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शनिवार, 20 अप्रैल 2019

भारत में महाभारत - 9

न्यायपालिका खतरे में - CJI  जस्टिस गोगोई
‘‘मैंने आज अदालत में बैठने का असामान्य और असाधारण कदम उठाया है क्योंकि चीजें बहुत आगे बढ़ चुकी हैं।  कुछ शक्तिशाली लोग सीजेआई के ऑफ़िस को निष्क्रिय करना चाहते हैं।  लोग पैसे के मामले में मुझ पर ऊंगली नहीं उठा सकते थे, इसलिये इस तरह का आरोप लगाया है। सीजेआई ने कहा कि मैं देश के लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि मैं महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करूंगा।  जिन्होंने मुझपर आरोप लगाए हैं, वे जेल में थे और अब बाहर हैं। इसके पीछे कोई एक शख़्स नहीं है, बल्कि कई लोगों का हाथ है।" - CJI  जस्टिस गोगोई
         एक अपराधी महिला को जेल में इस प्रकार तैयार किया कि वह देश के उच्चतम अदालत के मुख्य जस्टिस रंजन गोगोई को ही  यौन शोषण के मामले में सीधे टारगेट कर दिया । मोदी जी इस बात को अब भली भांति जान चुके है कि अदालत के सामने झूठे दस्तावेज़ रख कर  राफेल के मामले में वे अब बुरी तरह से फँस चुके हैं । जिसे पिछली सुनवाई में  अटॉर्नी जनरल के.के वेणुगोपाल उसी दिन खुली अदालत में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई को  धमकी भी दे  चुके थे कि वे  राफेल मामले में अपने पहले के फैसले की समीक्षा कर के सही नहीं कर रहे हैं । 
           मोदी जी यह बात अच्छी तरह जानते है कि यौन शोषण का एक ऐसा कमजोर हथियार है।  जिसका प्रयोग कर किसी भी व्यक्ति को तत्काल बदनाम किया जा सकता है और महिला को कुछ नहीं होगा क्योंकि उसके नाम को लेना भी अपराध है। मोदी ने कई जगह अपने राजनीति फायदे के लिए इसका प्रयोग किया भी है हार्दिक पटेल की फर्जी सेक्स सीडी आप सभी को याद होगा ही। मोदी किसी को भी इस हथियार से बदनाम करने में उन्हें महारत प्राप्त है।  यौन शोषण का ताजा आरोप  अपने रास्ते के काँटे को हटाने के लिए ही किया है यह एक प्रमाणित तथ्य है। मोदी के सत्ता में आने के बाद  इस नये हथियार को प्रयोग धड़ल्ले  किया जाने लगा है।  जिस दिन रंजन गोगोई  ने केन्द्र सरकार को यह आदेश दिया कि वे राफेल से जुड़े वे तमाम दस्तावेज़ ना सिर्फ कोर्ट में जमा करे, साथ ही साथ उन तीनों वादियों को भी उसकी प्रति दी जाए तब से मोदी सरकार बेचेन थी कि किस प्रकार सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई को रास्ते से हटा दिया जाय । क्योंकि अभी संसद का गठन होने मे एक माह वक्त लगेगा और किसकी सरकार आयेगी यह किसी को पता नहीं । मोदी की लहर 2014 जैसी नहीं हैं यह सब  बात (राफेल)मोदी के लिये चिंता का विषय बन चुकी थी। 
        
      पिछली सुनवाई के बाद एक माह तक सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर विचार करती रही कि वे क्या फैसला ले? क्या चोरी के दस्तावेज़ पर सुनावई करे कि नहीं? जिस दिन यह निर्णय आया उसी दिन गोगोई जी को यह सोच लेना चाहिये था कि अब उनके साथ भी कुछ गलत होने वाला है जो जस्टिस लोया के साथ हुआ था। खैर अभी मामला यौन शोषण तक ही आकर अटक गया पर आगे भी कुछ भी हो सकता है। क्योंकि भाजपा का एक वर्ग राम मंदिर के मामले में भी रंजन गोगोई के ऊपर तरह-तरह के आरोप खुल कर मीडिया के सामने लगा चुकी है। 
          यहां यह  बात लिखने  में आज मैं जरा भी संकोच नहीं करुंगा कि  सुप्रीम कोर्ट के जजों को लोकतंत्र की रक्षा के लिये एकजूटता दिखानी चाहिये। और किसी भी हालात में राफेल की सुनवाई जल्द से जल्द  कर दूध का दूध और पानी का पानी कर देना चाहिये भले ही इसके लिये कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े।
       
        मोदी जी आगामी लोकसभा चुनाव जीतने में राफेल सौदे की सुनवाई को अपना सबसे बड़ा रोड़ा मान रहें है कि कहीं अगली सुनवाई में कोई बात उनके खिलाफ जगजाहिर हो गई तो पूरा देश उन्हें मारने दौड़ेगा । वैसे भी फ्रांस में अनिल अंबानी को टैक्स में जो राहत राफेल सौदे के बाद दी गई जैसा कि ‘‘ला मोंडे’’ में छपा है। इस अपराध को भी राफेल सौदे की एक कड़ी के रूप में  देखा जा रहा है । इस खतरे को भी मेादी जी पहले से ही भाँप चुके है।
          आज की ताजा घटनाक्रम इसी अपराघ की एक कड़ी है जो सीधे मोदी से जोड़कर देखी जा  रही है।  यौन शोषण के आरोप से घिरे सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने ऊपर लगे  यौन शोषण के आरोप को खारिज करते हुइ कहा कि ‘‘ मुझे नहीं लगता कि इन आरोपों का खंडन करने के लिए मुझे इतना नीचे उतरना चाहिए । सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि न्यायपालिका खतरे में है। अगले हफ्ते कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई होनी है, इसलिये जानबूझकर ऐसे आरोप लगाए गए। 
          रंजन गोगोई ने कहा कि न्यायपालिका को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता है। ‘‘मैंने आज अदालत में बैठने का असामान्य और असाधारण कदम उठाया है क्योंकि चीजें बहुत आगे बढ़ चुकी हैं।  कुछ शक्तिशाली लोग सीजेआई के ऑफ़िस को निष्क्रिय करना चाहते हैं।  लोग पैसे के मामले में मुझ पर ऊंगली नहीं उठा सकते थे, इसलिये इस तरह का आरोप लगाया है। सीजेआई ने कहा कि मैं देश के लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि मैं महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करूंगा।  जिन्होंने मुझपर आरोप लगाए हैं, वे जेल में थे और अब बाहर हैं। इसके पीछे कोई एक शख़्स नहीं है, बल्कि कई लोगों का हाथ है।"
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

भारत में महाभारत - 8

मुल्क के गद्दार 
इन सब बातों को कड़ी दर कड़ी जोड़ दिया जाय तो पुलमावा की साजिश में मोदी सरकार और इमरान खान की मिली भगत का एक नमूना प्रतित होता है।   अर्थात  प्रधानमंत्री मोदी और इमरान खान इन दोनों ने मिलकर भारत की जनता को मुर्ख बनाने का प्रयास किया है। ये दोनों ही अपने-अपने मुल्क के गद्दार हैं ।
अब यह बात घीरे-धीरे सामने आ रही है कि पुलमावा में 14 फरवारी 2019 को हुए आतंकी हमले के समय मोदी जी और उनकी सरकार क्यों चुप थी?
1. पुलमावा में सैनिकों पर आतंकी हमला के दौरान प्रधानमंत्री को चार घंटे फिल्म की सुटिंग कराते रहना ।
2. फिर सुटिंग से निकलते ही जनता को संबोधन करना जिसमें पुलमावा घटना का कोई उल्लेख ना होना ।
3. शाम 5 बजे तक प्रधानमंत्री कार्यालय,  गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय का गायब हो जाना ।
कई बातों को संदेह के कठघरे में खड़ा कर देता है कि 24 घंटा काम करने वाले देश के  प्रधान सेवक जवानों की शहादत के समय आखिर क्या कर रहें थे? इसका जबाब अभी तक सीधे तौर पर नहीं दिया गया ।  फिर पुलमाव की घटना को दबाने के लिए मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ मिलकर एक चालाकी की। ‘‘दोनों देश की जनता को ठगों योजना’’नकली एयर स्ट्राइक हमला 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायु सेना के बालाकोट के सूनसान ईलाके में किया गया।  जिसकी दो तरह से पुष्ठि हो जाती है।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पुष्ठि भी  हो चुकी है कि जिस मस्जिद को हमले में गिराये जाने का दावा गोदी मीडिया कर रही है वह सब झूठ है।
इस झूठ की सच्चाई इस प्रकार है-
1.  पाकिस्तान की संसद में प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह ऐलान कि वह भारतीय पायलट अभिनंदन को  पाकिस्तान बिना किसी शर्त के  रिहा करेगा। साथ ही बताया कि 'बालाकोट' में भारतीय हमला हुआ, उससे पाकिस्तान को कोई क्षति नहीं हुई है।
2. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भाजपा कार्यकर्ताओं के सामने यह स्वीकार करना की भारतीय सेना को एयर स्ट्राइक के दौरान किसी भी पाकिस्तानी नागरिक या पाकिस्तानी सैनिकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए यह भारत सरकार की तरफ से हिदायत दी गई थी।
3. 350 आतंकवादी सहित मसूद को छुड़ाने वाला युसूफ भी मारा गया।
4. अमित शाह ने  कहा कि 250 आतंकवादी मारे गये।
5.  सेना की तरफ से बयान आया कि उनका काम लाशें गिनना नहीं है। अर्थात कितने आतंकी मारे गये इसका उनके पास कोई आंकड़ा नहीं है।
6.  भारतीय पायलट विंग कमांडर अभिनंदन की  बिना  शर्त  रिहाई और 
7.  इमरान खान का यह कहना कि मोदी को फिर सत्ता में आना चाहिये।
इन सब बातों को कड़ी दर कड़ी जोड़ दिया जाय तो पुलमावा की साजिश में मोदी सरकार और इमरान खान की मिली भगत का एक नमूना प्रतित होता है।   अर्थात  प्रधानमंत्री मोदी और इमरान खान इन दोनों ने मिलकर भारत की जनता को मुर्ख बनाने का प्रयास किया है। ये दोनों ही अपने-अपने मुल्क के गद्दार हैं ।
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बुधवार, 17 अप्रैल 2019

भारत में महाभारत -7

चुनाव  आयोग बनाम नमो आयोग
देश की सर्वशक्तिमान संस्थान यानि कि ‘चुनाव आयोग’ जिसे भारत के संविधान में सिर्फ राष्ट्रपति और राज्यपाल को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को सरकारी-गैर सरकारी  अधिकारियों के अधिकारों में परिवर्तित, उसके पद से उसका हस्तांतरण, उसके कार्यों  में हस्तक्षेप / रोक या कुछ भी जो उसे उचित लगे कि चुनाव की प्रक्रिया में उस  व्यक्ति का उपयोग कर सकती है  या  रोक लगा सकती है या  उसे निर्देश दे सकती है चाहे वह कितने ही बड़े पद पर विराजमान क्यों न हो परन्तु इस बार 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक,  मायावती से ल्रेकर आजम खान तक सबको भारत के संविधान से खेलने की पूरी आजादी चुनाव आयोग ने प्रदान कर दी है।  बार-बार उच्चतम अदालत को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ रहा है । मानो चुनाव आयोग भी ‘नमो आयोग’ बन चुका हो। जिसे ना तो संविधान से मतलब है  ना ही अपने पद की गरिमा से।
यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि देश की इन तीनों  चुनाव अधिकारियों को उच्चतम अदालत के सामने यह बोलना पड़ा कि ‘‘हां ! माई लॉड हमें पता लग गया कि हमारे पास शक्ति है।’’ हमें याद करना होगा कि टी एन शेषन  दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त  के रूप में  कार्य किये थे जिनके कार्यकाल को भारत में चुनाव प्रक्रिया की सुधार की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जाता है । शेषन ने ना सिर्फ चुनावों में व्याप्त धांधली व भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कई साहसिक कदम उठाये, मतदाताओं को पहचान पत्र  देने में भी इनकी प्रमुख भूमिका को नकारा नहीं जा सकता ।
1993 में  चुनाव की किसी भी चुनावी प्रक्रिया को रोक कर  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव में कहीं कोई  खतरा पैदा ना खड़ा कर दिया जाए के सावधानी हेतु एक आम सहमति बनी कि चुनाव आयोग को तीन-सदस्यीय निकाय बना दिया, जहां किसी भी बड़े फ़ैसलों पर तीनों की सहमति या बहुमत का निर्णय जरूरी होगा ।   यह इसलिये भी जरूरी हो गया था कि तब तक चुनाव आयोग एक सर्वशक्तिमान निकाय बन चुका था । जिसे भारत की जनता ने वे तमाम अधिकार दे रखें हैं जो प्रधानमंत्री के पास भी नहीं है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत भारतीय चुनाव आयोग  को वे तमाम शक्तियां प्रदान की गई है जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जरूरी है। जब संसद के अधिकारों को सीमित कर दिया जाता है तो देश में निर्णय लेने के लिए दो ही वैधानिक शक्तियां बची रह जाती है - एक उच्चतम अदालत दूसरा खुद चुनाव आयोग। परन्तु आज मोदी द्वारा नियुक्त  ये तीनों चुनाव आयुक्त की यह हालत हो यह  चुकी है कि वह कोई भी छोटे से छोटे  फ़ैसलों को लेने में इस कदर डरती है कि उन्हें हर बार निर्णय लेने में  उच्चतम अदालत को आदेश देना पड़ रहा है। चाहे वह वोटों की गिनती का मामला हो या फिर नेताओं के जबान पर लगाम ।  यदि सबकुछ अदालत से ही चलना है तो फिर इस  आयोग की जरूरत ही क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में श्री सुनील अरोड़ा पदोन्नति (नियुक्ति-2017),  श्री अशोक लवासा, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति  जनवरी, 2018  और  श्री सुशील चंद्रा ने फरवरी 2019 में चुनाव आयुक्त के रूप में  पद भार ग्रहण किया यानि  इनकी नियुक्तियां भी  अब संदेह के घेरे में आ चुकी है।  क्या इन तीनों आयुक्तों को इसलिये लाया गया कि वे चुनाव आयोग की तमाम व्यवस्था को ताक पर रखकर चुनाव कराये। प्रधानमंत्री को कुछ भी कहने व करने की आजादी मिल सके, मतपत्रों की शत-प्रतिशत गिनती में इनको किस बात का डर सता रहा है? लोकतंत्र इन्हीं संस्थाओं के हाथों संचालित होती है यदि चुनाव आयोग  में जनता का विश्वास ही नहीं रहा तो  तब क्या करेगा आयोग? मतपत्रों की शत-प्रतिशत गिनती लोकतंत्र को और मजबूत ही करेगी तो चुनाव  आयोग  इससे पीछे क्यों हट रही है? आयोग को किस बात की चिन्ता सता रही है? 
क्या अबसे चुनाव आयोग वही करेगें जो तुलसी दास की एक  चौपाई में लिखा है -
बस इसमें  राम की जगह ‘मोदी’ लिख दीजिये आपको सारा जबाब मिल जायेगा ।
होइहि सोइ जो मोदी रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन मोदीनामा। गईं तीन आयुक्त जहँ मोदी सुखधामा॥ 
गांधी जी के तीन बंदर तो आपने जरूर देखें होंगें। एक बार फिर देखें । बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोला । ये तीनों चुनाव आयुक्त इतने अच्छे नमो भक्त बन चुके हैं कि अब इनको कुछ भी ना तो दिखता है ना सुनता है ना वे बोलते हैं । परन्तु यह लोकतंत्र है चुनाव आयोग को यह समझ लेना होगा कि आयोग चाहे कितना भी  नमो  धांधली में हिस्सेदार बन जाए जनता जब मुखर होती है तो इंदिरा गांधी जैसी तानाशाह को भी घूल चटा देती है, जबकि चाहे वह बंग्लादेश युद्ध का ममला रहा हो, पार्टी का अंदरूनी  ममला रहा हो, संविधान संशोधन का मामला रहा हो, ऑपरेशन ब्लू स्टार  या फिर आपातकाल का निर्णय लेने में  श्रीमती गांधाी के घूल बराबर भी नहीं है मोदी।  जब वो चुनाव हार गई तो मोदी तो किस खेत की मूली है ?  झूठे और फर्जी एयर स्ट्राइक से देश को एक बार भ्रमित तो कर सकते है बार-बार नहीं। मोदी जी यह लाकेतंत्र है जिसे गांधी (महात्मा गांधी) की तरह उनकी हत्या तो कर सकते हैं पर उनके विचारों को नहीं मार सकते । जिसे  नेल्सन मंडेला की तरह 27 साल जेल में तो रखा जा सकता है या आंग सान सू को  20 साल  नजरबंद किया जा सकता पर उनकी आवाजों को दबाया नहीं जा सकता । आज मोदी जी जिस प्रकार का प्रयोग भारत में कर रहें हैं जिसमें युवाओं को देशद्रोह के झूठे मामलों में फसाने से लेकर संवैधानिक संस्थाओं को अपने चुंगुल में करने के सभी प्रयास एक दिन सभी प्रयोग विफल साबित हो जायेगे। 

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लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

भारत में महाभारत-6

हर-हर मोदी वर्ससेज घर-घर कन्हैया

मोदी जी (भाजपा) यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि उनको देश में युवाओं से कड़ी चुनौती मिल सकती है। इसके लिये उन्होंने दो मार्ग अपनाये कि किसी भी प्रकार या तो इन युवाओं को बदनाम कर दिया जाए या उसे देशद्रोही ठहरा दिया जाए । जिस प्रकार दिल्ली में पिछली  विधान सभा के चुनाव में अरविंद केजरीवाल को 'भगोड़ा' बोलकर बदनाम करने की एक बड़ी साजिश की गई, मोदी सत्ता की अपनी पुरी ताकत झोंक दी, आरएस,एस सहित तमाम संगठन दिल्ली में डेरा डाल दिये थे कि किसी भी प्रकार दिल्ली की सत्ता केजरीवाल से छीन ली जाए, जो नाकाम ही नहीं हुई भाजपा की 28 विधान सभा की सीट भी इस चक्कर में हाथ से चली गई।  वहीं गुजरात में हार्दिक पटेल (आरक्षण आंदोलन के युवा नेता हैं। ओबीसी दर्जे में पटेल समुदाय को जोड़कर सरकारी नौकरी और शिक्षा में आरक्षण चाहते हैं) को देशद्रोही बना दिया गया और उसे इस कदर बदनाम करने का प्रयास किया गया जिसमें फर्जी सैक्स सीडी तक का भी ईस्तमाल किया गया ।  फर्जी मामले में आनन-फानन में उन्हें 2 साल की सजा भी सुनवा दी गई ताकि मोदी के लिए व अगले छः साल कोई चुनौती न बन सके।  वही हाल इन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से डॉक्टरेड करने वाले एक युवा डॉ कन्हैया कुमार  के ऊपर भी फर्जी देशद्रोह का मुकदमा चलाने का प्रयास किया गया । कन्हैया कुमार को  लोकसभा चुनाव में रोकने की भरपूर तैयारी कर ली थी मोदी सकार ने परन्तु  कंस की मौत जब कृष्ण के हाथों ही लिखी तो वह सात तालों में कन्हैया को  कंस  कैद नहीं कर सका । मोदी की हर चाल  विफल होती चली गई ।  बात-बात में देश से लोगों को पाकिस्तान भेज देने वाले गिरीराज सिंह के दिन भी  खराब आ गये कि बेचारे को एक कीड़ी जैसा दिखने वाले अदने से युवक के सामने जिसने राजनीति का ‘क’ भी नहीं सीखा के सामने खड़ा कर दिया और  बीजेपी के केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को बार-बार पानी पीने की नौबत आ गई । 
कन्हैया कुमार अखिल भारतीय छात्र परिषद  (AISF),जो  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  (CPI) की स्टूडैंट विंग हैए के नेता हैं। वह 2015 में जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) छात्र संघ के अध्यक्ष पद के लिए चुने गए थे।  इनको  दिल्ली पुलिस ने एक साज़िश के तहत गिरफ्तार लिया था । अदालत ने सबूत ना प्रस्तुत किये  जाने पर जमानत पर रिहा कर दिया। दिल्ली पुलिस का कहना है कि जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (२०१६) में जब राष्‍ट्रविरोधी नारे लगाये जा रहे थे तब कन्हैया भी वहां मौजूद था जो कि एक सरासर झूठा और मनगढ़ंत आरोप है । मोदी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी  झूठ को इतनी ताकत से फैलाया जाए कि वह सच लगने लगे और  साथ ही  उस झूठ को सुनने से लोगों की भावना भी आहत हो ऐसा लगना चाहिये।
परन्तु मोदी शायद भूल गये थे कि यह गुजरात नहीं है जहां हार्दिक पटेल को दो साल की सजा सुनवा दी गई यह भारत है ।  कोई किसी जज या पत्रकार की हत्या करवा सकता है और कानून उन मामलों को दबाने में सहयोग करे तो उसे इस बात के लिये भी तैयार हो जाना चाहिये कि जो आदमी यह सब करवा सकता है वह किसी के साथ भी ऐसा करने से परहेज नहीं करेगा । इस लोकतंत्र की रक्षा करने के लिये सभी पत्रकारों को भगत सिंह बनने का समय आ गया है। पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है इसे साबित करने का यह सही अवसर है कि वे मुखर हो कर अपनी बात जनता तक पंहुचायें।
आज यह बात लिखने में जरा भी संकोच नहीं दिखाना चाहिये कि कन्हैया कुमार इस बार चुनाव परिणाम के चुनाव आयोग के तमाम पिछले रिकॉर्ड को तौड़ देगा ।  एनडीटीवी के  रवीश कुमार से बात करते हुए - "कन्हैया कुमार ने कहा कि मेरा अपना अनुमान है कि अगर मैं चुनाव जीतकर संसद जाउँगा तो शायद नरेंद्र मोदी वहां नहीं होंगे, क्योंकि मैं उसी स्थिति में चुनाव जीतूंगा जब भाजपा विरोधी माहौल पूरे देश में बनेगा. अब कुछ लोगों ने बेगूसराय में बोलना शुरू किया है कि देश में क्या होगा नहीं जानते, लेकिन बेगूसराय में तो आपको जिताएंगे."  जयहिन्द !

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शनिवार, 13 अप्रैल 2019

भारत में महाभारत-4



फ्रांस के प्रमुख दैनिक समाचार पत्र ले मोंडे’ के अनुसार भारतीय प्रधानमंत्री के 2015 में फ्रांस आगमन के बाद श्री अनिल अंबानी की दूरसंचार कंपनी रिलायंस अटलांटिक फ्लैग फ्रांस फ्रांसीसी कर अधिकारियों ने 151 मिलियन  के बजाय € 7.3 मिलियन के लिए एक समझौता किया। अर्थात श्री अंबानी को फ्रेंच से 143.7 मिलियन फ्रांसीसी डालर की कर छूट मिली। यह छूट क्यों मिली और कैसे मिली यह अभी भी रहस्य बना हुआ है।  समाचार ने लिखा कि यह छूट फ्रांस के साथ 36 विमानों के सौदे से जोड़कर देखा जा रहा है। आपको याद होगा कि  अप्रैल 2015 में  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दो दिवसीय पेरिस की यात्रा के दौरान ने 36 राफेल जेट की  सीधी खरीद के लिए एक आश्चर्यजनक घोषणा की थी, जिसकी जानकारी भारतीय अधिकारियों रक्षा मंत्रणालय को नहीं भी थी। यहां यह भी गौर करने की बात है कि भारत सरकार को यह बात जानकारी थी कि नहीं?  और यदि थी तो उसे अबतक देश से छुपाया क्यों गया? भारत के प्रधान सेवक को यह तो बताना ही चाहिये कि जो व्यक्ति किसानों के ऋण पिछले पांच सालों में माफ नहीं कर सका वह अपने मित्र अनिल अंबानी के मामले में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा था?  यह सब महज संयोग तो नहीं हो सकता मोदी जी !

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भारत में महाभारत-3

-शंभू चौधरी-
सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने विज्ञापन और फेक मीडिया और  हजारों फेक आई.डी के सहारे अपनी ब्राण्डिंग  की। इस नये तरीके के प्रचार ने जनता को इतना प्रभावित किया कि पूरे भारत में भाजपा को किसी ने, ना देखा न सुना। सिर्फ मोदी ही मोदी हर जगह छाये रहे।   मोदी के इस व्यावसायिक मोदी ब्रांडिग का उपयोग जिस प्रकार बड़े पूंजीपति घराने किया करते हैं मोदी ने ठीक उसका ही अनुसरण किया । कई व्यापारिक घरानों को लगा कि इस मोदी ब्रांडिग का लाभ सीधे उनको मिलेगा । अच्छे दिन आ जायेगें । वह हुआ भी एक चाय वाले की इस प्रकार ब्राण्डिंग  की गई कि देश को लगा  कि यही चाय वाला ब्रांड सही है। 
आयें विज्ञापन की दुनियों में ‘ब्रांडिंग’ का क्या मतलब है? इसपर एक नजर देते हैं -  ‘ब्रांडिंग’  से तात्पर्य है, आपका ब्रांड यह बताता है कि वे आप जिस उत्पादन को देख व सुन रहें हैं वह विश्वसनीय है और इसकी सेवा को प्राप्त करने में आपको कोई धोखा नहीं होगा । जैसे टाटा का उत्पादन या फिर एसीसी सिमेंट आदि । 
2014 का चुनाव इसी प्रकार मोदी की ब्रांडिंग कर के लड़ा गया था । गुजरात माॅडल को झूठा प्रचार किया गया । करोड़ों रुपये इस ब्रांड को प्रचारित करने में पानी की तरह बहाया गये। चुनाव इतना मंहगा बना दिया कि निष्पक्ष लोकतंत्र की कल्पना ही बेमानी लगने लगी ।   पूरे चुनाव में भाजपा को कोई अता-पता ही नहीं रहा । सिर्फ मोदी-मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा गया इसके चलते भाजपा का स्थायित्व पूर्णतय समाप्त होकर दो व्यक्ति का संगठन बन गया । 
2019 के चुनाव में इस ब्रांडिंग का असर साफ दिखने लगा। शिवसेना, अगप जो चुनाव से पूर्व मोदी को खुल तौर चुनौती दे रही थी, शिवसेना तो शेर से चूहा बनकर रह गई और असम में असम गण परिषद गिदर बनकर पुनः भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया । इस मोदी ब्रांडिंग के चक्कर में शिवसेना ने अपना अस्तितित्व ही दाव पर लगा दिया ।  सब खुले तौर पर कहने लगे कि शिवसेना अब समाप्ति के कगार पर आ खड़ी हैं इसके नेताओं में सिर्फ गिदरभभ्की के और कुछ नहीं बचा । वहीं असम में अगप के नेताओं की घ्ज्ञिग्गी बिल्ली बन चुकी है नागरिकता संशोधन बील, लोकसभा में दो सीट भीख में मिल गई इन बेचारों को।
दूसरी तरफ अडवानी खेमे को एक प्रकार से किनारे लगा दिया गया । एक प्रकार से देखा जाए तो भाजपा अब एक राजनीति संगठन ना रह कर व्यापारिक संगठन बन चुकी है जिसमें मोदी इसके ब्रांड का काम कर रहें हैं।
इस ब्रांड राजनीति का एक सबसे बड़ा खतरा यह भी है कि खुदा न ख़स्ता इस मोदी नामक ब्रांड में कोई राजनीतिक हमला हो गया जैसे राफेल की खरीदारी को लेकर या नोट बंदी को लेकर तो पूरी भापजा का जहाज बीच समुद्र में ही डूब जायेगा । तब ऊपर से कोई राम ही अवतरित होकर भाजपा को बचा पायेगा । 
इस ब्रांड में स्थायित्व नहीं है क्यों कि 2014 में किये सारे वादे झूठे निकले।  2019 इस ब्रांड की लेबलिंग चाय वाला से बदल कर इसे चौकीदार बना दिया गया । जो विज्ञापन जगत में एक उत्पादन की असफलताओं को छुपाने का प्रयास माना जाता है।  मोदी भक्तों को या आभास हो चुका था कि उनका ब्रांड बाजार में फेल हो चुका है इसके लिये उन्होंने दस नये रास्ते चुने कि कैसे 2019 के चुनाव में सफलता पाई जाए? जो इस प्रकार है।
1. "अच्छे दिन आयेंगे" चुनाव में कोई नेता ना उछाले ताकि विपक्ष को हमला करने को मौका  मिले। 
2. राफेल सौदे पर या सरकार के कामकाज पर कोई बात न हो । 
3. विपक्ष खास कर कांग्रेस पर हमला और तेज कर दिया जाए।
4. हिन्दूत्व, देशभक्ति और देश की सुरक्षा को जम कर भूनाया जाए।
5. नोटबंदी या जीएसटी की बात कोई न करे।
6. महागठबंधन को बदनाम किया जाए ।
7. विपक्षी नेताओं को मुद्दों से भटकाकर रखा जाए ।
8. प्रतिपक्ष के कुछ दलाल नेताओ से ऊल-जलुल बुलवाकर, गोदी मीडिया के सहारे उनके वक्तव्यों पर जनता को गुमराह किया जाए ।
9. जनता को चुनाव तक मोदी कार्यकाल की विफलताओं पर सोचने का कोई भी अवसर ना दिया जाए।
10. भाजपा के तमाम बड़े नेताओं को किनारे लगाकर मोदी  ब्रांड  को और अधिक मजबूत किया जाए।
इस प्रकार हम देखते हैं कि 2019 का चुनाव एक प्रकार विपक्ष की विफलता ही मानी जाऐगी क्योंकि विपक्ष एकतरफ सीटों के तालमेल में जहां रणनीति को बनाने में पूरी तरह से असफल रहा वहीं मोदी ब्रांड के मुकाबले दूसरा कोई नया ब्रांड प्रस्तुत करने में भी असफल रहा है। भाजपा के सबसे बड़े हिन्दी भासी गढ़  (उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, छत्तिसगढ़ और बिहार) में कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष रणनीति बनाने में पूर्णतय असफल हो चुकी है । ऐसे में एक तरफ कमजोर होती विपक्ष और दूसरी तरफ मजबूत रणनीतिकार जो अपने घोर विरोधी शिवसेना को पुनः साथ में लेकर चुनाव में आ गई । ऐसे में हम भले जितना भी लोकतंत्र-लोकतंत्र-लोकतंत्र करते रहें परिणाम मोदी के पक्ष में साफ दिखाई देने लगे हैं । जयहिन्द ।

भारत में महाभारत-2


शंभु चौधरी, 15/04/2019 
पाकिस्तानी की तरह ही सन् 2014 के बाद भारत में भी इसी तरह हिन्दूत्व कट्टरवाद विचारधाराओं को काफी बल मिला है। राष्ट्रवाद के नाम पर देश में भय का एक नया वातावरण पैदा किया गया, मोदी से असहमत होने वाले व्यक्ति को देशद्रोही बना देना उनकी मां-बहनों को खुलेआम गाली देना, किसी विशेष धर्म का नाम लेकर अन्य धर्म के लोगों में तनाव पैदा करना । एनआरसी व भारतीय नागरिकता के नाम पर किसी एक धर्म वर्ग के लोगों को पनाह देना तो दूसरों को भयभीत करना, यह सभी बातें ना तो संध की  विचारधाओं में है ना ही भारत के संविधान में । 
           भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है  कि  ‘‘हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा, उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढाने के लिए,दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’
           अर्थात भारत को प्रभुत्व संपन्न (किसी अन्य सत्ता के अधीन न हो), समाजवाद (अर्थात सबको बराबरी का हक मिले) के मार्ग पर चलते हुए पंथनिरपेक्ष (अर्थात धार्मिक विचारधारों से ऊपर उठकर) लोकतंत्रात्मक गणराज्य यानि कि जनता के द्वारा चुनी गई सरकार का प्रतिनिधित्व को स्वीकार करना । जिसमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीति, धार्मिक विचारधाराओं की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति (मर्यादा में रहते हुए बोलने) की आजादी, अपने धर्म के अनुकूल उपासना करने व शिक्षा प्राप्त करने, स्वतंत्र रूप से व्यापार करने, धन अर्जित करने व व्यव करने की आजादी प्राप्त है। जिसमें हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, मुसलमान और क्रिश्चन सभी धर्म के लोगों की सहभागिता हेतु संकल्प को दोहराया गया है । स्पष्ट है कि भारत दुनिया के उन महान देशों में एक है जिसमें कई धर्मों का समावेश तो है ही, हजारों जाति, उप-जाति, आदिवासी-जनजाति, मजदूर, किसान, जवान और वैष्य समाज सबका इसमें योगदान है। किसी एक अंग को भी इससे अलग नहीं किया जा सकता ।
           भारत का अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता कि वह किसी एक व्यक्ति के लिये ही बना हो या किसी एक राजनीति दल के लिये या किसी एक धर्म के लिए। यदि किसी एक व्यक्ति या धर्म का पक्षधर हो कर बात करना संविधान की मर्यादाओं की सीमाओं को पार करना है या इसकी (संविधान की) हत्या करना जैसा होगा, जैसे गांधी जी की हत्या नाथूराम गोडसे के द्वारा की गई थी । यहां यह भी समझना होगा कि गांधी जी कि हत्या के पीछे मुख्य वजह थी विचारधाराओं का टकराव । गोडसे कट्टर हिन्दू विचारधारा का परिणाम था परन्तु गांधी जी मुसलमान नहीं थे ।  वहीं स्व. इंदिरा गांधी या राजीव गांधी की हत्या किसी मुसलमान ने नहीं की थी ना ही किसी रूप से इन तीनों हत्यओं के पीछे मुस्लीम धर्म को किसी भी रूप में  दोषी ठहराया जा सकता है। स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों की हत्या में मुसलमाना कहां था? वहीं गोधरा कांड के पश्चात मुसलमानों की खुलेआम हत्या किसके शह पर की गई यह सब प्रमाणित है। चन्द लोगों के अपराध की सजा पूरे समाज को दिये जाना वह भी उनकी  हत्या कर के कहां तक ऊचित है?
           इससे पहले कि हम भारत की बात करें हम पाकिस्तान की हालात पर एक चर्चा कर लेते हैं । हम सभी इस बात से भलीभांति परिचित है कि पाकिस्तान अपनी इस्लामिक छवि को बनाये रखने के बावजूद वह बंग्लादेश को गवां बैठा सिर्फ भाषा के अंतर को वह (पाकिस्तान)  नहीं समझ सका । अर्थात धर्म से देश को जोड़ा नहीं जा सकता। पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरवादिता ने पाकिस्तान को अंदर और बाहर या यूं कह ले कि पूरे विश्व में आतंकवाद का पर्यावाची बना दिया । आज भारत सहित दुनियाभर में फैले आतंकवाद के केन्द्र में पाकिस्तान की प्रमुख भूमिका को नकारा नहीं जा सकता । तो क्या आज हम यानि की भारत भी उसी दिशा में बढ़ रहा है जिस पर पाकिस्तान चल रहा है?  
           पाकिस्तानी की तरह ही सन् 2014 के बाद भारत में भी इसी तरह हिन्दूत्व कट्टरवाद विचारधाराओं को काफी बल मिला है। राष्ट्रवाद के नाम पर देश में भय का एक नया वातावरण पैदा किया गया, मोदी से असहमत होने वाले व्यक्ति को देशद्रोही बना देना उनकी मां-बहनों को खुलेआम गाली देना, किसी विशेष धर्म का नाम लेकर अन्य धर्म के लोगों में तनाव पैदा करना । एनआरसी व भारतीय नागरिकता के नाम पर किसी एक धर्म वर्ग के लोगों को पनाह देना तो दूसरों को भयभीत करना, यह सभी बातें ना तो संध की  विचारधाओं में है ना ही भारत के संविधान में । 
           आज भारत को भी पाकिस्तान के उन्हीं रास्तों पर ले जाने का कुप्रयास किया जा रहा ह जिसके चलते पाकिस्तान आज पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका है। आज जिस प्रकार भारत में भी कहीं भाषा के आधार पर, कहीं धर्म के आधार पर बांटे जाने का प्रयास चल रहा है किसी नये खतरे को संकेत है। यह सब देश को जोड़ने के नाम पर देश को तोड़ने व नये रूप के आतंकवाद का जन्म है। आनेवाले दिनों में जिसे दुनिया में संभवतः ‘‘हिन्दू आतंकवाद’’ के नाम से जानेगा। आर.एस.एस (संघ) को अब यह सोचना होगा कि जिस गोडसे ने उनकी सदस्यता छोड़ दी थी पर गांधी जी की हत्या उसी ने ही की थी यह सच्चाई है।  इस बात से तो  संघ इंकार नहीं कर सकता।  संघ को अब यह भी सोचना होगा कि क्या भारत के इसी निर्माण की कल्पना उनके के विचारधारा का हिस्सा है जैसा मोदी और शाह की जोड़ी सोच रहे हैं या नहीं? आदरणीय मोहन भागवत के उस बयान जिसमें वे प्रतिपक्ष को भी देश निर्माण में उसकी भूमिका को इंकार नहीं करते तो वहीं आडवाणी जी के ताजा बयान जिसमें किसी के विचारधारा से सहमत ना होने पर उसे देशद्रोही कहना कहाँ तक उचित है? 
आगे पढ़ें - आज देश में गोदी मीडिया के द्वारा एक नया महाभारत लिखा जा रहा है जो भारत के संविधान, न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र से भी ऊपर है। जयहिन्द !
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गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

भारत में महाभारत-1


शंभु चौधरी 11/04/2019: 
17वीं लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण में चुनाव आयोग के अनुसार छिटपुट घटनाओं को छोड़कर मतदान शांतिपूर्ण रहा 20 राज्यों के 91 सीटों पर पहले दौर का मतदान आज हुआ जिसमें कई जगह ईवीएम मेशीनों में खराबी पाये जाने की सूचना भी समय-समय पर आती रही बंगाल की दो सीटों के लिये सबसे अधिक मत  81 प्रतिशत पड़े जबकि बिहार में चार सीटों के लिये सबसे कम महज 50 प्रतिशत ही मतदान हुआ आज के चुनाव में 1.7 लाख पोलिंग स्टेशन पर हुआ मतदान हुआ जिसमें 1239 उम्मीदवारों के भाग्य ईवीएम में बंद हो गया  मतदान में महिलाओं भागीदारी अच्छी बताई गई। अब दूसरे चरण का मतदान 18 अप्रैल को होना है।

REVIEW PETITION (CRIMINAL) NO. 46 OF 2019
आज के मतदान से ठीक एक दिन पूर्व देश की उच्चतम न्यायालय ने राफेल के मामले में हिन्दू में छपे सभी दस्तावेजों को स्वीकार करते हुए साथ ही यह भी कह दिया कि पिछले दिनों बंद लिफाफे को भी खुली अदालत में सार्वजनिक कर दिया जायेगा इसका अर्थ साफ हो गया कि मोदी सरकार ने बंद लिफाफे के सहारे जो क्लिन चिट पाई थी वह फैसला इस नये निर्णय के साथ ही शून्य हो गया और सरकार को अब वे सभी कागजात उच्चतम न्यायालय के सामने रखना पड़ेगा जो वह संसद से लेकर अदालत से, छुपाने का प्रयास कर रही थी। इतनी निडर सरकार तो पहले कभी नहीं देखी जो अपने पापों का भंडाफोड़ हो जाने के वाबजूद भी निर्भिक होकर बेशर्म होकर सेना की बलिदानी पर वोट मांग रही है।

माननीय उच्चतम न्यायालय ने माना कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 19(1 )  के अधिन आता है जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस का स्वतंत्रता का है। कोर्ट ने माना कि सरकरी पक्ष जिस संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में उल्लेख कर रही है उसमें ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि सरकार के अपराधों की जांच करना भी राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आयेगा सर्वोच्च अदालत ने AIR 1950 SC 124,  AIR 1950 SC 129  and  1985(1) SCC 641 का  जिक्र करते हुए माना कि देखें --[*1994 (2) SCC 434 Printers (Mysore) Limited  vs. Assistant Commercial Tax ]  अदालत ने अपने फैसले में स्वीकार किया कि भारतीय प्रेस का देश के लोकतंत्र को मजबूत करने में बहुत बड़ा योगदान रहा है।  कोर्ट ने (Indian Express Newspapers (Bombay) Private Ltd. And Others v. Union of India 1985 (1) SCC 641)का भी उदाहरण प्रस्तुत करते हुए प्रेस की अभिव्यक्ति को भारतीय लोकतंत्र की पूंजी माना है।  उच्चतम न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करते हुए राफेल के सौदे में हुए भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के अंर्तगत सुनवाई को ऊचित मानते हुए सरकार के उस धमकी भरे आवेदन को सिरे से खारिज करते हुए कहा भ्रष्टाचार की जांच करना ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न नहीं है।  
आज जहां देश की तमाम प्रेस मीडिया जहां डर के साये में जी रही है कि पता नहीं कब उनके ऊपर  भी कहीं 5000 करोड़ का मनाहानि का मामला तो न कर दिया जायेगा, ऐसे में हिन्दू  अखबार उनके वरिष्ठ पत्रकार एन.राम ने प्रेस की आजादी को नई रोशनी प्रदान की है।  जयहिन्द !
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