वाह सोनिया, वाह मनमोहन जी, खूब चल रहा खेल
घटा तेल के दाम रहे जब, निकल गया सब तेल
निकल गया सब तेल कि भईया टूटी कमर महंगाई में
आटा तेल की खातिर घर-घर पंगा लोग-लुगाई में।
देश पूछता आखिर बंधू, ऎसी क्या मजबूरी है?
पी एम् हो तुम देश के, या सोनिया देती मजदूरी है
कुंवर प्रीतम
1. ई- साहित्य प्रकाशन करना
2. ई-पत्रिका 'कथा-व्यथा' का प्रकाशन
3. कवि मंच
4. मंच समाचार
सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक विषयों का खुला मंच
शुक्रवार, ५ दिसम्बर २००८
ऎसी क्या मजबूरी है?
प्रकाशक: Shambhu Choudhary द्वारा ९:१४ AM
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

0 विचार मंच:
हिन्दी लिखने के लिये नीचे दिये बॉक्स का प्रयोग करें - ई-हिन्दी साहित्य सभा