गुरुवार, 13 जून 2019

व्यंग्य: सच’ का बोझ

बस क्या था मानहानि के मामले में 2 दिन की सजा सुना दी जज साहब ने। सजा देते वक्त जज साहब ने भी कहा - "भाई यह कानून ही ऐसा  है कि सच बोलने पर किसी की मानहानि हो सकती है। तो आपलोग ‘सच’ क्यों लिखते हो? "


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दो दिन से रामप्रसाद जी काम पर नहीं आये सुन कर बड़ी चिंता होने लगी। सुना कि वे बीमार हैं। आज मन बना ही लिया कि ऑफिस जाते समय उनसे मिलते चला जाऊँ।
सो बस रामप्रसाद जी के घर की बस पकड़ ली, बहुत पुराने मित्र हैं अपने।  ना उनमें कोई लाग-लपेट ना ही कोई छल-प्रपंच, उनके स्वभाव की जितनी भी चर्चा की जाए कम है। बिना सोचे कुछ भी बोल देते हैं। कोई बुरा माने या भला। रामप्रसाद जी को कुछ फर्क नहीं पड़ता। सच्चे मन के इंसान हैं । जो मन में आया बोल दिया जो अच्छा लगा बोल दिये। पिछले सप्ताह ही जेल से छुटकर आये थे  ‘‘बोलने लगे कि अदालत में उनसे जब जज साहब ने पूछा कि आपने ‘‘अमूक मंत्रीजी’’ के खिलाफ ऐसा क्यों लिखा? तो रामप्रसाद जी ने भी बिना कोई लाग-लपेट के कह दिये कि- ‘‘ वे ऐसे ही हैं तभी ऐसा लिखा है।’’
बस क्या था मानहानि के मामले में 2 दिन की सजा सुना दी जज साहब ने। सजा देते वक्त जज साहब ने भी कहा - "भाई यह कानून ही ऐसा  है कि सच बोलने पर किसी की मानहानि हो सकती है। तो आपलोग ‘सच’ क्यों लिखते हो? "
किसी जमाने में सच लिखा जाना पत्रकारिता का धर्म था अब तो भाई  ‘सच’  लिखना, बोलना मानो अपराध बन चुका है।
घड़ल्ले से झूठ परोस दो बस वाह-वाही हो जायेगी और बहुत वाह-वाही हो गई तो राज्यसभा में सीट भी मिल सकती है वशर्ते कि आप संपादक के पद पर विराजमान हो एवं एक साथ कई पत्रकारों से झूठ लिखवाने की क्षमता रखते हों। खैर... यह सब सोचते-सोचते रामप्रसाद जी के घर पंहुच गया। बस का भाड़ा 7/- रुपये कंडेक्टर को देते हुए बस से नीचे उतरा ही था कि देखा मेरे पीछे से कंडेक्टर ने मेरे ऊपर एक टिकट फैंक दी और आवाज देते हुए कहा - ‘‘भाईसाब! टिकट तो लेते जाओ’’
बस का भाड़ा देते समय मैंने मन ही मन यह सोचा था कि ‘‘ये लोग कितनी मेहनत करते हैं’’ और जानबुझ कर ही टिकट ना लेते हुए बस से नीचे उतर गया था, पर जैसे ही उसने टिकट मेरे सर पर दे मारी। मेरी सारी सोच माचीस की तिली की तरह जमीं पर धराशाही हो गई।

यह सब रास्ते में सोचते रामप्रसाद जी के घर पंहुच गया। देखा कि भाभीजी उनको दवा पिला रही थी।
 मुझे देखते ही रामप्रसाद जी मुसकराते हुए बोले -
"आईये-आईये चौधरी जी!" 
मुझे आते देख भाभी जी ने अपना पल्लु ठीक करते हुए प्रणाम किया और अंदर चली गई।

मैंने उनका हालचाल पूछा और सभी समाचार जानने के बाद उनको एक हफ्ता आराम करने की सलाह दे डाली।
तो रामप्रसाद जी कहने लगे- "चौधरी जी यह क्या मुसिबत आ गई?"
  कल ही ऑफिस से फोन आया था कि आप "वर्क फ्रोम होम" कर लें। यह क्या बला है?

मैंने उनको समझाया कि इससे आपको घर में आराम भी मिल जायेगा और लैपटॉप पर बैठ कर ऑफिस का काम भी हो जायेगा। इसमें हर्ज ही क्या है। छुट्टी भी मिल गई और तनख्वा भी नहीं कटेगा।
तभी भाभी जी अंदर से चाय लेकर आ गई। चाय का प्याला मेरी तरफ देते हुए कहा कि
"इनको आप समझाते क्यों नहीं ? अब इनकी उम्र तो रही नहीं दिनभर ‘सच’ का बोझ ढोहे फिरते हैं । चारों तरफ का माहौल नहीं देखते। "जैसा देश - वैसा भेष" बना लेना चाहिये पर मेरी एक भी नहीं सुनते। कल न इनको.... कहते  हुए वो फफ़क-फफ़क के रो पड़ी। रोते-रोते वह फिर अंदर चली गई।"
मैं और रामप्रसाद जी दोनों यह सुनकर अवाक थे।

शंभु चौधरी
बी.कॉम, एम.ए. (एमसी), एलएल.बी
कोलकाता-700106

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