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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

समीक्षाः पहले देश, फिर पार्टी और अंत में खुद -लालकृष्ण आडवाणी

पहले देश, फिर पार्टी और अंत में खुद   -लालकृष्ण आडवाणी
लालकृष्ण आडवाणी ने अपने पांच साल की चुप्पी पर विराम लगाते हुए  अपने ब्लाॅग में एक लेख लिखा जिसका मूल सार- मोदी और शाह की जोड़ी से देश सतर्क करना है और यह बताने का प्रयास है कि हर बात में आपकी बातों से जो सहमत ना हो वह देशद्रोही नहीं हो सकता। उन्होंने अपने लेख में कई जगह यह संकेत भी दिया और अपने दर्द को बिना उजागर करते हुए लिखा कि ‘‘ भाजपा में हम सभी के लिए यह महत्वपूर्ण अवसर है कि हम पीछे देखें, आगे देखें और भीतर देखें। ’’  साथ ही एक प्रकार से गांधीनगर कि जनता का भी आभार व्यक्त करते हुए लिखा ‘‘जिन्होंने 1991 के बाद छह बार मुझे लोकसभा के लिए चुना है। उनके प्यार और समर्थन ने मुझे हमेशा अभिभूत किया है।’’
अपने संघर्षपूर्ण राजनैतिज्ञ जीवन की कुछ बातों को साझा करते हुए आडवाणी जी ने लिखा कि ‘‘ मेरे जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत - सबसे पहले देश, फिर पार्टी और अंत में खुद को पाता हूँ और सभी परिस्थितियों में, मैंने इस सिद्धांत का पालन करने की कोशिश की है और आगे भी करता रहूंगा।’’
आपने माना कि भारतीय लोकतंत्र का सार विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान है। पार्टी व्यक्तिगत और राजनीतिक स्तर पर प्रत्येक नागरिक की पसंद की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध है। कोई राजनीति विरोधी दल या व्यक्ति हमारे विचारों से सहमत होना या ना होना उनकी निजी राय हो सकती है परन्तु उनको बात-बात में राष्ट्र विरोधी मानना पार्टी के सिद्धांतों में नहीं है।  लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा, पार्टी का लक्ष्य रहा है। 
आगे आपने आपातकाल के दौरान की याद दिलाते हुए लिखा कि ‘‘संक्षेप में, सत्य (सत्य), राष्ट्र निष्ठा (राष्ट्र के प्रति समर्पण) और लोकतंत्र (लोकतंत्र, पार्टी के भीतर और बाहर) बनाये रखना पार्टी का मुख्य लक्ष्य होना चाहिये।

यह लेख ऐसे समय आया है जब भारत में लोकसभा के प्रथम चरण के मतदान अगले सप्ताह होने जा रहा है।  यह लेख मोदी के सत्ता में आने के बाद  पहली बार पिछले पांच सालों में पहली बार लिखा गया है जिसका राजनैतिक गलियारों में कई कयास लगाये जा रहें जिसमें गांधीनगर की जनता को भी एक संदेश छुपा है ‘‘कि लोकतंत्र की रक्षा के लिये ऐसे लोगों को हरा दें जो भारतीय लोकतंत्र  और तमाम संवैधानिक संस्थाओं को मजाक बना कर रख दिया है। ’’ पार्टी ऐसे विचारों को कभी सहमति नहीं प्रदान करती है। इन दिनों भाजपा के अंदर मोदी आतंकवादियों (मोदी सेना) की एक फौज सक्रिय है जो भातीय लोकतंत्र को तालिबानी व्यवस्था में ले जाने को पक्षधर है। पिछले पांच सालों में हमने इनके तालिबानी बोल और फरमानों एक लंबी सूची देखी है जिसमें किस प्रकार लोकतंत्र का गलाा धीरे-धीरे दबाने का प्रयास जारी है। आज यह लोकतंत्र का तकाजा है है कि हर बुद्धिजीवि, देशभक्तों व पत्रकारों  को इस पर समय रहते चिन्तन शुरू कर देना चाहिये। जयहिन्द !
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

मंगलवार, 11 जून 2013

आडवाणी जी का इस्तीफा नाटक

देश को दो बार संप्रदायिकता की आग में झौंकने वाले भाजपा के कदवार नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने आखिरकार मानमनुवल के पश्चात अपना इस्तीफा वापस ले ही लिया। इस इस्तीफा वापसी के पीछे भी इस अति महत्वकांक्षी व्यक्ति की सौदावाजी को नकारा नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार इन्होंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को बाध्य किया था कि वे लिखकर देंवे कि देश का अगला ‘‘पी.एम इन वेटिंग’’ आडवाणी जी ही होंगे। कई सालों तक वे अपने नाम के साथ इस तगमे को लगाये जनता के सामने फिरते रहे कि ‘‘अगला प्रधानमंत्री मैं ही हूँ’’। जब देश की जनता ने इनके इस कद को दो बार सिरे से नकार दिया और पूरी की पूरी गठबंधन दल मिलकर भी माननीय आडवाणी जी को प्रधानमंत्री के पद तक नहीं पंहुचा पाई। आज इस भाजपा के लिबरल चेहरे को लगता है कि उनका ‘‘पी.एम इन वेटिंग’’ का सपना अधुरा ही रह जाएगा। इस बीच जब भाजपा में नये चेहरे उभरकर खुद-व-खुद सामने आयें हैं तो आडवाणी जी को लग रहा कि उनके पी.एम. पद को कोई दूसरा व्यक्ति जो उनके कद से छोटा है हड़पने जा रहा है। जिसके लिये उन्होंने जिन्ना की मजार पर भी मन्नतें मांगी थी और उनको धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के सम्मान से नबाजा था। मानो एक सांप्रदायिक व्यक्ति दूसरे सांप्रदायिक व्यक्ति को प्रमाण पत्र दे रहा हो। वर्तमान में हुए इस्तीफा नाटक ‘‘खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे’’ मुहावरा को सत्य साबित कर देने में सक्षम हो गया। इस इस्तीफा प्रकरण से आडवाणी के कई इरादे को स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है जैसा कि इन्होंने अपने पत्र में भाजपा पर यह आरोप लगाया कि ‘‘पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है। इसमें व्यक्ति विशेष का महत्व बढ़ता जा रहा है। लगता नहीं कि यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के आदर्शों पर चलने वाली पार्टी है।’’ इनका स्पष्ट संकेत है कि भाजपा में इनके कद को कोई भी व्यक्ति छोटा करने का प्रयास किया तो वे पार्टी लाईन से हटकर एक नई पार्टी तक बनाने की बात भी सोच सकते थे। श्री राजनाथ सिंह जी खैर मनायें कि उनका ( आडवाणी जी का ) तीसरा धमाका बीच में ही रूक गया अन्यथा भाजपा नेताओं को सत्ता के सपने देखने का अवसर भी नहीं देते अडवाणी जी। इस त्यागपत्र प्रकरण से किसे लाभ होगा किसे नहीं यह तो आने वाला 2014 का लोकसभा चुनाव ही बता पायेगा कि जनता ने इस प्रकरण को किस प्रकार लिया है। हाँ! एक बात जरूर है कि इससे श्री आडवाणी जी का कद बहुत छोटा हो गया। आज देशभर से आवज उठ रही है कि ‘‘नरेन्द्र मोदी को आगे लाया जाए - कांग्रेस को हटाया जाए’’ एनडीए के कुछ दलों का यह अहंकार कि यदि मोदीजी को भाजपा ने प्रजोक्ट किया तो वे दल को छोड़ देगें । वे होते कौन हैं मोदीजी को हटाने वाले? यदि देश की जनता मोदीजी को लाना चाहती है तो मोदी जी को कोई नहीं रोक सकता। गठबंधन जनता की आवाज के साथ रहना चाहे तो रहे। जाना चाहते हों तो कल क्यों आज ही छोड़कर जा सकतें हैं। धर्मनिरपेक्षता की कतार में खड़े होकर अपना दामन भी साफ कर लेवें। यही मौका है उनको धर्मनिपेक्षता का प्रमाणपत्र प्राप्त करने का। मुसलमानों के वोटों को बटोरने का।