सोमवार, 16 सितंबर 2013

गन्ने के खेत में वोट की खेती - शम्भु चौधरी

हे सूर्य ! जब-जब तेरा प्रताप डगमगाएगा,
दीपक की एक लौ से भी, अंधेरा मिट जायेगा ।
जिनको गुमान है सत्ता का, शाम ढलते ही डूब जायेगा ।

कहावत भी है कि ‘‘रोपे पेड़ बबुल के आम कहां से होय’’ हमलोग जैसा रोपेगें, सोचेगें वैसी ही फसल हमें काटने को मिलेगी । 27 अगस्त’ 13 की मामूली सी एक घटना ने सत्तारूढ़ दल के अहांकार को चूर-चूर कर रख दिया । वोट बैंक की राजनीति इनको इतनी मंहगी पड़ी की, जिसकी भरपाई करते-करते, कीमत चुकाते-चुकाते अखिलेश सरकार के दम फूलने लगे, फिर भी वे दंगे को रोकने में सफल नहीं हो सके ।

मुज़फ़्फ़रनगर कवाल गांव की घटना ना सिर्फ एक दुर्भाग्यजनक व दुखद घटना है । इस घटना ने सेकुलरवादी सत्तारूढ़ दल के चेहरे को बेनकाब कर दिया है । राजधर्म की दुहाई देने वाले सेकुलरवादी ताकतों को नंगा कर दिया । इसके लिए जिम्मेदार हम ही हैं । कहावत भी है कि ‘‘रोपे पेड़ बबुल के आम कहां से होय’’ हमलोग जैसा रोपेगें, सोचेगें वैसी ही फसल हमें काटने को मिलेगी । 27 अगस्त’ 13 की मामूली सी एक घटना ने सत्तारूढ़ दल के अहांकार को चूर-चूर कर रख दिया । वोट बैंक की राजनीति इनको इतनी मंहगी पड़ी की, जिसकी भरपाई करते-करते, कीमत चुकाते-चुकाते अखिलेश सरकार के दम फूलने लगे, फिर भी वे दंगे को रोकने में सफल नहीं हो सके । सेकुलरवाद की राजनीति करने वाले आजाम खान, कादिर राणा, सईद उर जमां, रासिद सिद्दकी, हरेन्द्र मलिक, राज्यपाल बाल्यान और राकेश टिकैत और सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले हुकुम सिंह, भारतेन्दु, संगीत सोम और साध्वी प्राची । सबके मुह में जहर भरा था, हर कोई खेत में लहलहाती गन्ने की फसल को काटने में लगा था, तो कोई इसमें आग लगाने में । किसी ने भी इस आग को रोकने की जिम्मेदारी नहीं निभाई ।

सत्ताधारी दल के सेकुलरवादी नेताओं ने जहर के बीज इस कदर रोपे की उसमें से सौंप ही सौंप निकलने लगे । मात्र सात दिनों में यह फसल मुज़फ़्फ़रनगर के आस-पास के गांवों में बलखाने लगी । सत्ता के नशे में चूर सेकुलरवादी नेताओं ने मामूली सी छेड़छाड़ की घटना को इतान जवान कर दिया कि देखते ही देखते वहाँ सेना को बुलानी पड़ी । जबतक एक समुदाय पर जुल्म ढहाया जाता रहा, उनके परिवारों व गांव के लोगों पर झूठे मामले गढ़ कर कवाल गांव के सैकड़ों अपराधियों को बचाने का प्रयास किया जाता रहा सबकुछ ठीक था । एक तरफ खालापुर में पंचायत कर लोगों जहन में ज़हर के बीज रोपे जा रहे थे ता दूसरी तरफ शाम को महापंचायत से लौटते निहते लोगों को घात लगा-लगा कर मारा गया, कई ट्रेक्टरों को आग के हवाले कर दिया गया कई लोगों को जान गंवा देनी पड़ी या वे घायल हो गए । जबतक सेकुलरवाद का ख़ौफ़ सर चढ़कर बोलता रहा और एक विशेष समुदाय के लोग मारे जाते रहे तब तक सरकार को कुछ भी पता नहीं चला कि उनकी नाक के नीचे क्या सब चल रहा है । चारों तरफ हा-हाकार की गुंज होने लगी । सुरक्षा के अभाव में मामला उलटा पड़ने लगा तब जाकर केन्द्र और राज्य सरकार हरकत में आई और तत्काल सेना को बुलाया गया । परिणाम सामने है । गन्ने के खेत में वोट की खेती, दोनों समुदाय पुस्तों से इस जमीन में गन्ने की खेती करते रहें हैं, अपनी बोली से समाज में मिठृठास घोलते रहें हैं, उनको चंद सियासतदानों ने सेकुलरवाद राजनीति की रोटी सेंकने के लिए उपजाऊ जमीन बना डाली । फसल तो 2014 के आगामी लोकसभा चुनाव में कटेगी । अब दिलचस्प देखना यह होगा कि यह फसल किसके पाले में जायेगी ? जयहिंद !

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