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शुक्रवार, 29 मई 2015

केजरीवाल को संवैधानिक इनकांडन्टर में मरवा देगी भाजपा?

लेखक: शम्भु चौधरी
जैसे ही दिल्ली सरकार के नियंत्रण में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ईमानदारी से कार्य करना क्या आरम्भ किया मानो केंद्र की मोदी सरकार सकते में आ गई महज 15 दिनों में 500 से भी अधिक भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ गये। इधर कार्यवाही होनी शुरू ही हुई कि उधर भाजपा ने ट्रांसफर-पोस्टींग का खेल शुरू कर दिया। यह सब अब तक जो भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था उसे छुपाने के लिये और खुद व कांग्रेस के पापों को बचाने के लिये किया जाने लगा। संविधान की दुहाई दी जाने लगी। कुछ दलाल पत्रकारों को बहस के लिये सामने लाया गया। कुछ मीडिया को हायर किया गया ताकि वे केजरीवाल को बदनाम करने का सिलसिला जारी रखें।

कोलकाताः ( 30 मई ,2015) जिस प्रकार दिल्ली में आप सरकार के भ्रष्टाचार से लड़ने के एक मात्र हथियार ‘‘भ्रष्टाचार निरोधक शाखा’’ को केंद्र की भाजपा सरकार ने उसके अधिकार क्षेत्र को सिमित करने का कुप्रयास कर भ्रष्टाचारियों को बचाने में लगी है, इससे साफ प्रतीत होता है कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली में ना सिर्फ भ्रष्टाचारियों के साथ मिली हुई है इन भ्रष्टाचारी अधिकारियों को मुख्य पदों पर आसीन कर केजरीवाल सरकार को असफल और बदनाम करने कर प्रयास भी कर रही है ताकि वह किसी भी प्रकार से केजरीवाल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप जड़ सके और केजरीवाल को जेल भेज सके या उसकी राजनैतिक रूप से हत्या करवा दी जाए ताकी जनता के सामने वह भाजपा का विकल्प न बन सके। मानो संघ का नौटंकी राष्ट्रवाद संगठन एक अदने से आदमी के सामने बौना साबित होता जा रहा है। इसी लिये अब संघ चाहती है कि केंद्र की मोदी सरकार किसी भी प्रकार संवैधानिक अड़चनें पैदा कर केजरीवाल को संवैधानिक इनकांडन्टर में मरवा दिया जाए?

कहावत है चोर को बचाने वाला भी चोर होता है। उच्चतम न्यायालय के पास एक चोर ने इस आशा के साथ फरियाद की है कि उसको इस कार्य में साथ देने वाले सभी भ्रष्टाचारी साथी बच जाए। माननीय न्यायालय को रूख स्पष्ट करना होगा कि वह भ्रष्टाचार के मामले में देश कि अदालतों से क्या अपेक्षा रखती है? सवाल यह नहीं उठता कि किस सरकारी एजेंसी ने किस भ्रष्टाचारी को पकड़ा। सवाल यह उठता है कि क्या हम इन भ्रष्टाचारियों को इसी प्रकार बचाने का प्रयास करते रहेंगें? यदि कोई व्यक्ति किसी भ्रष्टाचारी को पकड़वता है तो वह पहले यह पता लगाये कि ईमानदार अधिकारी कौन है?

जैसे ही दिल्ली सरकार के नियंत्रण में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ईमानदारी से कार्य करना क्या आरम्भ किया मानो केंद्र की मोदी सरकार सकते में आ गई महज 15 दिनों में 500 से भी अधिक भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ गये। इधर कार्यवाही होनी शुरू ही हुई कि उधर भाजपा ने ट्रांसफर-पोस्टींग का खेल शुरू कर दिया। यह सब अब तक जो भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था उसे छुपाने के लिये और खुद व कांग्रेस के पापों को बचाने के लिये किया जाने लगा। संविधान की दुहाई दी जाने लगी। कुछ दलाल पत्रकारों को बहस के लिये सामने लाया गया। कुछ मीडिया को हायर किया गया ताकि वे केजरीवाल को बदनाम करने का सिलसिला जारी रखें।

महज चंद दिनों में दिल्ली पुलिस के 100 से भी अधिक सिपाही घुस लेते, गरीब जनता को लुटते पकड़े गये। मानो दिल्ली में लुट का यह व्यवसाय राजनैतिक आकाओं की कमाई का बहुत बड़ा स्त्रोत था जिसे केजरीवाल की ‘आप’ सरकार ने आते ही बंद कर दिया।

आज हमें सोचना होगा कि क्या हम इसी प्रकार भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ेगें कि इसे समाप्त करने के लिये एक स्वर में ‘केजरीवाल’ का साथ देगें? जिस आनन-फानन में केंद्र की भाजपा सरकार ने 21 मई 2015 को एक नोटीफिकेसन जारी कर खुद के पापों को जायज़ ठहराने को प्रयास किया और भ्रष्टाचार से लड़ने के केजरीवाल सरकार के मनसुबे पर पानी फेरने का प्रयास किया, माननीय उच्चतम और दिल्ली उच्च न्यायालय को चाहिये कि वे भ्रष्टाचार के मामले में कोई समझौता ना करें।

- जयहिन्द!

रविवार, 24 मई 2015

मीडिया: राजनैतिक दलों की दलाल?

लेखक: शम्भु चौधरी
सवाल उठता है पत्रकारिता का सिद्धांत क्या है? पत्रकारिता का प्रथम और अंतिम सिद्धांत घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनना और उसकी हुबहु तस्वीर को देश-विदेश के लोगों तक पंहुचाना ना कि किसी एक पक्ष या विपक्ष में राग अलापना। परन्तु आज का समाचार समूह खासकर मीडिया हाऊसेस के शब्द साफ दर्शते हैं कि वे किसी एक पक्ष के खिलाफ या किसी विशेष व्यक्ति का प्रचार करने में लगी हैं। इन हाऊसेस को समाचार दिखाने से कहीं अधिक रुचि राजनीति करने में है।

कोलकाताः ( 25’मई ,2015) पिछले कई लेखों में मेैं मीडिया को सवालों के कठघरे में खड़ा करता आया हूँ। आज कई दिनों के बाद पुनः इसी विषय पर अपने विचार रख रहा हूँ। देश के कुछ मीडिया घराने न सिर्फ सत्ता के दलाल बन चुकें हैं कुछ तो उन राजनैतिक पार्टियों के रहमों-करम पर ही चलती अन्यथा उनको सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाता है। इन समूह को सिर्फ इतनी ही आजादी दी जाती है कि वे विपक्ष पर यदि 10 कीचड़ उझालते हैं तो उन राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ एक या अधिकतम दो वह भी उसकी इजाज़त उनको पहले अपने आला कमान से ले लेनी होती है।

देश में कुछ मीडिया हाउस के बिकाऊ पत्रकारों का एक वर्ग इस पूरे प्रकरण को संचालित करता है जो चुनाव से लेकर सरकार बनाने और गिराने के राजनैतिक आंकड़ें जोड़ते और घटाते रहते हैं। पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त हमने स्पष्ट देखा था कि किस प्रकार भाजपा वालों ने पैसे के बल पर स्थानीय समाचार समूह, पत्रकारों और मीडिया समूह को चाँदी के जूते मारे थे। ‘‘मुंह में राम बगल में छूरी’’ लिये दिन भर इन चैनलों ने (इक्का-दुक्का) को छोड़ के अरविंद केजरीवाल को जी’ भर-भर सभ्य भाषा में गाली देने में लगे थे। मानो एक प्रकार से वे खुद ही चुनाव लड़ रहे थे।

सवाल उठता है पत्रकारिता का सिद्धांत क्या है? पत्रकारिता का प्रथम और अंतिम सिद्धांत घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनना और उसकी हुबहु तस्वीर को देश-विदेश के लोगों तक पंहुचाना ना कि किसी एक पक्ष या विपक्ष में राग अलापना। परन्तु आज का समाचार समूह खासकर मीडिया हाऊसेस के शब्द साफ दर्शते हैं कि वे किसी एक पक्ष के खिलाफ या किसी विशेष व्यक्ति का प्रचार करने में लगी हैं। इन हाऊसेस को समाचार दिखाने से कहीं अधिक रुचि राजनीति करने में है।

पत्रकारिता के आड़ में दरअसल इन समूहों ने मीडिया हिजड़ों की दुकान खोल रखी है जो पैसा देगा उसके लिये ये लोग सड़क पर नंगा होकर नाचेगें। जो नहीं देगा उसको नंगा करेगें। -जयहिन्द

मंगलवार, 31 मार्च 2015

आतंकवादी पत्रकारिता ?

कोलकाताः 1’अप्रेल,2015, लेखक- शम्भु चौधरी

ये पत्रकार दिन-रात पूरे देश की गंदगी को पाठकों के मानस पटल पर अपनी थोपी गई विकलांग मानसिकता से एक साजिश के तहत हमें परोसनेवाली पत्रकारिता खुद को लोकतंत्र की प्रहरी मानती है परन्तु इसके कार्य तो समाज में गंदगी फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं रह गया। विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर रोज़ाना ये पत्रकार इतने गुनाह करतें हैं कि इनके गुनाह पर बोलनेवाले वाले भी उस समय चुप हो जातें हैं जब ये पत्रकार एक साथ उस व्यक्ति पर धावा बोल उसे इतना घायल कर देते हैं कि वह खुद को समाज का अपराधी समझने लगता है। दरअसल भारत में पत्रकारिता अब विचारप्रधान ना रहकर हमला प्रधान बन गई है।

नईदिल्ली/कोलकाताः (1’अप्रेल,2015) गत् 28’ मार्च 2015 को ‘आप’ की राष्ट्रीय परिषद की बैठक बहुमत प्रस्ताव से श्री प्रशांत भूषण, श्री योगेन्द्र यादव, प्रो. आनन्द कुमार और श्री अजित झा को क्या हटाया गया जैसे पूरे हिन्दूस्तान के राजनीति दलों द्वारा पोषित पत्रकार व मीडिया समूह, व शिवसेना की थूकचाटू पत्रिका ‘सामना’ सबके सब केजरीवाल पर ऐसे पिल गये जैसे कोई बहुत बड़ा जूल्म हो गया। मानो शिवसेना में कभी विभाजन ही ना हुआ हो। भाजपा, कांग्रेस या माकपा में कभी वगावत के स्वरों को दबाया ही ना गया हो। इन राजनीति दलों में किसी व्यक्ति को पार्टी विरोधी कार्याें के लिये दंडित ही ना किया गया हो? इनकी पार्टी में तो लोकतंत्र बचा है और कल कि जन्मी पार्टी के लोकतंत्र को बचाने की चिन्ता इनको ऐसे हो गई जैसे किसी अकेले व्यक्ति ने इनके राजनीति विचारधाराओं पर हमला कर दिया हो।

ऐसे लगता है जैसे भारत के लोकतंत्र की रक्षा का लाइसेंस सिर्फ इनके पास ही हो और केजरीवाल इस लाइसेंस को भी हथिया लेना चाहता है। जो माकपा खुद को मजदूरों कर पार्टी बताती रही, देश और विश्व की आर्थिक स्थिति पर इनके पास कोई विचारधारा नहीं कि जिन मज़दूरों के अधिकार की लड़ाई वे (माकपा, भाकपा) लड़ना चाहतें हैं उन्हें रोजगार कैसे प्रदान किया जा सकेगा।

बंगाल में 35 सालों से सत्ता पे काबिज रही माकपा के शासनकाल में 60 हजार से अधिक छोटे-बड़े कल-कारखाने बंद हो गये। सैकड़ों मज़दूरों ने माकपा के लाल डंडे को ढोते-ढोते अपनी जान दे दी। उनके बच्चों ने आत्महत्या कर ली । पर इनके पोषित पत्रकारों ने ज़ुबान तक नहीं खोली की यह गलत हो रहा है। जिन राजनैतिक विचारें के सिद्धांत 320 कमरे के आलीशान महल से बनता है वे लोग मजदूरों की, किसानों के हक की बात करतें हैं। जो लेखक आजतक सोना पैदा करने वाले किसानों का मरता देखता रहा। जो पत्रकार बैंकों के ‘एनपीए’ के नाम पर बैंकों की लाखों -करोंडों की लूट को दिनदहाड़े औद्योगिक जगत द्वारा सरेआम लूटते देखते रहे वे पत्रकार केजरीवाल के ‘स्वराज’ पर ऐसे हमला कर रहें है कि जैसे इनके खूनपसिने की कमाई को केजरीवाल लूटा देगा?

सवाल उठता है केजरीवाल की तुलना आज इंदिरागांधी के एमेरजेंसी जैसी हालात से करने की नौबत इन पत्रकारों को क्यों आन पड़ी? क्या इनके पास दूसरे उदाहरण की कमी पड़ गई थी? या जानबुझ कर देश को भ्रमित करना चाहतें हैं कि केजरीवाल किसी निरंकुश शासक की तरह बन गया है। वो भी उस सत्ता की कमान पाने के बाद जिस सत्ता के पांच पति है। ये पत्रकार दिन-रात पूरे देश की गंदगी को पाठकों के मानस पटल पर अपनी थोपी गई विकलांग मानसिकता से एक साजिश के तहत हमें परोसनेवाली पत्रकारिता खुद को लोकतंत्र की प्रहरी मानती है परन्तु इसके कार्य तो समाज में गंदगी फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं रह गया। विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर रोज़ाना ये पत्रकार इतने गुनाह करतें हैं कि इनके गुनाह पर बोलनेवाले वाले भी उस समय चुप हो जातें हैं जब ये पत्रकार एक साथ उस व्यक्ति पर धावा बोल उसे इतना घायल कर देते हैं कि वह खुद को समाज का अपराधी समझने लगता है। दरअसल भारत में पत्रकारिता अब विचारप्रधान ना रहकर हमला प्रधान बन गई है। अतः अब इस पत्रकारिता को आतंकवादी पत्रकारिता का नाम दिया जा सकता है।


शनिवार, 28 मार्च 2015

आप’का लोकतंत्र? लेखक: शम्भु चौधरी

कोलकाताः 28 मार्च 2015, लेखक- शम्भु चौधरी

श्री प्रशांत भूषण जी यह भी चाहते थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित की जा सके इसके लिये इन तथाकथित आप’ के नेताओं ने संघ से सांठगांठ कर ली आवाम के बहाने पार्टी पर राजनीति हमला करना और भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती किरणवेदी की प्रशंसा कर केजरीवाल को हर कदम पर नीचा दिखाने की गंदी राजनीति करते रहे। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है?

नईदिल्ली/कोलकाताः (28’ मार्च 2015) ‘आप’ की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में वही हुआ जो लगभग जो पहले से तय था। आम आदमी पार्टी के तीन वरिष्ठ नेता सहित चार सदस्यों को राष्ट्रीय से बहार का रास्ता दिखा दिया गया। एक शायर की कि एक शायरी है- बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। आज की हुई आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने बहुमत प्रस्ताव से श्री प्रशांत भूषण, श्री योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और श्री अजित झा को पार्टी में बगावत करने और पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में हराने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए इन चारों नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निष्कासित कर दिया। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पीएसी से पहले ही निकाला जा चुका था।

बैठक से निकलकर श्री योग्रेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि लोकतंत्र की हत्या हो गई। सवाल उठता है कि योगेंद्र जी किसे लोकतंत्र मानते हैं। जो उनके समर्थन में खड़े थे या वे जिसे अरविंद केजरीवाल फूटी आंखों नहीं सुहाते? उसे? राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अलग-थलग पड़े इन नेताओं ने बैठक के दौरान सिवा आरोप लगाने और अपने चंद समर्थकों के लेकर धरने में बैठने के अलावा सिर्फ इतना ही किया कि पूरी देश को यह बता दिया कि हम कितने जिम्मेदार नेता हैं।

जो प्रशांत जी कहते हैं कि उनको राजनीति नहीं आती वे कमरे के भीतर से लगातार केजरीवाल के खिलाफ साज़िश पे साज़िश रचने में लगे थे। विभिन्न प्रांतों के अपने प्रभाव में आने वाली तमाम ताकतों को पार्टी को बदनाम करने की रणनीति बनाने में जुटे थे। इसे क्या कहते हैं?

यह बात उसी समय तय हो गई थी जब दिल्ली में श्री केजरीवाल ने 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर जीत दर्जकर सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि वे 5 साल सिर्फ दिल्ली की जनता से किये वादों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करगें। इसी बात से बौखलाये श्री योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जी ने सवाल उठाने शुरू कर दिये कि दिल्ली का चुनाव ‘‘5 साल केजरीवाल ’’ के नारे से क्यों लड़ा गया? श्री प्रशांत भूषण जी यह भी चाहते थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित की जा सके इसके लिये इन तथाकथित आप’ के नेताओं ने संघ से सांठगांठ कर ली आवाम के बहाने पार्टी पर राजनीति हमला करना और भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती किरणवेदी की प्रशंसा कर केजरीवाल को हर कदम पर नीचा दिखाने की गंदी राजनीति करते रहे। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है? जो प्रशांत जी कहते हैं कि वे एक स्वस्थ्य राजनीति विकल्प के लिये ‘आम आदमी पार्टी’ में आये थे तो ये ओछी हरकत क्यों? इन सब सवालों का जबाब इन्हें देना ही पड़ेगा। जयहिन्द!

रविवार, 1 मार्च 2015

गद्दार कौन? आतंकवादी या मोदी?

प्रमाणित हो गया कि कभी 'राम' तो कभी 'देशभक्ति' को बेचने में भाजपा से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं जो आंस्तीन के सांप की तरह हिन्दुस्तानियों की भावना को भंजाकर सत्ता पर काबिज होते ही अपनी दौगली 'जात' दिखा देता है। आज जिस प्रकार से देश को चलाने का प्रयास भाजपा कर रही है इससे देश की जनता में भारी असंतोष पनपने लगा है कि स्पष्ट शब्दों में लोग कहने लगे है कि ‘‘यह भी गद्दार निकला’’

कोलकाताः 3 मार्च 2015, लेखक- शम्भु चौधरी ; जम्मू-कश्मीर में चुनाव परिणाम के पश्चात सरकार बनाने हेतु हुए एक लंबी सौदाबाजी के बाद भाजपा ने पीडीपी के साथ ठीक वैसे ही समझौता कर सरकार बना ली जैसे दूध और दही का मिश्रण। अब जम्मू-कश्मीर के नये मुख्यमंत्री जनाब मुफ्ती मोहम्मद सईद आखिरकार अपना दाव खेलने में सफल रहे। मुख्यमंत्री बनते ही आपने एक रहस्य का पर से पर्दा उठाकर कम से कम देश की जनता को बता दिया कि आप जिस इंसान पर भरोसा कर रहे हैं वह कितना भरोसेमंद है? मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने बता दिया था कि ‘‘मैं ऑन रेकॉर्ड कहना चाहता हूं मैंने प्रधानमंत्री से कहा है कि राज्य में विधानसभा चुनावों के लिए हमें हुर्रियत, आतंकवादी संगठनों और पाकिस्तान को श्रेय देना चाहिये’’ इनके इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री यह सब बात पहले से ही जानते हुए चुप रहकर देश की जनता से गद्दारी कर रहे थे।

जिस 370 को लेकर संध (RSS) हमेशा से देश की जनता को गुमराह करती रही, वह रामजादे आज चुप क्यों? सोचने की बात है। शायद अपनी मां का श्राद्ध कराने लगे थे? भारत सरकार को सरकारी बयान देना पड़ा कि वे धारा 370 पर कोई विचार नहीं कर रहीं। इस बयान का क्या अर्थ निकाला जाय कि यह भाजपा सरकार की तरफ से एक लिखित दस्तावेज है जो मोदी ने पीडीपी का दिया है। क्या भाजपा इस बात का जबाब देगी? या संघ के रामजादे इस पर भी चुप रहेगें? संध की बोलती पर ताला लगानेवाले मोदी की जबान में जहर ही जहर भरा है अब तो हमें लगता है कि मोदी जिताना पाकिस्तान के लिये खतरा नहीं उससे भी कहीं अधिक हिन्दुस्तान के लिये खतरनाक साबित होते जा रहा है।

मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ गठबंधन कर भाजपा भले ही कांग्रेस को सत्ता से अलग करने की राजनीति में सफल रही हो पर इस बात से यह तो प्रमाणित हो गया कि कभी 'राम' तो कभी 'देशभक्ति' को बेचने में भाजपा से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं जो आंस्तीन के सांप की तरह हिन्दुस्तानियों की भावना को भंजाकर सत्ता पर काबिज होते ही अपनी दौगली 'जात' दिखा देता है। आज जिस प्रकार से देश को चलाने का प्रयास भाजपा कर रही है इससे देश की जनता में भारी असंतोष पनपने लगा है कि स्पष्ट शब्दों में लोग कहने लगे है कि ‘‘यह भी गद्दार निकला’’। जयहिन्द!

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

आप’की ऐतिहासिक जीत

लेखक: शम्भु चौधरी
10 तारीख के दिन 11.00 बजते-बजते ‘‘5 साल केजरीवाल’’ के नारे से दिल्ली गुंज उठा। एक के बाद एक भाजपा के उम्मीदवार मैदान में धूल चाटते नजर आये। जैसे ही चुनाव परिणाम 'आम आदमी' के पक्ष में आने लगे तो लगा कि किसी तरह 40 तक पंहुच जायेगा। जब 35...36.. 40.. के बाद अचानक 50..51.. पर विजयी होने के आंकड़े आने लगे तो कई लोगों के नीचे की जमीन घिसकने लगी। भाजपा दलाल सटोरियों ने अपने मोबाईल को स्वीचआॅफ कर दिये।

कोलकाताः (10 फरवरी 2015) दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम ईपीएम मेशीन से ज्यूं-ज्यूं बहार आने लगे, कई मीडिया हाउस जो झूटे ही भाजपा को शुरू में बढ़त दिखाने का ढोंग रचते रहे दिन सुबह के 10 बजते-बजते उनकी जुबान लड़खराने लगी और ईपीएम मेशीन से निकल के आंकड़े बोलने लगे। कलतक जो लोग ‘आम आदमी पार्टी’ के दफ्तर में ताला लगाने की बात बोलते थकते नहीं थे। लोकतंत्र की ताकत ने उनके जुबान पर ऐसा ताला जड़ दिया कि पांच साल तक रह-रहकर सरकार को ब्लैकमेल भी नहीं पायेगें।। मेरी रचना -

जल जायेगी धरती जब, सत्ता के गलियारों में, भड़क उठेगी ज्वाला तब, नन्हे से पहरेदारों में।

दिल्ली के चुनाव में आम आदमी की जीत ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में अहंकार की कोई जगह नहीं है। आम आदमी पार्टी की सफलता ‘जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये’ भारत के संविधान में सत्य को साकार कर दिया। भाजपा के नाकारात्मक प्रचार, धन की बर्वादी, अर्मादित और असभ्य भाषा का प्रयोग, 200 से अधिक सांसदों, कई केन्द्रीय मंत्री, प्रधानमंत्री स्वयं, भाजपा के अध्यक्ष की पूरी ताकत, संध परिवार, कई राज्यों के मंत्री-मुख्यमंत्री सबके-सब एक परिंदे के सामने धूल चाटते नजर आये।

मोदी जी ने लोकसभा चुनाव जीतने के लिये जिन जुमले का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से वेदखल किया था, उन्हीं जुमलों ने मोदीजी के अश्वमेध विजयी घोड़े को दिल्ली में रोक दिया। जिस विजयी यात्रा ने भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह सह प्रधानमंत्री श्री मोदीजी को अहंकारी बना दिया था, यही अहंकार भाजपा को दिल्ली में डूबा दिया। भाजपा और संघ की केडर बेस ताकत, किरण बेदी का मास्टर स्ट्रोक, चपलुस मीडिया का एक वर्ग, नाकारात्मक विज्ञापनों की झड़ी ये सब प्रहार केजरीवाल के मजबूत इरादों के सामने पानी भरते नजर आये। केजरीवाल के एक-एक शब्द इनलोगों पर भारी पड़ने लगे। त्रिकोणात्मक संर्घष में किसी एक राजनीति दल को 54.2 प्रतिशत मतों का मिलना भारत के चुनावी इतिहास अबतक सभी आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया।

10 तारिख के दिन 11.00 बजते-बजते ‘‘5 साल केजरीवाल’’ के नारे से दिल्ली गुंज उठा। एक के बाद एक भाजपा के उम्मीदवार मैदान में धूल चाटते नजर आये। जैसे ही चुनाव परिणाम 'आम आदमी' के पक्ष में आने लगे तो लगा कि किसी तरह 40 तक पंहुच जायेगा। जब 35...36.. 40.. के बाद अचानक 50..51.. पर विजयी होने के आंकड़े आने लगे तो कई लोगों के नीचे की जमीन घिसकने लगी। भाजपा दलाल सटोरियों ने अपने मोबाईल को स्वीचआॅफ कर दिये। परिणाम देखते-देखते कई लोगों की सांसे फूलने लगी। अबतक कांग्रेस पार्टी मैदान से बहार हो चुकी थी। तभी चुनाव आयोग की तरफ से एक सूचना आई कि ‘आम आदमी पार्टी’ को 54.2 प्रतिशत मिले हैं। तबतक रूझान अपने अंतिम चरण की तरफ कदम रख चुका था। आम आदमी -61, भाजपा-9, कांग्रेस - 0, और अन्य -0 । सभी की सांसें थम सी गई थी। आम आदमी पार्टी के दफ्तर में जश्न को माहौल था, भाजपा कार्यलय के बहार हल्की चहल-पहल थी और कांग्रेस के कार्यालय के बहार सन्नाटा छाया हुआ था। अंतिम चरण में मुकाबला एक तरफा हो गया था। ‘आप-65’ , ‘भाजपा -5’ ...आप-66, भाजपा-4 समाचार आया किरण बेदी चुनाव हार गई। अंतिम परिणाम ‘आप-67’ और ‘भाजपा-3’ केजरीवाल अपने मित्रों व धर्मपत्नी के साथ जनता के सामने आते हैं कहते हैं - यह आप‘की’ जीत है।

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

हिन्दू ‘भाजपा’ के बंधवा वोटर? -शम्भु चौधरी

बुखारी साब के समर्थन को ठुकरातेे हुए ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने जो साहासिक कदम उठाया यह भारत की राजनीति के लिये एक सबक है। चुनाव परिणाम में इसका क्या प्रभाव होगा यह अलग बात है लेकिन यह जरूर है ‘आप’ ने भारतीय राजनेताओं को दर्पण दिखा दिया है कि मजबूत ईरादे से यदि चुनाव लड़ा जाये तो सांप्रदायिक ताकतों को तमाचा जड़ा जा सकता है।

कोलकाताः (08 फरवरी 2015) दिल्ली विधानसभा का चुनाव प्रचार कल शाम थम गया परन्तु चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर धर्म की राजनीति करने वाले नकाबपोश चेहरे सामने आ गये। ऐसा प्रायः हर चुनाव के समय होता है। राजनैतिक ताकतें भी अपने फायदे की बात सोच उन बयानों का लाभ लेने में लग जाती है। विश्वनाथ प्रताप सिंह के दौर से कई फिरकाफरस्ती ताकतें अमूमन हर चुनाव के वक्त इस तरह के बयानबाजी करतें हैं और जनता के मतों के ठेकेदार बनकर राजनीति दलों को अपने फायदे के लिये इस्तमाल करती रही हैं।

दिल्ली के इस चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। भाजपा को जहाँ डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम का समर्थन मिला जिसमें उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में 10 लाख सिख उनके समर्थक हैं। 'भाजपा' ने इसे स्वीकार कर लिया तो दूसरी तरफ दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी साब एक अपील जारी कर कहे कि ‘‘मुसलमान ‘आप’ को वोट दें’’। जबकि ‘आप’ ने इस तरह के समर्थन को ठुकराते हुए कहा कि उन्हें आम लोगों का समर्थन चाहिये धर्म-जाति के आधार पर सर्मथन देने वालों से उन्हें समर्थन नहीं चाहिये। ‘आप’ ने इसे अवसरवाद की राजनीति करार दिया।

‘आप’ के इस निर्णय से चुनाव के वक्त शाही इमाम बुखारी साब के दरबार पर घुटने टेकने वाले भारत की तमाम राजनीति दलों को मानो सांप सूंघ गया कि ‘आप’ की यह कैसी राजनीति? सामने आयी हुई थाली को ठुकरा दिया जबकि दूसरी तरफ ‘आप’ पर सांप्रदायिकता की राजनीति का आरोप लगाने वाली भाजपा के प्रवक्ता ने हिन्दुओं को भड़काने का बयान देकर कहा कि ‘‘इस फतवे के खिलाफ हिन्दू एकतरफा मतदान करें’’ भाजपा हमेशा से ही धर्म को चुनाव जीतने का एक हथकंडा मानती रही है। वहीं 'आप' ने एक नई लकीर खींच दी और धर्म को एक किनारे करते हुए आम लोगों की समस्या को अधिक महत्व दिया।

दूसरे पर सांप्रदायिकता का आरोप जड़नेवाली भाजपा भीतर से कितनी जहरीली है कि इसका इस बात से ही पता चलता है कि एक तरफ वह जब खुद धर्म के आधार पर किसी का समर्थन लेती है या बयानबाजी करती है तो उसे उसमें इसे सांप्रदायिकता की ‘बू’ नहीं झलकती। वहीं कोई दूसरे सांप्रदाय के लोग खासकर मुसलमान समाज के बयान पर तिलमिला जाती है। भाजपा को मुसलमान समर्थन दे तो वह तो वह भारतीय नहीं तो पाकिस्तानी? कलतक जिस बंगलादेशी को लेकर भाजपा सांप की तरह फुफकार मारती नहीं थकती थी आज ये सारे मुद्दे कहां चले गये?

बुखारी साब के समर्थन को ठुकरातेे हुए ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने जो साहासिक कदम उठाया यह भारत की राजनीति के लिये एक सबक है। चुनाव परिणाम में इसका क्या प्रभाव होगा यह अलग बात है लेकिन यह जरूर है ‘आप’ ने भारतीय राजनेताओं को दर्पण दिखा दिया है कि मजबूत ईरादे से यदि चुनाव लड़ा जाये तो सांप्रदायिक ताकतों को तमाचा जड़ा जा सकता है।

दिल्ली के चुनाव में इमाम बुखारी के प्रस्वात को ठुकरा देने के पश्चात भी मसलमानों ने बड़ी संख्या में ‘आप’ के पक्ष में मतदान किया वहीं भाजपा के हुक्म को किनारे करते हुए हिन्दुओं ने भी यह स्वीकार किया की ‘केजरीवाल’ की राजनीति में कुछ तो नया जरूर है। जो भाजपा हिन्दुओं को अपना बंधवा वोटर समझती है उसके इस भ्रम को भी चकनाचुर कर दिया दिल्ली की जनता ने। जयहिन्द!

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

स्वच्छ भारत का निर्माण -शम्भु चौधरी

यह लड़ाई अकेले ‘केजरीवाल’ की नहीं है। आम आदमी यही चाहता है कि भारत की राजनीति में अच्छे लोग आयें। भले ही वह किसी भी दल से क्यों न जूड़ा हो। राजनीति के इस गंदे प्रदुषित वातावरण में 'आम आदमी पार्टी' का छोटा सा प्रयास है कितना कारगार सिद्ध हुआ हम और आप इस बात से ही अंदाज लगा लें कि दिल्ली चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर कांग्रेस और भाजपा को साफ छवि के चेहरे को जनता के सामने रखना पड़ा। चुनाव में हार-जीत होती रहेगी। राजनीति को स्वच्छ बनाकर ही हम ‘‘स्वच्छ भारत का निर्माण’’ कर सकतें हैं।
कोलकाताः (05 फरवरी 2015) आज दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरम पर है। शाम पांच बजे से चुनाव प्रचार पर विराम लग जायेगा। इसके साथ ही विराम लग जायेगा भारत में गंदी राजनीति करने वाले उन मुनसबों पर जो पिछले 10 दिनों से दिल्ली में नाकारात्मक प्रचार में लगे हुए थे। विराम लग जायेगा जिनके हाथ किचड़ में सने थे उन पर, विराम लग जायेगा जो किचड़ में पैदा होते हैं। देश के कुछ के युवाओं का एक छोटा सा सपना पुनः जीवित हो उठेगा जिसे कुचलने के लिये भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झौंक दी थी। चुनाव आयोग ने अपनी टिप्पणी पर राजनैतिक नेताओं की इस वयानबाजी पर काफी असंतोष व्यक्त किया है। हमें चुनाव आयोग की इस टिप्पणी को काफी गंभीरता से लेने की जरूरत है।
यह चुनाव भारत की राजनीति का एक आईना माना जायेगा। जिस मोदीजी को चंद दिनों पहले ही इसी जनता ने सर का ताज बनाया था, आज उसी जनता ने इनके घंमड को चकनाचूर करके रख दिया। एक चिराग को बुझाने के लिये ‘भाजपा’ ने क्या-क्या पापड़ नहीं सैंके। बल्की यह लिखा जाए कि क्या नहीं बेलन नहीं बेले। भारतीय संस्कृति की बात करने वाली ‘भाजपा’ ने व्यक्तिगत-जातिगत हमले तक करने से परहेज नहीं किया। चुनाव नहीं जैसे मोदीजी की ‘‘मूंछ की लड़ाई’’ हो गई। भाजपा मैदान से गौन हो चुकी थी।
‘स्वच्छ भारत अभियान’ के नाम पर सिर्फ सड़कों की गंदगी को दूर करने का ढोंग करने वाले मोदीजी ने दिल्ली के इस चुनाव नाकारात्मक विज्ञापनों भरमार कर दी। जो लोकतंत्र में किसी भी रूप में स्वीकार नहीं हो सकता। आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र में जरूरी है। लेकिन नाकारात्मक प्रचार और व्यक्तिगत-जातिगत हमले को जनता किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। आज लगता है आदरणीय श्री अटल जी के इस कथन को कि ‘‘किचड़ में फूल खिलेगा’’ का मायने को ही मोदीजी ने बदल डाला। दिल्ली के चुनाव में भाजपा खासकर मोदीजी के इस व्यवहार से देश को बड़ी निराशा ही हाथ लगी है। दिल्ली के चुनाव में देश की जनता ने यह देख लिया कि भाजपा के नेताओं में ठीक वैसा ही घंमड झलकने लगा जो कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस के नेताओं में देखा जा सकता था।
मोदीजी के सपने का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से कुछ हटकर केजरीवाल के ‘स्वच्छ भारत निर्माण’ पर लोगों ने अपनी मोहर लगा दी। मोदीजी सड़कों की गंदगी साफ करने की बात करतें हैं वहीं केजरीवाल जी कहते हैं ‘‘भारत को अच्छा माहौल देना है तो अच्छे लोगों को इस गंदी राजनीति के अंदर आना होगा, तभी हम इस गंदगी को दूर कर पायेगें। आज जब हम किसी युवा से राजनीति की बात करतें तो उसका सीधा सा जबाब होता है - ‘‘राजनीति बहुत गंदी है’’ हमारे अंदर भी यही भावना भरी हुई थी। लेकिन अन्नाजी के आंदोलन के दौरान हमने महसूस किया कि कहीं से तो हमें इसे साफ करने की शुरूआत करनी ही होगी। यह लड़ाई अकेले की नहीं है। हम सबकी है। किरण जी का राजनीति में आना भी ‘‘बूराई पर अच्छाई’’ की एक जीत मानता हूँ। उनका स्वागत करता हूँ। वह मेरी बड़ी बहन है। कोई भी व्यक्ति साफ-सुथरे छवि का चेहरा अपनी इच्छानुसार किसी भी राजनीति दल का सदस्य बने इसमें कोई अड़चन नहीं। हमें युवाओं के अंदर व्याप्त इस हीन भावना को दूर करना होगा कि ‘‘राजनीति बहुत गंदी है’’ राजनीति बहुत अच्छी है। इसे चंदलोगों ने गंदा बना डाला है।’’
यह लड़ाई अकेले ‘केजरीवाल’ की नहीं है। आम आदमी यही चाहता है कि भारत की राजनीति में अच्छे लोग आयें। भले ही वह किसी भी दल से क्यों न जूड़ा हो। राजनीति के इस गंदे प्रदुषित वातावरण में 'आम आदमी पार्टी' का छोटा सा प्रयास है कितना कारगार सिद्ध हुआ हम और आप इस बात से ही अंदाज लगा लें कि दिल्ली चुनाव के ठीक ऐन वक्त पर कांग्रेस और भाजपा को साफ छवि के चेहरे को जनता के सामने रखना पड़ा। चुनाव में हार-जीत होती रहेगी। राजनीति को स्वच्छ बनाकर ही हम ‘‘स्वच्छ भारत का निर्माण’’ कर सकतें हैं। जयहिन्द! वंदे मातरम्

सोमवार, 17 नवंबर 2014

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आंतकवाद को पनाह ?

(पंडित नेहरू के 125वी जयंती के अवसर पर) 
लेखक: शम्भु चौधरी


पंडित जवाहरलाल नेहरू की आलिशान कब्र को ढोहने वाली कांग्रेसी जमात की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने पंडित नेहरू के 125वी जयंती के अवसर पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘नेहरू के विचार पर आज खतरा पैदा हो गया है। क्योंकि तथ्याों को गलत ढंग से रखा जा रहा है और तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को भारत के लिये अकाट्य जरूरत पर भी जोर दिया।’’ 
श्रीमती सोनिया गांधी का यह बयान कि पंडित नेहरू के विचार को खतरा पैदा हो गया  है यह खुद में कांग्रेस पार्टी की समाप्ति की तरफ इशारा भर  है। भला कब तक कांग्रेसी चम्मचे गांधी परिवार की  वैशाखी के भरोसे देश को लूटते रहेगें? भारत में कुकुरमुत्ते की तरह धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली  राजनैतिक दलों का पैदा होना इस बात का सबूत है कि पंडित जी के विचार से देश का सत्यानाश भले ही किया जा सकता भारतीय सांस्कृतिक विकास कदापि संभव नहीं है। 

पिछले 65 सालों में इस देश में धर्मनिरपेक्षता की राजनीति सिर्फ सत्ता को प्राप्त करने के लिये किया जाता रहा है। चाहे वह कांग्रेस पार्टी रही हो या अन्य कोई भी आंचलिक राजनैतिक पार्टी, सबके सब येन-केन प्रकारेण मुसलमानों का राजनैतिक दोहन कर खुद को सत्ता में स्थापित कर देश को लूटना इनका एकमात्र लक्ष्य रहा है। आज देश की जनता ने एकमत से इनको किनरे लगा दिया है।

आज यह प्रमाणित होता जा रहा है कि भारत में जिसप्रकार की सेक्लुरिजम की रोटी सैंकी जा रही है इससे देश की एकता और अखंडता को खतरा पैदा होने लगा है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर इस देश में ईस्लामिक आंतकवाद को बढ़ावा मिलने लगा है। 

आज भारत के तमाम शहरों में इन राजनैतिक दलों की सुरक्षा कवच पहनकर मुस्लीम आतंकवादी भारत में तेजी से पनप रहे हैं। इन आतंकवदियों का सीधा शिकार सबसे पहले भारतीय मुसलमानों होतें हैं। उनको पहले धर्म की दुहाई दी जाती है फिर धन का लालच देकर इन नदान बच्चों को ये आतंकवादी अपना हथियार बना लेते हैं और यहीं से शुरू होती है इनकी कारगुजारी की शुरूआत। स्नेह-स्नेह इन आतंकवादियों ने भारत के पुर्वत्तर सहीत देश की कई सीमाई राज्यों में अपना जाल से फैला दिया है। इसके लिये पूर्णरूप से पंडित नेहरू की विचारधारा ही जिम्मेदार मानी जा सकती है। जिन्होंने इन्हें वोटबैंक के रूप में सत्ता प्राप्त करने का जरिया मान लिया है। 

 बर्दमान विस्फोट कांड में ‘एनआईए’ की टीम की सक्रियता ने इन दिनों इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों की नींद ही उड़ा दी है। एक के बाद एक, परत दर परत मदरसों के माध्यम से भारत में सांप्रदायिक जहिरले तार बिछते जा रहे थे। बिहार के बाद बंगाल में इन आतंकवदियों का सुरक्षित कोरीडोर बनाने में आखिर किसने मदद की यह भारतीय राजनीति के लिये शौध का विषय है।

हाँ! यदि कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया जी यह मानती है कि पंडित नेहरू के यही बिचार थे कि भारत को आतंकवदियों को भरोसे सुपुर्द कर दिया जाय तो ऐसे विचारों को आज ना तो कल तो खतरा पैदा होना ही था। धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर ईस्लामिक आतंकवाद को भारत में संरक्षण देना यदि पंडित नेहरू की विचारधारा का मूल मंत्र है तो ऐसी विचारधारा किसी भी रूप में भारत को कभी भी स्वीकार नहीं।



गुरुवार, 6 मार्च 2014

‘आप’ फूंक-फूंक कर चले।

यह लड़ाई अंग्रेजों से लड़ने की नहीं, कि देश की जनता भावनात्मक रूप से ‘आप’ के साथ हो जायेगी। यह लड़ाई उस व्यवस्था से जो हमारे जीवन का अंग बन चुकी है। इस भ्रष्ट व्यवस्था में हर किसी का स्वार्थ छुपा हुआ है। चाहे वह पत्रकार हो या संपादक, सिपाही हो या ऑफिसर,  मंत्री हो या चपरासी। चेन की तरह सबके सब इस व्यवस्था के हिस्सेदार बन चुकें हैं। 
कोलकाताः (दिनांक 06 मार्च 2014) 
कल गुजरात के राधनपुर में आम आदमी पार्टी के संयोजक श्री अरविंद केजरीवाल के साथ जो कुछ भी घटा और तुरन्त उसके बाद दिल्ली भाजपा कार्यालय के बाहर जो कुछ भी हुआ, उसकी नाकारात्मक प्रतिक्रिया स्वभाविक थी। कुछ निर्णय ‘आप’ के आंदोलन को कमजोर करने में काफी महत्वपूण रहें हैं जिसमें 1. खड़की एक्सटेनशन में आधी रात को बिना वारण्ट के छापा मारना, मुख्यमंत्री के रूप मे केजरीवालजी का धरना और कल का दिल्ली और लखनऊ में ‘आप’ का कदम। 
‘आप’ को समझना होगा कि देश की जनता ‘आप’ के हर कदम पर नजर रखे हुए है। कांग्रेस और भाजपा के पापों से देश को मुक्त कराने के लिये जनता में अजीब सी छटपटाहट है। जबकी भाजपा और कांग्रेस हर उस ताकत (सरकारी तंत्र) का प्रयोग ‘आप’ को कुचलने के लिये करना चाहेगी जिससे ‘आप’ की शक्ति क्षीण हो।
इन दिनों जिसप्रकार मोदी के उग्रवादी समर्थक सिर्फ ‘आप’ और केजरीवाल को तारगेट करने में लगें हैं इससे साफ हो जाता है कि भाजपा को कांग्रेस से कम, ‘आप’ से अधिक खतरा है। 
इसीलिये मुम्बई में नितीन गडकरीजी, राज ठाकरे को मनाने में जूटें हैं कि कहीं दिल्ली जैसा हाल इनका महाराष्ट्र में भी ना हो जाय। भाजपा (मोदी ग्रुप) का सारा अंकगणित ‘आप’ खराब कर सकती है। इस बात का इनको आभास हो चुका है। इसलिय भाजपा उस हर कदम का राजनीति लाभ लेने का प्रयास करेगी जिससे ‘आप’ की लहर को नूकशान  हो। ‘आप’ को इन सब बातों पर ध्यान देने की जरूरत है।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ‘आप’ भ्रष्टमुक्त व्यवस्था लाने के लिये सबसे दुश्मनी मोल लेता जा रहा है। ऐसे में कोई भी ऐसी व्यवस्था जो अधिकांशतः भ्रष्टाचार में लिप्त है वह हर उस अवसर के तलाश में है जिससे ‘आप’ को ना सिर्फ राजनीति रूप से क्षति पंहुचा सके। तमाम सरकारी दस्तावेजों में भी अदालत को भी गुमराह कर सके। कहाँ-कहाँ, और किस-किस को सफाई देते फिरेगें ‘आप’? 
यह लड़ाई अंग्रेजों से लड़ने की नहीं, कि देश की जनता भावनात्मक रूप से ‘आप’ के साथ हो जायेगी। यह लड़ाई उस व्यवस्था से जो हमारे जीवन का अंग बन चुकी है। इस भ्रष्ट व्यवस्था में हर किसी का स्वार्थ छुपा हुआ है। चाहे वह पत्रकार हो या संपादक, सिपाही हो या ऑफिसर,  मंत्री हो या चपरासी। चेन की तरह सबके सब इस व्यवस्था के हिस्सेदार बन चुकें हैं। 
संविधान इनके हाथों में कैद हैं। सरकारी तंत्र को पूरी तरह से इन अपराधियों ने कब्जे में कर रखा है। सबको एक साथ ललकार नहीं जा सकता। अभी सिर्फ सत्ता के दलालों को ही ललकारना सही रहेगा। बाकी सभी व्यवस्था को साथ लेना होगा। भले ही वह गलत ही क्यों न हो। जयहिन्द!!  - शम्भु चौधरी
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मंगलवार, 4 मार्च 2014

अण्णाजी की राजनीति? - शम्भु चौधरी

संसद में लोकपाल बिल पारित करते समय अण्णाजी को जिन व्यक्तियों ने गुमराह किया उनमें से एक चौथी दुनिया के प्रधान संपादक श्री संतोष भारतीय भी हैं, जिन्होंने  अपने नये संपादकिया देखें 24 फरवरी का अंक ‘‘लोकतंत्र को तमाशा ना बनने दें’’ में श्री अण्णा हजारे के उस 17 सूत्रीय कार्यक्रम का जिक्र करते हुए आपने ममता बनेर्जी की काफी प्रसंशा की है। 
कोलकाताः (दिनांक 04 मार्च 2014) 
अण्णाजी जी ने जिस प्रकार ममता दीदी को लेकर राजनीति शुरू की है यह भी ठीक उसी राजनीति का हिस्सा है जिसप्रकार अण्णाजी ने जी ने रालेगणसिद्धी में बैठकर अनशण किया और पलकों में ही केन्द्र की कांग्रेस सरकार और भाजपा के दो एजेण्टों ने मिलकर अण्णाजी को गुमराह किया था। अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि वे दो एजेण्ट कौन थे। खुद अभी भाजपा में शामिल हुए जनरल वि.के.सिंह ने स्वीकारा किया कि ‘अण्णाजी’ एक सशक्त 'लोकपाल बिल' लाना चाहते थे। फिर देश को गुमराह क्यों किया गया? इसका जबाब अभी रहस्य बना हुआ है। परन्तु जिस प्रकार लोकपाल समिति के चयन पर रोजाना उठ रहे विवाद और चयनित सदस्यों के द्वारा पद से त्यागपत्र इस बात पर संकेत तो दे ही रहा है कि कहीं दाल में काला है जिसे कांग्रेस और भाजपा दोनों मिलकर छुपाना चाहते हैं।

संसद में लोकपाल बिल पारित करते समय अण्णाजी को जिन व्यक्तियों ने गुमराह किया उनमें से एक चौथी दुनिया के प्रधान संपादक श्री संतोष भारतीय भी हैं, जिन्होंने  अपने नये संपादकिया देखें 24 फरवरी का अंक ‘‘लोकतंत्र को तमाशा ना बनने दें’’ में श्री अण्णा हजारे के उस 17 सूत्रीय कार्यक्रम का जिक्र करते हुए आपने ममता बनेर्जी की काफी प्रसंशा की है।  

आप लिखते हैं कि 30 जनवरी को कोलकाता के पैरेड ग्राउंड में ममताजी की रैली में 30 लाख लोग आये थे।  20 लाख मैदान में 5 लाख मैदान के बहार और 5 लाख लोग कोलकाता की सड़कों पर। मुझे ताजूब होता है कि श्रीमान संपादकजी को कोलकाता की भौगोलिक स्थिति का कोई अंदाजा तक नहीं है। शहर में 15 लाख लोग यदि एक साथ प्रवेश कर जाएं तो टॉलिगंज से श्यामबजार और हवड़ा स्टेशन से सियालदाह स्टेशन के सभी मार्ग व सभी मैदान जाम हो जायेगें।  वैसे बिग्रेड पैरेड मैदान की अधिकतम क्षमता ही 5 लाख लोगों की है यदि अंदर और बहार चारों तरफ आदमियों से पट जाए।

 खैर! यह इनके सोचने का नजरिया है। जहाँ तक अण्णाजी के 17 सूत्रीय पत्र की बात है तो संपादक जी ने ‘अपने संपादकिय में कहीं भी ‘आप’ पार्टी का जिक्र तक नहीं किया जबकि इनको इस बात का पता था कि अरविंदजी ने इस पत्र पर पहले ही अण्णाजी से मिलकर अपनी स्वीकृति दे दी थी। ना तो संपादक ने अपने पत्रकारिता के धर्म को निभाने के प्रयास किया ना ही वे भारतीय राजनीति में ‘आप’ का अपने लेख में चिन्हीत तक ही किया। यदि अरविंद जी किसी समाचार मीडिया की बात करते है तो उनमें "चौथी दुनिया" समूह का विद्वेष साफ झलकता है। 

संपादक की माने तो ‘भारतीय राजनीति में ममता बनेर्जी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। सुश्री ममता बनेर्जी स्वयं एक कुशल नेत्री है परन्तु उनकी टीम में आज भी बहुत से ऐसे लोग हे जिस पर बंगाल की जनता को पूरा विश्वास नहीं है।  इससे साफ हो जाता है कि अण्णाजी और ममता जी को राजनीति फायदे के लिय इस्तमाल किया जा रहा है "संतोष भारतीय" ने इन दोनों को अपने राजनीति फायदे और केजरीवाल को नूकशान पंहुचाने के लिये प्रयोग करना शुरू कर दिया है। जो कहीं न कहीं नीच मनसिकता का परिचायक है।  इससे ममता बनेर्जी को कोई फायदा नहीं होगा। ना ही ममता बनर्जी का बंगाल से बहार कोई कद बनने की संभावना वर्तमान राजनीति में दिखाई देती है। - शम्भु चौधरी

रविवार, 2 मार्च 2014

"संसद" बहुमत की बपौती नहीं!

ऐसा बहुमत जो लोकतंत्र की मूल भावना को तहसनहस करता हो, ऐसा बहुमत जो देश को लूटने के लिये बनाया जाता हो और लुटरों को सुरक्षा प्रदान करता हो उसे कदापी बहुमत नहीं माना जा सकता भले ही पूरी की पूरी संसद उसके पक्ष में ही क्यों ना खड़ी हो। हमें इसके उन पहलुओं पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि ‘अल्पमत’ की जायज बातों को कहीं ‘बहुमत’ से दबाया तो नहीं जा रहा? यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं है।
अन्ततः कल 15वीं लोकसभा ने अपनी अंत्येष्टि कर ली। मनमोहन सरकार के इस अंत्येष्टि कार्यक्रम के समापन समारोह जब प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा की ‘‘तेलंगाना व लोकपाल बिल को इस संसद ने पास किया जो वर्षों से लंबित पड़ा था। यह अपने आप में इतिहास है।’’ जबकि लोकसभा के वरिष्ठतम सदस्य व भाजपा के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी सदन में अपनी तारीफ सुनकर भावुक हो गये उनकी आंखों में आंसू भर आये। यह दोनों ही दृश्य कई प्रश्नों का जबाब खोज रही है।

15वीं लोकसभा ने जाते-जाते जिस प्रकार बिल पर बिल पास करने की हड़बड़ी दिखाई, इससे संसदीय लोकतंत्र परंपरा पर कई प्रश्नचिन्ह भी लगा दिये हैं कि क्या ‘‘इसी को लोकतंत्र कहते हैं?’’ संसद को जिसप्रकार ब्लैकआउट कर बहुमत को दंभ भरा गया। ‘‘क्या इसे ही लोकतंत्र की मर्यादा कही जा सकती है?’’इसीप्रकार बहुमत की ताकत से संसद को चलाया जाना था तो ‘‘महिला बिल’’ ने क्या पाप किया था? 

तेलंगाना राज्य बने इस बात पर देश में कहीं विवाद नहीं। परन्तु जिस जमीन पर इसकी फसल रोपी गई है वह ना सिर्फ लोकतंत्र के लिये खतरे की घंटी है। इससे भाजपा की नियत पर शक होना लाजमी है कि यह प्रतिपक्ष में बैठी है कि सत्तापक्ष की दलाल है? 

15वीं लोकसभा में ही ‘‘लोकपाल बिल’’ को लेकर भाजपा नेता श्री अरुण जेटली जी का एक और बयान चौंकानेवाला रहा ‘बिल’ पर बहस का समय नहीं मिले तो सदन में बिना बहस के भी ‘‘लोकपाल बिल’’ को पारित किया जा सकता है।’’ सवाल इस बात का नहीं कि जेटलीजी ने सबकुछ देख सुन लिया है। सवाल इस बात का है कि देश की जनता को जानने का हक है या नहीं? कि संसद में हो क्या रहा है? 

"संसद" बहुमत की बपौती नहीं!
संसद सिर्फ बहुमत की बपौती नहीं है। इससे 125 करोड़ लोगों की आस्था जूड़ी हुई है। बहुमत एक आस्था और व्यवस्था का नाम है, ना कि तानाशाही का। राजनैतिक दलों में आपसी सहमती बने यह अच्छी परंपरा  है। परन्तु संसद को ब्लैकआउट कर तेलंगाना बिल पारित कर देना। देश को गुमराह कर ‘‘लोकपाल बिल’’ को पास करवाना, अपने राजनैतिक फायदे के लिये ‘‘दागी बिल’’ पर आपसी सहमती बनाना। इसीप्रकार जो लोग देश के हिसाब-किताब की पल-पल की खबर रखना चाहतें हैं वे ही लोग अपना हिसाब देना नहीं चाहते? ऐसे कृत्य को बहुमत की मोहर लगा देना, लोकतंत्र के लिये घातक माना जाना चाहिये। ऐसा बहुमत जो लोकतंत्र की मूल भावना को तहसनहस करता हो, ऐसा बहुमत जो देश को लूटने के लिये बनाया जाता हो और लुटरों को सुरक्षा प्रदान करता हो उसे कदापी बहुमत नहीं माना जा सकता भले ही पूरी की पूरी संसद उसके पक्ष में ही क्यों ना खड़ी हो। हमें इसके उन पहलुओं पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि ‘अल्पमत’ की जायज बातों को कहीं ‘बहुमत’ से दबाया तो नहीं जा रहा? यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं है।

जो लोग अब तक देश लूटते रहे जाते-जाते इनलोगों ने सदन के भीतर लोकतंत्र को लूटने का अवसार भी नहीं चुके। ऐसे में सवाल उठता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में हम जिसे विकल्प के तौर पर देख रहें हैं वह कहीं इन्हीं लुटरों का सरदार तो नहीं?

आगामी लोकसभा की तैयारी अब जोरों पर है। अब यही लोग संदन से निकल कर हमारे वोट को लूटने आनेवाले है। कोई हमारी भावना को लूटेगा तो कोई हमारे विचारों को। सबको सत्ता की भूख है। देश की परवा इनमें से किसी को नहीं है। देश की सोचने वाला शख्स इनके विचारों में अराजकता फैला रहा। वह शहरी नकस्लवादी है। उन्हें सरकार चलानी नहीं आती। वह पागल है। उनके पास कोई आर्थिक नीति नहीं। उसको पता नहीं देश की विदेश नीति क्या होनी चाहिये? हमें सोचना होगा कि हमें देश के लूटरों में से किनको चुनना है कि एक वह पागल को चुनना है जो देश के लिये मरने को तैयार खड़ा है। जिसे सत्ता नहीं चाहिये उसे देश की भ्रष्ट व्यवस्था में सुधार चाहिये। 
जयहिन्द!!
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16वीं लोकसभा की उलटी गिनती शुरू

कोलकाताः (दिनांक 2 मार्च 2014)

मैं व्यक्तिगत तौर पर मोदीजी का काफी प्रशंसक रहा हूँ। परन्तु मोदी के देशभक्तों ने मुझे काफी निराश कर दिया। मोदीजी के देशभक्तों ने तो खुले रूप से यह नारा दे दिया कि जो मोदी अर्थात आरएसएस को अर्थात भाजपा को वोट नहीं दे, वह देशद्रोही है। इसप्रकार मोदीजी के लक्ष्य 272 सांसद जो संसद में बैठने वाले हैं वे तो देशभक्त माने जायेगें बाकी बचे 271 सांसद देशद्रोहियों के मतों से जीतकर संसद में जानेवाले हैं। अर्थात इनकी मानें तो देश की 65 प्रतिशत आबादी देशद्रोहियों की श्रेणी में आनेवाली है। भाजपा ने कहीं भी इस बात का खंडन नहीं किया कि यह अफवाह या इस तरह की बात सही नहीं हैं ना ही वह अपने समर्थकों को मना ही कर रही है कि वे ऐसी बातें ना करें। एक तरफ तो राजनाथ सिंहजी, मोदी जी मुसलमानों को समझाने में लगे हैं तो दूसरी तरफ इस तरह की बातों से उनको सीधे-सीधे तारगेट भी किया जा रहा है। खैर!!!

आईये मोदी जी के भविश्य पर एक नजर दौड़ातें है-
सपा, बसपा, बिजूजनता दल, सीपीआई, सीपीएम, एनसीपी, डीएमके, टीएमसी इनकी वर्तमान 15वीं लोकसभा में 122 सीटें हैं। जो आगामी लोकसभा चुनाव में भी लगभग इन्हीं आंकड़ों को छूने वाली है। यदि उत्तरप्रदेश में सपा, बसपा को नूकशान होता है तो बंगाल में उतनी ही सीटों का ‘टीएमसी’ को फायदा होता दिखाई दे रहा है।  इन 122 सीटों में 50से 60 सीटें ऐसी हैं जिनमें भाजपा का कोई अतापता ही नहीं है इनमें बंगाल की 41 सीटें भी है।  ना ही इन सीटों पर मोदी फेक्टर कुछ काम कर रहा है। 

बची 421 सीटों पर हम पैनी नजर दौड़ाते हैं तो लगभग 70-80 सीटें जिनमें आंचलिक व छोटी-छोटी पार्टियों का कब्जा बरकरार रहेगा। बची 351 सीटों पर त्रिकोणात्मक संघर्ष है। इसमें कांग्रेस पार्टी, जदयू, आरजेडी, एडीएमके, ‘आप’ यदि सबको मिलाकर भी 150 सीटें मान ली जाती है तो 201 सीटें मोदीजी के खाते में बचती है। इन 201 सीटों में वे दल भी शामिल है जो ‘भाजपा गठबंधन’ से खुद को जोड़ चुके हैं। 71 सीटें किसके सहयोग से जूटाते हैं यह अभी देखना बाकी है।
भाजपा जिस प्रकार नाटकीय रूप से प्रचार में जूटी है कि पूरे भारत में मोदी की हवा बह रही है। उपरोक्त परिणाम से तो इस हवा की हवा ही निकलती दिखाई देती है मुझे। जयहिन्द!!

नोटः किसी को इस आंकड़ों में कोई भूल नजर आती हो तो वह अपनी बात तत्थ के साथ रख सकते हैं।
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

हिन्दी - कब तक उपेक्षित रहेगी

हिन्दी - कब तक उपेक्षित रहेगी
(लेखक - विजय गुजरवासिया)

हमारा महान भारत विश्व में एक ऐसा सार्वभोम राष्ट्र है जिसने अभी तक अपनी राष्ट्र भाषा की घोषणा नहीं की है। सन् 1950 में देवनागरी लिपी में हिन्दी को सरकारी भाषा के रुप में मान्यता दी गई। 15 वर्ष तक सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का भी उपयोग होता रहेगा। इसके अनुसार 26/1/1965 तक ही सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग होना चाहिए था किन्तु राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में संसद में यह पास कर दिया गया कि 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहेगा। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी फलती फूलती रही और हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार होता रहा। 
आज स्थिति यह है कि विद्यालयों, कालेजों एवं सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजी को प्राथमिकता मिलती है, हिन्दी को गौण स्थान प्राप्त होता है। गिरावट यहां तक आ गई है कि अंग्रेजी बोलनेवालों में उच्च मानसिकता (Superiority Complex)  परिलक्षित होने लगी है। भारत की अधिकांश भाषाओं की जननी ‘संस्कृत’ तो लुप्तप्राय हो रही है किन्तु बोधगम्य हिन्दी के प्रति हीन भावना  (Inferiority Complex)  लज्जाजनक है। अन्तराष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तर्देशीय मंचो पर भी हमारे देश के प्रवक्ता विदेशी अंग्रेजी भाषा में वक्तव्य देने में अपनी शान समझते हैं। 

भारत पर आधिपत्य कायम रखने के लिए ब्रिटिश-साम्राज्य को अंग्रेजी पढ़े लिखे किरानियों की आवश्यकता थी इसलिए लोर्ड मेक्यले ने भारत में अंग्रेजी का प्रचार प्रसार किया। किन्तु स्वाधीनता के पश्चात् अंग्रेजी का प्रचलन जिस अबाध गति से बढ़ा है उसी का परिणाम है कि हमारी युवापीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का अन्धानुकरण कर रही है और हमारे देश की नैतिक परम्पराएं, मौलिक मान्यताएं तथासरल जीवन शैली धराशायी हो रही है। 

देश की प्रायः 79% जनता हिन्दी समझती है भले ही उनकी आंचलिक और मातृबोली हिन्दी से अलग हो। 
जब देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था तब स्वदेशी आन्दोलन चला। विदेशी कपड़ो की होली जलाई गई स्वदेशी पर जोर दिया गया। विद्यालय प्रायः हिन्दी माध्यम अथवा प्रान्तीय भाषाओं के माध्यम से चलते थे। हिन्दी माध्यम से पढ़े हुए मनीषियों ने भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपने ज्ञान और विद्वता का झण्डा फहराया। सिर्फ महाजनी जाननेवालों ने बड़े बड़े व्यवसाय और उद्योग-धन्धे स्थापित किए। आज हर क्षेत्र में हिन्दी पिछड़ रही है। घरों में, मित्रमण्डली में, गोष्ठियों और सभाओं में भी लोग हिन्दी की अपेक्षा अधकचरी अंग्रेजी का उपयोग करने में अपनी शान समझते हैं। यहां तक कि विवाह शादी जैसे मांगलिक अवसरों, धार्मिक आयोजनों आदि के निमन्त्रण-पत्र भी हिन्दी की जगह अंग्रेजी में छपने लगे हैं। स्वतन्त्र भारत में विदेशी भाषा का बढ़ता हुआ यह वर्चस्व समाज को कहां ले जायगा यह चिन्तनीय विषय है।   

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हिन्दी को पुष्ट, प्रांजल और बोधगम्य शब्दों से भरपूर बनाने का सघन प्रयास नहीं हुआ। अन्तर्राष्ट्रीय मानक की विज्ञान संबन्धी और तकनीक संबन्धी शब्दावली का पूर्ण विकास स्वतन्त्रता के 65 वर्षो में भी नहीं हो सका इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा ? अंग्रेजियत मानस के दलदल में फंसे राजनेताओं को इस ओर ध्यान देने तथा सत्साहित्यकारों को प्रोस्ताहित करने की फुर्सत ही नहीं है। अंग्रेजी अथवा आंचलिक भाषाओं का विरोध नहीं है किन्तु एक भाषा जो बहुभाषी भारत राष्ट्र को एक सूत्र में बांध सकती है, जो देशज और विदेशी शब्दों को सहजता से अन्तर्भुक्त कर सकती है, जिसका समृद्ध साहित्य देश की सामाजिक रीति नीति का दर्पण है, जिसकी देवनागरी लिपी पूर्ण वैज्ञानिक है, जो राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होने की नैसर्गिक दावेदार है वह सिर्फ हिन्दी है। इसलिए हिन्दी को अब अवश्य ही यथोचित प्रोत्साहन और उच्चतम स्थान मिलना चाहिए। 
आज भारत के सभी हिन्दी समाचार पत्रों एवं उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को चेष्टा करनी चाहिये कि अधिक से अधिक हिन्दी में भाषण हों एवं लोगों को बताना चाहिये कि केवल अंग्रेजी बोलने वालों की पूछ नही होनी चाहिये। हिन्दी में पत्राचार करते या बोलते हैं उनकी भी इज्जत अंग्रेजी बोलने वालों से ज्यादा होगी तभी हिन्दी को असली दर्जा मिल सकेगा। प्रतिवर्ष चैदह सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि हरपल, हरदिन, हर अवसर पर हिन्दी की आराधना होनी चाहिए क्योंकि कवि के शब्दों में -
निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।

(लेखक - पश्चिम बंग प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन के मानद अध्यक्ष हैं) 




रविवार, 9 फ़रवरी 2014

संविधान के पहरेदार?


 ‘‘बैईमानों की पूरी व्यवस्था सिस्टम से चलती है।’’


अपने देश का यह दुर्भाग्य रहा है कि संविधान के पहरेदार संविधान की आड़ लेकर देश को लूटने में लगे हैं। मुझे वह दिन याद है जब पिछले दो साल पहले जन लोकपाल बिल को लेकर अण्णाजी का आंदोलन उबाल पर था। उस समय सारे नेताओं की बोलती बंद हो गई थी। अचानक से सभी नियमों को ताक पर रखकर संविधान के ये चौकीदार एक साथ संसद में खड़े होकर देश की जनता को इस बात का आश्वासन दिये थे कि वे जल्द ही एक सशक्त लोकपाल कानून को मूर्तरूप दे देगें। दो साल पश्चात परिणाम हमारे सामने हैं। किस प्रकार इन नेताओं में अब उसके सदस्यों के चयन को लेकर रस्साकशी चल रही है। 

 दरअसल ये संविधान के रक्षक नहीं भक्षक हैं। जो लोग उच्चतम न्यायालय के निर्णय को बदलने के लिये ‘‘आरटीआई कानून में संशोधन’’ और ‘‘दागी सांसदों व विधायकों को बचाने का बिल’’  रातों रात संसद और राज्यसभा से पारित कर राष्ट्रपति के अनुमोदन हेतु भेज सकतें हैं। मानो इन बैईमानों की सुरक्षा के लिये ही संविधान में तमाम संवैधानिक व्यवस्था पहले से ही बनाई हुई हो। खुद को कितने सुरक्षित महसुस करते हैं ये बैईमान जब संसद या विधानसभा में चुनकर चले जातें हैं। अंदाजा लगा लिजिये।

वास्तविकता यह है कि पिछले 60-65 सालों में इन राजनैतिक घरानों ने अपनी सुविधानुसार देश के संविधान को गढ़ा और देश को लूटने के नियम बनाते रहे। उद्योगिक घरानों की मिली भगत से देश के खनीज संपदा को लूटने वाले ये संविधान के पहरेदार देश के चंद उद्योगिक घरानों के लाभ के लिये देश की मुद्रा को डालर के अनुपात में कमजोर कर उन्हें लाभ पंहुचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते । भले ही इस मुद्रा विनिमय की कितनी भी कीमत देश की जनता को चुकानी पड़े, इन्हें इस बात की तनिक भी परवाह नहीं।

आज पुनः दिल्ली में इनको संविधान और संवैधानिक व्यवस्था की याद आने लगी।  इनकी संवैधानिक व्यवस्था देश के लूटरों को बचाने के लिये बनी हुई है। किस प्रकार पूरी की पूरी व्यवस्था संविधान की दुहाई देने के लिये एक नजर आती है। मानों बैईमानों को हर हाल में बचाना इनके संविधान में लिखा है।

 इनको ईमानदार व्यवस्था लागू करने से कोई दिलचस्पी नहीं। बैईमानों को बचाने वालों को बईमान कहा जाए तो इनके सम्मान को ठेस पंहुचती है।  जबकि देश की पवित्र संसद में बैठकर देश की मर्यादा को तार-तार कर देने में और दागियों के समर्थन से सरकार चलाने में इनके सम्मान को कोई ठेस नहीं पंहुचती।  इनका खुद का सम्मान देश के सम्मान से कहीं ऊँचा है।  ये अब संविधान के पहरेदार बन चुकें हैं। इनसे ऊपर/ इनके ऊपर अब कोई नहीं। इनकी पूरी व्यवस्था संवैधानिक सिस्टम से चलती है। अब हमें इनके बनाये पूरे सिस्टम को तौड़ना देना होगा। तभी इनको उस जेल भेजा जाना संभव होगा। जयहिन्द! 
- शम्भु चौधरी 09.02.2014
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शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

व्यंग्य: कानून के पहरेदार?


हमारे मोहल्ले में एक व्यापारी चोरी का माल खरीदने और बेचने का कारोबार करता था। जब भी उसके यहाँ पुलिस की कोई रेड पड़ती वह आदमी अपनी पंहुच की बात उस पुलिस ऑफिसर को बता के उल्टे उस अधिकारी को ही धमका देता। बेचारा पुलिस ऑफिसर उसकी धौंस से कांपने लगता और भाग जाता।
इस बात की चर्चा शहर में हर तरफ होने लगी। व्यापारी भी अपने धोंस के किस्से बाजार में फैलाता रहता था ताकि सब कोई उससे डरते रहे। एक बार एक नया ऑफिसर आया उसने भी उस कारोबारी की चर्चा सुनी तो उसने ठान लिया कि जैसे ही कोई चोर पकड़ा जायेगा उसे लेकर वह चोरी का बरामद करने खुद जायेगा। लगे हाथ उसे एक चोर मिल भी गया। उसने हवालात से उस चोर को बुलाया उसके बयान को डायरी में नोट किया और उस व्यापारी के यहाँ माल बरामद करने के लिये रेड डाल दी। संयोग से वह व्यापारी भी मिल गया।
व्यापारी ने अपनी आदतन धौंस जमाते हुए कहा कि जानते नहीं ‘‘मैं कौन हूँ?’’
ऑफिसर - ‘‘जी नहीं!’’
व्यापारी - ‘‘मेरी पंहुच ......तक है’’ तुमको पता नहीं होगा शायद? ‘‘आवाज पर जोर देते हुए कड़क से’’
ऑफिसर - ‘‘जी नहीं! आप चुप रहेंगे की आपको भी हथकड़ी डाल दूँ?’’
व्यापारी - ‘‘तुम्हारा ट्रांसफर करावा दूंगा समझते हो न चुपचाप यहाँ से चले जाओ, लिख देना कि कुछ नहीं मिला इसी में भलाई है, व्यापारी ने पुनः रौब दिखाते हुए और अपने आदमी की तरफ आँख से इशारा करते हुए कहा - ‘‘अरे कल्लू सा’ब को भीतर ले जाकर माल दिखा दो। सब समझ जायेगा।’’ व्यंग्य कसते हुए ‘‘शायद नया आया है इस इलाके में? नई बिल्ली म्यांऊ..म्यांऊ..’’
ऑफिसर - ‘‘जी नहीं!’’ आप बहार आईये हम खुद देख लेंगे भीतर क्या-क्या रखा है।   ऑफिसर ने चोर से पूछा ‘‘बोले क्या चोरी का माल इसी के यहाँ बेचा था? चोर - ‘‘जी सरकार’’
अबतक ऑफिसर की बात में अकड़ आ गई थी। उसने वे सारे माल भी बरामद कर लिये थे। तभी व्यापारी ने कहा हजूर! आपका फोन आया हुआ है। मंत्री जी लाइन पर आपका इंतजार कर रहें हैं।
ऑफिसर समझ गया कि बात जरूर ऊपर से शुरू होती है। फोन पर उसने बात की ‘‘ जी सर..ररर  ‘‘जी ठीक है।’’
ऑफिसर- चोर को मारते हुए साला झूठ बोलता हैं सच..सच बता माल किसके यहाँ बेचा है?
चोर चिल्लाता रहा.... माँ कसम... आप बोलें तो अपने बच्चे की कसम खा लेता हूँ!! मैंने इसी व्यापारी के यहाँ सारा माल बेचा है। देखिये व फंखा, व टीवी हाँ... वे जेवरात...
ऑफिसर- हरामी.. चोर को गाली देते हुए.. चल साले थाने तेरी आज वह धुलाई करूँगा कि सारा सच अपने आप बहार आ जायेगा।
चोर अब तक समझ गया था। सॉरी सर गलती हो गई अब किसी को कुछ नहीं बोलूँगा।
(नोट: इस व्यंग्य में सभी पात्र नकली हैं।)
- शम्भु चौधरी 08.02.2014
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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

एक ईमानदार पहल में आहुति दें देशवासी....



सरकार चलाने का तर्जूबा सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के पास ही। देश की सत्ता में काबिज हो देश के खजानों को लूटना, देश की खनिज संपदा का बंदरवाट करना इनके सरकार चलाने का अर्थ होता है। देश को लूटो और राज करो। केजरीवाल को सरकार चलानी इसलिये नहीं आती क्योंकि केजरीवाल व इसके साथी इस बंद पिंजडे का पंछी नहीं हैं । हमें अवसर मिला है इसमें अपनी आहुति देने का। संविधान की मर्यादा का पालन करनेवालों को भी खुलकर केजरीवाल का साथ देना होगा नहीं तो ये लूटरें संविधान के हथियार से केजरीवाल को घायल कर देगें ।

जबसे केजरीवाल की आम आदमी सरकार दिल्ली में आई है। सियासतदानों के तरकश में नये-नये शब्द पैदा होने लगे। राजनीति को रंडीखाना बना देने वाले इन नेताओं के मुंह से कभी पागल शब्द निकलता है तो कभी ‘‘शहरी नकस्लवाद’’। एक महाशय ने एक बेनेर अपने फेसबुक पर चिपकाया है उसमें लिखा है - ‘‘आम आदमी पार्टी माओवादी संगठन जैसा है।’’ मेरी एक कविता के बोल कुछ इस प्रकार है।- एक परिंदा...

एक परिंदा घर पर आया, वह फर्राया- फिर चहकाया..
मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,
मैं सोचा यह क्या कहता है? / हँसता है या रोता है।
मुझको गाली देता है या अपना दुःख यह कहता है।
एक परिंदा घर पर आया, फर्राया-चहकाया..
मैं आजाद.., मैं आजाद.., मैं आजाद..,

मुझे हैरत इस बात से नहीं कि भाजपा और कांग्रेस राजनीति तरीके से आम आदमी पार्टी को घेरने में लगी है। लोकतंत्र में इसका स्वागत है।  हैरनी इस बात से है कि 50 से 500 कमरों के आलिशान झूग्गी-झोपडियों में रहने वाले गरीब देश के इन महान सपुतों को राजनीति करने के लिये केजरीवाल का कभी 5 कमरे का घर मिलता, तो कभी सरकारी गाड़ी का नम्बर प्लेट। कभी ये रंडियों का बचाव करने का मौका तलाशतें हैं, परन्तु नादान लडकियों को इस गौरखघंघे की आग में झौंकने वाले दरिंदों के खिलाफ चुप रहतें हैं। दिल्ली पुलिस के काली करतुतों उनकी काली कमाई के खिलाफ चुप हैं परन्तु उनके द्वारा अपराधियों को बचाये जाने को लेकर की गई गलत कार्रवाही के पक्ष में हंगामा बरापा रहें हैं।  जिन बिजली कंपनियों के पुश्तैनी कारोबारी को कभी धन का संकट नहीं था आज अचानक से उनके पास धन की कमी हो गई। जिस सरकारी कंपनी ने कभी यह नहीं कहा कि वह बिजली नहीं दे सकते, उसने अचानक से नोटिस चिपका दी कि पहले पैसा दो फिर बिजली लो। मानो दिल्ली में ‘आप’ की सरकार क्या बनी, रातों-रात सारे के सारे ईमानदार हो गये। जो भाजपा पिछले 15 साल से सोई हुई थी। रजाई से बहार निकालकर खुद को तरोताजा महसूस करने लगी। जैसे दिल्ली से ही मोदी के भाग्य का फैसला होने वाला है।
दिल्ली की सरकार चुन कर आई है। परन्तु दिल्ली की सारी व्यवस्था दिल्ली के उप-राज्यपाल के माध्यम से केन्द्रीय सरकार चलायेगी। प्रत्येक बात पर दिल्ली के मुख्यमंत्री को उप-राज्यपाल की स्वीकृति लेनी आवश्यक होगी। मानो दिल्ली की जनता ने दिल्ली में अपनी सरकार बनाकर कोई पाप कर दिया है। अबतक दोनों (कांग्रेस व भाजपा) पार्टियों का धंधा दिल्ली में फलफूल रहा था। दिल्ली को तुम मिलकर लूटो, देश को हम मिलकर लूटतें हैं कोई किसी के काम में दखल नहीं देगा। इस बात की शपथ लेते थे कि दोनों पक्ष कभी भी इस लूट की व्यवस्था को जनता के सामने उजागर नहीं करेगें। यह है इनके संविधान की व्याख्या। दरअसल ये लोग संविधान की शपथ लेकर देश की जनता को लूटने का धंधा चलाते थे, जिसे केजरीवाल ने जगजाहिर करने का प्रयासभर किया है।
दिल्ली की जनता को लूटने के लिये इनके पास सारे नियम कानून और सिस्टम उपलब्ध है परन्तु जनता के धनको लूटने वालों पर अंकुश की बात करते ही इनको संविधान की याद आने लगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री के हाथ-पांव को कानून से बांधने के सभी कानून उपलब्ध है। देश के इन लूटरों के खिलाफ बोलने व दिल्ली जनलोकपाल कानून बनाने की बात करते ही इनको पद व गोपनियता की याद सताने लगी। कहते हैं वे संविधान से बंधे हुए हैं। जैसे चोर चिल्लाता है कि मुझे मारो मत मैं भी इंसान हूँ।
सरकार चलाने का तर्जूबा सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के पास ही। देश की सत्ता में काबिज हो देश के खजानों को लूटना, देश की खनिज संपदा का बंदरवाट करना इनके सरकार चलाने का अर्थ होता है। देश को लूटो और राज करो। केजरीवाल को सरकार चलानी इसलिये नहीं आती क्योंकि केजरीवाल व इसके साथी इस बंद पिंजडे का पंछी नहीं हैं । हमें अवसर मिला है इसमें अपनी आहुति देने का। संविधान की मर्यादा का पालन करनेवालों को भी खुलकर केजरीवाल का साथ देना होगा नहीं तो ये लूटरें संविधान के हथियार से केजरीवाल को घायल कर देगें ।  जयहिन्द! - शम्भु चौधरी 07.02.2014
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बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

मोदीः राजधर्म नहीं चुरा पा रहे?

भाजपा (मोदी) खेमा आगामी लोकसभा चुनाव में 272 सीटें लाने का दावा ठोक रही है। जबकी भाजपा (अडवाणी) खेमा चुपचाप मजे लेने में। इस दावे की पोल खोलने के लिये अडवाणी खेमा कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगा। बिहार में जदयू, बंगाल से ममता, महाराष्ट्र से शिवसेना और जम्मू कश्मीर के फारूक अब्दुल्ला कुछ ऐसे राज्य हैं जहां से कुल 50-60 सीटें ऐसी है जिसका झूकाव अडवाणी खेमे की तरफ है। 272 के आंकड़ें को पार करने के लिये इन सीटों की जरूरत पडेगी। 
आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी सरचढ़ कर बोलने लगी। जहाँ कांग्रेस पार्टी बिल पर बिल लाकर देश को चुनाव की तैयारी में जूटी है। अभी से बकवास विज्ञापनों के माध्यम से मीडिया व समाचार पत्रों का मुंह बंद कर, राहुल बाबा के चेहरे पर करोंड़ों का पाउडर पोतने में लगी है। वहीं ‘आप’ के देशभर में बढ़ते प्रभाव के कारण भाजपा की बैचेनी भी साफ झलकने लगी है। दिल्ली को राजनीति का दंगल बना देने वाली भाजपा पिछले 15 साल खुद दिल्ली को लूटती रही, फिर शीला दीक्षित की सरकार के साथ मिलकर 15 साल दिल्ली की जनता को जमकर लूटा। अब दोनों पार्टियाँ मिलकर ‘आप’ की सरकार गिराने में लगी है। मामला देश उन उद्योगिक घरानों से जूड़ा है जिनके बलबुते पर इनकी पार्टी का खर्चा चलता है।
वैसे तो देश में राजनीति पार्टीयों की भरमार है। सभी अपने-अपने क्षेत्र में कोई 20 सीट लाने का दावा ठोक रही है तो कोई 30 सीट, कोई 40 सीट। सबसे मजे की बात है की कांग्रेस पार्टी को ‘‘लोहे की टक्कर’’ देने वाली भाजपा (मोदी) खेमा आगामी लोकसभा चुनाव में 272 सीटें लाने का दावा ठोक रही है। जबकी भाजपा (अडवाणी) खेमा चुपचाप मजे लेने में। इस दावे की पोल खोलने के लिये अडवाणी खेमा कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगा। बिहार में जदयू, बंगाल से ममता, महाराष्ट्र से शिवसेना और जम्मू कश्मीर के फारूक अब्दुल्ला कुछ ऐसे राज्य हैं जहां से कुल 50-60 सीटें ऐसी है जिसका झूकाव अडवाणी खेमे की तरफ है। 272 के आंकड़ें को पार करने के लिये इन सीटों की जरूरत पडेगी। 
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की तरफ से अभी तक कोई दावा प्रस्तुत नहीं किया गया कि कांग्रेस को आगामी आम चुनाव में कितनी सीटें मिलेंगी? कांग्रेस अभी तक इस उलझन में है कि वह किसे प्रधानमंत्री पद का उम्मिदवार बनायें। जबकि कांग्रेसी चम्मचे राहुल गांधी को अभी से ही अपना प्रधानमंत्री मान रहें हैं। इन चम्मच छाप नेताओं ने देश में अपनी इतनी अच्छी छवि बना रखी है कि इनको गांधी परिवार के बहार देखना भी बेईमानी होगी। 
उघर सीपीएम एवं सीपीआई हर तरफ हाथ-पांव मारने में लगी है कि किसी प्रकार उसे 20-30 सीटें मिल जाये। अपने खुद के जो राज्य थे पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा एवं केरल इन तीनों राज्यों में इनका जनाधार काफी नीचे खिसक चुका है। प्रकाश करात के अहंकार ने सीपीएम को पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा से सत्ता बेदखल ही नहीं किया संगठन को भीतर से कमजोर भी कर दिया है।
 ‘इंडिया फस्ट’ का नारा देने वाले भाजपा के इकलोते नेता नरेन्द्र मोदी जी कल ही चुनावी सभा करने बंगाल आये। बंगाल की 42 लोकसभा सीटों पर अपना मजबूत उम्मिदवार भी ठीक से खड़ा कर पाने में असमर्थ,  बंगाल की भाजपा कोलकाता के बिग्रेड परेड मैदान के आधे हिस्से को बड़ी मसक्कत करने के बाद भी ठंग से नहीं भर पाई,  मोदी जी ने बंगाल की जनता को आह्वान किया कि वे सभी 42 सीट उनको झौली में भर दें। 
सवाल उठता है कि चुनाव मोदी जी लड़ रहे है कि भाजपा लड़ रही है? मैं और मेरा गुजरात से मोदी आज तक ऊपर नहीं उठ पाये हैं। बिहार जातें हैं तो खुद को गोबंशी कह कर वोट मांगते हैं। बंगाल आये तो ममता दीदी का परिवर्तन का नारा चुरा लिया। मोदीजी ने कहा कि ‘‘अबकि दिल्ली में परिवर्तन की बारी’’। यूपी में गये तो अजित सिंह का गन्ना चुरा लाये। कहीं से ईमान चुराया तो कहीं से गरीबों का सम्मान चुराया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि मोदी जी कांग्रेस के सरदार पटेल तक को चुरा कर भरे बाजार में बेच दिया, कांग्रेसियों की हिम्मत तक नहीं हुई की मोदी को जबाब तक दे सके। 
भले ही मोदी जी ने अपनी पार्टी से सभी कद्दवार नेताओं को क्रमवद्ध अपने रास्ते से हटा दिया हो। भले ही भाजपा, मोदी के पीछे भागती भीड़ को देख के ललायित हो रही हो कि अबकि नैया ‘रामजी’ के भरोसे नहीं ‘मोदीजी’ के भरोसे पार लगेगी, भले ही राजनाथ सिंह को आगे-पीछे मोदी ही मोदी दिखाई देतें हों। पर इतना तो सच है कि मोदी जी अभी तक अटल जी के एक छोटे से अटल वाक्य ‘‘ राज धर्म का पालन हो’’ को नहीं चुरा पाये। जो आगामी चुनाव का गणित है। जयहिन्द!
- शम्भु चौधरी 06.02.2014
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रविवार, 19 जनवरी 2014

बात पते की - दिल्ली पुलिस का अपहरण

20.01.2014 (Kolkata)
 जल्द ही रहस्य से पर्दा उठने का समय आ गया है। दिल्ली की पुलिस के नाक के नीचे विदेशी महिलाओं के द्वारा देह व्यापार, ड्रग्स का व्यापार उनके संरक्षण में चल रहा था। कहीं कोई रोक-टोक नहीं थी। कोई उनको बोलने वाला नहीं था। रोजाना आपके हमारे बैंकों के एकाउन्टस को हाईजैक कर लेना, लाटरी के नाम पर जाली एसमएस, इमेल का रेकैट फैलाने वाले का धंधा जैसे ही चौपट होने के कगार आया कि तमाम वे ताकतें, जिसमें दिल्ली की पुलिस सहित केंद्र के कई नेता और तमाम उन राजनीति ताकतों के प्यादे की मिलभगत, सबके-सब रातों-रात बैखला गये।

 दिल्ली पुलिस को  अचानक से उनको रात में सपना भी आ गया कि केजरीवाल का अपहरण तक हो सकता है। दरअसल ये अपहरण की हवा सिर्फ केजरीवाल को दिल्ली पुलिस के द्वारा ब्लैकमेल करने की साजिस है। दिल्ली का रेकैट चाहता है कि उनके फलफूल रहे धंधे में केजरीवाल व उनके मंत्री उनके धंधे में कोई दखल ना दें अन्यथा उनका अपहरण तक किया जा सकता है। 

 दिल्ली के कानून मंत्री श्री सोमनाथ भारती ने पिछली रात स्थानीय लोगों की लगातार सूचना के अनुसार दिल्ली पुलिस को घटनास्थल पर जाने का आदेश दिया, दिल्ली पुलिस उन पर कार्यवाही करने से इंकार कर दी, मंत्री को कहती है उनके पास वारंट नहीं है। दिल्ली के कानून मंत्री का यह प्रयास उनको इतना नागवार गुजरा कि वे उनके ही ऊपर ही विदेशी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का आरोप जड़ दिया ।

 सरेआम दिल्ली में सैकड़ों महिलाओं की ईज्जत को लुटते देखनेवाली दिल्ली पुलिस को कभी शर्म तक नहीं आती कि दिल्ली में इतनी घटनायें क्यों और कैसे हो जाती है जबकि देश की सबसे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था दिल्ली में दिल्ली पुलिस द्वारा पूरे ताम-झाम के साथ की जाती है। 

करोंड़ों का धन सिर्फ नेताओं की चौकीदारी में ही बहा दिया जाता है। कानून-व्यवस्था के नाम पर देश की आंख में घूल झौंकनेवाली दिल्ली पुलिस क्या है बता पायेगी कि दिल्ली में जब कई बम धमाके हुए तो उनकी सूचना उनके पास क्यों नहीं थी? आज अचानक से केजरीवाल के अपहरण की बात, किस बात की तरफ संकेत देती है? - शम्भु चौधरी

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

बात पते कीः ‘राजधर्म’ ? - शम्भु चौधरी


 लोकसभा का चुनाव सर पर आ गया। कांग्रेस पार्टी में हार की बैचेनी साफ दिखने लगी है। वहीं दिल्ली फ़तह में जुटी भाजपा देश की जनता में देश प्रेम की भावना (गुब्बारे में हवा) भरने में लगी है। यही भाजपा एक बार देश में ठीक इसी प्रकार का प्रयोग राम मंदिर बनाने के मुद्दे पर कर चुकी है।  ‘‘कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनायेगें’’ सरकार बनते ही मंदिर गया बुट लादने। कैसा राम मंदिर? मंदिर तो हमारे एजेंडे में था ही नहीं। यह तो एनडीए की सरकार है। भाजपा की सरकार बनेगी तब सोचेगें। न्यायालय का आदेश आने से या सुलह हो जाने से राम मंदिर बनाया जायेगा। फिर कुछ दिनों बाद भाषा में थोड़ा बदलाव आया। राममंदिर हमारे लिये एक राष्ट्रीय मुद्दा है। इससे देश के करोड़ों लोगों की जन भावना जुड़ी हुई है।
2014 के चुनाव में भाजपा ने मंदिर मुद्दे कुल मिलाकर पल्ला ही झाड़ लिया है। अब इस बूढ़ी घोड़ी पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लाल लगाम चढ़ा दी है। मोदीजी दुल्हे की तरह जँचने भी लगे। सज-धज के तैयार गुजरात के वीर पुरुष श्री नरेंद्र मोदी जी रोज नये-नये सपने देखने लगे हैं।

श्री नरेंद्र मोदी जी अभी तक अटल जी की एक अटल वाक्य को बोल नहीं पाये ‘‘राजधर्म का पालन करें’’   हाँ! मोदीजी इसी बात को कई प्रकार से समझाने में लगे हैं कि ‘‘सरकार का एक ही धर्म है ‘इंडिया फस्ट’, एक ही धर्मग्रंथ है ‘देश का संविधान’, एक ही भक्ति है ‘देश भक्ति’ फिर कुछ दिनों बाद याद आया तो इस कलाम में एक वाक्य और जोड़ दिये देश की एक ही शक्ति है ‘जन शक्ति’ कोटी जनता देश की जनशक्ति, सरकार की एक ही पूजा होती है देश के 125 करोड़ जनता की भलाई। अब तो मुसलमानों के गुणगान में भी कशिदे पढ़ने लगे।  


मोदी जी आप इतना लंबा-चौड़ा भाषण देकर अटल जी की एक वाक्य ‘‘राजधर्म का पालन करें’’ को हमें समझाने में लगे हैं। आप क्या समझते हैं कि आप और आपके समर्थक ही चतुर और बाकी मुर्ख? आपके समर्थकों ने तो अभी से ही आपा खो दिये हैं। हमें देशभक्ति का पाठ बाद में पढ़ा देना, चुनाव से पहले अपने समर्थकों को पाठ पढ़ा दो कि वे देशभक्ति में इतने मतवाले ना बन जाय कि आपका सपना अधूरा का अधूरा ही रह जाए।
18.01.2014 (Kolkata) 

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

बात पते कीः ‘‘आप’ को वोट देने के पहले सोचें?’’ - शम्भु चौधरी


अब इस बात में कोई बहस नहीं रही कि देश में तीसरा विकल्प गर्भ में जन्म ले चुका है। जो कांग्रेस और भाजपा की भ्रष्ट राजनीति से अलग अपनी नई सोच रखता है। कांग्रेसवाद, भ्रष्टवाद, बामवाद, समाजवाद, गाँधीवाद, लोहियावाद, दक्षिणवाद, पश्चिमवाद, दलीतवाद, अल्पसंख्यकवाद, हिन्दूवाद, मुस्लिमवाद और ना जाने कितने वाद के वादों की भूलभुलैया के बीच एक नया वाद जिसे ‘इंसानवाद’ का नाम देना सटीक रहेगा, ने जन्म ले लिया है।

(कोलकाता- 15.01.2014) : दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ‘आप’ को सफलता क्या मिली, भाजपा के कर्णधार नेतागण सबके सब अपनी नैतिकता को भूला बैठे। अपनी प्रमुख राजनीति प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेस को निशाना लगाने से हटकर पूरे देश में ‘आप’ के खिलाफ जनमत बनाने में लग गई। अचानक से इनके ऊपर ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा कि भाजपा को कांग्रेस से कहीं ज्यादा ‘आम आदमी’ से खतरा लगने लगा?
फेसबुक पर इनके समर्थकों की भाषा शर्मनाक तो हो ही चुकी है संघ संचालित व संघ विचारधारा के पोषक लेखकों की भाषा ने भी अपना संयम खो दिया है। कोलकाता के एक प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र ने तो अपनी संपादकीय में ही लिख दिया कि ‘‘ ‘आप’ को वोट देने के पहले सोचें’’  संपादक जी अभी से इतनी घबड़ाहट क्यों?  कि इनको संपादकीय तक लिखना पड़ा। 

कुछ लोग इसे पानी का बुलबुला मानते हैं तो कुछ चिल्लड़ पार्टी कहने से नहीं चुकते। इसमें बुरा तो कुछ भी नहीं दिखता। ये मानते हैं कि देश की जनता को अभी से जितना डराया और धमकाया जाएगा उतना वे मोदी के पक्ष में खड़े हो जायेंगे। मानो गुजरात मॉडल का प्रयोग संघी समर्थक पूरे देश में करना चाहते हैं। 
जहां एक तरफ कांग्रेस आज काफी राहत महसूस कर रही है कि कल तक भाजपा का जो रूख उसके विरूद्ध था वह अब ‘आप’ के पीछे हाथ धो कर लग गयी है। 

वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भी हाथ-पाँव अभी से ही फूलने लगे हैं। इनको लगता है कि कांग्रेस से कहीं ज्यादा नुकसान भाजपा को  ‘आप’ से हो सकता है। वर्तमान हालत तो यही संकेत दे रहें हैं कि जिस पार्टी का अभी तक देश में ठंग से कोई संगठन तक नहीं तैयार है। जिसने महज मां के भ्रूण में कदम ही रखा है उसे मारने के लिये देश के तमाम जाने-माने राजनीतिज्ञों की एक फौज लामबंध हो चुकी है। शायद इसीलिये राजनीति से खुद को दूर रखने वाली सामाजिक व देश की संस्कृति की रक्षा में लिप्त संस्था के सरसंघचालक को इस बात की चिंता अभी से सताने लगी और लगे हाथ संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा को हिदायत दे डाली कि ‘‘वह आम आदमी पार्टी को हल्के में ना लें’’ 

अब इस बात में कोई बहस नहीं रही कि देश में तीसरा विकल्प गर्भ में जन्म ले चुका है। जो कांग्रेस और भाजपा की भ्रष्ट राजनीति से अलग अपनी नई सोच रखता है। कांग्रेसवाद, भ्रष्टवाद, बामवाद, समाजवाद, गाँधीवाद, लोहियावाद, दक्षिणवाद, पश्चिमवाद, दलीतवाद, अल्पसंख्यकवाद, हिन्दूवाद, मुस्लिमवाद और ना जाने कितने वाद के वादों की भूलभुलैया के बीच एक नया वाद जिसे ‘इंसानवाद’ का नाम देना सटीक रहेगा, ने जन्म ले लिया है। शायद अरविंद केजरीवाल इसीलिए अपनी पार्टी के हर बैठक में कवि प्रदीप का यह गीत को गुनगुनाते हैं - ‘‘इंसान को इंसान से हो भाई चारा, यही पैगाम हमारा.. यही पैगाम हमारा।’’

सोमवार, 13 जनवरी 2014

बात पते की - मोदी की हवा?

सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।

 दिल्ली भाजपा ने मोदी का पूरा खेल ही बिगाड़ दिया अब मोदी पगला गये, इनके समर्थक गाल-गलौज की भाषा का प्रयोग करने को ऊतारु हैं। इनको लगने लगा कि दिल्ली अब दूर हो गई है। चंद दिनों पहले तक मोदी के समर्थन में एक तरफा हवा बह रही थी, पिछले पांच राज्यों के चुनाव में 4 उत्तर भारत के राज्य ऐसे थे जिसमें भाजपा की एकतरफ़ा जीत दर्ज थी।

परन्तु भाजपा के पुराने खिलाड़ी और राजनाथजी के कट्टर विरोधी दिल्ली भाजपा के प्रभारी श्री मान् नितिन गडकरी जी भीतर ही भीतर मोदी के रथ को रोकने की योजना पर कार्य कर रहे थे इसके लिये उन्होंने विजय गोयल की दुखती नब्जों को सहलाया और दिल्ली में कमजोर नेतृत्व को सामने ला खड़ा किया।

डा. हर्षवर्धन जी जो 32 सीटों पर जीत प्राप्त कर प्रथम स्थान पर थे सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर ‘आप’ और कांग्रेस को आपस में उलझा सकते थे। परन्तु गडकरीजी ने फोन पर उनको ऐसा करने से मना कर दिया कि ‘‘वे सरकार बनाने का दावा ना करें।’’ बात बड़े नेता की माननी थी सो डा.हर्षबर्धन जी ने चुनाव परिणाम के आते ही शाम को अपने हाथ खड़े कर दिये।

उधर भाजपा अध्यक्ष राजनाथजी दावा कर रहे थे कि वे 4-0 से आगे हैं कि नितिन गडकरी ने हवा निकाल दी। राजनाथजी चाह कर भी डा.हर्षबर्धन को मना नहीं पाये कि वे कम से कम सरकार बनाने का दावा तो प्रस्तुत करें। ताकी विधानसभा में दोनो पार्टियों का रूख क्या रहता है इसका अंदाजा जनता को स्वतः ही लग जाये।

सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

अरविंद का जनता दरबार - शम्भु चौधरी


अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय की छत से जनता को संबोधित कर जनता को धेर्य रखने को कहा कि ‘‘जल्द ही व्यवस्थित रूप से पुनः जनता दरबार लगाया जाएगा। अरविंद ने अपने बयान में कहा कि इतनी भीड़ की उनको उम्मीद नहीं थी। इसके लिय नये सिरे से पूरी व्यवस्था करनी होगी। जिससे लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निदान हो सके।’’ 

 दिल्लीः दिनांक 11 जनवरी’2014 - सरकार हो तो ऐसी जो जनता के दर्द को अपना दर्द बना लें। दिल्ली में सचिवालय के बाहर ‘आम आदमी पार्टी की सरकार’’ के द्वारा जनता दरबार में जनता की समस्या इतनी देखने को मिली की शायद कभी किसी ने उनकी सुध तक ना ली हो। जैसे ही आज से सुबह 9.30 बजे से जनता दरबार लगाने की घोषणा हुई जनता को लगा कि कोई उनकी बात सुनेगा, जनता अपने आवेदन और समस्याओं के साथ उमड़ पड़ी। 
आज की बैकाबू भीड़ को देखकर अरविंद केजरीवाल को आज की जनता दरबार को बीच में ही रोक देना पड़ा।

अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय की छत से जनता को संबोधित कर जनता को धेर्य रखने को कहा कि ‘‘जल्द ही व्यवस्थित रूप से पुनः जनता दरबार लगाया जाएगा। अरविंद ने अपने बयान में कहा कि इतनी भीड़ की उनको उम्मीद नहीं थी। इसके लिय नये सिरे से पूरी व्यवस्था करनी होगी। जिससे लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निदान हो सके।’’ 

इस जनता दरबार में सबसे बड़ी समस्या जो देखने को मिली वह लोग समूह के रूप में ज्यादा आ रहे थे। ठेकेदारी में काम कर रहे मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या थी जो लोग बड़े-बड़े ग्रुप बनाकर जनता दरबार में आ गये । जिससे पूरी-पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे चरमरा गई।

कहावत है ‘‘एक अनार-सौ बीमार’’  अरविंद केजरीवाल और इनके मंत्री ज्यों-ज्यों जनता के दर्द को सहलाते गए यह दर्द जख्म का रूप धारण करता गया। मानो दिल्ली की जनता में पिछले 30 सालों से इस दर्द को सहने की आदत सी बन गई थी। असफलता सफलता की कुंजी होती है। आज अरविंद केजरीवाल ने फिर प्रमाणित कर दिया की वे आज भी जनता के साथ हैं। भले ही आज इस दरबार से जनता की समस्या ना सुनी जा सकी हो पर यह तो साफ हो गया कि समस्या की जड़ें बहुत पुरानी है जिसे जड़ से ही समाप्त करना होगा। 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

राम! राम! सत्यानाश


‘नमो’ समर्थकों की भाषा एक पोस्ट आप भी पढ़ लें। 

‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
 राम! राम! सत्यानाश कर देगा देश का।

‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
 राम! राम! सत्यानाश कर देगा देश का।

‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
 राम! राम! सत्यानाश कर देगा देश का

सोमवार, 6 जनवरी 2014

आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय नीति?

आदरणीय केजरीवाल जी।                 दिनांकः 06/01/2014
सादर नमस्कार!

विषय:  आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय नीति।
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति को प्रेषित पत्र

आदरणीय सदस्यगण।

वैसे तो ‘आम आदमी पार्टी’ से जुड़े मुझे चंद ही दिन हुए हैं राजनीति में लगातार 1974 से रुचि रखने और आप लोगों से जुड़ कर कार्य करने की प्रेरणा से यह पत्र आप सभी सदस्यों के विचारार्थ भेज रहा हूँ।
दिल्ली के चुनाव के पश्चात जिस प्रकार कांग्रेस व भाजपा अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा लगाता राष्ट्रवादी व अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस को तेज कर ‘आप’ को बैकफुट पर लाना चाहती है इसके लिए हमें ना सिर्फ सतर्कता की जरूरत है हमें उन तमाम मुद्दों पर गंभीर चिंतन कर नीति के निर्धारण की भी अत्यंत आवश्यकता है।

निम्न विषय आपके ध्यानार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

1. सर्वप्रथम हमें संगठन के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की भर्ती करनी चाहिए। संभव हो तो उन्हें सवैतनिक भत्ता के साथ सम्मान पूर्वक पद पर उनकी नियुक्ति हो। ताकी संगठन में उनके कार्यानुसार भविष्य में उनको सम्मानित राजनीति पदों पर स्थापित किया जा सके।

2. कश्मीर सहित उन सभी राष्ट्रीय मुद्दों पर ‘आप’ की स्पष्ट नीति हो। ताकी कोई भी उसके विरुद्ध कार्य या बयान ना दे सके।
3. देश की सुरक्षा, अर्थ व्यवस्था, शिक्षा, किसान नीति, मज़दूर नीति, सरकारी-ग़ैरसरकारी कर्मचारी नीति, व्यापार नीति, बैंकिंग नीति, शेयर बाजार , विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, राज्यों के साथ संबंध, विदेशी मुद्रा भंडार व काला धन, खनिज संपदा नीति आदि पर विचार करना।
4.भ्रष्टाचार व अन्य जन अपादा-विपदा नीति के साथ-साथ आम जनता की जनसेवा से जुड़े कई क्षेत्र जिसमें बिजली-पानी, चिकित्सा-दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, खाद्य वितरण प्रणाली व यातायात व्यवस्था।
5.डालर के मूल्य पर नियंत्रण और तेल के प्रबंध पर अंकुश व आयात-निर्यात व्यवस्था में सामंजस्य करना साथ ही देश की उद्योगिक क्षेत्र में प्रोत्साहन प्रदान करना।
6.आधार भूत इंफ्रास्टेक्चर व्यवस्था को सुचारु करना, सरकारी विभागों की ज़िम्मेदारी तय करना व सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक सौहार्द बनाये रखते हुए स्वच्छ राजनीति व्यवस्था का निर्माण कर  देश में कानून व व्यवस्था का राज कायम करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
7. खेल क्षेत्र से राजनीतिज्ञों का वर्चश्व समाप्त करना।
8. कई ऐसे विषय जो यहां छुट गए हैं का अध्ययन करना और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर प्रणाली पर देश के जाने-माने विद्वानों की राय प्राप्त कर नीति का निर्धारण करना।
9. आम आदमी की प्राथमिकता इस बात पर भी हो कि जो नीति का निर्माण हो वह राष्ट्र की जनता पर दूरगामी प्रभाव छोड़ सके। व अन्य राजनीति पार्टियों को सोचने के लिए मजबूर कर दे।

आशा है 'आप' की  राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति मेरे पत्र पर गंभीरता से विचार करेगें। आपके उत्तर का इंतजार रहेगा।

आपका ही शुभचिंतक
शंभु चौधरी, कोलकाता