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सोमवार, 4 मई 2020

व्यंग्य: बहारों फूल बरसाओ !

....शंभु चौधरी, कोलकाता ।


इस युद्ध में  रामप्रसाद जी का पूरा परिवार लहू’लुहान हो चुका था भक्तों के शब्द बाणों से निकली माँ-बहन-बेटी किसी को बाकी नहीं छोड़ा गया । युद्ध महाभारत बन चुका था । देशद्रोही का आधार कार्ड बांटा जा रहा था । देर रात रामप्रसाद जी भले थक कर सो गए पर भक्तों का हमला जारी था ।

4 मई 2020, कोलकाता (भारत):
रामप्रसाद जी ने 30 साल पत्रकारिता क्या कर ली खुद को प्रधानसेवक से ही ऊपर समझने लगे । बात-बात में सवाल-जबाब करने लगते । अब कल की ही बात लो, प्रधानसेवक ने देश के सभी सेना विंगों को बुलाकर गुप्त रूप से कहा कि लॉकडाउन के दूसरे चरण की सफलता पूर्वक समाप्ति के अवसर को एक उत्सव के रूप में मनाये और भारतीय सेना के तीनों सेनाध्यक्षों ने इसकी तैयारी शुरू कर दी । अचानक से सेना के तीनों सेनाध्यक्ष मीडिया के सामने आकर जो कहा उससे रामप्रसाद जी के तो तोते ही उड़ गये। 

जो क्षेत्र आवाज प्रतिबंधित है वहाँ सेना के जवानों ने जाकर उसकी बैन्ड बजा दी, हेलीकेप्टरों से फूलों की बरसात करने की घोषणा की । भला इसमें क्या गलत है ? यह तो गर्व की बात है । सेना के जवानों के द्वारा फूलों की बरसात, बैन्ड-बाजों से स्वागत, पर रामप्रसाद जी लगे प्रधानसेवक से सवाल-जबाब करने । आदत से मजबूर हर अच्छे काम को उल्टे चश्मे से देखना ।

आजकल पत्रकारों के पास बिना कांच का चश्मा प्रधानसेवक ने भिजवा दिया जिसके अंदर से नोटों की बरसात होती है । पर इनको कौन समझाए । सारे पत्रकारों के अच्छे दिन आ गए । अब जिसके भाग्य में रामप्रसाद जी जैसे मुर्ख पत्रकारों की लकीर लिखी हो उसे फकीर बनने से कौन रोक सकता है। एक बार सच क्या लिख दिये, नौकरी गई ।

‘‘आगे से सच मत लिखा करो’’ 
जिला मजिस्ट्रेट ने बेल देते हुए कहा कि - ‘‘ जब सच्ची बात लिखने से किसी का अपमान होता तो क्यों लिखते हो? पांच सौ रुपये का जुर्माना ठोकते हुए चेतावनी दी ‘‘आगे से सच मत लिखा करो’’ ’’

‘‘तूमने झूठी खबरें क्यों छापी?’
दूसरी बार रामप्रसाद फिर मजिस्ट्रेट के सामने खड़े हुए तो मजिस्ट्रेट सा’ब ने पूछा - ‘‘तूमने झूठी खबरें क्यों छापी?’’ फिर पांच सौ रुपये का जुर्माना ठोकते हुए चेतावनी दी ‘‘आगे से झूठी खबरें   मत छापा करो’’ ’’
मजिस्ट्रेट के सामने तब भी लाचार थे अब भी लाचार ।

अब रामप्रसादजी घर में बैठकर थाली पीटते हैं। कल तक घर में जो इज्जत पत्नी-बच्चे किया करते उस बैलेंस शीट में कारोबारी डेप्रिएसिएशन हिन्दी में (औद्योगिक मूल्यह्रास) होने लगा था । इस प्रथा में मजदूरों के शारीरिक क्षय होने से उसकी आमदनी कम हो जाती है जबकि उद्योगों में लाभ माना जाता है। यानी कि जिस उद्योग में जितना बड़ा डेप्रिएसिएशन मिलता है कम्पनी को उतना बड़ा लाभ होता है। मूल्यह्रास की इस प्रथा को अंग्रेजी में आर्थिक विकास बोलते हैं । 
रामप्रसाद जी की आदत है बातों को भटका के कहने की ।
पाठकों के इनकी बात उनके सर के ऊपर से निकल जाती थी । 
तभी तो इनका मूल्यह्रास भी जल्दी हो गया और इनका आर्थिक विकास भी नहीं हो सका । कलम घिसते-घिसते साठिया गए, पर अब तक साठ का पहाड़ा याद नहीं कर सके । 

जमा पूंजी के नाम पर बैंक बैलेन्स जीरो बटा जीरो । खैर अपने स्वभाव से जिद्दी रामप्रसाद जी आजकल सोशल मीडिया के ही सहारे जी रहें हैं। लगे प्रधानसेवक को ट्विट करने ।

रामप्रसाद जी ने पहला ट्विट किया ‘‘सड़कों पर हजारों मजदूर फंसे पड़े हैं सर! जी उनको इन हेलिकप्टरों से उठाकर उनके गांव छुड़वा देते ।’’

बस क्या था प्रधानसेवक के भक्त उन पर गिद्ध की तरह टूट पड़े ।
‘‘किसी ने लिखा तेरे बाप का क्या जाता है ? देखते नही ये फूल सड़कों पर नहीं, कोरोना से लड़ रहे उन योद्धाओं पर बरसाया जा रहा है जो हम लोगों की जान बचाने में पिछले 40 दिनों से लगे हैं।’’

अब तर्क तो बहुत तगड़ा था। रामप्रसाद जी चिंता में डूब गए । पर रामप्रसाद जी कहां थमने वाले थे।
उन्होंने भी नहले पर दहला मारा । आखिर, उनको भी तीस साल की पत्रकारिता का तजुर्बा जो था ।

भक्त के ट्विट पर रामप्रसाद जी ने जबाब दिया - "सड़कों पर हजारों मजदूरों ने कौन सा अपराध कर दिया कि इनको पैदल ही गांव जाना पड़ रहा है। दरअसल देखा जाए तो असली योद्धा तो ये लोग है जो सरकार से बिना किसी फ़रियाद के चुपचाप सैकड़ों मील पैदल ही गांव की तरफ अपने परिवार व बच्चों को लेकर निकल पड़े । कुछ तो रहम करो । इनके लिए भी सरकार कुछ सोचे ?"

भक्त कहां रूकने वाले थे ।
दूसरे भक्त ने पलट के एक तमाचा मारा । ‘‘ सर जी ! दिखने में आप समझदार लगते हो पर अक़ल घास के बराबर है। आपकी उम्र का लिहाज कर रहा हूँ। जिसे आप देश के योद्धा बोल रहे हो दरअसल ये लोग देश के गद्दार हैं जिन्होंने लॉकडाउन के नियमों का पालन नहीं किया । जब लोगों को निकलना बंद कर दिया गया, तो ये लोग गांव क्यों जा रहें ?

रामप्रसाद जी ने फिर लिखा - ‘‘ आप समझदार लगते हो लिखते हो तो मानो ट्विटर से फूलों की बरसात हो रही हो । इनका कसूर तो इतना ही है कि ये मजदूर हैं दो वक्त की रोटी कमाने शहर आये थे । अब, जब, सब, बंद हो चुका तो कहाँ रहें? मालिकों ने इनकी छुट्टी कर दी ‘‘ बोले अपने-अपने घर जाओ । काम नहीं है ।’’

मालिकों ने  प्रधानसेवक की भी बात भी नहीं मानी  - ‘‘बोले जाकर उनसे पैसा ले लो।’’
अब शहर में जीना, वह भी काम के बिना कैसे संभव होगा?
साथ में सत्तू-चुड़वा है जो पांच-सात रोज चलेगा । इसके बाद ?
गांव पंहुच गये तो कम से कम खाने को दाना तो मिल जाएगा इनको । बड़े विनम्रभाव से उसकी बातों का जबाब दिए ।

पर भक्तों का गुस्सा तो सातवें आसमान में चढ़ चुका था ।
‘‘ सब व्यक्तिगत हो कर गाली पर उतर आया ’’ बोलने लगा अरे ‘‘$#$#’’ तेरा दिमाग ठिकाने लगा दूंगा अब एक शब्द भी लिखा तो ।

रामप्रसाद जी कहाँ थमने वाले थे । रामप्रसाद जी ने भी दो-दो हाथ करने की सोच ली, इनका भी खून पानी की तरह खौलने लगा । वैसे भी साठ साल की उम्र में शरीर का सारा खून पानी हो जाता है। आमदनी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। प्रेस मालिकों को लगता है कि अब यह पत्रकार भोथरा हो चुका है। मशीनों की तरह हमें भी बदल दिया जाता है। उम्र ढल जाने से लिखावट में भी धार कहाँ रहती ? 

खुद से सवाल करते हुए राम प्रसाद जी फिर भक्तों के मना करने के बाबजूद फिर जबाब देने बैठे गए - ‘‘भाई ! हमने हिंजड़ों को सड़क पर नाचते बहुत देखा था । पर देश को नाचते पहली बार देख रहा हूँ ।’’ 

वह भी तब जब देश में कोरोना महामारी का फन सांप की तरह लोगों को डसे जा रहा है। अस्पतालों में लोग मरे जा रहे हैं । अस्पतालों की हालात दर्दनीय बनी हुई है । सरकार द्वारा जरूरी सुविधा अब तक इन डाक्टरों तक नहीं पंहुच पाई है। रोजाना डाक्टर भी कोरोना के शिकार होते जा रहें हैं । किस बात का घमंड हो गया आपको?

‘‘कभी थाली बजाओ’’ लोग थाली बजाने लगे । मानो कोरोना थाली की आवाज से डर जाएगा । सरकार जिस दिन थाली पीटवा रही थी, उस दिन संक्रमित लोगों की संख्या एक हजार से कम थी । 

जिस दिन घर-घर दीये जलाये गये उस दिन देश में संक्रमित लोगों की संख्या चार हजार पार कर गई । बड़ी संख्या में लोगों की मरने की सूचना आने लगी।  पहले घर में अंधेरा करो फिर दीया जलाओ। तबतक अस्सी से सौ घरों के दीये बूझ चुके थे । 

अब जब 3 मई को भारतीय सेनाओं ने पुष्प वर्षा की तो मेरा मन और भी हर्षित होकर झूम उठा । आखिर सेना के जवानों पर गर्व जो ना करे वह देशद्रोही ही होगा । सेना दिन-रात हमारी रक्षा में लगी है उनके ऊपर सवाल उठाना किसी भी अपराध से कम नहीं होगा । सड़कों पर देश के हजारों भूखे-प्यासे मजदूरों ने भी सर उठा कर जरूर महसूस किया होगा कि देखो ‘‘मेरा भारत कितना महान है।’’ सेना की कलाबाजियों से एक बार तो ये लोग भी अपनी भूख-प्यास भी भूल गए होंगे । टीवी चैनलों के द्वारा सेना के गौरवपूर्ण कलाबाजियों को दिखाये सरकार थक नही रही थी मनोरंजन से भरपूर इस कलाबाजियों को भला कौन सलाम नहीं करेगा? हवा से लेकर समुद्र तक सेना के तीनों विंग कहीं बैण्डबाजों से कोरोना के योद्धाओं का उत्साहवर्धन कर रहे थे तो कहीं हेलिकेप्टरों के द्वारा फूलों की बरसात हो रही थी, वहीं समुद्र में नव सेनाओं ने आतिशबाजी कर कोरोना के योद्धाओं को सलामी ठोकी ।

अब भक्तों का पारा सातवें आसमान पर था । एक साथ कई भक्तों ने मोर्चा संभाल लिया ।
एक तरफ रामप्रसाद जी शहीद होने को तैयार थे, तो दूसरी तरफ प्रधानसेवक की सेना निहत्थे रामप्रसाद पर गोलियां बरसाने में लगी थी ।

इस युद्ध में रामप्रसाद जी का पूरा परिवार लहू’लुहान हो चुका था भक्तों के शब्द बाणों से निकली माँ-बहन-बेटी किसी को बाकी नहीं छोड़ा गया । युद्ध महाभारत बन चुका था । देशद्रोही का आधार कार्ड बांटा जा रहा था । देर रात रामप्रसाद जी भले थक कर सो गए पर भक्तों का हमला जारी था । चुकी उनको पता था कि घनघोर बादलों में सेना के लड़ाकू विमान दुश्मनों के राडार से बच निकलेगें ।

दूसरे दिन रामप्रसाद जी उठे तो देखा कि भारत में मरने वालों की संख्या तेरह सौ के पार कर चुकी थी। रामप्रसाद जी गुणगुणाने लगे ‘‘ बहारों फूल बरसाओ ’’ सुबह एक नया समाचार आया कि मजदूरों को वापस लाने वाली स्पेशल ट्रेन में नब्बे सीटें खाली थी,  मजदूरों को इसलिए  ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया गया क्योंकि उन मजदूरों के पास टिकट के पैसे नहीं थे । मजदूरों पर आंसू बहाने वाले प्रधानसेवक कल एक दिन में करोड़ों रुपये का तेल, फूल सिर्फ छोटे से अहंकार में फूंक डाले, लाखों मजदूर, गरीब मरे तो मरे पर हिन्दू धर्म खतरे में नहीं होना चाहिए।  शायद यह देश भी अब इन मजदूरों का नहीं रहा। क्योंकि हर तरफ इन्हें ही दोषी करार दिया जा रहा है। ये लोग सड़कों पर क्यों? जब देश लॉकडाउन का उत्सव मना रहा हो। जयहिन्द !


शनिवार, 25 मई 2019

जिन्ना की राह पर भारत

अब इस बात को गौर करें कि ‘‘जयश्री राम’’ या ‘‘भारत माता की जय’’ का नारा हो या आजादी के समय स्वाधिनता का प्रतीक ‘‘वंदे मातरम्‘‘ नारे के स्वरूप को इस प्रकार प्रस्तुत किये जाने लगे कि इसे बोलने का अर्थ ही बदल गया। अब इन नारों में राजनीति बू आने लगी।
आइये अब हम कुछ इतिहास के पन्ने समेट लेते हैं। पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में सन् 1947 में जिन्ना ने नई सत्ता की शुरूआत की थी, वही 16वीं लोकसभा के गठन के बाद ही मोदी ने भी नई सत्ता की  शुरूआत की। आप सोचेगें कि इन दोनों के बीच क्या सामन्यता है। आप पहले इनकी भाषा को पढ़ लें, फिर आगे बात करेगें। 
पाकिस्तान आजाद होते ही अली जिन्ना ने अपने इस भाषण में पाकिस्तान के सभी नागरिकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा था -
‘‘पाकिस्तान हमेशा उनका एहसानमंद रहेगा जिन्होंने पाकिस्तान बनाने में अपनी बड़ी कुर्बानियां दी हैं। हमें यह मौका भी दिया कि हम दुनिया को यह बता सकें कि किस तरह से अलग-अलग इलाकों को मिलाकर बने एक राष्ट्र में एकता रह सकती है और रंग और नस्ल के भेदभाव से परे होकर सबकी भलाई के लिए काम किया जा सकता है। उन्होंने पाकिस्तान की तरफ से अपने पड़ोसी देशों और दुनिया भर को शांति का संदेश दिया। जिन्ना ने कहा कि पाकिस्तान की कोई आक्रामक महत्वाकांक्षा नहीं है और यह देश संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रति बाध्य है, पाकिस्तान दुनिया में शांति और समृद्धि के लिए काम करेगा।’’

वहीं 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही मोदी जी का संसद में दिये गये पहले भाषण का एक अंश जो इस प्रकार है - ‘‘यह भारत के भाग्य के लिए एक शुभ संकेत है। राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में चुनाव, मतदाता, परिणाम की सराहना की है। मैं भी देशवासियों का अभिनंदन करता हूँ, उनका आभार व्यक्त करता हूँ कि कई वर्षों के बाद देश ने स्थिर शासन के लिए, विकास के लिए, सुशासन के लिए, मत दे कर पांच साल के लिए विकास की यात्रा को सुनिश्चित किया है। भारत के मतदाताओं की ये चिंता, उनका यह चिंतन और उन्होंने हमें जो जिम्मेवारी दी है, उसको हमें परिपूर्ण करना है। लेकिन हमें एक बात सोचनी होगी कि दुनिया के अंदर भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इस रूप में तो कभी-कभार हमारा उल्लेख होता है। लेकिन क्या समय की माँग नहीं है कि विश्व के सामने हम कितनी बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति हैं, हमारी लोकतांत्रिक परंपराएं कितनी ऊँची हैं, हमारे सामान्य से सामान्य, अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति की रगों में भी लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा कितनी अपार है। अपनी सारी आशा और आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक परंपराओं के माध्यम से परिपूर्ण करने के लिए वह कितना जागृत है। क्या कभी दुनिया में, हमारी इस ताकत को सही रूप में प्रस्तुत किया गया है? इस चुनाव के बाद हम सबका एक सामूहिक दायित्व बनता है कि विश्व को डंके की चोट पर हम यह समझाएं। विश्व को हम प्रभावित करें। ’’ इन्होंने भी अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर दुनिया को शांति व भाईचारे का संदेश दिया।
पिछले 70 सालों में भारत और पाकिस्तान के परिणाम हमारे सामने है। भारत न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत हुआ, शिक्षा से लेकर विज्ञान तक, कल-कारखानों से लेकर व्यापार तक, कृषि से लेकर सुरक्षा तक सभी जगह भारत मजबूत होता चला गया। पंजाब में पृथकतावादी खालिस्तान आंदोलन से लेकर असम में उल्फा उग्रवादियों का सफाया यहां कि जनता ने खुद कर दिया। भारतीय हिस्से के कश्मीर में वे तमाम जन सुविधाएं उपलब्ध है जो भारत के अन्य राज्यों में में उपलब्ध है।
वहीं पाकिस्तान के मदरसों में मानव बम के कारखाने फलने-फूलने लगे। पाकिस्तान  ने वही प्रयास भारत में भी भारतीय मुसलमानों को बहका कर करने का लगातार प्रयास किया गया जिसमें उसको कभी कामयाबी नहीं मिली। यही कारण है कि पाकिस्तान के मुसलमानों की सोच में और भारत के मुसलमानों की सोच में आकाश-पाताल का अंतर है। धर्म के नाम पर जो देश भारत से अलग होकर पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान बना। दुनिया भर को शांति का संदेश देने वाले मोहम्मद अली जिन्ना का सपना सन् 1971 में तब चकनाचूर हो गया जब पाकिस्तान भाषा के नाम पर दो हिस्सों में बँट गया। धर्म ने जिसे भारत से अलग किया वही धर्म एक समय लाखों बंगाली मुसलमानों के जान का दुश्मन बन चुका था। बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलायें अपने बच्चों के साथ भाग-भाग के भारत में शरण लेने लगी थी। शब्दों में ना लिखे जाने वाले काम पाकिस्तानी सेनाओं ने उनके साथ किया। यही हाल आज बलूचिस्तान का है। धर्म ना तो दो भाषा को बांध कर रख सका ना ही विकास कर सका । पाकिस्तान किस प्रकार अंदर ही अंदर खोखला बनता चला गया इस बात का भी अंदाजा उसे देखकर सहज लगाया जा सकता है।
वहीं भारत धर्मनिरपेक्षता के मार्ग का चयन किया। जहां हमें काफी सफलता मिली, परन्तु साथ ही  धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में मुसलमानों की तुष्टिकरण की राजनीति,  सत्ता में आने के लिए किया जाने लगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद जामा मस्जिद की राजनीति ने इसे और बल दिया। मुसलमानों की  तुष्टिकरण से स्वाभाविक रूप् से हिन्दुओं में असंतोष फैलता चला गया। 2013 में मुजफ्फरनगर की घटना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।  सेकुलरवाद की राजनीति करने वाले आजाम खान और सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले हुकुम सिंह, संगीत सोम, सबके मुह में जहर भरा था, हर कोई धर्म की लहलहाती फसल को काटने में लगा था। जिसका परिणाम हमने 2014 में देखा कि किस प्रकार सेक्युलरवादी दलों का सफाया हिन्दी भाषी प्रान्तों से हो गया।
2014 में जो लोग, मुसलमानों के खिलाफ थे वे ही 2019 आते-आते मानवबम बनाते चले गये। मोदी सरकार भी स्नेह-स्नेह इस आग को अपने नेताओं के माध्यम से घी डलवाते रहे। 2019 लोकसभा के चुनाव में भोपाल से लेकर बंगाल तक हमने इसे देखा और सुना है कि किस प्रकार मोदी समूह की एक महिला एक तरफ महात्मा गांधी के कातिल को महिमामंडित कर रही थी तो दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के महान समाज सुधारक ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, जिन्होंने विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित करवाया, बाल विवाह का विरोध किया, बांग्ला लिपि के वर्णमाला पर काम किया, बँगला पढ़ाने के लिए सैकड़ों विद्यालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की। संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया की प्रतिमा को एक झटके में खंडित कर दिया।
यह दो घटना सामान्य नहीं मानी जा सकती। यह आरएसएस विचारकों की सोच व्यक्त करती है। संवैधानिक संस्थाओं की बात छोड़ दें तो कहीं गाय के नाम पर, कहीं ‘‘जयश्री राम’’ के नाम पर, कहीं हिन्दुओं के अल्पसंख्यक हो जाने के नाम पर हिन्दू वोटों का पोलोराइजेशन (ध्रुवीकरण) किया गया। एक नये प्रकार का राष्ट्रवाद जिसमें हिन्दुओं में भी डर / खौफ पैदा कर दिया गया। भला हो भी क्यों नहीं? यदि मुसलमानों के वोटों का पोलोराइजेशन सेक्युलरवादी दलों के द्वारा किया जा सकता है तो सांप्रदायिक ताकतों ने हिन्दू वोटों का पोलोराइजेशन करके क्या गुणाह कर दिया?
कांग्रेस ने पिछले 50 सालों से मुसलमानों की तुष्टिकरण की राजनीति की, ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द धीरे-धीरे मुसलमानों की तुष्टिकरण का पर्यायवाची बन गया। वहीं अब ‘राष्ट्रवाद’ हिन्दू तुष्टिकरण का पर्यायवाची बनता जा रहा है।
अब इस बात को गौर करें कि ‘‘जयश्री राम’’ या ‘‘भारत माता की जय’’ का नारा हो या आजादी के समय स्वाधिनता का प्रतीक ‘‘वंदे मातरम्‘‘ नारे के स्वरूप को इस प्रकार प्रस्तुत किये जाने लगे कि इसे बोलने का अर्थ ही बदल गया। अब इन नारों में राजनीति बू आने लगी। हिन्दू तुष्टिकरण के रूप में इन नारों का प्रयोग खुल कर होने लगा ।
यदि हम महात्मा गांधी के हत्यारे पर इतना गर्व कर सकतें है इन्दिरा गांधी या राजिव गांधी के हत्यारे पर गर्व करने से हम किसी को कैसे मना कर सकतें हैं। गांधी की फिलोस्फी को मानने वाले दल के लोग ही उसके हत्यारे को महिमामंडित करने वाले लोगों को राजनीति पनाह देता हो, जनता उसको चुन कर संसद में भेजती हो तो भविष्य का आप खुद ही अंदाज लगा सकते हैं कि आने वाले दिनों में भारत में कैसी राजनीति पनपने वाली है ।

महाराष्ट्र में दो राजनीतिक दल है वे भी हिन्दुओं की राजनीति करते हैं परन्तु उनके राजनीति में मराठा हिन्दू है। युपी या बिहार के हिन्दू नहीं है। इसी प्रकार आंध्रा में एक राजनीति दल मुसलमानों की राजनीति करता है परन्तु उसकी भाषा में पूरा हिंदुस्तान के मुसलमानों को एकत्र करने की बात हो रही है। अब देश की एक बड़ी राजनीति पार्टी की जगह मैं उसे मोदी पार्टी बोलकर लिखूं तो ज्यादा उपयुक्त शब्द होगा उसके नेता अमित शाह व योगी आदित्यनाथ खुलकर हिन्दुओं की राजनीति करने लगे। इस बार के चुनाव में तो जमकर इस विचारधारा का प्रयोग किया गया। निश्चित रूप से यह एक ऐसा औजार बन चुका है जो धर्मनिरपेक्ष ताकतों की काट बन चुका है।
इसबार 2019 के लोकसभा के चुनाव में विपक्ष ने कहीं भी इस बात पर संगठित होने का प्रयास नहीं किया कि वे धर्मनिरपेक्ष ताकत है और सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से बहार रखना होगा। इस बार चुनाव में धर्मनिपेक्षता नहीं बल्की इनके संगठित होने का एक ही एजेंडा था ‘‘मोदी को सत्ता से कैसे बहार रखा जाए’’ यानि पिछले पांच सालों में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें जो महज एक मात्र मुसलमानों की सुरक्षा व उसके तुष्टिकरण को ही धर्मनिरपेक्ष समझती थी और जामा मस्जिद से इनकी राजनीति शुरू होती और वहीं जाकर समाप्त हो जाती थी में काफी बदलाव आया है। अब धर्मनिरपे़क्ष राजनीतिक दलों को यह बताना पड़ रहा है कि वे भी हिन्दू हैं।
अबतक मैंने दोनों पक्षों की बात जस की तस रख दी। अब आपके मन में यह प्रश्न रह गया होगा कि इस लेख में मैंने जिन्ना को क्यों घसीटा? सवाल वाजिब है। पाकिस्तान ने मानव को मानव बम में तब्दील किया आज विश्व में मुसलमानों की एक लंबी फौज तैयार हो गई जो दुनियाभर में आतंक का साम्राज्य बसा लेना चाहता है। विश्वभर में इसके खातमें को लेकर तरह-तरह की योजनाएं बनाई जा रही है। क्या भारत भी इसी रास्ते पर निकल पड़ा है ? ‘‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’’ के फ्रेम का दायरा सुनने में जितना बड़ा लगता है। वास्तव में ऐसा है नहीं। यदि मोदी जी सच में भारत को यह संदेश देना चाहते हैं तो उनको सर्वप्रथम अपनी बात पर आना होगा कि ‘‘मैं अपने मन से माफ नहीं कर पाऊंगा’’ उस महिला को संसद पद से इस्तीफ़ा दिला के देश को यह संदेश दे कि वे ऐसे तत्वों को संसद में जाने से रोक देगें। यदि ऐसा नहीं होता है तो भारत को भी जिन्ना की राह पर चलने से मोदी रोक नहीं पायेगें।
लेखक स्वतंत्र  व  पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  


बुधवार, 7 नवंबर 2018

लोकतंत्र: भाइयों कुछ तो गड़बड़ है?


कोलकाता- 8 नवंबर 2018
 अभी हाल में ही रिजर्व बैंक का सुरक्षित कोष जो कि  देश की जनता का धन है उसका एक तिहाई हिस्सा सरकार उन लुटेरों  अडानी, अनील अंबनी व नीरव मोदी जैसे देश के महान लुटारों, जिन्होंने  देश लूटने में  उनको मदद की थी  के खातों में डाल देने का दबाव बना रही है ।  एक बात पुनः यहां उल्लेख करना चाहता हूँ पंतलजि का विज्ञापन लोकतंत्र को धराशाही करने में मोदी सरकार को सहयोग कर रहा है यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है ।
दुष्यंत कुमार की एक कविता - दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है, आज कल नेपथ्य में संभावना है। 
आज इस बात को इतिहास में लिखना जरूरी हो गया कि भारत की प्रायः सभी संवैधानिक संस्थाएं जिसमें सुप्रीम कोर्ट से लेकर, चुनाव आयोग, सीबीआई, भारतीय रिजर्व बैंक, सीवीसी, व अन्य तंत्र पूर्ण रूप से मौजूदा हिटलरशाही मोदी सरकार के गिरफ़्त में आ चुकी है । सीबीआई में किस प्रकार राकेश अस्थाना की नियुक्ति से लेकर उनके काले कारनामों को बचाने के लिए जिस प्रकार रातों-रात सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं को ताख पर रख कर सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को उनको उनके पद से हटा दिया गया। ठीक यही घटना कुछ दिनों पूर्व सुप्रीम कोर्ट में हुई जिसमें चार जजों ने मीडिया के सामने आकर अपना दुखड़ा रोया था कि "सबकुछ ठीक नहीं चल रहा "। आदरणीय रजंन गोगोई की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से लेकर अन्य जजों की नियुक्तियों पर संध का हस्तक्षेप,  जिस प्रकार अभी से भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मोदी सरकार को मजबूत करने का राग दौहरने लगे, जिस प्रकार सेना के तीनों मुख्य सेनापति सरकार की सुरक्षा में तैनात दिखे,  आज रिजर्व बैंक की बात सामने आ गई - आरबीआई गवर्नर (पालतू) उर्जित पटेल जिसने नोटबंदी के समय से अबतक मोदी सरकार के कहे-कहे देश को गुमराह किया, आज उसी पर इतना भीतरी दबाब है कि वे खुद इस्तीफा देने की पेशकेश करने वाले हैं। ‘‘ दाल में काला तो जरूर है ’’ मोदी जी की ही भाषा में - ‘‘काली रात को काली करतूत - भाइयों कुछ तो गड़बड़ है? अब रात के अंधेरे में क्या होता है क्या यह भी  बताने की जरूरत है  आपको ! ’’
दुख तो तब होता है जब लोकत्रंत का प्रहरी मीडिया तंत्र जो खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा मानती है  उसका एक वर्ग पेट के रोग से ग्रसित हो चुका है उनके पेट में चांदी के जूतों का जौंक पैदा हो चुका है जो भीतर ही  भीतर शरीर रूपी लोकतंत्र का खून पीने लगा है । कभी हमें धर्म की खुंटी पीलाई जा रही है, कभी हमें राष्ट्रवाद की तो कभी देश की सुरक्षा की दुहाई दी रही है । मानो अचानक से सब कुछ खतरे में पड़ चुका हो । वही व्यक्ति जब देश के साथ गद्दारी करता है और भारतीय जवानों को भारत की सड़कों पर ही जूतों से पीटवाता हो ।  देश द्रोहियों (मोदी जी ने ही कहा था) के साथ सरकार बनाता हो तब इनकी देशभक्ति किस अंतरिक्ष यात्रा पर चली जाती है ? ‘‘भारत माता की जय’’ या  ‘‘गाय का मांस खाने की बात’’ क्यों टाल दी जाती जब इनको सरकार बनानी होती?  राममंदिर इनका चुनावी मुद्दा बनकर क्यों रह गया? यह सोचने की बात है।  पिछले पांच सालों की कुव्यवस्था से आज देश की अर्थव्यवस्था विनाश के कगार पर आ चुकी है । तेल व गैस के दामों से जनता को लूटने के बाद भी, बच्चों की शिक्षा पर 18% प्रतिशत जीएसटी (GST) लगा देने बाद भी, डालर अपनी रफ्तार पकड़ेे हुए है ।  अभी हाल में ही रिजर्व बैंक का सुरक्षित कोष जो कि जनता का धन है का एक तिहाई हिस्सा सरकार उन लुटेरों - अडानी, अनील अंबनी व नीरव मोदी जैसे देश के महान लुटारों, जिन्होंने  देश लूटने में  इनको मदद की  के खातों में डाल देने का दबाव बना रही है । एक नीरव मोदी से देश के किसानों को भला हो सकता था पर नहीं हुआ। एक अनिल अंबानी से देश के सैकड़ों गांवों में शिक्षा व इलाज की व्यवस्था हो सकती थी नहीं हुई, पर मोदी सरकार देश को गंभीर आर्थिक संकंट में डालने के हर उस कदम पर मोहर लगा रही हैं जो देश को बर्वाद करने में तुली हो।  यह किसी आर्थिक खतरों की तरफ संकत दे रहा है कि देश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा ।
एक बात पुनः यहां उल्लेख करना चाहता हूँ पंतलजि का विज्ञापन लोकतंत्र को धराशाही करने में मोदी सरकार को सहयोग कर रहा है यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है।  अतः मीडिया तंत्र को कहीं लकवा ना मार जाए इस बात पर बहस जरूरी है कि उन प्रतिष्ठानों में काम लोकतंत्र की  शर्त पर की जाय या नही ?
 - शंभु चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

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शनिवार, 15 सितंबर 2018

2024 के बाद मोदी हिटलर शासक?

इन सबके बीच भाजपा की तरफ से एक बयान यह भी आया कि 2019 के चुनावी विजय के बाद भाजपा को अगले 50 साल तक सत्ता से कोई नहीं हटा पायेगा ।  क्या सच में ऐसा संभव है? या किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बयान है। इन दिनों मीडिया जगत में एक बात देखी जा रही है - सरकार को बचाने के लिये उनके सरकार के मंत्री नदारत रहतें हैं पर मीडिया सरकार का ऐसे बचाव करती है जैसे मोदी की सरकार मीडिया की मेहरबानी पर चल रही हो ।
कोलकाता 15 सितम्बर : पिछले सप्ताह दिल्ली में बने नए अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में भाजपा की दो दिवसीय कार्यकारिणी बैठक संपन्न हुई । इस बैठक में कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार विमर्श किया गया, वहीं अपनी दो दिवसीय  राष्ट्रीय कार्यकारिणी    में पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी मंथन किया गया । भाजपा ने अपने नये अध्यक्ष के चुनाव को भी 2019 के लोकसभा के चुनाव तक टाल दिया। संकेत साफ था कि भाजपा ने अगला लोकसभा का चुनाव भी मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में ही करने का मन बना लिया है। 
इस कार्यकारिणी बैठक में मोदी के प्रभाव को लेकर अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग तरह के विचार दबे स्वर में आने लगे थे । जबकि एससी-एसटी बिल, राफेल सौदा, बढ़ते तेल के दाम, गिरते रुपये से लेकर विपक्ष के होते तेज हमले पर भी चर्चा हुई । साथ ही बिहार के सुशासन बाबू का बलात्कार, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की गाय प्रेम, राजस्थान में वसुंधरा राजे के कमजोर होती सत्ता, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह को लेकर साथ में उत्तर प्रदेष की राजनीतिक बदलते हालात पर भी चर्चा हुई। दबी ज़ुबान पर सबको इस बार इन राज्यों में लोकसभा की सीटों को लेकर आशंका बनी हुई है कि पिछले लोकसभा के चुनाव जैसे ही परिणाम क्या इन राज्यों में आ पायेंगें? 
इधर अमित शाह ने बंगाल यूनिट से आगामी लोकसभा के चुनाव में कम से कम 24-25 सीटों को लाने का लक्ष्य बना के कार्य करने का संकेत कल की कोलकाता में होने वाली बंगाल राज्य कार्यकारिणी की बैठक के बाद, संवाददाताओं को संबोधित करते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने घोषणा की ।
इन सबके बीच भाजपा की तरफ से एक बयान यह भी आया कि 2019 के चुनावी विजय के बाद भाजपा को अगले 50 साल तक सत्ता से कोई नहीं हटा पायेगा । क्या सच में ऐसा संभव है? या किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बयान है। इन दिनों मीडिया जगत में एक बात देखी जा रही है - सरकार को बचाने के लिये उनके सरकार के मंत्री नदारत रहतें हैं पर मीडिया सरकार का ऐसे बचाव करती है जैसे मोदी की सरकार मीडिया की मेहरबानी पर चल रही हो ।
आयें अब भाजपा के इस ताजा बयान पर भी हम गंभीरता से विचार कर लें कि आलगे 50 सालों तक सत्ता में वे कैसे बने रहने का सपना संजो रहे हैं । दरअसल इसके पीछे राज्यसभा की उन सीटों की बात उनके दिमाग में चल रही है जो आगामी 2019-24 के सालों में खाली होने वाली है । अभी भाजपा राज्यसभा में बहुमत में नहीं है यही कारण है कि मोदी के तमाम तानाशाही फरमानों पर कई बार राज्यसभा रोक लग चुका है, जिसमें जमीन अधिग्रहण से लेकर तीन तलाक जैसे कई मुद्दे हैं जों राज्यसभा में भारी विरोध के कारण लटक गये। मोदी जी सत्ता को पकड़े रखने की कला के खिलाड़ी माने जातें हैं जिस प्रकार उन्होंने गुजरात में अपने तमाम विरोधियों को भले ही वे सत्ता पक्ष को हों या विरोधी पक्ष के, को किनारे कर दिया था ठीक इसी योजना के तहत वे अपना अगला कदम बढ़ाने की ओर अग्रसर दिखाई दे रहें हैं । इससे भाजपा के खुले विचारों के सांसदों में एक प्रकार से चिंता की लकीर साफ दिखाई पड़ रही है। 
245 राज्यसभा की सीटों में भाजपा को इन चार सालों में अपनी बढ़त बनाते हुए बीजेपी-73 सीट के आंकडे पर पंहुच गई, जबकि कांग्रेस-50, टीएमसी- 13, एआईएडीएमके-13, समाजवादी- 13, बीजुद-9 , जद(यु)- 6, टीडीपी-6, तेलांगना- 6, आरजेडी- 5, सीपीएम- 5, डीएमके- 4, बीएसपी- 4, एनसीपी-4, षिवसेना- 4, आकालीदल-3, आमआदमी-3 सीपीआई-2, नोमिनेटेड- 4, व अन्य छोटी-छोटी पार्टियों के पास एक-एक सीटें हैं । कुल 25-30 सीटों के उलट-पुलट से राज्यसभा का यह खेल भाजपा के पक्ष में हो जायेगा । 
दरअसल भारत का लोकतंत्र इसी राज्यसभा के बल पर बचा हुआ जिसे भाजपा चाहती है अगले पांच सालों में पूर्ण रूपेन रूप से दखल कर ले। यह तभी संभव हो सकता है जब भाजपा लगातार दूसरी बार ना सिर्फ 2019 का लोकसभा का चुनाव 2014 के मुकाबले अधिक सीटों से जीतें वहीं राज्यों में होने वाले चुनावों में भी उनकी सीटों को आंकड़ा बढ़ सके। क्योंकि इन सीटों के अंक गणित ही मोदी को राज्यसभा और लोकसभा में क्रूर शासक बना सकता जिसका सपना पिछली कार्यकारिणी में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने देखा है। 
इन सपनों को केरल की 3 सीट जो अभी वामपंथी दलों के पास है, कर्नाटक की तीन सीट, (6 सीट)- उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की 11 सीट जो 2020 से 2022 के बीच खाली होने वाली है। कांग्रेस की 8 सीटें जो विभिन्न राज्यों में है जो 2019-2020 में खाली हो जायेगी। इसी प्रकार बंगाल व उन सभी राज्यों को लक्ष्य किया जाएगा जहां से भाजपा को  लोकसभा  के साथ ही राज्यसभा में भी बहुमत के आंकड़े को छूने में मदद कर सके । लोकतंत्र के ये आंकड़ें मोदी को 2024 तक हिटलर बना देने के लिये काफी होगा । जयहिन्द !  शंभु चौधरी, लेखक एक विधिज्ञात भी हैं।

रविवार, 12 अगस्त 2018

एनआरसी: भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संसद और सुप्रीम कोर्ट से भी बड़े हैं ?


कोलकाता- 12 अगस्त 2018
यदि इन सभी बयानों को परखा जाए तो ममता बनर्जी के साथ-साथ, देश की सर्वोच्य अदालत (सुप्रीम कोर्ट), देश के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री, असम के राज्यपाल वे सभी देशद्रोही है जो इन 40 लाख धुसपैठियों को सूची में शामिल करने पूरा अवसर देने की वकालत कर रहें। परन्तु अमित शाह का बयान है कि ये सभी घुसपैठियें हैं । तो फिर इन सभी घुसपैठियों को भाजपा अध्यक्ष सूट-एट-साइट आदेश क्यों नहीं दे देते?  क्या जरूरत है संसद की?  क्या जरूरत है सुप्रीम कोर्ट की?
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एनआरसी के अध्यक्ष प्रतीक हजेला को, प्रेस में उनके एक बयान को लेकर नाराजगी जताते हुए उनसे पूछा कि उनका काम है रजिस्टर तैयार करना है ना कि प्रेस में एनसीआर के मुद्दों पर बयानबाज़ी । सुप्रीम कोर्ट ने हजेला और रजिस्टार जरनल को जेल भेजने की चेतावनी देते हुए कहा कि वे कोर्ट के आदेश के मुताबिक काम करें। परन्तु भाजपा के अध्यक्ष इन सबसे बड़े हैं । इनके बयानों को सुप्रीम कोर्ट न तो अभी तक संज्ञान में लिया ना ही कोई टिप्पणी ही की । शेर की तरह खुलेआम सुप्रीम कोर्ट को आँख दिखा कर 40 लाख लोगों को धुसपेठिया बना दिया । जबकि एनसीआर की प्रक्रिया अभी जारी है। 
पिछले माह 30 जुलाई को एनआरसी की दूसरी सूची जारी की गई। इस सूची में 2 करोड़ 90 लाख लोगों के नाम शामिल किए गए हैं। सूची में 40 लाख लोगों के नाम प्रकाशित नहीं किए गए हैं। इस सूची के प्रकाश में आते ही बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस सूची पर आपत्ति व्यक्त की जो अमित शाह से लेकर भाजपा के देशप्रेमी छुटभयै तक ममता बनर्जी पर इस प्रकार हमला बोल दिये मानो किसी देशद्रोही से बात कर रहें हैं । जबकि देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद को भरोसा दिया कि यह अंतिम सूची नहीं है। यह मसौदा है। इसलिए जिनका नाम छूट गया है, उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वे दोबारा आवेदन कर अपनी बात रख सकते हैं। फिलहाल किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी। वहीं असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल जो खुद भाजपा में जुड़ने से पूर्व असम गण परिषद के सदस्य थे। ने राज्यवासियों से अपील की है कि वह किसी भी प्रकार से आशंकित ना हों । जिस किसी भी भारतीय नागरिक का नाम इसमें शामिल नहीं हुआ है उसका नाम अवश्य शामिल किया जाएगा। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी इस जारी एनआरसी की सूची को लेकर अपनी टिप्पणी में कहा कि ना तो हम इस सूची को इंकार कर रहें ना ही स्वीकार । सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि एनआरसी के अंतिम ड्राफ्ट के रिलीज के आधार पर अथाॅरिटी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती और जिन लोगों के नाम छूट गए है, उन्हें पूरा मौका मिलने के बाद ही कोई एक्शन लिया जाएगा।
यदि इन सभी बयानों को परखा जाए तो ममता बनर्जी के साथ-साथ, देश की सर्वोच्य अदालत (सुप्रीम कोर्ट), देश के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री, असम के राज्यपाल वे सभी देशद्रोही है जो इन 40 लाख धुसपैठियों को सूची में शामिल करने पूरा अवसर देने की वकालत कर रहें। परन्तु अमित शाह का बयान है कि ये सभी घुसपैठियें हैं । तो फिर इन सभी घुसपैठियों को भाजपा अध्यक्ष सूट-एट-साइट आदेश क्यों नहीं दे देते?  क्या जरूरत है संसद की?  क्या जरूरत है सुप्रीम कोर्ट की?  राज्यों के मुख्यमंत्रियों की क्या जरूरत है?
इस देश में अभी दो ही व्यक्ति है एक नरेन्द्र मोदी जो भारत के प्रधानमंत्री हैं दूसरा शेयर बाज़ार का सटोरिया अमित शाह को आज भाजपा का अध्यक्ष कम भारत का तानाशाह अधिक बनकर ना सिर्फ पूरी मीडिया तंत्र को पंतजलि विज्ञापनों के माध्यम लोकतंत्र के चौथेस्तंभ का नपुसंक बना दिया है।  साथ ही साथ चुनाव आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक,  सुप्रीम कोर्ट, उच्चतम अदालतों को पंगु बनाने का क्रम जारी है। यह भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और भाजपा जैसे संगठन का दुर्भाग्य ही होगा कि हम छद्म राष्ट्रवाद के चक्कर में देश को दो तानाशाह के गिरफ़्त में कहिं न बंध जाएं ? 
 नोटः यह लेखक के अपने विचार हैं। इसे लेख को प्रकाशित और पुनः प्रकाशित करने के लिये सभी स्वतंत्र है। । लेखक विधिज्ञाता व स्वतंत्र पत्रकार है। - शंभु चौधरी, अधिवक्ता

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

मेक इन इंडिया की पाक यात्रा?

यह सच है कि प्रधानमंत्री श्री मोदीजी अपने कार्यकाल में अब तक इतनी विदेश यात्रा कर ली जितनी आजतक किसी भी प्रधानमंत्री ने शायद ही कभी की हो। अभी तो यह शुरूआत है पूरे 4 साल अभी इनको और यात्रा ही करनी बाकी है। मेक इन इंडिया के सहारे प्रधानमंत्री जी अपनी विदेश यात्रा का सपना पूरा ही नहीं करेगें। इस यात्रा से भारत को विश्व के मानचित्र में भारत को सबसे शक्तिशाली देश बना देंगे।
कल की ही बात लें मोदी जी ने एक बहाना खोजा अटल जी के जन्मदिन की बात उनको याद नहीं आये, नवाज शरीफ साहेब का जन्म दिन याद आ गया और अपने विदेश कूट नीति में तत्काल बदलाव करते हुए तत्काल पंहुच गये पाकीस्तान, नवाज शरीफ जी को जन्मदिन की बधाई देने। अब इसमें कोन सी राजनीति? कैसी विदेशनीति। कैसा शिष्टाचार? मित्र देश है देश में भाजपा के नेता गाली देते रहें। विपक्ष आलोचना करता रहे। देश की सेना/जवान मरते रहें। सर काटकर पाकिस्तान ले जाता रहे। हम शिष्टाचार निभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़नेवाले।
परन्तु हमें यह सोच लेना चाहिये कि भारत का प्रधानमंत्री सिर्फ अपनी इच्छा से नही, भारत की सुरक्षा, राजनैतिक दृष्टि से, विदेश नीति के तहत , संविधान के तहत, और सबसे बड़ी बात है जनता की भावना को विश्वास में लेकर कार्य करे तभी वह भारत का प्रधानमंत्री है नहीं तो वह सिर्फ मोदी है।

मोदी जी के अबतक कार्यकाल में सबकुछ उलटा हो रहा है। तेल के दाम में कोई गिरावट नहीे हुई, उलटे डालर के दाम में 10 प्रतिशत की वृद्धि अर्थात तेल के दाम का जो फायदा देश की जनता को होना था उसका फायदा दलालों को होने लगा।
मेक इन इंडिया के नाम से देश को भीतर से खोखला करना। देश की सेना के मनोबल को निराश करना। किसानों के लिये कुछ नहीं करना। रोजाना कभी टैक्स के नाम पर कभी सरचार्य के बहाने कर का बोझ बढ़ा देना, रेल भाड़ा को बढ़ा देना, तत्काल को टिकट को महंगा कर देना, सभी व्यवसायियों को वे वजह नोटीश भेजना । कंपनियों की जांच-पड़ताल करना। विदेश से काले धन लाने की जगह देश के व्यापारियों को ही तंग करना। महंगे सूट पहनना, गैर भाजपा शासित राज्य सरकारों को जरूरत से ज्यादा तंग करना। कुछ चुनिंदा व्यापारी के हित में जमीं अधिग्रहण पाॅलिसी लागू कराना। मोदी सरकार की पहचान बन गई है। अब जरूरत वे जरूरत विदेश यात्रा मोदी जी की कूट नीति का हिस्सा बन चुका है। इसे भले ही भाजपा के चापलूस नेतागण स्पोर्ट्समेन स्प्रीट मानते हों। परन्तु यह अचानक भारत के प्रधानमंत्री की पाक यात्रा कितनी भी नज़दीकी क्यो न हो देश हित में कदापि सही कदम नहीं माना जायेगा।
जयहिन्द - शम्भु चौधरी 26/012/2015 kolkata

रविवार, 1 मार्च 2015

गद्दार कौन? आतंकवादी या मोदी?

प्रमाणित हो गया कि कभी 'राम' तो कभी 'देशभक्ति' को बेचने में भाजपा से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं जो आंस्तीन के सांप की तरह हिन्दुस्तानियों की भावना को भंजाकर सत्ता पर काबिज होते ही अपनी दौगली 'जात' दिखा देता है। आज जिस प्रकार से देश को चलाने का प्रयास भाजपा कर रही है इससे देश की जनता में भारी असंतोष पनपने लगा है कि स्पष्ट शब्दों में लोग कहने लगे है कि ‘‘यह भी गद्दार निकला’’

कोलकाताः 3 मार्च 2015, लेखक- शम्भु चौधरी ; जम्मू-कश्मीर में चुनाव परिणाम के पश्चात सरकार बनाने हेतु हुए एक लंबी सौदाबाजी के बाद भाजपा ने पीडीपी के साथ ठीक वैसे ही समझौता कर सरकार बना ली जैसे दूध और दही का मिश्रण। अब जम्मू-कश्मीर के नये मुख्यमंत्री जनाब मुफ्ती मोहम्मद सईद आखिरकार अपना दाव खेलने में सफल रहे। मुख्यमंत्री बनते ही आपने एक रहस्य का पर से पर्दा उठाकर कम से कम देश की जनता को बता दिया कि आप जिस इंसान पर भरोसा कर रहे हैं वह कितना भरोसेमंद है? मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने बता दिया था कि ‘‘मैं ऑन रेकॉर्ड कहना चाहता हूं मैंने प्रधानमंत्री से कहा है कि राज्य में विधानसभा चुनावों के लिए हमें हुर्रियत, आतंकवादी संगठनों और पाकिस्तान को श्रेय देना चाहिये’’ इनके इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री यह सब बात पहले से ही जानते हुए चुप रहकर देश की जनता से गद्दारी कर रहे थे।

जिस 370 को लेकर संध (RSS) हमेशा से देश की जनता को गुमराह करती रही, वह रामजादे आज चुप क्यों? सोचने की बात है। शायद अपनी मां का श्राद्ध कराने लगे थे? भारत सरकार को सरकारी बयान देना पड़ा कि वे धारा 370 पर कोई विचार नहीं कर रहीं। इस बयान का क्या अर्थ निकाला जाय कि यह भाजपा सरकार की तरफ से एक लिखित दस्तावेज है जो मोदी ने पीडीपी का दिया है। क्या भाजपा इस बात का जबाब देगी? या संघ के रामजादे इस पर भी चुप रहेगें? संध की बोलती पर ताला लगानेवाले मोदी की जबान में जहर ही जहर भरा है अब तो हमें लगता है कि मोदी जिताना पाकिस्तान के लिये खतरा नहीं उससे भी कहीं अधिक हिन्दुस्तान के लिये खतरनाक साबित होते जा रहा है।

मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ गठबंधन कर भाजपा भले ही कांग्रेस को सत्ता से अलग करने की राजनीति में सफल रही हो पर इस बात से यह तो प्रमाणित हो गया कि कभी 'राम' तो कभी 'देशभक्ति' को बेचने में भाजपा से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं जो आंस्तीन के सांप की तरह हिन्दुस्तानियों की भावना को भंजाकर सत्ता पर काबिज होते ही अपनी दौगली 'जात' दिखा देता है। आज जिस प्रकार से देश को चलाने का प्रयास भाजपा कर रही है इससे देश की जनता में भारी असंतोष पनपने लगा है कि स्पष्ट शब्दों में लोग कहने लगे है कि ‘‘यह भी गद्दार निकला’’। जयहिन्द!

सोमवार, 13 जनवरी 2014

बात पते की - मोदी की हवा?

सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।

 दिल्ली भाजपा ने मोदी का पूरा खेल ही बिगाड़ दिया अब मोदी पगला गये, इनके समर्थक गाल-गलौज की भाषा का प्रयोग करने को ऊतारु हैं। इनको लगने लगा कि दिल्ली अब दूर हो गई है। चंद दिनों पहले तक मोदी के समर्थन में एक तरफा हवा बह रही थी, पिछले पांच राज्यों के चुनाव में 4 उत्तर भारत के राज्य ऐसे थे जिसमें भाजपा की एकतरफ़ा जीत दर्ज थी।

परन्तु भाजपा के पुराने खिलाड़ी और राजनाथजी के कट्टर विरोधी दिल्ली भाजपा के प्रभारी श्री मान् नितिन गडकरी जी भीतर ही भीतर मोदी के रथ को रोकने की योजना पर कार्य कर रहे थे इसके लिये उन्होंने विजय गोयल की दुखती नब्जों को सहलाया और दिल्ली में कमजोर नेतृत्व को सामने ला खड़ा किया।

डा. हर्षवर्धन जी जो 32 सीटों पर जीत प्राप्त कर प्रथम स्थान पर थे सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर ‘आप’ और कांग्रेस को आपस में उलझा सकते थे। परन्तु गडकरीजी ने फोन पर उनको ऐसा करने से मना कर दिया कि ‘‘वे सरकार बनाने का दावा ना करें।’’ बात बड़े नेता की माननी थी सो डा.हर्षबर्धन जी ने चुनाव परिणाम के आते ही शाम को अपने हाथ खड़े कर दिये।

उधर भाजपा अध्यक्ष राजनाथजी दावा कर रहे थे कि वे 4-0 से आगे हैं कि नितिन गडकरी ने हवा निकाल दी। राजनाथजी चाह कर भी डा.हर्षबर्धन को मना नहीं पाये कि वे कम से कम सरकार बनाने का दावा तो प्रस्तुत करें। ताकी विधानसभा में दोनो पार्टियों का रूख क्या रहता है इसका अंदाजा जनता को स्वतः ही लग जाये।

सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

सेकुलरवादी दल आई.एस.आई के एजेंट?

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके। ।

पिछले 27 अक्टूबर को पटना में आयोजित भाजपा की विशाल रैली जिसमें लगभग 5 से 6 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था इस दौरान पटना के रेलवे स्टेशन और गांधी मैदान के चारों तरफ सिलसिलेवार सात बम धमाके हुए। इन धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई, जबकि 100 से अधिक लोगों की घायल होन की सूचना मिली। दो लोग मौके से पकड़े जा चुके हैं। बोधगया के बाद बिहार में यह दूसरी और सबसे बड़ी आतंकी घटना है । गांधी मैदान में आयोजित इस विशाल रैली में भाजपा के नेताओं ने यदि थोड़ी सी भी चूक की होती या श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने भाषण में इन विस्फोटों का जिक्र किया होता तो भगदड़ मच जाती और इस भगदड़ में हजारों लोगों की जान पलकों में चली जाती । खैर! हम इस बात के लिए भाजपा नेताओं की दिलेरी और हिम्मत को सलाम करते हैं कि इतनी बड़ी बारदात को आंखों के सामने होते हुए भी मंच छोड़ कर नहीं भागे जैसा की कांग्रेसी सोच रहे हैं। संभवतः सेकुलरवादी दलों की मिलीभगत रही हागी किसी प्रकार इस रैली में भगदड़ मचा दिया जाए और फिर इस भगदड़ के बहाने देश की जनता को गुमराह कर अपनी-अपनी राजनीति रोटी पकाई जा सके।

मुज्जफ्फरनगर दंगों की आग को जिस प्रकार राहुल गांधी ने आग में घी डालने का प्रयास किया और देश के मुसलमानों पर शंका कर उन्हें अपमानित करने का प्रयास किय इससे भी इस बात की पूष्टी हो जाती हैं कि इस देश में सेकुलरवादी दल आईएसआई के एजेंट के रूप में कार्य कर रहें हैं। इंडियन मुजाहिदीन भारत में तेजी से अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा है । उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड में इस संगठन ने काफी सक्रियता से पांव फैलायें हैं। जिसको आंचलिक सेकुलरवादी दलों का संरक्षण भी प्राप्त है। अब कांग्रेसी भी इस संगठन को अपना संरक्षण देने का प्रयास कर आतंकवदियों के साथ सांठगांठ करने का प्रयास कर रही है। मुसलमानों के वोट को लेकर भारत में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है इससे यह तो स्पष्ट हो चुका है कि अब मुसलमानों को काफी सतर्क होने की आवश्यकता है । एक तरफ आईएसआई इनको भारत के खिलाफ भड़काने में लगी है तो दूसरी तरफ सेकुलरवादी दल इनको अपने-अपने पाले में लेने के लिए इनको हिन्दुओं के खिलाफ भडकाने में लगी है। जिसप्रकार इन दिनों राजनैतिक दलो द्वारा वोट की रजनीति के लिए सेकुलरवाद की परिभाषा का अलग-अलग अर्थ लगाया जा रहा है इससे आईएसआई मजबूत ही नहीं उनके समर्थकों का मनोबल भी बढ़ता जा रहा है। मानों ऐसा लग रहा है कि भारत में सेकुलरवादी राजनैतिक दल आईएसआई के पक्षधर बन चुकें है। मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के कारण समस्‍तीपुर, दरभंगा और मधुबनी जिला इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है! यूपी का 'आजमगढ़ मॉड्यूल' की जगह अब 'दरभंगा मॉड्यूल' और 'मधुबनी मॉड्यूल' सक्रिय हो गया है।

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

सांप्रदायिकता की आग - शम्भु चौधरी

कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री श्री मनीष तिवारी ने ‘‘देश में सांप्रदायिकता का जबाब देने की भरपूर वकालत की। उन्हों ने ‘धर्मनिरपेक्षता के एजेंडा’’ को आगे बढ़ाने की जोरदार वकालत की। यह बात सभी को पता है कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के पास अब इस एजेंडे के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं बचा है। कारण साफ है कि कांग्रेस पार्टी और इसके सहयोगी दलों ने मिलकर जिस प्रकार पिछले 9 सालों में देश को लूटा और देश को बर्वादी के कगार पर ला खड़ा किया हैं। देश की आर्थिक स्थिति को खास्ता हालात कर दिया हो। जिधर छूओ उधर ही लूट मची है। पुंजीपतिओं की पौ-बारह है गरीब मंहगाई की चपेट में बुरी तरह पीसता जा रहा है। जरूरी सभी खाद्य पदार्थों के दाम आकाश छूने लगे हैं। मंहगाई पर मनमोहन सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहा, नेता और पूंजीपति उद्योगिक घराने दोनों मिलकर देश को लूटने में लगे हैं। इस नाकामी को छूपाने के लिए देश में सांप्रदायिकता का माहौल खड़ा करना कांग्रेस पार्टी के लिए ना सिर्फ लाभकारी रहेगा और वह यह भी सोचती यह कि इससे मुसलमानों के वोटों का एकतरफा लाभ भी उसी की पार्टी को मिलेगा। जिससे यू.पी-बिहार-बंगाल जैसे कई राज्यों में जहां क्षेत्रिय दलों ने जैसे सपा, बसपा, जदयू, तृणमूल ने जिस प्रकार इनके सांप्रदायिक वोट बैंक में सैंध लगाई है कांग्रेस पार्टी का जनाधार लगभग इन राज्यों से समाप्त सा हो चुका है। इनको लगने लगा है कि स्नैह-स्नैह आने वाले दिनों में क्षेत्रिय दलों द्वारा इनके नाक में दम पैदा कर देगी।

मानो सत्ता देश की सेवा के लिए नहीं लूटने व बंदरबांट के लिए बना हो। जिसप्रकार राजनैतिक सांठगांठ क्षेत्रिय दलों के द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए किये जातें हैं, असमाजिक तत्वों से समझौता किया जाता है। उच्चतम अदालत के निर्णय को भी दरकिनार कर सी.बी.आई जैसी संस्था का दुरूपयोग किया जाता है। अदालती हस्तक्षेप के उपरान्त अपराधियों को बचाने का भरसक प्रयास हमें इस बात की तरफ संकेत करता है कि देश में कानून व्यवस्था से भी ऊपर हो चुका है राजनीति दल या यूँ लिखा जाए राजनीति दल देश की कानून व्यवस्था से ऊपर है। इनको RTI Act के अधिन आने में खतरा नजर आता है। इनको देश बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती सबके सब इस बात को लेकर चिन्तित है कि किस प्रकार जेल से चुनाव लड़ा जा सके। अपराधियों के सहयोग से कैसे सत्ता पर बना रहा जा सके।
अब चुकीं देश की जनता कांग्रेस पार्टी की भ्रष्ट व्यवस्था और लोकपाल विल को लेकर देश की जनता को जिस प्रकार से गुमराह करने का काम किया। डा. मनमोहन सिंह की असफल आर्थिक व्यवस्था ने देश को अंधकार में डाल दिया। एक तरफ शिक्षा का व्यवसायिकरण तो दूसरी तरफ देश में बेरोजगारों की बढ़ती समस्या से देश ध्यान हटाने और देश में श्री नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के खतरे को भांपते हुए कांग्रेस पार्टी ने सांप्रदायिकता के कार्ड को खेलने का खतरा मोल ले लिया है। इससे देश को क्या लाभ या हानि होगी यह तो वक्त ही बता पायेगा। हाँ ! इतना जरूर तय हो जायेगा देश में 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही सांप्रदायिकता की आग इस कदर लगेगी कि पूरा देश एकबार फिर से आजादी की घटना को याद कर सकेगा।

अर्मत्य सेन की धर्मनिरपेक्षता - शम्भु चौधरी

इस देश में ‘‘भारत माता की जय’’ बोलना सांप्रदायिकता कहलाती है, अल्पसंख्यकों को नाराज करना जैसा है। संसद के भीतर जो सांसद ‘‘बंदे मातरम्’’ बोलने में हिचकिचाते हैं। भारत के गुणगान में जो गीत तक गुनागुनाने में जिनका धर्म खुद को अपमानित समझता हो। वे लोग कैसे देश के प्रति वफ़ादार हो सकते? इन सबके उपरान्त हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को स्वीकारता है। हम इसका सम्मान भी करते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि हम खुद को उनके हवाले कर दें? हम कुछ भी कहें तो सांप्रदायिक और वे दंगा करें, आतंकियों को पनाह दें तो धर्मनिरपेक्ष? यह धर्मनिरपेक्षता का पैमाना नहीं हो सकता। यदि समय से हम नहीं चेते तो, आने वाली पौध हमें कभी नहीं माफ करेगी।
जिस प्रकार एक मांसाहारी इंसान (चंद अपवादों को छोड़ दें तो) निरामिस नहीं बन सकता चुकीं उसको खुन खाने की लत जो लग जाती है। उसी प्रकार एक भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक अपने को कभी भी सुरक्षित नहीं मानते, भले ही उनके चलते आप खुद को क्यों न असुरक्षित महसूस करने लग जाएं। आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर जिस प्रकार देश में एक व्यक्ति को लेकर आशंकओं का वातावरण पैदा किया जा रहा है इसमें देश के कुछ धर्मनिरपेक्षता की खाल में छिपे सांप्रदायिक चेहरे बेनकाब होते जा रहे हैं। जो यह सोचते हैं की देश में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा सिर्फ वे ही लोग कर सकते हैं। लेकिन जब पाकीस्थान या बंगलादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के साथ जो सांप्रदायिक व्यवहार होता है तब इनकी धर्मनिरपेक्षता, इनकी यही सोच, इनका यही बयान, हिन्दू मां बहनों के साथ हो रहे अत्याचार के दर्द को यह वर्ग नहीं समझ पाता। पिछले दिनों नोबल पुरस्कार प्राप्त भारत के महान अर्थशास्त्री श्री अर्मत्य सेन जी जिसके सिद्धान्तों से विश्व के किसी भी देश के एक भी ग्रामीण या ग्राम का भला नहीं हो सका ने एक प्रश्न के जबाब में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘असुरक्षित महसूस करने के लिए मुझे अल्पसंख्यक समूदाय का सदस्य होना होगा।’’ धर्मनिरपेक्षता की नई व्याख्या करने वाले श्री सेन को एक सलाह है कि कुछ दिन पड़ोस के देश में रह लेते वहां पर जो अनुभव उनको होगा उसके लिए उनको धर्म बदलने की कोई जरूरत नहीं होगी। आप स्वतः ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे संभव हो तो अपने परिवार को भी साथ रख लिजिऐगा। भारत के 40 प्रतिशत गांवों की स्थिति पाकीस्तान जैसी बनती जा रही हैं हिन्दूओं के नाबालिक बच्चियों को यही अल्पसंख्यक समूदाय उठा-उठाकर ले जा रहा, 15-20 दिनों तक उसको किसी घर में बन्द रखता है फिर उसका धर्म परिवर्तन कर किसी मुसलमान से जबरन निकाह करा देता है। आतंक का यह वातावरण पूरे भारत में सनै-सनै तेजी से फैलता जा रहा है भारत का कानून मूकदर्शक बना देख रहा है। श्री अर्मत्य सेन को अल्पसंख्यक बनकर उनके दर्द का अहसास करने की जगह भारत के उन इलाकों के दर्दनाक दृश्य को भी देखने का प्रयास करना चाहिए जहां भारत के अंदर ही हिन्दुओं के सैकड़ों परिवार खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। मुसलमानें के काल के ग्रास बनते जा रहे हैं। श्री अर्मत्य सेन का खुद का मत किसको भारत का प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहतें हैं या किसको नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है। परन्तु इस बात का देश की पौंगी धर्मनिरपेक्षता से कोई तालमेल नहीं बैठाया जा सकता। जिसप्रकार भारत में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा गढ़ी जा रही है उसमें भारत के उन बुद्धिजीवि वर्ग का प्रयोग किया जा रहा है जिसका विश्वव्यापि माहौल बनता या बिगड़ता ऐसे खतरनाक खेल को ना खेला जाए अन्यथा इसके परिणाम गुजरात से भी भयानक हो सकते हैं। इस देश में ‘‘भारत माता की जय’’ बोलना सांप्रदायिकता कहलाती है, अल्पसंख्यकों को नाराज करना जैसा है। संसद के भीतर जो सांसद ‘‘बंदे मातरम्’’ बोलने में हिचकिचाते हैं। भारत के गुणगान में जो गीत तक गुनागुनाने में जिनका धर्म खुद को अपमानित समझता हो। वे लोग कैसे देश के प्रति वफ़ादार हो सकते? इन सबके उपरान्त हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को स्वीकारता है। हम इसका सम्मान भी करते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि हम खुद को उनके हवाले कर दें? हम कुछ भी कहें तो सांप्रदायिक और वे दंगा करें, आतंकियों को पनाह दें तो धर्मनिरपेक्ष? यह धर्मनिरपेक्षता का पैमाना नहीं हो सकता। यदि समय से हम नहीं चेते तो, आने वाली पौध हमें कभी नहीं माफ करेगी। Date: 23.07.2013/ amartya sen

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

धर्मनिरपेक्षता का बुर्का

श्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान पर कि जब कभी भी कांग्रेस पार्टी को राजनैतिक संकट का सामना करना पड़ता है तो वह धर्मनिरपेक्षता का बुर्का पहन लेती है। इनके कहने का तात्पर्य स्पष्ट था कि भ्रष्टाचार में पूरी तरह डूबी कांग्रेस पार्टी न तो मंहगाई पर काबू पा रही है, ना ही देश में विकास का कोई नया मॉडल प्रस्तुत करने में सफल रही है। इनको तो बस हर किसी के बयान में सांप्रदायिकता ही नजर आती है और खुद धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनकर सारे महत्वपूर्ण मुद्द को गायब कर सत्ता पर किसी तरह बने रहना चाहती है। इस बयान का पलटवार करते हुए कांग्रेस पार्टी के इन दो चेहरों ने स्वीकार किया कि उनको धर्मनिरपेक्षता का बुर्का (चोला) अच्छा लगता है।

रविवार, 14 जुलाई 2013

कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई-शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं?
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक समाचार एजेन्सी को दिए गये बयान ‘‘कुत्ते के बच्चे वाली टिप्पणी’’ पर देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने जो हंगामा खड़ा किया इससे ऐसा प्रतित होता है कि ये राजनैतिक दल अपने स्वार्थ व वोट बैंक के लिए देश में सांप्रदायिक सदभावनाओं के साथ हमेशा सौदाबाजी करती रही है या करने का कोई अवसर नहीं चुकना चाहती। जिस बयान से श्री नरेन्द्र मोदी गोधरा के प्रतिफल में हुए गुजरात दंगों के दर्द के मानवीय पक्ष को अहसास कराने के प्रयास कर रहे थे, उसी बयान को इन धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कुछ इस प्रकार प्रचारित कर देश के मुसलमानों को बहकाने का प्रयास शुरू कर दिया । इनकी सोच अभी भी उसी जमाने में चल रही है कि वे एक झूठ को सौ बार कहेगें तो सभी को वही सच नजर आयेगा। जबकी वे यह नहीं जानते कि अब मुसलमान समाज भी आधुनिक हो चुका है। वे भी इन्टरनेट के माध्यम से उनके बयान या टिप्पणी को पढ़ सकते हैं और उसका अर्थ निकाल सकते हैं। जिसका अर्थ तथाकथित सांप्रदायिक धर्मनिरपेक्ष दलों ने निकाल कर देश की जनता को समझाना कर प्रयास किया। जिसप्रकार इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों को बहकाने का प्रयास कर देश की सांप्रदायिक सदभावनाओं में जह़र घोलने का प्रयास किया है, इस बात को जगजाहिर करती है कि इनका उद्देश्य सीधे तौर पर मुसलमानों को बरगलाना है। कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं? दरअसल मुसलमानों का वोट बैंक नोचने-खसोटने में लगी तथाकथित राजनैतिक दल खुद ही कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं। हर दल यह साबित करने में लगा है कि वे ही मुसलमानों का भला कर सकते हैं। मुसलमानों के वोट बैंक को एकतरफा पाने के जिस सेक्लुरिजम की बात ये लोग करते हैं। उससे आजतक मुसलमानों का भला नहीं कर सके। खुद को धर्मनिरपेक्ष और दूसरे को सांप्रदयिक मानने वाले दलों की इस देश में बाढ़ आ गई है। अब तो हालात कुछ इस प्रकार हो चुके हैं कि एक दल दूसरे दल से आगे बढ़कर मुसलमानों का हमदर्द बनने इस कदर प्रयास करता है कि वह यह भी भूल जाता है कि उसे कब और कहाँ क्या कहना चाहिए, कहना चाहिए कि नहीं? यह भी भूल जाते हैं। मानों देश के अन्दर मुसलमानों के वोटों को पाने के लिए सेक्लुरिजम दलों की आपस में ही कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई चल रही हो। - शम्भु चौधरी

रविवार, 16 जून 2013

यह कैसा सिद्धान्त नीतीश जी? -शम्भु चौधरी

माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को यह तो बताना ही होगा कि वह कौन सा सिद्धान्त है जिसको आधार बनाकर आपने बिहार की जनता के विश्वास के साथ धोखाबाजी की। जिसमें पिछले सप्ताह से बिहार की जनता को उनके बयानों से जो दिखाई दे रहा उसमें मात्र एक कारण श्री नरेन्द्र मादी के नाम को लेकर है। तो उनको यह बताना और जबाब भी देना होगा कि नरेन्द्र मादी न तो उनके दल के प्रचारक नेता बनाये गए ना ही एनडीए के प्रचारक बने तो उनको इस बात को लेकर इतना बबाला और भविष्य में क्या होगा इसकी अभी से ही चिन्ता क्यों सताने लगी? क्या वे खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मिदवार मानते थे?
आज भाजपा व जेडीयू का 17 साल पुराना गठबंधन कई लोगों के ना चाहते हुऐ भी बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के अहम का बली का बकरा बन गया। यह बात अलग है कि आने वाले चुनाव में इस अहंकारी व्यक्ति का हर्ष ठीक लालू यादव जैसी ही होनी तय है। आपने इस गठबंधन को भाजपा के नेताओं के लाख मनाने के वाबजूद व एनडीए अध्यक्ष श्री शरद यादव के ना चाहते हुए भी अहंकारी जिद ठान ली कि इसके लिए भला उनको कुछ भी करना पड़े वे एनडीए के गठबंधन में नहीं बने रह सकते। जिसका कारण नीतीशजी ने कहा कि ‘‘ हम किसी भी हालात में अपने सिद्धान्तों से समझौता नहीं करेगें’’ माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को यह तो बताना ही होगा कि वह कौन सा सिद्धान्त है जिसको आधार बनाकर आपने बिहार की जनता के विश्वास के साथ धोखाबाजी की। जिसमें पिछले सप्ताह से बिहार की जनता को उनके बयानों से जो दिखाई दे रहा उसमें मात्र एक कारण श्री नरेन्द्र मोदी के नाम को लेकर है। तो उनको यह बताना और जबाब भी देना होगा कि नरेन्द्र मोदी न तो उनके दल के प्रचारक नेता बनाये गए ना ही एनडीए के प्रचारक बने तो उनको इस बात को लेकर इतना बबाला और भविष्य में क्या होगा इसकी अभी से ही चिन्ता क्यों सताने लगी? क्या वे खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मिदवार मानते थे? यदि श्री नीतीश जी का यही सिद्धान्त है तो उनको नैतिकता के आधार पर बिहार में एनडीए को प्राप्त बहुमत की गद्दी भी छोड़ देनी चाहिए और बिहार की जनता के सामने जाकर कहना चाहिए कि वे सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं कर सकते। सिर्फ नरेन्द्र मोदी का विरोध करने से वे मुसलमनों के चेहते बन सकते हैं और सिर्फ मुसलमानों के चहते बनकर सत्ता प्राप्त किया जा सकता या प्रधानमंत्री का सपना पूरा किया जा सकता तो इसमें लालू यादव को अबतक मुसलमानों ने प्रधानमंत्री बना दिया होता। चुकिं हम सभी इस बात को जानते हैं कि श्री अडवानी जी की एतिहासिक सांप्रदायिक यात्रा को रोकने का साहस सिर्फ लालू जी ने ही दिखाया था उस समय आप श्री अडवाणी जी के साथ खड़े दिखाई देते रहे। धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त आपकी राजनीति चाल भले ही हो सकती है आपके इस सिद्धान्त से कोई सहमत दिखाई नहीं देता। आप इतने ही धर्मनिरपेक्ष थे तो भाजपा के साथ आपने गठबंधन ही क्यों किया था? आज जब आपकी दाल नहीं गली तो अंगूर खट्टे नजर आने लगे श्रीमान को।