रविवार, 10 नवंबर 2013

मेरे पास 1000टन सोना है - शम्भु चौधरी

यदि इस संपदा से होने वाली आय को पिछले 60 सालों में जमा किया जाता तो आज डालर का मूल्य एक रु के बदले 2 डालर या 5 डालर हो सकता था। आज भी इस प्रयोग को हम अपना सकते हैं। सिर्फ इस प्रयोग से ही देश की अर्थ व्यवस्था में रोजना का परिवर्तन हमें देखने को मिल सकता है। परन्तु हमारी लाचारी यह है कि हमने खनीज संपदा को ना सिर्फ खुद की तिजौरी भरने का माघ्यम बना दिया है, सरकारी खर्चों को पूरा करने व राज्यों को लूटने के काम में लगा दिया है।

मेरे पास 1000टन सोना है जो भारत मां की सेवा में अर्पित करना चाहता हूँ। कल रात जब संत श्री शोभन सरकार के सपने की बात को पढ़ रहा था तभी मुझे लगा कि देश में अपार संपदा भरा हुआ हैं और हम जमीन के तह में खजाने की खोज में लगे हैं।

1. हमारे पास अपार खनीज संपदा है। 2. हमारे पास 9 रत्न सरकारी उद्योग लगे हुए हैं। 3. हमारे पास कृषि योग्य भूमि का अपार भंडार है। 4. हमारे मंदिरों में खजानों का भंडार भरा पड़ा है। 5. हमारे पास 125 करोड़ जनसमूह की अदभूत क्षमता है।

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -1

आज हम भारत की अर्थ व्यवस्था व अन्य विकसित देशों की अर्थ व्यवस्था पर नजर देगें। जो देश विकसित हैं उनके खान-पान, रहन-सहन अलग हो सकते हैं पर रोटी तो रोटी ही होती है। जिसका मूल्य लगभग सभी देशों में एक ही होना चाहिए। रोटी बनाने के तरिके भले ही अलग हो सकते हैं, खाने का तरीका तो एक ही होगा। इसी प्रकार पहनने, नहाने-धोने के सामान व अन्य जरूरी वस्तुएं सिर्फ दवाओं व इलेक्ट्रोनिक समानों की बात छोड़ दें तो हमारे और उनके रोजाना ईस्तमाल की वस्तुएं प्रायः एक जैसी है। उन देशों के क्षेत्रफल और जनसंख्या का अनुपात भी हमारे देश से कम ही है। भारत में जहां क्षे़त्रफल अधिक है और काम करने वालों की संख्या भी अधिक है तो इस देश की मुद्रा इतनी कमजोर कैसे? उन देशों का रूपया इतना मजबूत क्यों यह सवाल उठाना जरूरी हो जाता है। अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत है कि आमदनी या संपत्ति और खर्च या कर्ज जिस तरह हमारे जीवन के तराजू हैं जो हमारे स्वास्थ का दर्शाता ही नहीं वह यह भी बताता है कि उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति कितनी कमजोर या मजबूत है। सिर्फ सोना के संकलन से ही उस व्यक्ति के स्वास्थ का आंकलन नहीं किया जा सकता। उसकी कूल सकल आय या बचत, जमीन-जायदाद/ शिक्षा आदि सभी का आंकलन जरूरी होता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ सोना ही जमा कर ले और उसका हेल्थ खराब रहे व उसे सोना देने से भी अनाज खाने को ना मिले तो उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होते हुए भी उसके किसी काम की नहीं हो सकती और उसके सोने का मूल्य नहीं लगाया जा सकता। भारत में राजा मिडास की एक कहानी काभी प्रचलित रही है। इस कहानी से वर्तमान अर्थशास्त्र को समझाने में हमें मदद मिलेगी।

राजा मिडास की कहानी आपने जरूर पढ़ी होगी। इस कहानी में राजा को एक वरदान मिला था कि वह जिसे छूएगा वह वस्तु सोने की हो जाएगी। परिणाम स्वरूप वह अपनी बच्ची को भी सोने में बदल डाला। कहानी आज के परिदृष्य पर आर्थिक जगत के लालच का दर्शनशास्त्र है। पीने का ग्लास, पानी भी सोने में बदल गया। राजा मिडास को बहुत तेज भूख लग रही थी और सोना खाकर तो कोई पेट नहीं भर सकता था वह!

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -2

भारत की अर्थ व्यवस्था को समझने के लिए हमें कुछ बुनियादी बातों की तरफ भी अपना ध्यान देना होगा। हम अपने घरों में सबसे अच्छा सामान लाना चाहते हैं, खाना चाहते हैं परंतु बनाने और बेचने के नाम पर जब बात अच्छे की आती है तब मुनाफा हमारे सामने खड़ा होकर हमें चोर बना डालती है। जिसका परिणाम. यहीं से हमारी मुद्रा कमजोर होना शुरू कर देती है। किसी समान का निर्माण सस्ता हो गलत नहीं है पर खराब माल बनाकर उसे अच्छा बोलना गलत है। आज चीन दुनिया भर में सस्ते सामान बना कर जो शोहरत और प्रतिष्टा प्राप्त की है वह एक उदाहरण के तौर पर हमें देखना चाहिए। माल बनाने वाला बोलकर बेचता है माल की कोई गारण्टी नहीं है, लेने वाला, बेचने वाला, ट्रेडर, सरकार सब इस बात को जानते हैं कि चाइना का माल किसी भी समय खराब हो सकता है। अच्छी बात है। जो है, स्पष्ट है। एक बच्चे को हमें अभी खुश करना है इसके लिए महत्व उस समय सस्ता या मंहगा का नहीं है बच्चे को मात्र एक खिलौना देकर चुप कराया जा सकता है। इस समय की उपयोगिता उसके सामान पर है ना कि उसके मूल्य या वह कितना चलेगा पर। इसी प्रकार इस उपयोगिता को हम निम्न हिस्से में देखें। 1. पहली उपयोगिता वह होती है जहां वस्तु के मूल्य को न देखते ह्रए कि वह सस्ता है या मंहगा हमें लेना ही पड़ता है। जैसे दवा, पानी, आटा, दाल, चावल। 2. दूसरी उपयोगिता वह है जो हमें झणीक सुख के लिए लेना होता है। जैसे गहने, जवहरात, सुंदर बनने के प्रशाधन आदि...आदि । 3. तीसरी उपयोगिता होती है कि हम भविष्य के लिए कोई सामान लेते या निर्माण करतें हैं। जैसे घर के सामान, पुनः गहने, घर बनाना इत्यादि। इसी प्रकार उपयोगिता की एक लंबी सूची तैयार की जा सकती है।

अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत -3

हमने पहले भाग में पढ़ा था कि हमारे पास खनिज संपदा का अपार भंडार है। लोहा, कोयला, पानी, अबरख, पथ्थर, बालू, चूना, मारबल, समुद्री तल,तेल के कूएं, लाखों जल क्षेत्र व तालाब इत्यादि । जो हमें हर वक्त धन देते रहते हैं इसके बदले में उनको कोई शुल्क जमा नहीं देना पड़ता है। सरकार सिर्फ इन स्त्रोतों से होने वाले आय को ही सरकारी खजाने में जमा कर दे तो यह कंगाल देश पलकों में धनवान हो सकता है। परन्तु हम इस संपदा को हर तरफ से नोचने, लूटने में लगे हैं। जो उत्पादन इन स्त्रोतों से हो रहा है उसका धन या तो नेताओं की तिजौरी में चला जाता है या विदेशी खातों में जमा हो जाता है। देश के एक-दो नहीं प्रायः तमाम उद्योगपति इस संपदा का लाभ लेने से नहीं चुकते। हर तरफ लूट मची है। सब मिलकर अपनी तिजौरी भरने में लगें हैं। यदि इस संपदा से होने वाली आय को पिछले 60 सालों में जमा किया जाता तो आज डालर का मूल्य एक रु के बदले 2 डालर या 5 डालर हो सकता था। आज भी इस प्रयोग को हम अपना सकते हैं। सिर्फ इस प्रयोग से ही देश की अर्थ व्यवस्था में रोजना का परिवर्तन हमें देखने को मिल सकता है। परन्तु हमारी लाचारी यह है कि हमने खनीज संपदा को ना सिर्फ खुद की तिजौरी भरने का माघ्यम बना दिया है, सरकारी खर्चों को पूरा करने व राज्यों को लूटने के काम में लगा दिया है। बड़े-बड़े सरकारी पद सृजन कर इन क्षेत्रों को उनकी तनख्वाह बांटने में इन स्त्रोंतों का धन बर्वाद होने लगा दिया है। क्रम जारी....

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