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रविवार, 19 जनवरी 2014

बात पते की - दिल्ली पुलिस का अपहरण

20.01.2014 (Kolkata)
 जल्द ही रहस्य से पर्दा उठने का समय आ गया है। दिल्ली की पुलिस के नाक के नीचे विदेशी महिलाओं के द्वारा देह व्यापार, ड्रग्स का व्यापार उनके संरक्षण में चल रहा था। कहीं कोई रोक-टोक नहीं थी। कोई उनको बोलने वाला नहीं था। रोजाना आपके हमारे बैंकों के एकाउन्टस को हाईजैक कर लेना, लाटरी के नाम पर जाली एसमएस, इमेल का रेकैट फैलाने वाले का धंधा जैसे ही चौपट होने के कगार आया कि तमाम वे ताकतें, जिसमें दिल्ली की पुलिस सहित केंद्र के कई नेता और तमाम उन राजनीति ताकतों के प्यादे की मिलभगत, सबके-सब रातों-रात बैखला गये।

 दिल्ली पुलिस को  अचानक से उनको रात में सपना भी आ गया कि केजरीवाल का अपहरण तक हो सकता है। दरअसल ये अपहरण की हवा सिर्फ केजरीवाल को दिल्ली पुलिस के द्वारा ब्लैकमेल करने की साजिस है। दिल्ली का रेकैट चाहता है कि उनके फलफूल रहे धंधे में केजरीवाल व उनके मंत्री उनके धंधे में कोई दखल ना दें अन्यथा उनका अपहरण तक किया जा सकता है। 

 दिल्ली के कानून मंत्री श्री सोमनाथ भारती ने पिछली रात स्थानीय लोगों की लगातार सूचना के अनुसार दिल्ली पुलिस को घटनास्थल पर जाने का आदेश दिया, दिल्ली पुलिस उन पर कार्यवाही करने से इंकार कर दी, मंत्री को कहती है उनके पास वारंट नहीं है। दिल्ली के कानून मंत्री का यह प्रयास उनको इतना नागवार गुजरा कि वे उनके ही ऊपर ही विदेशी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का आरोप जड़ दिया ।

 सरेआम दिल्ली में सैकड़ों महिलाओं की ईज्जत को लुटते देखनेवाली दिल्ली पुलिस को कभी शर्म तक नहीं आती कि दिल्ली में इतनी घटनायें क्यों और कैसे हो जाती है जबकि देश की सबसे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था दिल्ली में दिल्ली पुलिस द्वारा पूरे ताम-झाम के साथ की जाती है। 

करोंड़ों का धन सिर्फ नेताओं की चौकीदारी में ही बहा दिया जाता है। कानून-व्यवस्था के नाम पर देश की आंख में घूल झौंकनेवाली दिल्ली पुलिस क्या है बता पायेगी कि दिल्ली में जब कई बम धमाके हुए तो उनकी सूचना उनके पास क्यों नहीं थी? आज अचानक से केजरीवाल के अपहरण की बात, किस बात की तरफ संकेत देती है? - शम्भु चौधरी

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

बात पते कीः ‘राजधर्म’ ? - शम्भु चौधरी


 लोकसभा का चुनाव सर पर आ गया। कांग्रेस पार्टी में हार की बैचेनी साफ दिखने लगी है। वहीं दिल्ली फ़तह में जुटी भाजपा देश की जनता में देश प्रेम की भावना (गुब्बारे में हवा) भरने में लगी है। यही भाजपा एक बार देश में ठीक इसी प्रकार का प्रयोग राम मंदिर बनाने के मुद्दे पर कर चुकी है।  ‘‘कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनायेगें’’ सरकार बनते ही मंदिर गया बुट लादने। कैसा राम मंदिर? मंदिर तो हमारे एजेंडे में था ही नहीं। यह तो एनडीए की सरकार है। भाजपा की सरकार बनेगी तब सोचेगें। न्यायालय का आदेश आने से या सुलह हो जाने से राम मंदिर बनाया जायेगा। फिर कुछ दिनों बाद भाषा में थोड़ा बदलाव आया। राममंदिर हमारे लिये एक राष्ट्रीय मुद्दा है। इससे देश के करोड़ों लोगों की जन भावना जुड़ी हुई है।
2014 के चुनाव में भाजपा ने मंदिर मुद्दे कुल मिलाकर पल्ला ही झाड़ लिया है। अब इस बूढ़ी घोड़ी पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लाल लगाम चढ़ा दी है। मोदीजी दुल्हे की तरह जँचने भी लगे। सज-धज के तैयार गुजरात के वीर पुरुष श्री नरेंद्र मोदी जी रोज नये-नये सपने देखने लगे हैं।

श्री नरेंद्र मोदी जी अभी तक अटल जी की एक अटल वाक्य को बोल नहीं पाये ‘‘राजधर्म का पालन करें’’   हाँ! मोदीजी इसी बात को कई प्रकार से समझाने में लगे हैं कि ‘‘सरकार का एक ही धर्म है ‘इंडिया फस्ट’, एक ही धर्मग्रंथ है ‘देश का संविधान’, एक ही भक्ति है ‘देश भक्ति’ फिर कुछ दिनों बाद याद आया तो इस कलाम में एक वाक्य और जोड़ दिये देश की एक ही शक्ति है ‘जन शक्ति’ कोटी जनता देश की जनशक्ति, सरकार की एक ही पूजा होती है देश के 125 करोड़ जनता की भलाई। अब तो मुसलमानों के गुणगान में भी कशिदे पढ़ने लगे।  


मोदी जी आप इतना लंबा-चौड़ा भाषण देकर अटल जी की एक वाक्य ‘‘राजधर्म का पालन करें’’ को हमें समझाने में लगे हैं। आप क्या समझते हैं कि आप और आपके समर्थक ही चतुर और बाकी मुर्ख? आपके समर्थकों ने तो अभी से ही आपा खो दिये हैं। हमें देशभक्ति का पाठ बाद में पढ़ा देना, चुनाव से पहले अपने समर्थकों को पाठ पढ़ा दो कि वे देशभक्ति में इतने मतवाले ना बन जाय कि आपका सपना अधूरा का अधूरा ही रह जाए।
18.01.2014 (Kolkata) 

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

बात पते कीः ‘‘आप’ को वोट देने के पहले सोचें?’’ - शम्भु चौधरी


अब इस बात में कोई बहस नहीं रही कि देश में तीसरा विकल्प गर्भ में जन्म ले चुका है। जो कांग्रेस और भाजपा की भ्रष्ट राजनीति से अलग अपनी नई सोच रखता है। कांग्रेसवाद, भ्रष्टवाद, बामवाद, समाजवाद, गाँधीवाद, लोहियावाद, दक्षिणवाद, पश्चिमवाद, दलीतवाद, अल्पसंख्यकवाद, हिन्दूवाद, मुस्लिमवाद और ना जाने कितने वाद के वादों की भूलभुलैया के बीच एक नया वाद जिसे ‘इंसानवाद’ का नाम देना सटीक रहेगा, ने जन्म ले लिया है।

(कोलकाता- 15.01.2014) : दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ‘आप’ को सफलता क्या मिली, भाजपा के कर्णधार नेतागण सबके सब अपनी नैतिकता को भूला बैठे। अपनी प्रमुख राजनीति प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेस को निशाना लगाने से हटकर पूरे देश में ‘आप’ के खिलाफ जनमत बनाने में लग गई। अचानक से इनके ऊपर ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा कि भाजपा को कांग्रेस से कहीं ज्यादा ‘आम आदमी’ से खतरा लगने लगा?
फेसबुक पर इनके समर्थकों की भाषा शर्मनाक तो हो ही चुकी है संघ संचालित व संघ विचारधारा के पोषक लेखकों की भाषा ने भी अपना संयम खो दिया है। कोलकाता के एक प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र ने तो अपनी संपादकीय में ही लिख दिया कि ‘‘ ‘आप’ को वोट देने के पहले सोचें’’  संपादक जी अभी से इतनी घबड़ाहट क्यों?  कि इनको संपादकीय तक लिखना पड़ा। 

कुछ लोग इसे पानी का बुलबुला मानते हैं तो कुछ चिल्लड़ पार्टी कहने से नहीं चुकते। इसमें बुरा तो कुछ भी नहीं दिखता। ये मानते हैं कि देश की जनता को अभी से जितना डराया और धमकाया जाएगा उतना वे मोदी के पक्ष में खड़े हो जायेंगे। मानो गुजरात मॉडल का प्रयोग संघी समर्थक पूरे देश में करना चाहते हैं। 
जहां एक तरफ कांग्रेस आज काफी राहत महसूस कर रही है कि कल तक भाजपा का जो रूख उसके विरूद्ध था वह अब ‘आप’ के पीछे हाथ धो कर लग गयी है। 

वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भी हाथ-पाँव अभी से ही फूलने लगे हैं। इनको लगता है कि कांग्रेस से कहीं ज्यादा नुकसान भाजपा को  ‘आप’ से हो सकता है। वर्तमान हालत तो यही संकेत दे रहें हैं कि जिस पार्टी का अभी तक देश में ठंग से कोई संगठन तक नहीं तैयार है। जिसने महज मां के भ्रूण में कदम ही रखा है उसे मारने के लिये देश के तमाम जाने-माने राजनीतिज्ञों की एक फौज लामबंध हो चुकी है। शायद इसीलिये राजनीति से खुद को दूर रखने वाली सामाजिक व देश की संस्कृति की रक्षा में लिप्त संस्था के सरसंघचालक को इस बात की चिंता अभी से सताने लगी और लगे हाथ संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा को हिदायत दे डाली कि ‘‘वह आम आदमी पार्टी को हल्के में ना लें’’ 

अब इस बात में कोई बहस नहीं रही कि देश में तीसरा विकल्प गर्भ में जन्म ले चुका है। जो कांग्रेस और भाजपा की भ्रष्ट राजनीति से अलग अपनी नई सोच रखता है। कांग्रेसवाद, भ्रष्टवाद, बामवाद, समाजवाद, गाँधीवाद, लोहियावाद, दक्षिणवाद, पश्चिमवाद, दलीतवाद, अल्पसंख्यकवाद, हिन्दूवाद, मुस्लिमवाद और ना जाने कितने वाद के वादों की भूलभुलैया के बीच एक नया वाद जिसे ‘इंसानवाद’ का नाम देना सटीक रहेगा, ने जन्म ले लिया है। शायद अरविंद केजरीवाल इसीलिए अपनी पार्टी के हर बैठक में कवि प्रदीप का यह गीत को गुनगुनाते हैं - ‘‘इंसान को इंसान से हो भाई चारा, यही पैगाम हमारा.. यही पैगाम हमारा।’’

सोमवार, 13 जनवरी 2014

बात पते की - मोदी की हवा?

सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।

 दिल्ली भाजपा ने मोदी का पूरा खेल ही बिगाड़ दिया अब मोदी पगला गये, इनके समर्थक गाल-गलौज की भाषा का प्रयोग करने को ऊतारु हैं। इनको लगने लगा कि दिल्ली अब दूर हो गई है। चंद दिनों पहले तक मोदी के समर्थन में एक तरफा हवा बह रही थी, पिछले पांच राज्यों के चुनाव में 4 उत्तर भारत के राज्य ऐसे थे जिसमें भाजपा की एकतरफ़ा जीत दर्ज थी।

परन्तु भाजपा के पुराने खिलाड़ी और राजनाथजी के कट्टर विरोधी दिल्ली भाजपा के प्रभारी श्री मान् नितिन गडकरी जी भीतर ही भीतर मोदी के रथ को रोकने की योजना पर कार्य कर रहे थे इसके लिये उन्होंने विजय गोयल की दुखती नब्जों को सहलाया और दिल्ली में कमजोर नेतृत्व को सामने ला खड़ा किया।

डा. हर्षवर्धन जी जो 32 सीटों पर जीत प्राप्त कर प्रथम स्थान पर थे सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर ‘आप’ और कांग्रेस को आपस में उलझा सकते थे। परन्तु गडकरीजी ने फोन पर उनको ऐसा करने से मना कर दिया कि ‘‘वे सरकार बनाने का दावा ना करें।’’ बात बड़े नेता की माननी थी सो डा.हर्षबर्धन जी ने चुनाव परिणाम के आते ही शाम को अपने हाथ खड़े कर दिये।

उधर भाजपा अध्यक्ष राजनाथजी दावा कर रहे थे कि वे 4-0 से आगे हैं कि नितिन गडकरी ने हवा निकाल दी। राजनाथजी चाह कर भी डा.हर्षबर्धन को मना नहीं पाये कि वे कम से कम सरकार बनाने का दावा तो प्रस्तुत करें। ताकी विधानसभा में दोनो पार्टियों का रूख क्या रहता है इसका अंदाजा जनता को स्वतः ही लग जाये।

सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

अरविंद का जनता दरबार - शम्भु चौधरी


अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय की छत से जनता को संबोधित कर जनता को धेर्य रखने को कहा कि ‘‘जल्द ही व्यवस्थित रूप से पुनः जनता दरबार लगाया जाएगा। अरविंद ने अपने बयान में कहा कि इतनी भीड़ की उनको उम्मीद नहीं थी। इसके लिय नये सिरे से पूरी व्यवस्था करनी होगी। जिससे लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निदान हो सके।’’ 

 दिल्लीः दिनांक 11 जनवरी’2014 - सरकार हो तो ऐसी जो जनता के दर्द को अपना दर्द बना लें। दिल्ली में सचिवालय के बाहर ‘आम आदमी पार्टी की सरकार’’ के द्वारा जनता दरबार में जनता की समस्या इतनी देखने को मिली की शायद कभी किसी ने उनकी सुध तक ना ली हो। जैसे ही आज से सुबह 9.30 बजे से जनता दरबार लगाने की घोषणा हुई जनता को लगा कि कोई उनकी बात सुनेगा, जनता अपने आवेदन और समस्याओं के साथ उमड़ पड़ी। 
आज की बैकाबू भीड़ को देखकर अरविंद केजरीवाल को आज की जनता दरबार को बीच में ही रोक देना पड़ा।

अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय की छत से जनता को संबोधित कर जनता को धेर्य रखने को कहा कि ‘‘जल्द ही व्यवस्थित रूप से पुनः जनता दरबार लगाया जाएगा। अरविंद ने अपने बयान में कहा कि इतनी भीड़ की उनको उम्मीद नहीं थी। इसके लिय नये सिरे से पूरी व्यवस्था करनी होगी। जिससे लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निदान हो सके।’’ 

इस जनता दरबार में सबसे बड़ी समस्या जो देखने को मिली वह लोग समूह के रूप में ज्यादा आ रहे थे। ठेकेदारी में काम कर रहे मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या थी जो लोग बड़े-बड़े ग्रुप बनाकर जनता दरबार में आ गये । जिससे पूरी-पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे चरमरा गई।

कहावत है ‘‘एक अनार-सौ बीमार’’  अरविंद केजरीवाल और इनके मंत्री ज्यों-ज्यों जनता के दर्द को सहलाते गए यह दर्द जख्म का रूप धारण करता गया। मानो दिल्ली की जनता में पिछले 30 सालों से इस दर्द को सहने की आदत सी बन गई थी। असफलता सफलता की कुंजी होती है। आज अरविंद केजरीवाल ने फिर प्रमाणित कर दिया की वे आज भी जनता के साथ हैं। भले ही आज इस दरबार से जनता की समस्या ना सुनी जा सकी हो पर यह तो साफ हो गया कि समस्या की जड़ें बहुत पुरानी है जिसे जड़ से ही समाप्त करना होगा। 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

राम! राम! सत्यानाश


‘नमो’ समर्थकों की भाषा एक पोस्ट आप भी पढ़ लें। 

‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
 राम! राम! सत्यानाश कर देगा देश का।

‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
 राम! राम! सत्यानाश कर देगा देश का।

‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
 राम! राम! सत्यानाश कर देगा देश का

सोमवार, 6 जनवरी 2014

आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय नीति?

आदरणीय केजरीवाल जी।                 दिनांकः 06/01/2014
सादर नमस्कार!

विषय:  आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय नीति।
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति को प्रेषित पत्र

आदरणीय सदस्यगण।

वैसे तो ‘आम आदमी पार्टी’ से जुड़े मुझे चंद ही दिन हुए हैं राजनीति में लगातार 1974 से रुचि रखने और आप लोगों से जुड़ कर कार्य करने की प्रेरणा से यह पत्र आप सभी सदस्यों के विचारार्थ भेज रहा हूँ।
दिल्ली के चुनाव के पश्चात जिस प्रकार कांग्रेस व भाजपा अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा लगाता राष्ट्रवादी व अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस को तेज कर ‘आप’ को बैकफुट पर लाना चाहती है इसके लिए हमें ना सिर्फ सतर्कता की जरूरत है हमें उन तमाम मुद्दों पर गंभीर चिंतन कर नीति के निर्धारण की भी अत्यंत आवश्यकता है।

निम्न विषय आपके ध्यानार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

1. सर्वप्रथम हमें संगठन के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की भर्ती करनी चाहिए। संभव हो तो उन्हें सवैतनिक भत्ता के साथ सम्मान पूर्वक पद पर उनकी नियुक्ति हो। ताकी संगठन में उनके कार्यानुसार भविष्य में उनको सम्मानित राजनीति पदों पर स्थापित किया जा सके।

2. कश्मीर सहित उन सभी राष्ट्रीय मुद्दों पर ‘आप’ की स्पष्ट नीति हो। ताकी कोई भी उसके विरुद्ध कार्य या बयान ना दे सके।
3. देश की सुरक्षा, अर्थ व्यवस्था, शिक्षा, किसान नीति, मज़दूर नीति, सरकारी-ग़ैरसरकारी कर्मचारी नीति, व्यापार नीति, बैंकिंग नीति, शेयर बाजार , विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, राज्यों के साथ संबंध, विदेशी मुद्रा भंडार व काला धन, खनिज संपदा नीति आदि पर विचार करना।
4.भ्रष्टाचार व अन्य जन अपादा-विपदा नीति के साथ-साथ आम जनता की जनसेवा से जुड़े कई क्षेत्र जिसमें बिजली-पानी, चिकित्सा-दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, खाद्य वितरण प्रणाली व यातायात व्यवस्था।
5.डालर के मूल्य पर नियंत्रण और तेल के प्रबंध पर अंकुश व आयात-निर्यात व्यवस्था में सामंजस्य करना साथ ही देश की उद्योगिक क्षेत्र में प्रोत्साहन प्रदान करना।
6.आधार भूत इंफ्रास्टेक्चर व्यवस्था को सुचारु करना, सरकारी विभागों की ज़िम्मेदारी तय करना व सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक सौहार्द बनाये रखते हुए स्वच्छ राजनीति व्यवस्था का निर्माण कर  देश में कानून व व्यवस्था का राज कायम करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
7. खेल क्षेत्र से राजनीतिज्ञों का वर्चश्व समाप्त करना।
8. कई ऐसे विषय जो यहां छुट गए हैं का अध्ययन करना और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर प्रणाली पर देश के जाने-माने विद्वानों की राय प्राप्त कर नीति का निर्धारण करना।
9. आम आदमी की प्राथमिकता इस बात पर भी हो कि जो नीति का निर्माण हो वह राष्ट्र की जनता पर दूरगामी प्रभाव छोड़ सके। व अन्य राजनीति पार्टियों को सोचने के लिए मजबूर कर दे।

आशा है 'आप' की  राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति मेरे पत्र पर गंभीरता से विचार करेगें। आपके उत्तर का इंतजार रहेगा।

आपका ही शुभचिंतक
शंभु चौधरी, कोलकाता

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

दिल्ली भाजपाः सदी की चूक - शम्भु चौधरी


जहां तक मेरी राजनीति समझ है भाजपा के नेताओं ने दिल्ली में सरकार का दावा ना प्रस्तुत कर ‘आप’ पार्टी को राजनीति जमीन प्रदान कर दी है। आज देशभर में ‘आम आदमी पार्टी’ की धूम मची हुई है। जो लोग भाजपा में आना चाहते थे वे सभी झूंड के झूंड  ‘आप’ को ज्वाईन करने लगे। ‘आप’ द्वारा सरकार बनाने की घोषणा के महज चार दिनों में ‘आप’ को देशभर में जो समर्थन प्राप्त हुआ और दिल्ली में जिस प्रकार शपथ समारोह का दृश्य देशभर ने देखा इससे भाजपा की जमीन नीचे से हिल गई है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में डॉ. हर्षवर्धन जी  के नेतृत्व में भाजपा ने चुनाव लड़ा। नीतिन गडकरी जी इस विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी बनाये गए। चुनाव का वक्त ज्यों-ज्यों नजदीक आता गया विजय गोयल से चुनाव की कमान छीनकर भाजपा के सबसे शातिर नेता श्रीमान् नितिन गडकरी ने गोयल से यह कमान छीन ली और साफ-सुथरी छवि की आड़ में दिल्ली भाजपा की कमान खुद के खेमे के चापलूस नेता डॉ. हर्षवर्धन जी के हाथों थमा दी। दिल्ली भाजपा यह कवायद वह भी चुनाव के ऐन वक्त पर, जीत का बहाना था कि मोदी के विजय रथ को रोकने का? यह तो वक्त ही बतायेगा। हाँ! अब यह बात साफ हो चुकी कि दिल्ली भाजपा के डॉ. हर्षवर्धन जी ने जिस प्रकार दावा प्रस्तुत किया कि उनकी पार्टी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी होकर भी विपक्ष में बैठी है इसका अर्थ निकालना तो पड़ेगा ही।

दरअसल भाजपा के पक्ष में 32 सीटों के परिणाम जैसे ही घोषित हुए,   डॉ. हर्षवर्धन जी ने बैगेर राजनीति विचार विमर्श किये ही बयान जारी कर अपने हाथ खड़े कर दिये बस यही पल भाजपा के लिए आत्मधाती निर्णय साबित हो गया। यह बात तो डॉ. हर्षवर्धन जी विधानसभा के भीतर भाजपा के पक्ष में विश्वास मत प्राप्त करने के वक्त भी कह सकते थे। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग ना कर राजनीति मैदान से भाग से भाग खड़े होने वाले डॉ. हर्षवर्धन जी को यह तो जबाब देना ही होगा कि आज देश भर में मोदी की लहर में ‘आप’ पार्टी को मजबूत आधार प्रदान कर देने के लिए सबसे प्रमुख दोषी कौन है?

जहां तक मेरी राजनीति समझ है भाजपा के नेताओं ने दिल्ली में सरकार का दावा ना प्रस्तुत कर ‘आप’ पार्टी को राजनीति जमीन प्रदान कर दी है। आज देशभर में ‘आम आदमी पार्टी’ की धूम मची हुई है। जो लोग भाजपा में आना चाहते थे वे सभी झूंड के झूंड  ‘आप’ को ज्वाईन करने लगे। ‘आप’ द्वारा सरकार बनाने की घोषणा के महज चार दिनों में ‘आप’ को देशभर में जो समर्थन प्राप्त हुआ और दिल्ली में जिस प्रकार शपथ समारोह का दृश्य देशभर ने देखा इससे भाजपा की जमीन नीचे से हिल गई है। 

इस सबके लिए मैं विशेष रूप से भाजपा को ही जिम्मेदार मानता हूँ। जितना आसान राह था मोदी का दिल्ली सफर, दिल्ली भाजपा ने उसके मार्ग में देशभर में कांटे उगा दिये। दिल्ली भाजपा के प्रभारी श्रीमान नितिन गडकरी ने राजनाथ सिंह से जो राजनैतिक बदला लिया इसके भनक भी शायद किसी को नहीं मिली होगी।  दिल्ली के इस राजनैतिक चाल मे सह किसने किसको दिया यह तो वक्त ही बतायेगा पर मात तो साफ नजर आ रही है। 

दिल्ली विधानसभा में विश्वासमत के दौरान डॉ. हर्षवर्धन जी भले ही नैतिकता की बात करते रहे हों, केजरीलवाल और मनीष सिसोदिया पर व्यक्तिगत अरोपों की झड़ी लगा दी। दिल्ली विधानसभा में कश्मीर का राग अलापते रहे हों पर दिल्ली की जनता के हित में बात कहने से बचते रहे। 30 सालों से दिल्ली की जनता को धोखा देने वाले राजनैतिक दल इससे ज्यादा बोल भी क्या सकते थे? 

खैर! भले ही भाजपा के समर्थक डॉ. हर्षवर्धन के भाषण से खुश हो लें, साथ ही यह भी ना भूलें कि इसी  (डॉ. हर्षवर्धन) व्यक्ति ने ‘आप’ को पूरे देश में रातों-रात फैला दिया है। दिल्ली चुनाव परिणामों के परिपेक्ष में देखा जाए तो जहाँ कांग्रेस ने ‘आप’ को समर्थन देकर दिल्ली में अपनी स्थिति को पहले से बेहतर बना ली है वहीं भाजपा ने सरकार का रास्ता ‘आप’ के लिए छोड़कर मोदी के साथ घोखा किया है। 

जो काम कांग्रेस ने किया यही काम भाजपा भी कर सकती थी। पहली बात तो भाजपा को सरकार बनाने का दावा स्वयं प्रस्तुत करना चाहिये था। सदन के भीतर दोनों (आप एवं कांग्रेस) पार्टियों की स्थिति स्वतः साफ हो जाती। यह नहीं हुआ तो ‘आप’ को समर्थन देकर कांग्रेस को पूरे देश में घेरा जाना था। भाजपा दोनों जगह विफल रही और आज खुद पूरे देश में ‘आप’ की शिकार बन गई। 

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

मोदी के राह का रोढ़ा - शम्भु चौधरी


सवाल उठता है कि- डॉ. हर्षवर्धन जी जब खुद मानतें हैं कि दिल्ली की जनता ने उनकी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने लाया है उनके पास विधानसभा में सबसे अधिक सीट है। उनकी पार्टी को सबसे अधिक मत मिले हैं तो सरकार क्यों नहीं बनाई? सवाल सरकार बनाने का नहीं था। प्रधानमंत्री पद का सपना संजाये श्री अडवाणी जी, भाजपा के संविधान को पलटने वाले व दौबारा अध्यक्ष का सपना देखने वाले श्रीमान नितिन गडकरी जी,  महात्मा गांधीजी के पूण्य समाधि स्थल पर ठुमका लगाने वाली सुषमा स्वराज एवं डॉ. हर्षवर्धन जी दिल्ली में मोदी के रथ को रोक कर यह साबित कर दिये कि मोदी को दिल्ली में किसी भी प्रकार से आने नहीं दिया जाएगा। 

दिल्ली के विधानसभा चुनाव के समय डॉ. हर्षवर्धन जी के भाषण से साफ झलक रहा था कि वे दिल्ली की जनता की समस्या के लिए नहीं अपने राजनीति एजेंडे पर भाषण दे रहे थे इनके इस भाषण को भाजपा के तथा कथित राष्ट्रप्रेमी जो सिर्फ खुद को देशभक्त की श्रेणी में रखना चाहते हैं जोर-शोर से प्रचार करने में लग गए।  इनका तर्क मान लिया जाए तो दिल्ली में सिर्फ 33 प्रतिशत जनता ही राष्ट्रप्रमी और बाकी 67 प्रतिशत जनता देशद्रोही? डॉ. हर्षवर्धन जी ने अरविंद केजरीवाल के 18 मुद्दों के जबाब में आपने अपनी 18 भड़ास निकाल दी।
भड़ास में आपने सुरक्षा, भ्रष्टाचार, बंगला, मोहनशर्मा की शहादत, अफजल की फांसी, सेनिकों की शहादत,
 कश्मीर पर बहस,  सिसोदिया जी को चंदा की जाँच,  आयकर विभाग के कमिश्नर नहीं थे केजरीवाल, मुफ्त पानी सिर्फ 8लाख घरों ही क्यों?,  पानी का बिल बढ़ा दिया,  बिजली में सब्सिडी जनता के पैसों का दुरुपयोग है,  आँकड़ों की बाजिगीरी करके धोखा दे रहे , बाटला हाउस एनकाउंटर पर, कश्मीर के देशद्रोही बयानों पर, आतंकवादियों से समर्थन माँगने पर केजरीवाल को देश से माफी माँगनी चाहिए, कांग्रेस के समर्थन पर सवाल किए।   

डॉ. हर्षवर्धन जी मानो दिल्ली विधानसभा में ‘आप’ द्वारा प्रस्तुत विश्वास मत पर भाषण नहीं संसद में जनता को संबोधन कर रहे थे। व्यक्तिगत आरोप लगाने के माहिर भाजपाईयों ने दिल्ली के विधानसभा में भी अपनी जात दिखा दी कि वे जनता की भावना से खिलवाड़ करने के लिए अपने पैंट का जीप भी खोल सकते हैं। 
भाजपा को सिर्फ जनता की भावना से खिलवाड़ करना आता है। दिल्ली के चुनाव में जिस प्रकार इन लोगों ने देश की भावना से खिलवाड़ कर जनता के वोट प्राप्त करने का प्रयास किया इससे साफ हो जाता है कि इनको देश सेवा और देश से कोई प्रेम नहीं । राम मंदिर निर्माण के समय भी कुछ ऐसा ही किया गया था। अब राममंदिर इनके लिए कोई मुद्दा नहीं रहा।

 लोकसभा चुनाव से पूर्व किसी भी प्रकार देश की भावना को सांप्रदायिक जहर से पाट दिया जाय। कारण स्पष्ट है कि भाजपा खुद भ्रष्टाचार से चारों तरफ से घीरी हुई है। कांग्रेस का हर कदम पर भाजपा ने साथ दिया । दिल्ली में पिछले 15 सालों से विपक्ष की भूमिका निभाने में पूर्णतः असफल रही भाजपा दिल्ली विधानसभा में या तो केजरीवाल जी पर, मनीष सिसोदिय व्यक्तिगत आरोपों की छड़ी लगा दी या फिर देश की भावना के साथ खिलवाड़ करते नजर आये। 

सवाल उठता है कि- डॉ. हर्षवर्धन जी जब खुद मानतें हैं कि दिल्ली की जनता ने उनकी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने लाया है उनके पास विधानसभा में सबसे अधिक सीट है। उनकी पार्टी को सबसे अधिक मत मिले हैं तो सरकार क्यों नहीं बनाई? सवाल सरकार बनाने का नहीं था। प्रधानमंत्री पद का सपना संजाये श्री अडवाणी जी, भाजपा के संविधान को पलटने वाले व दौबारा अध्यक्ष का सपना देखने वाले श्रीमान नितिन गडकरी जी,  महात्मा गांधीजी के पूण्य समाधि स्थल पर ठुमका लगाने वाली सुषमा स्वराज एवं डॉ. हर्षवर्धन जी दिल्ली में मोदी के रथ को रोक कर यह साबित कर दिये कि मोदी को दिल्ली में किसी भी प्रकार से आने नहीं दिया जाएगा।  

भाजपा की राजनीति हार का ठिकरा अब डॉ.हर्षवर्धनजी केजरीवाल के ऊपर फोड़ना चाह रहें हैं। मुझे अभीतक इस बात का जबाब नहीं मिला कि 32 सीटों के परिणाम जैसे ही घोषित हुए डॉ. हर्षवर्धन जी ने सीधे मीडिया में बयान जारी कर दिये कि वे सरकार नहीं बनायेगें। इतनी जल्दी और विधायक दल की बैठक बिना किये ही इसप्रकार का बयान कहीं मोदी के खिलाफ गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं? 
आज दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बनते ही पूरे देश में केजरीवाल व उनके साथियों को जो समर्थन मिला है क्या इसके लिए दिल्ली भाजपा दोषी नहीं? दिल्ली भाजपा कहीं मोदी के रथ का रोढ़ा तो नहीं बन गई? यह मोदी के समर्थकों को सोचना होगा।
03.01.2014

गडकरी की चाल सफल

जनता पर एहसान लाद रही थी कांग्रेस

देश के इतिहास में शायद यह पहली घटना होगी जब किसी विधानसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण हुआ हो। दिल्ली विधानसभा में अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ की सरकार के बयान को देश की जनता सीधे देख रही थी। इससे पहले हम विधानसभाओं का प्रसारण जब सदन के भीतर चप्पल-जूते चलते थे तभी देखते थे।
विधानसभा में विश्वास मत पर कांग्रेस अपने 8 विधायकों को लेकर अहंकार में बोलती नजर आई मानो वह ‘आप’ को समर्थन नहीं दिल्ली की जनता के ऊपर बड़ा भारी एहसान कर रही हो। वहीं भाजपा इस बात का दंभ भरती रही कि दिल्ली की जनता ने उनको सर्वाधिक मतों से विजयी बनाया और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में होकर भी विपक्ष में बैठी है। मानो सब कोई जनता के वोट से चून कर आयें, और जनता पर ही अपने दल का एहसान लाद रहें हो। वहीं केजरीवाल ने साफ किया कि वे जनता के साथ कल भी थे और आज भी उसी तरह से जनता के साथ खड़े हैं। आप ने 37-32 से विश्वास मत जीता।

डा. हर्षवर्धन तो पहले से ही भगोड़े थे। 

हर्षवर्धन जी विधानसभा में केवल इस बात का दंभ भर रहे थे कि वे विपक्ष में बैठकर भाजपा दिल्ली की जनता पर ही एहसान कर रही है। ‘‘हमारी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है जिसे जनता ने सबसे अधिक सीटें दी है। सबसे अधिक वोट मिले हमको। हम जनता के वोट से चुनकर आयें हैं इसलिए हम जनता को सदन के भीतर बैठकर जूते मारेगें।

गडकरी की चाल

दिल्ली में गडकरी की चाल सफल हुई दिल्ली में मोदी को हरा दिया गडकरी ने दिल्ली में सरकार ना बनाकर दिखा दिया की देश की पूरी जनता मोदी के साथ नहीं।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

कलम आज इनकी जय बोल - शम्भु चौधरी

देश को संसद में, विधानसभा में लूटने वाले लोग, गठबंधन के नाम पर लोकतंत्र का चिरहरण करने वाले, लोकतंत्र को लूटतंत्र में तब्दील करने वाले लोग, चुनाव के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी करने वाले लोग, विकास के नाम पर भ्रष्टाचार करने वाले लोग, कॉर्पोरेट चंदे के सौदागर, असामाजिक तत्वों के बल पर सत्ता प्राप्त करने वाले लोग, जनतंत्र को बर्वाद कर देने पर आमदा सत्ता की जोड़-तोड़ में माहिर शातिर लोगों को अचानक से सबकुछ अराजकता लगने लगी। 
आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता को संभालते ही महज दो दिनों जनता से किया वादा पूरा कर दिखाया। अरविंद केजरीवाल में कार्य करने की अदभुत क्षमता को देख देष आश्चर्यचकित है अपनी बीमारी के बावजूद भी केजरीवाल ने आम जनता से किये दो प्रमुख वादों में- पानी और बिजली क दामों में कटौती कर दिखा दिया कि सरकार चाहे तो जनता की भलाई के लिए कार्य करना चाहे तो इसमें कोई अड़चन नहीं आ सकती। ‘आप’ के मंत्री मनीश सिसोदिया, राखी बिड़ला जहाँ रात को रैन बसेरा का निरक्षण कर रहे तो,  सोमनाथ भारती, सत्येन्द्र जैन, गिरीश सोनी और सौरभ भारद्वाज सभी अपने-अपने कार्य में लगे देखे गए। कई महत्वपूर्ण जनता के हित में फैसले लिए जा रहे हैं । 

जनता एक तरफ खुश नजर आ रही है तो दूसरी तरफ अन्य राजनीति दल एवं इनके द्वारा पोषित समाचार संपादकों, किसी के हाथ तो, किसी के पाँव भारी हो गए । इनको लगने लगा कि अब तक जिस दिल्ली को वे अपने आभा मंडल से हड़प लेना चाहते थे में सफलता नहीं मिल तो क्या हुआ हम अपनी पूरी ताकत झोंक देगें परन्तु केजरीवाल या ‘आप’ पार्टी को किसी भी हालात में मोदी के मार्ग में आने नहीं दिया जाएगा । 

अभी से ही इन लोगों ने आरोपों की झड़ी लगा दी । महज चार दिन में 40 आरोप जन्म हो गए।  ऐसा क्यों किया? वैसे करने से क्या होगा? "जनता का पैसा है।" ‘आप’ वाले जनता का पैसा लुटाने में लग गए? आदि-आदि देश का धन लूटने वाले के मुंह से जनता के प्रति संवेदना के शब्द 30 साल बाद सुनने को मिल रहें हैं 15 साल भाजपा दिल्ली की सत्ता में रहकर भी गरीबों तक पानी पंहुचाने के नाम पर पानी बेचने का धंधा शुरू कर दिया तब इनको जनता की याद आई कि जनता के धन सदुपयोग कर जनता की सेवा की जाय अब अचानक से महज चार दिनों में इनको जनता के धन की चिंता सताने लगी।

15 साल कांग्रेस वाले सत्ता में राज्य किये। शीला जी ने कई विकास के काम किये तब इनको पानी की बात क्यों नहीं आई। दिल्ली के कई कॉलोनियों में आजादी के 60 साल बाद भी पानी की पाइप लाइन तक नहीं डाल पाये, दावा इतना कि मानो देश की तकदीर ही बदल डाली हो। 

देश को संसद में, विधानसभा में लूटने वाले लोग, गठबंधन के नाम पर लोकतंत्र का चिरहरण करने वाले, लोकतंत्र को लूटतंत्र में तब्दील करने वाले लोग, चुनाव के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी करने वाले लोग, विकास के नाम पर भ्रष्टाचार करने वाले लोग, कॉर्पोरेट चंदे के सौदागर, असामाजिक तत्वों के बल पर सत्ता प्राप्त करने वाले लोग, जनतंत्र को बर्वाद कर देने पर आमदा सत्ता की जोड़-तोड़ में माहिर शातिर लोगों को अचानक से सबकुछ अराजकता लगने लगी। 

जनता से संवाद यदि अराजकता है तो जनता यही चाहती है। जनता की सत्ता में हिस्सेदारी यदि विद्रोह है तो हाँ! जनता इस विद्रोह के साथ है। जनता का धन लूटने से बचा के जनता के काम आता हो तो अरविंद के हर फैसले जनता को मंजूर है। आज देश करवटें ले रहा है। देश के अच्छे युवक देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। हमें हर हाल में इनका साथ देना चाहिये ।

 राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने अपनी कविता शायद इन्हीं दिनों के लिये लिखी थी - ‘‘कलम आज इनकी जय बोल’’ मुझे गर्व हो रहा है कि हम आज सपने के भारत को पूर्व से उगता देख रहें हैं । भले ही इन युवकों में प्रशानिक क्षमता-दक्षता कम हो पर देश सेवा का जज्बा जो है इनमें। हम संतुष्ट है। आशा करता हूँ इनका भविष्य उज्जवल हो। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ नववर्ष की मंगलकामना करता हूँ। जय हिन्द, जय भारत!!
02-01-2014
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शनिवार, 28 दिसंबर 2013

केजरीवाल का ऐतिहासिक भाषण -शम्भु चौधरी



अब यह सरकार सिर्फ 7 मंत्री नहीं चलायेगें, सरकार कुछ अफ़सर नहीं चलायेगें, सरकार कुछ पुलिसवाले नहीं चलायेंगें। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करगें दिल्ली के अंदर हम डेढ़ करोड़ लोग मिलकर सरकार बनायेगें। डेढ़ करोड़ मिलकर सरकार चलायेगें। - अरविंद 

मेरी एक कविता है-
वोटों की ताकत को जानो, अपनी ताकत  को  पहचानो,
   घर-घर अलख जगा दो आज, भ्रष्टाचार मिटा दो आज। 




























अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के रामलीला मैदान के ऐतिहासिक मंच पर


श्री अरविंद केजरीवाल ने आज दिल्ली के रामलीला मैदान के ऐतिहासिक मंच पर अपने 6 विधायकों के साथ मुख्यमंत्री पद व गोपनीयता की शपथ लेकर देश के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। लोकतंत्र इस रामलीला मैदान से मानो हुंकार भर यह कह रहा हो- ‘‘मुझे मजाक से भी हल्का मत लेना’’

लाखों लोगों के जन सैलाब, लबालब भरा रामलीला मैदान को देशभर की जनता अपनी आंखों से देख रही थी । भारत के इतिहास में सैलाब वह भी एक साधारण सामाजिक जीवन से राजनीति में आने वाले एक आम आदमी के उस क्षण का है जो हमेशा से ही अपना नया रास्ता बनाता रहा है। मध्यम श्रेणी के परिवार में जन्मे श्री अरविंद केजरीवाल ने अपने चंद साथियों के साथ सफलता के उस शिखर पर कदम रखने के लिए अपना पहला कदम बढ़ा दिया हो।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जिस ऐतिहासिक जीत की कल्पना किसी ने भी नहीं की थी, आम आदमी पार्टी ने उन तमाम राजनैतिक आंकड़ों को उथल-पुथल कर रख दिया। लोकतंत्र क्या होता है यह देश की जनता को बता दिया। भले ही इसका रूप हमें आज बहुत छोटा नजर आता हो पर कहावत है- ‘‘ देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’’ जो राजनीति पार्टियाँ अपने अहंकार में मस्त-मस्त हो चल रही है अथवा जो राजनेता इस बात के घमंड में चूर है कि वे सत्ता की ताकत से इस आम आदमी को मिटा देने का जज्बा रखते हैं उनके एक लिए अरविंद केजरीवाल एक सबक है।

दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से श्री अरविंद केजरीवाल अपनी टीम के साथ शपथ लेने के तुरंत बाद जो भाषण दिया उस भाषण के प्रमुख अंश जो इस प्रकार है। -

अभी हमने मुख्यमंत्री और मेरे साथियों ने मंत्री पद की शपथ ली है। यह सारी लड़ाई जो हमलोगों ने लड़ी थी, यह सारी कबायत जो हमलोगों ने की थी, यह कबायत हमलोगों ने अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नहीं की थी। यह सत्ता के किले तोड़कर सत्ता जनता के हाथ में देने के लिए की थी।

 दोस्तों!! आज आम आदमी की जीत हुई है। दिल्ली के लोगों ने इस बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में एक बहुत बड़ा काम कर के दिखाया है। अभी तक हमलोग, इस देश के लोग बिल्कुल निराश हो चुके थे, हमें लगता था इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह देश तो बिल्कुल गर्त में जा रहा है। इस देश की राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया था, लेकिन इसबार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में दिल्ली के लोगों ने दिखा दिया कि ईमानदारी से भी राजनीति की जा सकती है। ईमानदारी से चुनाव लड़ें जा सकतें हैं, और ईमानदारी से चुनाव जीते जा सकते हैं।

दोस्तों!  इसके लिये मैं आप सब लोगों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। दिल्ली के लोगों को बधाई देता हूँ। यह एक बहुत बड़ी जीत है, दिल्ली के लोगों की जीत है। मैं परमपिता परमेश्वर, ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरु उनको मैं धन्यवाद देना चाहुँगा। जो यह जीत हुई है, यह वाकई यह कुदरती करिश्मा लगता है। नहीं तो आज से दो साल पहले हमलोग यह सोच भी नहीं सकते थे। इस देश में ऐसी क्रांति आयेगी कि जो जब हम भ्रष्ट पार्टियों को उखाड़ कर फेंक देगें और असल में जनता का राज स्थापित होगा।

दोस्तों!! यह हमारी वजह से नहीं हुआ। यह जरूर कुछ न कुछ कुदरती करिश्मा है। इसके लिये हम भगवान को धन्यवाद अदा करता हूँ, ईश्वर को धन्यवाद अदा करता हूँ अल्लाह का शुक्रिया अदा करता हूँ।

दोस्तों! अभी तो यह शुरूआत है। अभी तो केवल आम आदमी की सरकार बनी है। असली लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। यह लड़ाई हम लोग नहीं लड़ सकते। अरविंद केजरीवाल अकेले नहीं लड़ सकता। हम 6 लोग 7 लोग मिलकर यह लड़ाई नहीं लड़ सकते। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि अगर दिल्ली के डेढ़ करोड लोग़ एकट्डें हो जायें तो इस देश से दिल्ली से भ्रष्टाचार हम दूर कर सकते हैं। हम मिलकर भ्रष्टाचार दूर कर सकते हैं।

दोस्तों ! हमें यह बिल्कुल गुमान नहीं है, हमें यह बिल्कुल घमंड नहीं है कि सारी समस्याओं का समाधान हमारे पास है। हमारे पास सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। भगवान ने सारी बुद्धी हमें नहीं दी है। हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि आज सरकार बनेगी, कल सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। लेकिन हमें यह पूरा यकिन है कि यदि दिल्ली के डेढ़ करोड़ लोग एकट्डा हो गए तो ऐसी कोई समस्या नहीं कि जिसका समाधान हम नहीं निकाल सकते। हमें अब दिल्ली मिलकर चलानी होगी।

अब यह सरकार सिर्फ 7 मंत्री नहीं चलायेगें, सरकार कुछ अफ़सर नहीं चलायेगें, सरकार कुछ पुलिसवाले नहीं चलायेंगें। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करगें दिल्ली के अंदर हम डेढ़ करोड़ लोग मिलकर सरकार बनायेगें। डेढ़ करोड़ मिलकर सरकार चलायेगें। 

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इनके साथ 6 अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण किया । दिल्ली के उप राज्यपाल श्री नजीब जंग ने इनको पद की गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह एक ऐतिहासिक वह झण था जिसे दिल्ली वासियों ने ना सिर्फ सुना इस घटना को अमर बना दिया है।
 -शम्भु चौधरी 28/12/2013

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

आम आदमी की सरकार -शम्भु चौधरी

कांग्रेसी नेताओं के अहंकार ‘‘हम चुनकर आयें हैं, हमसे बात करना हो तो चुन कर आयें। जनता ने प्रतिनिधित्व करने का दायित्व हमें दिया है। आपलोग एक भीड़ का हिस्सा हो।’’ जैसे शब्दों का चयन करना और उनको देश की जनता को सीधे तौर इस बात की चुनौती देना कि राजसत्ता में जनता कि नहीं नेताओं की बात सुनी जाती है। आखिरकार दिल्ली की जनता ने इनके इस अहंकार को नस्तनामूद कर दिया।
श्री प्रमोद शाह की एक कविता है-
इंतजार और नही, और नहीं, और नहीं
गर बदलना है इसे, आज बदलना होगा। 

आम आदमी पार्टी का उदय एक ऐसे समय में हुआ है जब देश की प्रायः सभी राजनैतिक पार्टियों के भीतर अधिकांशतः नेतागण भ्रष्टाचार में लिप्त हो चुके हैं। धीरे-धीरे इनकी जड़ें इतनी मजबूत हो चूंकि है कि ये लोग भ्रष्टाचारियों व दागी नेताओं को सही ठहराये जाने के पक्ष में कई तरह के तर्क देते नहीं थकते। इन सबके बीच दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों ने इन नेताओं की जुबान पर मानो ताला ही जड़ दिया हो। आम आदमी के हित को अनदेखी करने वाले नेता आज मजबूर और बेबस नजर आने लगे हैं। 

भले ही इस बेबसता के बीच आम आदमी को भले ही दिल्ली के चुनाव में आंशिक सफलता ही मिली हो, परन्तु इस सफलता की चर्चा ना सिर्फ देश में, दुनियाभर में हो रही है। दुनिया को केजरीवाल के अंदर ना जाने ऐसा क्या दिख रहा है कि भारत की बदलती राजनीति में उन्हें एक मसीहा के तौर पर देखा जाने लगा है। 

केजरीवाल के अंदर भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत का अंदाजा उस समय लगा जब 2011 में श्री अण्णा हजारे ने केजरीवाल के सहयोग से रामलीला मैदान में ‘‘इंडिया एगेंस्ट कप्शन’’  के बैनर तले अनशन किया गया था। उस ऐतिहासिक घटना को दुनियाभर के लोगों ने देखा था। 

कांग्रेसी नेताओं के अहंकार ‘‘हम चुनकर आयें हैं, हमसे बात करना हो तो चुन कर आयें। जनता ने प्रतिनिधित्व करने का दायित्व हमें दिया है। आपलोग एक भीड़ का हिस्सा हो।’’ जैसे शब्दों का चयन करना और उनको देश की जनता को सीधे तौर इस बात की चुनौती देना कि राजसत्ता में जनता कि नहीं नेताओं की बात सुनी जाती है। आखिरकार दिल्ली की जनता ने इनके इस अहंकार को नस्तनामूद कर दिया।

उस समय देश की आम जनता को लगा कि भ्रष्ट व्यवस्था बदलने के लिए सत्ता में अच्छे और इमानदार लोगों को सामने आना ही होगा। अण्णा आंदोलन के समय देशभर की यही भावना थी कि अच्छे लोगों को राजनीति में आना ही होगा। जिसकी कमान संभाली श्री अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, संजय सिंह व गोपाल राय ने। तमाम राजनीति विपरीत परिस्थितियों व सहयोगी के अड़ियल रूख के बावजूद इन लोगों ने हार नहीं मानी। 
राजनीति का क, ख, ग भी नहीं जानने वाले साथियों के साथ मिलकर एक विचारधारा ‘‘पूर्ण स्वराज्य’’ के सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ाने का दृढ़ संकल्प ले इन नन्हे सेनानियों की टोली ने दिल्ली में अपना भाग अजमाने चुनावी मैदान में कूद पड़े। इस बगावत के झंडे को जिसने भी थामा उसे जनता ने सर पै बैठा लिया। 40-40 साल से चुने जानेवाले कदवार नेता को एक अदने से आम आदमी के सामने मुंह की खानी पड़ी। लोकतंत्र मानो हंस कर कह रहा था ‘‘मुझे मजाक से भी हल्का मत लेना’’

इन सबके बीच कांग्रेस ने पुनः एक नई चाल चली, इन लोगों ने अण्णाजी को पुनः अनशन कराने और देश की भावना को बांटने की साजिश रची। आनन-फानन में एक लंगड़ा लोकपाल सदन के पटल पर लाया गया। भाजपा के नेता तो इस लंगड़े बिल को पारित करने के लिए इतने उतावले दिखे कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि इसे पारित करने के लिए वक्त ना मिले तो बिना बहस के ही इस बिल को पारित किया जा सकता है। इन दोंनो राजनैतिक पार्टियों के उतावलेपन से साफ हो गया था कि केजरीवाल के बढ़ते कद का इनको पहले से ही आभास हो चुका था। जिसे ये लोग लोकपाल बिल चाहे जैसा ही क्यों न हो पारित कर दिल्ली की जनता का ध्यान बांट देना चाहते थे। ताकि चुनाव में आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्त दी जा सके साथ ही देश में बन रहे नये राजनीति धुर्वीकरण को रोका जा सके।

कहावत है ‘‘जो लोग दूसरों के लिए गड्ढा खोदतें हैं खुद उसमें गिरते हैं’’ देश की राजनीति ने नई करवटें लेनी शुरु कर दी। अण्णा को आंदोलन राळेगांव सिद्धी से शुरु होकर राहुल गांधी तक सिमटकर रह गई। 

 जोड़-तोड़ की राजनीति और गठबंधन धर्म की राजनीति ने देश को भीतर ही भीतर दीमक की तरह खोखला बना दिया है। मसरुम की तरह फैलते राजनीति दलों के गठबंधन की खेती सिर्फ धन पैदा करने की फसल बनकर रह गई। लोकतंत्र के चारों खंभे इस लहलहाती खेती को ललचाई आंखों से देखते और हर कोई अपने बाड़े-न्यारे करने में लग गये। बंदरबांट की इस राजनीति के बीच अचानक से एक हल्की सी चिंगारी पैदा कर दी है केजरीवाल ने।

मेरी एक कविता - 
भले ही अंधरे ने बसा लिया हो साम्राज्य दुनिया में सदा,/ बस एक चिंगार भर से ही कांप जायेगा वह सदा।
जागते रहो...जागते रहो....जागते रहो...../ ठक...ठक....ठक...ठक....ठक...ठक....
बस इस शब्दचाप से ही / चोर भाग जाएगा सदा।
-शम्भु चौधरी 
 25/12/2013

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

दिल्ली चुनावः आप ने रचा नया इतिहास-2


भारतीय गणतंत्र की इस खुशबू के साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस चमन में जो फूल खिल रहे हैं उसे कैसे इन गिद्ध दृष्टि से बचाया जा सके। निःश्कोंच मुझे यह बात मानने से कोई परहेज नहीं कि अभी आम आदमी पार्टी में परिपक्वता की काफी कमी देखने को मिली है। हांलाकि उनकी भावना और ईमानदारी पर कोई शक नहीं, परन्तु जिस प्रकार के शब्दों का चयन या प्रयोग पार्टी के कार्यकर्ताओं को करते देखा जा रहा है यह लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकती। कम से कम सभ्य तो नहीं मानी जा सकती। 
देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि कोई राजनैतिक पार्टी सिर्फ इसलिए जनता के पास रायशुमारी के लिए जाती है कि अब चूंकि उनकी पार्टी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला है ऐसे में उनकी पार्टी को सरकार बनाने के लिए दूसरी राजनीति पार्टी अर्थात जिस कांग्रेस के खिलाफ वे चुनाव लड़कर आयें हैं उनके ही समर्थन से सरकार बनानी चाहिए कि नहीं?

भारत के राजनीति इतिहास में कहीं भी ऐसे प्रयोग की चर्चा पढ़ने या सुनने को नहीं मिली है। हाँ! अक्सर इस बात की चर्चा हम जरूर करते हैं कि दो विपरीत विचारधाराओं को संसद और विधान सभाओं में जो चुनाव के पूर्व एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाते थे, एक -दूसरों के खून के प्यासे थे, वे सत्ता के लिए कमरे में बैठकर आपस में गले मिल जनता का गला घोंटते रहें हैं। जनता इनके इन इरादों को कभी भाँप भी ही नहीं पाती थी। लाचार जनता किंकर्तव्यविमूढ खुद को ठगी सी महसूस करती अगले चुनाव का इंतजार करती नजर आती। जिस अंगूलियों से उन्होंने वोट दिया था उन अंगूलियों को दाँत के तले दबाने के अलावा जनता के पास कुछ भी नहीं बचता था।

देश में कई राजनीति दल तो सिर्फ इस काम के लिए ही बने हैं जो सिर्फ खरीद फरोख्त के कार्य को ही अपना राजनीति धर्म मानती रही हैं । ऐसे राजनीति दलों की इस वातावरण में चाँदी ही चाँदी हो जाती थी। यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच भी है तो मजाक भी है। गठबंधन की सरकार चलाना या सरकार बनाने के लिए गठबंधन बनाना सिवा एक राजनैतिक समझौता है। जिसने देश को लूटने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है।

भारत की जनता को यह भी सोचना जरूरी हो गया कि देश में गठबंधन राजनीति का जो दौर शुरु हुआ है यह देश के कितने हित में है? कांग्रेस पार्टी के वर्तमान अनुभव की ही बात को लें तो यूपीए-2 का गठबंधन पूरी तरह से भ्रष्टाचार के बलि चढ़ चुका है। जिन-जिन राजनैतिक पार्टियों ने कांग्रेस से गठबंधन किया उन लोगों ने जमकर देश को लूटने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी। कुछ ईमानदार लोग राजनीति करने की चेष्टा की तो उनको बीच में ही इस गठबंधन से बाहर जाना पड़ा। एक गये तो दो नये आ गये। कुल मिलाकर गठबंधन की राजनीति, सत्ता का संरक्षण और देश को लूटने का लाइसेंस बन चुका है। इस राजनीति में आतंकवादी तक भी संरक्षण प्राप्त कर सकता है।

इन सबके बीच भारतीय लोकतंत्र में एक ठंडी हवा का हल्का सा झोंका ही सही देश की जनता ने दिल्ली के चुनाव में महसूस किया है। शायद मेरे मित्र मेरी इस बात से भी सहमत होंगे कि भले ही हमारी अपनी अलग-अलग विचारधारा रही हो पर इस बार दिल्ली के चुनाव में सिर्फ दिल्ली की जनता की ही भागीदारी हमें नहीं दिखी बल्की लगभग पूरी देश की निगाहें इस चुनाव पर ही टिकी थी, दिल्ली की जनता के साथ-साथ देश की जनता ने भी ‘आप पार्टी’ की रायशुमारी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है। जो कभी देखने को नहीं मिला था।

भारतीय गणतंत्र की इस खुशबू के साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस चमन में जो फूल खिल रहे हैं उसे कैसे इन गिद्ध दृष्टि से बचाया जा सके। निःश्कोंच मुझे यह बात मानने से कोई परहेज नहीं कि अभी आम आदमी पार्टी में परिपक्वता की काफी कमी देखने को मिली है। हांलाकि उनकी भावना और ईमानदारी पर कोई शक नहीं, परन्तु जिस प्रकार के शब्दों का चयन या प्रयोग पार्टी के कार्यकर्ताओं को करते देखा जा रहा है यह लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकती। कम से कम सभ्य तो नहीं मानी जा सकती। आम आदमी पार्टी ने जनता का विश्वास प्राप्त करने में जरूर सफलता प्राप्त की है परन्तु इस विश्वास पर खरा उतरने के लिए इनको ना सिर्फ अपनी भाषा को संतुलित करने, साथ ही इनको अब ज़िम्मेदारी पूर्वक बयान देने की भी जरूरत है।

रविवार की रात आम आदमी पार्टी के लिये काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। ‘आप’ एक ऐसे अंतर्विरोध के बाद सरकार बनाने का फैसला लेगी जहां दिल्ली में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभायेगी।  लोकतंत्र में इसे त्रासदी कह लें यह हकीकत। आम आदमी पार्टी को मानना ही होगा कि वह जो सोचती है ये रास्ते उतने आसान नहीं हैं। अपने घोर दुश्मन के सहयोग से सरकार बनाना उससे भी कहीं खतरनाक मार्ग है। जबकि इनको इनमें से एक विकल्प चुनना ही होगा। इसी को लोकतंत्र कहा जा सकता है।

मेरी शुभकानाऐं ‘आप’ के सभी कार्यकर्ताओं के साथ है। इसी शुभकामनाएं के साथ।
शम्भु चौधरी
21-12-2013

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दिल्ली चुनावः आप ने रचा नया इतिहास-1

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

दिल्ली चुनावः 'आप' ने रचा नया इतिहास


राजनीति में कुछ भी हो सकता है। यह बात चार दिन की आम आदमी पार्टी के उस दावे को झूठलाने के लिए सामने खड़ी है जिसमें ‘आप’ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में साफ किया था कि उनकी पार्टी ‘‘ना तो किसी का समर्थन लेगी ना देगी। साथ ही इनका प्रमुख सिद्धांत कि ‘‘हम यहां राजनीति करने नहीं - बल्की इसे बदलने आये हैं।’’ यह बात सही है कि जबसे ‘आप’ ने राजनीति मंच पर अपने पैर फैलने शुरु किये हैं, भारत की राजनीति में कई नये प्रयोग हमें देखने को मिल रहें हैं। जिसे अबतक के राजनीति धुरंधर समझ पाने में ना सिर्फ नकाम रहे हैं। जाने-अनजाने में वे जो भी शतरंजी दाव चलते हैं सब ‘आप’ के रणनीतिकारों के सामने रैंगते और घुटने टैकते नजर आते हैं।

चुनावी सर्वेक्षण और सट्टाबजार
जिसप्रकार राजनीतिक पार्टीयाँ चुनाव के पूर्व और बाद के चुनावी सर्वेक्षणों और सट्टाबजार की राजनीति करती रही है इसबार दिल्ली के विधानसभा में इन्हें मुंह की खानी पड़ी है। यह कोई पहली घटना नहीं है इससे पहले भी कुछ राज्यों में ऐसा हो चुका है। दिल्ली के चुनाव परिणामों को देखकर ऐसा लगने लगा कि ‘आप’ पार्टी की सोच अन्य राजनीतिक पार्टियों की सोच से अलग हटकर है जिसे भांप पाना आसान नहीं है जितना ये लोग सोचतें हैं। मीडियावाले एक-एक राजनीति दलों के पक्ष में धूंआधार प्रचार और उनके पक्ष में आंकड़े प्रस्तुत करने में लगे थे। पहले कौन बाजी मार ले, इस दौड़ में कुछ मीडिया कर्मी को छोड़ दें तो बाकी बचे सबके सब रस्सा-कस्सी के मैदान में जंग लड़ने को तैयार दिखाई दे रहे थे । शब्दों के जाल बूने जा रहे थे। नये-नये अल्फाजों से इतिहास बूनने की तैयार चल रही थी कि दिल्ली के चुनाव परिणामों ने इनकी तुकाबाजी को विराम लगा दिया। इनको यह बात समझने की है कि सट्टा बाजार की तरह अटकलें लगाना व जाति, धार्मिक आंकडों के जोड़-तोड़ कितना सही है? 

भाजपा का मैदान छोड़कर भागना
चार राज्यों के चुनाव परिणाम के पश्चात जिस प्रकार भाजपा ने 4-0 क मशाल जलाकर दौड़ लगाई यह मशाल दिल्ली तक आते-आते ही बूझने लगी। अंततः भाजपा को 3-1 पर ही संतोष करना पड़ा। जोड़-तोड़ के सिद्धांत को राजनीति की सच्चाई माननेवाली भाजपा जो हरकतें चुनाव के पूर्व करने का प्रयास कर, अपनी सरकार बनाने का दावा पेश कर रही थी। चुनाव परिणाम आते-आते शाम तक इनके पांव-हाथ सूजने लगे थे। डा. हर्षबर्धन जी की ज़ुबान लड़खड़ाने लगी। बोले हमारे पक्ष में आंकड़ें नहीं हैं। हम विपक्ष में बैठेगें। राजनीति के माहिर इनके इस बयान से ना सिर्फ अचंभित थे। जानकारों की बात माने तो यह एक प्रकार से इनकी नैतिक राजनैतिक हार ही मानी जाएगी। जिस नैतिकता का ‘भूत’ भाजपा ने दिल्ली में पाला है यह ‘भूत’ भाजपा को अब आजन्म पीछा छोड़ने वाला नहीं। भले ही इनके पक्ष या विपक्ष में भाजपा जो भी तर्क ये दे दें। भाजपा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर ही मैदान छोड़ना चाहिये था जो कि ये लोग नहीं कर सके। यह तो ठीक ‘‘खेल के मैदान में दौड़ लगाने से पहले ही भाग लेना’’ सी बात हुई। भाजपा ये सभी बातें ‘‘फ्लोर आॅफ दी हाउस’’ में बहुमत प्रस्तुत करते वक्त भी कह सकती थी। उप राज्यपाल के निमंत्रण से पहले ही भाजपा का इस प्रकार से पहले ही मैदान में फैल जाना फिर इसे आंकड़ों का खेल बताना, प्रमाणित करता है कि भाजपा को अभी भी राजनीति सीखनी होगी।

कांग्रेस पार्टी का समर्थन
सांप्रदायिकता की राजनीति करनेवाली कांग्रेस दिल्ली में महज 8 सीटों पर आकर किसी प्रकार अपनी लाज बचा पाई। प्रायः सभी सीटों पर तीसरे और चौथे स्थान पर आने वाली पार्टी अपने 8 विधायकों के साथ दिल्ली के राजनीति हलचल आज भी बनी हुई है। जबकि इसके विपरीत 32 सीटों वाली भाजपा दिल्ली के खेल में अपना दम पहले ही तोड़ चुकी हैं। इस बात से यह तो पता चलता है कि दिल्ली विधानसभा में भले ही कांग्रेस का सफाया सा हो चुका है पर राजनीति हासिये पर खड़ी अभी भी डूबते को तिनके का सहारा मिला चुका है। दिल्ली के विधानसभा के गठन में अब कांग्रेस का महत्वपूर्ण रोल को नकारा नहीं जा सकता। भले ही कांग्रेस पार्टी का जो भी चरित्र इतिहास रहा हो। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस समर्थन देने के मामले में हमेशा से सत्ता गिराने या सत्ता के करीब बना रहने की नियत बनी रहती है। जिस चुनाव में जो ‘आप’ कांग्रेस पार्टी को जी भर-भरकर गालियां दी इनके भ्रष्टाचार को उजागर किया, अभी भी लगातार नये-नये विशेषण से कांग्रेस पार्टी को अलंकृत कर रही है फिर भी थेतर की तरह अपने राजनीति एजेंडे कि  ‘‘हम सांप्रदायिक पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिये ‘आप’ को समर्थन दे रहें हैं।’’ अरे भाई! भाजपा तो पहले ही सत्ता से बहार होने का दावा प्रस्तुत कर चुकी है। अब तो केवल ‘आप’ ही बची है जो आपसे समर्थन भी नहीं मांग रही। फिर भी कांग्रेस की ज़ुबान से सांप्रदायिकता शब्द की भाषा निकलना इस बात की तरफ इशारा करता है कि उनको जो आठ सीटें दिल्ली विधानसभा में मिली है उसका जांच परख की जाये तो साफ हो जाता है कि मुसलमानों के वोट बैंक ने कांग्रेस को 8 सीटों में से 6 सीटें प्रदान की है। यदि मुसलमान कांग्रेस का साथ ना देते तो दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस का सुपड़ा साफ हो जाता।                                                                      
शम्भु चौधरी
21-12-2013

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

व्यंग्य: अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त - शम्भु चौधरी

 बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।  कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।   तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। 

वैसे तो मॉर्निंग वॉक के समय हंसी-मजाक को दौर रोजाना चलता ही रहता है, कभी धर्म और राजनीति को लेकर तो कभी महिलाओं से छेड़-छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज, बलात्कार, बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह, स्वास्थ, जीना-मरना आदि आदि।

धीरे-धीरे इन विषयों के वक्ता भी हमारी टीम में जमा हो गए। मुंगेरीलाल रोजना कोई नई बात (समाचार) लाते और व्यायाम के पश्चात शुरु हो जाती बहस की परम्परा। कुछ दिनों से मुंगेरीलाल बिस्तर पर ही पड़े थे लगभग एक सप्ताह हो गया। उनका अन्न-पानी सब छूट सा गया था। वजन भी कम होने लगा था। सबने मिलकर मन बनाया कि क्यों ना आज मुंगेरीलाल के पास ही मिलने को चला जाए। एक ने कुछ नाश्ता के पैकेट खरीद लिये, एक ने दो पैकट दूध ले लिया बोले- ‘‘यार लगा तो काम आ जाएगा नहीं तो घर लेते जाएंगे।’’

घर पंहुते ही एक ने व्यंग्य कसा ‘‘ कैसे हो भाई!! अब तो ‘जल’-‘पानी’ ग्रहण कर लो, लोकपाल बिल पास हो गया है।’’
मानो किसी ने मुंगेरीलाल की दुखती नब्ज को ही छेड़ दिया हो। बोले क्या खाक पास हो गया? अन्ना ने देश के साथ धोखा किया है। सब कुछ पहले से ही तय था यह सब  आप लोगों ने सुना नहीं!! हमलोगों कि तरफ देखते हुए कहने लगे... मेरी तो तबियत खराब चल रही है नहीं तो....

तभी उनको बीच में ही टोकते हुए रामप्रसाद जी बोल पड़े... ‘‘अरे भाई अभी थोड़ा आराम भी कर लो, फिर लिखना जो मन आयें वैसे भी तेरे लिखे को पढ़ते ही कितने लोग हैं? अपने मुंह मियाँ मिठू खुद ही बनते रहो, खुद ही लडू बनाओ और खुद ही खाओ। फिर बात को बदलते हुए ‘‘हम तो बस आपकी सेहत का हाल जानने आ गये, कैसी है अभी आपकी सेहत?’’ पास ही भाभी जी खड़ी थी बोलने लगी - इनको कल ही डाक्टर के पास दिखाने ले गई थी बोले अभी भी थोड़ा बुखार है एक दो दिन में उतर जायेगी। सर्दी-जूकाम लग गई थी।’’

सीताराम जी को पिछले रात की घटना याद थी भाभी जी को बीच में ही रोकते हुए बोल - ‘‘ वह तो लगनी ही थी, अब भला कोई सुबह चार बजे ही इस ठंडी के समय घर से बहार किसी से लड़ने निकल जाए तो सर्दी नहीं लगेगी तो और क्या लगेगी?’’

तभी भाभी ने वैहिचक होते हुए हमारे हाथ से नाश्ते का पैकेट लेते हुए बोली- ‘‘इनसब की क्या जरूरत थी! थोड़ी सकुचाती हुई बोली दूध तो अभी आने ही वाला है...’’ तभी रामप्रसाद ने बात को संभालते हुए बोले ‘‘नहीं भाभीजी हमारे मॉर्निंग वॉकर क्लब का यह नियम ही है कि सुबह किसी से मिलने जाना हो तो वहां भी हमें अपना नाश्ता और चाय पीनी हो तो दूध साथ ही ले जाना होगा। बस आप तो इसमें अपना प्यार मिला कर हमें परोस दिजिए’’

भाभी मुसकराती हुई नाश्ते के पैकेट लेकर भीतर जाते-जाते एक तीर चला गई - हां!! हां!! अभी लाती हूँ थोड़ी इनको भी अक्ल दे देते कि कैसे बात संभाली जाती है’’ और भीतर चली गई।

तभी ने एक ने मुंगेरलाल के हालचाल पूछने के लिये पुनः उसकी दुखती नब्ज को सहलाया ‘‘तो आपने अनाज क्यों छोड़ दिया?’’ हमने तो सुना कि आप भी अन्ना के साथ अनशन में बैठे हो।

अब मुंगेरीलाल का पारा सातवें आसमान को छूने लगा। बोले- ‘‘ अरे यार मेरा अन्ना से कोई लेना-देना नहीं ना ही मेरी इस बीमारी से उनके लोकपाल बिल का कोई संबंध है। हां! एक पत्रकार के हैसियत से मैं उस आदमी की जरूर खबर लूंगा।

‘‘क्यों? क्या कर दिया अन्ना ने बीच में ही रामप्रसाद जी ने उन्हें रोकते हुए पूछ डाला।’’

क्या किया? अब मुंगेरीलाल आपे से बहार हो गया था। उसका पूरा चेहरा लाल तपतपाने लगा। ये लोग सब मिलकर संसद को ड्रामा मंच बना दिये हैं लगता ही नहीं कि कोई देश चला रहा है। सारे बिल ऐसे पास हो रहे हैं कि  जैसे मनमोहन मुद्रा में पूरी संसद सोई हुई हो ... बिल्ली जैसी आंख से टूकूर-टूकूर देखता है बोलता ऐसे है जैसे कोई दैहाती औरत अपने पति के सामने घीघीयाती हो।
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
फिर थोड़ा रुककर सोचते हुए। दिल्ली चुनाव में भाजपा की भी सांस फूलने लगी। इनको लगा कि ये केजरीवाल ने कांग्रेस पार्टी का जो हर्ष दिल्ली में किया कहीं दोनो राजनीति पार्टियों की भी बैंड ना बजा दे?

बस अन्ना के दो दलाल (नाम नहीं लिया) पर इशारा काफी था को इस काम में लगा दिया। उधर अन्ना को इस बात के लिए मना लिया कि वह जनता का ध्यान बंटाने में कांग्रेस की मदद करे और कांग्रेस उनके बिल को संसद में पास कर देगी। बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।

कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।  

तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। कह दिया ने ‘‘अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त‘‘ जब तक कि हमारी बात समाप्त होती चाय-नाश्ता आ गया था।  

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

व्यंग्य: चूहे ने बिल खा लिया... - शम्भु चौधरी

अब मुंगेरीलाल ने मेरा हिसाब लेना शुरू कर दिया - ‘‘ अच्छा ये बताओ ये अन्ना का आंदोलन तुमने क्यों किया था? मुझे रोज उसपर लिखने को क्यों कहता था? भाई! वो तो दो साल पुरानी बात हो गई, इसबार तो हमने कोई आंदोलन-वांदोलन नहीं किया? यह अन्ना कहां से बीच में आगया आज?
मॉर्निंग वॉकर क्लब के हमारे पत्रकार मित्र मुंगेरीलाल ने पता नहीं क्या लिख दिया कि सुबह-सुबह पांच बजे ही मुझे उठाने चले आये। ठंड से सिकुड़ता हुआ रजाई के भीतर से ही उनकी आवाज सुनी...‘‘अरे ओउउउ..सीताराम जी... जल्दी बहार आओ घूमने जाना नहीं क्या?

 मुझे अनायास ही ‘अरे’ कि जगह पता नहीं सिर्फ ‘‘ओअअअ म्हारा सीताराम जी’’ सुनाई देने लगा। मैंने उनको समझाते हुए कहा कि यार सुबह-सुबह तो शुभ-शुभ बोला कर यार....
दूसरी बार उन्होंने फिर जोर से आवाज लगाई.... मैं हड़बड़ी में गरम-गरम रजाई का मोह त्याग कर खिड़की से बहार देखा- चारों तरफ  कुप अंधेरा ही अंधेरा, कुहासा छाया हुआ था मध्यरात्रि सा सन्नाटा चारों तरफ बिखरा हुआ था। स्ट्रीट लाईटें चमक रही थी। कोलकाता में दिसम्बर माह में भी ठंड कम ही रहती है परन्तु हमारा ईलाका शहर से थोड़ा दूर रहने के चलते यहाँ गांव जैसा आनन्द मिलता है।

अपनी आंखें मसलते हुए- बोला यार आता हूँ...आता हूँ....उम्र की इस दहलीज पर भी आकर तुम नहीं सुधरने वाले। सुबह-सुबह क्यों बकवास किये जा रहे हो।

मुंगेरीलाल कहां मेरी बात सुनता वह चिल्लाये ही जा रहा था जल्दी बहार आता है कि आज इस कलम की समाधी तेरे घर के बाहर ही कर दूंगा। मुझे समझ में आ गया जरूर कोई बड़ी घटना रात को हो गई होगी। जल्दी से गुसलखाने में गया, कपड़े बदले सोचता हुआ रात 11 बजे तक के समाचार में तो कोई बड़ी खबर नहीं थी सिवा लोकपाल के और केजरीवाल के। पर केजरीवाल पर तो हमने कल ही बात की थी और रही लोकपाल के यह तो दो साल पुरानी बात है। अन्ना का आंदोलन में भी इस बार कोई खास बात नहीं थी जैसा कि पिछले बार देखने को मिला था। फिर इनको यह क्या सूझी कि तड़के सुबह-सुबह ही हंगामा मचाने लगे।

वैसे तो मॉर्निंग वॉक में जबतक मुंगेरीलाल जी कोई नया धमाका नहीं करते हमें मजा ही नहीं आता। हम सबने मिलकर इनका नाम ही ‘‘मीडिया समाचार’’ रख दिया है।

 घर के बाहर आकर दरवाजा भीतर से बंद किया, चाबी खिड़की के भीतर डालते हुए अंदर आवाज दी... अजी सुनती हो.... ‘‘चाबी भीतर डाल दी है!’’  अंदरे से एक चुभती हुई आवाज निकली- ‘‘ मेरे सर पर मार देते?’’ काम-धाम तो कुछ करना नहीं बस दूसरों को परेशान करना। 

मैंने वह आवाज सुनी-अनसुनी करते हुए मुंगेरीलाल की तरफ रुख किया बोलो तुम्हें क्या हो गया इतनी सुबह?
मुंगेरीलाल और ताव खा गया बोला- ‘‘चल बेटा आज तो तेरी भीतर भी धुलाई होनी है और बहार भी’’
मैंने उसकी तरफ शक की नजर से देखा.. प्रश्नवाचक चिन्ह की मुद्रा में उसको निहारा- ‘‘मैं...मैं...ने??
अच्छा..अ..अ..आ अब मिमियाने भी लगा तुमको सब पता है। तुम्ही हो वो....अभी थोड़ी देर में ही तुमको सब पता चल जायेगा।

मैंने ऊपर की ओर देखा अभी भी सूरज की लालीमा पूरब में नहीं दिखाई दे रही थी.. सेन्ट्रल पार्क का मैनगेट भी अभी तक नहीं खुला होगा। मुंगेरीलाल की तरफ देखते हुए भाई सुबह-सुबह मेरे से क्या गलती हो गई कि तुम इतने गुस्से में दिखाई दे रहे हो?

मुंगेरीलाल कुछ बोलता तभी पीछे से किसी ने आवाज दी.....जयश्री राम.....!! राधे....राधे....!!
हमदोंनो ने पीछे मुड़कर देखा रामप्रसाद जी मफ्लर, चादार ओढ़े चले आ रहें हैं... मैंने मौका देखते ही बात पलटने की चेष्टा की ‘‘क्यों रामप्रसादजी इतनी भी ठंड नहीं है कि आपको इतना ठंडा लग गया’’
रामप्रसादजी भी कहाँ मौका खोनेवाले थे मुझपर पलटवार करते हुए कहा- बस अब सूरज की किरण आकाश में चढ़ने दो सबको गर्मी आ जायेगी। राधे...राधे...

अब मुंगेरीलाल ने मेरा हिसाब लेना शुरू कर दिया - ‘‘ अच्छा ये बताओ ये अन्ना का आंदोलन तुमने क्यों किया था? मुझे रोज उसपर लिखने को क्यों कहता था?

भाई! वो तो दो साल पुरानी बात हो गई, इसबार तो हमने कोई आंदोलन-वांदोलन नहीं किया? यह अन्ना कहां से बीच में आगया आज?

खुद ही देख लो मैंने कहा था अन्ना से सावधान रहना!!! अब लो लोकपाल!! पूरा का पूरा लोकपाल बिल में चला गया.... अन्ना का अनशन..अन्ना का अनशन, सब दिखावा था। शेर को पीछे करने और चूहे को सामने लाने का। मजा लो अब! चूहे ने बिल खा लिया...।

मैं शर्मिंदा था। आज मुंगेरीलाल ने वह बात कह दी जो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मुझे पहली बार लगा कि मुंगेरीलाल को गुस्सा करने का हक बनता है। सुरज निकल चुका था.. लोगों का आना शुरु हो चुका था।
व्यायाम करते-करते मुझे अपनी धर्मपत्नी की भी याद आ गई। उन दिनों किस प्रकार मुझपर अन्ना का भूत सवार था। मैं उसकी एक बात सुनने को तैयार नहीं था। आज मुंगेरीलाल की बात सुनकर मुझे भीतर ही भीतर इतनी आत्मग्लानी हो रही थी कि कुछ बोले भी नहीं बन रहा था।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

गांधी परिवार तक सिमटती कांग्रेस?

जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव धार्मिक तुष्टिकरण के आधार पर नहीं लड़ा जा सकता। पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है।

कोलकाता से शम्भु चौधरी- पिछले माह पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव व इनके परिणामों पर विभिन्न विद्वानों के विश्लेषण से इस बात के संकेत प्राप्त होतें हैं कि कांग्रेस पार्टी में अब कार्यकर्ताओं की जगह नेताओं ने ले ली है। देश के चार राज्यों साम-दाम-दंड-भेद करने के बाद भी इनकी करारी हार ने ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है। यह परिणाम कांग्रेस की नीतियों और इनके बड़बोलेपन नेताओं को भी सबक है।
जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव धार्मिक तुष्टिकरण के आधार पर नहीं लड़ा जा सकता। पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है।

 माहाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, छतिसगढ़, राजस्थान कुछ ऐसे राज्यों की सूची में आ चुके हैं जहाँ कांग्रेस के केन्द्रीय या राज्य के चन्द चापलूस-पदलोलुप नेताओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को सामने रख संगठन को हमेशा से नुकसान पंहुचाते रहे हैं। माहाराष्ट्र में जहाँ शरद पावर ने कांग्रेस से अलग होकर खुद को शक्तिशाली बना लिया तो बंगाल में ममता बनर्जी के कद को नीचा दिखाने व केन्द्र में रहने की मजबूरी ने इस पार्टी की जमीन ही बंगाल से हिला कर रख दी।

 तमिलनाडु में पिछले 45 सालों से, बिहार और उत्तरप्रदेश में पिछले दो दशकों से, बंगाल में पिछले 35 सालों कांग्रेस पार्टी सत्ता से बहार हो चुकी है। पंजाब, कर्नाटक, आंध्रा, राजस्थान, असम, हरियाणा व देश के कुछ छोटे राज्यों में कांग्रेस अपनी स्थिति को किसी प्रकार बचा पाती है इसका कारण यह नहीं कि वहां इस पार्टी कर जनाधार मजबूत है। इसका कारण है कि अभी वहाँ जनता को कोई अच्छा विकल्प नहीं मिल पाया है। जबकि केरल व त्रिपुरा में माकपा का जनाधार कुछ हद तक कांग्रेस को टक्कर देती रही है।

 कांग्रेस पार्टी के जो सोनिया के चापलुस नेतागण अपने ही राज्यों के मझले नेताओं के पर हमेशा से ही कुतरते रहे हैं इन लोगों ने ही सत्ता को अपनी जागीर बनाये रखने के लिए गांधी परिवार के सामने अपने घुटने टैकने का कार्य करते रहें हैं।

मजे कि बात यह है कि कांग्रेस पार्टी में इनके खुद की जमीन को मजबूत बनाने की जगह हवा में महल बनाने के लिए नींव रखी जाती रही है। दिल्ली के गलियारे तक सिमटती कांग्रेस पार्टी आज धीरे-धीरे राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस पार्टी का जनमत पर विश्वास न कर गांधी परिवार तक सिमटता जा रहा है।
 इससे देश के अन्दर छोटी-छोटी ताकतें अपना सर उठाने में सफल रही है। देश का राजनैतिक परिदृश्य भी तेजी से बदलता जा रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम हमें चौंकाने वाले परिणाम से कांग्रेस पार्टी को पुनः सोचने के लिए विवश तो किया है साथ ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को देश में तीसरे विकल्प के रूप में जगह भी प्रदान कर दी है।
इसका विश्लेषण कांग्रेस पार्टी को अंततः करना ही चाहिए कि उनकी पार्टी किस दिशा में जा रही है? राज्य के नेताओं के पर्र कुतरने के बजाय यदि कांग्रेस पार्टी उनके कद को एक अनुशासन के अन्दर महत्व प्रदान करे और सत्ता प्राप्त करने की जल्दबाजी न कर अपने संगठन को महत्व दे तो संभवतः यह दल भारतीय राजनीति में अपनी पहचान पुनः बना पाएगी अन्यथा इसका हर्ष सिमटता चला जाऐगा।

व्यंग्य: हम हार नहीं मानगें? - शम्भु चौधरी



कुछ तो शर्म करो भाई! भाजपा ने दिल्ली में सरकार बना भी लेती या नहीं बनाई तो क्या हुआ? केजरीवाल को दे तो दिया सबने मिलकर अपना समर्थन। अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता से किये वादों को पूरा करे। सिर्फ छह महीने में बिजली-पानी का वादा हम भी देखते हैं कैसे पूरा करेंगें? हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। जबतक केजरीवाल को अपनी जाति में शामिल नहीं कर लेते, हम हार नहीं मानगें।  


भाजपा को अगला चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ना चाहिए। यह बात हमें सुनने में बड़ी ही अटपटी सी लगती हो, पर इस बात में कहीं ना कहीं सच्चाई तो लग ही रही है। आज सुबह मॉर्निंग वॉकर क्लब में कुछ हंसी मजाक की बात चल रही थी तभी मुंगेरीलाल काफी गंभीर हो कर बोलने लगे’ आप लोगों को मजाक की सूझ रही है? इस देश का अब क्या होगा? ऐसे ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा, सरकार बनाने से पहले ही मैदान छोड़ कर पतलीगली से भाग निकली। नैतिकता का यही तकाजा यदि लोकसभा चुनाव के पश्चात दिखा तो सोचे देश का क्या होगा?
पास खड़े सीताराम जी मुंगेरीलाल की बात सुन कर थोड़े चिंतित नजर आने लगे। बीच में ही मुंगेरीलाल को टोकते हुए बोले- ‘‘यार बात तो सोचने की है, अब केजरीवाल को ही देखो समर्थन लेने के नाम पर भी अपनी शर्तें रख रहा है। गजब ही कर दिया बंदे ने’’ मेरे जीवन में तो ऐसा कभी नहीं सुना था। इतनी नैतिकता किस काम की? भले आदमी को थोड़ा तो समझौता करना ही चाहिए। अब ये घमंड ही तो है और इसको क्या कहें ?

अब सुबह का वातावरण धीरे-धीरे राजनीतिमय होने लगा। गोपालजी ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि मुझे तो लगता है इसमें भी कोई राजनीति है? केजरीवाल को सरकार बना लेनी चाहिए। राजनीति पार्टियों को समर्थन लेने की कीमत चुकानी पड़ती है परन्तु केजरीवाल को तो सब कुछ बिना शर्त बिलकुल मुफ्त मिल रहा है। कहावत हैं न ‘‘हल्दी लगे ना फिटकरी रंग चोखो आये’’ अब केजरीवाल को कुछ काम कर के दिखाना चाहिए।
हमारे कुछ मित्र राजनीति बहस होते देख धीरे-धीरे घिसकने लगे। अब हम चार ही बच गये थे सो बात करते-करते चाय की दुकान की तरफ हो लिए। चाय वाले के पास खड़े-खड़े बात ही कर रहे थे कि पास में ही युवकों की एक टोली खड़ी थी पहले तो वे लोग हमारी बातें सुनते रहे, फिर कुछ देर बाद उनमें से एक युवक थोड़ा ताव में आकर बोलने लगा। -
‘‘तो भाई सा’ब ये बीजेपी और कांग्रेस वाले ही मिलकर सरकार क्यों नहीं बना लेते? इनकी हर जगह आपस में मैच फिक्सड है। अब ये लोकपाल बिल को ही ले लिजिये? बीजेपी के वो क्या नाम है..... कुछ याद करते हुए... हां!  जेटली जी सा’ब कहते हैं कि ‘‘संसद में लोकपाल बिल को बिना बहस के ही पास कर दिया जाए’’ भाई!  मैं पूछता हूँ ये दोनों इतने उतावले क्यों दिखने लगे लोकपाल बिल को पास करने के मामले में? सोचना तो पड़ेगा ही दो विपरीत विचारधारा के ध्रुव जब एक दिखें तो दाल में काला तो जरूर है। हो ना हो देश में ग्रहण काल दिख रहा है।
तभी उनमें से एक दूसरा युवक बोलने लगा-
‘‘मुझे तो राहुल गांधी ज्यादा ईमानदार नजर आते हैं। बेचारा जो कुछ भी बोलता है सही बोलता है। दागी बिल में भी राहुल जी को उन लोगों ने वेबजह बकरा बना दिया। जब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने तो तय ही कर लिया था कि दागी अध्यादेश जल्दी से पास हो जाए तो बेचारे को बकरा क्यों बनाया मिलकर?

तभी तीसरा युवक सामने आया- हमें समझाने की लहजे में बोला ‘‘आरटीआई कानून से लेकर कोयला दलाली तक दोनों राजनीति दल सूर में सूर मिलाते नजर आतें हैं। क्यों ने दोनों ही मिलकर दिल्ली में सरकार बना लेते?’’
अब मुंगेरीलाल से रहा नहीं गया। बीच में ही टोकते हुए कहे ये सब तो ठीक है पर केजरीवाल को तो मौका हाथ से गँवाना नहीं चाहिए?
हम तो गंवारू लोग हैं, हमें तो बस यही समझ में आता है कि कैसे भी हो सरकार बना लो बस। जनता का वादा पानी, बिजली से हमें अब क्या लेना-देना वैसे भी केजरीवाल को कौन सा 5 साल सरकार चलानी है। 6 माह के बाद चुनाव करवाना तो होगा ही? अभी तो सरकार बना ही लेनी चाहिए’’ - क्यों कोई गलत बात हो तो बताओ?
मेरे से तब रहा नहीं गया। मैंने उनसे पूछा मेरी एक बात समझ में नहीं आती ये अन्ना को क्या हो गया जो उनको अचानक से ये अनशन की क्या सूझी, मुझे तो इनके अनशन के समय और इनके बयान पर भी शंका नजर आने लगी।

मुंगेरीलाल अब आपे से बहार हो गए- बोले जो भी हो जैसा भी हो बस अब संसद को चलने भी दो यार मिलकर जब दोनों बड़ी पार्टियां काम करती हैं तो इसमें देश का भला ही तो है। आप लोगों को बस बात बनानी आती है। बेबजह हर बात में अंगूली करना आदत सी बन गई है।

देश की दो बड़ी राजनीति पार्टी देश हित में लगातार फैसलों पर फैसला लिये जा रही है। चार साल संसद को जम कर लूटा, देश को मिल बांट कर लूटा। अब चुनाव का समय आया और फैसले लेने में लगी है तो भी इनके ऊपर सवाल पर सवाल किये जा रहे हो!! कुछ तो शर्म करो भाई! भाजपा ने दिल्ली में सरकार बना भी लेती या नहीं बनाई तो क्या हुआ? केजरीवाल को दे तो दिया सबने मिलकर अपना समर्थन। अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता से किये वादों को पूरा करे। सिर्फ छह महीने में बिजली-पानी का वादा हम भी देखते हैं कैसे पूरा करेंगें? हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। जबतक केजरीवाल को अपनी जाति में शामिल नहीं कर लेते, हम हार नहीं मानगें।

रविवार, 15 दिसंबर 2013

Letter to Sonia Gandhi By Aam Adami Party

सोनिया गांधी को अरविंद केजरीवाल ने चिट्ठी में क्या लिखा.
 दिनांकः 14/12/13
श्रीमती सोनिया गांधी जी, 
अध्यक्षा, कांग्रेस पार्टी 
नई दिल्ली
HIGHLIGHT: हम इस राजनीति में सत्ता हासिल करने नहीं आएं हैं। जनता उन समस्याओं का समाधान चाहती हैं।
श्रीमती सोनिया जी,
कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने के लिए कहा है। हमने तो कांग्रेस से समर्थन मांगा नहीं था। आम आदमी पार्टी का जन्म ही बीजेपी और कांग्रेस पार्टियों की भ्रष्ट, आपराधिक और साम्प्रदायिक राजनीति के कारण हुआ। जब देश का आम आदमी भ्रष्टाचार से कराह उठा तो इस देश के आम लोगों ने खुद अपनी पार्टी बनाई और आवाज उठाने का निश्चय किया। ऐसे में आम आदमी पार्टी और बीजेपी जैसी पार्टियों के साथ कैसे हाथ मिला सकती है?
चुंकि आपकी पार्टी ने कहा है कि आप बिना शर्त समर्थन देने के लिए तैयार हैं तो देश की जनता जानना चाहती है कि इसका क्या मतलब है? दिल्ली की जनता के कुछ ज्वलंत मुद्दे हैं जिसकी वजह से दिल्ली की जनता परेशान है। 15 वर्ष के शासनकाल में कांग्रेस की सरकार ने इन मुद्दों का समाधान करने की बजाय कई जगह तो जनता की परेशानियों को और ज्यादा बढ़ा दिया है। सात वर्ष के अपने शासनकाल में भाजपा ने नगर निगम को जमकर लूटा है। ऐसे में यदि अब आप आम आदमी पार्टी की सरकार को बिना शर्त समर्थन देते हैं तो आपका इन मुद्दों पर क्या विचार होगा?
आज देश की राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का एक माध्यम बन गई है। सत्ता हासिल करने के लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। हर पार्टी किसी भी तरह सत्ता हासिल करना चाहती है। लोगों के मुद्दों से किसी को कोई लेना-देना नहीं है। हम इस राजनीति में सत्ता हासिल करने नहीं आएं हैं। हम जनता उन समस्याओं का समाधान चाहती हैं।
ऐसे कुछ मुद्दे मैं इस पत्र के साथ संलग्न कर रहा हूँ। आपसे उम्मीद करता हूँ कि आपकी पार्टी हर मुद्दों पर अपना रुख साफ करेगी। चूंकि हमारी पार्टी की बुनियाद ही सच्चाई और पारदर्शिता पर आधारित है, इसलिए यह पत्र मैं जनता के बीच रख रहा हॅँ। आपका जो भी जबाब आएगा उसे भी हम जनता के बीच रख देंगे और जनता से पूछेंगे कि आपके जबाब के मद्देनजर क्या आम आदमी पार्टी को सरकार बनानी चाहिए? और हां! कृपया हर मुद्दों पर अपना नजरिया स्पष्ट रूप से बतलाइएगा। गोलमोल करके मत कहिएगा। जैसे - ‘‘सैद्धांतिक रूप से हम साथ हैं’’ इत्यादि। आपके जबाब का इंतजार रहेगा।
अरविंद केजरीवाल

रविवार, 8 दिसंबर 2013

आम आदमी पार्टी की सफलता आम आदमी - शम्भु चौधरी

कल तक जो काँग्रेसी और भाजपाई ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को भारत की राजनीति में कोई महत्व तक देने को तैयार नहीं थे आज चुनाव परिणामों को देख कर ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के नीचे की जमीन खिसक गई, भाजपा पार्टी के भी दाँत खट्टे कर दिये। चुनाव परिणाम के दो दिन पूर्व तक जो पार्टी आम आदमी के सदस्यों को तोड़ने की गंदी साजिश करने का प्रयास कर रही थी? आज अचानक से नैतिकता की बात करने लगी। डॉ. हर्षवर्धन कल तक अपनी जीत का दावा करते नहीं थक रहे थे आज उनको विपक्ष में बैठने का ज्ञान जग गया।

दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम में किसी एक राजनीति दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में आप आदमी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन देश की राजनीति में हलचल सी पैदा कर दी है। 125 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के स्टार केंपेनर श्री राहुल गांधी ने इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि दिल्ली में उनकी पार्टी की शीला दीक्षित के अच्छे कार्यों के बावजूद उनकी पार्टी आम आदमी की बात को समझने में भूल की है। उन्होंने अपने नेताओं को भी कड़ा संदेश देते हुए आम आदमी पार्टी के नेताओं से सीख लेने की सलाह तक दे डाली।

कल तक जो काँग्रेसी और भाजपाई ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को भारत की राजनीति में कोई महत्व तक देने को तैयार नहीं थे आज चुनाव परिणामों को देख कर ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के नीचे की जमीन खिसक गई, भाजपा पार्टी के भी दाँत खट्टे कर दिये। चुनाव परिणाम के दो दिन पूर्व तक जो पार्टी आम आदमी के सदस्यों को तोड़ने की गंदी साजिश करने का प्रयास कर रही थी? आज अचानक से नैतिकता की बात करने लगी। डॉ. हर्षवर्धन कल तक अपनी जीत का दावा करते नहीं थक रहे थे आज उनको विपक्ष में बैठने का ज्ञान जग गया।

मुझे याद है जोड़-तोड़ में माहिर भाजपा के नेताओं ने कई बार राज्यपाल व महामहिम राष्ट्रपति जी को इस आधार पर नैतिकता का पाठ पढ़ा चुके हैं कि उनकी पार्टी संसद या विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है। जनता का जनादेश उनके पक्ष में है। अतः सरकार बनाने का पहला अधिकार उनकी पार्टी को ही मिलना चाहिए। आज नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली पार्टी, जोड़-तोड़ की राजनीति में आस्था रखने वाली पार्टी के मुंह से नमाज पढ़ने की बात गले नहीं उतर रही। कहावत तो हम भी पढ़ते हैं और भाजपा भी पढ़ती है। यदि इसी बात को कहावत में कहा जाए तो ‘‘ सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को ’’ इन पर सटीक बैठता है।

दिल्ली के विधानसभा चुनाव परिणाम ने देश की तमाम राजनीतिज्ञों को एक चेतावनी भर दी है कि ‘‘ वे इस बात का अहंकार कि ‘‘वे चुन कर आयें हैं’’ इसलिए वे ही आम आदमी के प्रतिनिधि हैं इसके अलावा वे किसी को भी जनता का प्रतिनिधि नहीं मानते और जिनको उनसे बात करनी हो तो पहले चुनाव लड़कर आयें तब ही वे उनसे बात करे।’’

पहली बात तो यह कि यदि आम आदमी ही चुनकर चले गये तो उनसे बात ही क्यों करेंगें? दूसरी बात कि जब आम आदमी ही चुनकर संसद या विधानसभा में पंहुचगें तो आप खुद ही बहार हो जाएंगे। इसलिए यह अहंकार पालने वाले सांसदों को भी आज सोचने की जरूरत है कि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें।

देश से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं होता और लोकतंत्र में संसद या विधानसभा से बड़ा कोई मंदिर। इस मंदिर के पुजारी यदि वहां बैठकर जनता को लूटने में लग जाए। लोकतंत्र के पवित्र मंदिर को अपवित्र कर दे तब प्रशांत भूषण, अरविन्द केजरीवाल, मनीष सीसोदिश, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, संजय सिंह, शाजिया इल्मी जैसे नेता पैदा होते हैं। इतिहास में इनके नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखें जाऐगें। Date:09/12/2013

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

वाममोर्चा का ‘‘सांप्रदायिक-सेक्युलरवाद’’ - शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी देश में "सेक्युलर-सांप्रदायिकता" की राजनीति शुरु से ही करती रही है परन्तु चूंकि इस बार दिल्ली में कांग्रेस की हालत ना सिर्फ पतली होती जा रही है वाममोर्चा कभी भी यह खतरा नहीं उठाना चाहेंगी कि वह भी कहीं कांग्रेस पार्टी के चक्कर में जनता के आक्रोश का शिकार ना बन जाए। तब बंगाल में उनको सीट कहां से मिलेगी?

जो वाममोर्चा लगातार 35 सालों से बंगाल में एक छत्र राज किया कई बार काँग्रेसी बैशाखी के सहारे लंगड़ाती हुई चली, दिल्ली में कांग्रेस को सहारा देती, तो कभी लतियाती रहती। बंगाल में ठीक चुनाव के समय या यूँ कह लें चुनाव के ठीक एक वर्ष पूर्व से ही वाममोर्चा के नेतागण कांग्रेस पार्टी को पानी पी-पी कर कोसते नजर आते और चुनाव में टिकट बांटते समय फ्रेंडली चुनाव लड़कर दिल्ली में उनकी सरकार बनाने में मदद करते रहें है। जिसमें सिर्फ एक चुनाव में माकपा ने जयप्रकाश आंदोलन के समय जनता पार्टी जिसमें आज की भाजपा (जनसंघ) भी शामिल थी के साथ कई सालों भात-दाल खाया था।

पिछले लोकसभा चुनाव 2009 के ठीक पूर्व भी वाममोर्चा ने इसका प्रयोग जारी रखा पर उस बार यह प्रयोग इनको भारी पड़ गया । कांग्रेस पार्टी ने पलटवार करते हुए बंगाल की शेरनी तृणमूल नेत्री जो लगातार वाममोर्चा के विरूद्ध अपनी आवाज उठाती रही थी का साथ दे दिया। लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा से भी वाममोर्चा के परचे-परचे उखड कर गाड़ी का टायर सड़क पर ही पौं बोल गया।

विधानसभा का चुनाव हो या म्यूनिसिपल व पंचायत का चुनावों में सब जगह वाममोर्चा की लाल तानाशाही ने दम तोड़ दिया। पिछले 35 सालों में बंगाल को कंगाली के हालात में पंहुचा देने वाली माकपा जिसने ना सिर्फ बंगाल को कर्ज में गले तक डुबो दिया। हवड़ा के सरकारी अस्पताल में पिछले 30 सालों तक एक ऐम्बूलेंस तक खरीद कर नहीं दे सकी। सारा का सारा सांसद निधि, विधायक निधि तक को डकार जाती रही वाममोर्चा की सरकार अब एक नया राग अलापने में लगी है। ‘सेक्लुलरवाद’

इनका सेक्युलरवाद क्या है?

बंगाल में तृणमूल की सरकार व इस राजनीति दल के साथ इस वाममोर्चा कभी भी किसी भी हालात में एक साथ खड़ी नहीं हो सकती कारण स्पष्ट है जिस वाममोर्चा को जड़ से उखाड़ने का प्रण ममता बनर्जी ने ले रखा तब उसका क्या होगा? कांग्रेस पार्टी देश में "सेक्युलर-सांप्रदायिकता" की राजनीति शुरु से ही करती रही है परन्तु चूंकि इस बार दिल्ली में कांग्रेस की हालत ना सिर्फ पतली होती जा रही है वाममोर्चा कभी भी यह खतरा नहीं उठाना चाहेंगी कि वह भी कहीं कांग्रेस पार्टी के चक्कर में जनता के आक्रोश का शिकार ना बन जाए। तब बंगाल में उनको सीट कहां से मिलेगी?

वाममोर्चा बंगाल में अपना दम-खम पहले ही समाप्त कर चुका है बंगाल में अब ज्योति बसु और सुभाष चक्रवर्ती सरिके नेता नहीं रहे। रही-सही कसर इन लोगों बंगाल के वरिष्ठ माकपा नेता श्री सोमनाथ चटर्जी को संगठन से अलग कर माकपा महासचिव श्री प्रकाश करात के अहंकार पर मोहर जड़ दी। आज माकपा दिल्ली का ख़्वाब देखने में लगी है। सोचती है सेक्युलरवाद का सहारा ही ले लिया जाए? इसमें बुराई ही क्या है। सब राजनीति दल जब यही कह रहें तो वाममोर्चा भी उनके सूर में सूर मिला दें तो हर्ज ही क्या है।

मैं इनसे ही जानना चाहता हूँ वामपंथी विचारधारा के किस विचारधारा को यह नेतृत्व करती हैं, धर्म आधारित विचारधारा को या कुछ और ? अफसोस की बात है कि इनका बैचारिक दिवालिपन तो बहुत पहले ही निकल चुका था। अब इनका मानसिक दिवालियापन निकलना बाकी है। खैर यह भारत की राजनीति ही है जहां माकपा के नेता समझते हैं कि देश की जनता अनपढ़ है और खुद को विद्वान समझते हैं। इनके ‘‘सांप्रदायिक-सेक्युलरवाद’’ की जनता इस बार के लोकसभा चुनाव में जमकर पिटाई करेगी। लूट-लूट कर देश को जर्जर अवस्था में पंहुचा देने राजनीतिज्ञों के द्वारा अब सेक्युलरवाद का सहारा लेना देश की जनता को खलने लगा है।


शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

तहलका : तमाशा ना बन जाए देश? - शंभु चौधरी

सवाल यह उठता है कि महिला का होना, महिला के साथ होना कहीं अपराध तो नहीं बन गया? कोई भी कभी भी किसी भी दिन, किसी कारण से ही अपने साथ हुए व्यवहार को यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत कर दें और हमारा कानून संबंधित पुरुष का अपराधी मामने लगे तो और यह क्रम इसी प्रकार ही चलता रहा तो जो कानून, संसद ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाये हैं वही कानून देश की पूरी सभ्यता को चौखट पर लाकर खड़ा कर देगा।

कोलकाता- 30 नवम्बर ’2013 इन दिनों महिलाओं के द्वारा कथित यौन उत्पीड़न आरोप में दो घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। जिसमें लगातार एक सप्ताह से सुर्खियों में तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के ऊपर लगाया गया यौन उत्पीड़न मीडिया वालों के लिए टीआरपी बढ़ाने के लिए मानो एक प्रकार से ‘‘यूरिया खाद’’ ही मिल गया हो । दूसरा मामला वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री ए के गांगुली पर एक वर्ष पूर्व की घटना का जिक्र अपने ब्लॉग में लिख कर किया । दोनों ही मामले एक ऐसे वर्ग से जुड़े हैं जहां समाज को सोचने के लिए मजबूर तो करता ही साथ ही यह भी सोचने के लिए बाध्य करता है कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? कहीं हम आधुनिक बनते-बनते महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर इस कदर अपराधी बन जाए कि पूरी दूनिया हमारे पास खड़ी होने से भी भयभीत होने लगे?

सर्वप्रथम में यहां यह लिख देना जरूरी समझता हूँ कि में पीड़ित महिला की भावना के साथ हूँ और महिलाओं की भावना उनकी मान-मर्यादा का सम्मान भी करता हूँ । साथ ही इस बहस में उनकी भागीदारी भी चाहता हूँ जो महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिन्तीत भी हैं।

अभी हाल के दो मामले हमारे सामने हैं-

पहला मामला:-
तहलका संपादक तरुण तेजपाल का ही लें जो हाल की ही घटना पर आधारित है। इस मामले की पीड़ित महिला ने पहले मामले को पत्राचार और तेजपाल से वार्तालापए संस्थान के सहयोगियों के माध्यम से सुलह-सफाई मे कुछ दिन गंवा दिए। सवाल उठता है कि जब तरुण तेजपाल के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला बनता है तो यह सुलह सफाई कहीं अपने कंपनी के बॉस को ब्लैकमेल करने का हिस्सा तो नहीं था? आखिर वह पीड़ित पत्रकार महिला कोई अनपढ़ व तैहाती औरत या लड़की तो नहीं थी कि उसको थाने में जाकर अपनी बात कहने से डर लग रहा था। जो महिला 6 पेज का पत्र लिख कर यह कहती हो कि ‘‘तेजपाल ने जो किया वह दुष्कर्म है । एक ओर जहां तेजपाल अपने धन, ऐश्वर्य, रसूल और विशेष लाभ को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे वहीं उनके लिए यह लड़ाई अपने सम्मान और अपने अधिकार के लिए है कि मेरा शरीर मेरा है और मेरे नियोक्ता का खिलौना नहीं है ।’’ सवाल उठता है कि जो पत्रकार महिला इतनी लंबी-लंबी बातें, बड़ी-बड़ी बातें कर रही है वह घटना के इतने दिन बाद उसको याद आया कि वह अपने सम्मान के लिए लड़ रही है? कौन सा सम्मान बताने का कष्ट करेंगी। फिर ईमेल और एसएमएस का आदान-प्रदान क्यों हुआ? समझौते और माफीनामा किस लिए मांगा और किसके लिए मांगा जा रहा था? तेजपाल की लड़की और सोमा चौधरी और चंद मित्रों को बीच में क्यों डाला और डाला भी गया था तो उसका क्या उद्देश्य था?

इन सब प्रश्नों का जबाब उनको देना ही चाहिए । जब इस पत्रकार महिला ने इतने नाटक कर दिये उसके बाद भी वह खुद गोवा के थानें में या देश के किसी भी थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने क्यों नहीं गई? उसको इस बात का भी जबाब देना चाहिए कि वह तरुण तेजपाल के साथ जो बातें इन दिनों शेयर करने लगी थी और उनसे उत्तेजक बातें पूछने लगी थी वे क्या बातें थी और क्यों करती थी? उसका इन बातों से उसके प्रोफेशन से क्या रिलेशन था? आज उस पीड़ित महिला को अपने शरीर की चिंता है तो क्या इस बात का भी जबाब वे देगी कि तब उसको अपने कद और अपने उम्र का ध्यान क्यों नहीं आया था? तब उसका सम्मान किधर घास चढने गया था?

दूसरा मामला:-
भी ठीक इससे विपरीत पर कुछ-कुछ मिलता जुलता सा है। जिसमें पीड़ित महिला अधिवक्ता ने एक आपबीती जग से शेयर की । यह आपबीती वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री ए के गांगुली के अधीन एक वर्ष पूर्व प्रशिक्षु अधिवक्ता के तौर पर जब प्रशिक्षण ले रही थी तब की है जो इस महिला ने भी किसी थाने में जाकर आरोप नहीं लगाया, उसने इस रोचक वारदात को अपने ब्लॉक पर ठीक प्रतिभा खेतान की कहानी की तरह एक लेखिका बनकर प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए लगा दिया । मामले की जांच के आदेश आनन-फानन में दे दिए गए । जांच जारी है ।

सवाल यह उठता है कि महिला का होना, महिला के साथ होना कहीं अपराध तो नहीं बन गया? कोई भी कभी भी किसी भी दिन, किसी कारण से ही अपने साथ हुए व्यवहार को यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत कर दें और हमारा कानून संबंधित पुरुष का अपराधी मामने लगे तो और यह क्रम इसी प्रकार ही चलता रहा तो जो कानून, संसद ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाये हैं वही कानून देश की पूरी सभ्यता को चौखट पर लाकर खड़ा कर देगा।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आरुषि हत्याकांड : सीबीआई सफेद का झूठ?

[HIGHLIGHT: सीबीआई ने मीडिया और देश को गुमराह कर गलत तथ्य देश और कानून के सामने रखने में सफल रही है। परन्तु देश का कानून कहता है कि एक निर्दोष को सजा देने से बेहतर है 10 दोषी को सजा ना मिले। सीबीआई ने जिस प्रकार इस मामले में एक रोचक कहानी के आधार पर तलवर दंपति को सजा दिलाने का प्रयास किया है यह फैसला कानून के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज किया जाना है। ]

सीबीआई सफेद झूठ का पुलंदा है। सबूत जुटाने में असमर्थ इस संस्था के पास सबूत नहीं, सिर्फ कहानी बनाकर मामला चलाने का लाइसेंस प्राप्त है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में कहा दिया कि सीबीआई एक असंवैधानिक संस्था है। इस संस्था को हमेशा के लिए बंद कर एक ऐसी संस्था का गठन समय की मांग हो चुकी है जो देश में बढ़ते आधुनिक अपराधों को जांच करने में सफल हो सके। ऐसी संस्था जो ना सिर्फ देश की सुरक्षा पर पैनी नजर रख सके अपने कार्य को अंजाम तक पंहुचाने के लिए किसी राजनेताओं की सिफारिश का उसे मुहंताज ना होना पड़े।

इन दिनों जिस प्रकार सीबीआई का प्रयोग दुरुपयोग बड़े पैमाने में सामने आया है। जिस प्रकार अन्य आतंकी हमलों में इसको वोट बैंक के लिए प्रयोग किया गया। जिस प्रकार अपने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिज्ञों को बदनाम करने या उनके चरित्र को दागदार करने व उनके ऊपर आपराधिक मामले लगाने के आरोप इस संस्था पर लगे हैं इससे इस संस्था की ना सिर्फ इसके साख पर बट्टा लगा है। हमारी देश की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह इस संस्था की करतूतों से लग चुका है। सीबीआई हर जगह ना सिर्फ विफल साबित होती रही है देश का धन बर्बाद करने में इस संस्था को महारत हासिल है एक-एक मामला 25-25 साल चलाना और अपराधियों को कभी बचाना, कभी पकड़ना फिर उसे बचाना इस संस्था का सिर्फ और सिर्फ यही काम हो चुका हैं। सीबीआई के द्वारा जांच होनेवाले आजतक के तमाम मामलों की समीक्षा की जाए तो हमें इस संस्था के परिणाम निराशाजनक लगते हैं। अदालतों को बार-बार इन्हें फटकारना पड़ता है।

आरुषि हत्याकांड में भी इनके क्लोजर रिपोर्ट के बाद तलवार दंपति के निवेदन और अपनी लड़की के लिए न्याय की गुहार लगाते हुए क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया था। जिस पर अदालत ने इसे फटकार लगते हुए क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर ही ठीक से इस मामले की जांच का आदेश दिया था। अदालत के निर्देश के बावजूद जब इनको मामला सुलझाने में सफलता नहीं मिली तो सीबीआई ने न्याय की गुहार लगाने वाले तलवार दंपति को ही अपने जाल में फंसा लिय। बोले अब लगाओ न्याय से गुहार? तुम दोनों को ही फाँसी पर झूला डालते हैं। सीबीआई ने जो तथ्य अदालत के सामने रखें हैं वह सबको चौंका देनेवाला है। इनका निष्कर्ष था ‘‘घटना स्थल पर जो चार लोग थे उनमें से दो की हत्या हो चुकी है इसलिए उस स्थल पर जा दो बचे तलवार दंपति ही इस घटना के अपराधी हैं।’’ कितनी मजेदार कहानी है सीबीआई से कोई पूछे तब इस कहानी को गढ़ने के लिए इतना वक्त क्यों लगा यह तो एक बच्चा भी बता देता तो इनके पास सिर्फ धमकी है। सीबीआई को शाबाशी देने का मन करता हैं कि इसने देश के रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटना को इतनी आसानी से सुलझा दिया।

सवाल यह उठता है कि तब सीबीआई ने कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल आखिर क्यों की थी? इस बात से सीबीआई के ऊपर शक की सूई जाती हैं कि यदि कोई अपराधी ही होगा तो वह सीबीआई के इस क्लोजर रिपोर्ट पर खुश होगा कि वह इनके खिलाफ न्यायालय से न्याय की गुहार लगायेगा? इस मामले में सीबीआई खुद की असर्मथता और अपने दोष को एक निर्दोष परिवार पर मढ़ दिया है।

देश का कानून कहानी और शक के आधार पर किसी को अपराधी नहीं करार दे सकता। सीबीआई इस मामले में सबूत जुटाने और तथ्यों को खोजने में पूर्णतः असफल रही है। इस केस से प्रमाणित होता है, सीबीआई सिर्फ देश का पैसा बर्बाद करती है। सीबीआई ने मीडिया और देश को गुमराह कर गलत तथ्य देश और कानून के सामने रखने में सफल रही है। परन्तु देश का कानून कहता है कि एक निर्दोष को सजा देने से बेहतर है 10 दोषी को सजा ना मिले। सीबीआई ने जिस प्रकार इस मामले में एक रोचक कहानी के आधार पर तलवर दंपति को सजा दिलाने का प्रयास किया है यह फैसला कानून के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज किया जाना है। अब लगाओ न्याय से गुहार?

Date: 25-11-2013 [Free copyright]

शनिवार, 23 नवंबर 2013

व्यंग्यः मोदी ने कांग्रेस पार्टी ज्वा......ईन कर ली?

मुझे मुंगेरी लाल पर बार-बार शक भी हो रहा था पटना में मेरे सौ रु खर्च करवा दिया थे अब तक उसका हिसाब नहीं किया, बोला- "दे दूगां मोदी को आ जाने दो।" जैसे मोदी के आने से ही इसका लोन पास होगा। कांग्रेस इतना लोन बांट रही वह इसको नहीं दिखाई देता। अनाज सस्ता कर दिया। फल-सब्जी भी मुफ्त में खाना चाहता है? अब 20रु रोजाना कमाकर देश को ही खा जाएगा क्या? अब भी मोदी की दलाली करता है नमकहराम। मुझे लगा कि आज काई नया बहाना लेकर आया है मुझसे फिर पैसे ऐंठने का।

मुंगेरीलाल भागता-भागता और हांफता-हांफता मेरे पास आया बोला सुना है क्या?, ‘क्या’ पर इतना जोर दिया की उसके दम फूलने लगे, थोड़ी बहुत जो सांसें वह ले पाता था, वह भी लेने के लाले पड़ गये।
मैंने जल्दी से उसको पास पड़ी पानी की बोतल पीने को दी और उसे पहले बैठने को कहा-
‘‘यार! पहले थोड़ी सांस तो ले लो!’’
मुंगेरी लाल पास पड़ी बेंची पर बैठते हुए कहा हां! हां! ‘‘ यार बड़ी धांसू खबर लाया हूँ’’... फिर पानी की बोतल मुंह में डाली और गट-गट पानी पीने लगा। उसको पानी पीते देख मुझे भी प्यास लग गई।
पर पानी बचने का नाम ही नहीं ले रही थी, उसने एक ही बार में पूरी की पूरी बोतल साफ कर डाली । फिर बोला- ‘‘यार हां! अब आराम मिला मेरी तो पूरी सांस ही चढ़ गई थी। तेरे जैसा यार मिल जाए तो फिर किस बात की चिन्ता मुझे। थोड़ा मुस्कराया और बोला- ‘‘चल चाय पिला’’
मुंगेरी मेरी तरफ तिरछी नजर से बार-बार देखकर मुस्करा रहा था, मानो जैसे कोई ‘मुर्गा’ उसके सामने खड़ा हो।
मैंने उसकी हां में हां मिलाते हुए कहा- ‘‘हाँ! क्यों नहीं चाय तो बनती ही है’’ फिर थोड़ा रूक कर
यार! तू जो खबर लाया था वह तो पहले बता।
जैसे-जैसे मुंगेरी लाल को हवा मिलती गई वह खुद को तरोताजा महसूस करने लगा।
बोला. यार मोदी जी के बारे में एक जोरदार खबर लाया हूँ।
मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था।
पिछले दिनों ही हम दोनों ने मिलकर पटना के गांधी मैदान में मोदीजी का भाषण सुना था।
वह तो गनिमत है कि हमारी जान बच गई, ठीक हमारे सामने एक बम फटा था। इसकी खबर हमको पहले से ही थी कि इधर कोई ‘धमाका’ होने का है। हमने सोचा यह मोदी का धमाका है।
हम ठहरे बिहारी के बिहारी सोचे- हमको क्या लेना-देना धमाके से। हमको तों बस मोदीजी को सुनना है।
हमको तो बस मोदी ही मोदी चारों तरफ दिखाई दे रहे थे । धमाके की आवाज सुनकर भी कोई हिलने को तैयार नहीं था। हम दोनों भी मोदी को सुनने के लिए वहीं डटे रहे। यह सब मैं सोच ही रहा था कि मुंगेरी लाल ने मेरे सपने में खलल पैदा कर दी-
अरे.... जनाब कहां खो गए? चाय आ गई थी। यार !!! जानते हो कांग्रेस पार्टी ने.... बीच में ही उसको टोकते हुए पूछा-
‘‘क्यों क्या हुआ कांग्रेस पार्टी को ?’’ फिर पप्पू ने कोई नई बात तो नहीं बोल दी, जैसे ‘नानसेंस’ , ‘बकवास’
अरे नहीं- इस बार मोदी ने कहा है इससे पूरी कांग्रेस पार्टी बल्ले-बल्ले करने लगी है।
चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ गई है। सभी जगह फटाके फौंड़े जा रहें हैं। कांग्रेस पार्टी में दीवाली मनाई जाने लगी।
मैं भी आश्चर्यचकित सा हो गया? यह सब सुनकर।
आखिर मोदी ने ऐसा क्या रातों-रात तीर मार दिया कि कांग्रेस में हर तरफ खुशियाली छा गई?

आज अचानक से कांग्रेस को खुश होने का कारण मेरी समझ से परे था। कल तक तो ‘‘मोदी पीछा करो अभियान’’ चला रहे थे। खोजी कुत्तों की टीम लगा दी उनके पीछे, पूरा देश एक ही काम में लगा था क्या सी.बी.आई हो क्या नेतागण सबको एक ही आदेश का पालन करना था, ‘‘मोदी को खोजो’’ पर ये जनाब हर जगह मंच पर आते कोई नया धमाका कर के चले जाते। ऐसा तो आजादी के समय भी देखने को नहीं मिला था। गजब का नेता है अभी से सत्ता पक्ष, विपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार बैठी है।

मुंगेरीलाल की तरफ देखते हुए पूछा - "यार बात ठीक से समझाते हो कि सिर्फ पहेली में ही बात करोगे?"
मुंगेरी- बताता हूँ.. बताता हूँ जल्दी भी क्या है? "यार चाय तो पी लेने दो पहले।"
मुझे मुंगेरी लाल पर बार-बार शक भी हो रहा था पटना में मेरे सौ रु खर्च करवा दिया थे अब तक उसका हिसाब नहीं किया, बोला- "दे दूगां मोदी को आ जाने दो।" जैसे मोदी के आने से ही इसका लोन पास होगा। कांग्रेस इतना लोन बांट रही वह इसको नहीं दिखाई देता। अनाज सस्ता कर दिया। फल-सब्जी भी मुफ्त में खाना चाहता है? अब 20रु रोजाना कमाकर देश को ही खा जाएगा क्या? अब भी मोदी की दलाली करता है नमकहराम।
मुझे लगा कि आज काई नया बहाना लेकर आया है मुझसे फिर पैसे ऐंठने का।
मैंने आशंका भरी नजरों से उसकी तरफ देख कर पुछा-
"तु कुछ बतायेगा कि मैं अब यहां से जाऊं?,"
यार! आप तो बस नाराज हो गए-
लो सुन मोदी ने कांग्रेस पार्टी...
हां!...हां!... आगे बोल क्या? ‘‘कांग्रेस पार्टी...’’
‘‘मोदी ने कांग्रेस पार्टी ज्वा.......ईन कर ली है।’’
क्या???? यह सुनकर मैं भौंच्चका रह गया।
अब मोदी भी सांप्रदायिक नहीं रहे? अब देश को फिर से सेक्युलरवादी के हाथ ही सौंप देना होगा? मुझे तो पहले सी लगता था कांग्रेस कुछ ना कुछ चालाकी करेगी फिर सत्ता में आने के लिए लो कर लो बात अब इनसे। अब हिटलर किसको कहेंगे हम? अब मोदी की शादी कराने के लिए कांग्रेस ने जिस महिला को खोजा था उसका क्या होगा? माकपा, भाकपा, सपा, राजद, बसपा, जदयू सब ने मोदी की तारीफ में नये-नये कशीदे गढ़ने शुरू कर दिये। यह तो सरासर गद्दारी है। - शम्भु चौधरी