बुधवार, 18 दिसंबर 2013

व्यंग्य: अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त - शम्भु चौधरी

 बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।  कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।   तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। 

वैसे तो मॉर्निंग वॉक के समय हंसी-मजाक को दौर रोजाना चलता ही रहता है, कभी धर्म और राजनीति को लेकर तो कभी महिलाओं से छेड़-छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज, बलात्कार, बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह, स्वास्थ, जीना-मरना आदि आदि।

धीरे-धीरे इन विषयों के वक्ता भी हमारी टीम में जमा हो गए। मुंगेरीलाल रोजना कोई नई बात (समाचार) लाते और व्यायाम के पश्चात शुरु हो जाती बहस की परम्परा। कुछ दिनों से मुंगेरीलाल बिस्तर पर ही पड़े थे लगभग एक सप्ताह हो गया। उनका अन्न-पानी सब छूट सा गया था। वजन भी कम होने लगा था। सबने मिलकर मन बनाया कि क्यों ना आज मुंगेरीलाल के पास ही मिलने को चला जाए। एक ने कुछ नाश्ता के पैकेट खरीद लिये, एक ने दो पैकट दूध ले लिया बोले- ‘‘यार लगा तो काम आ जाएगा नहीं तो घर लेते जाएंगे।’’

घर पंहुते ही एक ने व्यंग्य कसा ‘‘ कैसे हो भाई!! अब तो ‘जल’-‘पानी’ ग्रहण कर लो, लोकपाल बिल पास हो गया है।’’
मानो किसी ने मुंगेरीलाल की दुखती नब्ज को ही छेड़ दिया हो। बोले क्या खाक पास हो गया? अन्ना ने देश के साथ धोखा किया है। सब कुछ पहले से ही तय था यह सब  आप लोगों ने सुना नहीं!! हमलोगों कि तरफ देखते हुए कहने लगे... मेरी तो तबियत खराब चल रही है नहीं तो....

तभी उनको बीच में ही टोकते हुए रामप्रसाद जी बोल पड़े... ‘‘अरे भाई अभी थोड़ा आराम भी कर लो, फिर लिखना जो मन आयें वैसे भी तेरे लिखे को पढ़ते ही कितने लोग हैं? अपने मुंह मियाँ मिठू खुद ही बनते रहो, खुद ही लडू बनाओ और खुद ही खाओ। फिर बात को बदलते हुए ‘‘हम तो बस आपकी सेहत का हाल जानने आ गये, कैसी है अभी आपकी सेहत?’’ पास ही भाभी जी खड़ी थी बोलने लगी - इनको कल ही डाक्टर के पास दिखाने ले गई थी बोले अभी भी थोड़ा बुखार है एक दो दिन में उतर जायेगी। सर्दी-जूकाम लग गई थी।’’

सीताराम जी को पिछले रात की घटना याद थी भाभी जी को बीच में ही रोकते हुए बोल - ‘‘ वह तो लगनी ही थी, अब भला कोई सुबह चार बजे ही इस ठंडी के समय घर से बहार किसी से लड़ने निकल जाए तो सर्दी नहीं लगेगी तो और क्या लगेगी?’’

तभी भाभी ने वैहिचक होते हुए हमारे हाथ से नाश्ते का पैकेट लेते हुए बोली- ‘‘इनसब की क्या जरूरत थी! थोड़ी सकुचाती हुई बोली दूध तो अभी आने ही वाला है...’’ तभी रामप्रसाद ने बात को संभालते हुए बोले ‘‘नहीं भाभीजी हमारे मॉर्निंग वॉकर क्लब का यह नियम ही है कि सुबह किसी से मिलने जाना हो तो वहां भी हमें अपना नाश्ता और चाय पीनी हो तो दूध साथ ही ले जाना होगा। बस आप तो इसमें अपना प्यार मिला कर हमें परोस दिजिए’’

भाभी मुसकराती हुई नाश्ते के पैकेट लेकर भीतर जाते-जाते एक तीर चला गई - हां!! हां!! अभी लाती हूँ थोड़ी इनको भी अक्ल दे देते कि कैसे बात संभाली जाती है’’ और भीतर चली गई।

तभी ने एक ने मुंगेरलाल के हालचाल पूछने के लिये पुनः उसकी दुखती नब्ज को सहलाया ‘‘तो आपने अनाज क्यों छोड़ दिया?’’ हमने तो सुना कि आप भी अन्ना के साथ अनशन में बैठे हो।

अब मुंगेरीलाल का पारा सातवें आसमान को छूने लगा। बोले- ‘‘ अरे यार मेरा अन्ना से कोई लेना-देना नहीं ना ही मेरी इस बीमारी से उनके लोकपाल बिल का कोई संबंध है। हां! एक पत्रकार के हैसियत से मैं उस आदमी की जरूर खबर लूंगा।

‘‘क्यों? क्या कर दिया अन्ना ने बीच में ही रामप्रसाद जी ने उन्हें रोकते हुए पूछ डाला।’’

क्या किया? अब मुंगेरीलाल आपे से बहार हो गया था। उसका पूरा चेहरा लाल तपतपाने लगा। ये लोग सब मिलकर संसद को ड्रामा मंच बना दिये हैं लगता ही नहीं कि कोई देश चला रहा है। सारे बिल ऐसे पास हो रहे हैं कि  जैसे मनमोहन मुद्रा में पूरी संसद सोई हुई हो ... बिल्ली जैसी आंख से टूकूर-टूकूर देखता है बोलता ऐसे है जैसे कोई दैहाती औरत अपने पति के सामने घीघीयाती हो।
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
 तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
फिर थोड़ा रुककर सोचते हुए। दिल्ली चुनाव में भाजपा की भी सांस फूलने लगी। इनको लगा कि ये केजरीवाल ने कांग्रेस पार्टी का जो हर्ष दिल्ली में किया कहीं दोनो राजनीति पार्टियों की भी बैंड ना बजा दे?

बस अन्ना के दो दलाल (नाम नहीं लिया) पर इशारा काफी था को इस काम में लगा दिया। उधर अन्ना को इस बात के लिए मना लिया कि वह जनता का ध्यान बंटाने में कांग्रेस की मदद करे और कांग्रेस उनके बिल को संसद में पास कर देगी। बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।

कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।  

तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। कह दिया ने ‘‘अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त‘‘ जब तक कि हमारी बात समाप्त होती चाय-नाश्ता आ गया था।  

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