सोमवार, 1 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतें -शम्भु चौधरी

आज देश की प्रायः सभी राजनैतिक दलों पर सत्ता प्राप्त करने का भूत सवार है, इसके लिए वे न सिर्फ वे चोर, लुटेरे, देश के गद्दारों ओर-तो-ओर आतंकवादियों से भी हाथ मिलाने में नहीं हिचकते। जिसे ये लोग धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वह वास्तव में एक विशेष धर्म को प्रलोभन देकर इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का हथकंडा मात्र है। चोर-लुटरे तो फिर भी देश के प्रति वफादार होते हैं, पर देश के गद्दारों और आतंकवादियों के ऊपर इनका भरोसा किस राजनीति का हिस्सा है? यह किसी भारतीय को नहीं समझ में आता।

आजादी के पश्चात एक सोची समझी साजिश के तहत छदम धर्मनिरपेक्षता का शिकार भारत बनता जा रहा। देश के अधिकांश राजनेता जो धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैं वे वास्तव में वे धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में एक विशेष धर्म समुदाय की कट्टरपंथी विचारधाराओं के समर्थक हैं। जो राजनैतिक दल जितना कट्टरपंथी समर्थक है, वह दल खुद को उतना ही धर्मनिरपेक्ष मानती है, जबकि इसके विपरीत दूसरे वर्ग को सांप्रदायिक कहा जाता है जो देश की एकता व अखंडता हेतु कट्टरपंथियों से सतर्क होने के लिए हमेशा आवाज उठाता रहता है।। परन्तु धार्मिक कट्टरपंथिया का सहारा लेकर विशेष वर्ग के वोटों को प्राप्त करना एक प्रकार से धर्मनिपेक्षता की परिभाषा में आंकी जाने लगी है। चुनाव के समय खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले दल कट्टरपंथी भारत विरोधी ताकतों से हाथ मिलाते इनको खुले आम देख जा सकता है। ऐसा सिर्फ एक सियासी पार्टी नहीं बल्की इस दौड़ में देश की सभी छोटी-बड़ी पार्टियाँ कार्य कर रही है। जो इस बात की तरफ संकेत दे रही है कि देश की धर्मनिरपेक्षता एक विशेष संप्रदाय की कठपुतली बनकर रह गई। कुछ कट्टरपंथी व असामाजिक ताकतें देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी लगी है जो न सिर्फ इस्लाम धर्म को बदनाम कर रही है। इस धर्म के अनुयाइयों के प्रति दुनिया में शक पैदा करने में भी सफल रही है। दुनियाभर में आज इस कौम को शक की निगाह से देखा जा रहा है इसमें भारतीय मुसलमानों का भी बहुत बड़ा योगदान है, गोधरा की घटना के प्रतिवाद में गुजरात में जो भी जन आक्रोश उभरा वह दुर्भाग्यजनक था। परन्तु इसके लिए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक बंधु जो खुद को धर्मनिरपेक्ष मानते वैसे लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं न कि नरेन्द्र मोदी। जो लोग देश को टूकरों में बंटना चाहते हों उनको हम न सिर्फ धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पनाह दे रहे हैं। ऐसे लोगों को कानून के माध्यम से सुरक्षा भी देने का प्रयास किया जाता है। आज देश की प्रायः सभी राजनैतिक दलों पर सत्ता प्राप्त करने का भूत सवार है, इसके लिए वे न सिर्फ वे चोर, लुटेरे, देश के गद्दारों ओर-तो-ओर आतंकवादियों से भी हाथ मिलाने में नहीं हिचकते। जिसे ये लोग धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वह वास्तव में एक विशेष धर्म को प्रलोभन देकर इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का हथकंडा मात्र है। चोर-लुटरे तो फिर भी देश के प्रति वफादार होते हैं, पर देश के गद्दारों और आतंकवादियों के ऊपर इनका भरोसा किस राजनीति का हिस्सा है? यह किसी भारतीय को नहीं समझ में आता। कहने का अभिपार्य है कि सत्ता के लिए ये लोग इतना नीचे गिर चुकें हैं कि जहां से भारत में सही मायने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को लौटना असंभव तो नहीं जान पड़ता पर राह बहुत कठिन बन चुका है।। कोई दाऊद के आईक्यू का सहारा लेता है तो कोई जिन्ना का। कोई इमामों का सहारा लेता है तो कोई भगवा आतंकवाद का। पता नहीं किस माँ की कोख ने भारत माँ के इन लाडलों को पैदा किया कि इनको सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सार्वभौमिकता से भी समझौता करना पड़े तो इन लोगों को जरा भी संकोच नहीं। मजे की बात है जो देश के गद्दार हैं उनका समर्थन प्राप्त करने को हम धर्मनिरपेक्ष मानते हैं।


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