बुधवार, 31 अगस्त 2011

व्यंग्य नाटकः अक्ल बड़ी की भैंस?




संसद की मर्यादा सांसदों के हाथ ही बचेगी। जब खुद ही दामन में आग लगाए तो उसे कौन बचाए। संसद में किस-किस के खिलाफ अवमानना की नोटिस जारी करेगी सरकार। आज सारे देश के समाचार पत्रों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है।




संसद में इस बात पर बहस शुरू हो गई कि यह पता लगाया जाए कि अक्ल बड़ी की भैंस? तो सभी सांसदों ने एक स्वर में ही चिल्लाया ‘अक्ल’ परन्तु वहां कुछेक ऐसे भी सांसद बचे थे जो इस बात से सहमत नजर नहीं आ रहे थे। हांलाकि लोकतंत्र में बहुमत का राज होता है परन्तु कुछ सांसदों के मन में कई तरह के सवाल खड़े हो रहे थे, सो धीरे से उठकर एक ने अपना विरोध दर्ज ही करा ही दिया कि ‘‘नहीं भैंस बड़ी होती है।’’ बस इतना कहना था कि सब-के-सब एक साथ उस सांसद पर पील पड़े। जबाब-सवाल का दौर शुरू हो गया, किसी ने उन्हें पागल बताया तो किसी ने धमकाना शुरू कर दिया। वे भी कहाँ हार मानने वाला थे उन्होंने भी बड़ी शालीनता से अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आप ही नापवा लो भाई! - ‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या।’’


बहस का सिलसिला चल पड़ा।
सभाध्यक्ष महोदय ने सबको बारी-बारी से पक्ष और विपक्ष पर अपनी-अपनी बात रखने की व्यवस्था दी।
‘‘शान्त हो जाइये...शान्त हो जाइये... हाँ...आप भी शान्त हो जाइये... सबको समय मिलेगा..आप बैठ जाइये....कृपया शान्त हो जाइये...। अध्यक्ष जी ने सभी को शान्त करने का प्रयास किया।


एक सदस्य ने अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा कि महाशय जब संसद में उपस्थित अधिकतम सदस्यों ने यह मान लिया कि ‘अक्ल’ ही बड़ी है तो इनको जिद छोड़ देनी चाहिये और कहावतों में भी यही मान्यता है कि अक्ल ही बड़ी होती है फिर यहाँ इस बात पर बहस कर संसद का कीमती वक्त जाया करने का कोई अधिकार नहीं बनता इनको।
दूसरे सदस्य ने इसे वे वजह का विवाद और बैतुका करार दिया।


तीसरे ने सदन की पिछली बैंच से ही उछल कर चिल्लाया इसकी जबान पर ताला लगा दिया जाए श्री मान! अक्ल न हो तो भैंस का काम ही क्या? इसलिए इस बहस को यहीं समाप्त कर देना चाहिये एवं बहुमत में प्रस्ताव को पारित समझा जाना चाहिए।


अधिकतम सांसदों के हाव-भाव से बेचारे सांसद की हालत पतली होने लगी थी सारे के सारे उनके ऊपर इस प्रकार चढ़ गये मानो किसी ने हमला कर दिया हो। फिर भी हार न मानने की कसम लेकर उन्होंने पुनः अपनी बात रखने का प्रयास किया।


अध्यक्ष जी! ‘‘जब महल में लटके बिजली के बल्ब की गर्मी से खिचड़ी पकाई जा सकती है।’’....
अभी बात पूरी हुई ही नहीं थी कि पुनः
एक ने झलांग लगाई आप हमें पहेलियाँ न बुझाएं सीधे-सीधे ये बतायें कि भैंस कैसे बड़ी है अक्ल से?
दूसरे ने-आप संसद के कीमती वक्त को बर्बाद करने में तूले हैं।
तीसरे ने-आपको तो संसद से बाहर कर दिया जाना चाहिए।
सभा में शोर-सराबा, हंगामा जैसा माहौल हो गया।
किसी की आवाज ही समझ में नहीं आ रही थी।


अध्यक्ष जी ने खड़े होकर पुनः सबसे निवेदन किया-
‘‘शान्त हो जाइये...शान्त हो जाइये... हाँ...आप भी शान्त हो जाइये... सबको समय मिलेगा..आप बैठ जाइये....कृपया शान्त हो जाइये...।


अध्यक्ष जी! माननीय सदस्यगण मुझे बोलने दें या खुद ही बोलें।


तब तक एक सदस्य ने अपने गले में लटकते माइकफोन को टेबल पर पटकते हुए कहा कि लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि जिसको जो मन में आये बाले।
अध्यक्ष जी! यही तो बताने का प्रयास मैं तबसे कर रहा हूँ कि लोकतंत्र में बहुमत का अर्थ होता है देश की 90 प्रतिशत जनता को मुर्ख बनाकर शासन करना और हम पिछले 63 सालों से यही तो करते आ रहे हैं।


पुनः एक नेता ने अपनी माइक को निशाना करते हुए उस सदस्य पर निशाना साधा। जिस बात पर बहस हो रही है आप हमें उसका ही जबाब दें न कि दूसरी-दूसरी बातों कि तरफ हमारा ध्यान बांटने का प्रयास करें।


श्रीमान् हम यही तो बताने का प्रयास कर रहे हैं कि आप सब बीच में ही उछल-कूद करने लगते हैं।
अध्यक्ष जी! जी ने पुनः सदस्यों को व्यवस्था दी आपस में कोई बात न करें।


सारे के सारे सदस्य एक साथ चिल्ला पड़े...


‘‘इनको जबान संभाल कर बोलने के लिए कहा जाए अन्यथा इनके ऊपर भी संसद की अवमानना का मुकदमा चलाया जायेगा।
अध्यक्ष जी! संसद सदस्यों को संसद के अन्दर संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि उनको सदन के अंदर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। इन्हें आप समझाऐ कि ये शांत रहें।
अध्यक्ष जी ने पुनः खड़े होकर सबसे निवेदन किया-
‘‘शान्त हो जाइये...शान्त हो जाइये... हाँ...आप भी शान्त हो जाइये... सबको समय मिलेगा..आप बैठ जाइये....कृपया शान्त हो जाइये...।
शोरसराबा जारी .........


अध्यक्षजी ने पुनः सबसे निवेदन किया- कृपया शांत हो जाएं हाँ! आप बोलिए....हाँ! आप शुरू किजिए बोलना.....
तभी एक सदस्य ने जोर देकर कहा अध्यक्ष जी! जब सब कोई यह जानते है कि अक्ल ही बड़ी होती है भैंस से, इसमें बहस की कोई गुंजाईश ही कहाँ बचती है।
अध्यक्ष जी! सदस्यगण का व्यवहार ही बताता है कि संसद में भैंस ही बड़ी है अक्ल का काम ही कहाँ है यहाँ। कहावत है कि जब संसद के अन्दर आओ तो अपनी अक्ल घर की खुंटी से बांधकर आओ और पार्टी के प्रमुख जो बोले उसकी बात को मजबूती से बकते रहो। इसमें अक्ल का काम ही क्या है? जब सारे निर्देश हमें एक खुंटे से बंधकर ही मानने हैं तो अक्ल का महत्व ही कहाँ रह जाता है?


तभी कुछ सदस्य शांत हो चुप-चाप मन ही मन खुश होने लगे कि एक मर्द बहुत दिनों बाद संसद के भीतर बोलने की हिम्मत तो दिखाई है।
अध्यक्ष जी! हम जब चुनाव के समय जनता के पास जातें हैं तो जनता हमारे वादे से ज्यादा पार्टी के वादे पर विश्वास करती है। जब कोई पार्टी सदन में बहुमत से पीछे रह जाती है तो सांसदों की खरीद-फरोक्त का मामला सामने आता है। सिद्धान्तों को ताक पर रखकर संसद के बाहर और भीतर सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए सांसदों को लामबंध किया जाता है। दो विपरीत विचारधाराओं के सदस्य संसद में सरकार बनाने की पहल करते हैं इसमें कौन सी अक्ल काम करती है? अध्यक्ष जी! और यदि अक्ल काम भी करती है तो भैंस ही बनकर रहना है सदन में। पार्टी का आदेश मानते रहे तो सब ठीक-ठाक चलता रहेगा। अर्थात भैंस की तरह रहे तो ठीक अक्ल से काम लिया तो पार्टी से बाहार का रास्ता दिखा दिया जाता है। अक्ल तो सिर्फ चंद लोगों के पास ही कैद हो जाती है बाकी सबके सब भैंस ही बने रह जाते हैं। अब चुकीं बैगेर भैंस के संसद में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता तो कौन बड़ा और कौन छोटा इसका अंदाज आप खुद ही लगा लिजिए।


अध्यक्ष जी! आज संसद के हर सदस्य एक खुंटे से बंधे हुए हैं जिसकी कमान हाई कमान के पास रहती है। ऊपर से जो आदेश इनको मिलते हैं सिर्फ उन्हीं का पालन संसद में इनको करना पड़ता है मानो कि इनको किसी मैदान में चारा चरने के लिए छोड़ दिया गया है और जब उनको खेत जोतने की जरुरत हो जोत दिया जाता है।
अध्यक्ष जी! संसद के अन्दर सांसदों की इस दुर्गति के लिए खुद सांसद ही जिम्मेदार हैं। हमारी अक्ल तो चरने ही चली जाती है। इसलिए आज से इस कहावत का अर्थ बदल दिया जाना चाहिए।


अध्यक्ष जी! जब से इस कहावत का अर्थ अक्ल से जोड़ दिया गया तब से हम भी चारा भैंसों का ही चरने लगे हैं। इससे भैंस समाज को काफी क्षति का सामना भी करना पड़ा है। राह चलते ही जिसे मन आता है हमें गाली दे जाता है। हमारी नकल उतारने लगते हैं। रोजाना समाचार पत्रों में हमलोगों के खिलाफ कार्टून छापे जाते हैं। हमारी तो नाक ही कट जाती है जब पत्नी घर में अखबार देखती है तो सबसे पहले यही कार्टून देखती है और हंस कर कहती है आप भी इसी जमात के भाई हो। मन करता है हमें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। मेरी माने तो किरण बेदी के साथ-साथ हमारे सभी राजनेताओं की पत्नियों पर भी अवमानना के मुकदमे चलाए जाने चाहिए। उसी प्रकार देश के तमाम समाचार पत्रों पर भी श्री ओम पुरी के साथ-साथ मुकदमा चलना चाहिए। ये समाचार वाले भी जब जो मन आता है राजनेताओं के उल्टे-सीधे कार्टून बना-बना कर छापते रहते हैं।

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Written By Shambhu Choudhary on dated: 30.08.2011

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