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रविवार, 17 मार्च 2019

चाय-पकौड़ा बिचवाया, अब चौकीदारी करो ?


2014 में चुनाव में मोदी का सबसे बड़ा मुद्दा था, काला धन, भ्रष्टाचार और तेल-डालर के दाम के साथ-साथ, देश के युवाओं को प्रति साल दो करोड़ नौकरी देने के वादा किया था।  ‘‘अच्छे दिन आयेंगे, 15 लाख देश के लोगों के खाते में जमा करायेगें। यह सब बातें झूठे वादे साबित हुए। चाय बेच कर सरकार बनायी और आते ही सबसे पहले यह बोल दिया कि पकौड़े बेचो । भाजपा के अध्यक्ष अमित साह ने खुद स्वीकार किया चुनाव में जो वादे किये थे सभी वादे जुमले थे। तब तो इनकी देश भक्ति का यह नये नाटक को भी जुमला ही क्यों ना मान लिया जाए?
गत् पांच सालों में मोदी ने बिना किसी संस्थान के अनुमति के नोट बंदी किया जिसका परिणाम हमने देखा कि 25 दिनों में आरबीआई को बार-बार नियमों में बदलाव लाना पड़ा, सैकड़ों लोगों की जान चली गई। ठीक इसी प्रकार 'जीएसटी' को लेकर जिस एक्ट में जितनी धाराएं नहीं उससे अधिक तो एक साल में इनको संशोधन लाना पड़ा। 100 पेज के एक्ट में 200 पेज का संशोधन यह है हमारे पढ़े-लिखे मोदी का हाल । व्यापारियों की कमर तौड़ डाली । लाखों युवाओं की नौकरी चली गई। किसानों की आत्महत्या थमने का नाम नहीं ले रही। कालेधन के नाम देश को गुमराह किया गया । नोट बंदी से आतंकवाद को लगाम तो नहीं लगा पाये सेनाओं की जम कर हत्या करवाते रहे। पठानकोट, उरी, पुलमावा जैसी कई आतंकवादी घटना भारत की सीमा में आकार, आतंकवादी ‘‘सर्जिकल आतंक’’ करते रहे और पांच साल मोदी जी हाथ पर हाथ धरे चुप-चाप आतंकवाद को कश्मीर में (मु्फ्ती सरकार) समर्थन देते रहे।
तमाम संवैधानिक संस्थाओं, आरबीआई, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों में हेरा-फेरी, कॉलिजियम के द्वारा तय नामों में बिना सहमति से बदलाव, पूर्व में तय नामों की सूची में हेरा-फेरी, चुनाव आयोग में भ्रष्ट अधिकारियों का चयन इस बात का इंगित करता है कि मोदी सरकार देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं को कठपुतली बनाकर अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का काम करते पाये गये। जिस प्रकार राफेल सौदा किया गया, देश की एक दिवालिया कंम्पनी के मालिक को राफेल का कान्ट्रेक्ट दिलाया गया यह सब कई खतरनाक संकेतों की तरफ इशारा कर रहा है।
अब जब मोदी को लगा कि उनकी सरकार पिछले पांच सालों में देश की जनता का ठगा और छला ही छला है। खुद विदेश के दौरा करते रहे और इधर देश में कभी गाय के नाम पर कभी छदम राष्ट्रवाद के नाम पर तो कभी भारत माता के नाम पर देश की जनता को 'गोदी मीडिया' के सहयोग से उलझाये रखकर नीरव मोदी या दिवालिया कंम्पनी के मालिकों के साथ फोटो खिंचवाने में लगे रहे । 100 से भी अधिक देशों के चक्कर लगाने वाला चौकीदार भ्रष्टाचार के इतने खिलाफ था कि पिछले पांच सालों में 'लोकपाल' का गठन तक नहीं होने दिया ।
जब लोकसभा का चुनाव सर पर आ गया तो इनका मानसिक दिवालियापन देखिये ये अब देश भक्ति को भजाने में लगे हैं । देश के युवाओं को नौकरी तो दे नहीं सके सबको बोल रहें कि चौकीदारी करो अब। 
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

शनिवार, 16 मार्च 2019

भ्रष्टाचार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा

भ्रष्टाचार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा

राफेल सौदे की पुनरीक्षण याचिका पर केन्द्र सरका, दलील पर दलील दिये जा रही है कि चौकीदार चोर नहीं हैं इसके साथ ही वा ‘‘शासकीय बात अधिनियम, 1923’’ का हवाला भी दे रही है कि जो दस्तावेज अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के द्वारा अपनी दलील में दिये गये हैं वे सभी दस्तावेज़ चोरी से प्राप्त किये गए हैं। परन्तु  चौकीदार की सरकार इस बात को अपनी जिरह में बताना भूल जाती है कि यदि भ्रष्टाचार से जुड़ा ममला है तो ‘‘शासकीय बात अधिनियम, 1923’’ यहां लागू होता है या नहीं ? जबकि आरटीआई एक्ट, 2005 के अध्याय - 6, धारा -24 की उपधारा - 4  "देश के हरेक नागरिकों को भ्रष्टाचार व मानवाधिकार के मामले में सुरक्षा प्रदान करती है। " देश की कोई भी अदालत किसी भी ऐसे भ्रष्टाचार को  ‘‘शासकीय बात अधिनियम, 1923’’ के बहाने ना तो सुनवाई से इंकार ही कर सकती है ना ही उसके प्रस्तुत दस्तावेज़ों को इंकार ही कर सकती है।
पिछले मंगलवार  (14 मार्च) को सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर बहस हुई, सरकार नहीं चाहती कि  मोदी के भ्रष्टाचार को किसी भी हालात में उजागर किया जाय इसके लिये वह राष्ट्र की सुरक्षा की दुहाई दे रही है। जैसे एक आंतंकवादी अपने बचाव में धर्म की दुहाई देता है।  सवाल उठता है यह दलील तो बोफोर्स के मामले में भी लागू होती थी, तब तो आरटीआई एक्ट भी अस्थित्व में नहीं आया था।  आज मोदी सरकार देश की सुरक्षा की दुहाई दे रहें हैं तक क्या हुआ था? बोफोर्स ने तो करगील युद्ध में अपना लोहा भी मना दिया था। 
अपराधी को कानून से सजा मिले यही अदालत का प्रमुख लक्ष्य है। सुप्रीम कोर्ट आज जिस दौराहे पर खड़ी नजर आ रही है। इससे ऐसा लगता है कि अदालत,  "आरटीआई एक्ट, 2005 के अध्याय - 6 धारा -24 की उपधारा - 4"  की नई व्याख्या का कोई मार्ग खोज रही है जिससे  देश की सुरक्षा के नाम पर इसे दरकिनार किया जा सके। जो संविधान संशोधन से ही संभव हो सकता है । अब चुकिं चुनाव की घोषणा भी हो चुकी है तो मोदी सरकार के लिए यह भी संभव नहीं कि वे संविधान में संशोधन कर अपना बचाव कर सके। 
फिलहाल 14 मार्च की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। साथ ही अदालत में सुनवाई के दौरान हुई बहस से भी यह आभास भी हो रहा था कि अदालत उन सभी दस्तावेज़ों को भ्रष्टाचार की श्रेणी में मानते हुए स्वीकार कर ले और मोदी सरकार पर देश की सबसे बड़ी अदालत को (शीलबंध लिफाफे में)  गुमराह करने के लिए दोषी मानते हुए अपने पूर्व के सभी आदेशों को वापस लेते हुए इसकी जांच के लिए कोई कमिशन ऑफ इन्क्वायरी की नियुक्ति कर दे। कुछ भी संभव है।
अब हमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार करना चाहिये। देखना है कि जिस भ्रष्टाचार से लड़ने की दुहाई देनेवाली मोदी सरकार खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती है कि नहीं? 
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

मंगलवार, 12 मार्च 2019

नामुमकिन अब' मुमकिन नहीं ? - शंभु चौधरी

एयर स्ट्राइक के  साथ-साथ ही दो झूठे और मनगढंत बात मोदी सरकार की तरफ से जारी की गई- 
पहला कि - मोदीजी रातभर साये नहीं। 
दूसरा ‘‘350 आतंकवादी सहित मसूद को छुड़ाने वाला युसूफ भी मारा गया’’ प्रश्न यहीं से उठने शुरू हो गये जब अमित शाह ने 250 आंतकियों के मारे जाने की बात कही, फिर सेना को आकर बयान देना पड़ा कि संख्या सरकार बातायेगी। इस आंकड़ों के झूठ ने एक बार फिर मोदी के झूठ को नंगा कर दिया था। 
इन सब बातों को कड़ी दर कड़ी जोड़ दिया जाय तो पुलमावा की साजिश में मोदी सरकार की एक करतूत है जो भारतीय सेनाओं की शहादत पर अपनी राजनीति रोटी सैंकने में लगी है।    

भारत के प्रधानमंत्री अपने पांच साल की असफलता, देश की समस्त लोकतांत्रिक संस्थाओं को कठपुतली बना देने के बाद भी उनको सत्ता की पिपासा इस कदर उन पर हॉबी है कि जैसे ही मोदी जी को लगा कि पिछले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार और आगामी लोकसभा के चुनाव में भाजपा को 100 से अधिक सीटों का नुकसान होने का संभावना है, गोदी मीडिया सहित कई लोगों कि नींद खराब कर दी थी। सबको यह लगने लगा कि मोदी अब पाकिस्तान पर कोई बड़ी कार्यवाही जरूर करेंगे, तभी उनकी सत्ता में नई जान फूंकी जा सकेगी । परिणाम स्वरूप क्रमवार मोदी सरकार की हरकतों पर नजर डालें तो यह साफ हो जायेगा कि पुलवामा का हमला मोदी सरकार की एक सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा था जिसे जानबूझकर ठीक चुनाव के ऐनवक्त पर करवाया गया ।  यदि साफ शब्दों में लिखा जाए पुलमावा में सैनिकों की हत्या की गई ।
क्रमवार देखें -
1. राम मंदिर का मुद्दा उछाला गया, जब यह बात सामने आई कि भाजपा चुनाव आते ही इस मुद्दे को भुनाने में लग जाती है तो मोदी ने एक कदम पीछे कर लिए ।
2. किसानों की बदहाली पर मोदी को पांचवें साल ध्यान आया जब सरकार को अंतिम बजट पेश करना था वह भी ‘ऊंट में जीरा’  जब इससे भी बात नही बनी तो,
3. वीवीआईपी हेलीकॉप्टर अगस्ता वेस्टलैंड केस की चल रही 10 साल  पुराने  गड़े मुर्दे को फिर से जिंदा किया गया ताकी कांग्रेस पर हमला किया जा सके। 
4. रॉबर्ट वाड्रा की फाइलें खंखाली जाने लगी।
5. यहां भी जब बात नहीं बनी तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव पर सीबीआई के द्वारा दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह कांग्रेस के साथ गठजोड़ न करें। 
6. पश्चिम बंगाल में सीपीएम के टाईम हुए चिटफंड घोटाले में ममता की सरकार को परेशान किया जाने लगा।

सवाल उठता हे पांच साल मोदी जी क्या कर रहें थे? ये सभी मामले तो पांच साल पुराने थे, पांच साल चुप्पी के बाद , लोकसभा चुनाव के ठीक कुछ महीने पूर्व इनकी सक्रियता क्या दर्शाती है?
कारण साफ था देश की जनता मोदी सरकार के कई तानाशाही फ़ैसलों से इतनी परेशान थी कि उनके सामने एक ही विकल्प था कि किसी भी प्रकार से मोदी को सत्ता से बेदखल कर दिया जाए । इसके लिये मोदी के नाम पर मोदी भक्तों की अफ़वाहों के प्रचार और गोदी मीडिया से लोहा लेना जरूरी हो गया था।
जैसे ही मोदी-शाह की जोड़ी को लगा कि अब उनकी सत्ता उनके हाथ से खिसकनेवाली ही और सत्ता के जाते ही  सबसे पहले राफेल के घोटाले और नोटबंदी के समय हुए नोटों की अदला-बदली के घोटालों से पर्दा उठ जायेगा। 
पुलमावा का हमला,  भारतीय सैनिकों की शहादत को लेकर यह आशंका पहले से ही चर्चा में थी जैसे 1990 में बाबरी मस्जिद ढहाने के समय था। सबको पता था कि ऐसा होने जा रहा  है ठीक इस बार भी या चर्चा आम थी कि मोदी सैनिकों की कोई बड़ी कार्यवाही कर सकते हैं।

भारत सरकार की गुफिया ऐजेंसिंया इस बात की आशंका पहले ही जाहिर कर चुकी थी और मोदी सरकार चाहती थी खतरे को टाला ना जाए ।  घटना का राजनीति लाभ लेने की मंशा मोदी ने मन ही मन बना चुकी थी। जैसे ही पुलमावा में 14 फरवारी 2019 को हमला हुआ, मोदी जी शांत भाव से चुनावी भाषण देने में लगे थे मानो सबकुछ प्लान के अनुसार चल रहा हो। बस उन्होंने मन ही मन इसकी नई योजना बाननी शुरू कर दी। जिसका आभास टाइम्स  ऑफ़ फ इंडिया के स्वामीनाथन एस.ए अयर (24 फरवरी, 2019 ) के लेख में साफ संकेत थे कि  "Between now and the elections, can Modi launch another surgical strike or bombing of terrorist camps in Pakistan?" अर्थात यह साफ हो चुका था कि मोदी राजनैतिक लाभ लेने के लिये फिर वही नाटक करेगा जो उसने 2016 में किया था। जिसकी कहानी  दो साल बाद उनको याद आई कि वे रात भर नहीं सो पाये थे। ठीक वही कहानी इसबार भी दौहराई गई। जैसे ही मीडिया में यह समाचार प्रसारित किया गया कि भारतीय वायु सेना ने एयर स्ट्राइक किया है साथ-साथ ही दो झूठे और मनगढंत बात मोदी सरकार की तरफ से जारी की गई- 
पहला कि - मोदीजी रातभर साये नहीं। 
दूसरा ‘‘350 आतंकवादी सहित मसूद को छुड़ाने वाला युसूफ भी मारा गया’’ प्रश्न यहीं से उठने शुरू हो गये जब अमित शाह ने 250 आंतकियों के मारे जाने की बात कही, फिर सेना को आकर बयान देना पड़ा कि संख्या सरकार बातायेगी। इस आंकड़ों के झूठ ने एक बार फिर मोदी के झूठ को नंगा कर दिया था। 
इन सब बातों को कड़ी दर कड़ी जोड़ दिया जाय तो पुलमावा की साजिश में मोदी सरकार की एक करतूत है जो भारतीय सेनाओं की शहादत पर अपनी राजनीति रोटी सैंकने में लगी है।  
सच में मोदी है तेा कुछ भी नामुमकिन नहीं । 
भले ही सेना को कश्मीर में जूतें क्यों ना खाने पड़े या लोकतंत्र के  चौथे खंभे को घूटनों के बल रेंगना पड़े।
कश्मीर विधानसभा में  तीन साल मोदी सरकार ने उस मुफ्ती (बाप-बेटी) की सरकार चलाई जिसने 'जैस ए मोहम्मद' के सरगना को आजाद किया था। जिसने भारत के विमान अपहरण पर  आतंकवादियों  को छुड़वाने में भारत पर दबाव बनाया था, और खुद भारत के गृह मंत्री (मुफ्ती मोहम्मद सईद) रहते भारत सरकार के मंत्री को आतंकवादियों के साथ कंधार भेजा था। जिसने अपनी बेटी डॉक्टर रूबिया का अपहरण का नाटक रचकर खुंखार आतंकवादियों को जेल से रिहा करवा दिया था। जिसे खुद मोदी ने जम्बू-कशमीर विधानसभा चुनाव में आतंकवादी कहा था के साथ सरकार बना ली थी । आज कश्मीर की इस हालात का एक मात्र दोषी मोदी है जिसके चलते करगील के बाद सेनाओं की लगातार हत्या कश्मीर में  हो रही है और सरकार चुपचाप सब कुछ देखती रही।  देशप्रेम और देश सुरक्षा से गद्दारी करने वाला प्रधानमंत्री मोदी जब छुप के पाकिस्तान जातें हैं तब उनकी देशभक्ति कहां चली गई थी?
लोकसभा के चुनाव में अपनी पांच साल कि विफलताओं को छुपाने का सबसे बड़ा हथियार यही था कि लोगों को देश की रक्षा के नाम पर बड़गलाया जा सके। भले ही मोदी सरकार इसमें एक बार सफल हो कर पुनः जोड़-तौड़कर पांच साल सत्ता में आजाए, पर भारत के पत्रकारों को यह बात डायरी में लिख लेनी चाहिये कि लोकतंत्र का अंत अब निकट आ चुका है। कलतक जो पत्रकार गुलामी करते थे वे अब गुमनामी की जिंदगी जियेगें। जयहिन्द।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

चौकीदार के रहते चोरी हो गई ?


जबसे मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद को सुशेभित किया है तबसे ‘चौकीदार’ शब्द की गरिमा को गहरा सदमा लगा है। एकतरफ ‘चायवाले’ सबके सब जश्न माना रहे थे कि उनकी जमात का एक ‘भाई’ प्रधानमंत्री बन गया, तो वहीं दूसरी तरफ ‘चौकीदारी’ पेशे से जुड़े लोगों को हर तरफ शक की निगाह से देखा जाने लगा । विपक्ष ताबड़तोड़ ‘चौकीदारी चोर है!’ बोल-बोलकर ऑक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी में   ‘चौकीदार’ शब्द की  नई परिभाषा गढ़ने  में तुला हुआ है। 
जब ‘चोर की दाड़ी में तिनका’ हो तो चोर कितना भी शातिर, चालाक क्यों न हो कोई न कोई निशानी जरूर छोड़ देता है।  कुछ ऐसा ही राफेल के सौदे को लेकर उच्चतम न्यायालय के पिछले फैसले में हुआ- जब माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘शीलबंद’ लिफाफे की सुनवाई करते हुए अपना एकतरफा फैसला सुना कर चौकीदार की वफ़ादारी पर मोहर लगा दिया था, तो इस फैसले के साथ भी यही हुआ।
          एक दिन ऐसा भी आया जब फ्रांस की कंपनी दसाॅल्ट से 36 राफेल विमान सौदे पर  प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जिनकी याचिका को उच्चतम अदालत ने पिछली सुनावाई के दौरान रद्द कर दिया था पुनः उनकी दलीलों पर सुनवाई करने का फैसला वह भी खुली अदालत में करने का निर्णय ले लिया और पुनरीक्षण याचिकाओं पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पुनः सुनवाई भी शुरू कर दी। 
इस बार उच्चतम अदालत का रूख कुछ अलग था । जहां एक तरफ सरकार बचाव की मुद्रा में खड़ी देश की सुरक्षा की दुहाई दे रही थी और अदालत को इशारों-इशारों में यह बताने का प्रयास किया जा रहा था कि चौकीदार का अर्थ है ‘‘सुप्रीमो ऑफ इंण्डिया’’ साथ ही जिस सच को छुपाने का शीलबंद लिफाफे का खेल केन्द्र की सरकार ने उच्चतम अदालत की प्रतिष्ठा का दाव में लगा कर खेला था, जब इसका सच हिन्दू समाचार पत्र ने सार्वजनिक कर दिया तो, सरकारी वकील व अटाॅर्नी जनरल वेणुगोपाल ने अदालत से कहा कि वे दस्तावेज जो हिन्दू समाचार  में छपे थे, वे चोरी किये गए दस्तावेज हैं। 
अर्थात सरकार यह मानती है कि उन दस्तावेजों में जो कुछ भी लिखा हुआ है वह सच तो है पर चोरी किये हुए दस्तावेज़ हैं। सरकार स्वीकार करती है कि प्रधानमंत्री का सीधा हस्तक्षेप राफेल के सौदे में था पर वह चूंकि दस्तावेज चोरी किये गये हैं इसलिये वह अपराध की श्रेणी में नहीं आ सकते।
अर्थात सरकार गोपनीयता व सरकारी दस्तावेज गोपनीयता कानून की दुहाई देकर यह बताने का प्रयास कर रही है कि उसने खून तो किया है पर यह खून अपराध नहीं है। इसलिये इसकी जांच कोई नहीं कर सकता और अदालत को भी इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये ।
जब से मोदी की सरकार आई है तब से देश भक्ति के नाम पर कुछ भगवाधारण गिरोह ‘मोदीभक्त’ बनकर गाहे-बगाहे देश में देश भक्ति का नया अर्थ गढ़ रहें हैं। 
कभी देश भक्ति, कभी हिंदुओं की रक्षा, तो कभी देश की सुरक्षा, मोदी सरकार का सारा जबाब इसी केन्द्र बिंदु पर आकर सिमट जाता है। 

सवाल उठता है  एक भ्रष्ट चौकीदार अपने बचाव में देश की सुरक्षा की दुहाई कब तक देता रहेगा? क्या राफेल की सारी फाइलें जब इनका कार्यकाल समाप्त हो जायेगा तो जला दिया जायेगी या गायब कर दिया जायेगी अथवा मोदी जी की कार्यकाल की सभी फैसले देश की सुरक्षा के नाम पर तहखाने में भारत सरकार दबाकर रख देगी ? क्या उच्चतम अदालत, बंद अदालतों में ही सभी फैसले किया करेंगी और निर्णय की जगह खाली रखकर , देश की सुरक्षा की दुहाई देगी, जैसा केग ने किया है?
आज उच्चतम अदालत को यह भी सोचना होगा कि देश की सुरक्षा की दुहाई देकर मोदी सरकार ने 130 करोड़ जनता के विश्वास पर जो गद्दारी की है, जिसने देश की सुरक्षा को व्यापार में बदल दिया,  जिसने कैग की रिपोर्ट से भी आंकड़ों को मिटा दिया, जिसने उच्चतम अदालत को कह दिया कि ‘‘उच्चतम अदालत को ‘‘इज और हैज’’ नहीं मालूम’’, जो सरकार राफेल के सौदे पर लगातार झूठ पर झूठ बोल रही है । इस सौदे का सबसे बड़े लाभार्थी एक पत्रकार पर 5000 करोड़ का मानहानि का दावा ठोक सकता है। अदालत को उस लाभार्थी से भी यह तो जरूर पूछना चाहिये कि आपके के स्वामित्व वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस  जब खुद को दिवालिया घोषित कर रही है तो आपकी कीमत 5000 करोड़ की आंकी जाए या दो कौड़ी की?
आज उच्चतम अदालत के हाथ में देश का भविष्य उम्मीद की आस लगाये बैठा है । देश की सुरक्षा के नाम पर जो सौदेबाजी चल रही है इसपर विराम लगाने का समय आ गया है। दस्तावेज यदि सही है तो भले ही वे दस्तावेज चोरी से लाये गये हैं सरकार या तो इस दस्तावेज का सिरे से इंकार करे कि अन्यथा अदालत को चाहिये कि इसपर संज्ञान लेते हुए, चौकीदार की इस चोरी और धोखाघड़ी पर कठोर से कठोर फैसला लें ताकि भविष्य में कोई भी प्रधानमंत्री ऐसा करने की जुर्रत ना कर सके । जयहिन्द !
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी
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गुरुवार, 10 जनवरी 2019

आरक्षण - “Separate but ‘Not’ equal”

उच्चतम अदालत को अपनी उसी परिभाषा को नये सिरे से लिखना होगा जिसमें 1993 में कहा था कि  & “Separate but equal”    यानि कि 50% - 50%  अर्थात अदालत को  अब 2019 में    50% = 10% + 40%  लिखना होगा यानि कि & “Separate but ‘Not’ equal”   ।
लेखक: शंभु चौधरी, कोलकाता 10 जनवरी 2019

भाजपा ने 2014 में अपने चुनावी घोषणा पत्र में कई वायदे जनता से किये थे, जिनमें प्रमुख रूप से ‘‘अच्छे दिन आयेंगे’’, 15 लाख सबके खाते में आयेंगे, प्रति वर्ष 2 करोड़ युवकों को नौकरी देगें, मंहगाई पर लगाम लगायेगी, राष्ट्रीय स्तर पर कृषि बाजार निर्मित करना, पीपीपीपी यानि "पीपल पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप माॅडल" निश्चित करना, फास्ट ट्रेक कोर्ट स्थापना करना,  वैकल्पिक न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाना,  अमीर-गरीब के मध्य अंतर को कम करना,  शिक्षा के स्तर का विकास, कौशल विकास, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना, राम मंदिर निर्माण भी कार्य करेगी के साथ ही मोदी ने ‘‘सबका साथ-सबका विकास’’ का नारा भी दिया था । 
आज पौने पांच साल गुजर जाने के बाद भी ये सभी वादे मुंह बाये जस की तस खड़े हैं । मंहगाई ने अपनी चरम सीमा को पार कर दी है। रोज़ाना घरों में काम आने वाले गैस का मूल्य 400 से एक हजार रुपये प्रति सिलेंडर को छू गया, तेल में सरकारी लूट का आलम यह था कि 20 रुपये का तेल 90 रुपये की सीमा को छूने लगा था। चुनाव सर पर आते ही मोदी सरकार को फिर वे बातें याद आने लगी जो पांच साल पहले जनता से की थी । यानी युवाओं को नौकरी देना, राम मंदिर बनाना , तेल के दामों में गिरावट दर्ज करना ।    तो दूसरी तरफ अपने पांच साल के कार्यकाल में 100 अधिक देशों के विदेशी भ्रमण 2000 करोड़ का मौज़, राफेल के सौदे में हुई खुली डकैती जो उच्चतम अदालत को भी विवाद के घेरे में ला खड़ा की । तोते की लड़ाई किसी से छुपी नहीं है। आर्थिक रूप से नोटबंदी और जीएसटी की असफलता, व तमाम संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने, मोब लांचिंग व गौ रक्षा के नाम पर तालिबानी आतंक का सृजन करना । बैंकों के लुटेरों के साथ पार्टी मनाना और भारतीय की रक्षा के साथ खिलवाड़ करते हुए पाकिस्थानियों को' उरी' घटना जांच में का निमंत्रण देना, भारतीय सेनाओं की सेना के मनोबल को कमजोर करते हुए मुफ्ती की सरकार बनवाना आदि कई ऐसे एकतरफ़ा  फैसले मोदी ने लिये जो लोकतंत्र के लिये कभी भी घातक साबित हो सकता है। 
अब चूंकि सत्तरवीं लोकसभा का चुनाव सर पर आ चुका है। इधर पिछले माह तीन हिन्दी भाषी राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार, मोदी लहर का ना होना, साथ ही विभिन्न राजनीति पार्टियों का राजनीति समीकरण जिसमें प्रमुख रूप से महाराष्ट्र में शिवसेना का आँख तरेरना और असम में अगप का एनडीए से अलग होना, बिहार और गुजरात में कड़ी टक्कर व उत्तरप्रदेश में मायावती व अखिलेश का मिलकर चुनाव लड़ना मोदी सरकार के लिये भारी पड़ने वाला है । यदि इसे सीटों के अनुसार जिनमें पिछले कई विधान सभाओं के चुनाव परिणामों और राजनैतिक समीकरण का कुल जोड़ जहां आज भाजपा को 200 सीटों का आंकड़ा 100 सीटों पर आकर थम जाती है। यानि की भाजपा को चंद राज्यों में जैसे त्रिपुरा, केरल, और पश्चिम बंगाल में एक-दो सीटों का फायदा भी भाजपा को 271 के जादुई आंकड़े को पार नहीं कर पायेगी । यदि इनको परिणाम में बदल दिया जाय तो भाजपा की वर्तमान मोदी सरकार 150 से 180 सीटों के बीच सिमट जायेगी ।
तो मोदी जी को अब याद आया कि ‘‘सबका साथ और सबका विकास’’ भी कुछ कर ही दिया जाए नही तो किस मुंह से जनता के बीच जायेगें। राम मंदिर के 25 सालों की चुप्पी के बाद आरएसएस का अलाप, अध्यादेश लाने के मामले में बिखरती एनडीए को रोकने के लिये मादीजी को स्पष्ट करना पड़ा कि वे अदालत के फैसले का इंतजार करेगें और शीतकालीन सत्र के अंतिम पल में आरक्षण को नया हथियार बना लिया । 
1896 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक सिद्धांत बनाया था - “Separate but equal” जिसमें यह कहा गया कि हर इंसान की अलग व्यवस्था तो संभव पर समान होनी चाहिये। अदालत ने स्वीकार किया था कि समानता के विभिन्न रंग जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों संभव है। जनसंख्या के विभिन्न वर्गों के बीच असमानताओं को कम करने और न्यायोचित और सामाजिक व्यवस्था को बढ़ावा देने की राज्य की जिम्मेदारी है।  जिसमें सभी वर्गों को समान लाभ मिल सके। जिसें सामाजिक सुरक्षा, न्याय, समानता, रोज़गार के समान अवसर, शिक्षा व स्वस्थ्य जैसे महत्व को इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य माना गया ।
डाॅ. अंबेडकर ने भी उपरोक्त सिद्धांत सही मानते हुए भी अल्पसंख्यकों के आरक्षण को उचित ठहराया था । 1993  में भी उच्चतम अदालत आठ जजों की संविधान पीठ ने ‘‘ इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार में इस सिद्धान्त को पुनः 100 साल के बाद प्रतिपादित करते हुए 50 प्रतिशत के आरक्षण को स्वीकारते हुए निम्न बातें प्रमुखता से कही -
(i) अनुच्छेद 16 (4) के तहत आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए।
(ii)) अनुच्छेद 16 (1) या 16 (4) के तहत पिछड़े वर्ग के अलावा किसी भी वर्ग के लिए कोई आरक्षण नहीं किया जा सकता है।
(iii) किसी समुदाय को सहयोग प्रदान करना जो अनुच्छेद 16 (1) में शामिल हैं, लेकिन यह भी बहुत सीमित है।
सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान वाले संविधान संशोधन बिल को मंगलवार को निचली सदन (लोकसभा) में और बुधवार को ऊपरी सदन (राज्यसभा) से मंजूरी मिल गयी। सवर्ण आरक्षण बिल को लोकसभा के अंतिम दिन सदन में रखते हुए केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि- ‘‘हम गरीबी हटाने के सिर्फ वादे नहीं इरादे लेकर आए हैं’’ और अंत में मोदी के नारे  ‘‘सबका साथ - सबका विकास’’ की बात को दोहराते हुए भाजपा की मंशा को साफ कर दिया कि मोदी सरकार इस आरक्षण के सहारे चुनावी समर में अपने प्रतिपक्षों की एकता को तौड़ने के काट खोज रही है। साथ ही गहलोत ने उच्चतम अदालत के उक्त फैसले का जिक्र करते हुए भी कहा कि हम इसी लिए संविधान में संशोधन ला रहे है कि इसे अदालत में चुनौती ना दी जा सके जैसा की 1993 में हुआ था । सवाल वहीं आज भी खड़ा है जहां हम 1993 में थे । संविधान की धारा अनुच्छेद 15  में नया उपबंध (6) a & b - जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान  और अनुच्छेद 16  में नया उपबंध (6) जिसमें कहा गया यह संशोधन अनुच्छेद 16(4) में दिये प्रावधानों के अतिरिक्त होगा।
सवाल उठता है क्या यह भी ‘‘मोदी का जमुला’’  बन कर रह जायेगा । चुंकि बिल को प्रस्तुत करते समय इस बात को गौन रखा गया कि 10% किसका होगा? बचे शेष भाग 50% का 10%  होगा कि 100% का, किसका होगा? यदि हम इसे 100% का ही मान लें यह आरक्षण, समानता का कौन सा पैमाना माना जायेगा? उच्चतम अदालत को अपनी उसी परिभाषा को नये सिरे से लिखना होगा जिसमें 1993 में कहा था कि  & “Separate but equal”    यानि कि 50% - 50%  अर्थात अदालत को  अब 2019 में    50% = 10%+40%  लिखना होगा यानि कि & “Separate but ‘Not’ equal”   ।  जयहिन्द !        
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र त्रकार हैं  विधि विशेषज्ञ भी है।

बुधवार, 2 जनवरी 2019

चोर की दाढ़ी में तिनका - शंभु चौधरी



कोलकाता 03 जनवरी 2019 ( शंभु चौधरी ) - नये साल में प्रधानमंत्री मोदी का प्रिपेड भाषण एक खास संवाददाता के माध्यम से देश की जनता को सुनने को व प्रिंट मीडिया के माध्यम से पढ़ने को मिला । मोदी जी ने यह पहले से ही मान लिया कि 2019 का आगामी लोकसभा चुनाव में जनता का  वही प्यार मिलेगा जो उन्हें 2014 के लोकसभा के चुनाव में मिला था, परन्तु  मोदी जी यह भूल गये कि ठीक चंद महीनों के बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव भी हुए थे मोदी जी अपनी तमाम ताकत, भाजपा, आरएसएस, बजरंग दल, प्रिपेड मीडिया की जमात, सरकारी बल, दिल्ली पुलिस, सेक्स वीडियो, अफ़वाह, केजरीवाल के परिवार पर अशोभनीय, अभद्र, अपमान जनक भद्दे लाक्षण लगाना, भगोड़ा-भगोड़ा बोल कर अपमानित करना, पैसों को पानी की तरह बहाना, मानो मोदी  जी ने यह ठान लिया था कि दिल्ली की जनता को अपने झूठ-प्रपंच के जाल में फंसा कर उनको ठग लिया जाए । परन्तु इन सबके बावजूद परिणाम जो सामने आये वह ऐतिहासिक थे । 54.2 प्रतिशत वोट 70 में 67 सीटों पर केजरीवाल की वापसी, मोदीजी को यह बताने के लिये काफी है कि यही लोकतंत्र हैं जिसे धन-बल और छल से ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता, ना ही स्व. इंदिरा गांधी के आपातकाल  से ।

मोदी जी ने अपने उक्त प्रिपेड भाषण में पिछले अपने साढ़े चार सालों में किये कार्यों की चर्चा करते हुए  अपने कार्यों की  एक प्रकार से सफाई दे रहे थे। मानो उन्होंने जो कुछ भी किया वही सही था और जो गलत हुआ वह सब कांग्रेस के जमाने का था।
सर्जिकल स्ट्राइक पर साढ़े चार सालों के बाद  उन्हें  वे पल याद आने लगे जो सेना के जवानों के साथ गुजरे, मानो  सर्जिकल स्ट्राइक के समय, प्रधानमंत्री इतने भावुक थे कि एक भी सेना मर जाता  तो वे आत्महत्या कर लेते? वहीं उनके नाक के नीचे पाकिस्तान से चंद पाक आतंकवादी भारतीय सीमा के अंदर  'उरी' में आये और  सर्जिकल स्ट्राइक कर के चले गये। सेना के 18 जवानों को मौत के घाट सुला गये और भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तानी सेना से ‘उरी घटना’ जांच करने में लग गये। लगातार पाकिस्तान, भारतीय जवानों के साथ कायरता पूर्ण कार्यवाही करता रहा और मोदी जी देश को गुमराह कर छुप कर नवाज शरीफ से मिलते रहे। भारतीय सेनाओं को कश्मीर की सड़कों पर जूतों से पिटवाते रहे व खुद मुफ्ती की सरकार में अनुच्छेद 370 पर गुप्त समझौता करते रहे। पाकिस्तान से सेना के दो ‘सर’ वापस लाने की बात दूर, इनकी आंखों के सामने भारतीय सेना के कई जवानों के सर कलम कर के साथ ले गये।

दूसरा उन्होंने नोट बंदी पर कहा कि - वे इसकी चेतावनी कई बार देते रहे। काला धन निकालने के लिए सरकार ने डिस्क्लोजर स्कीम भी लाई । मोदी जी यह बताने का कष्ट करेंगें कि डिस्क्लोजर स्कीम का ग़रीबों से क्या लेना देना था? 120 लोगों की जान ले लेने के बाद, देश की अर्थव्यवस्था को खोखला बना देने या फिर किसानों की, व्यापारियों की कमर तोड़ देने को मोदी जी अपनी सफलता मानतें हों तो फिर तो इस तुगलकी फरमान का दर्ज देना कहीं ज्यादा उपयुक्त होगा।
तीसरा उन्होंने जीएसटी को लेकर यह सफाई दी - कि यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था। जब सर्वसम्मति का ही फैसला था और कांग्रेस कार्यकाल का ही निर्णय था तो इसमें मोदी की क्या भूमिका? अर्थात कांग्रेस की योजनाओं को लाभ मिले तो मेरा और हानि हो तो तेरा? अभी बंगाल के वित मंत्री अमित मित्रा ने एक चौंकाने वाला बयान दिया कहा कि ‘‘जीएसटी हवाला का कारोबार हो गया। चंद बड़े उद्योगपतियों ने इसे नकली रिफंड लेने का जरिया बना लिया  है।" अर्थात भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहीं जानबूझ इन हवाला कारोबारियों के लिये सुराख तो नहीं छोड़ दिया?
चौथा राफेल को लेकर आपने कहा कि वे काम करते रहेगें - मोदी जी ने उच्चतम अदालत का हवाला तो दे दिया पर यह नहीं बोले कि अदालत के "एकतरफ़ा निर्णय" में जिन ख़ामियों को भारत सरकार ने भी चिन्हित कर उच्चतम अदालत को अपमानीत करने का काम आपकी सरकार ने किया "कहीं यह क्या चोर की दाढ़ी में तिनका तो नहीं ?"
अंत में राम मंदिर को लेकर एक कहानी याद आ गई - एक किसान ने  एक तोता पाल रखा था । उनके परिवार के सभी सदस्य तोता को आते-जाते यही सिखाते ‘‘तोता ! राम-राम बोलो’’ तोता भी यह समझ जाता कि उसे ‘‘राम-राम’’ बोलने को कहा जा रहा है । परन्तु  तोता "राम-राम" बोलने के बदले "चोर-चोर"  चिल्लाने लगता । एक रात मोहल्ले का चौकीदार रात को, घर का आंगन सूना देखकर घुस आया । तोता जोर से ‘‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगा । किसान ने चौकीदार को धर-दबोचा। तब चौकीदार ने अपना बचाव करते हुए दलील दी कि वह तो मोहल्ले का चौकीदार है। वह तो चोर को पकड़ने के लिये आया था ना कि चोरी करने । जयहिन्द !
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र त्रकार हैं  आपने विधि स्नातक (LL.B)  और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से एम.ए. (एमसी) की है।

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

झूठ बोलना भी कला है

झूठ बोलना भी कला है
कोलकाता 18 दिसम्बर 2018

पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने एक रायबरेली में अपने भाषण में कहा कि ‘‘झूठ बोलने वालों पर सत्य बोलने वालों की विजय होती है। सच को श्रृंगार की जरूरत नहीं होती, झूठ चाहे जितना बोलो इसमें जान नहीं होती। झूठ की पंक्तियों को कुछ लोगों ने जीवन का मूल मंत्र बना लिया है।’’ इस बात से एक कहानी याद आ गई - 
‘‘राजस्थान के एक गांव में एक बहुत बड़ा व्यापारी रहता था उसके कारोबार का हिसाब-किताब देखने के लिये उसने एक मुनिम भी रख रखा था । मुनिम बहुत ही चालाक बुद्धि का था। वह उस व्यापारी को रोज फायदा करवाता। कभी जोड़ में भूल दिखा के, कभी दाम के भाव बढ़ा कर तो कभी गल्ले में सरप्लस दिखा के । व्यापारी को लगा कि यह आदमी तो बहुत काम का है । उसकी हर बात मानने लगा । इधर मुनिम जी ने जब व्यापारी को अपने जाल में फंसा लिया तो उसने उसके व्यापार को भीतर ही भीतर खोखला करने लगा । खाते में कुछ, हकिकत में कुछ दिखने लगा । एक दिन अचानक से व्यापारी को मंदी का सामना करना पड़ा, तब व्यापारी ने मुनिम को बुलाकर पूछा कि जो हर साल का मुनाफ़ा जमा होता था उसका हिसाब दो तब मुनिम ने जबाब दिया सेठ जी ! वह तो दो दिन के घाटे के भुगतान में ही समाप्त हो गया और आज के दिन तो आपके सर पर दस लाख का कर्ज चढ़ गया है । व्यापारी  ने अपना सर पीट लिया’’  कुछ ऐसा ही हाल आज हमारे देश का है।
पिछले साढ़े चार सालों में मोदी की सरकार में कुछ ऐसा ही हो रहा है । नोट बंदी से देश को जो घाटा हुआ उसे हमारे वित्तमंत्री जी जीएसटी से पूरा करने की हड़बड़ी की । जब जीएसटी से बात नहीं बनी तो वित्तमंत्री जी आरबीआई में जनता का जमा धन पर डाका डालने पंहुच गये ।
2014 के बाद से ही झूठ का व्यापार चल रहा है । झूठी अफवाहें फैला कर लोगों की हत्या करना। झूठे वायदे कर देश की जनता को गुमराह करना । चुनाव में किये सभी वायदे भले ही वह काला धन लाने का वायदा हो या 15 लाख रुपये लोगों के खातों में जमा करने का वायदा सब झूठ का पुलंदा साबित हुआ । युवाओं को नौकरी देने के नाम पर पकौड़े बेच के काम चलाने की सलाह से लेकर किसानों को न्यूनतम लागत मूल्य का भुगतान अथवा उनकी आमदनी को दोगुना करने की बात हो या फिर राफेल में सुप्रीम कोर्ट तक को झूठे दस्तावेज़ प्रस्तुत कर सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को तक ताक पर लगा देना, यह सब मोदी सरकार की झूठ बोलने वाली मशीन का कमाल है। 
मोदी जी के आने के बाद हर जगह झूठ बोलने के एटीएम लग गये हैं। मीडिया से लेकर संसद तक में झूठ का बोलबाला है । पिछले 70 सालों में झूठ पर इतना ज्ञान देते, आपने किसी प्रधानमंत्री को कभी ना सुना होगा, जितना मोदी के भाषणों से सुनने मिल रहा है । यह झूठ बोलने की कला ही तो है कि भक्तों को सब कुछ सच नजर आता है ।
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र त्रकार हैं  विधि विशेषज्ञ भी है।

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

बंगाल: लोकतंत्र बचाओ रथ यात्रा

दो दिन पूर्व राफेल सौदे में सुप्रीम कार्ट ने जो एकतरफ़ा सीलबंद लीफाफे के आधार पर बिना प्रतिपक्षों की दलीलों को सुने भारत सरकार के झूठ को अपने कलम से लिख का देना इसे  फैसला तो कदापी नहीं माना जा सकता । यह भी एक प्रकार का भ्रष्टाचार को बचाने का प्रयास है। कानून के कार्य में लिप्त कोई व्यक्ति भले ही इसे सही ना माने पर यह फैसला की परिधी में तो कदापि नहीं आ सकता।

कोलकाता: 16 दिसम्बर 2018

लोकसभा चुनाव से ठीक पूर्व देश में पांच बड़ी घटना घटी: पहला- सीबीआई के दो प्रमुखों में भ्रष्टाचार के आरोप पर आपस में ही घमासान होना, दूसरा- मोदी के आदेश पर नियुक्त अर्जित पटेल का सरकार द्वारा आरबीआई के खज़ाने को हड़पने के प्रयास के विरूद्ध त्यागपत्र देना, तीसरा- चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव अधिकारी के रूप में अपने ही प्यादे सुनील अरोरा की नियुक्ति, चाौथा- पांच राज्यों के विधान सभाओं के चुनाव में करारी हार और पांचवा- सुप्रीम कोर्ट का लिफाफा बंद फैसला ।
जो भाजपा बंगाल में लोकतंत्र बचाओ रथयात्रा निकालने की बात कर रही है उसी भाजपा सरकार के सारे कृत्य देश के लोकतंत्र को मटीयामेट करने में लगी है । चाहे वह सुप्रीम कोर्ट में प्रमुख की नियुक्ति में हेराफेरी का मामला हो या फिर सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति का मामला हो। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के ही चार जजों ने देश के इतिहास में पहली बार प्रेस के सामने आकर कहा था कि ‘‘ सबकुछ ठीक नहीं चल रहा’’  इसे आम साधारण घटना नहीं मानी जा सकती ।
दो दिन पूर्व राफेल सौदे में सुप्रीम कार्ट ने जो एकतरफ़ा सीलबंद लीफाफे के आधार पर बिना प्रतिपक्षों की दलीलों को सुने भारत सरकार के झूठ को अपने कलम से लिख का देना इसे  फैसला तो कदापी नहीं माना जा सकता । यह भी एक प्रकार का भ्रष्टाचार को बचाने का प्रयास है। कानून के कार्य में लिप्त कोई व्यक्ति भले ही इसे सही ना माने पर यह फैसला की परिधी में तो कदापि नहीं आ सकता।
जो भाजपा की  मोदी   सरकार लोकतंत्र की हत्या पर हत्या किये जा रही है । यदि इसे ही लोकतंत्र कहा जा रहा है तो निश्चय ही लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा है।
जिस प्रकार बाबा रामदेव की कंपनी में इसकी कुल संपदा पिछले चार सालों में 850 करोड़ की कंपनी का 11526 करोड़ की कंपनी हो जाना और इसके विज्ञापनों के माध्यम से लोकतंत्र का हरण करना भी निश्चय रूप से किसी बड़े खतरे को संकेत देता है।
जिस प्रकार मोदी की सरकार ने चंद बड़े घरानों के लिए आते ही जमीन अधिग्रहण बिल लाये थे, जिस प्रकार मोदी ने नोटबंदी का फरमान लागू किया था, जिस प्रकार कश्मीर की विधानसभा को भंग किया गया, जिस प्रकार वहां गोवा में भाजपा की सरकार बनी, जिसप्रकर मोदीजी निजी फायदे और अनिल अंबानी को लाभ दिलाने के लिये भारत के वायु सेनाध्यक्ष से राफेल के पक्ष में बुलवना निश्चित तौर पर लोकतंत्र के लिये किसी खतरे से कम नहीं।
बंगाल में सबको पता है कि हर साल दिसम्बर से जनवरी माह तक गंगा सागर तीर्थयात्रियों का भारी जमावड़ा होता है देशभर से लगभग हर साल लाखों की संख्या में तीर्थयात्रियों का अगमन शुरू हो जाता है। ऐसे में भाजपा के द्वारा इस शांत क्षेत्र में धार्मिक उत्तेजना फैलाने की साज़िश कर रही है यह निश्चय ही लोकतंत्र के लिये किसी खतरे की ओर संकेत दे रहा है । यदि सच में भाजपा लोकतंत्र के प्रति इतनी चिंतित है तो उसे मोदी को सत्ता से हटाने पर विचार करना चाहिये।
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं  विधि विशेषज्ञ भी है।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

राफेल - सब कुछ सील है?

 भारत की उच्चतम अदालत ने सील बंद लिफाफे में बंद झूठ के सहारा लेकर देश को गुमराह करने का काम किया है। माननीय अदालत का दूसरे पक्षों को सुने बिना ही एकतरफ़ा  निर्णय देना खुद में अदालत की गरिमा को आघात पंहुचाता है। मानो अदालत का निर्णय भी सील बंद हो?
कोलकाता 15 दिसम्बर 2018
कल माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में हुए 30 हजार से अधिक के घोटाले और रिलायंस समूह के चेयरमैन की कंपनियों को ठेका दिये जाने पर प्रशांत भूषण सहित कई लोगों की याचिकाओं को खारिज कर दिया कहा – “हमने सब देख परख लिया और जांच लिया कि सबकुछ ठीक-ठाक हुआ है।“ केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अब इस विषय पर बोलना ‘‘सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है ’’
      आज इसी बात से इस लेख की शुरूआत करता हूँ न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा-5 न्यायिक कार्य की उचित आलोचना, जिस मामले को अंतिम रूप से सुन लिया गया हो और उसका अंतिम निर्णय अदालत के द्वारा दे दिया गया हो अवमानना नहीं है। शायद यह बात भारत के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पता नहीं कि राफेल के सील बंद लिफाफे का कल समापन सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया ।
अब बात सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर आता हूँ जिसपर टिप्पणी करना अदालत के अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत अवमानना नहीं है क्योंकि माननीय अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुना कर देश के चौकीदार और अनिल अंबानी को बहुत बड़ी सौगात दे दी।
अदालत ने अपने एकतरफा सील बंद लिफाफे के आधार पर दिये फैसले में तीन बातों का प्रमुख रूप से उल्लेख किया 1. उन्हें सौदे की प्रक्रिया पर कोई संदेह नहीं । 2. राफेल की कीमत तय करना अदालत का काम नहीं 3. 2016 में जब सौदा हुआ तो सवाल नहीं उठे।
1.    उन्हें सौदे की प्रक्रिया पर कोई संदेह नहीं  - अदालत ने एक पक्ष का सील बंद लिफाफा पढ़ा उसमें सही या गलत क्या है कैसे तय हो सकता है जबतक कि अदालत दूसरे प़ा की बात नहीं सुनती । इसका अर्थ है भारत सरकार को  क्लीनचीट की डिग्री सौंपना सरासर देश के साथ माननीय उच्चतम न्यायालय का धोखा है ।
2.    राफेल की कीमत तय करना अदालत का काम नहीं - जब राफेल की कीमत को तय करना अदालत का काम नही तो कैग कि रिपोर्ट कर जिक्र कैसे आया जो रिपोर्ट संसद में अभी तक प्रस्तुत ही नहीं की गई?
3.    2016 में जब सौदा हुआ तो सवाल नहीं उठे - अदालत तो यह कहना चाहती है कि यदि अपराध का पर्दाफ़ाश दो साल बाद हो तो कोई मुकदमा ही नहीं बनता ?
भारत के इतिहास में इससे बचकाना निर्णय शायद ही किसी अदालत ने अब तक किया होगा जा सुप्रीम कोर्ट ने दिया है।
टिप्पणी: भारत की उच्चतम अदालत ने सील बंद लिफाफे में बंद झूठ के सहारा लेकर देश को गुमराह करने का काम किया है। माननीय अदालत का दूसरे पक्षों को सुने बिना ही एकतरफ़ा  निर्णय देना खुद में अदालत की गरिमा को आघात पंहुचाता है। मानो अदालत का निर्णय भी सील बंद हो? 
Note: इस लेख की तमाम कानूनी प्रक्रिया के लिये इस लेख का लेखक जिम्मेदार है।
शंभु चौधरीलेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं  विधि विशेषज्ञ भी है।

रविवार, 25 नवंबर 2018

व्यंग्य: रामनाम सत्य है-

मोदी जी को पता है कि 2014 में मोदी की लहर 2019 में नहीं हैं । मोदी जी का पता है जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग उनके पाले से घसक चुका है । मोदी जी को पता है कि चुनाव आयोग के हाथ बंधे हुएं हैं । उसे पता है कि जिस सीबीआई को उन्होंने बर्वाद कर दिया वह मामला जल्द सुलझने वाला नहीं है ....
कोलकाता- 25 नवम्बर 2018
मोदी जी के कार्यकाल के चंद दिन ही गिनती के बचे हैं ओैर इधर पांच विधानसभा के चुनाव क्रमशः राजस्थान, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, मिजोरम और छत्तीसगढ़। इसमें तीन राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हालात बहुत खराब बताई जा रही है। तेलंगना पहले सह तेल भरने गया हुआ है । राजस्थान तो मानो हाथ से निकल ही चुका है मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा अपनी सांप्रदायिक कार्ड को खेल चुकी है। अर्थात बस किसी प्रकार जनता को फिर पांच साल गुमराह किया जाय । भाजपा और पंतजलि के विज्ञापन दाताओं को लगता है कि कहीं यही हाल उनका लोकसभा के चुनाव में ना हो जाय ? सो अभी से विश्व हिन्दू परिषद और आर.एस.एस और महाराष्ट्र का थूकचाटूकार नेता जो महाराष्ट्र में हिन्दीवासी प्रवासियों को पिटवाने में खुद की राजनीति मानतें हैं माननीय उद्धव ठाकरे 70 साल के इतिहास में पहली बार अयेध्या में रामनाम सत्य का नारा लगाने सबके सब पंहुच गये।
कहने का अर्थ है मोदी जी 2019 में नोटबंदी की सफलता पर नहीं, सीबीआई के घमाशान पर नहीं, अपने किये पापों के काले कारनामों पर नहीं, राफेल में हुए भ्रष्टाचार पर नहीं, गैस की किमतों में हुए  इजाफे पर नही तेल के दामों हुई लूट पर नहीं, ‘‘अच्छे दिन आयेंगे-कालाधन लायेंगे’’ पर नहीं, सेनाओं की मौत पर नहीं, देश की अर्थव्यवस्था को कंगाली के कगार पर ला दिया पर नहीं, बेरोजगारों के रोजगार पर नहीं, किसानों की मौत पर नहीं, अब या तो कांग्रेस को गाली देगी या फिर अपनी मां को चुनाव में भजाने का प्रयास मोदी जी करेगें।
2019 के चुनाव में मोदी की एक रणनीति साफ दिख रही है वह राममंदिर को लेकर देश में वातावरण को गरम कर देना चाहतें हैं और लोकसभा चुनाव की घोषणा का पहला भाषण होगा’ ‘‘उसे संसद के साथ-साथ राज्यसभा में भी बहुमत चाहिये’’  इसके लिये एक राममंदिर पर झूठा बिल इस बार लोकसभा में लाया जायेगा। जिसे लाकेसभा पारित कर राज्यसभा में भेजेगा कहेगा,  देखो हमारी सरकार राज्यसभा में अभी भी अल्पमत है आप मुझे लोकसभा के साथ-साथ राज्य सभा में भी बहुमत दे दो ।
मोदी जी को पता है कि 2014 में मोदी की लहर 2019 में नहीं हैं ।  मोदी जी का पता है जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग उनके पाले से घसक चुका है । मोदी जी को पता है कि चुनाव आयोग के हाथ बंधे हुएं हैं । उसे पता है कि जिस सीबीआई को उन्होंने बर्वाद कर दिया वह मामला जल्द सुलझने वाला नहीं है। वैसे भी सीबीआई उनके लोकसभा चुनाव में बाल भी नहीं उखाड़ के दे सकती । उन्हें पता है कि आरबीआई उनकी बात अब नहीं सुन रही और उन्हें पता है कि सुप्रीमकोर्ट अभी पूर्णरूपेन उनके साथ नहीं खड़ा हो सकता ।  इधर भाजपा का एक बड़ा खेमा अमित षाह और मोदी के व्यवहार से नाराज चल ही रहा है अरुण षौरी ने तो मोदी के षासन काल को हिटलर से तुलना तक कर ही दी । ऐसे में संघ को लगता है कि कहीं मोदी का ‘‘राम नाम सत्य’’ न हो जाए ? इसके लिये राम का सहारा लेना जरूरी हो गया । जब किसी व्यक्ति को षमशान घाट पंहुचाया जाता है तो लोग इसी बात की जयघोष करतें हैं  ‘‘राम नाम सत्य’’ ।

व्यंग्य: सीलबंद लीफाफा


अब मुख्य न्यायाधीश महोदय गोगई को कुछ तो करना ही होगा तो सीलबंद लिफाफे में सारी प्रक्रिया मांगते हुए सरकार को यह भी बोल दिये किसी अदालती आदेश के लिये नहीं बल्कि सिर्फ जनता को गुमराह करने के लिये और मामले को रफा-दफा करने के लिये वे सीलबंद लीफाफे में बस सौदे की क्या प्रक्रिया अपनाई गई है उसे देख लेना चाहते हैं।  जैसे सुप्रीम कोर्ट सीलबंद फैसला भी देने लगेगी ? मानो देश में मोदी से जुड़े तमाम भ्रष्ट्राचार के मामले बस सीलबंद ही रहेंगे।
कोलकाता- 18 नवम्बर 2018
सुप्रीम कोर्ट इन दिनों सीलबंद लिफाफे के चलते मशहूर हो चला है। राफेल सौदे से लेकर सीबीआई के आलोक वर्मा की जांच तक मानो सड़क पर एक पंडित जी महोदय एक तोते को पिंजड़े से बहार निकालकर सीलबंद एक लिफाफा लाने को कहता है और उस लिफाफे में लिखी बात उस व्यक्ति को बताकर उसका भविष्य बताता है ।  जब से माननीय रंजन गोगई महोदय सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश बने हैं तब से सीलबंद लिफाफे का रहस्य भी गहराता चला जा रहा है ।
अब राफेल सौदे में क्या रहस्य छुपा है सब तो किस्तों में जनता के सामने सच आ गया कि जिस दिन से मोदी सरकार सत्ता में आई तब से अनिल अंबानी नई कंपनी बननी शुरू कर दी थी। इस साहुकार से कोई यह पूछे कि इन कंपनियों को बनाने के पीछे उनकी मंशा जब राफेल सौदे को लेने की थी ही नहीं तो  एक के बाद एक शुरू में तीन कंपनियों का पंजीकरण, फिर दो नई कंपनी का गठन किन कारणों से हुआ? कि क्या साहुकार के साथ-साथ चाौकीदार भी हिस्सेदार हैं देश को लूटने में? जब बात उच्चतम अदालत में पंहुची तो अब मुख्य न्यायाधीश महोदय गोगई को कुछ तो करना ही होगा तो सीलबंद लिफाफे में सारी प्रक्रिया मांगते हुए सरकार को यह भी बोल दिये किसी अदालती आदेश के लिये नहीं बल्कि सिर्फ जनता को गुमराह करने के लिये और मामले को रफा-दफा करने के लिये वे सीलबंद लीफाफे में बस सौदे की क्या प्रक्रिया अपनाई गई है उसे देख लेना चाहते हैं।  जैसे सुप्रीम कोर्ट सीलबंद फैसला भी देने लगेगी ? मानो देश में मोदी से जुड़े तमाम भ्रष्ट्राचार के मामले बस सीलबंद ही रहेंगे।
अब सीबआई के मामले में देख लें इनका लिफाफा मीडिया वाले उड़ा लिया। साथ ही सीलबंद लिफाफे में जिस सीवीसी ने जांच की, वह खुद पाप के घड़े से लदा पड़ा है । उसकी जांच में क्या निकलेगा सबको पता है। तो आलोक वर्मा का सीलबंद लिफाफे को ही किसी ने सार्वजनिक कर दिया और उसका ठीकरा आलोक वर्मा के उपर ही फोड़ दिया । अब माननीय गोगई ने यह पहले से ही सोच लिया है कि उनको सिर्फ वही करना है जो चाौकीदार चाहेगा अर्थात राकेश अस्थाना की पुनः नियुक्ति वह भी उस पद पर जिसपर आलोक वर्मा कुछ दिन पूर्व विराजमान थे। कहने का अर्थ है सब कुछ सीलबंद सौदा है।

बुधवार, 7 नवंबर 2018

लोकतंत्र: भाइयों कुछ तो गड़बड़ है?


कोलकाता- 8 नवंबर 2018
 अभी हाल में ही रिजर्व बैंक का सुरक्षित कोष जो कि  देश की जनता का धन है उसका एक तिहाई हिस्सा सरकार उन लुटेरों  अडानी, अनील अंबनी व नीरव मोदी जैसे देश के महान लुटारों, जिन्होंने  देश लूटने में  उनको मदद की थी  के खातों में डाल देने का दबाव बना रही है ।  एक बात पुनः यहां उल्लेख करना चाहता हूँ पंतलजि का विज्ञापन लोकतंत्र को धराशाही करने में मोदी सरकार को सहयोग कर रहा है यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है 
दुष्यंत कुमार की एक कविता - दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है, आज कल नेपथ्य में संभावना है। 
आज इस बात को इतिहास में लिखना जरूरी हो गया कि भारत की प्रायः सभी संवैधानिक संस्थाएं जिसमें सुप्रीम कोर्ट से लेकर, चुनाव आयोग, सीबीआई, भारतीय रिजर्व बैंक, सीवीसी, व अन्य तंत्र पूर्ण रूप से मौजूदा हिटलरशाही मोदी सरकार के गिरफ़्त में आ चुकी है । सीबीआई में किस प्रकार राकेश अस्थाना की नियुक्ति से लेकर उनके काले कारनामों को बचाने के लिए जिस प्रकार रातों-रात सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं को ताख पर रख कर सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को उनको उनके पद से हटा दिया गया। ठीक यही घटना कुछ दिनों पूर्व सुप्रीम कोर्ट में हुई जिसमें चार जजों ने मीडिया के सामने आकर अपना दुखड़ा रोया था कि "सबकुछ ठीक नहीं चल रहा "। आदरणीय रजंन गोगोई की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से लेकर अन्य जजों की नियुक्तियों पर संध का हस्तक्षेप,  जिस प्रकार अभी से भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मोदी सरकार को मजबूत करने का राग दौहरने लगे, जिस प्रकार सेना के तीनों मुख्य सेनापति सरकार की सुरक्षा में तैनात दिखे,  आज रिजर्व बैंक की बात सामने आ गई - आरबीआई गवर्नर (पालतू) उर्जित पटेल जिसने नोटबंदी के समय से अबतक मोदी सरकार के कहे-कहे देश को गुमराह किया, आज उसी पर इतना भीतरी दबाब है कि वे खुद इस्तीफा देने की पेशकेश करने वाले हैं। ‘‘ दाल में काला तो जरूर है ’’ मोदी जी की ही भाषा में - ‘‘काली रात को काली करतूत - भाइयों कुछ तो गड़बड़ है? अब रात के अंधेरे में क्या होता है क्या यह भी  बताने की जरूरत है  आपको ! ’’
दुख तो तब होता है जब लोकत्रंत का प्रहरी मीडिया तंत्र जो खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा मानती है  उसका एक वर्ग पेट के रोग से ग्रसित हो चुका है उनके पेट में चांदी के जूतों का जौंक पैदा हो चुका है जो भीतर ही  भीतर शरीर रूपी लोकतंत्र का खून पीने लगा है । कभी हमें धर्म की खुंटी पीलाई जा रही है, कभी हमें राष्ट्रवाद की तो कभी देश की सुरक्षा की दुहाई दी रही है । मानो अचानक से सब कुछ खतरे में पड़ चुका हो । वही व्यक्ति जब देश के साथ गद्दारी करता है और भारतीय जवानों को भारत की सड़कों पर ही जूतों से पीटवाता हो ।  देश द्रोहियों (मोदी जी ने ही कहा था) के साथ सरकार बनाता हो तब इनकी देशभक्ति किस अंतरिक्ष यात्रा पर चली जाती है ? ‘‘भारत माता की जय’’ या  ‘‘गाय का मांस खाने की बात’’ क्यों टाल दी जाती जब इनको सरकार बनानी होती?  राममंदिर इनका चुनावी मुद्दा बनकर क्यों रह गया? यह सोचने की बात है।  पिछले पांच सालों की कुव्यवस्था से आज देश की अर्थव्यवस्था विनाश के कगार पर आ चुकी है । तेल व गैस के दामों से जनता को लूटने के बाद भी, बच्चों की शिक्षा पर 18% प्रतिशत जीएसटी (GST) लगा देने बाद भी, डालर अपनी रफ्तार पकड़ेे हुए है ।  अभी हाल में ही रिजर्व बैंक का सुरक्षित कोष जो कि जनता का धन है का एक तिहाई हिस्सा सरकार उन लुटेरों - अडानी, अनील अंबनी व नीरव मोदी जैसे देश के महान लुटारों, जिन्होंने  देश लूटने में  इनको मदद की  के खातों में डाल देने का दबाव बना रही है । एक नीरव मोदी से देश के किसानों को भला हो सकता था पर नहीं हुआ। एक अनिल अंबानी से देश के सैकड़ों गांवों में शिक्षा व इलाज की व्यवस्था हो सकती थी नहीं हुई, पर मोदी सरकार देश को गंभीर आर्थिक संकंट में डालने के हर उस कदम पर मोहर लगा रही हैं जो देश को बर्वाद करने में तुली हो।  यह किसी आर्थिक खतरों की तरफ संकत दे रहा है कि देश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा ।
एक बात पुनः यहां उल्लेख करना चाहता हूँ पंतलजि का विज्ञापन लोकतंत्र को धराशाही करने में मोदी सरकार को सहयोग कर रहा है यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है।  अतः मीडिया तंत्र को कहीं लकवा ना मार जाए इस बात पर बहस जरूरी है कि उन प्रतिष्ठानों में काम लोकतंत्र की  शर्त पर की जाय या नही ?
 - शंभु चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

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शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

चुनाव-2019: भेड़िया आया


कोलकाता- 2 नवंबर 2018
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक लघु कथा है ‘भेड़िया’ गांव में एक बालक हर बार गाँववालों को मुर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया करता था। जब भी उसको गांव वालों को मुर्ख बनाने की जरूरत पड़ती वह गांव में भागा-भागा आता और जोर-जोर से चिल्लाता ‘‘भेड़िया आया... भेड़िया आया...’’ बस गांव के सारे लोग उस बालक के कहे-कहे भेड़िया को मारने दौड़ पड़ते। पर हाथ कुछ नहीं आता । बालक मन ही मन गांव वालों की मुर्खता पर इतराता और मजा लेता था ।
इस बार के चुनाव में इस बालक को पहले से अंदाज हो चुका है कि उसे लोक सभा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। जिसमें राजस्थान, तेलंगाना मध्य प्रदेश और मिजोरम और छत्तीसगढ़। इसमें तीन राज्यों राजस्थान, तेलंगाना मध्य प्रदेश में भाजपा की हालात बहुत खराब बताई जा रही है।  इन सभी राज्यों में लोकसभा की 83 सीटें हैं। यदि हम प्रमुख तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और मिजोरम और छत्तीसगढ़ की बात करें इन तीन राज्यों में भाजपा के पास अभी 16वीं लोकसभा की 61 सीटें हैं। भाजपा को लगता इन राज्यों में हमने जनता को इतना छल्ला है कि अब धोखे से भी हमारी बात में नहीं आयेगें। विधानसभा चुनाव से उनके तलवे की जमीं अभी से ही खिसकती दिखाई दे रही है। 
लगे हाथ आपको बताता चला जाऊँ कि इस बार भाजपा को सत्ता में लाने के लिये चुनाव आयोग खुलकर जनता के साथ धोखा/साज़िश करने का मन बना चुकी है। पूरी की पूरी चुनाव आयोग की टीम तोता बन चुकी है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पिछली चुनावी घोषणा के ठीक एक दिन पूर्व भाजपा के द्वारा तेल के दामों में 2.5 रुपये की कटौती करना । इसका स्पष्ट अर्थ निकलता है कि चुनाव आयोग भाजपा की ‘बी टीम’ के रूप में कार्य कर रही है। 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून 2014 को हुआ था एवं इसके इसका कार्यकाल 3 जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जायेगा । स्पष्ट है कि आगामी चुनाव की तिथि की घोषणा आगामी जनवरी-फरवरी माह में किसी भी समय कर दी जायेगी 
आज एक पंचतंत्र की कहानी सही साबित हो रही चालाक सियार ने शेर के खोल धारण कर लिया है। आरएसएस की मुंबई में हुए तीन दिवसीय शिविर के समापन में संघ के महासचिव व भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने नया सगुफा छोड़ दिया । एक चोर साहुकार बनकर दूसरे चोर को चेतावनी दे डाली कि ‘‘राम मंदिर को लेकर पुनः 1992 जैसा आंदोलन करेगी’’ । पिछले 70 सालों में संघ का यह चेहरा नया नहीं है । हर चुनावी मौसम में संघ कोई न कोई नया पैंतरा दिखाता ही है। 
अबकी सबको पता है कि मोदी का वह जूमला जिसमें तेल के दाम, डालर के बढ़ते मूल्य, मंहगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन, जवानों के दो सर, युवाओं को नौकरी, अच्छे दिन के वादा जैसे कोई खोखले वादे नहीं चलने वाला है। काठ की हांडी  पूरी तरह से जलकर खाख हो चुकी है। अब मोदी को वे सभी संवैधानिक संस्थाये बचाने का प्रयास करेगी जिसके प्रमुख को मोदी ने तमाम नियमों को ताख पर रखकर पदास्थिापित किया है।
इस बार के चुनाव में एक तरफ व्यापारी वर्ग काफी नाराज है उन्हें लग रहा हे मोदी ने उनके साथ धोखा किया। वहीं यही हालात किसानों की है, तो आरक्षण विवाद भी एक प्रकार से मोदी सरकार के गले की हड्डी बन चुकी है। पिछले पांच सालों में मोदी की विदेश यात्रा, राफेल सौदे में देश को गुमराह करना, सभी संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बना देना मोदी सरकार की उपलब्धि रही है । अब यह देखना है कि गांव को हर बार झलने वाला व्यक्ति क्या इस बार भी सफल हो जायेगा देश को अपने जुमले सुनाकर या संध के नये पैंतरे से देश को मुर्ख बनाया जायेगा?
-शंभु  चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

चुनाव-2019: काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

चुनाव-2019:  काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
कोलकाता- 2 नवम्बर 2018
हम सभी इस बात से भलीभांती अवगत हैं कि 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून 2014 को हुआ था एवं इसके इसका कार्यकाल 3 जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जायेगा । स्पष्ट है कि आगामी चुनाव की तिथि की घोषणा आगामी जनवरी-फरवरी माह में किसी भी समय कर दी जायेगी । 
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 में भारत के चुनाव आयोग को इसका अधिकार दिया गया है। वहीं अनुच्छेद 83(2) में इसका कार्यकाल 5 वर्ष का तय किया गया और आपात किसी स्थिति में एक साल का कार्यकाल संसद में कानून बना के बढ़ाया जा सकता है । वहीं भारत के नागरिकता कानून, 1951 की धारा 14 में नई लोकसभा गठन की प्रक्रिया दी गई है। जिसमें लिखा है कि नई लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव करायें जायेगें । इसके लिए पूर्व की लोकसभा की समाप्ति जो कि जून 2019 में हो जायेगी के छः माह अर्थात 1 दिसम्बर-2018 से 30 मई 2019 के बीच चुनाव की सभी प्रक्रियाओं को पूरा कर लेनी होगी । अर्थात 16वीं लोकसभा की उलटी गनती शुरू हो चुकी है। 
पिछले पांच सालों में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि मोदीजी ने देश को बहुत बड़े आर्थिक संकट में डाल दिया  है । तेल व गैस के दाम, डालर का मंहगा होना, रसोई गैस का 400/- रुपये से 900/- रुपये का हो जाना, राफेल सौदे में 20 हजार करोड़ का डाका, निरव मोदी का फरार होना, अमित साह के बेटे के धन में रातों-रात, दिन दूनी रात चौकनी कमाई हो जाना, बाबा रामदेव के 850 करोड़ रुपये की कम्पनी का 11526 करोड़ की कम्पनी हो जानी, बाबा के विज्ञापनों के माध्यम से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को नपूंसक बना देना का षड़यंत्र, नोटबंदी से 60 प्रतिशत नये करोड़पतियों की उपज, कालेधन पर चुप्पी, आतंकवाद के नाम पर देश को धोखा देना, सेना का इस्तमाल अपनी रक्षा में प्रयोग करना, बच्चों की शिक्षा पर भी जीएसटी लागू कर देना। कभी गाय के नाम पर कभी धर्म के नाम पर  तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर देश को गुमराह करना, देश के युवाओं को पकौड़े बेचने को कहना, ‘‘मान न मान - मैं तेरा मेहमान’’ विश्वभर में 80 से अधिक बार विदेश की यात्रा, मानहानी के मुकदमों का नया दौर शुरू कर अपने विरोधियों की आवाज को दबा देना। रिजर्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, सीबीआई, आईबी, लोकपाल, आदि सभी संवैधनिक संस्थाओं को पिछले पांच सालों में कमजोर कर लोकतंत्र को धराशाही करने में लगातार कार्यरत रहना यह मोदी सरकार की पिछले पांच साल की प्रमुख उपलब्धीयां हैं । 

  • आज हमें सोचना होगा कि क्या हम लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं कि बाबा रामदेव के विज्ञापनों के पीछे कुत्ते की तरह दुम हिल्लाकर अपनी कलम को, पत्रकारिता को गिरबी रखना चाहतें हैं?
  • आज हमें सोचना होगा कि धर्म की आड़ लेकर जो भेड़िया हमें पिछले 25 सालों से नोचता रहा वह पुनः उसी खाल में हमें लुटने तो नहीं आ रहा?
  •  आज हमें सोचना होगा जिसने 2014 के चुनाव में हमें जो सपने दिखाये थे उसका क्या हुआ।
  • आज हमें साचेना होगा घरों की रसोई की गैस में ऐसी कौन सी आग लग गई की मोदी सरकार ने पांच सालों में इसके मूल्य को 400 से 900 कर दिये?
  • आज हमें यह भी सोचना होगा जिस लोकपाल के गठन को लेकर पूरा देश आंदोलनरत हो चुका था, उसका गठन मोदी सरकार ने क्यों नहीं किया? 
  • ऐसे हजार सवाल हो सकते हैं साथ ही एक सवाल यह भी उठता है कि मोदी नहीं तो फिर कौन?
  • स्वाल बहुत गंभीर है। क्या हमारे पास कोई विकल्प नहीं? क्या एक सवाल यह भी किया जा सकता है मोदी ने इन पांच सालों में हमारी सोच को भी विकलांग बना दिया कि हम किसी विकल्प की बात भी नहीं सोच सकते?  जयहिन्द !  
- शंभु चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

राफेल सौदा बनाम मोदी की सुरक्षा?


राफेल सौदा बनाम देश मोदी की सुरक्षा?

" यह सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा मामला है ।"

तब बोफोर्स का मामला किसकी सुरक्षा  से जुड़ा था ?
भारत सरकार के अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि 
"अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए ।
ये नेशनल सिक्योरिटी का मामला है । 
ये जनहित याचिका नहीं है बल्कि राजनीति से प्रेरित याचिका है।
दिनांक 11 अक्टूबर 2018:  देश की सर्वोच्च अदालत ने कल एक प्रकार से दबी ज़ुबान से ही सही यह राफेल सौदे की प्रक्रिया संबंधी पूरा विवरण अदालत में सौंपने का निर्देश अंततः दे दिया। अभी पिछले सप्ताह ही मुख्य न्यायाधीश के पद पर मोदी सरकार की तरफ से कालेजियम व वरियता को फेर-बदल कर बनाये गये मुख्य न्यायाधीश माननीय रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के.कोल, व जस्टिस के.एम. जोसेप की खंडपीठ ने विनीत ढंडा बनाम भारत सरकार W.P.(C) No. 1205/2018 पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से कहा कि  वे दाम से जुड़े प्रश्न पर कोई सवाल नहीं कर रहे । ना ही वे देश की सुरक्षा से कोई समझौता कर रहे । ना ही वे इस पीआईएल का स्वीकार या रद्द कर रहे ।  अदालत सरकार से सिर्फ यह जानना चाहती है कि इसमें अपनाये जाने वाली प्रक्रिया क्या थी ? 

कहने का सार यह है अदालत यह नही जानना चाहती -
1. कि युपीए सरकार के सौदे 526 करोड़ रुपये  प्रति राफेल विमान को रद्द कर मोदी सरकार ने कैसे 1670 करोड़ रुपये का कर दिया? 
2. कि देश की रक्षा के नाम पर मोदी की सरकार संसद को गुमराह करती रही,  कि सरकार का इस सौदे में कोई भूमिका नहीं? 
3. कि एक पत्रकार के द्वारा सच को सामने लाने पर मोदी सरकार के प्यादे अनिल  अंबानी ने 5000 करोड़ रुपये का मानहानि का दावा एक पत्रकार के उपर ठोक दिया ताकि मामला दबा रहे।
4. कि प्रधान सेवक ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही यह इस योजना को कैसे पग-पग पर अमली जामा पहनाया गया।
5. कि कैसे 20 दिसम्बर 2014 को तीन नई कंपनी रिलायंस डिफेंस टेक्नोलॉजी प्रा. लि. , रिलायंस डिफेंस सिस्टम प्रा. लि.  और रिलायंस डिफेंस एंड ऐरोस्पेश प्रा. लि. को जन्म दिया गया ।
6. कि कैसे 28 मार्च 2015 को पुनः एक नई कंपनी रिलायंस डिफेंस लि. को जन्म दिया गया ।
7. कि कैसे और क्यों? 10 फरवरी 2017 को पुनः एक नई कंपनी डास्साल्ड रिलायंस ऐरोस्पेश लि. को जन्म दिया गया ।
अब इन प्रश्नों का जबाब ना लेकर सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश माननीय रंजन गोगोई ही बता पायेंगे कि अंबानी परिवार की 5000 करोड़ रुपये  की मानहानि की भरपाई कैसे और कौन करेगा?
किसी पत्रकार की आवाज को दबा देने का नया नुख्सा मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने निकाल लिया है मानहानि का मामला ठोक दो चाहे काई भी मामला हो दब जायेगा । अब वेचारा गरीब पत्रकार लोकतंत्र की बात कर के तो देख ले जबान काटकर उसके हाथ में ना थमा दिया तो मोदी की सरकार नहीं।
अब जरा मोदी सरकार का अदालत में दलील देखिये -
भारत सरकार के अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि "अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए ।ये नेशनल सिक्योरिटी का मामला है । ये जनहित याचिका नहीं है बल्कि राजनीति से प्रेरित याचिका है।  यह सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा मामला है ।"  
माने सीधे तौर पर अदालत को धमकाया गया है ।  तो अदालत ने भी वहीं किया जो सरकार चाहती थी । इधर अचानक से रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण फ्रांस की यात्रा पर चली गई । मोदी को डर है कि कहीं फ्रांस की सरकार भारत सरकार के उस दस्तावेज़ को जारी ना कर दे जिसमें एचएएल ‘‘हिन्दुस्थान एयरोनेटिक्स लिमिटेड’’ जो एक सरकारी कंपनी है से सौदा छीन कर अनील अम्बानी की कम्पनी को सौदा दे दिया गया।
जिस कंपनी की स्थापना मोदी जी की फ्रांस यात्रा ( दिनांक 11-12 अप्रैल 2015)  कंपनी की स्थापना (28 मार्च 2015 ) कूल 15 दिन की इस कंपनी को कैसे दे दिया गया ?  अब तक एक के बाद एक कूल पांच कंपनी की स्थापना क्यों की गई?
मजे की बात देखिये भारत के वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल बीएस धनोआ भी देश की रक्षा के लिये नहीं सरकार की रक्षा के लिये इस मैदान में कूद पड़े।
सवाल देश की सुरक्षा से जुड़ा है । अब अदालत यह भी बता दे कि तब बोफोर्स का मामला किसकी सुरक्षा  से जुड़ा था ?
 लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  -शंभु चौधरी