सोमवार, 26 जनवरी 2009

‘‘अभिलाषा‘‘ काव्य-संकलन



कृष्ण कुमार यादव के प्रथम काव्य-संकलन ‘‘अभिलाषा‘‘ की प्रस्तुति देखकर प्रथमदृष्ट्या कहा जा सकता है कि उनके मस्तिष्क-पिण्ड में प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ फूलों की खुशबू समान काव्य-सर्जक का गुण भी विद्यमान है। इसी गुण के कारण अभिधा शैली में नानाविध 88 छन्दमुक्त कविताओं का यह अनुपम संकलन सामने आया है। इस संकलन में प्रस्तुत कवितायें उनके चिन्तन के विविध बहुरंगी रूप हैं। ‘‘अभिलाषा‘‘ रूपी काव्य का यह गुलदस्ता निरूपित कर रहा है कि कृष्ण कुमार यादव का व्यक्तित्व कितने अच्छे गुणों और मौलिक विचारों की तिजोरी है। मेरा प्रयत्न यही है कि ‘‘अभिलाषा‘‘ काव्य-संकलन जिन बारह शीर्षकों की परिधि में आवृत्त किया गया है, उसका विवेचन हमें क्या दिशा और बोध देता है, उस छोर की बात कह सकूं।
‘माँ‘ की ममता, कृपा, सुरक्षा, बच्चों के प्रति दुलार, कर्तव्य इत्यादि भावों को बच्चे की छोटी उम्र से लेकर बड़ा होने तक शादी होने तक के विभिन्न पड़ावों को कवि ने बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। कवि के समर्पण लेकिन मातृत्व भाव को देखिए- बेटे की शादी होनें के बाद बेटे का हाथ बहू के हाथ में देते हुए वह कहती है- उसे संभालना, बड़े दुलार से पाला है। माँ के आँसू, माँ का पत्र, परी इत्यादि रचनाओं से कवि की संवेदनशीलता का भाव, पाठक-मन के मर्म को छू जाता है। यह प्रस्तुति सराहनीय है, प्रशंसनीय है। काश! निर्दयी लोगों के मन माँ के लिए ऐसे ही भावुक बन जाएं, तो धरती को स्वर्ग बनने में देरी नहीं लगेगी।
तितलियाँ जितनी नाजुक व कोमल होती हैं, ऐसा ही ‘प्रेम‘ होता है- अपनी ‘प्रेयसी‘ के लिए। ‘तुम्हारी खामोशी‘ में ‘तुम्हें जीता हूँ‘। जब कभी भी ‘बेवफा‘ हुआ हूँ, मुझे तुम्हारी ‘तलाश‘ है- ढूँढ़ता हूँ हर कहीं/ इस छोर से उस छोर तक/ उस छोर से इस छोर तक। तब ‘तुम और चाँद‘ में फर्क भूल जाता हूँ। क्या ‘तुम‘ ऐसी ही नहीं हो? प्रेम एक भावना है/ समर्पण है, त्याग है/ प्रेम एक संयोग है/ तो वियोग भी है/.... पतंगा बार-बार जलता है/ दीये के पास जाकर, आखिर क्यूं ? जीवन-संगिनी क्या चीज है, इस जिम्मेदारी को और उसके लिए पवित्र प्रेम को समझना एवं तद्नुरूप कर्तव्यबोध को अवगत कराया है- कृष्ण कुमार यादव ने।
‘ईश्वर‘ को लेकर कृष्ण कुमार जी का नजरिया बिल्कुल साफ है। ऐसी सोच और विवेक को वे आमजन-मानस में देखना चाहते हैं, यथा- मैं किसी मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे में नहीं/मैं किसी कर्मकाण्ड और चढ़ावे का भूखा नहीं/ नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा ये सब कुछ/मैं सत्य में हूँ, सौंदर्य में हूँ, कर्तव्य में हूँ। इसी प्रकार ‘नारी‘ के आत्मबल को पहचानते हुए उसे अबला की संज्ञा देना तथा उस पर होने वाले जुल्मोसितम व उत्पीड़न से आज के पुरूष समाज को चेताने का प्रयास किया है और अपेक्षा की है कि पुरूष, नारी को अपने बराबर ही समझे।
‘बचपन‘ खण्ड के अन्तर्गत निहित कविताएं बहुत अच्छा संदेश देती हैं। बचपन में मन-मस्तिष्क पर जमे संस्कार कवि-मन को कचोटते हैं। वर्तमान में एक दूसरे के प्रति दिखाई देने वाली नफरत, दूरियाँ, घृणा, बैर, विद्रूपता को वह सहन नहीं कर पाता है और अपेक्षा करता है कि - अरे! आज लड़ाई हो गई/शाम को दोनों गले मिल रहे हैं/एक दूसरे को चूम रहे हैं/.....दीवाली है, ईद है/ अपनी मंडली के साथ/मिठाइयांँ खाए जा रहा है/क्या फर्क पड़ता है/ कौन हिन्दू कौन मुसलमां।
‘एकाकीपन‘ शीर्षक में लिखी सभी रचनाओं ने जिस मनोदर्शन और अन्तद्र्वन्द्व को उकेरा है, मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘खिड़कियाँ‘ कविता की खिड़की से प्रवेश करती धूप-रश्मियाँ ही ‘अपने लोग‘ हैं। रश्मिरूप ‘अपने लोग‘ ही आपके मन से बातें कर रहे होते हैं। न जाने कितनी अच्छी और न जाने कितनी देर तक। कभी ‘मानव जीवन‘ तो कभी ‘अकेलेपन के संघर्ष‘ और ‘अकेलापन‘ की। अन्र्तमन को रश्मियों के रूप में इतना अच्छा मीत मिल गया हो और उसके साथ हम घंटों बतियाते हुए ‘‘अभिलाषा‘‘ रूपी काव्य-संग्रह जन्मते हैं, तो कवि किसी भी हाल में अकेला नहीं होता है। हाँ, मन जब सौ पर्दों में कैद हो जाता है, दरो-दीवारों में बंद महसूस करता है, तब वह ‘वातायन‘ की अपेक्षा करता है।
‘दतर‘ का जीवन, मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन को काफी प्रभावित करता है। इसका कारण एक अपरिपक्व उम्र में नौकरी में लगना है। उस वक्त का उसका कर्तव्य बोध, अपने संस्था के लिए सेवाभाव, समर्पण, त्याग, उद्देश्य, सिद्धान्त, सपने आदि एक-एक करके दबते जाते हैं, जब कार्यालय के अन्य भ्रष्ट कर्मचारी उस पर गलत तरीके अपनाने का दबाव डालते हैं और वह भी इनके समान गलत रास्ते अपना लेता है। इन मनोभावों को कवि ने ‘फाइलें‘ निपटाने में ‘सुविधा शुल्क‘ जैसी प्रवृत्ति और तद्नुसार एक ‘युवा अधिकारी‘ के मनोभावों में होने वाले बदलाव को बड़े अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है- जिन्दगी में समझौतावादी बनो/यहांँ कोई नहीं देखता/ कि आपने क्या किया/ बस आपकी सी.आर. देखी जाती है/उसे ही ठीक-ठाक रखने का प्रयास करो/ मुझे अपने अन्दर कुछ टूटता सा नजर आता है।
‘प्रकृति‘ शीर्षक के अन्तर्गत पचमढ़ी, बादल, नया जीवन और प्रकृति के नियम कविताएं कवि के प्रकृति प्रेम को उजागर करती हैं। ‘मूल्य एवं विसंगतियाँ‘ शीर्षक के माध्यम से कवि ने सिद्ध कर दिया है कि आज नैतिकता के साथ-साथ मानवता का कितना अधःपतन हो चुका है। ये सब कविताएं मन के मर्म को छूती हैं। हमारी चेतना और संवेदना को जागृत करती हैं। काश! समाज की दशा और दिशा बिगाड़ने वाले लोगों को इन कविताओं के अर्थों का संदेश मिले, ताकि वांछित परिवर्तन हो सकें।
वास्तविक रूप से ‘महात्मा गाँधी‘ को हाशिए पर डालने वाले ये इंसान ऐसे ‘खटमल‘ हैं, जो स्वयं की ‘मौत‘ के वक्त भी अपने मुख से ‘हे राम‘ कभी नहीं कहेंगे। ये ‘मानवता के दुश्मन‘ कभी सुधर सकते हैं क्या? अतीत का इतिहास और वर्तमान के सबूत यही गवाही देते हैं। रोज पढ़ा जाने वाला ‘सुबह का अखबार‘ भी यही निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। यदि समाज सुधारकों का बस चल सके तो मजबूर गरीब, बेरोजगार, पीड़ितो का ‘गुर्दा‘ न निकालकर ऐसे बेईमानों के गुर्दे निकालकर और उन्हें बेचकर इन बेसहारा लोगों की जानी चाहिए। ‘सम्बन्ध‘ और ‘जिन्दगी का दोराहा‘ कविताएं कवि मन की संवेदनशीलता के साथ-साथ चिंता को निरूपित करती हैं। क्योंकि जिंदगी को मोड़ देने के अहम् फैसले मृगमरीचिका साबित हुए तो क्या हश्र होगा इससे भी कवि चिंतित नजर आता है।
‘समकालीन‘ शीर्षक में प्रकाशित बारह कविताएं वर्तमान और दैनन्दिन जीवन में घटित होने वाले विषयों के संबंध में आगाह करती हैं। ये कवि की जागरूकता, कार्यालयीन, सामाजिक, प्रादेशिक और देशज घटनाओं को विशेष रूप से इंगित करती हंै। ‘क्लोन‘ कविता में कवि मानव को आगाह करता है- प्रकृति को ललकारना/तो आसान है/ लेकिन/इसके दुष्परिणामों को भुगतना/उतना ही कठिन। इसी प्रकार ‘कश्मीर‘ में व्याप्त आतंकवाद और हिंसा के अंजाम से बेपरवाह कवि कहता है- अतीत की परछाईयों से क्या डरना/चाहे भारत पाक में जाए/या पाक भारत में आए/ पर हम एक तो होंगे/ फिर यह तो अवाम तय करेगी/शासकों का भविष्य क्या है। ‘हिन्दी सप्ताह‘ कविता में सरकारी रवैये का एक नमूना देखिए - सरकारी बाबू ने कुल खर्च की फाइल/धीरे-धीरे अधिकारी तक बढ़ाई/अधिकारी महोदय ने ज्यों ही/ अंग्रेजी में अनुमोदन लिखा/बाबू ने धीमे से टोका/अधिकारी महोदय ने नजरें उठायीं/और झल्लाकर बोले/तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा/कि हिन्दी सप्ताह बीत चुका है। इसी तरह अन्य कविताओं आटा की चक्की, मेरी कहानी, ई-पार्क, जज्बात, ट्रैफिक जाम इत्यादि में आज के मनुष्य और शासन तंत्र की अमानवीय व्यवस्था और स्वार्थपरक प्रवृत्ति का अच्छा खाका तैयार किया है।
‘विविध‘ के अन्तर्गत संकलित कविताओं के तेवर और प्रवाह कवि कृष्ण कुमार यादव के मौलिक विचारों की प्रस्तुति में नयापन का आभास देते हैं, यथा-कविता है वेदना की अभिव्यक्ति/कविता है एक विचार/कविता है प्रकृति की सहचरी/कविता है क्रान्ति की नजीर/कविता है शोषितों की आवाज/कविता है रसिकों का साज/कविता है सृष्टि और प्रलय का निर्माण/कविता है मोक्ष और निर्वाण। इसी तरह मजदूर, कुर्सियां, ये बादल इत्यादि कविताओं में कवि के सरलतम शब्दों के ताने-बाने ने समर्थ मनभावन भावों को चुनकर मन के मर्म को सर्वथा एक नये लेकिन भिन्न अन्दाज से छुआ है। ऐसे ही अनेक बहुरंगी विचार कृष्ण कुमार यादव जी की अन्य रचनाओं में यत्र-तत्र-सर्वत्र मौजूद हैं। इस मायने में कवि एक समर्थ रचनाकार है। निश्चित ही आने वाले वर्षों में लेखन की परिपक्वता का यह ग्राफ और भी गहराता जाएगा।
अन्त में यह कहना चाहूँगा कि कविवर कृष्ण कुमार जी के मन-मस्तिष्क में विद्यमान सुप्त-सरस्वती जो सुख-दुःख के फूलों के बीच प्रवहमान रहती है, काव्य लेखन हेतु उनको विशेष दर्द और वेदना से अवगत कराती है। उसमें निहित चेतना और संवदेना का प्रस्फुटीकरण ही देशज, सामाजिक, मानवीय गुणों से आपूर्ति करने हेतु ‘‘अभिलाषा‘‘ काव्य-संकलन के रूप में प्रकट हुआ है। निश्चित ही श्री यादव के विचारों, चिन्तन आदि की दशा और दिशा देश, समाज और मानव कल्याण की ओर उन्मुख है।



समालोच्य कृति- अभिलाषा (काव्य संग्रह)
कवि- कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल/
kkyadav.y@ rediffmail.com
प्रकाशक- शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर
पृष्ठ- 144,
मूल्य- 160 रुपये
समीक्षक- विष्णु मंगरूलकर ‘तरल‘, अध्यक्ष-हिन्दी साहित्य समिति, मुलताई, 63, नेहरू वार्ड, अमरावती मार्ग,मुलताई, बैतूल (म0प्र0)

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