बुधवार, 28 नवंबर 2007

मैं भी स्वतंत्र हो पाता

मैं भी स्वतंत्र हो पाता
- शम्भु चौधरी, कोलकात्ता

चलो आज खिड़कियों से कुछ हवा तो आई,
कई दिनों से कमरे में घुटन सी बनी हुई थी।
हवाओं के साथ फूलों की खुशबू
समुद्री लहरों की ठंडक,
थोड़ी राहत,थोड़ा शकुन,
पहुँचा रही थी मेरे मन को शकुन
कुछ पल पूर्व मानो कोई बंधक बना लिया था
समुंदर पार कोई रोके रखा था,
कई बंधनों को तोड़, स्वतंत्रता के शब्द ताल
बज रही थी एक मधुर धुन।
सांय...सांय.....सांय.....सांय.....
मैं नितांत, निश्चित व शांत मन से
एकाग्रचित्त हो कमरे के एक कोने में बैठा,
हवाओं का लुफ्त उठा रहा था।
काश! इन हवाओं की तरह,
मैं भी कभी स्वतंत्र हो पाता
अपने - आपसे?

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निःशब्द हो जलता रहा
- शम्भु चौधरी, कोलकात्ता

आज, अपने आपको खोजता रहा,
अपने आप में,
मीलों भटक चुका था, चारों तरफ घनघोर अंधेरा
सन्नाटे के बीच एक अजीब सी, तड़फन ,
जो आस-पास,
भटक सी गयी थी।
शून्य ! शून्य ! और शून्य !
सिर्फ एक प्राण,
जो निःसंकोच, निःस्वार्थ रहता था,
हर पल साथ
पर मैंने कभी उसकी परवाह न की,
अचानक उसकी जरूरत ने,
सबको चौंका दिया।
चौंका दिया था मुझको भी,
पर! अब वह
बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर...
और मैं जलता रहा निःशब्द हो आज
..

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