गुरुवार, 16 जून 2011

लोकपाल बिल की भ्रूण हत्या - शम्भु चौधरी


ड्राफ्ट कमिटि के सरकारी शातिरों ने एक नई पहल शुरू कर बिल को मूल रूप में न सिर्फ परिवर्तन करने का प्रयास किया उन लोगों ने बाबा रामदेव को जिस हथियार से लहूलूहान किया अब उनके दिमाग ने एक नई पहल शुरू कर दी है। उनको देश के संसद की अब बहुत याद सताने लगी। उनका यह मानना है कि संसद में इस अपूर्ण बिल को प्रस्तावित कर वे एक पंथ दो काज करने में सफल भी हो जायेगें। संभवतः उनका यह भी मानना है कि सिविल सोसाईटी के पांच सदस्य खुद को संसद से उपर न समझे। आखिर में संसद को हथियार बनाकर देश की जनता को गुमराह करने का राजनीतिक हथकंडा अपनाया जाने की तैयारी जोरों से शुरू हो चुकी है। एक पर एक लगातार जनता व मीडिया को गुमराह कर भ्रष्टाचारी व्यवस्था को संसद के भीतर बिल को भैंट चढ़ाने की तैयारी सरकार ने कर ली है। यह बात गत बैठक से ही सामने आने लगी जब सिविल सोसाइटी के सदस्यों द्वारा एक बैठक में गैरहाजीर रहने पर सरकारी पक्ष ने सीधे से एक प्रकार से घोषणा कर दी थी कि वे बैगर समाज के सदस्य के भी बिल को 30 जून तक संसद को बनाकर भेज देगें। यानी एकतरफा ऐलान की घोषणा साफ तौर पर सरकारी पक्ष की गुंडागर्दी सामने आ गई। सरकारी पक्ष की सोच है कि ड्राफ्ट कमिटि गठित हो जाने के बाद अब वे अपनी मनमानी कर एक तरह से लोकपाल बिल की आड़ में सरकारी भ्रष्टाचारी बचाव बिल संसद के पटल पर पटक देंगे, जिस पर संसद बहस करे और एक अपंग और लंगड़ा बिल देश के माथे ठोक कर अपनी गिरती हुई शाख को बचा लेंगे। देश की आजादी से लेकर आज तक कांग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकों के मामाले में ईमानदार रही बाकी कोई भी एक काम जिसे ईमानदारी का तगमा दिया जा सके मेरी नजर में तो नहीं है जो लोग सिविल सोसाईटी के सदस्यों या अन्ना हजारे को कठघरे में लाने का प्रयास कर रहें हैं वे वही लोग हैं जो पक्ष भ्रष्ट व्यवस्था के प्रवल समर्थक माने जाते हैं। देश किस प्रकार भ्रष्ट लोगों के हाथ से मुक्त हो इस पर उनके कोई राय नहीं है। कोलकाता के एक समाचार ने तो लिख ही दिया कि सरकार सिविल सोसाईटी की बात न माने न ही उन्हें कोई महत्व दिया जाय । इस संपादक का मानना ह कि देश संसद सदस्य चलाते हैं। सिविल सोसाईटी नहीं। जिन सदस्यों को जनता चुनकर संसद में भेजती है। जी संपादक जी! यह आपको बताने की जरूरत नहीं कि किसे कौन चुन कर संसद में भेजता है। सिविल सोसाईटी की बात भी जनता की आवाज है आपको इसका पैमाना तय करना है कि देश में भ्रष्टाचार काई मुद्दा है कि नहीं तो आप संसद को भंग कर जनता के बीच इस बात का फैसला करने का अधिकार सौंप दें। और एक बात कांग्रेसी को भी बता देना उचित होगा कि अन्ना हजारे बाबा रामदेव नहीं जिसे आप पांच सितारे होटल में बुलाकर ब्लेकमेल कर सको। सिविल सोसाईटी का आन्दोलन बाबा रामदेव का अनशन समझने की भूल न करें। इसे न सिर्फ आम जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त है कांग्रेस के परचे-परचे सड़क पर लड़खड़ाने लगेगें। संसद की आड़ में जनता को गुमराह करने की आदत से बाज आये कांग्रेसीगण लोकपाल बिल की सभी पहलुओं पर ईमानदारी से अपना पक्ष रखें जो बात आपकी सही होगी जनता स्वतः आपको समर्थन करेगी। मीडिया वाले दोस्तों से भी अपील है कि एक घर तो डायन भी छोड़ती है। भारत देश, अपना देश कैसे भ्रष्टमुक्त हो इस पर अपनी राय दें न कि जो लोग इस नेक कार्यों का अपना तन-मन-धन लुटाकर सामने आयें हैं उनके मजबूत इरादों को कमजोर करने जैसी टिप्पनियों की बोछार सिर्फ अपने तुक्ष्य इरादे की पूर्ति करने के लिये न करें। बिल पास हो न हो इससे सिविल सोसाईटी को क्या फर्क पड़ेगा? कांग्रेस के भ्रष्टी जो चाहतें हैं वही बिल संसद में आ जाय तो देश का क्या भला हो जायेगा? आज देश को एकतरफा फैसला लेना होगा कि हम देश को भ्रष्टमुक्त देखना चाहते हैं कि नहीं? यदि आपका उत्तर हाँ में हो तो सरकारी पक्ष की वकालत छोड़ कर जनता के बीच में खड़े हो जाएं इसी में देश का भला है।

0 विचार मंच:

हिन्दी लिखने के लिये नीचे दिये बॉक्स का प्रयोग करें - ई-हिन्दी साहित्य सभा

एक टिप्पणी भेजें