शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

वाममोर्चा का ‘‘सांप्रदायिक-सेक्युलरवाद’’ - शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी देश में "सेक्युलर-सांप्रदायिकता" की राजनीति शुरु से ही करती रही है परन्तु चूंकि इस बार दिल्ली में कांग्रेस की हालत ना सिर्फ पतली होती जा रही है वाममोर्चा कभी भी यह खतरा नहीं उठाना चाहेंगी कि वह भी कहीं कांग्रेस पार्टी के चक्कर में जनता के आक्रोश का शिकार ना बन जाए। तब बंगाल में उनको सीट कहां से मिलेगी?

जो वाममोर्चा लगातार 35 सालों से बंगाल में एक छत्र राज किया कई बार काँग्रेसी बैशाखी के सहारे लंगड़ाती हुई चली, दिल्ली में कांग्रेस को सहारा देती, तो कभी लतियाती रहती। बंगाल में ठीक चुनाव के समय या यूँ कह लें चुनाव के ठीक एक वर्ष पूर्व से ही वाममोर्चा के नेतागण कांग्रेस पार्टी को पानी पी-पी कर कोसते नजर आते और चुनाव में टिकट बांटते समय फ्रेंडली चुनाव लड़कर दिल्ली में उनकी सरकार बनाने में मदद करते रहें है। जिसमें सिर्फ एक चुनाव में माकपा ने जयप्रकाश आंदोलन के समय जनता पार्टी जिसमें आज की भाजपा (जनसंघ) भी शामिल थी के साथ कई सालों भात-दाल खाया था।

पिछले लोकसभा चुनाव 2009 के ठीक पूर्व भी वाममोर्चा ने इसका प्रयोग जारी रखा पर उस बार यह प्रयोग इनको भारी पड़ गया । कांग्रेस पार्टी ने पलटवार करते हुए बंगाल की शेरनी तृणमूल नेत्री जो लगातार वाममोर्चा के विरूद्ध अपनी आवाज उठाती रही थी का साथ दे दिया। लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा से भी वाममोर्चा के परचे-परचे उखड कर गाड़ी का टायर सड़क पर ही पौं बोल गया।

विधानसभा का चुनाव हो या म्यूनिसिपल व पंचायत का चुनावों में सब जगह वाममोर्चा की लाल तानाशाही ने दम तोड़ दिया। पिछले 35 सालों में बंगाल को कंगाली के हालात में पंहुचा देने वाली माकपा जिसने ना सिर्फ बंगाल को कर्ज में गले तक डुबो दिया। हवड़ा के सरकारी अस्पताल में पिछले 30 सालों तक एक ऐम्बूलेंस तक खरीद कर नहीं दे सकी। सारा का सारा सांसद निधि, विधायक निधि तक को डकार जाती रही वाममोर्चा की सरकार अब एक नया राग अलापने में लगी है। ‘सेक्लुलरवाद’

इनका सेक्युलरवाद क्या है?

बंगाल में तृणमूल की सरकार व इस राजनीति दल के साथ इस वाममोर्चा कभी भी किसी भी हालात में एक साथ खड़ी नहीं हो सकती कारण स्पष्ट है जिस वाममोर्चा को जड़ से उखाड़ने का प्रण ममता बनर्जी ने ले रखा तब उसका क्या होगा? कांग्रेस पार्टी देश में "सेक्युलर-सांप्रदायिकता" की राजनीति शुरु से ही करती रही है परन्तु चूंकि इस बार दिल्ली में कांग्रेस की हालत ना सिर्फ पतली होती जा रही है वाममोर्चा कभी भी यह खतरा नहीं उठाना चाहेंगी कि वह भी कहीं कांग्रेस पार्टी के चक्कर में जनता के आक्रोश का शिकार ना बन जाए। तब बंगाल में उनको सीट कहां से मिलेगी?

वाममोर्चा बंगाल में अपना दम-खम पहले ही समाप्त कर चुका है बंगाल में अब ज्योति बसु और सुभाष चक्रवर्ती सरिके नेता नहीं रहे। रही-सही कसर इन लोगों बंगाल के वरिष्ठ माकपा नेता श्री सोमनाथ चटर्जी को संगठन से अलग कर माकपा महासचिव श्री प्रकाश करात के अहंकार पर मोहर जड़ दी। आज माकपा दिल्ली का ख़्वाब देखने में लगी है। सोचती है सेक्युलरवाद का सहारा ही ले लिया जाए? इसमें बुराई ही क्या है। सब राजनीति दल जब यही कह रहें तो वाममोर्चा भी उनके सूर में सूर मिला दें तो हर्ज ही क्या है।

मैं इनसे ही जानना चाहता हूँ वामपंथी विचारधारा के किस विचारधारा को यह नेतृत्व करती हैं, धर्म आधारित विचारधारा को या कुछ और ? अफसोस की बात है कि इनका बैचारिक दिवालिपन तो बहुत पहले ही निकल चुका था। अब इनका मानसिक दिवालियापन निकलना बाकी है। खैर यह भारत की राजनीति ही है जहां माकपा के नेता समझते हैं कि देश की जनता अनपढ़ है और खुद को विद्वान समझते हैं। इनके ‘‘सांप्रदायिक-सेक्युलरवाद’’ की जनता इस बार के लोकसभा चुनाव में जमकर पिटाई करेगी। लूट-लूट कर देश को जर्जर अवस्था में पंहुचा देने राजनीतिज्ञों के द्वारा अब सेक्युलरवाद का सहारा लेना देश की जनता को खलने लगा है।


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