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सोमवार, 16 सितंबर 2013

गन्ने के खेत में वोट की खेती - शम्भु चौधरी

हे सूर्य ! जब-जब तेरा प्रताप डगमगाएगा,
दीपक की एक लौ से भी, अंधेरा मिट जायेगा ।
जिनको गुमान है सत्ता का, शाम ढलते ही डूब जायेगा ।

कहावत भी है कि ‘‘रोपे पेड़ बबुल के आम कहां से होय’’ हमलोग जैसा रोपेगें, सोचेगें वैसी ही फसल हमें काटने को मिलेगी । 27 अगस्त’ 13 की मामूली सी एक घटना ने सत्तारूढ़ दल के अहांकार को चूर-चूर कर रख दिया । वोट बैंक की राजनीति इनको इतनी मंहगी पड़ी की, जिसकी भरपाई करते-करते, कीमत चुकाते-चुकाते अखिलेश सरकार के दम फूलने लगे, फिर भी वे दंगे को रोकने में सफल नहीं हो सके ।

मुज़फ़्फ़रनगर कवाल गांव की घटना ना सिर्फ एक दुर्भाग्यजनक व दुखद घटना है । इस घटना ने सेकुलरवादी सत्तारूढ़ दल के चेहरे को बेनकाब कर दिया है । राजधर्म की दुहाई देने वाले सेकुलरवादी ताकतों को नंगा कर दिया । इसके लिए जिम्मेदार हम ही हैं । कहावत भी है कि ‘‘रोपे पेड़ बबुल के आम कहां से होय’’ हमलोग जैसा रोपेगें, सोचेगें वैसी ही फसल हमें काटने को मिलेगी । 27 अगस्त’ 13 की मामूली सी एक घटना ने सत्तारूढ़ दल के अहांकार को चूर-चूर कर रख दिया । वोट बैंक की राजनीति इनको इतनी मंहगी पड़ी की, जिसकी भरपाई करते-करते, कीमत चुकाते-चुकाते अखिलेश सरकार के दम फूलने लगे, फिर भी वे दंगे को रोकने में सफल नहीं हो सके । सेकुलरवाद की राजनीति करने वाले आजाम खान, कादिर राणा, सईद उर जमां, रासिद सिद्दकी, हरेन्द्र मलिक, राज्यपाल बाल्यान और राकेश टिकैत और सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले हुकुम सिंह, भारतेन्दु, संगीत सोम और साध्वी प्राची । सबके मुह में जहर भरा था, हर कोई खेत में लहलहाती गन्ने की फसल को काटने में लगा था, तो कोई इसमें आग लगाने में । किसी ने भी इस आग को रोकने की जिम्मेदारी नहीं निभाई ।

सत्ताधारी दल के सेकुलरवादी नेताओं ने जहर के बीज इस कदर रोपे की उसमें से सौंप ही सौंप निकलने लगे । मात्र सात दिनों में यह फसल मुज़फ़्फ़रनगर के आस-पास के गांवों में बलखाने लगी । सत्ता के नशे में चूर सेकुलरवादी नेताओं ने मामूली सी छेड़छाड़ की घटना को इतान जवान कर दिया कि देखते ही देखते वहाँ सेना को बुलानी पड़ी । जबतक एक समुदाय पर जुल्म ढहाया जाता रहा, उनके परिवारों व गांव के लोगों पर झूठे मामले गढ़ कर कवाल गांव के सैकड़ों अपराधियों को बचाने का प्रयास किया जाता रहा सबकुछ ठीक था । एक तरफ खालापुर में पंचायत कर लोगों जहन में ज़हर के बीज रोपे जा रहे थे ता दूसरी तरफ शाम को महापंचायत से लौटते निहते लोगों को घात लगा-लगा कर मारा गया, कई ट्रेक्टरों को आग के हवाले कर दिया गया कई लोगों को जान गंवा देनी पड़ी या वे घायल हो गए । जबतक सेकुलरवाद का ख़ौफ़ सर चढ़कर बोलता रहा और एक विशेष समुदाय के लोग मारे जाते रहे तब तक सरकार को कुछ भी पता नहीं चला कि उनकी नाक के नीचे क्या सब चल रहा है । चारों तरफ हा-हाकार की गुंज होने लगी । सुरक्षा के अभाव में मामला उलटा पड़ने लगा तब जाकर केन्द्र और राज्य सरकार हरकत में आई और तत्काल सेना को बुलाया गया । परिणाम सामने है । गन्ने के खेत में वोट की खेती, दोनों समुदाय पुस्तों से इस जमीन में गन्ने की खेती करते रहें हैं, अपनी बोली से समाज में मिठृठास घोलते रहें हैं, उनको चंद सियासतदानों ने सेकुलरवाद राजनीति की रोटी सेंकने के लिए उपजाऊ जमीन बना डाली । फसल तो 2014 के आगामी लोकसभा चुनाव में कटेगी । अब दिलचस्प देखना यह होगा कि यह फसल किसके पाले में जायेगी ? जयहिंद !

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सेकुलरिज्म बनाम देश की सुरक्षा - शम्भु चौधरी

देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। जो लोग ऐसा सोचते हैं कि इससे उनको चुनावों में फायदा हो सकता है से भी स्पष्ट हो जाता है कि देश में पकिस्तानियों की संख्या भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बनती जा रही है। अर्थात सेकुलरवादी राजनेता देश की सुरक्षा के सौदागर बन चुके हैं।

जबसे भारतीय संविधान में सेकुलर शब्द को अंकित किया गया है तब से देश के भीतर पाकिस्तानी समर्थकों का मनोबल इतना ऊँचा हो गया है कि देश की सुरक्षा को भी खतरा मंडराने लगा है। पाकिस्तानी समर्थकों से आप जो भी अर्थ लगायें वह आपकी सोच हो सकती है। जहां तक मेरा मानना है कि जो लोग भारतीयता को नहीं स्वीकारते, भारतीय संस्कृति को अपनाने में जिनको अड़चनें आती हों। भारतीय सैनिकों की बलि पर जो लोग संसद के भीतर और बहार देश को गुमराह करते हों, जो लोग पकिस्तानियों को दोष मुक्त करार देने में जरा भी संकोच नहीं करते, भारतीय क्षेत्र में रहकर भारत के विरूद्ध साजिश करने में सहयोग प्रदान करना, आतंकवादियों व उन से जुड़ी घटनाओं की वकालत करना व देश की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ कर उन्हें भारतीय राजनीति का हिस्सा बनाना या बनाने का प्रयास करना यह सभी कारनामे देशद्रोही की श्रेणी में आते हैं। और इसके लिए खुद को सेकुलरवादी बताने वाले लोग ही जिम्मेदार हैं । यही सेकुलरवादी ना सिर्फ आतंकी घटनाओं के लिए देश में जगह-जगह होने वाले दंगों के लिए भी जिम्मेदार हैं।

इन दिनों देश की संसद व विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं में कुछ ऐसे तत्वों की भरमार सी हो चुकी है जो सेकुलरिजम के बहाने देश की सुरक्षा के खिलाफ न सिर्फ सार्वजनिक बयान देते पाये जाते हैं इन लोगों ने देश के सैनिकों के मनोबल को भी कमजोर करने का प्रयास किया है। इन सबके बीच देश का लोकतंत्र तमाशबीन बनकर रह गया। इस बात को लेकर भी हम आश्चर्यचकित हैं कि आखिर में हमारे सेकुलरवादी विचारधारा के झंडावाज नेतागण देश को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। इनका जमीर इस कदर समाप्त हो चुका कि ये लोग सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सुरक्षा तक को भी दाव में लगाने से बाज नहीं आते।

ऐसे नेताओं के विरूद्ध देशद्रोह का मामला बनाया जाना चाहिए जिससे इस तरह के बयानों से जिससे देश की सुरक्षा को खतरा बनता हो पर लगाम लगाया जा सके। देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। इससे उनको चुनावों में किसी विशेष समुदाय के वोटों का फायदा तो हो सकता है परन्तु कालान्तर में यही फायदा देश की संप्रभुता के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। जो लोग ऐसा सोचते हैं उनकी इन हरकतों से उनको या उनके दल का राजनीति फायदा होता है वे लोग देश के इतिहास को उठाकर देख लें कि इसके क्या परिणाम सामने हमें देखने को मिल रहें हैं। जैसे-जैसे सत्ता पर सांप्रदायिक ताकतों का पल्ला मजबूत होता जा रहा है देश में उतने ही तेजी से सांप्रदायिक तनाव फैलता जा रहा है। अब तो कई जगह खुले रूप में देश के विरूद्ध जहर तक उगलने लगे हैं।

यहाँ यह सवाल नहीं है कि किसी संप्रदाय या दल विशेष की बात हो या उनकी नीतियों को दोषी ठहराया जाए। सवाल है कि हम इन मुद्दों को लेकर देश को किस जगह ले जाने का प्रयास कर रहें हैं इससे किसको फायदा होने वाला है। जो लोग भारतीयता को स्वीकार नहीं कर पा रहे उनको हम भारतीय राजनीति में जगह देकर ना सिर्फ खुद को कमजोर करने का प्रयास कर रहें हैं अन्ततः इसका परिणाम सभी राजनैतिक दलों को झेलना पड़ सकता हैं । उस समय आज कि इस राजनीति के परिणाम कितने घातक होगें इसकी कल्पना मात्र से देश की रूह कांप जाऐगी। सभी राजनीति दलों को इस सेकुलरवादी विचारधारा के परिणामों पर ना सिर्फ पुनः सोचने की जरूरत है। भारतीय राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता को प्राप्त करना नहीं, भारतीय संस्कृति की रक्षा भी होना जरूरी है। ताकी सभी धर्म के लोग आपसी भाई-चारे के साथ रह कर अपने-अपने समाज का विकास कर सकें।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

सोमवार, 12 अगस्त 2013

नपुंसक बनता जा रहा धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत- - शम्भु चौधरी

सत्ता को बचाये रखना या सत्ता प्राप्त करने के लिए हम इस तरह के सांप्रदायिक हमलों को कबतक सहते रहेगें? किश्तवाड़ में पाक प्रयोजित इस सांप्रदायिक हमले की हमें एकजुट होकर विरोध करने की जरूरत है ना कि हर बात में गुजरात दंगों या अन्य घटनाओं से जोड़कर उनके मनोबल को मजबूती प्रदान करने की। देश की संसद, देश के सांसदों , राजनेताओं को खुलकर इस घटना का विरोध करना चाहिय। जिसप्रकार ये लोग एकजुट होकर गुजरात पर हमला करते नहीं थकते, काश! यही राजनेताओं के मुंह किश्तवाड़ के सांप्रदायिक हमले की गुंज सुनाई देती तो हम कुछ हद तक उनको धर्मनिरपेक्ष मान लेते, पर इनको देश से ज्यादा बोट बैंक की चिन्ता नजर आती है। तब यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दुओं की सुरक्षा कौन करेगा और जो हिन्दुओं के सुरक्षा की बात करेगा या करना चाहेगा क्या वह सांप्रदायिक बन जायेगा?

किश्तवाड़ में पिछले तीन दिनों जिसप्रकार एक विशेष समुदाय के लोगों को मौत के घाट सुलाया गया। यह इस बात की तरफ हमें सोचने को विवश करता है कि धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनने वाले लोगों की चुप्पी, ऐसा लगता है कि किसी विशेष समुदाय के देशद्रोही व सांप्रदायिक हरकतों के विरूद्ध ना बोलना इनकी लाचारी सी बन गई है। पाकिस्तानी हमारी सीमाओं आकर हमारे सैनिकों को मौत के घाट सुला जाता हैं। और हमारे देश की तथाकथित राजनैतिक पार्टियां कुछ इसप्रकार का सफाई देती नजर आती है कि जैसे वे भारत के नहीं पाकिस्तान की तरफ से बयान दे रहें हों । हर जगह वोटबैंक एक तमाशा हो गया हैं। देश की सुरक्षा से भी अब ये लोग समझौता करने में नहीं हिचकचाते। किस बेशर्मी के साथ संसद में एक ही बयान को तीन-तीन बार देकर देश को गुमराह करने का प्रयास ये किस साजिश का हिस्सा है इनके पीछे कौन से लोग शामिल थे उनके नकाब को उतारना जरूरी हो गया है। मुझे तो इस बात का दर्द हो रहा है देश के पत्रकार व बुद्धिजीवी वर्ग भी अपनी कलम को इस अंधकार में धकेल चुके हैं। मानो देश की सुरक्षा धर्मनिरपेंक्षता के सामने नपुंसक सी बन चुकी है।

आतंकवादी हमारे देश की संसद पर हमला करते हैं हम उनका पक्ष लेते नहीं थकते। पाकिस्तान हमारे जवानों का सर काट ले जाते हैं हम चुपचाप सह लेते हैं। पाकिस्तानी सीमाओं पर रात के अंधरे में हमारे जवानों को भूनकर चले जाते हैं हमारा विदेश व गृह मंत्रालय संयुक्त रूप से पाकिस्तान को बचाने की हरकतें करता है। कुल मिलाकर हमें यह मान लेना होगा कि धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर पाकिस्तानी समर्थकों ने हमारे देश पर एक प्रकार से सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिज्ञ हमला सा कर दिया है। और हम एक दूसरे को नीचा दिखाने में या अपनी सत्ता पर बचाने में लगे हैं।

जब कुछ लोग देश के भीतर हिन्दू सांप्रदायिकता का सवाल उठाते हैं तो उनको मुस्लिम सांप्रदायिकता के विरूद्ध बोलने में किस बात का डर सताता है? सांप्रदायिकता तो दोनों ही है। पर हमारे धर्मनिरपेक्षता के विद्वानों को हिन्दू सांप्रदायिकता से देश के टूटने व सांप्रदायिक दंगों का तो खतरा नजर आता है पर वहीं जब को मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात या देश के विरूद्ध उठती हुई आवाज के तब इन राजनेताओं को देश पर कोई खतरा नहीं मंडराता नजर आता।

इस बात पर एक बात तो माननी ही होगी कि देश का मुसलमान एक साथ है। चुकीं जब ओबामा को पत्र लिखने की बात सामने आती है तो उस पत्र पर देश के अधिकांशतः मुस्लिम सांसदों और विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किये थे। ये संकेत को देश भले ही आज ना भांप पा रहा हो। इसके परिणाम भविष्य में घातक सिद्ध होगें। किसी समुदाय के विरूद्ध हमें नहीं सोचना चाहिये यह बात सही है कि हर समुदाय में अच्छे-बुरे लोग होते हैं पर यहां तो उस जमात का एक बड़ा हिस्सा ही देश के विरूद्ध साजिश में लगा चुका है। पाक प्रायोजित षडयंत्र को हम अनदेखा करते हुए किसी विशेष समुदाय के बोट बैंक पाने या खुद को सत्ता में बनाये रखने के लिए उनका राजनैतिक प्रयोग करना एक प्रकार से देश के साथ गद्दारी देश के संविधान की आड़ में पाक प्रायोजित आतंकवाद को संरक्षण देना है।

सत्ता को बचाये रखना या सत्ता प्राप्त करने के लिए हम इस तरह के सांप्रदायिक हमलों को कबतक सहते रहेगें? किश्तवाड़ में पाक प्रयोजित इस सांप्रदायिक हमले की हमें एकजुट होकर विरोध करने की जरूरत है ना कि हर बात में गुजरात दंगों या अन्य घटनाओं से जोड़कर उनके मनोबल को मजबूती प्रदान करने की। देश की संसद, देश के सांसदों , राजनेताओं को खुलकर इस घटना का विरोध करना चाहिय। जिसप्रकार ये लोग एकजुट होकर गुजरात पर हमला करते नहीं थकते, काश! यही राजनेताओं के मुंह किश्तवाड़ के सांप्रदायिक हमले की गुंज सुनाई देती तो हम कुछ हद तक उनको धर्मनिरपेक्ष मान लेते, पर इनको देश से ज्यादा बोट बैंक की चिन्ता नजर आती है। तब यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दुओं की सुरक्षा कौन करेगा और जो हिन्दुओं के सुरक्षा की बात करेगा या करना चाहेगा क्या वह सांप्रदायिक बन जायेगा?

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

भारतीय धर्मनिरपेक्षता - शम्भु चौधरी

जबतक भारतीय संस्कृति इस देश में कायम रहेगी तभी तक धर्मनिरपेक्षता इस देश में जीवित रह सकेगी, यही अंतिम सत्य है। जो लोग वोट बैंक की राजनीति करते हैं वे वोट बैंक की राजनीति करें पर साथ ही वे इस बात का भी ध्यान रखें कि भारतीय संस्कृति को चोट पंहुचाने वाले तत्वों से सत्ता को कैसे दूर रखा जाए। जो लोग भारतीय संस्कृति को भी नूकसान पंहुचाकर अपनी राजनीति स्वार्थ की पूर्ति में लगे हैं वे लोग कहीं भूल से ही सही भारत की संप्रभूता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे? यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनको सावधान होने की जरूरत है।

पिछले एक दशक से भारत में धर्मनिरपेक्षता को लेकर लोगों के मन में शंकाएं होने लगी है कि जिसप्रकार देश के विभिन्न राजनैतिक दलों में एक विशेष सांप्रदाय के वोट बैंक को लेकर राजनीति की जा रही है कहीं आगे चलकर यही राजनीति देश की संप्रभूता के लिए घातक ना साबित हो जाए। भारतीय संविधान में सभी धर्मावलंबी को समान अधिकार दिया गया है ताकि वे अपने धर्मानुसार अपने धर्म व संस्कृति की रक्षा करते हुए भारतीय भौगोलिक सीमा के अन्दर एक अच्छे नागरिक बनकर अपना जीवन यापन कर सकें। अर्थात जिन लोगों को भारतीय संविधान में विश्वास है उनको भारतीय संस्कृति में भी आस्था रखनी चाहिए चुंकि भारतीय संस्कृति ने जिस धर्मनिरपेक्षता की संरचना की है यदि हम उसकी भावना को ही समाप्त कर देगें तो इस संविधान की संरचना ही गलत हो जाएगी।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजनीति दल के एक प्रवक्ता ने इस बात की पूरजोर वकालत की कि भारत में ‘सेक्लुरिजम’ पर बहस हो जानी चाहिए। हाँ ! मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि इस बात पर देश में बहस होनी ही चाहिए ताकि आज की नई पीढ़ी को पता चल सके कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या है?’’ जिस प्रकार इन दिनों इसकी परिभाषा व्यक्त की जा रही है क्या वास्तव में यही धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप होना चाहिए हमें इस बात पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इससे पहले की हम धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या हो पर चर्चा करें, हमें इसके उन पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए कि विश्वभर में भारतीय संस्कृति ही इस व्यवस्था की जनक मानी जाती है। जबकि अन्य धर्म या संस्कृति इस व्यवस्था को सिरे से नकारती रही है। भारत में जो मुसलमान धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर खुद को भारतीय समझते हैं वही मुसलमान कश्मीर में हिन्दुओं के प्रति ना सिर्फ भेदभाव उनको विस्थापित करते समय मौन धारन कर लेते हैं । जो लोग देश की एकता व अखंडता के प्रति अपना दोहरा मापदंड रखते हैं वैसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते नजर आते हैं। जो लोग भारतीय संस्कृति को मटियामेट करने में आमदा हैं वैसे ही लोग धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति का एक हथकंडा मानते हैं। इसके विपरीत जो लोग देश की एकता व अखंडता की रक्षा करना चाहते हैं वैसे लोग हमें सिर्फ इसलिए सांप्रदायिक नजर आतें हैं चुकि उसमें भारतीयता की खुशबू महकती है। जबकि धर्मनिरपेक्षता को जो लोग वोट बैंक का जरिया बना चुके हैं उनमें भारतीयता के प्रति संवेदना उस समय समाप्त नजर आती है जब उनको लगने लगता है कि उनके बयान से एक विशेष संप्रदायवर्ग नाराज हो सकता है। इसलिए वे गाहे-बगाहे हमेशा इस बात को ध्यान में रखते हैं कि उनके वोट बैंक को कोई क्षति न हो सके।

जब हम धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा पर विचार करते हैं तो हमें देश के विभाजन के पूर्व और बाद की स्थिति पर भी विचार करना होगा। जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ तो यह तय किया गया कि भारत में बचे हुए मुसलमान चुंकि वे अब देश में अल्पसंख्यक हो चुके हैं उनके जान-माल की सुरक्षा हमें देना हमारा फर्ज बनता है । जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कोई भी ऐसा प्रस्ताव ग्रहित नहीं किया गया। अर्थात इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति जहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास करती नजर आती है वहीं पकिस्तानी संस्कृति में अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिसके आंकड़े परिणाम सहित भी हमारे सामने है।

खैर! इस बहस को हम उस दिशा में नहीं ले जाना चाहते। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति की देन है। और जबतक भारतीय संस्कृति इस देश में कायम रहेगी तभी तक धर्मनिरपेक्षता इस देश में जीवित रह सकेगी, यही अंतिम सत्य है। जो लोग वोट बैंक की राजनीति करते हैं वे वोट बैंक की राजनीति करें पर साथ ही वे इस बात का भी ध्यान रखें कि भारतीय संस्कृति को चोट पंहुचाने वाले तत्वों से सत्ता को कैसे दूर रखा जाए। जो लोग भारतीय संस्कृति को भी नुकसान पंहुचाकर अपनी राजनीति स्वार्थ की पूर्ति में लगे हैं वे लोग कहीं भूल से ही सही भारत की संप्रभूता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे? यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनको सावधान होने की जरूरत है। भारतीय संस्कृति जबतक जीवित रहेगी तभीतक इस देश में सभी धर्म के लोग भाईचारे के साथ रह सकेगें। अर्थात धर्मनिरपेक्षता के मूल तत्व में भारतीय संस्कृति छिपी हुई है जो हिन्दूधर्म के विशाल हृदय का सूचक माना सकता है ना कि संकीर्ण मानसिकता का ।जो लोग धर्मनिरपेक्षता को वोटबैंक की राजनीति से जोड़कर देखने का प्रयास कर रहें हैं वे अंततः उस सांप्रदाय को भले ही अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए पक्ष में कर ले, इसके दूरगामी राजनीति परिणाम देश की संप्रभूता को क्षति करने की दिशा में एक कदम ही माना जाएगा।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं। Date: 08/08/2013

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

सांप्रदायिकता की आग - शम्भु चौधरी

कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री श्री मनीष तिवारी ने ‘‘देश में सांप्रदायिकता का जबाब देने की भरपूर वकालत की। उन्हों ने ‘धर्मनिरपेक्षता के एजेंडा’’ को आगे बढ़ाने की जोरदार वकालत की। यह बात सभी को पता है कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के पास अब इस एजेंडे के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं बचा है। कारण साफ है कि कांग्रेस पार्टी और इसके सहयोगी दलों ने मिलकर जिस प्रकार पिछले 9 सालों में देश को लूटा और देश को बर्वादी के कगार पर ला खड़ा किया हैं। देश की आर्थिक स्थिति को खास्ता हालात कर दिया हो। जिधर छूओ उधर ही लूट मची है। पुंजीपतिओं की पौ-बारह है गरीब मंहगाई की चपेट में बुरी तरह पीसता जा रहा है। जरूरी सभी खाद्य पदार्थों के दाम आकाश छूने लगे हैं। मंहगाई पर मनमोहन सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहा, नेता और पूंजीपति उद्योगिक घराने दोनों मिलकर देश को लूटने में लगे हैं। इस नाकामी को छूपाने के लिए देश में सांप्रदायिकता का माहौल खड़ा करना कांग्रेस पार्टी के लिए ना सिर्फ लाभकारी रहेगा और वह यह भी सोचती यह कि इससे मुसलमानों के वोटों का एकतरफा लाभ भी उसी की पार्टी को मिलेगा। जिससे यू.पी-बिहार-बंगाल जैसे कई राज्यों में जहां क्षेत्रिय दलों ने जैसे सपा, बसपा, जदयू, तृणमूल ने जिस प्रकार इनके सांप्रदायिक वोट बैंक में सैंध लगाई है कांग्रेस पार्टी का जनाधार लगभग इन राज्यों से समाप्त सा हो चुका है। इनको लगने लगा है कि स्नैह-स्नैह आने वाले दिनों में क्षेत्रिय दलों द्वारा इनके नाक में दम पैदा कर देगी।

मानो सत्ता देश की सेवा के लिए नहीं लूटने व बंदरबांट के लिए बना हो। जिसप्रकार राजनैतिक सांठगांठ क्षेत्रिय दलों के द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए किये जातें हैं, असमाजिक तत्वों से समझौता किया जाता है। उच्चतम अदालत के निर्णय को भी दरकिनार कर सी.बी.आई जैसी संस्था का दुरूपयोग किया जाता है। अदालती हस्तक्षेप के उपरान्त अपराधियों को बचाने का भरसक प्रयास हमें इस बात की तरफ संकेत करता है कि देश में कानून व्यवस्था से भी ऊपर हो चुका है राजनीति दल या यूँ लिखा जाए राजनीति दल देश की कानून व्यवस्था से ऊपर है। इनको RTI Act के अधिन आने में खतरा नजर आता है। इनको देश बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती सबके सब इस बात को लेकर चिन्तित है कि किस प्रकार जेल से चुनाव लड़ा जा सके। अपराधियों के सहयोग से कैसे सत्ता पर बना रहा जा सके।
अब चुकीं देश की जनता कांग्रेस पार्टी की भ्रष्ट व्यवस्था और लोकपाल विल को लेकर देश की जनता को जिस प्रकार से गुमराह करने का काम किया। डा. मनमोहन सिंह की असफल आर्थिक व्यवस्था ने देश को अंधकार में डाल दिया। एक तरफ शिक्षा का व्यवसायिकरण तो दूसरी तरफ देश में बेरोजगारों की बढ़ती समस्या से देश ध्यान हटाने और देश में श्री नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के खतरे को भांपते हुए कांग्रेस पार्टी ने सांप्रदायिकता के कार्ड को खेलने का खतरा मोल ले लिया है। इससे देश को क्या लाभ या हानि होगी यह तो वक्त ही बता पायेगा। हाँ ! इतना जरूर तय हो जायेगा देश में 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही सांप्रदायिकता की आग इस कदर लगेगी कि पूरा देश एकबार फिर से आजादी की घटना को याद कर सकेगा।

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सांप्रदायिक सेक्लुरिजम - शम्भु चौधरी

कोई भी धर्म बुरा नहीं होता परन्तु कोई धर्म दूसरे धर्म के प्रति भेदभावपूर्ण, वेमनुष्यता व सांप्रदायिकतापूर्ण व्यवहार करता हो तो इसको किसी भी रूप में धर्मनिरपेक्षता के पलड़े पर सही नहीं आंका जा सकता। आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण में जिसप्रकार की राजनीति की जा रही है अर्थात श्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘‘बुर्का की राजनीति’’ की जा रही है इसे ही हम सेक्लुरिजम सांप्रदायिकता भी कह सकते हैं जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को स्नेह..स्नेह अपने धर्म का ग्रास बनाकर निगल जाऐगी।
भारत में ज्यूँ-ज्यूँ 2014 का आम लोकसभा का चुनाव नजदीक आता जा रहा है सेक्लुरिजम की रोटी सैंकने वाले राजनैतिक दलों की एक ही भाषा होती जा रही है। हर बात में सेक्लुरिजम की दुहाई देने वाले दलों को राष्ट्रीयता की बात करने वाले व्यक्ति के हर शब्दों में सांप्रदायिकता की बू झलकती है। आईये इससे पहले कि हम भारतीय राजनीति की बात करें, भारत में चल रहे सेक्लुरिजम युद्ध की बात को समझ लेते हैं। पिछले कुछ दशकों से भारत में सेक्लुर दलों की बाढ़ सी आ गई है। इन दलों की सेक्लुरिजम की जो परिभाषा मानी जाती है वह है ऐन-केन-प्रकारेण मुस्लीम सांप्रदाय के वोटों को प्राप्त करने के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे मुसलमानों की आत्म संतुष्टी मिलती रहे। विशेषकर कट्टरवादी ईस्लामिक विचारधारा के पोषकों को, जिनको भारतीय धर्मनिरपेक्षता से न तो कोई मतलब है ना ही धर्मनिरपेक्षता के वे कभी पक्षधर माने जा सकतें हैं। ऐसे लोगों का एक ही सिद्धान्त रहता है कि किसी न किसी प्रकार भारतीय धर्मनिरपेक्षता के विचारधारा से अपने धर्म को फैलाते हुए भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक हमला करते हुए भारतीय विचारधारा को समाप्त कर इस्लामिक सत्ता को स्थापित करना इनका एक मात्र उद्देश्य माना जा सकता है। दूसरी तरफ देश के भीतर इस्लामिक आंतकवाद को पोषण देना उनको संरक्षित करते हुए उनको पनाह देना व उनका राजनैतिक बचाव करते रहना, इनका लक्ष्य है। भारतीय संस्कृति के विकास व विचारधाराओं में किसी भी प्रकार का ना तो इनके योगदानों को आंका जा सकता है ना ही इस भुखण्ड की धार्मिक सभ्यता के विकास के लिए सामाजिक रूप कभी भी कोई योगदान ही दिया हो ऐसा दिखाई नहीं देता। अब हम भारतीय धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो आज देश में जिस प्रकार विभिन्न राजनैतिक दलों में हौड़ सी लगी है इनको देखकर ऐसा प्रतित होता है कि भारत जैसे बहु भाषा-भाषी, बहुजातिय परंपरा, बहु संप्रदाय के लोगों का आपसी सोहार्द के ताने-बाने को खंड-खंड करते रहना धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर एक विशेष धर्म द्वारा प्रायोजित सांप्रदायिकता का पोषण मात्र इन राजनैतिक दलों का लक्ष्य रह गया है। कोई भी धर्म बुरा नहीं होता परन्तु कोई धर्म दूसरे धर्म के प्रति भेदभावपूर्ण, वेमनुष्यता व सांप्रदायिकतापूर्ण व्यवहार करता हो तो इसको किसी भी रूप में धर्मनिरपेक्षता के पलड़े पर सही नहीं आंका जा सकता। आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण में जिसप्रकार की राजनीति की जा रही है अर्थात श्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘‘बुर्का की राजनीति’’ की जा रही है इसे ही हम सेक्लुरिजम सांप्रदायिकता भी कह सकते हैं जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को स्नेह..स्नेह अपने धर्म का ग्रास बनाकर निगल जाऐगी।