वास नहीं हुआ कि ये भ्रष्ट और बेईमान लोग इतनी आसानी से कैसे उनकर मांगे मान रहें हैं। कहावत है ‘‘चोर चोरी से जाए - हैरा फेरी से न जाए’’ इस बात को आज पत्रकारों के लिए कोट करता हूँ कि ‘‘कलम जब चलती है तो उसकी स्याही खुद व खुद निकलती है, जब रुक जाती है तो स्याही सुख जाती है।’’ भारतीय पत्रकारिता विदेशी पत्रकारिता की तर्ज पर काम न करें। भ्रष्टाचार मिटाने का सारा जिम्मा अन्ना हजारे, बाबा रामदेव जी व अरविन्द केजरीवाल ने ही नहीं उठा रखा है। इस यज्ञ में हमारी भी आहुति होनी चाहिये। देश भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के जाल से जकड़ा हुआ है। उनकी इच्छाशक्ति कभी भी इस व्यवस्था को समाप्त करने की नहीं होगी। हमें चौतरफा हमला करना होगा ताकी तमाम राजनीतिज्ञों के नकाबपोश को उतारा जा सके। 2जी, या कॉमनवेल्थ घोटाले का हमें कभी पता न चलता यदि हमारे पास ‘‘सूचना का अधिकार कानून’’ नहीं होता। हमें जनता को बताना होगा कि ये कितने नकाबपोश देश के गद्दार हैं जो देश को भीतर ही भीतर खोखला किये जा रहें है। बाबा रामदेव जी के साथ 3 जून को दिल्ली के होटल के भीतर क्या घटना घटी इस सच को उजागर करते मेरे पत्रकार मित्र श्री हंसराज सुज्ञ जी का लेख यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया आप अपने समाचार व ब्लॉग पर इसे स्थान दें। - शम्भु चौधरी


- हंसराज सुज्ञ -


बाबा रामदेव ने जबसे चार जून को आंदोलन का ऐलान किया था। तब से ही सरकार ने अपनी घिनौनी रणनीति बनानी शुरु कर दी थी। रही बात माँगो की तो मांगे तो कांग्रेस कभी भी किसी भी हालत में नही मान सकती थी। क्यों कि क्या कोई चोर और उसके साथी कभी भी ये मान सकते है कि वो अपनी चोरी का खुलासा करें।
जब सुप्रीम कोर्ट कह कह के थक गया कि कालेधन जमा करने वालो की सूची जारी करें। जब इस भ्रष्ट सरकार ने आज तक सूची तक नही जारी की। तो काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना और उसको वापस लाना तो बहुत दूर की बात है। क्यों कि ये बात 100 % सही है की खुद इस गांधी फैमिली का अकूत धन स्विस बैँक में जमा है। इस बारे में सनसनी खेज खुलासे बाबा रामदेव की 27 फरवरी की रामलीला मैदान की विशाल रैली में भी हुये थे। जिसमें विशाल जनसमूह उमड़ा था और इस बिके मीडिया ने उस रैली को प्रसारित नही किया था। और जब आस्था चैनल ने उस रैली को दिखाया तो तुरंत इस सरकार ने आस्था चैनल पर इस रैली को दिखाने पर प्रतिबंध लगा दिया। उसके बाद से कांग्रेस का केवल एक ही उददेश्य था कि कुछ ऐसा किया जाये जिससे बाबा रामदेव पे लोगों का विश्वास उठ जाये।
क्यों कि कांग्रेस जानती थी की उसको किसी भी विपक्षी पार्टी से इतना खतरा नही है जितना बाबा रामदेव से है। क्यों कि उनके साथ विशाल जन समर्थन है। इसलिये कांग्रेस ने एक ऐसी घिनौनी साजिश रची । कि जिससे लोगों का विश्वास रामदेव से उठ जाये। एक जून को जब चार मंत्री एयरपोर्ट पर बाबा को लेने गये तो आम जनता या मीडिया को तो छोड़ो । स्वयं बाबा रामदेव भी नही समझ पाये। कि ये उल्टी गंगा कैसे बही? जब कि कांग्रेस के इस पैतरें का केवल एक ही उद्देश्य था। कि किसी तरह बाबा को प्रभावित करके एक चिटठी लिखवा ली जाये। ताकि बाद में ये साबित किया जा सके। कि अनशन फिक्स था और लोगों का विश्वास बाबा से उठ जाये।
लेकिन बाबा ने कोई पत्र नही लिखा।
कांग्रेस ने हार नही मानी दुबारा मीटिँग की फिर भी असफल रही। और फिर उसने तीसरी मीटीँग होटल में की । वहाँ उन नेताओं के पास बाबा की गिरफ्तारी का आदेश भी था। और होटल के बाहर काफी फोर्स भी पहुच गयी थी। नेताओं ने बाबा पर बहुत दबाब बनाया। और ये कहा कि आप की सारी मांगे मान ली जायेँगी लेकिन आप एक पत्र लिखे कि आप अपना अनशन खत्म कर देँगे। आपको ये पत्र लिखना बहुत जरुरी है। क्यों कि ये पत्र प्रधानमंत्री को दिखाना है।और ये एक आवश्यक प्रक्रिया है।
बिना पत्र लिखे वो बाबा को छोड़ ही नही रहे थे। इसीलिये उस मीटीँग में 6 घंटे का समय लग गया। उस समय बाबा रामदेव ये समझ गये थे कि कुछ षडयंत्र बुना जा रहा है। तब उन्होने संयम से काम लेते हुये पत्र लिखवाने पर तो मान गये लेकिन खुद साइन नही किया बल्कि आचार्य बालक्रष्ण से करवाया। हालाकि कांग्रेस बाबा से खुद साइन करने का दबाब डालते रहे लेकिन बाबा ने समझदारी से काम लेते हुये खुद साइन नही किया।
तब जाकर बाबा उस होटल से बाहर निकल पाये। उन्होने रामलीला मैदान पहुचते ही ये बता दिया कि उनके खिलाफ षडयंत्र रचा जा रहा है और वक्त आने पर खुलासा करेँगे। उसके बाद चार तारीख को नेताओं ने बाबा को फोन करके झूठ बोल दिया। कि आपकी अध्यादेश लाने की मांगे मान ली गयी है और आप अनशन खत्म करने की घोषणा कर दे। कांग्रेस इस बात का इंतजार कर रही थी कि एक बार बाबा अनशन खत्म की घोषणा कर दे तो उसके बाद वो पत्र मीडिया में जारी कर दिया जाये जिससे ये साबित हो जाये की अनशन फिक्स था और लोगों की नजर में बाबा नीचे गिर जाये। बाबा ने फिर घोषणा भी कर दी की सरकार ने हमारी माँगे मान ली है और वो जैसे ही हमें लिखित में दे देगी ।हम अनशन खत्म कर देँगे। सरकार फिर फस गयी क्यों कि उसने बाबा से झूठ बोला था कि वो अध्यादेश लाने की बात
लिख कर देगी ।जब कि वास्तव में उसने कमेंटी बनाने की बात लिखी थी। और बाबा जब तक अध्यादेश लाने की बात लिखित रुप से नही देखेँगे। तब तक वो आंदोलन नही खत्म करेँगे। तब कांग्रेस के चालाक वकील मंत्री सिब्बल ने तुरंत मीडिया को पत्र दिखाया और ये जताया कि ये अनशन पहले से फिक्स था। क्यों कि
सिब्बल जानता था कि मीडिया बिना कुछ सोचे समझे बाबा की धज्जियाँ उड़ाने में लग जायेगा। हुआ भी यही मीडिया ने बिना कुछ समझे चिल्लाना शुरु कर दिया की बाबा ने धोखा किया। लोगों की भावनाओं से खेला आदि।
जब बाबा को पता चला कि सिब्बल ने एक कुटिल चाल खेली है। तब उन्होने बड़ी वीरता से उस धज्जियाँ उड़ाने को आतुर मीडिया को सारे सवालो के जबाब दिये और स्थिति को संभाल लिया। कांग्रेस अपनी इतनी बड़ी चाल को फेल होते हुये देख बौखला गयी। और उस मूर्ख कांग्रेस ने मैदान में रावणलीला मचा कर अपनी कब्र खोदने की शुरुआत कर दी।

सोमवार, 6 जून 2011

सत्याग्रह की नई व्याख्या अन्ना हजारे लिखेगें - शम्भु चौधरी, कोलकाता


अपनी बातः कांग्रेसी चरित्र
कोलकाताः 7 जून 2011;
देश की आजादी से लेकर आज तक कांग्रसी लोगों का एक ही चरित्र सामने उभर कर आया है। पहले नेहरु जी, बापूजी को गुमराह किया करते थे आज सारे के सारे कांग्रसी देश को गुमराह करने के फिराक में लगे रहते हैं। इनके पास तीन प्रमुख हथियार है।
1. सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम,
2. लोकपाल बिल व भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की कल्पना एवं
3. नई-नई व्याख्या करना।

1. सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम:
सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम किसी दूसरे के मुंह से सुनना या उनके नाम पर की जाने वाली किसी भी टिप्पणियों पर तत्काल आपे से बहार आकर सबके सब यह दिखाने का अवसर तलाशते रहते हैं कि कैसे वे भी कांग्रेसी दरबार के विश्वास पात्र बन जाये। स्व. सीताराम केसरी, बापू जगजीवन राम और अब हमारे प्रियतम प्रधानमंत्री श्री श्री 420 मनमोहन सिंह जी की कड़ी बनने की ताक में सभी के सभी कतार लगाये खड़े हैं। कब किसका नम्बर आ जाये? बेचारे प्रणब दा इस फिराक में दो बार फिसल चुके हैं। एकबार तो इनको कांग्रेस तक छोड़ना पड़ा, बाद में कहीं दाल न गली तो वापस उसी कचरे के डब्बे में जाकर शामिल हो गये। अब तो उनको नम्बर2 से ही संतोष करना पड़ता है। चुंकि इस बीच कई दूसरे 1नम्बर में स्थान प्राप्त कर लिए। शरद पवार की गर्त आपके सामने है। यह तो रहा कांगे्रसी नेताओं की नौकरी का सवाल। अब देखिये इनके प्रांतीय नेताओं के हाल- बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बंगाल, उडीसा एवम् महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों की हालत। सारे के सारे प्रान्तीय नेताओं के पर कुतर-कुतर कर इन प्रान्तों को दूसरे राजनैतिक दल या खुद के दल से टूटे हुए नेताओं के सहारे किसी प्रकार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाये रखने में लगे हैं। अभी बंगाल में ही देखिये एक समय ममता दीदी को प्रणब दा एण्ड पार्टी ने कांग्रेस से बहार निकाल फेंक, बामपंथियों का हाथ थामे बंगाल का 35 साल तक बंटाधार करते रहने वाले श्रीमान् महोदय को ममता दीदी ने एक बार कह दिया सो कह दिया लेना हो तो लो नहीं तो जाओ। झक मरवाकर इनको ममता दीदी से समझौता करना पड़ा। ठीक ऐसी ही हालात कम व वैसी अन्य प्रान्तों की हो चुकी है। अब तो इस डूबती नैया को सहारा मात्र सांप्रदायिकता की आड़ में एक धर्म विशेष को बार-बार याद करना इनका मुख्य और एक मात्र एजेन्डा बचा गया है।
अब इनके दूसरे चरित्र को देखें-
2. लोकपाल बिल व भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की कल्पनाः
श्री अन्ना हजारे एवं उनके सहयोगियों द्वारा बनाये जा रहे लोकपाल बिल को किसी तरह एक तरफा बिल बनाकर देश को थोपने की रणनीति के तहत कांग्रेसी शातिर दिमाग के धनी श्री कपिल सिब्बल साहेब ने पहले बाबा रामदेव को उकसाया, उन्हें सर पर बैठाया। फिर देखे कि यह बन्दर तो पेड़ से नीचे ही नहीं उतर रहा तो पेड़ को ही रातों रात काट डाला। यह एक सोची समझी साजिश का एक हिस्सा है। सरकार की मंशा कभी भी भ्रष्टाचारियों को सजा देना है ही नहीं, सरकार उनको बचाने के उपाय इस बिल के माध्यम से लाने का प्रयास कर रही है। कल की लोकपाल बिल विधयेक की बैठक में जब ‘समाज’ ने भाग न लेने का फैसला कर लिया तो सरकार ने एक तरफा बैठक कर अपने निर्णय सुना दिये। सरकार को पता है कि यह जो समिति के नाम का जो नाटक उसने रचा है उसके क्या परिणाम निकलने वाले हैं। इस बिल के एक हिस्से पर ‘समाज’ के सदस्यों के विरोध को देखते हुए ही शातिर दिमागी श्री सिब्बल जी ने बाबा रामदेव जी सामने खड़ा कर उनसे एक बयान दिलवाया था कि प्रधानमंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को लोकपाल बिल से अलग रखा जाए। इस बात को लेकर श्री अरविन्द केजरीवाल नाराज भी हुए एवं कहा कि हम बाबा रामदेव जी से बात करेगें। परन्तु तब बाबा रामदेव जी को राजनीति के शातिरों की चालाकी नहीं समझ में आ रही थी। खर! अब बाबा के साथ जो हुआ इसे हम किसी भी दृष्टि से जायज नहीं ठहरा सकते। लोकतंत्र में राजनीति चालें जब तक चली जाती है तब तक जनता लाचार होती है परन्तु जब प्रशासनिक हथियार जब सरकार उठा लेती है तो जनता उसका जबाब देकर रहती है। कांग्रेस अब इसे राजनैतिक रंग देने के लिए कहना शुरू कर दिया कि बाबा रामदेव के पीछे भाजपा एवं संघ के लोग हैं। यह बात कांग्रेस को पाँच दिन पहले नहीं दिखाई दे रही थी क्या? आज अचानक से उन्हें वोट बैंक की राजनीति शुरू करनी पड़ गई। कांग्रेस का यह दूसरा और सबसे खतरनाक कार्ड होता है मुसलमानों को डराना एवं उनके वोट को अपनी झौली में बनाये रखना। यही कारण है जब भी इनको अवसर मिलता है वे हर मुद्दे को सांप्रदायिकाता से जोड़ने का प्रयास करते हैं। अब जरा आप ही सोचिये यह जो विदेशों में कालाधन एवम् देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से सांप्रदायिकता या मकपा, भापका, भाजपा, धर्म-जाति से क्या लेना? हां है लेना-देना है। कांग्रेस की सत्ता इस एक बिल से भारत से समाप्त हो जायेगी। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना मात्र से कांग्रेस का इस जमीन से सफाया हो जायेगा। भला आप भी कल्पना किजियेगा। हां! एक बात और कल माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को दिल्ली के रामलीला मैदान में आधी रात को सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियों की बरसात एवं अंश्रू गैस छोड़े जाने की घटना पर संज्ञान लेते हुए नोटीस जारी की है। कांग्रेसीगण जरा यह बतायेगें कि यह सुप्रीम कोर्ट कौन सी पार्टी के सदस्य हैं?
इनका तीसरा चरित्र-
3. नई-नई व्याख्या करनाः
कांग्रेसियों ने अपने तरह से सत्याग्रह के नये तरिके से मापदण्ड तय करने का प्रयास किया जैसे कांग्रेसियों के अलावा किसी ने आन्दोलन किया ही नहीं हो। बल्कि कांग्रेसियों ने तो सिर्फ सत्याग्रह के नाम पर अपनी रोटी सैंकी है। सिर्फ भारत की ही बात करें तो गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के बाद कोई भी कांगे्रसी ने कभी भी कोई सत्याग्रह किया ही नहीं। न तो आजादी के पहले का कोई इतिहास है ना ही आजादी के बाद का। जो भी आन्दोलन या सत्याग्रह हुए हैं वे सभी गांधीजी के समय के हैं। इसके बाद केवल लाश बेचने, सांप्रदायिकता भड़काने, मुसलमानों को डराने व उनको एकत्रित कर उनके वोट पर सत्ता प्राप्त कर उनका कभी भी विकास न करना और नेहरु परिवार के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हुए अपनी राजनीति धरातल को बनाये रखना यही कांग्रसियों का कुल मिलाकर इतिहास रहा है। कांग्रेसियों की व्याख्या से अब भारत का निर्माण नहीं किया जायेगा। सत्याग्रह की नई व्याख्या अब अन्ना हजारे लिखेगें। जयहिन्द! वन्देमातरम्!

रविवार, 5 जून 2011

अपनी बातः ढाक के तीन पाँत - शंभू चौधरी

Anna Ham Tumare Sath


कोलकाता, दिनांक 6जून 2011;
आज निम्न तीन बिन्दुओं पर आपसे बात करूँगाः
1. भाजपा का अन्धापन,
2. बाबा रामदेव बनाम लोकपाल बिल एवम्
3. लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशा।


1. भाजपा का अन्धापनः
इस देश में गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, मंहगाई, महिलाओं पर अत्याचार, अराजकता, सांप्रदायिकता, कुपोषन, चिकित्सा, आर्थिक अपराधिकरण, असामाजिक आचरण वालों का राजनैतिक संरक्षण, शिक्षा, किसानों द्वारा आत्महत्या, किसानों की उपजाओ जमीन का व्यवसायीकरण, अनैतिक अधिग्रहण जैसे सैकड़ों मुद्दे भारत के कण-कण में विखरे पड़े हैं, परन्तु पता नहीं संसद के अन्दर पैसे लेकर प्रश्न उठाने वाले भाजपा सांसदों को ये मुद्दे क्यों नहीं वक्त से पहले दिखाई देते। जब कोई इन मुद्दों पर आन्दोलन करता है तो भाजपा वाले सबसे पहले यहाँ पहुँच कर अपनी छवि बनाने का प्रयास करती रही है। रामजन्म भूमि विवाद से लेकर भ्रष्टाचार सहित सभी आन्दोलनों में भाजपा का एक ही चरित्र देखने को मिला कि वो अपने 90 साल के प्रधानमंत्री प्रत्यासी को लेकर लकड़ी से घास खिलाने का काम करती रही है। कभी जिन्ना के नाम पर तो कभी राम के नाम सत्ता का स्वाद लेने की नकाम दौड़ जारी है। पिछले दिनों सरकार ने पेट्रोल के 5 रु. दाम बढा दिये, भाजपा ने एक दिन सांकेतिक हल्ला कर लोगों को सड़कों पर परेशान किया। फिर वही ढाक के तीन पाँत। क्या हुआ? बाबा रामदेव को सबसे पहले मलहम लगाने दौड़ने चाली भाजपा के नेताओं से एक सीधा सा प्रश्न है कि नियत साफ है तो संसद से सारे सदस्यों को इस्तीफा देने को कह कर देश में मध्याविधि चुनाव के लिए जनता के बीच में जाएं और एक शपथ लें कि वे भ्रष्टमुक्त राष्ट्र की कल्पना को मुर्तरूप देने के लिए देश की जनता के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलेगी।

2. बाबा रामदेव बनाम लोकपाल बिल
अब बाबा को यह स्वीकार कर लेना चाहिये कि भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के लिए सभी को साथ लेने की जरूरत है। जिसमें किसी भी राजनैतिक दल का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सहयोग इस लड़ाई को कमजोर करना है। बाबा को मान लेना चाहिये कि यदि राजनेताओं में इतनी ही ईमानदारी हुई होती तो बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल या किरण बेदी की कोई जरूरत नहीं होती। देश को आपलोगों से काफी अपेक्षाऐं हैं। बस एक मंच से एक होकर लड़ने कि हमें जरूरत है। आज से ही आप एह ऐलान कर दें कि यह देश की लड़ाई है इसे हम सब मिलकर लड़ेगें।

3. लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशाः
जिस प्रकार कांग्रेसी सरकार के शातिर दिमाग ने बाबा रामदेव को अपने जाल में फांस अपने कांटे को निकालने के लिए जनता के दिमाग का 'आईवास' कर रामदेवजी क आन्दोलन को कुचलने की साजिश रची और आंशिक सफल भी रहे माना जा सकता है। हमको यह मान लेना चाहिये कि लोकपाल विधयेक पर सरकार की मंशा को लेकर जनता के बीच जाने की जरूरत है। इसके लिए हमें अब मध्याविधि चुनाव का मार्गा अपनाने की तरफ कदम बढा़ना होगा।

हम श्री अरविन्द जी को विश्वास दिलाते हैं


हमारी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ उस व्यवस्था से है जो इसका पोषन करती आ रही है। न कि किसी व्यक्ति विशेष या सरकार के नुमाईदों के साथ है। बाबा रामदेव ने जब काले धन और भ्रष्ट तंत्र की बात शुरू की तो एक विचारधारा के सभी लोगों का एक मंच पर जमा होना स्वभाविक सा था। इस क्रम में स्वामी अग्निवेश जी, श्री अन्ना हजारे, श्री अरविन्द केजरीवाल एवं किरण बेदी का एक साथ एक मंच पर आना इस लड़ाई को बल देने लगा।
अपने स्वभाव से उग्र श्री अन्ना हजारे ने इस लड़ाई को आर-पार की लड़ाई कर अनशन का मार्ग चुन लिया जबकि श्री बाबा रामदेव जी सरकार को सिर्फ खोखली धमकी देते रहे। अन्न जी ने जैसे ही इसका दिल्ली में अनशन शुरू किया बाबा को एकबार लगा कि उनका मुद्दा अन्ना जी ने हाईजेक कर उसे किनारे कर दिया है। वे एकबार मंच पर दिखे पर बड़े वेमन से मंच आये। तब तक देश की जनता पुरी तरह से अन्ना के आंदोलन से जुड़ चुकी थी। एक ही रात में अन्ना के नाम से केन्द्र सरकार हिल चुकी थी। पहले दिन आनाकानी करने वाल श्री सिब्बल जी एवं प्रनव दा के स्वर बदलने लगे। सरकार सभी बातों को क्रमवार मानते चली गई। बाबा को लगा कि उसे किनारा कर दिया गया हो, फिर ड्राफ्टींग कमिटि में खुद के नाम को न पाकर सिविल सोसाइटी द्वारा नामांकित कुछ नामों पर अपनी आपत्ति तक दर्ज करा दी। यही कसक बाबा को नागवार गुजरा जिसको लेकर वे एक योजना के तहत कार्य करने लगे। इस घटना के बाद अन्ना सहित उन सभी लोगों को बाबा के मंच पर आने न तो निमंत्रन दिया गया। न ही बाबा की तरफ से कोई ऐसी पहल की गई। कांग्रेस के चतुर राजनीतिज्ञों ने इस बीच के दरार को दो फाड़ करने के लिए जहाँ एक तरफ बाबा को एक ही मुद्दे पर तुल देने लगे तो दूसरी तरफ सिविल सोसाईटी के सदस्यों के साथ कड़ाई से पेश आने लगे। अन्ना के साथीगण इस दोहरी राजनीति के शिकार हाने लगे। इनको लगा कि बाबा की इस पहल से कांग्रस पार्टी इस ड्राफ्टिंग कमिटि की हवा निकाल देगी।
सबकुछ सिलसिले बार चल रहा था। बाबा को लगा कि अब वे कांग्रेस पार्टी के कहे चलकर अपना उल्लू सीधा कर लेगें। परन्तु वे अपने और पराये का फर्क नहीं समझ पाये। वे कांग्रेस के श्री कपिल सिब्बल एवं श्री सुबोधकांत सहाय को अपना विश्वासपात्र मान उनके बुलावे पर उनके मांद में वैगर किसी को बताये चुपचाप समझौता कर आये। मजे कि बात यह कि अपने एक सहयोगी द्वारा लिखित समझौते को पुरे दिनभर मीडिया से छुपाये रखा। खर! हम बाबा रामदेव की इस भूल को हमारी हार मानते हुए पुनः संगठित रूप से इस लडा़ई को आगे जारी रखेगें एवं बाबा रामदेव जी की प्रतिष्ठा को सम्मान करते हुए हम श्री अरविन्द जी को विश्वास दिलाते हैं कि हम सभी आपके साथ हैं। पूर्व में लिखे मेरे दोनों लेख को हटाने की घोषणा करते हुए आगे के आदेश की अपेक्षा करता हूँ। शम्भु चौधरी, कोलकाता

शनिवार, 4 जून 2011

बाबा रामदेव-ढोल की पोल

Baba Ramdev
यह बात उसी समय स्पष्ट हो गई थी जब राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले श्री कपिल सिब्बल एवमं श्री सुबोधकांत सहाय के साथ गुप्त रूप से समझौता कर लेने के बाद योगी-ढोंगी बाबा रामदेव का पांच सितारा सत्याग्रह विवाद के घेरे में आ गया। देश की करोड़ों जनता को धोखा देने वाले अविश्वासी बाबा के विश्वास पात्र आचार्य बालकृष्ण जी का लिखा पत्र देखकर सारी दुनिया चकित रह गई। पहले ही सत्याग्रह के नाम पांच सितारा पंडाल को लेकर एक लम्बी बहस को बाबा ने जन्म दे दिया। अब किस मुँह से ‘विश्वासघात और धोखेबाजी’ का आरोप सरकार पर मंढ़ रहे हैं? बाबा! । बाबा जी द्वारा अनशन के ठीक पहले दिन की गई गुप्त बैठक का गुप्त एजेन्डा सरकार की दो तरफा चाल का एक हिस्सा था। एक अन्ना हजारे समूह को कमजोर कर उनमें फूट डालना, दूसरा बाबा को सामने लाकर बाबा से गुप्त समझौते के तहत अन्ना हजारे द्वारा तैयार किये जा रहे मौसदे में विवाद पैदा करने के लिए तीसरे पक्ष को सामने खड़ा करना। जब बाबा ने इस गुप्त समझौते में इस बात की मांग रखी कि उनके द्वारा संचालित न्यास एवं ट्रस्ट को बैगर क्षति पंहुचाये सरकार उनको अन्ना हजारे के समकक्ष प्रधानता प्रदान करें। बस क्या था बाबा की कमजोर नस को राजनीति के खिलाड़ी तत्काल भांप गये कि यह योग बाबा योगी नहीं, ‘एक ढोंगी बाबा है।’ सरकार ने तत्काल अपने पैंतरे बदलने शुरू कर दिये। जैसे-जैसे दिन गुजरता गया ढोल की पोल खुलती गई।
कल मैंने चार प्रश्न किये थे उसे आज फिर से दोहरा रहा हूँ-

  • 1.बाबा को यह बताना चाहिये कि उनको गुप्त बैठक करने की क्या जरूरत पड़ गई जिसमें उनके साथ एक भी दूसरा जन प्रतिनिधि नहीं था? सिर्फ उनके संस्थान का ही एक सदस्य क्यों था?
  • 2.लाखों के इस भव्य पंडाल की योजना किसके अनुमति से और क्यों बनाई गई?
  • 3.बाबा जी के साथ एक भी सामाजिक कार्यकर्ता क्यों नहीं है, सिर्फ धार्मिक लोगों में भी तीसरी या चौथी श्रेणी के लोगों की ही भरमार है।
  • 4.बाबा के इस आंदोलन को किस समूह द्वारा चलाया जा रहा है। उनके नामों को अभी तक सामने क्यों नहीं लाया गया ?

    - निर्भिक पत्रकार शम्भु चौधरी, कोलकाता।

  • शुक्रवार, 3 जून 2011

    बाबा रामदेव का नाटक भरा आंदोलन

    बाबा रामदेव का नाटक भरा आंदोलन पांच सितारा पंडाल से कल शुरू होने जा रहा है। इसके पूर्व बाबा ने दिल्ली के एक होटल में सरकार के दो प्रतिनिधि श्री कपिल सिब्बल एवं श्री सुबोधकांत सहाय से एक गुप्त बैठक करने का प्रयास किया जिसकी जानकारी प्रेस मीडिया वालों को नहीं देकर शक की बुनियाद खड़ी कर दी।
    पहला शक- बाबा को यह बताना चाहिये कि उनको गुप्त बैठक करने की क्या जरूरत पड़ गई जिसमें उनके साथ एक भी दूसरा जन प्रतिनिधि नहीं था? सिर्फ उनके संस्थान का ही एक सदस्य क्यों था?
    दूसरा शक- लाखों के इस भव्य पंडाल की योजना किसके अनुमति से और क्यों बनाई गई?
    तीसरा शक- बाबा जी के साथ एक भी सामाजिक कार्यकर्ता क्यों नहीं है, सिर्फ धार्मिक लोगों में भी तीसरी या चौथी श्रेणी के लोगों की ही भरमार है।
    चौथा शक- बाबा के इस आंदोलन को किस समूह द्वारा चलाया जा रहा है। उनके नामों को अभी तक सामने क्यों नहीं लाया गया ?

    बुधवार, 1 जून 2011

    सकारात्मकता या नकारात्मकता - शम्भु चौधरी


    Shambhu Choudharyमहाभारत में जब भगवान श्री कृष्ण सारथी स्वरूप अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे थे। उस समय एक साथ दो क्रियाऐं चल रही थी। एक तरफ श्री अर्जुन के अशान्त मन को शन्ति प्राप्त हो रही थी तो दूसरी तरफ धृतराष्ट्र जैसे-जैसे संजय से श्री कृष्ण की वाणी सुन रहे थे, उनका मन विचलित और अशान्त होते जा रहे था। एकबार मेरी पत्नी मुझसे यह प्रश्न किया कि ’’हम दुःखी क्यों होतें हैं?’’ जबाब सरल था। जिस क्रिया को हम स्वीकार नहीं कर पाते उससे हमें दुःख पंहुचता है। उदाहराणार्थः किसी अशुभ समाचार का सुनना। इसी प्रकार कई ऐसे भी समाचार होते हैं जो एक साथ दो परिणाम देते हैं जैसे चुनाव परिणाम की घोषणा। आमतौर पर आजकल सकारात्मक पहल की बात ज्यादा होती है। एकबार एक सदस्य ने लिखा कि जब हम किसी बात से संतुष्ट नहीं होते तो नकारात्मक विचार पैदा करने लगते हैं। संभवतः कुछ हद तक यह बात सही हो, परन्तु हमें बात भी समझने कि है कि आखिर में जो बात पदाधिकारियों को नकारात्मक लग रही है वह संस्था के हित में सकारात्मक हो? हमें यह समझने की जरूरत है कि जिस बात को हम सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिये से लेते हैं वे सिर्फ हमारी सोचने की प्रक्रिया का एक मात्र परिणाम हो। ऐसा नहीं कि हम जो भी सोचे, वही सही हो। एकबार सिकंदर विश्व विजयी बनने के लिये निकला लेकिन एक संत के तर्क से हार गया। कारण मात्र संतोष की मात्रा तय करने से है। कोई एक रोटी मिल जाने से संतुष्ट हो जाता है तो किसी को सारा भंडारा भी मिल जाए तो उसे संतोष प्राप्त नहीं होता। प्रायः साधारण सभाओं में सदस्यों का असंतोष उभरकर सामने आता है पदाधिकारीगण ऐसे असंतोष को नकारात्मक क्रिया की संज्ञा देकर खुद का बचाव कर लेते हैं या किसी ऐसे अवसर की तलाश करते हैं जब वो सदस्य किसी विशेष व्यक्ति को दोषी ठहराने का प्रयास करे या जब कोई बात खुद के अहम को आहत कर दें ऐसी बातों को हम नकारात्मक संज्ञा के दायरे में डाल देते हैं। अर्थात सकारात्मकता या नकारात्मकता के अनुपात में परिवर्तन हमारे ग्रहण करने अथवा न करने से तय होती है।
    दुर्योधन के अपमान जनक शब्दबाण के वाबजूद कुरुक्षेत्र में श्री अर्जुन अपने परिजनों को देख विचलित होने लगे थे। जबकि अपने पुत्र के जीत को लेकर आशान्वित धृतराष्ट्र श्री कृष्ण के प्रवचन से अशान्त होते जा रहे थे। क्या गीता में हमें नकारात्मक संदेश मिलता है? नहीं। यदि आपके अन्दर विचारों का भण्डार है तो उससे हर वो व्यक्ति कंपित होगा जो सत्ता को अपनी जमींदारी समझता है। बस आपको यह सोचना है कि आपके मन में उत्पन्न विचार दूरगामी प्रभाव देने वाले हों। कौन किस बात को सकारात्मक लेगा या उसका अर्थ नकारात्मक लेगा इसे आप कभी नहीं सोचें अन्यथा आपके मन में उत्पन्न विचार कभी भी आपको स्थापित नहीं कर सकेगा।

    रविवार, 29 मई 2011

    राजस्थानी शब्द का प्रयोग - शम्भु चौधरी


    Rajputana Prant Before Independence of India
    धीरे-धीरे मारवाड़ी शब्द संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। अब यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है। एक समय था जब इतर समाज के साथ-साथ समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। समाज के जो युवक पढ़-लिख लेते थे वे अपने आपको न सिर्फ समाज से अलग मानते थे, वरण कई ऐसे भी थे जो अपने नाम के आगे जाति सूचक टाइटल को भी हटा दिया करते थे ताकी उनको सरकारी नौकरी करने में सहुलियत हो। इसके प्रायः दो करण थे- पहला समाज में सरकारी नौकरी करना अच्छा नहीं माना जाता था। दूसरा नौकरी करने वाले बच्चे की शादी समाज के भीतर करना एक टेढ़ी खीर के बराबर थी। आज भी समाज में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिसमें हम रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर श्री विमल जालान का नाम उदाहरण के तौर पर रखा जा सकता है। जबकी इनके पिता स्व. ईश्वरदास जालान जाति सूचक शब्द ‘मारवाड़ी’ में पूरी आस्था रखते थे एवं जाति सूचक ‘मारवाड़ी’ शब्द से शुरू की गई संस्था ‘‘मारवाड़ी सम्मेलन’’ के जन्मदाता के रूप में आपका नाम लिखा जाता है। कई बार हरियाणा के मारवाड़ी राजस्थानी शब्द को लेकर विचलित हो जाते हैं। कई सभाओं में इस बात का विवाद अनजाने में ही शुरु हो जाता है कि सभा में या संविधान में सिर्फ राजस्थानी भाषा और संस्कृति पर ही चर्चा क्यों होती है इस तरह क अनसुलझे प्रश्न सामने आते रहते है। जिसका समाधान भी खोजा जाता है, चुकिं उपयुक्त उत्तर के अभाव में विवाद को टालने के लिए सिर्फ ‘मारवाड़ी’ शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है।
    जहाँ तक मेरा मानना है कि ‘मारवाड़ी’ - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी विषेश प्रान्त का ही द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान व राजस्थानी सीमावर्ती इलाके जिसमें हरियाणा व पंजाब के कुछ हिस्से जो कालांतर भौगोलिक रेखाओं में परिवर्तन के चलते इन प्रान्तों में राजपुताना रियासतों का विलय कर दिया गया को, के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी ‘मारवाड़ी’ शब्द से जाना व पहचाना जाता है। जबकि इन सबकी संस्कृति और भाषा राजस्थानी ही है। ( मुसलमानों को छोड़कर )।
    यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताना के क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने व पहचाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनावे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही है। इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आमतौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हो। पिछले दिनों यह प्रश्न उठा कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इसे पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी और केन्द्र ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थानी रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान, रीति-रिवाज हो या पर्व-त्यौहार सभी में समानता पाई जाती है जो थोड़ा बहुत अन्तर पाया जाता है वह सिर्फ आंचलिक बोली का ही है। ( देखें दिये गये एक चित्र के तीर निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों हरियाणा राज्य में आते हैं। ) इसलिए राजस्थानी शब्द की व्यापकाता पर हमें सोचने की जरुरत है न कि प्रान्तीयता के नजरिये से होकर हमें अपने अन्दर संकुचित विचार पैदा करने की।

    बुधवार, 15 दिसंबर 2010

    आपां तो लड़की वाला ठहरा - शम्भु चौधरी


    Shambhu Choudhary
         यह बात सही है कि मारवाड़ी समाज के एक वर्ग ने काफी धन अर्जित किया, संग्रहित किया, संचित भी किया, इसका उपयोग किया तो दुरुपयोग भी। सामाजिक कार्यों मेँ जी जान से खर्च किया तो शादी-ब्याहों में इसका आडम्बर करने से भी नहीं चुका। धार्मिक कार्यों या आयोजनों मेँ धन को समर्पित किया तो खुद को पूजवाने भी लगे। समाज सेवा की तो, सेवा को बदनाम कर समाज सेवक कहलाने की एक मुहिम भी चली। कोई खुद को चाँदी में तुलवाने को सही ठहराता है, तो कोई भागवत कथा के नाम पर लाखों का खर्च को। एक दूसरे को शिक्षा देने में किसी से कोई कम नहीं। एक लाखों का विज्ञापन छपवाकर समाज को शिक्षा दे रहा है, तो दूसरा इस तर्क से कि धन उनका है वे उसको कैसे भी लुटाये। वाह भाई! वाह! कमाल का यह समाज। इस समाज का कोई सानी नहीं। कौन किसकी परवाह करता है। सभी अपने मन के मालिक हैं भला हो भी क्यों नहीं धन जो कमा लिया है बेशुमार दौलत का मालिक जो बन गया है यह समाज। मानो लक्ष्मी से लक्ष्मी की हत्या का अधिकार मिल गया हो इस समाज को। मारवाड़ी समाज की एक सबसे बड़ीं ख़ासियत यह भी है कि इस समाज को किसी भी प्रान्त के साहित्य-संस्कृति-भाषा-कला या उनके रहन-सहन, खान-पान (यहाँ तक की राजस्थान से भी) आदि से कोई लगाव नहीं सिर्फ और सिर्फ अपनी जीभिया स्वाद और पैसे का अहंकार इनको नीमतल्ला घाट तक पीछा नहीं छोड़ता।


         परन्तु इस नालायकी के लिये सारा समाज न तो दोषी है ना ही हमें समझना ही चाहिये। समाज का समृद्ध परिवार आज भी धन के इस तरह के दुरुपयोग से कोशों दूर है, यह जो भी गंदगी और धन के नंगे प्रदर्शन मे लगे लोग हैं वे या तो नाजायज तरीके से अर्जित धन को खर्च कर अपनी मानसिक विकलांगता को समाज के सामने परोस रहें हैं या फिर गांव का धन है जिसे वे खुले हाथ लूटा रहें हैं। संपन्न वर्ग और समृद्ध परिवार कभी भी अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन नहीं करेंगे, इस तरह धन की बर्बादी को जो लोग उचित ठहराते हैं वे न सिर्फ दरिद्र ही हैं ऐसे लोग विकलांग भी हैं। मानो संपन्नता की आड़ में खुद के साथ-साथ समाज की दरिद्रता का प्रदर्शन करता हो, जिससे समाज का हर वर्ग न सिर्फ दुखी है, लाचार भी हो चुका है। कुछ लोग तो आडम्बर को समाज की जरूरत मानते हैं। कहते हैं नहीं तो समाज उसे दिवालिया समझेगा, अब इस दिवालियापन का क्या इलाज?


         अपने अर्जित धन को खुद के बच्चों के ब्याह-शादियों में खर्च करने का समाज को पूरा अधिकार है, करना भी चाहिये, इसके लिये गली मत बनाई.. शान से खर्च कीजिए पर साथ-साथ कुछ नेक उदाहरण भी देते जाईये जिससे समाज को लगे कि आप सच में धनवान हो। धन से ही नहीं मन से भी धनवान हो। झूठी दलीलों की धरातल पर खुद के दिवालियेपन को समाज पर थोपकर, कोई लड़के वाले का नाम लेता है तो कोई लड़की वाले का। " भाई कै करां आपां तो लड़की वाला ठहरा या भाई लड़की वाला ने कोई दवाब कोनी देवां अब वे अपनी मर्जी से खर्च करे तो आंपा कै कर सकां हाँ!" ये दलीलें खुद की नपुंशकता को छुपाने वाली बात है।


         हमेशा से मैं इस बात का समर्थक रहा हूँ कि उत्सव के अवसर को उत्साह के साथ मनाये इसका यह अर्थ नहीं कि फ़िज़ूलखर्ची करें। जरूरत के अनुसार सजावट करें व परिवार-मित्रों के साथ उत्साह के साथ उत्सव मनायें भीड़ एकठी न करें। इन दिनों ब्याह-शादियों में लोग आडम्बर तो करते ही हैं साथ-साथ इस आडम्बर को दिखाने के लिये वेबजह हजारों लोगों को जमा कर लेते हैं। पता नहीं खाने के नाम पर लोग जमा भी कैसे हो जाते हैं- कहते हैं भाई "चेहरो तो दिखाणो ही पड़सी" जैसे किसी मातम में जाना जरूरी हो। पिछले सालों में इसका प्रचलन तेजी से हुआ है। शहरों में एक-एक आदमी ३-४ ब्याह के कार्ड हाथ में लिये शादीबाडी़ खोजते नजर आ जातें हैं। गाँव में आज भी ऐसी स्थिति नहीं हुई है। गाँवों में शादी-ब्याह के नियम-कायदे लोग मानते हैं। इनमें आज भी समाज का भय बना रहता है। परन्तु शहरों में खासकर महानगरों में कोई किसी की नहीं सुनने को तैयार।


         इसी प्रकार भागवत भी बंचवाईये, इसके लिये जरूरी धन की व्यवस्था भी करे परन्तु जो भागवत आप क्रूज जहाज़ में सुनने जा रहें हैं वो भागवत कथा को बदनाम ही करता है, जो महंत इस तरह धन के लालच में भागवत कथा को बेचने की दुकान खोल लिये हैं वे हिन्दू धर्म का विनाश करने में लगे हैं, मेरा उनसे आग्रह रहेगा कि धर्म को कभी भी किसी भी रूप में कैद करने वाले ऐसे तत्वों को पनाह न देवें। मारवाड़ी समाज यदि इसके लिये गुणाहगार है तो उसे सम्मानित न होने देवें और अपनी विद्या को धर्म के प्रति समर्पित करे न कि धन के प्रति।


    नववर्ष आपका मंगलमय हो, इसी शुभकामनाओं के साथ।

    सोमवार, 13 दिसंबर 2010

    व्यंग्य- टूकुर-टूकुर - शम्भु चौधरी

    हिन्दी साहित्य सभा की एक साहित्यिक गोष्ठि चल रही थी, विचार हो रहा था कि हिन्दी को कैसे मजबूत किया जाय। मांग हुई कि भारत सरकार अपने सभी मंत्रालय में हिन्दी के जानकार को जरूर से रखे खासकर ऐसे विभाग जो अहिन्दी राज्यों में संचालित होते हैं, देखा गया कि इससे १० हजार हिन्दी भाषी कि नियुक्ति हो जायेगी। सदस्यों ने राय दी कि हमें राज्य सरकारों एवम् गैर सरकारी संस्थानों में भी हिन्दी के लिये पद सुरक्षित कराया जाना चाहिये। सबकी एक राय हुई कि इस संदर्भ मे एक प्रस्ताव बना कर सभी राज्य सरकारों व केन्द्रिय सरकार को भेजा जाय। सभी सदस्य मन ही मन काफी संतुष्ट नजर आ रहे थे। सभा जब समाप्त हो गई तो एक न व्यंग्य किया "भाई! नौकरी तो हमें हिन्दी के नाम पर मिलेगी तब हमारी क्या योग्यता रही?" दूसरे न जबाब दिया -"हिन्दी!" हम हिन्दी के वाहक बन कर अपने नाम के आगे अंग्रेजी चिन्ह लगाकर "Dr." अपनी नौकरी पक्की करा लेंगे। बाकी के ७० करोड़ लोग हमें ताकते रहेंगे- टूकुर-टूकुर

    गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

    कन्यादान -शम्भु चौधरी

    एक साइकिल, एक रेडियो,
    कुछ कपडे़, थोडे़ गहने,
    बारातियो की खातीर-दारी-
    दामाद की चेन, सास की साडी़,
    समधी की तामीरदारी
    मेहमानों की आवभगत,
    पंडितों की दान-दक्षिणा
    ऐसा लगता था मानो
    एक माँ-बाप के लिये
    खून देने के बराबर था,
    बेटी का ब्याह करना।
    माँ-बाप का धर्म जो ठहरा
    कन्यादान करना।
    -शम्भु चौधरी, कोलकाता-७००१०६, मोब: ९८३१०८२७३७

    चूँडि़यों की खनक -शम्भु चौधरी

    संसद में चूडि़याँ पहने नेताओं,
    चूँडि़यों की खनक तो सुनो,
    जो सड़कों पे बिखरी-टूटी पडी़,
    मांग रही थी भीख-
    सुहाग की रक्षा
    और
    खुद की सुरक्षा।
    -शम्भु चौधरी, कोलकाता-७००१०६, मोब: ९८३१०८२७३७

    बुधवार, 8 दिसंबर 2010

    संयुक्त संसदीय जाँच समिति (JPC)

    पिछले दिनों राम मनोहर लोहिया जी से नरकलोक के एक पत्रकार ने प्रश्न किया कि गुरुदेव ये विपक्षवाले बार-बार संयुक्त संसदीय जाँच समिति (JPC) की माँग क्यों कर रहे हैं? उनका जबाब ये था- सब "चोर-चोर मौसेरे भाई" हैं। दरअसल विपक्ष इस बात की जाँच करना चाहती है कि उनके हिस्से में जो रकम उन्हें मिलेगी वो सही है कि नहीं।

    रविवार, 31 अक्टूबर 2010

    संसद में लोहियाजी बोलतें हैं-२

    १०० रुपये चुराने वाले को देश के कानून में सी.आर.पी.सी. की धारा लगा दी जाती है, परन्तु देश को लुटने वाले सांसदों के ऊपर इस धारा का प्रयोग नहीं किया जाता कहा जाता। धीरे से एक बोलता है जे.पी.सी.बैठा दो। क्यों भाई! एक चोर को बचाने के लिये दूसरे चोर को बैठा दिया जाय क्या?

    भारतीय भाषा संग्राहलय


    HINDI


    क ख ग घ ङ
    च छ ज झ ञ
    ट ठ ड ढ ण
    त थ द ध न
    प फ ब भ म
    य र ल व श ष स ह ळ
    क्ष त्र ज्ञ अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ
    १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०
    ॐ ओ औ ऑ ऋ
    क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः


    Gujarati


    ક ખ ગ ઘ ઙ
    ચ છ જ ઝ ઞ
    ટ ઠ ડ ઢ ણ
    ત થ દ ધ ન
    પ ફ બ ભ મ
    ય ર લ વ શ ષ સ હ ળ
    ક્ષ ત્ર જ્ઞ અ આ ઇ ઈ ઉ ઊ એ ઐ
    ૧ ૨ ૩ ૪ ૫ ૬ ૭ ૮ ૯ ૧૦
    ૐ ઓ ઔ ઑ ઋ
    ક કા કિ કી કુ કૂ કે કૈ કો કૌ કં કઃ


    Bengali


    ক খ গ ঘ ঙ
    চ ছ জ ঝ ঞ
    ট ঠ ড ঢ ণ
    ত থ দ ধ ন
    প ফ ব ভ ম
    য র ল ব শ ষ স হ ল
    ক্ষ ত্র জ্ঞ অ আ ই ঈ উ ঊ এ ঐ
    ১ ২ ৩ ৪ ৫ ৬ ৭ ৮ ৯ ১০
    ও ঔ ও ঋ
    ক কা কি কী কু কূ কে কৈ কো কৌ কং কঃ


    Gurumukhi (Punjabi)


    ਕ ਖ ਗ ਘ ਙ
    ਚ ਛ ਜ ਝ ਞ
    ਟ ਠ ਡ ਢ ਣ
    ਤ ਥ ਦ ਧ ਨ
    ਪ ਫ ਬ ਭ ਮ
    ਯ ਰ ਲ ਵ ਸ਼ ਸ਼ ਸ ਹ ਲ਼
    ਕ੍ਸ਼ ਤ੍ਰ ਜ੍ਞ ਅ ਆ ਇ ਈ ਉ ਊ ਏ ਐ
    ੧ ੨ ੩ ੪ ੫ ੬ ੭ ੮ ੯ ੧੦
    ਓ ਔ ਔ ਰਿ
    ਕ ਕਾ ਕਿ ਕੀ ਕੁ ਕੂ ਕੇ ਕੈ ਕੋ ਕੌ ਕਂ ਕ


    Kannada


    ಕ ಖ ಗ ಘ ಙ
    ಚ ಛ ಜ ಝ ಞ
    ಟ ಠ ಡ ಢ ಣ
    ತ ಥ ದ ಧ ನ
    ಪ ಫ ಬ ಭ ಮ
    ಯ ರ ಲ ವ ಶ ಷ ಸ ಹ ಳ
    ಕ್ಷ ತ್ರ ಜ್ಞ ಅ ಆ ಇ ಈ ಉ ಊ ಏ ಐ
    ೧ ೨ ೩ ೪ ೫ ೬ ೭ ೮ ೯ ೧೦
    ಓ ಔ ಓ ಋ
    ಕ ಕಾ ಕಿ ಕೀ ಕು ಕೂ ಕೇ ಕೈ ಕೋ ಕೌ ಕಂ ಕಃ


    Malayalam


    ക ഖ ഗ ഘ ങ
    ച ഛ ജ ഝ ഞ
    ട ഠ ഡ ഢ ണ
    ത ഥ ദ ധ ന
    പ ഫ ബ ഭ മ
    യ ര ല വ ശ ഷ സ ഹ ള
    ക്ഷ ത്ര ജ്ഞ അ ആ ഇ ഈ ഉ ഊ ഏ ഐ
    ൧ ൨ ൩ ൪ ൫ ൬ ൭ ൮ ൯ ൧൦
    ഓ ഔ ഓ ഋ
    ക കാ കി കീ കു കൂ കേ കൈ കോ കൌ കം കഃ


    Tamil


    க க க க ங
    ச ச ஜ ஜ ஞ
    ட ட ட ட ண
    த த த த ந
    ப ப ப ப ம
    ய ர ல வ ஸ ஷ ஸ ஹ ள
    க்ஷ த்ர ஜ்ஞ அ ஆ இ ஈ உ ஊ ஏ ஐ
    1 2 3 4 5 6 7 8 9 10
    ஓ ஔ ஆ ௫
    க கா கி கீ கு கூ கே கை கோ கௌ கஂ கஃ


    Telgu


    క ఖ గ ఘ ఙ
    చ ఛ జ ఝ ఞ
    ట ఠ డ ఢ ణ
    త థ ద ధ న
    ప ఫ బ భ మ
    య ర ల వ శ ష స హ ళ
    క్ష త్ర జ్ఞ అ ఆ ఇ ఈ ఉ ఊ ఏ ఐ
    ౧ ౨ ౩ ౪ ౫ ౬ ౭ ౮ ౯ ౧౦
    ఓ ఔ ఓ ఋ
    క కా కి కీ కు కూ కే కై కో కౌ కం కః

    शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

    दीपावली की शुभकामनाएँ - शम्भु चौधरी

    नक्सलवाद पर लिखी मेरी एक कविता से आज आपको दीपावली की शुभकामनाएँ देना चाहता हूँ।

    एक परिंदा घर पर आया, फर्राया-चहकाया..
    मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,
    मैं सोचा यह क्या कहता है? हँसता है या रोता है।
    मुझको गाली देता है या अपना दुःख यह कहता है।


    सर्वप्रथम हमें आतंकवाद को व्याखित करना होगा, खुद की जमीं पर रहकर अपने हक की लड़ाई लड़ना आतंकवाद नहीं हो सकता चाहे वह कश्मीर की समस्या ही क्यों न हो, लेकिन को कुछ ईश्लामिक धार्मिक संगठनों ने धर्म को आधार मानते हुए सारी दुनिया में आतांकवाद फैला दिया, पाक प्रायोजित तालिबानियों द्वारा धर्म को जिहाद बताया उनलोगों ने न सिर्फ़ कश्मीर समस्या को उलझाया। भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश सहित विश्व के अनेक देशों के भीतर आतंकवाद को देखने का एक अलग नजरिया प्रदान कर दिया। जिसक परिणाम यह हुआ कि आज विश्व में हर तरफ यह प्रश्न उठता है कि आखिर एशिया महाद्वीप में ही आतंकवाद क्यों पैदा हो रहा, सारे विश्व के अपराधियों का सुरक्षा केन्द्र बनता जा रहा है यह महाद्वीप। संभवतः भारत विश्व में एक मात्र देश होगा जो लगातार आज़ादी के बाद से इस समस्या से झूझता आ रहा है। ९/११ की घटना यदि अमेरीका की जगह भारत में हुई होती तो शायद अमेरिका, तालिबानियों का सफ़ाया कभी नहीं करती़। कारण स्पष्ट है अमेरिका को किसी बात का दर्द तभी होता है जबतक वह खुद इस दर्द को न सह ले।
    इसी प्रकार भारत में नक्सलवाद का काफी तेजी से विकास हुआ खासकर आदिवासी इलाकों में जहाँ हम अभी तक विकास, शिक्षा, चिकित्सा जैसी मूलभूत ज़रूरतों को भी नहीं पहुँचा पाये। हमने उनके घर (वन, वनिस्पत, खनिज, पर्वत, जंगल आदि) को सरकारी समझा और उनको उस जगह से वेदखलकर उन्हें जानवर का जीवन जीने को मजबूर करते रहे। जब इन लोगों को कुछ लोगों ने वगावत का पाठ पढ़ाया तो ये देश के लिये गले की फांस बन गई। आपको सबसे पहले यह समझना होगा कि आखिर समस्या क्या है, सिर्फ हथियार उठा लेने से आतंकवाद हो जाता तो भारत स्वतंत्रता आन्दोलन के हजारों शहीद को भी हमें आतंकवाद कहना होगा। इसमें कोई शक नहीं नक्सलवाद को कुछ लोगों ने इसे सरकारी ताक़तों को नुकशना पहुँचाने के नाम से बेकसूर जनता को भी काफी हानी पहुँचाई जिसका लाभ लेकर सरकारी ताक़तों ने सेना को इस मैदान पर उतार दिया है। जो किसी भी दृष्टिकोण से न तो उन्हें सही ठहराया जा सकता है ना ही इसे। हम अपनी दीपावली के दीये उन आदिवासी के साथ जलाना पसंद करेंगे जिन्हें सरकार नक्सलवादी समझती है। माना कि सरकार पर देश की सुरक्षा का भार है। परन्तु एक को सुरक्षा देने के नाम पर दूसरे का घर ही उजाड़ दिया जाय यह सुरक्षा नहीं हो सकती। आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ।

    शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

    लोहिया संसद में बोल रहें हैं- शम्भु चौधरी


    Shambhu Choudhary
    इस बार देश में अजीबो-गरीब एक घटना घटी। भ्रष्टाचार व तैयारी में हो रही विलम्बता के चलते विश्व भर की मीडिया से घिरी कॉमनवेल्थ खेल आयोजक समिति को अचानक से राष्ट्र के गौरव की याद सताने लगी। कॉमनवेल्थ खेल के विदेशी सदस्यों से भारत के गौरव की भीख माँगे जाने लगी, कि कम से कम वे लोग भारत के गौरव का ध्यान रखें, जबाब में मिला भारतवासियों को एक तमाचा। जरा इन भ्रष्ट नेताओं से कोई पूछे कि जब ये संसद या विधान सभाओं के भीतर लत्तम-जूता करते हैं तब देश का गौरव किधर जाता है? जब ये देश को लूटने में लगे रहते हैं तब इनका स्वाभिमान को क्या हो जाता है? जब ये विदेशों में नन्गे होकर चुपचाप घर आते हैं तब इनका आत्मसम्मान को डंक क्यों नहीं मारता? जब ये लोग खेल को व्यवसाय बनाकर खेल की नकली नीलामी करते हैं और अपराधियों को बचाने के लिए बयानबाज़ी करते हैं तब इनके स्वाभिमान को क्या हो जाता है?

    शनिवार, 28 अगस्त 2010

    परिंदा -शम्भु चौधरी

    Shambhu Choudhary
    (नक्सलवाद पर लिखी एक कविता)
    एक परिंदा घर पर आया, फर्राया-चहकाया..
    मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,

    मैं सोचा यह क्या कहता है?
    हँसता है या रोता है।
    मुझको गाली देता है या अपना दुःख यह कहता है़।

    एक परिंदा घर पर आया, फर्राया-चहकाया..
    मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,

    खेत को काटा, जंगल काटा
    वन को नोचा, पहाड़*1 तोड़ा
    घर को तहस-नहस कर छोड़ा
    पर न माना, फिर चहकाया...
    मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,

    समझाया....
    तुम अनपढ़ और गंवार हो।
    लोकतंत्र की गंगा#2 बहती,
    गंदे, नाले, पोखर सब सहती
    गंगा#3 को 'गंगा'#4 करने का
    २ खोखा#5 मिलता हर साल।

    एक परिंदा घर पर आया, फर्राया-चहकाया..
    मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,

    मैं सोचा यह क्या कहता है?
    हँसता है या रोता है।
    मुझको गाली देता है या अपना दुःख यह कहता है़।

    समझ न पाया,
    #7शेर को भेजा, भेंड़ को भेजा,
    भालू, बन्दर, हाथी भेजा,
    शिकारी भेजा, जाल बिछाया,
    पकड़ कर लाया, फिर धमकाया
    नहीं समझने पर मरवाया
    फिर भी समझ न पाया।
    खेत, पहाड़, जंगल को लुटा,
    फिर भी लुट न पाया।

    मैं सोचा यह क्या कहता है?
    हँसता है या रोता है।
    मुझको गाली देता है या अपना दुःख यह कहता है़।
    एक परिंदा घर पर आया, फर्राया-चहकाया..
    मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,

    (रचना दिनांक २९ अगस्त २०१० को सुबह लिखी है।)
    कवि: शम्भु चौधरी

    *1. दर-असल में आदिवासी पर्वत शब्द की जगह पहाड़ का प्रयोग ज्यादा करतें हैं।
    #2. गंगा शब्द संसद का प्रर्यावाची है।
    #3. यहाँ गंगा शब्द का अर्थ "गंगा" से है।
    #4. यहाँ गंगा शब्द का अर्थ शुद्ध करने से है।
    #5. एक सांसद को हर साल २ करोड़ रुपये हराम के विकास के नाम से सरकार से मिलते हैं, जिस रकम को ९०% सांसद हड़प जाते है।
    #6. पार्टी के पालतु कुत्ते बन कर संसद मेँ बन्द रहना पड़ता है।
    #7. ऑपरेशन हन्ट- नक्सलवाद कि खिलाफ चलरहा जिसमें सैनिक जनवरों के तरह ऑपरेशन करते हैं।

    मंगलवार, 11 मई 2010

    आचार्य महाप्रज्ञ का निधन अपूरणीय क्षति


    9 मई 2010 ... बीदासर : श्वेताम्बर तेरापंथ के दसवें संत आचार्य महाप्रज्ञ का रविवार को निर्वाण हो गया। महाप्रज्ञ दोपहर करीब 2.50 बजे देवलोकगमन कर गए। वे 89 वर्ष के थे। अणुव्रत आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले महाप्रज्ञ जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के अध्यक्ष थे। महाप्रज्ञ के निर्वाण से तेरापंथ समाज में शोक की लहर है। महाप्रज्ञ का जन्म 17 जून 1920 में झुंझनुं जिले के छोटे से गांव तमकोर में हुआ। महाप्रज्ञ को अपने परिवार में नथमल के नाम से जाना जाता था। 1931 में मात्र दस वर्ष की आयु में उन्होंने सन्यास ले लिया था। अहिंसा व विश्वशांति के अग्रदूत आचार्य महाप्रज्ञ का स्वर्गवास जैन समाज के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश व दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। धर्म, अध्यात्म, शांति व अमन के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान को शब्दों में बयां करना कठिन है। उनके निधन का समाचार मिलने के बाद से ही जैन समुदाय में शोक लहर दौड़ गई। डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम ने चुरू जिले के सरदार शहर पहुंचकर आचार्य महाप्रज्ञ को श्रद्धांजलि दी । पिछले दिनों मेरे मित्र श्री प्रकाश चंडालिया ने उनसे मिलकर एक साक्षात्कार लिया था। जिसे हम यहाँ पाठकों के लिये जारी कर रहें हैं। हम देश की इस अपूरणीय क्षत्ति को पुरा तो नहीं कर सकते, हाँ! श्रद्धांजलि स्वरूप हम उनके विचारों से प्रेरणा ग्रहण कर सकतें हैं।- संपादक



    साक्षात्कार आचार्य महाप्रज्ञ से

    - प्रकाश चंडालिया -


    अपने चिन्तन और विचारों से ऐसे ही करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले श्री महात्मा यूं तो तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य हैं, लेकिन अपने चिन्तन के माध्यम से उन्होंने यह स्थापित कर दिया है कि वह केवल तेरापंथ संघ के आचार्य ही नहीं, भारत के महान दार्शनिकों में उनका नाम सुमार है। उम्र के आठ दशक पार करने के बाद भी अहिंसा की महान यात्रा लेकर पूरे भारत भ्रमण पर निकले आचार्य श्री ने महाप्रदीय देश के कई प्रान्तों का सफर कर लिया है। राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा जैसे प्रान्तों में उन्होंने अहिंसा यात्रा का परचम लहराया है और अब तक 7.5 हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा संपन्न कर चुके हैं। आचार्य महाप्रज्ञ की इस यात्रा में 100 करोड़ की आबादी वाले इस देश में
    एक प्रतिशत ही कहें तो एक करोड़ से ज्यादा लोग इनके संपर्क में आए हैं। आचार्य श्री का प्रभाव अहिंसा यात्रा का कितना है यह इसी से समझा जा सकता है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आठ बार गुरुदेव का दर्शन करने आ चुके हैं।
    उनसे किए गये प्रश्नोत्तर:-
    प्रश्न: गुरुवर, आप अहिंसा यात्रा पर निकले हुए हैं और अब तक आपने 7.5 हजार किलोमीटर की यात्रा कर ली है। अहिंसा यात्रा का चिंतन आपके दिमाग में कैसे आया और जो आपकी आंखों में एक सपना था अहिंसा यात्रा का उसे साकार करने में आप कहां तक बढ़ पाए।
    उत्तर: भगवान महावीर के 26वें जन्मदिन को भारत सरकार ने अहिंसा वर्ष घोषित किया था। काफी समय बीत गया-कुछ भी नहीं हो रहा था, तब एक चिन्तन आया कि अहिंसा वर्ष की घोषणा सरकारी घोषणा तो है ही किन्तु हमारा भी कर्तव्य है कि कुछ करना चाहिए। एक निमित बना और अहिंसा यात्रा की भावना, कल्पना सामने आई। फिर उस पर चिन्तन किया, उद्देश्य बनाया कि जनता में अहिंसा की चेतना जागृत हो। सुजानगढ़ से सफर शुरू हुआ और पांच वर्ष पूरे हो गए, छठा वर्ष अभी चल रहा है। व्यापक जन संपर्क रहा और हमने केवल बात में ही हिंसा-अहिंसा की बात में ध्यान नहीं दिया वह तो चल ही रहा था, किन्तु अहिंसा के कारणों पर विचार किया, चिन्तन किया, अनुसंधान किया तो सामने जो कारण आये तो मान लिया एक साधन है कि अहिंसा ज्यादा हो।
    प्रश्न: देश में बढ़ती हिंसा का मुख्य कारण क्या है?
    उत्तर: जातिवाद और सम्प्रदायवाद हिंसा का कारण बन रहा है। अनैतिकता भी हिंसा का कारण है। आदमी में आवेश इतना बढ़ रहा है कि आज सहन करने की शक्ति कम हो गई है। साथ-साथ में गरीबी तो है ही, किन्तु रोटी का अभाव भी हिंसा का बड़ा कारण बन रहा है। भूखा आदमी हिंसा में बह जाता है। इन सब कारणों को सामने रख कर हमने काम शुरू किया कि हमारा एक लक्ष्य रहे स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ समाज और स्वस्थ अर्थ व्यवस्था, इन तीनों के समन्वयन के बिना अहिंसा की बात आगे नहीं बढ़ सकती। इन सब के चिंतन के साथ हमने यात्रा शुरू की और संयोग की बात है कि सबसे पहले राजस्थान से गुजरात में हिंसा के वातावरण में ही हमें प्रवेश करना पड़ा।
    प्रश्न: आप अंहिसा के विभिन्न प्रयोग करते रहे हैं। क्या यह संभव है कि हम अंहिसा का पूर्ण दौर देख सकेंगे क्या सभी धर्मों के एकीकरण की कल्पना की जा सकती है?
    उत्तर: पूर्ण अहिंसा कभी संभव नहीं है। सभी धर्मों के एकीकरण की कल्पना करनी नहीं चाहिए। संभव भी नहीं है। हमें तो इतना ही करना चाहिए कि धार्मिक लोगों में सामंजस्य रहे, समन्वय की भावना रहे और धर्म के नाम पर लड़ाई झगड़ा न हो। इतना हो जाए तब इससे आगे जाना भी नहीं है। संभव भी नहीं है। पूर्ण अहिंसा की कल्पना ही डींग है। क्यों कि मनुष्यों के मस्तिष्क समान नहीं होते हैं। मस्तिष्क की रचनाएं भिन्न चिन्तन-मनन करती है। राष्ट्रीयता भी भिन्न-भिन्न होती है। इतना ही कर सकते हैं कि कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर अपना बाजार और व्यावसायिक प्राधित्व स्थापित न करें इतना हो तो कार्य अच्छा है।
    प्रश्न: आंतकवाद की मूल जड़ क्या है?
    उत्तर: आतंकवाद की मूल वजह राजनीति और वे करततें हैं जो कुछ कारणों से कुछ लोगों के द्वारा होती हैं। आतंकवाद है, भिन्न वाद है, इसके पीछे अनेक कारण हैं-राजनीतिक कारण भी हैं, और कुछ राष्ट्रों पर अपना अधिकार व प्रभुत्व जमाने की भावना भी है। इन कारणों में एक मूल कारण ये लगता है कि भूखे आदमी को
    धनी आदमी जहां लगाना चाहें लगा सकते हैं। अतंकवाद में यही हो रहा है।
    प्रश्न: धर्म के नाम पर जेहाद क्या आतंकवाद का ही एक हिस्सा है?
    उत्तर: आतंकवाद एक जाल है। कोई भी अतंकवादी अपने पुत्र को आतंकवादी नहीं बनाता। जेहाद और आतंकवाद अलग-अलग और एक दूसरे के विपरीत बिन्दु हैं।
    प्रश्न: भारत में हिंसा रुकने का नाम ही नहीं लेती। आरोप है कि पड़ोसी देश भारत में आतंकवाद को शह दे रहा है।
    उत्तर: पहले ही कहा है कि राजनीति आतंकवाद का मुख्य कारक है।
    प्रश्न: विभिन्न धर्मों के अनेक साधु-संत काफी वैभवशाली जीवन यापन करते हैं।
    उत्तर: यह एक संवेदनशील विषय है, जिसके बारे में अधूरी बात कहना नहीं चाहता और पूर्ण बात कह नहीं सकता।
    प्रश्न: संथारा को गलत संदर्भ में परिभाषित किया जाता है।
    उत्तर: यह भ्रांति है। आत्महत्या आवेश में की जाती है जबकि संथारा साधना या समाधिकरण का एक प्रयोग है। अधूरे ज्ञान के कारण लोग संथारा को आत्महत्या परिभाषित कर देते हैं।
    प्रश्न: युनेस्को के शान्ति विश्वाविद्यालय के पदाधिकारी एवं संयुक्तराष्ट्र संघ के शान्ति मिशन के लोग आपसे मिलते रहे हैं। इस संबंध में अब तक क्या काम हुआ है?
    उत्तर: चर्चाएं होती हैं। हिंसा के दमन के लिए वे लोग सामंजस्य स्थापित करना चाहते हैं, प्रयास जारी है।
    प्रश्न: पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ आप पुस्तक लिख रहे हैं। कैसी होगी यह पुस्तक क्या विज्ञान और अध्यात्म में सामंजस्य संभव है?
    उत्तर: पूर्व राष्ट्रपति के साथ पुस्तक से संबंधित चर्चाएं होती रही हैं। पुस्तक कैसी होगी इसका आंकलन तो पाठक ही करेंगे। विज्ञान और अध्यात्म का योग समाज व राष्ट्र को बेहतर स्थिति में ला सकता है।
    प्रश्न: राष्ट्रकवि दिनकर ने आपकी तुलना स्वामी विवेकानन्द से की है जबकि कुछ लोग आप में गाँधी की छवि देखते हैं।
    उत्तर: आचार्य तुलसी ने एक बार कहा था कि महाप्रज्ञ को महाप्रज्ञ ही रहने दो। मैं भी यही सोचता हूँ।
    प्रश्न: आप अपने लक्ष्य में कितने सफल हुए हैं?
    उत्तर: पहले पहल तो लक्ष्य नहीं जानता था, कितना बढ़ पाया उसको मापना कठिन है। हिमखण्ड का सिरा दिखाई देता है, सम्पूर्ण हिमखण्ड तो सागर में ही समाहित है।
    प्रश्न: तेरापंथ का भविष्य.........?
    उत्तर: आचार्य तुलसी के शब्दों में शुभ ही शुभ है।

    गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

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