शुक्रवार, 17 जून 2011

Suggestions Letter To Lokpal



आदरणीय अध्यक्ष महोदय,
लोकपाल बिल ड्राफ्ट समिति,
नई दिल्ली, भारत।


महोदय,
आपने देश के सभी राजनैतिक दलों व राज्य सरकारों को एक पत्र लिख कर निम्न बिन्दूओं पर उनकी राय जाननी चाही। मैं समझता हूँ कि भारत सरकार इस पत्र को आम जनता के लिए जारी करेए कारण कि जिन दलों को या सरकार की राय आपने जाननी चाही उनको देश की जनता ही चुनती है। आप इस बात को स्वीकार करेगें कि पिछले 15-20 सालों में संसद व विधानसभा की गरिमा को गहरा आघात लगा है।
किस प्रकार संसद के भीतर नोटों के बण्डल उछाल कर भाजपा संसदों ने लोकतंत्र की धजी उड़ाई थी। प्रायः विश्वास मत प्राप्त करते समय संसदों व विधायकों की खुले आम खरीद-फरोक्त होती रही है। जिसके चलते स्वण्भजनलाल की भजन मंण्डली की कहानी अथवा शिबु सोरेन की सौदेबाजी से संसद शर्मसार होता रहा है। कुछ ऐसा ही हाल देश के सभी प्रान्तों में है। आपने जो प्रश्न उठाये उन सभी का यदि एक उत्तर दिया जाय तो यह कि कम से कम भ्रष्टाचार निरोधक इस बिल को बनाते समय दोंनो पक्ष ईमानदारी से जनता के सामने पेश आये। यह काम सिर्फ कांग्रेस के बुते का ही है। आपकी पार्टी में आज भी आप जैसे कुछक ईमानदार लोग बचे हैं। बल्की मैं मानता हूँ इस बिल में सभी कड़े से कड़े प्रवाधान शामिल कर लिये जाने चाहिये कि जिससे संसद व विधानसभाओं की मर्यादाओं को धन-बल की ताकत से चलाने वाले राजनैतिक दलों का नकाब उतारा जा सके। बात काफी है पर इशारा एक ही है देश का भविष्य कैसे सुरक्षित हाथों में रहे इस बात को ध्यान में रखते हुए आपके निम्न प्रश्नों पर मेरी राय आप सभी सदस्यों के समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूँ। आशा है मेरे पत्र को लोकपाल बिल ड्राफ्ट समिति के पटल पर रखा जायेगा।


Suggestions Letter To Joint Drafting Committee in April 2011







(i) There have been demands from the Civil society members that one single Act should provide for both the Lokpal in the Centre and Lokayukta in the State. Would your State Government be willing to accept a draft provision for the Lokayukta on the same lines as that of the Lokpal ?
1. राज्य सरकारों को यह अधिकार देने का अर्थ होगा कि बिल के मूल को अपनी जरूरतों के अनुसार कमजोर करना होगा। अतः मेरी राय होगी कि इस बिल के ड्राफ्ट के मूल से कोई समझौता न किया जाना चाहिये।

(ii) Should the Prime Minister be brought within the purview of the Lokpal? If the answer is in the affirmative, should there be a qualified inclusion (in which case you may also suggest qualifications for such an inclusion).
2. आप इस बात से सहमत होंगे जब-जब हंग संसद का गठन हुआ है उस समय प्रधानमंत्री बनने के लिए सांसदों में एक प्रकार से Horse Riding होने लगती है। इस तरह के मुद्दे प्रधानमंत्री की छवि को कई बार विवाद में डाल चुकि है। अतः इस प्रश्न को खुले दिमाग से हल करने की जरूरत है। मेरा उत्तर हाँ है।

(iii) Should judges of the Supreme Court / High Court be brought within the purview of the Lokpal?

3. देश का अदालती इतिहास इस बात का गवाह है कि आज अदालतों में न्याय बिकना षुरू हो गया है। अदालत को ईमानदार बनाये रखने के लिये इसे उन पर लागू करना निहायत ही जरूरी है।

(iv) Should the conduct of Members of Parliament inside Parliament 1 (speaking on voting in the House) be brought within the purview of the Lokpal? (Presently such actions are covered under Article 105 (2) of the Constitution).

4. आप इस बात से सहमत होगें जब भी सरकार किसी मुद्दे में अल्पमत में आ जाती है तो सरकार को बचाने को लेकर जो मत विभाजन होता है इस समय साफ तौर पर संसदों की खरीद-फरोक्त का मामला सामने आता ही है। इस प्रवाधान से संदिग्ध संसदों की जाँच लोकपाल द्वारा निहायत ही जरूरी है।

(v) Whether articles 311 and 320 (3) (c) of the Constitution notwithstanding members of a civil service of the Union or an all lndia service or a civil service of a State or a person holding a civil post under the Union or State, be subject to enquiry and disciplinary action including miss all removal by the Lokpal/Lokayukta, as the case may be?

Yes it Must be


(vi) What should be the definition of the Lokpal, and should it itself exercise quasi-judicial powers also or delegate these powers to its subordinate officers?

Yes it Must be


अन्त में आप सभी सदस्यों से अनुरोध रहेगा कि यह सुनहरा अवसर जो कांग्रेस की सरकार को मिला है इस पर ईमानदारी व जिम्मेदारी पूर्ण दायित्वों का निर्वाह करते हुए इस बिल का सर्वमान्य रास्ता निकालते हुए मजबूती के साथ बिल के प्रारूप न सिर्फ तैयार ही करें सोसाइटी सदस्यों को सम्मान भी देंवे। उनका स्वार्थ सिर्फ देश को भ्रष्टमुक्त करना है न कि आपकी सरकार को गिराना। यह लड़ाई कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं जिसके लिये आप लोगों ने विभिन्न तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये। सभी सदस्य या तो इतिहास के हिस्से बन जायेगें और देश की आनेवाल पीढ़ी आपलोगों को हमेशा याद करेगी या फिर आप लोगों का नाम सदैव काले अक्षरों में अंकित होकर रह जायेगा। आईये हम प्रण लें कि देश का हमसब मिलकर नव निर्माण करें। जय हिन्द!

- शम्भु चौधरी, कोलकाता मोबाः 9831082737

0 विचार मंच:

हिन्दी लिखने के लिये नीचे दिये बॉक्स का प्रयोग करें - ई-हिन्दी साहित्य सभा

एक टिप्पणी भेजें