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रविवार, 7 मार्च 2010

समीक्षा: शमोइल एहमद की इक्कीस श्रेठ कहानियां


शमोइल एहमद की कहानियां पढ़ने का ‘ दुर्भाग्य’ मेरे ऊपर न जाने कैसे सवार हो गया। डायमंड प्रकाशन से प्रकाशित उनकी २७ कहानियों का संकलन मेरे हाथ में आ गया और मैं एक के बाद एक कहानी इस आस में झेलती गयी कि शायद अब अगली कोई कहानी अच्छी निकल आए, पर वहाँ तो सारी कहानिया औरत से शुरू होकर बिस्तर पर खत्म होती रही। मैंने व्यर्थ ही अपनी आँखें फोड़ी, घटिया कहानी पढ़कर। मुझे ताज्जुब है कि इस आदमी के ज़हन में औरत, उसके जिस्म और सैक्स के अलावा और कुछ है ही नहीं और वही सब जनाब की कहानियों में भरा पड़ा है। बात ये नहीं कि औरत पर कहानी लिखना निषिद्ध है पर औरत में जिस्म के अलावा गहन सोच विचार और सघन भावनाएं और संवेदनाएं भी होती हैं। अनेक क्षमताएं, विविध गुण और प्रतिभाएं भी कूट कूट के भरी होती हैं। वे तो इन जनाब को शायद कभी दिखी ही नहीं। दिखती भी कैसे जब इनकी रुचि ही सिर्फ जिस्म में है। अंदर तक औरत को कभी खंगाल कर इन्होंने देखा ही नहीं, बस ऊपर से उसकी देह ही टटोलते रहे। इसलिए कहानियां भी सतही बन पड़ी हैं। न कहानी संरचना का उचित रूप आकार है, न मानवीय भावनाएं, संवेदनाएं हैं, न कहीं पात्रों का अन्तर्द्वन्द है और न भाषा दिल और आत्मा को छूती है। कहानी शिल्प से तो शमोइल एहमद अनजान लगते हैं। ऐसी कहानियां तो विकृत मनोवृति के व सीखतड़ लोग लिखा करते हैं।
आजकल हर कोई कलम पकड़ कर पन्ने काले किया करता है जैसे कि ये महाशय कर रहें हैं। जैसे आज का हर दूसरा लड़का और लड़की फिल्म स्टार बनना चाहता है, भले ही सूरत और प्रतिभा के नाम पर राखी सावंत और इमरान हाशमी की तरह हो। ठीक इसी तरह हर इंसान ‘रचनाकार’ बनना चाहता है, भले ही उसमें लेखन प्रतिभा हो या न हो। यदि गलती से वह एक दो प्रतिनिधि पत्रिकाओं में सिर्फ एक या दो बार छप जाए, तो वह अपने को रातोंरात यशस्वी लेखक मानने लगता है। आत्म मुग्धता की स्थिति में जीता है।खैर, लिखने वाले को अपना जजमेंट करने का कोई अधिकार नहीं होता। यह काम तो ‘’साधारण व बुद्धिजीवी’’ दोनों तरह के पाठकों का होता है। मैंने शमोइल एहमद की कहानियां पढकर अपने मित्रों को दी, ये सोच कर कि कहीं मुझे ही खराब लग रहीं हों कहानियां। लेकिन उन सबने भी कहानियों को सामान स्वर से ‘’भूसा ‘’ कहते हुए मेरी प्रतिक्रिया को सही सिद्ध किया। मैं और मेरे समस्त पाठक मित्र शमोइल एहमद की कहानियों को पढकर बेहद - बेहद निराश हुए।
जनाब से गुजारिश है कि या तो वे कहानियां लिखना छोड़ दे या फिर किसी से मार्गदर्शन लें पर यूं लेखन जैसे उद्दात व उत्तम कार्य का अपमान न करें।


रितिका एवं साथी मित्र

सोमवार, 26 जनवरी 2009

‘‘अभिलाषा‘‘ काव्य-संकलन



कृष्ण कुमार यादव के प्रथम काव्य-संकलन ‘‘अभिलाषा‘‘ की प्रस्तुति देखकर प्रथमदृष्ट्या कहा जा सकता है कि उनके मस्तिष्क-पिण्ड में प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ फूलों की खुशबू समान काव्य-सर्जक का गुण भी विद्यमान है। इसी गुण के कारण अभिधा शैली में नानाविध 88 छन्दमुक्त कविताओं का यह अनुपम संकलन सामने आया है। इस संकलन में प्रस्तुत कवितायें उनके चिन्तन के विविध बहुरंगी रूप हैं। ‘‘अभिलाषा‘‘ रूपी काव्य का यह गुलदस्ता निरूपित कर रहा है कि कृष्ण कुमार यादव का व्यक्तित्व कितने अच्छे गुणों और मौलिक विचारों की तिजोरी है। मेरा प्रयत्न यही है कि ‘‘अभिलाषा‘‘ काव्य-संकलन जिन बारह शीर्षकों की परिधि में आवृत्त किया गया है, उसका विवेचन हमें क्या दिशा और बोध देता है, उस छोर की बात कह सकूं।
‘माँ‘ की ममता, कृपा, सुरक्षा, बच्चों के प्रति दुलार, कर्तव्य इत्यादि भावों को बच्चे की छोटी उम्र से लेकर बड़ा होने तक शादी होने तक के विभिन्न पड़ावों को कवि ने बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। कवि के समर्पण लेकिन मातृत्व भाव को देखिए- बेटे की शादी होनें के बाद बेटे का हाथ बहू के हाथ में देते हुए वह कहती है- उसे संभालना, बड़े दुलार से पाला है। माँ के आँसू, माँ का पत्र, परी इत्यादि रचनाओं से कवि की संवेदनशीलता का भाव, पाठक-मन के मर्म को छू जाता है। यह प्रस्तुति सराहनीय है, प्रशंसनीय है। काश! निर्दयी लोगों के मन माँ के लिए ऐसे ही भावुक बन जाएं, तो धरती को स्वर्ग बनने में देरी नहीं लगेगी।
तितलियाँ जितनी नाजुक व कोमल होती हैं, ऐसा ही ‘प्रेम‘ होता है- अपनी ‘प्रेयसी‘ के लिए। ‘तुम्हारी खामोशी‘ में ‘तुम्हें जीता हूँ‘। जब कभी भी ‘बेवफा‘ हुआ हूँ, मुझे तुम्हारी ‘तलाश‘ है- ढूँढ़ता हूँ हर कहीं/ इस छोर से उस छोर तक/ उस छोर से इस छोर तक। तब ‘तुम और चाँद‘ में फर्क भूल जाता हूँ। क्या ‘तुम‘ ऐसी ही नहीं हो? प्रेम एक भावना है/ समर्पण है, त्याग है/ प्रेम एक संयोग है/ तो वियोग भी है/.... पतंगा बार-बार जलता है/ दीये के पास जाकर, आखिर क्यूं ? जीवन-संगिनी क्या चीज है, इस जिम्मेदारी को और उसके लिए पवित्र प्रेम को समझना एवं तद्नुरूप कर्तव्यबोध को अवगत कराया है- कृष्ण कुमार यादव ने।
‘ईश्वर‘ को लेकर कृष्ण कुमार जी का नजरिया बिल्कुल साफ है। ऐसी सोच और विवेक को वे आमजन-मानस में देखना चाहते हैं, यथा- मैं किसी मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे में नहीं/मैं किसी कर्मकाण्ड और चढ़ावे का भूखा नहीं/ नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा ये सब कुछ/मैं सत्य में हूँ, सौंदर्य में हूँ, कर्तव्य में हूँ। इसी प्रकार ‘नारी‘ के आत्मबल को पहचानते हुए उसे अबला की संज्ञा देना तथा उस पर होने वाले जुल्मोसितम व उत्पीड़न से आज के पुरूष समाज को चेताने का प्रयास किया है और अपेक्षा की है कि पुरूष, नारी को अपने बराबर ही समझे।
‘बचपन‘ खण्ड के अन्तर्गत निहित कविताएं बहुत अच्छा संदेश देती हैं। बचपन में मन-मस्तिष्क पर जमे संस्कार कवि-मन को कचोटते हैं। वर्तमान में एक दूसरे के प्रति दिखाई देने वाली नफरत, दूरियाँ, घृणा, बैर, विद्रूपता को वह सहन नहीं कर पाता है और अपेक्षा करता है कि - अरे! आज लड़ाई हो गई/शाम को दोनों गले मिल रहे हैं/एक दूसरे को चूम रहे हैं/.....दीवाली है, ईद है/ अपनी मंडली के साथ/मिठाइयांँ खाए जा रहा है/क्या फर्क पड़ता है/ कौन हिन्दू कौन मुसलमां।
‘एकाकीपन‘ शीर्षक में लिखी सभी रचनाओं ने जिस मनोदर्शन और अन्तद्र्वन्द्व को उकेरा है, मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘खिड़कियाँ‘ कविता की खिड़की से प्रवेश करती धूप-रश्मियाँ ही ‘अपने लोग‘ हैं। रश्मिरूप ‘अपने लोग‘ ही आपके मन से बातें कर रहे होते हैं। न जाने कितनी अच्छी और न जाने कितनी देर तक। कभी ‘मानव जीवन‘ तो कभी ‘अकेलेपन के संघर्ष‘ और ‘अकेलापन‘ की। अन्र्तमन को रश्मियों के रूप में इतना अच्छा मीत मिल गया हो और उसके साथ हम घंटों बतियाते हुए ‘‘अभिलाषा‘‘ रूपी काव्य-संग्रह जन्मते हैं, तो कवि किसी भी हाल में अकेला नहीं होता है। हाँ, मन जब सौ पर्दों में कैद हो जाता है, दरो-दीवारों में बंद महसूस करता है, तब वह ‘वातायन‘ की अपेक्षा करता है।
‘दतर‘ का जीवन, मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन को काफी प्रभावित करता है। इसका कारण एक अपरिपक्व उम्र में नौकरी में लगना है। उस वक्त का उसका कर्तव्य बोध, अपने संस्था के लिए सेवाभाव, समर्पण, त्याग, उद्देश्य, सिद्धान्त, सपने आदि एक-एक करके दबते जाते हैं, जब कार्यालय के अन्य भ्रष्ट कर्मचारी उस पर गलत तरीके अपनाने का दबाव डालते हैं और वह भी इनके समान गलत रास्ते अपना लेता है। इन मनोभावों को कवि ने ‘फाइलें‘ निपटाने में ‘सुविधा शुल्क‘ जैसी प्रवृत्ति और तद्नुसार एक ‘युवा अधिकारी‘ के मनोभावों में होने वाले बदलाव को बड़े अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है- जिन्दगी में समझौतावादी बनो/यहांँ कोई नहीं देखता/ कि आपने क्या किया/ बस आपकी सी.आर. देखी जाती है/उसे ही ठीक-ठाक रखने का प्रयास करो/ मुझे अपने अन्दर कुछ टूटता सा नजर आता है।
‘प्रकृति‘ शीर्षक के अन्तर्गत पचमढ़ी, बादल, नया जीवन और प्रकृति के नियम कविताएं कवि के प्रकृति प्रेम को उजागर करती हैं। ‘मूल्य एवं विसंगतियाँ‘ शीर्षक के माध्यम से कवि ने सिद्ध कर दिया है कि आज नैतिकता के साथ-साथ मानवता का कितना अधःपतन हो चुका है। ये सब कविताएं मन के मर्म को छूती हैं। हमारी चेतना और संवेदना को जागृत करती हैं। काश! समाज की दशा और दिशा बिगाड़ने वाले लोगों को इन कविताओं के अर्थों का संदेश मिले, ताकि वांछित परिवर्तन हो सकें।
वास्तविक रूप से ‘महात्मा गाँधी‘ को हाशिए पर डालने वाले ये इंसान ऐसे ‘खटमल‘ हैं, जो स्वयं की ‘मौत‘ के वक्त भी अपने मुख से ‘हे राम‘ कभी नहीं कहेंगे। ये ‘मानवता के दुश्मन‘ कभी सुधर सकते हैं क्या? अतीत का इतिहास और वर्तमान के सबूत यही गवाही देते हैं। रोज पढ़ा जाने वाला ‘सुबह का अखबार‘ भी यही निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। यदि समाज सुधारकों का बस चल सके तो मजबूर गरीब, बेरोजगार, पीड़ितो का ‘गुर्दा‘ न निकालकर ऐसे बेईमानों के गुर्दे निकालकर और उन्हें बेचकर इन बेसहारा लोगों की जानी चाहिए। ‘सम्बन्ध‘ और ‘जिन्दगी का दोराहा‘ कविताएं कवि मन की संवेदनशीलता के साथ-साथ चिंता को निरूपित करती हैं। क्योंकि जिंदगी को मोड़ देने के अहम् फैसले मृगमरीचिका साबित हुए तो क्या हश्र होगा इससे भी कवि चिंतित नजर आता है।
‘समकालीन‘ शीर्षक में प्रकाशित बारह कविताएं वर्तमान और दैनन्दिन जीवन में घटित होने वाले विषयों के संबंध में आगाह करती हैं। ये कवि की जागरूकता, कार्यालयीन, सामाजिक, प्रादेशिक और देशज घटनाओं को विशेष रूप से इंगित करती हंै। ‘क्लोन‘ कविता में कवि मानव को आगाह करता है- प्रकृति को ललकारना/तो आसान है/ लेकिन/इसके दुष्परिणामों को भुगतना/उतना ही कठिन। इसी प्रकार ‘कश्मीर‘ में व्याप्त आतंकवाद और हिंसा के अंजाम से बेपरवाह कवि कहता है- अतीत की परछाईयों से क्या डरना/चाहे भारत पाक में जाए/या पाक भारत में आए/ पर हम एक तो होंगे/ फिर यह तो अवाम तय करेगी/शासकों का भविष्य क्या है। ‘हिन्दी सप्ताह‘ कविता में सरकारी रवैये का एक नमूना देखिए - सरकारी बाबू ने कुल खर्च की फाइल/धीरे-धीरे अधिकारी तक बढ़ाई/अधिकारी महोदय ने ज्यों ही/ अंग्रेजी में अनुमोदन लिखा/बाबू ने धीमे से टोका/अधिकारी महोदय ने नजरें उठायीं/और झल्लाकर बोले/तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा/कि हिन्दी सप्ताह बीत चुका है। इसी तरह अन्य कविताओं आटा की चक्की, मेरी कहानी, ई-पार्क, जज्बात, ट्रैफिक जाम इत्यादि में आज के मनुष्य और शासन तंत्र की अमानवीय व्यवस्था और स्वार्थपरक प्रवृत्ति का अच्छा खाका तैयार किया है।
‘विविध‘ के अन्तर्गत संकलित कविताओं के तेवर और प्रवाह कवि कृष्ण कुमार यादव के मौलिक विचारों की प्रस्तुति में नयापन का आभास देते हैं, यथा-कविता है वेदना की अभिव्यक्ति/कविता है एक विचार/कविता है प्रकृति की सहचरी/कविता है क्रान्ति की नजीर/कविता है शोषितों की आवाज/कविता है रसिकों का साज/कविता है सृष्टि और प्रलय का निर्माण/कविता है मोक्ष और निर्वाण। इसी तरह मजदूर, कुर्सियां, ये बादल इत्यादि कविताओं में कवि के सरलतम शब्दों के ताने-बाने ने समर्थ मनभावन भावों को चुनकर मन के मर्म को सर्वथा एक नये लेकिन भिन्न अन्दाज से छुआ है। ऐसे ही अनेक बहुरंगी विचार कृष्ण कुमार यादव जी की अन्य रचनाओं में यत्र-तत्र-सर्वत्र मौजूद हैं। इस मायने में कवि एक समर्थ रचनाकार है। निश्चित ही आने वाले वर्षों में लेखन की परिपक्वता का यह ग्राफ और भी गहराता जाएगा।
अन्त में यह कहना चाहूँगा कि कविवर कृष्ण कुमार जी के मन-मस्तिष्क में विद्यमान सुप्त-सरस्वती जो सुख-दुःख के फूलों के बीच प्रवहमान रहती है, काव्य लेखन हेतु उनको विशेष दर्द और वेदना से अवगत कराती है। उसमें निहित चेतना और संवदेना का प्रस्फुटीकरण ही देशज, सामाजिक, मानवीय गुणों से आपूर्ति करने हेतु ‘‘अभिलाषा‘‘ काव्य-संकलन के रूप में प्रकट हुआ है। निश्चित ही श्री यादव के विचारों, चिन्तन आदि की दशा और दिशा देश, समाज और मानव कल्याण की ओर उन्मुख है।



समालोच्य कृति- अभिलाषा (काव्य संग्रह)
कवि- कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल/
kkyadav.y@ rediffmail.com
प्रकाशक- शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर
पृष्ठ- 144,
मूल्य- 160 रुपये
समीक्षक- विष्णु मंगरूलकर ‘तरल‘, अध्यक्ष-हिन्दी साहित्य समिति, मुलताई, 63, नेहरू वार्ड, अमरावती मार्ग,मुलताई, बैतूल (म0प्र0)

सोमवार, 19 जनवरी 2009

साहित्य शिल्पी: एक परिचय



विडम्बना की बातें की जाती हैं कि एक अरब की जनसंख्या वाले इस राष्ट्र में हिन्दी की दुर्दशा है। जब भी आँसू बहाने की बारी आती है, हिन्दी के दिवस मनाये जाते हैं और फिर एक वर्ष का मौन व्रत। इस भाषा की तरक्की और विस्तार के लिये आखिर बुनियादी स्तर पर कार्य क्या हुआ है? सरकारी फाइलें जो भी कहती हों केवल आँकड़ों का खेल ही होगा। दशा पर बहुत चर्चाएँ हुईं, किंतु दिशा की बातें कम ही हुई हैं। जब मैं सोचता हिन्दी में हूँ, पुकारता हिन्दी में हूँ, खुश हिन्दी में होता हूँ,  मन की भड़ास हिन्दी में,  तो भाई यह अंग्रेज़ी कब तक गुप-चुप  "मम्मी-लेंगवेज" रहेगी?....। चिड़िया की कहानी याद आती है। खेत में घोसला था और रोज किसान खेत काटने की बात करता और किसी न किसी रिश्तेदार को काम सौंप कर चला जाता। चिड़िया नित्य चर्चा सुनती और निश्चिंत होकर काम पर निकल जाती। एक दिन जब किसान ने कहा कि निकम्मे हैं सारे लोग “कल खेत मैं काटूंगा”, चिड़िया बच्चों सहित खेत से उड गयी, जानती थी कि खेत ज़रूर कटेगा। और ऐसा ही हुआ। साहित्य शिल्पी को ऐसा ही प्रयास कहा जा सकता है जहाँ रचनाधर्मी उर्जा ने यह ठान लिया कि हिन्दी के लिये अब हमें ही जुटना होगा, पूरी गंभीरता और ताकत के साथ।

यह प्रश्न उठता है कि साहित्य शिल्पी द्वारा अंतरजाल को ही माध्यम क्यों चुना गया। इस प्रश्न का उत्तर तकनीक और साहित्य के प्रयोग की ओर इंगित करता है। अखबारों में इन दिनों प्रकाशित हो रही कविताओं/कहानियों आदि को देखें तो लगता है कि या तो लेखन खो गया है या वास्तविक लेखन की प्रिंट-मीडिया तक पहुँच आसान नहीं रही। जो स्थापित पत्रिकायें हैं, उन तक पैंठ नये साहित्य सर्जकों की आसान भी नहीं।...। फिर तकनीक के परिप्रेक्ष्य में अंतरजाल जैसे व्यापक माध्यम को अछूता क्यों छोड दिया जाय? अंतरजाल पर हिन्दी सामग्री अभी बहुत अधिक दृष्टिगोचर नहीं होती। कुछ वेब-पत्रिकायें, कुछ अखबारों के हिन्दी संस्करण तथा कुछ समाचार प्रधान साइटों के परे साहित्यिक हलचल से अंतर्जाल जगत अभी अछूता ही है। हाँ, हाल ही में यूनिकोड टाईपिंग द्वारा हिन्दी लिखना और उसका वेब-प्रस्तुतिकरण अवश्य आसान हुआ है। साहित्य शिल्पी ने अंतरजाल जगत की इसी नब्ज को और यूनिकोड की ताकत को पहचाना है। हिन्दी की पुनर्स्थापना का रास्ता कंप्यूटर के कीबोर्ड से हो कर भी जाता है।

साहित्य शिल्पी वस्तुत: हिन्दी तथा साहित्य की सेवा के लिये समर्पित रचनाकारों का समूह है। इस मंच पर कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण, समसामयिक विषयों पर परिचर्चायें, कार्टून विधा, बाल साहित्य आदि तो प्रस्तुत हो ही रहे हैं, साथ ही विद्वान हिन्दी सेवियों के साक्षात्कार भी प्रस्तुत हुए हैं। गोपालदास नीरज, शहरयार, नासिरा शर्मा, लाला जगदलपुरी, मानव कौल, श्याम माथुर, ज़ाकिर अली ‘रजनीश’, पूर्णिमा वर्मन आदि के साक्षात्कार के बाद साहित्य शिल्पी प्रसिद्ध कवि कुँवर बैचैन का साक्षात्कार प्रस्तुत करने की तैयारी में है। प्रसिद्ध अभिनेता मनोज बाजपेयी नें साहित्य शिल्पी को अपने साक्षात्कार में इस अभियान की प्रशंसा करते हुए इसे साहित्य के लिये किया जा रहा सार्थक प्रयास बताया।

कविता पर रिकार्ड हुए गीत, कवि की आवाज में रिकार्ड कवितायें, कविता पर बने वीडियो आदि समय समय पर साहित्य शिल्पी द्वारा प्रस्तुत किये गये। इस श्रंखला की महत्वपूर्ण प्रस्तुतियों में महेन्द्र भटनागर के गीत उनके पुत्र आदित्य विक्रम के स्वर व संगीत में, गीता बाल निकेतन फरीदाबाद के बच्चों द्वारा तैयार किया गया एलबम - अनहद गीत, पंडित नरेन्द्र शर्मा की रचनायें लावण्याशाह की के सौजन्य से, देवेन्द्र मणि पाण्डेय की कवितायें हरीश भिमानी के स्वर में आदि प्रमुख हैं। आगामी आकर्षणों में प्रख्यात कथाकार तेजिन्दर शर्मा की कहानियों के ऑडियो भी मंच पर प्रस्तुत किये जाने हैं।

नाटक विधा को अंतर्जाल पर स्थान दिलाने के अपने अभियान में साहित्य शिल्पी नें न केवल स्थायी स्तंभ इस दिशा में आरंभ किया है अपितु पहली बार सत्यजीत भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित एक नाटक “राई-द स्टोन” का विडियो इस मंच पर प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्तुति के दौरान साहित्य शिल्पी को प्राप्त हुई प्रतिक्रियाओं नें यह सिद्ध किया कि नाटक को आज भी दर्शकों की कमी नहीं है।

कार्टून को विधा का दर्जा दिलाना साहित्य शिल्पी का उद्देश्य है। इस कडी में एक गंभीर प्रयास करने की कोशिश व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति तथा प्रख्यात कार्टूनिष्ट कीर्तिश भट्ट् द्वारा की गयी। दोनों ने नैनो कार पर व्यंग्य और कार्टून की जुगलबंदी प्रस्तुत की जिसे पाठकों नें भी हाँथो-हाँथ लिया। प्रसिद्ध कार्टूनिष्ट अभिषेक तिवारी साहित्य शिल्पी पंच पर सप्ताह का कार्टून स्तंभ भी चला रहे हैं। साथ ही साथ माह में दो बार कीर्तिश भट्ट के कार्टून मंच पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

साहित्य शिल्पी मंच यह मानता है कि हमारे साहित्यकार हमारी निधि हैं। यदि हम अपने माननीय साहित्यकारों की यादों को सजो कर नहीं रखेंगे तो साहित्य को ही खो देंगे।साहित्य शिल्पी सभी स्थापित रचनाकारों/साहित्यकारों के जन्मदिवस अथवा पुण्यतिथि पर उनको स्मरण करते हुए उनके जीवन एवं कृतीत्व पर आलेख प्रस्तुत करता रहा है। इस कडी में रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथिली शरण गुप्त, त्रिलोचन, हरिवंशराय बच्चन, अमृता प्रीतम, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रेम चंद, पंडित मुकुटधर शर्मा आदि मनीषियों के संदर्भ में साहित्य शिल्पी संग्रहालय से सामग्री प्राप्त की जा सकती है, जो निरंतर समृद्दि की ओर है। युगप्रवर्तकों में भगत सिंह, दुर्गाभाभी, सुभाष चंद्रबोस जैसे क्रांतिकारियों का भी जीवन परिचय साहित्य शिल्पी संग्रहालय में है।

साहित्य शिल्पी पर चलाये जा रहे प्रमुख नीयमित स्तंभों में हिन्दी साहित्य का इतिहास तथा ग़ज़ल- शिल्प और संरचना प्रमुख हैं। बाल साहित्य को भी इस मंच पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है। देश भर में हो रही साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को भी प्रमुखता से मंच पर स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध समालोचक सुशील कुमार जी काव्यालोचना स्तंभ आरंभ कर मंच पर प्रकाशित कविताओं की समीक्षा कर रहे हैं।

साहित्य शिल्पी मंच पर नये रचना-प्रस्तोता साहित्यकारों को मार्गदर्शन मिल सके और इस मंच के स्तर में उत्तरोत्तर सुधार हो इसके लिये वरिष्ठ साहित्यकारों का भी मार्गदर्शन व आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है। साहित्य शिल्पी समूह के लिये यह गर्व का विषय है कि कई स्थापित व वरिष्ठ साहित्यकार भी इस अभियान की मशाल थाम रहे हैं। साहित्य शिल्पी यह गर्व के साथ कह सकता है कि हमने हिन्दी और साहित्य की सेवा के लिये न केवल भारत अपितु विदेशों में बसे रचनाकारों को भी इस सूत्र में जोडा है। इस मंच की विचारधारा है सृजन। हमने इसे किसी पंथ/विचार या संघ से नहीं जोडा बल्कि हर प्रकार के विरोधाभासों को स्थान देने का यत्न किया है जिससे सार्थक परिचर्चायें जन्म लें और हिन्दी तथा साहित्य का विकास हो।

आलेख: साहित्य शिल्पी के लिये राजीव रंजन प्रसाद द्वारा

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

समीक्षाः ‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘‘


‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘‘ कृष्ण कुमार यादव का प्रथम निबंध संग्रह है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी रूप में पदस्थ श्री यादव अपनी व्यस्तताओं के बीच भी सामाजिक-साहित्यिक सरोकारों से कटे नहीं हैं बल्कि उन्हें आत्मसात् करते हुए पन्नों पर उभारने में भी माहिर हैं। सुकरात ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा था कि-‘‘सर्वगुणसम्पन्न और सच्चे अर्थों में शिक्षित वही लोग माने जायेंगे जो सफलता मिलने पर बिगड़ते नहीं, जो अपनी असलियत से मुँह नहीं मोड़ते; साथ ही बुद्धिमान और धीर-गम्भीर व्यक्ति की तरह दृढ़ता से जमीन पर पैर जमाये रखते हैं।‘‘ साहित्य में उसी दृष्टि को संपन्न माना जाता है, जो अपने समय की सभी प्रवृत्तियों को अपने साहित्य में स्थान दे और उनके साथ समुचित न्याय करे। कृष्ण कुमार चूँकि अभी युवा हैं, अतः उनकी सोच में नवीनता एवं ताजगी है।

समालोच्य निबंध संग्रह में कुल 10 लेख/निबंध प्रस्तुत किये गये हैं। भारतीय जीवन, समाज, साहित्य और राजनीति के अंतर्सूयों से आबद्ध इन लेखों में तेजी से बदलते समय और समाज की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। संग्रह का प्रथम लेख ‘‘बदलते दौर में साहित्य की भूमिका‘‘ समकालीन परिवेश में साहित्य और इसमें आए बदलाव को बखूबी रेखांकित करता है। नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, बाल-विमर्श जैसे तमाम तत्वों को सहेजते इस लेख की पंक्तियाँ गौरतलब हैं- ‘‘रचनाकार को संवेदना के उच्च स्तर को जीवंत रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप से जोड़कर देखना चाहिए एवं अपने सत्य व समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये।’’ इसी प्रकार ‘‘बाल-साहित्य: दशा और दिशा‘‘ में लेखक ने बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उनकी मनोभावनाओं को भी बाल साहित्य में उभारने पर जोर दिया है।

आज लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं वरन् वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है। कृष्ण कुमार यादव की नजर इस पर भी गई है। ‘‘लोकतंत्र के आयाम‘‘ लेख में भारतीय लोकतंत्र के गतिशील यथार्थ की सच्ची तस्वीर देखी जा सकती है। किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए बिना भारतीय समाज के पूरे ताने-बाने को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि इस लेख को महत्वपूर्ण बना देती है। सत्य-असत्य, सभ्यता के आरम्भ से ही धर्म एवं दर्शन के केद्र-बिंदु बने हुये हैं। महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है ने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। भारत सरकार के राजकीय चिन्ह अशोक-चक्र के नीचे लिखा ‘सत्यमेव जयते’ शासन एवं प्रशासन की शुचिता का प्रतीक है। यह हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। इस भावना को सहेजता लेख ‘‘सत्यमेव जयते‘‘ बड़ा प्रभावी लेख है। एक अन्य लेख में लेखक ने प्रयाग के महात्मय का वर्णन करते हुए इलाहाबाद के राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया है। इसमें इतिहास और स्मृति एक दूसरे के साथ-साथ चलते हुए नजर आते हैं।

सृष्टि का चक्र चलाने वाली, एक उन्नत समाज बनाने वाली, शक्ति, ममता, साहस, शौर्य, ज्ञान, दया का पुंज है नारी। एक तरफ वह यशोदा है, तो दूसरी तरफ चण्डी भी। आज महिलायें समुद्र की गहराई और आसमान की ऊँचाई नाप रही हैं। ‘‘रूढ़ियों की जकड़बन्द तोड़ती नारियाँ‘‘ ऐसी नारियों का जिक्र करती है जो फेमिनिस्ट के रूप में किन्हीं नारी आन्दोलनों से नहीं जुड़ी हैं। कर्मकाण्डों में पुरूषों को पीछे छोड़कर पुरोहिती करने वाली, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने वाले ऐसे तमाम कार्य जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है, आज महिलायें खुद कर रही हैं। आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठाई थी पर अब महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं। इसी क्रम में ‘‘लिंग समता: एक विश्लेषण‘‘ नामक लेख पुरूष व महिलाओं के बीच जैविक विभेद को स्वीकार करते हुए सामंजस्य स्थापित करने और तद्नुसार सभ्यता के विकास हेतु कार्य करने की बात करता है।

कोई भी लेखक या साहित्यकार अपने समय की घटनाओं और उथल-पुथल के माहौल से प्रेरित होकर साहित्य की रचना करता है। कृष्ण कुमार भारतीय संस्कृति, उसके जीवन मूल्यों और माटी की गंध को रोम-रोम में महसूस करते हैं। आज हमारी लोक-संस्कृति व विरासत पर चैतरफा दबाव है और बाजारवाद के कारण वह संकट में है। ऐसे में लेखक भारतीय संस्कृति और उसकी विरासत का पहरूआ बनकर सामने आता है। अपने लेख ‘‘शाश्वत है भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत‘‘ में कृष्ण कुमार जब लिखते हैं- ‘‘वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं‘‘, तो उनसे असहमति जताना बड़ा कठिन हो जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की हिमायती रही हैं। आज जातिवाद, सम्प्रदायवाद की आड़ में जब इस पर हमले हो रहे हैं तो युवा लेखक की लेखनी इससे अछूती नहीं रहती। बचपन से ही एक दूसरे के धर्मग्रंथों और धर्मस्थानों के प्रति आदर का भाव पैदा करके अगली पीढ़ियों को इस विसंगति से दूर रखने की सलाह देने वाले लेख ‘‘साम्प्रदायिकता बनाम सामाजिक सद्भाव‘‘ में समाहित उदाहरण इसे समसामयिक बनाते हैं।

आज की नई पीढ़ी महात्मा गाँधी को एक सन्त के रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। महात्मा गाँधी पर प्रस्तुत लेख ‘‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘‘ उनके जीवन-प्रसंगों पर रोचक रूप में प्रकाश डालते हुए समकालीन परिवेश में उनके विचारों की प्रासंगिकता को पुनः सिद्ध करता है। वस्तुतः गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं।

साहित्य रचना केवल एक कला ही नहीं है बल्कि उसके सामाजिक दायित्व का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही कारण है कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। ऐसे में व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बधों की संश्लिष्टता को पहचान कर उसे मौजूदा दौर के परिपे्रक्ष्य में जाँचना-परखना कोई मामूली चुनौती नहीं। कृष्ण कुमार यादव मूकदृष्टा बनकर चीजों को देखने की बजाय भाषा की स्वाभाविक सहजता के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिसका प्रतिरूप उनका यह प्रथम निबंध-संग्रह है। कृष्ण कुमार यादव की यह पुस्तक पढ़कर जीवंतता एवं ताजगी का अहसास होता है।



पुस्तक: अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह)/ लेखकः कृष्ण कुमार यादव/ मूल्य: 150/- प्रकाशक: शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर
समीक्षक: गोवर्धन यादव, 103. कावेरी नगर, छिंदवाड़ा (म0प्र0)-480001

सोमवार, 6 अक्टूबर 2008

समीक्षा: ज्योति प्रभा - शम्भु चौधरी


ज्योतिप्रसाद अगरवाला का जन्म 17 जून सन् 1903 को डिब्रूगढ़ अंचल के तामुलबारी चाय बगीचे (असम) में हुआ। उन्होंने हाईस्कूल की शिक्षा डिब्रूगढ़ तथा तेजपुर में प्राप्त की। सन् 1921 में वे तेजपुर सरकारी उच्च विद्यालय से 'प्रवेशिका निर्वाचन' परीक्षा में उत्तीर्ण होकर कलकत्ता में चित्तरंजन दास द्वारा स्थापित राष्ट्रीय विद्यापीठ से द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। वह समय था महात्मा गांधी द्वारा संचालित असहयोग का। ज्योतिप्रसाद ने उच्च शिक्षा से मुँह मोड़कर असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। आन्दोलन धीमा होने पर कलकत्ता के नेशनल कॉलेज में अध्ययन कर कुछ दिन अपने ताऊ चन्द्रकुमार अगरवाला द्वारा स्थापित 'न्यू प्रेस' के संचालन में सहयोग दिया। सन् 1926 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये वे इंग्लैण्ड चले गये। वहाँ एडिनबरा विश्वविद्यालय में कुछ दिनों तक अध्ययन करने के बाद जर्मनी में सात माह तक चलचित्र तकनीक संबंधी प्रशिक्षण लिया। 1930 में स्वदेश वापसी के पश्चात आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भागीदारी । 1932 में 15 महीनों का सश्रम कारावास और 500 रुपये का जुर्माने की सजा। 14 वर्ष की आयु में 'शोणित कुँवरी नाटक' की रचना। अन्तिम समय तक नाटक, कविता, जीवनी, शिशु-काव्य और साहित्य की अन्य विधाओं में कार्य। रचना एवं स्वर संयोजन में अभिनवता से भरे असंख्य गीतों के माध्यम से असमीया संगीत को नवरूप प्रदान । 1934 में भोलागुरि चाय बगीचे में अस्थायी 'चित्रवन स्टूडियो' स्थापित कर, सर्वप्रथम असमीया चलचित्र 'जयमती' का निर्माण। 1935 में जयमती का प्रदर्शन। 1936-37 में विष्णुप्रसाद राभा के साथ नाटक जयमती और शोणित कुँवरी के ग्रामोफोन रेकॉर्ड निर्माण। 1937 में तेजपुर में 'जोनाकी' चलचित्र-गृह का निर्माण। 1939 में द्वितीय असमीया चलचित्र 'इन्द्रमालती का निर्माण। 1940 में तेजपुर में संगीत विद्यालय की स्थापना। असम में एक दिन की सरकारी छुट्टी इनके जन्म दिन पर मनायी जाती है। अनके करीब 367 गीत (सभी मूल असमीया भाषा में) प्रकाश में आये। उन्होंने कुछेक गीतों के लिए स्वयं स्वरलिपि तैयार की थी। जसकी अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। इसी कारण असम के संगीत प्रेमियों ने इस संगीत को 'ज्योति संगीत' की संज्ञा दी। जिस प्रकार ' रवीन्द्र संगीत' में भाव, भाषा, स्वर और कल्पना का समन्वय हुआ है उसी प्रकार ज्योतिप्रसाद के गीतों में भी समन्वय के दर्शन होते हैं। ज्योतिप्रसाद ने असमीया संगीत के मूल रूप को अक्षुण्ण रखते हुए, पाश्चात्य संगीत का समावेश कर, एक पथ-प्रदर्शक के रूप में असमीया साहित्य को स्मृद्ध तो किया ही असमीया समाज में नई चेतना का संचार भी किया।


आप प्रकृतितः कवि थे। उनके गद्य में भी उनके कवित्व की सुषमा और सौरभ व्याप्त है। संख्या की दृष्टि से उनकी कविताएँ कम हैं - उनकी 50 सम्पूर्ण कविताएँ एवं 12 शिशु-कविताएँ प्रकाशित ( सभी असमीया भाषा में) हुई हैं। किन्तु काव्य, भाव एवं शिल्प की दृष्टि से वे अनुपम हैं। इसी कारण असमीया काव्य साहित्य में उन्हें शीर्ष स्थान प्राप्त है। कवि के रूप में ज्योतिप्रसाद में कुछ विशेष गुण हैं। उनकी कविता में असमीया जातीयता के भाव की प्रधानता होने पर भी भारतीय तथा विश्वजनीन भाव के साथ कहीं विरोध नहीं झलकता। जातीयता के प्रति निष्ठा रकह्ते हुए, उससे दृढ़तापूर्वक जुड़े रहते हुए भी वे संकीर्ण जातीयता से ऊपर अठने में सक्षम हैं।
ज्योतिप्रसाद को असम में लोग 'रूपकुँवर' के नाम से जानते -पहचानते हैं। यह शब्द उनके नाम का एक अभिन्न अंग बन गया है। ज्योतिप्रसाद को 'रूपकुँवर' की उपाधि किस प्रकार मिली, इस विषय में कई विचार और भ्रान्तियाँ हैं। इस सम्बन्ध में असम के सुप्रसिद्ध कवि आनन्दचन्द्र बरुवा ने कहा है, " अखबार में काम करते समय ज्योतिप्रसाद के 'चित्रवन' में दो दिन रहकर आया और 'रूपकुँवर ज्योतिप्रसाद' नाम से एक लेख प्रकाशित करवाया । मेरे द्वारा कल्पित यह उपाधी लोकप्रिय होकर अजर-अमर हो गयी, इसका मुझे संतोष है। आपके द्वारा रचित कुछ रचनाओं का हिन्दी अनुवाद असम के देवीप्रसाद बागड़ोदिया जी ने की है। इनखी एक पुस्तक 'ज्योति प्रभा' का प्रथम संस्करण जनवरी 1995 एवं दूसरा संस्करण 2003 में प्रकाशित हुआ है। 650 पृष्ठ की यह पुस्तक का मूल्य 250/- + डाकखर्च अतिरिक्त रखा गया है।
पुस्तक प्राप्ति स्थान:
ई- हिन्दी साहिय सभा या आप सीधे श्री देवी प्रसाद बागड़ोदिया, बागड़ोदिया निवास, ज्योतिनगर, डिब्रूगढ़ - 786005, फोन नम्बर: 09435032796 से भी प्राप्त कर सकतें हैं।
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ज्योतिप्रसाद की कुछ रचनाएँ नीचे दे रहे हैं।
सभी गीत असमीया मूल से हिन्दी में अनुवाद श्री देवी प्रसाद बागड़ोदिया के द्वारा :-



1. रुपहले पानी में सोने की नाव


रूपहले पानी में सोने की नाव
खोल दे रे
खोल दे, खोल दे, खोल दे रे।
तितली के पंखों से उड़ते हैं पाल
फूल के पत्तों की छाजन
वह नील आकाश की किस सीमा में
बाजे असीम की बंसी
वहाँ निद्रा तिमिर भेदकर
जागे अरूण की हँसी
उसी ओर, उसी ओर
खोल दे, खोल दे, खोल दे रे।
जीवन तट का हरियाला खेत
खिले फूल की ज्योति अपार
मरणाकुल फेनिल उफान
पीछे छोड़ जाये
विहर की वेदना में आनन्द झलके
मिलन में विहर का लेख
जीवन मरण जीत चमके
प्रणय का ध्रुवतारा
चमक कर बुलाये रे
प्रकाश की ओर, प्रकाश की ओर
ज्योति के देश की ओर।


2. लुइत* तट का अग्निसुर


लुइत तट का अग्निसुर
तुम्हें लिख दिया अपने रक्त से
लुइत तट का अग्निसुर।
तुम्हें रच दिया
 व्यथा वेदना से
  कर दिया तुम्हें
   अपने हृ्दय की
    अग्निशिखा से
लुइत तट का अग्निसुर।
    छा जाओगे तुम
     लुइत के दोनों पार
चमकना तुम सागर के उस पार
भारत के घर-घर में
परिचय बनाना भावी पृथ्वी में
     नये प्राण में
     नये गान में
विकरित कर
ज्योति स्फुलिंग
जाना दूर अति दूर
लुइत तट का अग्निसुर।
* लुइत : (लोहित) ब्रह्मपुत्र नदी का लोक-प्रचलित नाम।


3. स्वाधीनता के लिये तड़पते प्राण


स्वाधिनता के लिये तड़पते प्राण
    देश का दुःख देख कलपे हिया
भिक्षा की झोली ले निकला है
    विमुख न करना हमें माँ।
त्याग दी हमने विषय वासना
अग्नि लुइत में प्राणों का कर संधान
गृहस्थ घर की लक्ष्मी बहू
    अन्न की मुट्ठी करो दान।
देश का दुःख देख लुइत सिसक रही
    रोक न पाये कोई अश्रुजल
अहिंसा युद्ध में रण की रणभेरी
  बजे बार बार
   जाये तत्काल
    विमुख न करना हमें माँ।



4. कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश


कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश
माँ असमी को पहनाना चाहता
प्रकाशित सुन्दर वेश
कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश
मेरे इस देश के खेतों में सोना
अपने आप उपजे
स्वर्न प्रभात की सुनहरी हँसी
मेरे आँगन में खेले
संध्या लुइत का वक्ष चमका
स्वर्णिम रंग भरे
सुनहले मूँगो के पट से
युवती सुन्दर सजे
रुपहली रेत पर स्वर्णिम धूल
झलमल रूप धरे
स्वर्ण केतकी की, स्वर्ण रेणु झरे
शिल्पी दल का स्वर्णिम स्वप्न
 हरित वन विचरे।
  स्वर्णिम देश की
महापुरुष की
शंकर माधव* की
 स्वर्ण मूल्या संस्कृति
  देती प्रकाश
   इस पृथ्वी को
    स्वर्णिम जीवन की
महा मनीषा
महा प्रतिभा जन जीवन की
स्वर्णीम सपनों की
इसी देश में स्वर्णिम भविष्य की
  स्वर्ण ज्योति जले
इसी देश में शिल्पी मन के
  महा स्वप्न की
इस पृथ्वी के स्वर्ण यथार्थ की, स्वर्णिम पहचान
  स्वर्ण चित्र में ढले।
बोधन कर विश्व शिल्पी मन
इसी देश में जनजीवन में
स्वर्णिम मन की स्वर्णिम पंखुड़ी
  स्वर्ण हँसी सी खिले।

* शंकर माधव: महापुरुष शंकरदेव


5. मनुष्य जन्म लेकर कौन


मनुष्य जीवन लेकर कौन
पशु का खेल खेलो?
देव किरीट पहन भाल पर
राक्षस रूप धरो
आसुरी नृत्य करो
स्वर्ग की छवि पृथ्वी पर चाहकर
नर्क की ओर डग भरो
अपनी आँख आप फोड़कर
गहरे गर्त गिरो।
ज्ञानी को तू मूर्ख बताये
हँसे आप ही आप ही रोये
खुद को मार रहा खुद ही
गली गली घूमो पगलाये।