शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सांप्रदायिक सेक्लुरिजम - शम्भु चौधरी

कोई भी धर्म बुरा नहीं होता परन्तु कोई धर्म दूसरे धर्म के प्रति भेदभावपूर्ण, वेमनुष्यता व सांप्रदायिकतापूर्ण व्यवहार करता हो तो इसको किसी भी रूप में धर्मनिरपेक्षता के पलड़े पर सही नहीं आंका जा सकता। आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण में जिसप्रकार की राजनीति की जा रही है अर्थात श्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘‘बुर्का की राजनीति’’ की जा रही है इसे ही हम सेक्लुरिजम सांप्रदायिकता भी कह सकते हैं जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को स्नेह..स्नेह अपने धर्म का ग्रास बनाकर निगल जाऐगी।
भारत में ज्यूँ-ज्यूँ 2014 का आम लोकसभा का चुनाव नजदीक आता जा रहा है सेक्लुरिजम की रोटी सैंकने वाले राजनैतिक दलों की एक ही भाषा होती जा रही है। हर बात में सेक्लुरिजम की दुहाई देने वाले दलों को राष्ट्रीयता की बात करने वाले व्यक्ति के हर शब्दों में सांप्रदायिकता की बू झलकती है। आईये इससे पहले कि हम भारतीय राजनीति की बात करें, भारत में चल रहे सेक्लुरिजम युद्ध की बात को समझ लेते हैं। पिछले कुछ दशकों से भारत में सेक्लुर दलों की बाढ़ सी आ गई है। इन दलों की सेक्लुरिजम की जो परिभाषा मानी जाती है वह है ऐन-केन-प्रकारेण मुस्लीम सांप्रदाय के वोटों को प्राप्त करने के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे मुसलमानों की आत्म संतुष्टी मिलती रहे। विशेषकर कट्टरवादी ईस्लामिक विचारधारा के पोषकों को, जिनको भारतीय धर्मनिरपेक्षता से न तो कोई मतलब है ना ही धर्मनिरपेक्षता के वे कभी पक्षधर माने जा सकतें हैं। ऐसे लोगों का एक ही सिद्धान्त रहता है कि किसी न किसी प्रकार भारतीय धर्मनिरपेक्षता के विचारधारा से अपने धर्म को फैलाते हुए भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक हमला करते हुए भारतीय विचारधारा को समाप्त कर इस्लामिक सत्ता को स्थापित करना इनका एक मात्र उद्देश्य माना जा सकता है। दूसरी तरफ देश के भीतर इस्लामिक आंतकवाद को पोषण देना उनको संरक्षित करते हुए उनको पनाह देना व उनका राजनैतिक बचाव करते रहना, इनका लक्ष्य है। भारतीय संस्कृति के विकास व विचारधाराओं में किसी भी प्रकार का ना तो इनके योगदानों को आंका जा सकता है ना ही इस भुखण्ड की धार्मिक सभ्यता के विकास के लिए सामाजिक रूप कभी भी कोई योगदान ही दिया हो ऐसा दिखाई नहीं देता। अब हम भारतीय धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो आज देश में जिस प्रकार विभिन्न राजनैतिक दलों में हौड़ सी लगी है इनको देखकर ऐसा प्रतित होता है कि भारत जैसे बहु भाषा-भाषी, बहुजातिय परंपरा, बहु संप्रदाय के लोगों का आपसी सोहार्द के ताने-बाने को खंड-खंड करते रहना धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर एक विशेष धर्म द्वारा प्रायोजित सांप्रदायिकता का पोषण मात्र इन राजनैतिक दलों का लक्ष्य रह गया है। कोई भी धर्म बुरा नहीं होता परन्तु कोई धर्म दूसरे धर्म के प्रति भेदभावपूर्ण, वेमनुष्यता व सांप्रदायिकतापूर्ण व्यवहार करता हो तो इसको किसी भी रूप में धर्मनिरपेक्षता के पलड़े पर सही नहीं आंका जा सकता। आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण में जिसप्रकार की राजनीति की जा रही है अर्थात श्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘‘बुर्का की राजनीति’’ की जा रही है इसे ही हम सेक्लुरिजम सांप्रदायिकता भी कह सकते हैं जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को स्नेह..स्नेह अपने धर्म का ग्रास बनाकर निगल जाऐगी।

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