Translate

धर्मनिरपेक्षता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्मनिरपेक्षता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

फतवा क्यों? ‘‘भारतमाता की जय पर’’

लेखक: शम्भु चौधरी

भले ही उनका तर्क ‘‘भारतमाता की जय’’ पर कुछ भी रहे। यह फतवा सीधे तौर पर भारत की अखण्डता पर एक सांप्रदायिक हमला है। यह फतवा उस समय आया जब संघ प्रमुख ने लगभग अपनी बात को वापस ले ली थी। देश को सोचना होगा कि इस फतवे के अंदर छुपा संदेश आखिर में क्या कहता है?

कोलकाताः ( 1 अप्रैल,2016) आज धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते देश की यह हालात बना दी कि भारत में, भारत का ही एक वर्ग भारत में रह कर भारत को गाली दे रहा है कोई भारत मां डायन कह रहा है तो कोई कुछ है। मजे की बात यह है कि इसे बोलने वाले सभी एक विशेष समुदाय के हैं।

आज तो हद कि उस सीमा को भी इन लोगों ने पार कर दी दारुम-उलूम देवबंद के द्वारा एक फ़तवा जारी कर कहा गया है कि भारत माता की जय कहना मूर्ति पूजा के बराबर है। ‘‘इस्लाम में किसी भी तरीके से मूर्ति पूजा नहीं की जा सकती। अतः भारत माता की जय बोली जाए या वंदना की जाए तो इस्लाम में ये मना है, नाजायज है।’’

इसके पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख श्री मोहन भागवतजीने देशभर में आलोचना के शिकार हो जाने के कारण अपने सूर बदलते हुए ‘‘भारतमाता की जय’’ पर दो बार सफाई दी कहा कि ‘‘हमें ऐसा कार्य करना है कि, पूरी दुनियाँ भारत माता की जय का नारा लगायेगी’’ जब इससे भी बात नहीं बनी तो कहा कि ‘‘ हम ऐसा भारत बनाएँगे जहां लोग खुद-ब-खुद भारत माता की जय हो.... हम नहीं चाहते कि किसी पर इसके लिये दबाव डाला जाए, इसे थोपा ना जाए।’’

देश की आज़ादी के पश्चात भारत की नींव को संविधान निर्माताओं ने भारत के मांस के टुकड़े को चन्द गिद्धों के खाने के लिए छोड़ दिया, ताकि सत्ता स्वार्थ बना रहें। दुर्भाग्य की बात है कि एक तरफ हमें ऐसे फतवे पढ़ने-सुनने को मिल रहें हैं। यह फतवा उस कौम की मानसिकता को दर्शाता है कि वे मौका मिलते ही भारत की बर्बादी का नया इतिहास लिख डालेगें।

भले ही उनका तर्क ‘‘भारतमाता की जय’’ पर कुछ भी रहे। यह फतवा सीधे तौर पर भारत की अखण्डता पर एक सांप्रदायिक हमला है। यह फतवा उस समय आया जब संघ प्रमुख ने लगभग अपनी बात को वापस ले ली थी। देश को सोचना होगा कि इस फतवे के अंदर छुपा संदेश आखिर में क्या कहता है? - भारतमाता की जय!


सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

सेकुलरवादी दल आई.एस.आई के एजेंट?

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके। ।

पिछले 27 अक्टूबर को पटना में आयोजित भाजपा की विशाल रैली जिसमें लगभग 5 से 6 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था इस दौरान पटना के रेलवे स्टेशन और गांधी मैदान के चारों तरफ सिलसिलेवार सात बम धमाके हुए। इन धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई, जबकि 100 से अधिक लोगों की घायल होन की सूचना मिली। दो लोग मौके से पकड़े जा चुके हैं। बोधगया के बाद बिहार में यह दूसरी और सबसे बड़ी आतंकी घटना है । गांधी मैदान में आयोजित इस विशाल रैली में भाजपा के नेताओं ने यदि थोड़ी सी भी चूक की होती या श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने भाषण में इन विस्फोटों का जिक्र किया होता तो भगदड़ मच जाती और इस भगदड़ में हजारों लोगों की जान पलकों में चली जाती । खैर! हम इस बात के लिए भाजपा नेताओं की दिलेरी और हिम्मत को सलाम करते हैं कि इतनी बड़ी बारदात को आंखों के सामने होते हुए भी मंच छोड़ कर नहीं भागे जैसा की कांग्रेसी सोच रहे हैं। संभवतः सेकुलरवादी दलों की मिलीभगत रही हागी किसी प्रकार इस रैली में भगदड़ मचा दिया जाए और फिर इस भगदड़ के बहाने देश की जनता को गुमराह कर अपनी-अपनी राजनीति रोटी पकाई जा सके।

मुज्जफ्फरनगर दंगों की आग को जिस प्रकार राहुल गांधी ने आग में घी डालने का प्रयास किया और देश के मुसलमानों पर शंका कर उन्हें अपमानित करने का प्रयास किय इससे भी इस बात की पूष्टी हो जाती हैं कि इस देश में सेकुलरवादी दल आईएसआई के एजेंट के रूप में कार्य कर रहें हैं। इंडियन मुजाहिदीन भारत में तेजी से अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा है । उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड में इस संगठन ने काफी सक्रियता से पांव फैलायें हैं। जिसको आंचलिक सेकुलरवादी दलों का संरक्षण भी प्राप्त है। अब कांग्रेसी भी इस संगठन को अपना संरक्षण देने का प्रयास कर आतंकवदियों के साथ सांठगांठ करने का प्रयास कर रही है। मुसलमानों के वोट को लेकर भारत में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है इससे यह तो स्पष्ट हो चुका है कि अब मुसलमानों को काफी सतर्क होने की आवश्यकता है । एक तरफ आईएसआई इनको भारत के खिलाफ भड़काने में लगी है तो दूसरी तरफ सेकुलरवादी दल इनको अपने-अपने पाले में लेने के लिए इनको हिन्दुओं के खिलाफ भडकाने में लगी है। जिसप्रकार इन दिनों राजनैतिक दलो द्वारा वोट की रजनीति के लिए सेकुलरवाद की परिभाषा का अलग-अलग अर्थ लगाया जा रहा है इससे आईएसआई मजबूत ही नहीं उनके समर्थकों का मनोबल भी बढ़ता जा रहा है। मानों ऐसा लग रहा है कि भारत में सेकुलरवादी राजनैतिक दल आईएसआई के पक्षधर बन चुकें है। मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के कारण समस्‍तीपुर, दरभंगा और मधुबनी जिला इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है! यूपी का 'आजमगढ़ मॉड्यूल' की जगह अब 'दरभंगा मॉड्यूल' और 'मधुबनी मॉड्यूल' सक्रिय हो गया है।

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिन्दू-मुसलमानों को बांटती ताकतें - शम्भु चौधरी

जब भी कोई दंगा होगा, कोई न कोई नंगा होगा,
हिन्दू-मुस्लिम ना हो भाई ऐसा ही कोई बंदा होगा।

देश के मुसलमानों को हिन्दूओं से दूरी बनाने के बदले उन्हें ऐसे अवसर तलाशने चाहिए कि जो दूरियाँ सेकुलरवादी ताकतों ने बना दी है उसे कैसे कम किया जा सके । हमें मिलकर दोनों समुदाय के बीच के बिचौलियों को हटाकर भारत के विकास व अपने बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित होने की जरूरत है। यह तभी संभव हो सकता है जब मुसलमान सेकुलरवादी ताकतों को उखाड़ फैंकने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दे तो पूरे राष्ट्र में उनके प्रति स्वतः सम्मान पैदा हो जाएगा ।

उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर की घटना ना सिर्फ एक दुर्भगयजनक व दुखद घटना है । यह घटना इस बात को प्रमाणित करने में सझम है कि सेकुलरवादी चौला पहनकर मुसलमानों को जो लोग मुर्ख बनाते रहें हैं दरअसल वे मुसलमानों की सुरक्षा के लिए नहीं, उनको हिन्दुओं से दूरी बनाये रखने के लिए है । उत्तरप्रदेश में यदि दोनों समुदाय के बीच सामाजिक ताने-बाने तौड़े ना जाते तो जिस छोटी सी घटना ने, जो कि भारतवर्ष में आम घटना मानी जाती है को लेकर इतना बड़ा नुकसान दोनों समुदाय को नहीं उठाना पड़ता । लगातार 10 दिनों तक शहर में तनाव बना रहा, जातीय व धार्मिक धूव्रीकरण आस-पास के गाँवों में होता रहा । इस बीच ना सिर्फ स्थानीय प्रशासन, लखनऊ भी सोता रहा । अब यही सेकुलरवादी ताकतें कभी इसके लिए जातीय संघर्ष की बात दौहराती है तो कभी इसके लिए सांप्रदायिक ताकतों को दंगा भड़काने के लिए जिम्मेदार मानती है । अर्थात दिल्ली में बैठी कांग्रेस की सेकुलरवादी सरकार और उत्तरप्रदेश की सेकुलरवादी सरकार हाथ पर हाथ धर कर तमाशा देखती रही । शायद यह सोचती रही होगी कि दंगे फैलने के बाद मुसलमानों को पुनः बहलाया या फुसलाया जा सकेगा । मानों मुसलमानों को ऐन-केन-प्रकारेण डराये रखना सेकुलरवादी ताकतों का उद्देश्य बन गया हो । ना सिर्फ उद्देश्य मुसलमानों को हिन्दूवादी विचारधारा से अलग करते हुए देश की सत्ता पर खुद को स्थापित कर सामाजिक सौहार्द को बांटे रखना ताकि दोनों समुदायों के बीच आपसी संवाद न बन सके ।

कुल मिलाकर हिन्दू और मुसलमानों के बीच आपसी संवाद के रूप में यह सेकुलरवादी ताकतें खुद को बिचौलिये के रूप में रखना चाहती है । देश आज परिवर्तन की तरफ जाने को बैताब हो रहा है। वहीं सेकुलरवादी ताकतें देश में दंगों की आड़ में पुनः मुसलमानों के वोट बैंक पर कब्जा जमाने की हौड़ में लगी है । इन सब के बीच कहीं मुसलमान मारा जा रहा है तो कहीं हिन्दू ।

सीयासी पार्टी सत्ता को प्राप्त करने के लिए अपने भ्रष्टाचार के कार्यकाल को मोदी बनाम सेकुलरवाद की तरफ ले जाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है । अचानक से देश के गृहमंत्रीजी का एक बयान आता है कि देश के कई राज्यों में दंगा होने की संभावना है । दरअसल देश में कोई दंगा-वंगा नहीं होने का यह इन लोगों की सोची समझी साजिस है कि इससे मुसलमानों के बड़े वर्ग को हिन्दूओं के विचारों से अलग-थलग कर ‘मोदी की लहर’ को किसी प्रकार से रोका जा सके ।

मुजफ्फरनगर की घटना ना सिर्फ मुसलमानों के लिए चिंता का विषय है, हिन्दुओं के परिवार भी कई गाँवों से पलायन कर चुके हैं । क्षति का पैमाना इतना बड़ा है कि इसे पाटने में कई साल लग सकते हैं । सामाजिक तानें-बानें बिखर से गए हैं । 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही दोनों समुदाय को आमने-सामने खड़ा कर दिया है । ऐसे में इन तथाकथित सेकुलरवादी ताकतों से सत्ता छीन कर मोदी के नेतृत्व में दोनों समुदायों को एक जुट होकर देश में एक नए वातावरण का निर्माण किया जाना चाहिए । यह अवसर ना सिर्फ देश के हित में होगा जो लोग सत्ता प्राप्त करने के लिए मुसलमानों को वोट बैंक समझते हैं उनको करारा तमाचा भी होगा ।

देश के मुसलमानों को हिन्दूओं से दूरी बनाने के बदले उन्हें ऐसे अवसर तलाशने चाहिए कि जो दूरियाँ सेकुलरवादी ताकतों ने बना दी है उसे कैसे कम किया जा सके । हमें मिलकर दोनों समुदाय के बीच के बिचौलियों को हटाकर भारत के विकास व अपने बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित होने की जरूरत है। यह तभी संभव हो सकता है जब मुसलमान सेकुलरवादी ताकतों को उखाड़ फैंकने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दे तो पूरे राष्ट्र में उनके प्रति स्वतः सम्मान पैदा हो जाएगा।


गुरुवार, 22 अगस्त 2013

किश्तवारः भारत को चेतावनी - शम्भु चौधरी

भारत में सभी अल्पसंख्यकों को जो जिस जगह वे खुद को अल्पसंख्यक समझते हों चाहे वह मुसलमान हो या हिन्दू, जैन, सिख या क्रिश्चन आदि सभी संप्रदायों को उनके परिवार व अपने-अपने धार्मिक स्थलों की सुरक्षा, भारतीय संविधान में प्रदान की गई है ना कि भारतीय संप्रभुता की असुरक्षा । धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हम देश की सुरक्षा से हम कोई समझौता नहीं करेंगें यह बात भारत का हर नागरिक चाहेगा । यदि वह ऐसा नहीं चाहता तो इसका सीधा सा अर्थ होगा वह व्यक्ति पाकिस्तानी है, अल्पसंख्यक नहीं ।



भारत में धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर राजनीतिज्ञों की बोलती उस समय बंद होती नजर आती है जब-जब देश में पाकिस्तानी समर्थक इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा सांप्रदायिकता का बीजारोपन किया जाता है। पिछले दिनों किश्तवार में जिसप्रकार मुसलमानों ने भारत के खिलाफ जहर उगला और देश विरोधी घटना को अंजाम दिया और इसे सांप्रदायिकता का चौला पहनाकर कश्मीर के मुख्यमंत्री श्री उमर अब्दुल्ला जी का इस बात के लेकर रोना कि इस दंगे में दो मुसलमानों की भी मौत हो गई, यह उनके ना सिर्फ विचारों का दर्शता है, भारत को चेतावनी भी दे रहा है ।

दरअसल यह कोई सांप्रदायिक दंगा था ही नहीं बल्की यह घटना मुसलमानों द्वारा एक सोची समझी साजिश के तहत भारतीयता में आस्था रखने वालों पर हमला था। ईद के दिन सामूहिक रूप से एकत्रित होकर मुसलमानों ने सरे आम भारत के प्रति वफादारों के सैकड़ों हिन्दू परिवार के करोबार व घरों को चन्द घंटों में ही आग के हवाले कर दिया प्रशासन सुरक्षा की व्यवस्था करने में ना सिर्फ नाकाम रही, केन्द्रीय हस्तक्षेप भी भाजपा की दखल के बाद हरकत में आई। इस घटना को किसी भी रूप में सांप्रदायिक दंगा नहीं कहा जा सकता। यह एक सुनियोजित षड़यंत्र है जो किश्तवार व उसके आस-पास के ईलाकों से अल्पसंख्यक हो चुके हिन्दू परिवारों को उनकी पुश्तैनी जगहों से बेदखल करने का प्रयास है। जिस प्रकार एक दशक पूर्व सन् 1990 में कश्मीर के कई हिस्सों से बड़ी संख्या में हिन्दू कश्मीरियों के साथ किया गया था।

किश्तवार की घटना कई प्रश्नों को एक साथ समेटे हुए हमें सोचने पर विवश तो किया ही है साथ ही पाकिस्तानी मुसलमानों ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को खुले रूप से चुनौती भी दी है। 1990 की घटना जिसके शिकार सैकड़ों हिन्दू पंडितों का परिवार आज भी अपने ही देश में धर्मनिरपेक्षता की तराजु में कहीं फिट नहीं बैठते। गुजरात के दंगों पर रोजना सुबह-शाम मुर्गो की तरह बांग देने वाले राजनीतिज्ञों ने एक दिन भी उनकी सुध लेने की नहीं सोची, यहां तक कि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जी भी उनको देखने नहीं गये। अपने ही घर से बेघर हुए कश्मीरी पंडितों की जो लोग सुघ लेने जाएंगे उन लोगों से भी कहीं मुसलमानों का वह तबका नाराज ना हो जाए जो देश में सांप्रदायिता की राजनीति कर रहें हैं। अर्थात यह बात स्पष्ट रूप से हमें समझने की है कि कहीं धर्मनिरपेक्षता सिर्फ मुसलमानों के हितों की रक्षा व उनके कट्टरपंथी सांप्रदायिक ताकतों के लिए एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने का हथकंडा तो नहीं बन गया ।

सेक्लुरिजम की राजनीति करने वाले दल ना सिर्फ देश की सुरक्षा के साथ सौदा कर रहे हैं ये लोग देश के साथ भी गद्दारी कर रहे हैं । जिस प्रकार किश्तवार की घटना पर धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने अपनी जुबानों पर ताला लगा रखा है, इनकी चुप्पी हमें इस तरफ भी संकेत करती है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ मुसलमानों की सुरक्षा, उनके आतंकवाद को संरक्षण, उनकी कट्टरपंथी नीतियों का समर्थन, और देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने के लिए ही प्रयोग में ली जा रही है। जिसे कोई भी देश प्रेमी किसी भी रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है ।

भारत में सभी अल्पसंख्यकों को जो जिस जगह वे खुद को अल्पसंख्यक समझते हों चाहे वह मुसलमान हो या हिन्दू, जैन, सिख या क्रिश्चन आदि सभी संप्रदायों को उनके परिवार व अपने-अपने धार्मिक स्थलों की सुरक्षा भारतीय संविधान में प्रदान की गई है ना कि भारतीय संप्रभुता की असुरक्षा। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हम देश की सुरक्षा से हम कोई समझौता नहीं करेंगें यह बात भारत का हर नागरिक चाहेगा । यदि वह ऐसा नहीं चाहता तो इसका सीधा सा अर्थ होगा वह व्यक्ति पाकिस्तानी है, अल्पसंख्यक नहीं । ऐसे तत्वों को भारत में भारतीय कानून के तहत किसी भी रूप में सुरक्षा नहीं दी जा सकती । यदि ऐसा किया जाता है तो यह भारत की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ माना जाना चाहिए ।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सेकुलरिज्म बनाम देश की सुरक्षा - शम्भु चौधरी

देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। जो लोग ऐसा सोचते हैं कि इससे उनको चुनावों में फायदा हो सकता है से भी स्पष्ट हो जाता है कि देश में पकिस्तानियों की संख्या भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बनती जा रही है। अर्थात सेकुलरवादी राजनेता देश की सुरक्षा के सौदागर बन चुके हैं।

जबसे भारतीय संविधान में सेकुलर शब्द को अंकित किया गया है तब से देश के भीतर पाकिस्तानी समर्थकों का मनोबल इतना ऊँचा हो गया है कि देश की सुरक्षा को भी खतरा मंडराने लगा है। पाकिस्तानी समर्थकों से आप जो भी अर्थ लगायें वह आपकी सोच हो सकती है। जहां तक मेरा मानना है कि जो लोग भारतीयता को नहीं स्वीकारते, भारतीय संस्कृति को अपनाने में जिनको अड़चनें आती हों। भारतीय सैनिकों की बलि पर जो लोग संसद के भीतर और बहार देश को गुमराह करते हों, जो लोग पकिस्तानियों को दोष मुक्त करार देने में जरा भी संकोच नहीं करते, भारतीय क्षेत्र में रहकर भारत के विरूद्ध साजिश करने में सहयोग प्रदान करना, आतंकवादियों व उन से जुड़ी घटनाओं की वकालत करना व देश की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ कर उन्हें भारतीय राजनीति का हिस्सा बनाना या बनाने का प्रयास करना यह सभी कारनामे देशद्रोही की श्रेणी में आते हैं। और इसके लिए खुद को सेकुलरवादी बताने वाले लोग ही जिम्मेदार हैं । यही सेकुलरवादी ना सिर्फ आतंकी घटनाओं के लिए देश में जगह-जगह होने वाले दंगों के लिए भी जिम्मेदार हैं।

इन दिनों देश की संसद व विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं में कुछ ऐसे तत्वों की भरमार सी हो चुकी है जो सेकुलरिजम के बहाने देश की सुरक्षा के खिलाफ न सिर्फ सार्वजनिक बयान देते पाये जाते हैं इन लोगों ने देश के सैनिकों के मनोबल को भी कमजोर करने का प्रयास किया है। इन सबके बीच देश का लोकतंत्र तमाशबीन बनकर रह गया। इस बात को लेकर भी हम आश्चर्यचकित हैं कि आखिर में हमारे सेकुलरवादी विचारधारा के झंडावाज नेतागण देश को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। इनका जमीर इस कदर समाप्त हो चुका कि ये लोग सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सुरक्षा तक को भी दाव में लगाने से बाज नहीं आते।

ऐसे नेताओं के विरूद्ध देशद्रोह का मामला बनाया जाना चाहिए जिससे इस तरह के बयानों से जिससे देश की सुरक्षा को खतरा बनता हो पर लगाम लगाया जा सके। देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। इससे उनको चुनावों में किसी विशेष समुदाय के वोटों का फायदा तो हो सकता है परन्तु कालान्तर में यही फायदा देश की संप्रभुता के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। जो लोग ऐसा सोचते हैं उनकी इन हरकतों से उनको या उनके दल का राजनीति फायदा होता है वे लोग देश के इतिहास को उठाकर देख लें कि इसके क्या परिणाम सामने हमें देखने को मिल रहें हैं। जैसे-जैसे सत्ता पर सांप्रदायिक ताकतों का पल्ला मजबूत होता जा रहा है देश में उतने ही तेजी से सांप्रदायिक तनाव फैलता जा रहा है। अब तो कई जगह खुले रूप में देश के विरूद्ध जहर तक उगलने लगे हैं।

यहाँ यह सवाल नहीं है कि किसी संप्रदाय या दल विशेष की बात हो या उनकी नीतियों को दोषी ठहराया जाए। सवाल है कि हम इन मुद्दों को लेकर देश को किस जगह ले जाने का प्रयास कर रहें हैं इससे किसको फायदा होने वाला है। जो लोग भारतीयता को स्वीकार नहीं कर पा रहे उनको हम भारतीय राजनीति में जगह देकर ना सिर्फ खुद को कमजोर करने का प्रयास कर रहें हैं अन्ततः इसका परिणाम सभी राजनैतिक दलों को झेलना पड़ सकता हैं । उस समय आज कि इस राजनीति के परिणाम कितने घातक होगें इसकी कल्पना मात्र से देश की रूह कांप जाऐगी। सभी राजनीति दलों को इस सेकुलरवादी विचारधारा के परिणामों पर ना सिर्फ पुनः सोचने की जरूरत है। भारतीय राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता को प्राप्त करना नहीं, भारतीय संस्कृति की रक्षा भी होना जरूरी है। ताकी सभी धर्म के लोग आपसी भाई-चारे के साथ रह कर अपने-अपने समाज का विकास कर सकें।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

सोमवार, 12 अगस्त 2013

नपुंसक बनता जा रहा धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत- - शम्भु चौधरी

सत्ता को बचाये रखना या सत्ता प्राप्त करने के लिए हम इस तरह के सांप्रदायिक हमलों को कबतक सहते रहेगें? किश्तवाड़ में पाक प्रयोजित इस सांप्रदायिक हमले की हमें एकजुट होकर विरोध करने की जरूरत है ना कि हर बात में गुजरात दंगों या अन्य घटनाओं से जोड़कर उनके मनोबल को मजबूती प्रदान करने की। देश की संसद, देश के सांसदों , राजनेताओं को खुलकर इस घटना का विरोध करना चाहिय। जिसप्रकार ये लोग एकजुट होकर गुजरात पर हमला करते नहीं थकते, काश! यही राजनेताओं के मुंह किश्तवाड़ के सांप्रदायिक हमले की गुंज सुनाई देती तो हम कुछ हद तक उनको धर्मनिरपेक्ष मान लेते, पर इनको देश से ज्यादा बोट बैंक की चिन्ता नजर आती है। तब यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दुओं की सुरक्षा कौन करेगा और जो हिन्दुओं के सुरक्षा की बात करेगा या करना चाहेगा क्या वह सांप्रदायिक बन जायेगा?

किश्तवाड़ में पिछले तीन दिनों जिसप्रकार एक विशेष समुदाय के लोगों को मौत के घाट सुलाया गया। यह इस बात की तरफ हमें सोचने को विवश करता है कि धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनने वाले लोगों की चुप्पी, ऐसा लगता है कि किसी विशेष समुदाय के देशद्रोही व सांप्रदायिक हरकतों के विरूद्ध ना बोलना इनकी लाचारी सी बन गई है। पाकिस्तानी हमारी सीमाओं आकर हमारे सैनिकों को मौत के घाट सुला जाता हैं। और हमारे देश की तथाकथित राजनैतिक पार्टियां कुछ इसप्रकार का सफाई देती नजर आती है कि जैसे वे भारत के नहीं पाकिस्तान की तरफ से बयान दे रहें हों । हर जगह वोटबैंक एक तमाशा हो गया हैं। देश की सुरक्षा से भी अब ये लोग समझौता करने में नहीं हिचकचाते। किस बेशर्मी के साथ संसद में एक ही बयान को तीन-तीन बार देकर देश को गुमराह करने का प्रयास ये किस साजिश का हिस्सा है इनके पीछे कौन से लोग शामिल थे उनके नकाब को उतारना जरूरी हो गया है। मुझे तो इस बात का दर्द हो रहा है देश के पत्रकार व बुद्धिजीवी वर्ग भी अपनी कलम को इस अंधकार में धकेल चुके हैं। मानो देश की सुरक्षा धर्मनिरपेंक्षता के सामने नपुंसक सी बन चुकी है।

आतंकवादी हमारे देश की संसद पर हमला करते हैं हम उनका पक्ष लेते नहीं थकते। पाकिस्तान हमारे जवानों का सर काट ले जाते हैं हम चुपचाप सह लेते हैं। पाकिस्तानी सीमाओं पर रात के अंधरे में हमारे जवानों को भूनकर चले जाते हैं हमारा विदेश व गृह मंत्रालय संयुक्त रूप से पाकिस्तान को बचाने की हरकतें करता है। कुल मिलाकर हमें यह मान लेना होगा कि धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर पाकिस्तानी समर्थकों ने हमारे देश पर एक प्रकार से सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिज्ञ हमला सा कर दिया है। और हम एक दूसरे को नीचा दिखाने में या अपनी सत्ता पर बचाने में लगे हैं।

जब कुछ लोग देश के भीतर हिन्दू सांप्रदायिकता का सवाल उठाते हैं तो उनको मुस्लिम सांप्रदायिकता के विरूद्ध बोलने में किस बात का डर सताता है? सांप्रदायिकता तो दोनों ही है। पर हमारे धर्मनिरपेक्षता के विद्वानों को हिन्दू सांप्रदायिकता से देश के टूटने व सांप्रदायिक दंगों का तो खतरा नजर आता है पर वहीं जब को मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात या देश के विरूद्ध उठती हुई आवाज के तब इन राजनेताओं को देश पर कोई खतरा नहीं मंडराता नजर आता।

इस बात पर एक बात तो माननी ही होगी कि देश का मुसलमान एक साथ है। चुकीं जब ओबामा को पत्र लिखने की बात सामने आती है तो उस पत्र पर देश के अधिकांशतः मुस्लिम सांसदों और विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किये थे। ये संकेत को देश भले ही आज ना भांप पा रहा हो। इसके परिणाम भविष्य में घातक सिद्ध होगें। किसी समुदाय के विरूद्ध हमें नहीं सोचना चाहिये यह बात सही है कि हर समुदाय में अच्छे-बुरे लोग होते हैं पर यहां तो उस जमात का एक बड़ा हिस्सा ही देश के विरूद्ध साजिश में लगा चुका है। पाक प्रायोजित षडयंत्र को हम अनदेखा करते हुए किसी विशेष समुदाय के बोट बैंक पाने या खुद को सत्ता में बनाये रखने के लिए उनका राजनैतिक प्रयोग करना एक प्रकार से देश के साथ गद्दारी देश के संविधान की आड़ में पाक प्रायोजित आतंकवाद को संरक्षण देना है।

सत्ता को बचाये रखना या सत्ता प्राप्त करने के लिए हम इस तरह के सांप्रदायिक हमलों को कबतक सहते रहेगें? किश्तवाड़ में पाक प्रयोजित इस सांप्रदायिक हमले की हमें एकजुट होकर विरोध करने की जरूरत है ना कि हर बात में गुजरात दंगों या अन्य घटनाओं से जोड़कर उनके मनोबल को मजबूती प्रदान करने की। देश की संसद, देश के सांसदों , राजनेताओं को खुलकर इस घटना का विरोध करना चाहिय। जिसप्रकार ये लोग एकजुट होकर गुजरात पर हमला करते नहीं थकते, काश! यही राजनेताओं के मुंह किश्तवाड़ के सांप्रदायिक हमले की गुंज सुनाई देती तो हम कुछ हद तक उनको धर्मनिरपेक्ष मान लेते, पर इनको देश से ज्यादा बोट बैंक की चिन्ता नजर आती है। तब यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दुओं की सुरक्षा कौन करेगा और जो हिन्दुओं के सुरक्षा की बात करेगा या करना चाहेगा क्या वह सांप्रदायिक बन जायेगा?

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

भारतीय धर्मनिरपेक्षता - शम्भु चौधरी

जबतक भारतीय संस्कृति इस देश में कायम रहेगी तभी तक धर्मनिरपेक्षता इस देश में जीवित रह सकेगी, यही अंतिम सत्य है। जो लोग वोट बैंक की राजनीति करते हैं वे वोट बैंक की राजनीति करें पर साथ ही वे इस बात का भी ध्यान रखें कि भारतीय संस्कृति को चोट पंहुचाने वाले तत्वों से सत्ता को कैसे दूर रखा जाए। जो लोग भारतीय संस्कृति को भी नूकसान पंहुचाकर अपनी राजनीति स्वार्थ की पूर्ति में लगे हैं वे लोग कहीं भूल से ही सही भारत की संप्रभूता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे? यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनको सावधान होने की जरूरत है।

पिछले एक दशक से भारत में धर्मनिरपेक्षता को लेकर लोगों के मन में शंकाएं होने लगी है कि जिसप्रकार देश के विभिन्न राजनैतिक दलों में एक विशेष सांप्रदाय के वोट बैंक को लेकर राजनीति की जा रही है कहीं आगे चलकर यही राजनीति देश की संप्रभूता के लिए घातक ना साबित हो जाए। भारतीय संविधान में सभी धर्मावलंबी को समान अधिकार दिया गया है ताकि वे अपने धर्मानुसार अपने धर्म व संस्कृति की रक्षा करते हुए भारतीय भौगोलिक सीमा के अन्दर एक अच्छे नागरिक बनकर अपना जीवन यापन कर सकें। अर्थात जिन लोगों को भारतीय संविधान में विश्वास है उनको भारतीय संस्कृति में भी आस्था रखनी चाहिए चुंकि भारतीय संस्कृति ने जिस धर्मनिरपेक्षता की संरचना की है यदि हम उसकी भावना को ही समाप्त कर देगें तो इस संविधान की संरचना ही गलत हो जाएगी।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजनीति दल के एक प्रवक्ता ने इस बात की पूरजोर वकालत की कि भारत में ‘सेक्लुरिजम’ पर बहस हो जानी चाहिए। हाँ ! मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि इस बात पर देश में बहस होनी ही चाहिए ताकि आज की नई पीढ़ी को पता चल सके कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या है?’’ जिस प्रकार इन दिनों इसकी परिभाषा व्यक्त की जा रही है क्या वास्तव में यही धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप होना चाहिए हमें इस बात पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इससे पहले की हम धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या हो पर चर्चा करें, हमें इसके उन पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए कि विश्वभर में भारतीय संस्कृति ही इस व्यवस्था की जनक मानी जाती है। जबकि अन्य धर्म या संस्कृति इस व्यवस्था को सिरे से नकारती रही है। भारत में जो मुसलमान धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर खुद को भारतीय समझते हैं वही मुसलमान कश्मीर में हिन्दुओं के प्रति ना सिर्फ भेदभाव उनको विस्थापित करते समय मौन धारन कर लेते हैं । जो लोग देश की एकता व अखंडता के प्रति अपना दोहरा मापदंड रखते हैं वैसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते नजर आते हैं। जो लोग भारतीय संस्कृति को मटियामेट करने में आमदा हैं वैसे ही लोग धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति का एक हथकंडा मानते हैं। इसके विपरीत जो लोग देश की एकता व अखंडता की रक्षा करना चाहते हैं वैसे लोग हमें सिर्फ इसलिए सांप्रदायिक नजर आतें हैं चुकि उसमें भारतीयता की खुशबू महकती है। जबकि धर्मनिरपेक्षता को जो लोग वोट बैंक का जरिया बना चुके हैं उनमें भारतीयता के प्रति संवेदना उस समय समाप्त नजर आती है जब उनको लगने लगता है कि उनके बयान से एक विशेष संप्रदायवर्ग नाराज हो सकता है। इसलिए वे गाहे-बगाहे हमेशा इस बात को ध्यान में रखते हैं कि उनके वोट बैंक को कोई क्षति न हो सके।

जब हम धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा पर विचार करते हैं तो हमें देश के विभाजन के पूर्व और बाद की स्थिति पर भी विचार करना होगा। जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ तो यह तय किया गया कि भारत में बचे हुए मुसलमान चुंकि वे अब देश में अल्पसंख्यक हो चुके हैं उनके जान-माल की सुरक्षा हमें देना हमारा फर्ज बनता है । जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कोई भी ऐसा प्रस्ताव ग्रहित नहीं किया गया। अर्थात इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति जहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास करती नजर आती है वहीं पकिस्तानी संस्कृति में अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिसके आंकड़े परिणाम सहित भी हमारे सामने है।

खैर! इस बहस को हम उस दिशा में नहीं ले जाना चाहते। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति की देन है। और जबतक भारतीय संस्कृति इस देश में कायम रहेगी तभी तक धर्मनिरपेक्षता इस देश में जीवित रह सकेगी, यही अंतिम सत्य है। जो लोग वोट बैंक की राजनीति करते हैं वे वोट बैंक की राजनीति करें पर साथ ही वे इस बात का भी ध्यान रखें कि भारतीय संस्कृति को चोट पंहुचाने वाले तत्वों से सत्ता को कैसे दूर रखा जाए। जो लोग भारतीय संस्कृति को भी नुकसान पंहुचाकर अपनी राजनीति स्वार्थ की पूर्ति में लगे हैं वे लोग कहीं भूल से ही सही भारत की संप्रभूता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे? यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनको सावधान होने की जरूरत है। भारतीय संस्कृति जबतक जीवित रहेगी तभीतक इस देश में सभी धर्म के लोग भाईचारे के साथ रह सकेगें। अर्थात धर्मनिरपेक्षता के मूल तत्व में भारतीय संस्कृति छिपी हुई है जो हिन्दूधर्म के विशाल हृदय का सूचक माना सकता है ना कि संकीर्ण मानसिकता का ।जो लोग धर्मनिरपेक्षता को वोटबैंक की राजनीति से जोड़कर देखने का प्रयास कर रहें हैं वे अंततः उस सांप्रदाय को भले ही अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए पक्ष में कर ले, इसके दूरगामी राजनीति परिणाम देश की संप्रभूता को क्षति करने की दिशा में एक कदम ही माना जाएगा।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं। Date: 08/08/2013

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

अर्मत्य सेन की धर्मनिरपेक्षता - शम्भु चौधरी

इस देश में ‘‘भारत माता की जय’’ बोलना सांप्रदायिकता कहलाती है, अल्पसंख्यकों को नाराज करना जैसा है। संसद के भीतर जो सांसद ‘‘बंदे मातरम्’’ बोलने में हिचकिचाते हैं। भारत के गुणगान में जो गीत तक गुनागुनाने में जिनका धर्म खुद को अपमानित समझता हो। वे लोग कैसे देश के प्रति वफ़ादार हो सकते? इन सबके उपरान्त हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को स्वीकारता है। हम इसका सम्मान भी करते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि हम खुद को उनके हवाले कर दें? हम कुछ भी कहें तो सांप्रदायिक और वे दंगा करें, आतंकियों को पनाह दें तो धर्मनिरपेक्ष? यह धर्मनिरपेक्षता का पैमाना नहीं हो सकता। यदि समय से हम नहीं चेते तो, आने वाली पौध हमें कभी नहीं माफ करेगी।
जिस प्रकार एक मांसाहारी इंसान (चंद अपवादों को छोड़ दें तो) निरामिस नहीं बन सकता चुकीं उसको खुन खाने की लत जो लग जाती है। उसी प्रकार एक भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक अपने को कभी भी सुरक्षित नहीं मानते, भले ही उनके चलते आप खुद को क्यों न असुरक्षित महसूस करने लग जाएं। आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर जिस प्रकार देश में एक व्यक्ति को लेकर आशंकओं का वातावरण पैदा किया जा रहा है इसमें देश के कुछ धर्मनिरपेक्षता की खाल में छिपे सांप्रदायिक चेहरे बेनकाब होते जा रहे हैं। जो यह सोचते हैं की देश में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा सिर्फ वे ही लोग कर सकते हैं। लेकिन जब पाकीस्थान या बंगलादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के साथ जो सांप्रदायिक व्यवहार होता है तब इनकी धर्मनिरपेक्षता, इनकी यही सोच, इनका यही बयान, हिन्दू मां बहनों के साथ हो रहे अत्याचार के दर्द को यह वर्ग नहीं समझ पाता। पिछले दिनों नोबल पुरस्कार प्राप्त भारत के महान अर्थशास्त्री श्री अर्मत्य सेन जी जिसके सिद्धान्तों से विश्व के किसी भी देश के एक भी ग्रामीण या ग्राम का भला नहीं हो सका ने एक प्रश्न के जबाब में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘असुरक्षित महसूस करने के लिए मुझे अल्पसंख्यक समूदाय का सदस्य होना होगा।’’ धर्मनिरपेक्षता की नई व्याख्या करने वाले श्री सेन को एक सलाह है कि कुछ दिन पड़ोस के देश में रह लेते वहां पर जो अनुभव उनको होगा उसके लिए उनको धर्म बदलने की कोई जरूरत नहीं होगी। आप स्वतः ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे संभव हो तो अपने परिवार को भी साथ रख लिजिऐगा। भारत के 40 प्रतिशत गांवों की स्थिति पाकीस्तान जैसी बनती जा रही हैं हिन्दूओं के नाबालिक बच्चियों को यही अल्पसंख्यक समूदाय उठा-उठाकर ले जा रहा, 15-20 दिनों तक उसको किसी घर में बन्द रखता है फिर उसका धर्म परिवर्तन कर किसी मुसलमान से जबरन निकाह करा देता है। आतंक का यह वातावरण पूरे भारत में सनै-सनै तेजी से फैलता जा रहा है भारत का कानून मूकदर्शक बना देख रहा है। श्री अर्मत्य सेन को अल्पसंख्यक बनकर उनके दर्द का अहसास करने की जगह भारत के उन इलाकों के दर्दनाक दृश्य को भी देखने का प्रयास करना चाहिए जहां भारत के अंदर ही हिन्दुओं के सैकड़ों परिवार खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। मुसलमानें के काल के ग्रास बनते जा रहे हैं। श्री अर्मत्य सेन का खुद का मत किसको भारत का प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहतें हैं या किसको नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है। परन्तु इस बात का देश की पौंगी धर्मनिरपेक्षता से कोई तालमेल नहीं बैठाया जा सकता। जिसप्रकार भारत में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा गढ़ी जा रही है उसमें भारत के उन बुद्धिजीवि वर्ग का प्रयोग किया जा रहा है जिसका विश्वव्यापि माहौल बनता या बिगड़ता ऐसे खतरनाक खेल को ना खेला जाए अन्यथा इसके परिणाम गुजरात से भी भयानक हो सकते हैं। इस देश में ‘‘भारत माता की जय’’ बोलना सांप्रदायिकता कहलाती है, अल्पसंख्यकों को नाराज करना जैसा है। संसद के भीतर जो सांसद ‘‘बंदे मातरम्’’ बोलने में हिचकिचाते हैं। भारत के गुणगान में जो गीत तक गुनागुनाने में जिनका धर्म खुद को अपमानित समझता हो। वे लोग कैसे देश के प्रति वफ़ादार हो सकते? इन सबके उपरान्त हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को स्वीकारता है। हम इसका सम्मान भी करते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि हम खुद को उनके हवाले कर दें? हम कुछ भी कहें तो सांप्रदायिक और वे दंगा करें, आतंकियों को पनाह दें तो धर्मनिरपेक्ष? यह धर्मनिरपेक्षता का पैमाना नहीं हो सकता। यदि समय से हम नहीं चेते तो, आने वाली पौध हमें कभी नहीं माफ करेगी। Date: 23.07.2013/ amartya sen

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

धर्मनिरपेक्षता का बुर्का

श्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान पर कि जब कभी भी कांग्रेस पार्टी को राजनैतिक संकट का सामना करना पड़ता है तो वह धर्मनिरपेक्षता का बुर्का पहन लेती है। इनके कहने का तात्पर्य स्पष्ट था कि भ्रष्टाचार में पूरी तरह डूबी कांग्रेस पार्टी न तो मंहगाई पर काबू पा रही है, ना ही देश में विकास का कोई नया मॉडल प्रस्तुत करने में सफल रही है। इनको तो बस हर किसी के बयान में सांप्रदायिकता ही नजर आती है और खुद धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनकर सारे महत्वपूर्ण मुद्द को गायब कर सत्ता पर किसी तरह बने रहना चाहती है। इस बयान का पलटवार करते हुए कांग्रेस पार्टी के इन दो चेहरों ने स्वीकार किया कि उनको धर्मनिरपेक्षता का बुर्का (चोला) अच्छा लगता है।

रविवार, 14 जुलाई 2013

कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई-शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं?
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक समाचार एजेन्सी को दिए गये बयान ‘‘कुत्ते के बच्चे वाली टिप्पणी’’ पर देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने जो हंगामा खड़ा किया इससे ऐसा प्रतित होता है कि ये राजनैतिक दल अपने स्वार्थ व वोट बैंक के लिए देश में सांप्रदायिक सदभावनाओं के साथ हमेशा सौदाबाजी करती रही है या करने का कोई अवसर नहीं चुकना चाहती। जिस बयान से श्री नरेन्द्र मोदी गोधरा के प्रतिफल में हुए गुजरात दंगों के दर्द के मानवीय पक्ष को अहसास कराने के प्रयास कर रहे थे, उसी बयान को इन धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कुछ इस प्रकार प्रचारित कर देश के मुसलमानों को बहकाने का प्रयास शुरू कर दिया । इनकी सोच अभी भी उसी जमाने में चल रही है कि वे एक झूठ को सौ बार कहेगें तो सभी को वही सच नजर आयेगा। जबकी वे यह नहीं जानते कि अब मुसलमान समाज भी आधुनिक हो चुका है। वे भी इन्टरनेट के माध्यम से उनके बयान या टिप्पणी को पढ़ सकते हैं और उसका अर्थ निकाल सकते हैं। जिसका अर्थ तथाकथित सांप्रदायिक धर्मनिरपेक्ष दलों ने निकाल कर देश की जनता को समझाना कर प्रयास किया। जिसप्रकार इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों को बहकाने का प्रयास कर देश की सांप्रदायिक सदभावनाओं में जह़र घोलने का प्रयास किया है, इस बात को जगजाहिर करती है कि इनका उद्देश्य सीधे तौर पर मुसलमानों को बरगलाना है। कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं? दरअसल मुसलमानों का वोट बैंक नोचने-खसोटने में लगी तथाकथित राजनैतिक दल खुद ही कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं। हर दल यह साबित करने में लगा है कि वे ही मुसलमानों का भला कर सकते हैं। मुसलमानों के वोट बैंक को एकतरफा पाने के जिस सेक्लुरिजम की बात ये लोग करते हैं। उससे आजतक मुसलमानों का भला नहीं कर सके। खुद को धर्मनिरपेक्ष और दूसरे को सांप्रदयिक मानने वाले दलों की इस देश में बाढ़ आ गई है। अब तो हालात कुछ इस प्रकार हो चुके हैं कि एक दल दूसरे दल से आगे बढ़कर मुसलमानों का हमदर्द बनने इस कदर प्रयास करता है कि वह यह भी भूल जाता है कि उसे कब और कहाँ क्या कहना चाहिए, कहना चाहिए कि नहीं? यह भी भूल जाते हैं। मानों देश के अन्दर मुसलमानों के वोटों को पाने के लिए सेक्लुरिजम दलों की आपस में ही कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई चल रही हो। - शम्भु चौधरी

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता बनाम भगवा आतंकवाद -शम्भु चौधरी

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इतनी विवेकशील हो चुकी है कि देश की देशभक्ति इनको सांप्रदायिक लगने लगी है। देशभक्ति की बात करने वाले, इस देश के हर नागरिक इनकी नजर में देश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने वाला माना जाने लगे हैं उनकी परिभाषा में सिर्फ वे लोग देशभक्त हैं जो देश को अंदर से खोखला करने में उनकी मदद कर रहें हैं। जो लोग देश की एकता और अखंडता की बात करते हैं उसको भगवा आंतकवाद का नाम दिया जा रहा है, इससे स्पष्ट परिलक्षित हो जाता कि देश में धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद उनके सर चढ़कर बोल रहा है। यह सब बातें हमारी पौंगी धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती है। जो इनके बचाव में गाहे-बगाहे कुछ दलील देश के सामने रखते हैं जो निम्न प्रकार है -

इस परिपेक्ष में जो दलीलें दी जाती है-

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना। 2. देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोकना। 3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना।

हमें देखना होगा कि इन दलीलों के पीछे किन स्वार्थी तत्वों का दिमाग कार्य कर रहा है? दरअसल देश में जिन-जिन स्थानों में दंगों के खतरे ज्यादा महसूस किये जाते रहे हैं वैसे अधिकतर स्थान मुस्लीम बाहुलता वाले होते हैं। दंगों की शुरुआत ऐसे ही तत्वों द्वारा होती है जो देश में खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानती रही है। इसका स्पष्ट संकेत है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानने वाले तत्व देश की धर्मनिरपेक्षता को न सिर्फ खतरा साबित हो चुके हैं वे राजनीति स्वार्थपुर्ति के लिए बार-बार इस तरह का वातावरण भी सृजन करते रहें हैं।

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना -   आजादी के पश्चात अबतक हम जिन्हें अल्पसंख्यक मानते रहें हैं वे अपने-अपने क्षेत्र में अब न सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके हैं उन क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं के उनके साथ विवाह के भी कई मामले सामने आने लगे हैं। सही अर्थों मे कहा जाए तो अब इस कौम के अंदर भय नाम की कोई बात नहीं रह गई कारण कि इनको दोहरे कानून का समर्थन प्राप्त हो रहा है। पहला इस्लामिक कानून जो हिन्दुओं की लड़कियों को मुस्लीम बनाने की इज्जाजत देता है। दूसरा भारतीय संविधान जो वयस्कों धर्म-जाति के बंधन से परे रहकर शादी करने की इज्जाजत। जबकि इसके विपरित कोई अन्य प्रकार की घटना घटते ही सांप्रदायिकता व कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती हैं। आनन-फानन में ऐसे संबन्धों का जो भी हर्ष निकले पर यह बात तय है कि उस समय भारत का संविधान गौन हो जाता है। चुकीं मामला एक विशेष धर्म से जुड़ा होता है। जहां से सांप्रदायिक दंगे फैलने की प्रवल संभावनाएं बनी रहती है। यह इस बात की ओर संकेत देता है कि भयभीत होने वाली कोई बात इस कौम पर लागू नहीं होती।

2. सांप्रदायिक दंगों की आग -   प्रायः राजनैतिक दलों द्वारा इस बात की चेतावनी दी जाती है कि कोई भी बात जो उनको पसंद न हो न करें, अन्यथा दंगा होने की संभावना जताई जाती रही है। हर बात में इस खौफ को पैदा किया जाता रहा है। कोई भी व्यक्ति ऐसी बात न करें या ऐसा कार्यक्रम न करें जिससे सांप्रदायिक सदभावना का खतरा पैदा हो जाए। यह बात किसे कहा जाता है? क्या यही बात हमारे राजनैतिक दलों ने कभी मुसलमानों को भी कहा है? जो लोग सांप्रदायिकता की बात करतें हैं वे लोग ही खुद सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं चुंकि उनका उद्देश्य न सिर्फ राजनीति करना रहा है इसके माध्यम से वे कई बार सत्ता भी प्राप्त करने में सफल रहें हैं।

3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना-   जो लोग बार-बार देश के टूकरे करने की बात कर देश की जनता को भयभीत करते रहते हैं उनके लिए एक बात याद आती है कि जो रोज-रोज शेर आया शेर आया करते रहते हैं ऐसे ही लोगों को एक दिन सच में शेर आकर खा जाता है। ऐसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों को मोहरा बनाकर अपनी सत्ता का दावा मजबूत करने में लगें हैं वे ही वास्तव में देश को पुनः विभाजन की कगार पर ले जाने का कार्य कर रहें हैं। जब एकबार धर्म के नाम पर देश के तीन बंटवारे हो चुके, तो प्रमाणित आंकड़े कहते हैं कि अब जो लोग देश को पुनः बांटने की धमकी देकर देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर एक विशेष संप्रदाय के वोट बैंक को अपने पक्ष में एकत्रित करने का काम कर रहें है। वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने में लगे हैं। ऐसी ताकतें जो खुद की राजनीति में लगा हो वह किसी भी सांप्रदाय का कभी भी भला नहीं सोच सकती।

आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इन तत्वों की ताकतों में इजाफा होगा। देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता चला जाएगा और इसके लिए एक मात्र वे ही लोग जिम्मेदार माने जाएंगें या धर्मनिरपेक्ष ताकतों का वह चेहरा ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा जो देश में धर्मनिरपेक्ष की आड़ में वोट की राजनीति करते रहें है।।

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतें -शम्भु चौधरी

आज देश की प्रायः सभी राजनैतिक दलों पर सत्ता प्राप्त करने का भूत सवार है, इसके लिए वे न सिर्फ वे चोर, लुटेरे, देश के गद्दारों ओर-तो-ओर आतंकवादियों से भी हाथ मिलाने में नहीं हिचकते। जिसे ये लोग धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वह वास्तव में एक विशेष धर्म को प्रलोभन देकर इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का हथकंडा मात्र है। चोर-लुटरे तो फिर भी देश के प्रति वफादार होते हैं, पर देश के गद्दारों और आतंकवादियों के ऊपर इनका भरोसा किस राजनीति का हिस्सा है? यह किसी भारतीय को नहीं समझ में आता।

आजादी के पश्चात एक सोची समझी साजिश के तहत छदम धर्मनिरपेक्षता का शिकार भारत बनता जा रहा। देश के अधिकांश राजनेता जो धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैं वे वास्तव में वे धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में एक विशेष धर्म समुदाय की कट्टरपंथी विचारधाराओं के समर्थक हैं। जो राजनैतिक दल जितना कट्टरपंथी समर्थक है, वह दल खुद को उतना ही धर्मनिरपेक्ष मानती है, जबकि इसके विपरीत दूसरे वर्ग को सांप्रदायिक कहा जाता है जो देश की एकता व अखंडता हेतु कट्टरपंथियों से सतर्क होने के लिए हमेशा आवाज उठाता रहता है।। परन्तु धार्मिक कट्टरपंथिया का सहारा लेकर विशेष वर्ग के वोटों को प्राप्त करना एक प्रकार से धर्मनिपेक्षता की परिभाषा में आंकी जाने लगी है। चुनाव के समय खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले दल कट्टरपंथी भारत विरोधी ताकतों से हाथ मिलाते इनको खुले आम देख जा सकता है। ऐसा सिर्फ एक सियासी पार्टी नहीं बल्की इस दौड़ में देश की सभी छोटी-बड़ी पार्टियाँ कार्य कर रही है। जो इस बात की तरफ संकेत दे रही है कि देश की धर्मनिरपेक्षता एक विशेष संप्रदाय की कठपुतली बनकर रह गई। कुछ कट्टरपंथी व असामाजिक ताकतें देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी लगी है जो न सिर्फ इस्लाम धर्म को बदनाम कर रही है। इस धर्म के अनुयाइयों के प्रति दुनिया में शक पैदा करने में भी सफल रही है। दुनियाभर में आज इस कौम को शक की निगाह से देखा जा रहा है इसमें भारतीय मुसलमानों का भी बहुत बड़ा योगदान है, गोधरा की घटना के प्रतिवाद में गुजरात में जो भी जन आक्रोश उभरा वह दुर्भाग्यजनक था। परन्तु इसके लिए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक बंधु जो खुद को धर्मनिरपेक्ष मानते वैसे लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं न कि नरेन्द्र मोदी। जो लोग देश को टूकरों में बंटना चाहते हों उनको हम न सिर्फ धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पनाह दे रहे हैं। ऐसे लोगों को कानून के माध्यम से सुरक्षा भी देने का प्रयास किया जाता है। आज देश की प्रायः सभी राजनैतिक दलों पर सत्ता प्राप्त करने का भूत सवार है, इसके लिए वे न सिर्फ वे चोर, लुटेरे, देश के गद्दारों ओर-तो-ओर आतंकवादियों से भी हाथ मिलाने में नहीं हिचकते। जिसे ये लोग धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वह वास्तव में एक विशेष धर्म को प्रलोभन देकर इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का हथकंडा मात्र है। चोर-लुटरे तो फिर भी देश के प्रति वफादार होते हैं, पर देश के गद्दारों और आतंकवादियों के ऊपर इनका भरोसा किस राजनीति का हिस्सा है? यह किसी भारतीय को नहीं समझ में आता। कहने का अभिपार्य है कि सत्ता के लिए ये लोग इतना नीचे गिर चुकें हैं कि जहां से भारत में सही मायने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को लौटना असंभव तो नहीं जान पड़ता पर राह बहुत कठिन बन चुका है।। कोई दाऊद के आईक्यू का सहारा लेता है तो कोई जिन्ना का। कोई इमामों का सहारा लेता है तो कोई भगवा आतंकवाद का। पता नहीं किस माँ की कोख ने भारत माँ के इन लाडलों को पैदा किया कि इनको सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सार्वभौमिकता से भी समझौता करना पड़े तो इन लोगों को जरा भी संकोच नहीं। मजे की बात है जो देश के गद्दार हैं उनका समर्थन प्राप्त करने को हम धर्मनिरपेक्ष मानते हैं।


शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

धर्मनिरपेक्ष ताकतों का अर्थ क्या हो?

- शम्भु चौधरी

धर्म के आधार पर देश के विभाजन पश्चात व आजादी के बाद तेजी से एक शब्द ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ भारत की राजनीति में अपनी केन्द्रीय भूमिका निभाने लगी। इसके गहराई में जाकर देखा जाए तो हमें ज्ञात होता है कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ का अर्थ है एक विशेष धर्म के कट्टरवादी ताकतों को मजबूती प्रदान करना मात्र धर्मनिरपेक्षता का मुख्य लक्ष्य है देश की तमाम राजनैतिक चेहरे धर्मनिरपेक्षता को वोट बैंक की कुंजी मानते हैं और उन कट्टरवादी ताकतों द्वारा संकलित वोटों से खुद की राजनीति को मजबूत बनाये रखना, जो ऐसा करने में सफल रहे हैं वैसे लोग अपने आपको ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ मानते हैं। जबकि दूसरी तरफ हिन्दूवादी कट्टरवादी ताकतों को देश में सांप्रदायिक ताकत माना जाता है। व इसको केन्द्र कर आज देश की राजनीति दो हिस्सों मे स्पष्ट दिखाई देती है। आज सत्ता के बचाये रखने के लिए देश की एक बड़ी राजनीति दल ने इस हथियार का जम कर इस्तेमाल किया है। जब उस दल पर परिवारवाद का आरोप लगा और सत्ता से बहार आ गई तो उसने सांप्रदायिक शब्द का भरपूर प्रचार कर देश के बामदल सहित समाजवादियों तक को अपने पक्ष में ला खड़ा करने में सफलता पा ली। यह बात अलग है कि बामदल की सिद्धांतहीन दलदली राजनीति ने उसको जहाँ देश की राजनीति में हाशिये पर ला खड़ा किया है पर अभी भी इसके सर पर सांप्रदायिकता का भूत सवार है। जब भी संसद में कोई बहस होती है तो वो अपने को इस कदर बचाना चाहती है कि जैसे वो किसी महखाने से मुंह छिपाकर जाना चाहता हो। मानो सबका लक्ष्य एक है कि देश की मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों के एक वर्ग को कौन कितना लुभा सकता है इस बात कि हर तरफ हौड़ लगी है। असम की घटना के पश्चात पिछले दिनों देश में जो कुछ भी हमें देखने को मिला इसके साथ ही सरकारी व अन्य राजनीति दलों की टिप्पणियों पर नजर दौड़ाई जाए तो हमें यह बात ही नहीं समझ पा रहे हैं कि देश में बंगलादेशी मुसलमान इतने ताकतवर हो गए कि उनके कुप्रचार से देश की ही असमिया समाज को अपनी ही जमीं, अपने ही वतन में खुद को असुरक्षित महसूस करना पड़ा और बड़ी संख्या में देश के विभिन्न हिस्सों से उनके पलायन से हमें यह तो सोचना ही होगा कि देश में मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों ने भारतीय धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक स्वरूप को तार-तार कर दिया है। कुछ इस्लामिक संगठनों न सिर्फ मुम्बई में पाकिस्तान के झंडा ही नहीं फहराया, साथ ही उनके आकाओं ने यह भी ऐलान कर दिया कि अब जल्द ही समूचे भारत में इस्लाम का झंडा फहरा दिया जाएगा। इन मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों के सामने हमारी धर्मनिरपेक्षता पलक झपते ही ताश के पत्ते की तरह बिखर कर उनका तमाशा देखता रहा। सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही न होकर हिन्दूवादी नेताओं पर अंकुश लगाया जाना इस बात को बल प्रदान करता है कि देश किस कदर एक धर्म विशेष के वोट बैंक की तरफ सिमटता जा रहा है। असम की घटना व असमियों और मणिपुरीयों को जिस प्रकार से भयभीत करने में देश की मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों ने अपनी भूमिका निभाई, इससे इस बात में कतई संदेह नहीं रह गया कि अब धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने वाली ताकतों को यह बताना जरूरी हो गया है कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ वास्तव में वह नहीं कि वह सत्ता से चिपकने के लिए किसी दूसरे दल को सत्ता से अलग रखा जाए। ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ का अर्थ है कि देश में सभी धर्म में समभाव बना रहे, ना कि वह सत्ता को प्राप्त करने व सत्ता से किसी दल विशेष को दूर रखने के प्रयोग में लाया जाना चाहिए। हिन्दुत्वाद से देश मजबूत ही होगा जबकि मुस्लिम कट्टरवादी ताकातों को जितना बल दिया जाएगा देश की सार्वभैमिकता को उतना ही खतरा पैदा होता जा रहा है। मुस्लिम समुदायों के वोटों को लेकर सत्ता का सौदा न किया जाए। यदि इस सौदेबाजी पर तत्काल प्रभाव से रोक न लगाई तो हर प्रान्त भारत महासंध से अपनी सुरक्षा के लिए अलग होने के लिए मजबूर भी हो सकता है।