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शुक्रवार, 8 मई 2020

‘‘वंदे भारत मिशन’’ शंभु चौधरी

8th May 2020, कोलकाता (भारत):h
उड़ीसा हाई कोर्ट 
उड़ीसा हाई कोर्ट ने वीडियो कोन्फ्रेंस के माध्यम से नारायण चंद्र जेना द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए देश के अन्य प्रांतों से प्रवासी मजदूरों को राज्य में बिना कोविड-19 की जांच के उड़ीसा में प्रवेश पर रोक लगा दी । इस फैसले के बाद गुजरात व अन्य प्रांतों से उड़ीसा आने वाली सभी श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं। जस्टिस एस पांडा और के.आर महापात्रा की खंडपीठ के इस आदेश से जहाँ लाखों प्रवासी मजदूरों को जिन्होंने अपने वापस आने की उम्मीद जगा ली थी, फिर सदमे में आ गए ।
"Supreme Court has stayed the order of the Orissa High Court, which had asked the state government to ensure that all migrants, who are in the queue to enter Odisha, should be tested negative for Covid-19 before boarding the conveyance." On 8th May 2020 time 6.00 pm. Supreme Court has stayed
एक तरफ लाखों विदेशी प्रवासी भारतीयों को ‘वंदे भारत मिशन’ के तहत हवाई जहाजों व जल मार्ग से भारत लाया जा रहा है तो दूसरी तरफ भारत के भीतर देश की उच्च अदालतें ऐसे फैसले सुना रही है जिसे सभ्य समाज कभी भी नहीं स्वीकार सकता । 

माननीय उड़ीसा हाई कोर्ट को भारत के संविधान के पार्ट -3 आर्टिकल - 14 को ठीक से पढ़ लेना चाहिये 

‘ राज्य (यहाँ राज्य से अभिप्राय केन्द्र, राज्य की सरकारें, सरकारी सभी विभाग) भारत के किसी भी व्यक्ति को समान संरक्षण देने से इनकार नहीं कर सकती । चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, वर्ग का हो । ’’ 

इसकी परिभाषा के अर्थ पर नहीं इसके मूल भावना पर आज विचार करने की हमें जरूरत है। कि देश-विदेश से एक तरफ लाखों श्रमिकों, छात्रों, पर्यटकों को अपने-अपने देश व देस (Village) बुलाने व पंहुचाने के लिए "वंदे भारत मिशन" का अभियान चलाया जा रहा वहीं उड़ीसा हाई कोर्ट के इस फैसले से स्वार्थ की बू आने लगी । 

खुद को बचाते हुए दूसरों के लिए मददगार बनने की जगह मैदान छोड़ कर भागने से किसी भी प्रान्त को इस महामारी से नहीं बचाया जा सकता है। अदालत सामूहिक रूप से किसी को भी बिना उसके अपराध के सिर्फ एक जनहित याचिका से लाखों निर्दोषों को सूली पर नहीं चढ़ा सकती । उन मजदूरों की रक्षा की बात जनहित में समझ में आती है पर उनके हितों के ऊपर रात के अंधेरों में रेलगाड़ी चलाकर उनका कत्ल नहीं किया जा सकता।

यदि मैं यहाँ गलत नहीं हूँ तो अदालतों को भी इस जनहित की मर्यादाओं का पालन करना अनिवार्य है। एक राज्य में किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए उसके प्रवेश को बाधित कर दिया जाना जिसमें कि उसने कोई अपराध न किया हो वहीं दूसरे राज्य में इस प्रक्रिया का जारी रहना अपने आप में अदालत के निर्णय पर प्रश्न खड़ा कर देता है। 
देश में राज्यों से राज्य के रास्ते रोक दिये गये । शहर से शहर व गांव से गांव के दरवाजे बंद कर दिये गए । अब अस्पतालों के दरवाजों पर भी न्याय का ताला जड़ देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। माननीय उड़ीसा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मैं अपील करता हूँ कि वे ऐसे निर्णय का तत्काल कोई विकल्प निकाले । सरकार उन मजदूरों को अन्य राज्य की तरह वापस बुला कर उन मजदूरों, श्रमिकों व छात्रों को उनके प्रखंड में 21 दिनों तक क्वरांटाईन में रखा जा सकता है ना कि उसे आने से ही रोक देना । मेरी दृष्टि से यह अपराध से भी बड़ा अपराध है । जयहिन्द ।

सोमवार, 4 मई 2020

व्यंग्य: बहारों फूल बरसाओ !

....शंभु चौधरी, कोलकाता ।


इस युद्ध में  रामप्रसाद जी का पूरा परिवार लहू’लुहान हो चुका था भक्तों के शब्द बाणों से निकली माँ-बहन-बेटी किसी को बाकी नहीं छोड़ा गया । युद्ध महाभारत बन चुका था । देशद्रोही का आधार कार्ड बांटा जा रहा था । देर रात रामप्रसाद जी भले थक कर सो गए पर भक्तों का हमला जारी था ।

4 मई 2020, कोलकाता (भारत):
रामप्रसाद जी ने 30 साल पत्रकारिता क्या कर ली खुद को प्रधानसेवक से ही ऊपर समझने लगे । बात-बात में सवाल-जबाब करने लगते । अब कल की ही बात लो, प्रधानसेवक ने देश के सभी सेना विंगों को बुलाकर गुप्त रूप से कहा कि लॉकडाउन के दूसरे चरण की सफलता पूर्वक समाप्ति के अवसर को एक उत्सव के रूप में मनाये और भारतीय सेना के तीनों सेनाध्यक्षों ने इसकी तैयारी शुरू कर दी । अचानक से सेना के तीनों सेनाध्यक्ष मीडिया के सामने आकर जो कहा उससे रामप्रसाद जी के तो तोते ही उड़ गये। 

जो क्षेत्र आवाज प्रतिबंधित है वहाँ सेना के जवानों ने जाकर उसकी बैन्ड बजा दी, हेलीकेप्टरों से फूलों की बरसात करने की घोषणा की । भला इसमें क्या गलत है ? यह तो गर्व की बात है । सेना के जवानों के द्वारा फूलों की बरसात, बैन्ड-बाजों से स्वागत, पर रामप्रसाद जी लगे प्रधानसेवक से सवाल-जबाब करने । आदत से मजबूर हर अच्छे काम को उल्टे चश्मे से देखना ।

आजकल पत्रकारों के पास बिना कांच का चश्मा प्रधानसेवक ने भिजवा दिया जिसके अंदर से नोटों की बरसात होती है । पर इनको कौन समझाए । सारे पत्रकारों के अच्छे दिन आ गए । अब जिसके भाग्य में रामप्रसाद जी जैसे मुर्ख पत्रकारों की लकीर लिखी हो उसे फकीर बनने से कौन रोक सकता है। एक बार सच क्या लिख दिये, नौकरी गई ।

‘‘आगे से सच मत लिखा करो’’ 
जिला मजिस्ट्रेट ने बेल देते हुए कहा कि - ‘‘ जब सच्ची बात लिखने से किसी का अपमान होता तो क्यों लिखते हो? पांच सौ रुपये का जुर्माना ठोकते हुए चेतावनी दी ‘‘आगे से सच मत लिखा करो’’ ’’

‘‘तूमने झूठी खबरें क्यों छापी?’
दूसरी बार रामप्रसाद फिर मजिस्ट्रेट के सामने खड़े हुए तो मजिस्ट्रेट सा’ब ने पूछा - ‘‘तूमने झूठी खबरें क्यों छापी?’’ फिर पांच सौ रुपये का जुर्माना ठोकते हुए चेतावनी दी ‘‘आगे से झूठी खबरें   मत छापा करो’’ ’’
मजिस्ट्रेट के सामने तब भी लाचार थे अब भी लाचार ।

अब रामप्रसादजी घर में बैठकर थाली पीटते हैं। कल तक घर में जो इज्जत पत्नी-बच्चे किया करते उस बैलेंस शीट में कारोबारी डेप्रिएसिएशन हिन्दी में (औद्योगिक मूल्यह्रास) होने लगा था । इस प्रथा में मजदूरों के शारीरिक क्षय होने से उसकी आमदनी कम हो जाती है जबकि उद्योगों में लाभ माना जाता है। यानी कि जिस उद्योग में जितना बड़ा डेप्रिएसिएशन मिलता है कम्पनी को उतना बड़ा लाभ होता है। मूल्यह्रास की इस प्रथा को अंग्रेजी में आर्थिक विकास बोलते हैं । 
रामप्रसाद जी की आदत है बातों को भटका के कहने की ।
पाठकों के इनकी बात उनके सर के ऊपर से निकल जाती थी । 
तभी तो इनका मूल्यह्रास भी जल्दी हो गया और इनका आर्थिक विकास भी नहीं हो सका । कलम घिसते-घिसते साठिया गए, पर अब तक साठ का पहाड़ा याद नहीं कर सके । 

जमा पूंजी के नाम पर बैंक बैलेन्स जीरो बटा जीरो । खैर अपने स्वभाव से जिद्दी रामप्रसाद जी आजकल सोशल मीडिया के ही सहारे जी रहें हैं। लगे प्रधानसेवक को ट्विट करने ।

रामप्रसाद जी ने पहला ट्विट किया ‘‘सड़कों पर हजारों मजदूर फंसे पड़े हैं सर! जी उनको इन हेलिकप्टरों से उठाकर उनके गांव छुड़वा देते ।’’

बस क्या था प्रधानसेवक के भक्त उन पर गिद्ध की तरह टूट पड़े ।
‘‘किसी ने लिखा तेरे बाप का क्या जाता है ? देखते नही ये फूल सड़कों पर नहीं, कोरोना से लड़ रहे उन योद्धाओं पर बरसाया जा रहा है जो हम लोगों की जान बचाने में पिछले 40 दिनों से लगे हैं।’’

अब तर्क तो बहुत तगड़ा था। रामप्रसाद जी चिंता में डूब गए । पर रामप्रसाद जी कहां थमने वाले थे।
उन्होंने भी नहले पर दहला मारा । आखिर, उनको भी तीस साल की पत्रकारिता का तजुर्बा जो था ।

भक्त के ट्विट पर रामप्रसाद जी ने जबाब दिया - "सड़कों पर हजारों मजदूरों ने कौन सा अपराध कर दिया कि इनको पैदल ही गांव जाना पड़ रहा है। दरअसल देखा जाए तो असली योद्धा तो ये लोग है जो सरकार से बिना किसी फ़रियाद के चुपचाप सैकड़ों मील पैदल ही गांव की तरफ अपने परिवार व बच्चों को लेकर निकल पड़े । कुछ तो रहम करो । इनके लिए भी सरकार कुछ सोचे ?"

भक्त कहां रूकने वाले थे ।
दूसरे भक्त ने पलट के एक तमाचा मारा । ‘‘ सर जी ! दिखने में आप समझदार लगते हो पर अक़ल घास के बराबर है। आपकी उम्र का लिहाज कर रहा हूँ। जिसे आप देश के योद्धा बोल रहे हो दरअसल ये लोग देश के गद्दार हैं जिन्होंने लॉकडाउन के नियमों का पालन नहीं किया । जब लोगों को निकलना बंद कर दिया गया, तो ये लोग गांव क्यों जा रहें ?

रामप्रसाद जी ने फिर लिखा - ‘‘ आप समझदार लगते हो लिखते हो तो मानो ट्विटर से फूलों की बरसात हो रही हो । इनका कसूर तो इतना ही है कि ये मजदूर हैं दो वक्त की रोटी कमाने शहर आये थे । अब, जब, सब, बंद हो चुका तो कहाँ रहें? मालिकों ने इनकी छुट्टी कर दी ‘‘ बोले अपने-अपने घर जाओ । काम नहीं है ।’’

मालिकों ने  प्रधानसेवक की भी बात भी नहीं मानी  - ‘‘बोले जाकर उनसे पैसा ले लो।’’
अब शहर में जीना, वह भी काम के बिना कैसे संभव होगा?
साथ में सत्तू-चुड़वा है जो पांच-सात रोज चलेगा । इसके बाद ?
गांव पंहुच गये तो कम से कम खाने को दाना तो मिल जाएगा इनको । बड़े विनम्रभाव से उसकी बातों का जबाब दिए ।

पर भक्तों का गुस्सा तो सातवें आसमान में चढ़ चुका था ।
‘‘ सब व्यक्तिगत हो कर गाली पर उतर आया ’’ बोलने लगा अरे ‘‘$#$#’’ तेरा दिमाग ठिकाने लगा दूंगा अब एक शब्द भी लिखा तो ।

रामप्रसाद जी कहाँ थमने वाले थे । रामप्रसाद जी ने भी दो-दो हाथ करने की सोच ली, इनका भी खून पानी की तरह खौलने लगा । वैसे भी साठ साल की उम्र में शरीर का सारा खून पानी हो जाता है। आमदनी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। प्रेस मालिकों को लगता है कि अब यह पत्रकार भोथरा हो चुका है। मशीनों की तरह हमें भी बदल दिया जाता है। उम्र ढल जाने से लिखावट में भी धार कहाँ रहती ? 

खुद से सवाल करते हुए राम प्रसाद जी फिर भक्तों के मना करने के बाबजूद फिर जबाब देने बैठे गए - ‘‘भाई ! हमने हिंजड़ों को सड़क पर नाचते बहुत देखा था । पर देश को नाचते पहली बार देख रहा हूँ ।’’ 

वह भी तब जब देश में कोरोना महामारी का फन सांप की तरह लोगों को डसे जा रहा है। अस्पतालों में लोग मरे जा रहे हैं । अस्पतालों की हालात दर्दनीय बनी हुई है । सरकार द्वारा जरूरी सुविधा अब तक इन डाक्टरों तक नहीं पंहुच पाई है। रोजाना डाक्टर भी कोरोना के शिकार होते जा रहें हैं । किस बात का घमंड हो गया आपको?

‘‘कभी थाली बजाओ’’ लोग थाली बजाने लगे । मानो कोरोना थाली की आवाज से डर जाएगा । सरकार जिस दिन थाली पीटवा रही थी, उस दिन संक्रमित लोगों की संख्या एक हजार से कम थी । 

जिस दिन घर-घर दीये जलाये गये उस दिन देश में संक्रमित लोगों की संख्या चार हजार पार कर गई । बड़ी संख्या में लोगों की मरने की सूचना आने लगी।  पहले घर में अंधेरा करो फिर दीया जलाओ। तबतक अस्सी से सौ घरों के दीये बूझ चुके थे । 

अब जब 3 मई को भारतीय सेनाओं ने पुष्प वर्षा की तो मेरा मन और भी हर्षित होकर झूम उठा । आखिर सेना के जवानों पर गर्व जो ना करे वह देशद्रोही ही होगा । सेना दिन-रात हमारी रक्षा में लगी है उनके ऊपर सवाल उठाना किसी भी अपराध से कम नहीं होगा । सड़कों पर देश के हजारों भूखे-प्यासे मजदूरों ने भी सर उठा कर जरूर महसूस किया होगा कि देखो ‘‘मेरा भारत कितना महान है।’’ सेना की कलाबाजियों से एक बार तो ये लोग भी अपनी भूख-प्यास भी भूल गए होंगे । टीवी चैनलों के द्वारा सेना के गौरवपूर्ण कलाबाजियों को दिखाये सरकार थक नही रही थी मनोरंजन से भरपूर इस कलाबाजियों को भला कौन सलाम नहीं करेगा? हवा से लेकर समुद्र तक सेना के तीनों विंग कहीं बैण्डबाजों से कोरोना के योद्धाओं का उत्साहवर्धन कर रहे थे तो कहीं हेलिकेप्टरों के द्वारा फूलों की बरसात हो रही थी, वहीं समुद्र में नव सेनाओं ने आतिशबाजी कर कोरोना के योद्धाओं को सलामी ठोकी ।

अब भक्तों का पारा सातवें आसमान पर था । एक साथ कई भक्तों ने मोर्चा संभाल लिया ।
एक तरफ रामप्रसाद जी शहीद होने को तैयार थे, तो दूसरी तरफ प्रधानसेवक की सेना निहत्थे रामप्रसाद पर गोलियां बरसाने में लगी थी ।

इस युद्ध में रामप्रसाद जी का पूरा परिवार लहू’लुहान हो चुका था भक्तों के शब्द बाणों से निकली माँ-बहन-बेटी किसी को बाकी नहीं छोड़ा गया । युद्ध महाभारत बन चुका था । देशद्रोही का आधार कार्ड बांटा जा रहा था । देर रात रामप्रसाद जी भले थक कर सो गए पर भक्तों का हमला जारी था । चुकी उनको पता था कि घनघोर बादलों में सेना के लड़ाकू विमान दुश्मनों के राडार से बच निकलेगें ।

दूसरे दिन रामप्रसाद जी उठे तो देखा कि भारत में मरने वालों की संख्या तेरह सौ के पार कर चुकी थी। रामप्रसाद जी गुणगुणाने लगे ‘‘ बहारों फूल बरसाओ ’’ सुबह एक नया समाचार आया कि मजदूरों को वापस लाने वाली स्पेशल ट्रेन में नब्बे सीटें खाली थी,  मजदूरों को इसलिए  ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया गया क्योंकि उन मजदूरों के पास टिकट के पैसे नहीं थे । मजदूरों पर आंसू बहाने वाले प्रधानसेवक कल एक दिन में करोड़ों रुपये का तेल, फूल सिर्फ छोटे से अहंकार में फूंक डाले, लाखों मजदूर, गरीब मरे तो मरे पर हिन्दू धर्म खतरे में नहीं होना चाहिए।  शायद यह देश भी अब इन मजदूरों का नहीं रहा। क्योंकि हर तरफ इन्हें ही दोषी करार दिया जा रहा है। ये लोग सड़कों पर क्यों? जब देश लॉकडाउन का उत्सव मना रहा हो। जयहिन्द !


रविवार, 3 मई 2020

मंदिरों को काठ क्यों सूंघ गया ?

 तिरुपति बालाजी
जिस मंदिर ने जिंदगी भर इन मजदूरों को पेट पाला, देश के करोडों भक्तों को मालामाल किया आज कोरोनावायरस की इस महामारी के चलते इसकी नियत में भी खोट दिखाई देने लगी। सूचना मिली की  तिरुपती मंदिर ट्रस्ट ने 1300 लोगों को जो मंदिर के लिए और उनके प्रसाद की दुकान चलाने के लिए दिन-रात  भंडारा चलाते थे और  चौबिसों घंटों नोटों की बंडल गिना करते थे। अचानक सब के सब को हटा दिया गये । प्रधानमंत्री जी के उस अपील की भी कोई कद्र नहीं कि जिसमें प्रधानमंत्री ने आंसू बहाते हुए देशवासियों से अपील की थी कि आप अपने कर्मचारियों का ध्यान रखेंगें और किसी भी मजदूर को लॉकडाउन के चलते ना तो हटाया जाएगा ना ही उसकी सैलेरी काटी जाए । देश के मोदी भक्त जो  बात-बात में लोगों को ट्रोल किया करते  हैं आज मंदिर की इस धार्मिक और पूण्य  कार्य में कुछ तो जरूर सहयोग करेंगे।

एक बात ओर आपसे करनी है । आज तक देश की कोई बड़ी मंदिर जहां रोजाना के लाखों का चढ़ाआ आता है अभी तक कोई भी मंदिर का ट्रस्ट सामने नहीं आया कि वह भारत के इस संकट काल में अपना सब कुछ देने को तैयार है। भारत सरकार कोरोना की महामारी से लड़ने में किसी भी प्रकार की कमी न करें । परन्तु अफसोस है कि अभी तक मेरी जानकारी के अनुसार, स्वामी नारायण मंदिर सभी जगह से मिलकर 1.88 करोड़ रुपया, सांईबाबा संस्थान ट्रस्ट 51 करोड़ रुपया महाराष्ट्र सरकार को, बाबा रामदेव प्रधानमंत्री कोश में 25 करोड़ रुपया, श्री माता मानसी देवी, पंचकुला के द्वारा 10 करोड़ रुपये हरियाणा की सरकार को, जबकि पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुवनंतपुरम भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। कुछ लोग यहां की संपत्ति का अनुमान लगाकर बताते हैं कि यहां एक खरब डॉलर के मूल्य की संपत्ति है। वेंकटेश्वर मंदिर, तिरूपति नवीनतम अनुमान के अनुसार तिरुमला मंदिर में स्वर्ण भंडार और 52 टन सोने के गहने हैं और प्रत्येक वर्ष यह तीर्थयात्रियों से हुंडी/दान बाॅक्स में प्राप्त प्रति वर्ष तीन हजार किलो सोने से राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ गोल्ड रिजर्व जमा के रूप में परिवर्तित हो जाता है।  शिर्डी साईबाबा का मंदिर, इनका सिर्फ सिंहासन 94 किलोग्राम सोने का बना है। यह मंदिर भारत के अमीर मंदिरों की लिस्ट में तीसरे स्थान पर है। महज 51 करोड़ राज्य सरकार को दान देने की घोषणा की हे। वहीं वैष्णोदेवी मंदिर, जम्मू कश्मीर मंदिर में करीब 500 करोड़ की वार्षिक आय है। सिद्धि विनायक, मुंबई 100 करोड़ से अधिक की वार्षिक आय। पुरी का जगन्नाथ मंदिर, जिसकी आय सालान 50 करोड़ रुपये आंकी जाती है। आज इन मंदिरों के मठाधीशों पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता है कि यदि देश के लगभग सभी बड़े-छोटे व्यापारी घराने इस संकट के समय देश के साथ खड़े हैं इन मंदिरों को काठ क्यों सूंघ गया दान लेने में सबसे आगे दिखने वाले ये मंदिर आज दान देने में सबसे पीछे की पंक्ति में क्यों खड़े नजर आते हैं? रोजान धर्म के नाम पर जमा करने वाले इन धार्मिक पंडों से कोई सवाल तो करे कि इस धन का आखिर कब इस्तेमाल होगा? जयहिन्द !
देखें:  The Lallantop Fact check

India’s richest temple in Tirupati lays off 1300 contractual employees

शनिवार, 2 मई 2020

"लॉकडाउन फेज - 3"- शंभु चौधरी



Kolkata : 3rd May' 2020:
कल रात बारह बजे से लॉकडाउन फेज - 3 की शुरूआत हो जायेगी। 30 जनवरी को भारत में कोरोनावायरस का सबसे पहला मामला तब सामने आया जब चीन के ‘वुहान विश्वविद्यालय‘ से लौटें एक मैडिकल छात्र आसिफ को केरल में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए । तब तक सब कुछ सामान्य सा चल रहा था। इससे पूर्व चीन ने लगभग एक माह तक इस बात को दबाने की भरपूर कोशिशें की, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारियों की आंखों में भी धूल झोंकने का प्रयास किया ।

 प्रो. झेंगली शी
12 दिसंबर, 2019 को वुहान शहर का ‘जीवित जानवरों के मांस बाजार’ (Wet Bazaar) की वजह से उसके महज कुछ ही दूरी पर पहले पीड़ित मरीज में पाये गये वायरस की जांच में वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. झेंगली शी और उनकी टीम ने दिसंबर के दूसरे सप्ताह में ही कोरोनावायरस पर ‘‘एंटीबॉडी-निर्भर वृद्धि’’ के लिए आणविक तंत्र का अध्ययन प्रकाशित किया था जिसे चीन के हुक्मरानों ने दबा दिया । ज्यों-ज्यों इस बीमारी के मरीजों की संख्या में धीरे-धीरे स्वतः वृद्धि होने लगी, अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने शुरू हो गए तब एक चीनी चिकित्सक डॉ. ली वेनलियानग ने चेतावनी देते हुए कहा कि ‘‘क्या सार्स फिर से आ रहा है?’’ अर्थात उस डाक्टर और उनकी टीम ने यह भांप लिया था कि यह किसी नए खतरे का संकेत है। जंगली आग की तरह सार्स कोरोनावायरस-2 के आने की खबर तेजी से फैलने लगी । चीनी सरकार ने चिकित्सक डॉ. ली वेनलियानग को भी धमका दिया कि वे इस बात की सूचना किसी भी मीडिया या सोशल साइट पर न दें साथ ही वुहान की स्थानीय पुलिस ने उनसे लिखवा भी लिया कि वे आगे से ऐसा नहीं करेगें।


विस्सल ब्लोअर डॉ.ली वेनलियानग 
31 दिसम्बर, 2020: मीडिया को, अस्पतालों व अस्पतालों के कर्मचारियों-डॉक्टरों को, आम जनता को, प्रशासन के अधिकारियों को चीन के हुक्मरानों ने हर प्रकार से साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग कर इस आपातकाल से सामना न कर बस इसे महज़ एक मामूली वायरस की संज्ञा देते हुए रफादफा करने के लिए दबाव बनाने का प्रयास करने लगा। परिणाम देखते-देखते यह आग चीन के अन्य शहरों में भी फैलने लगी। 2002 की महामारी से चीन ने तब भी कोई सबक नहीं सीखा और 2019 में भी चीन ने वही किया जो उसने सार्स की महामारी के समय किया था । वुहान शहर की वुहान सिटी स्वास्थ्य समिति ने सर्वप्रथम 31 दिसम्बर को सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार कर एक विज्ञप्ति जारी की जिसमें कहा गया कि ‘‘कुछ चिकित्सा संस्थानों ने पाया कि निमोनिया के कई मामले दक्षिण चीन सीफूड सिटी से संबंधित थे। रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद, नगर स्वास्थ्य और स्वास्थ्य आयोग ने तुरंत शहर के चिकित्सा और स्वास्थ्य संस्थानों में साउथ चाइना सीफूड सिटी से संबंधित एक मामले की खोज और पूर्वव्यापी जांच शुरू की। सत्ताईस मामले पाए गए हैं , जिनमें से 7 गंभीर स्थिति में हैं, और शेष मामले स्थिर और नियंत्रणीय हैं।’’


20 जनवरी 2020: के आते-आते यह वायरस चीन के दस शहरों में पांव पसार चुका था। 19 जनवरी 2020 को चीन की आधिकारिक रिर्पोट में 218 मामलों की पुष्टि कर दी गई। साथ ही यह हिदायत भी जारी की गई (क) कच्चा या अपक्व मांस ना खांयें। (ख) जिस व्यक्ति को जरा भी बुखार या वह अस्वस्थ है उससे दूरी बनायें। (ग) चीन में सभी आने वाले लोगों की टेम्परचर मीटर से जांच जरूरी है। एवं (घ) वुहान में जो व्यक्ति अस्वस्थ हो उसे दो सप्ताह के लिए क्वारंटाइन होने को कहा गया। पहली मौत की पुष्टि 9 जनवरी 2020 को वुहान में हुई थी ।

30 जनवरी 2020: चीन के वुहान शहर के सभी स्वास्थ्य अधिकारियों व स्थानीय जनता को प्रशासन की तरफ से साफ हिदायतें दी गई कि वे इस बीमारी के संदर्भ में किसी भी प्रकार की सूचना का आदान-प्रदान सोशल मीडिया के माध्यम से न करें अन्यथा उनके ऊपर कठोर कार्यवाही की जायेगी। इस संदर्भ में कई लोगों पर मामला भी दर्ज कर दिया गया । इस महामारी के प्रकाश में आने के ठीक एक माह पश्चात ‘‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’’ ने 30 जनवरी को "विश्व स्वास्थ्य आपातकाल अन्तरराष्ट्रीय संस्थान"  "Public health emergency of international concern" (PHEIC)  को नामित किया, जो लगभग शांति से बैठा रहा । यह समिति इस बीमारी को महामारी कहने से हिचकती रही । इसका मानना था कि ‘‘महामारी हल्के या लापरवाही से इस्तेमाल करने के लिए एक शब्द नहीं है। यह एक ऐसा शब्द है, जिसका दुरुपयोग होने पर, अनुचित भय, या अनुचित स्वीकृति हो सकती है जिससे अनावश्यक रूप से विवाद पैदा होने की संभावना बनती है।’’ तब तक इस महामारी ने चीन व उसके आस-पास के कई देशों को अपने गिरफ्त में में ले चुका था। 

Chinese-doctor-Li-Wenliang_selfi-before-his-death
विस्सल ब्लोअर डॉ.ली वेनलियानग 


7’ फरवरी 2020: चीनी चिकित्सक डॉ.ली वेनलियानग (whistleblower) जिसने  सर्वप्रथम विश्व को चेतावनी दी थी कि ‘‘क्या सार्स फिर से आ रहा है?’’ कोरानावायरस की इस महामारी से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए ।







11 फरवरी 2020: को डब्ल्यूएचओ (WHO) ने काफी सोच समझ कर अन्ततः इस वायरस को नोवल कोरोना वायरस सार्स -2 नया नाम COVID-19  देते हुए कहा कि ‘‘यह प्रकोप एक महामारी है और हम इस प्रकोप का आकलन कर रहें हैं। ’’  आज बार-बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस महामारी के दुनिया भर में फैलने के लिए इसी संस्थान को दोषी ठहरा रहा है।

24 फरवरी 2020:  इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले 24-25 फरवरी को भारत ‘नमस्ते ट्रंप’ की यात्रा पर आये थे और उनके साथ आयी थी उनकी विशाल टीम दो दिवसीय यात्रा पर । इस यात्रा के दौरान ट्रंप ने आगरा का ताज महल, नयी दिल्ली और अहमदाबाद की यात्रा की थी । अहमदाबाद के विशाल क्रिकेट स्टेडियम को राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत में 700 करोड़ रुपये की लागत बनाया और सजाया गया था। आपको याद होगा ट्रंप के स्वागत के समय इस स्टेडियम के रास्ते में आने वाले गरीबों की बस्ती  को चीन की दीवार बनाकर इसी मोदी की भाजपा सरकार ने छुपा दी थी, ताकि  मोदी जी के मित्र ट्रंप को उनकी भनक तक न लगे कि भारत में 80 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-बसर करते हैं लोग जिसे आज भी दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है ।

ठीक इससे कुछ पहले की एक घटना भी आपको याद दिलाना चाहूँगा, जब सन 1978 में स्व. मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर भी अपनी पत्नी के साथ दो दिवसीय भारत यात्रा आये थे तब उन्हें हरियाणा के दौलतपुर गाँव (नया नाम जिम्मी कार्टर के नाम के ऊपर ‘कार्टरपुरी’) ले जाया गया था, ना कि किसी विशाल स्टेडियम में । उनका व उनकी पत्नी का भारतीय वेशभूषा में स्वागत किया गया था । गांव के लोगों में रम गये थे राष्ट्रपति, तमाम सुरक्षा को दरकिनार करते हुए गांव वालों के साथ खूब नाचे । (देखें ऊपर चित्र को)

वहीं ठीक इसके विपरीत आज के लोकप्रिय प्रधानमंत्री जी गांव के दृश्य को छुपाने में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये । प्रतिक्रिया करने वालों को देशद्रोही करार दिया गया।  वही अहमदाबाद आज कोरोना की महामारी से पूरा कांप चुका है । मोदी की भाजपा सरकार ने इन तथ्यों को छुपाने की लाख कोशिशें की । इसके लिए पूरे भारत में एक विशेष समूदाय के खिलाफ जहर उगला गया । पूरे देश का ध्यान बांट दिया गया, नीचे से कोरोना की आग मुम्बई, दिल्ली और अहमदाबाद में तेजी से फैलने लगी। दिल्ली सहित महाराष्ट्र के मुंबई शहर और गुजरात के अहमदाबाद में लगातार कोरोना के बढ़ते मामले किसी बड़े खतरे को संकेत देने लगे। अतिश्योक्ति न हो तो ‘नमस्ते ट्रंप की यात्रा’ की इस महामारी के बीच भारत के लिए श्राप साबित हो चुकी थी ।

इसके बाद तो भारत में कारेाना की महामारी धीरे-धीरे पूरे देश में अपना पांव पसारने लगी। दिल्ली, कोलकाता, क्या मुंबई हर तरफ से खबरें आने लगी । अंततः 19 मार्च को प्रधानमंत्री जी ने देश के नाम एक संदेश प्रसारित करते हुए देश की जनता से इस महामारी से निपटने के लिए 22 मार्च रविवार को एक दिन का जनता कर्फ्यू  का पालन करने की अपील की साथ ही शाम को पांच बजे अपने-अपने घरों की बालकोनी व छतों पर खड़े हो कर थाली, घंटी या कुछ भी बजा कर कोरोना के जूझ रहे कोरोना मरीजों की चिकित्सा-रत डॉक्टरों व अन्य युद्धाओं के हौसला अफजाई करने का आग्रह किया, जिसका देशभर में स्वागत किया गया । इसके दो दिन बाद प्रधानमंत्री जी पुनः जनता से सीधे संवाद करते हुए बिना किसी ठोस योजना को मुर्तरूप दिये ठीक वही गलती दौराह दी जो उन्होंने नोटबंदी के समय की थी । लाखों गरीब लोगों को एक साथ सड़कों पर ला खड़ा किया । 25 मार्च बुधवार से आगामी 21 दिनों की पूरे देश में लाॅकबंदी की घोषणा ने पूरे देश को सदमें में डाल दिया था । यानी मोदी जी को इसके परिणामों का आभास  हो चुका था यहां पर यदि योजनाबद्ध इसी लाॅकडाउन को इंजाम दिया जा सकता था । जिससे एक घटना से आज जो इतनी बड़ी तबाही देश में हुई है शायद देश को इस तबाही को हम बचा लेते । अचानक हुए लाॅकबंदी के चलते देश के लाखों उद्योग, कल-कारखाने अचानक से ठप हो गए । करोड़ों मजदूर बेकार हो गए । देश की अर्थव्यवस्था का आलम तो यह है कि रिजर्ब बैंक आफ इंडिया को दो बार बीच में आना पड़ा ।

अभी 21 दिन की पूरे भी नहीं हुए, भारत के प्रधानमंत्री ने पुनः जनता से अपील की और कहा कि- पांच अप्रैल को रात नो बजे अपने-अपने घरों की बत्तियां बुझा कर नो मिनट के लिए दीये, या टार्च जला कर योद्धाओं को नमन करें। यह सब एक तरफ चलता रहा तो दूसरी तरफ लाखों घरों के दीये बुझते गये । रोजना कमाने-खाने वालों के लिए हमदर्दी जताने वाले प्रधानमंत्री बस घड़ियाली आंसू बहाते दिखे । उनके द्वारा प्रायोजित मीडिया चैनलों ने मजदूरों की भूखमरी को कोरोना की महामारी से जोड़ दिया । सरकार से सवाल पूछने की जगह मजदूरों के धर्म पर सवाल खड़े कर दिये। उनकी माली हालात पर कोई चर्चा नहीं हुई। कैसे उनका जीवन यापन होगा इस पर कोई बहस तक नहीं की गई बस हर तरफ एक ही सवाल उठाया गया कि यदि ये लोग इस प्रकार जमा होंगे तो इस महामारी से कैसे लड़ा जा सकेगा? प्रश्न उठाने वाले चैनलों से यह कोई पूछ ले कि यदि आपका दो दिन का राशन-पानी बंद कर दिया जाता है तो आप सारा जहां सर पर उठा लेते हैं । आज तो इन मजदूरों के जीने-मरने का सवाल उठ खड़ा हुआ है । सिर्फ प्रधानमंत्री जी के घड़ियाली आंसू से मजदूरों व उनके बच्चों को भोजन नहीं मिल सकता। जमीनी हकीकत से रुबरु कराने की हिम्मत किसी समाचार चैनलों की नहीं दिखी। किसी प्रकार लॉकडाउन का पहला चरण समाप्ति की दिशा में आगे बढ़ने लगा। मजदूरों को लगा कि अब उनको रहत दे दी जाएगी। 


दूसरा फेज :
परन्तु पुनः 15 अप्रैल से लॉकडाउन का दूसरा फेज शुरू कर दिया गया। कुछ राज्य सरकारें मजदूरों के हितों पर ध्यान दे रही थी, पर वह हित उनके लिए बस इतना संतोष भर था कि वे मर तो नहीं रहे थे पर जी भी नहीं पा रहे थे । हर पल मौत उनके आस-पास मंडरा रही थी। बिहार की भाजपा के समर्थन से चल रही नीतीश कुमार की सरकार की तो बात ही कुछ निराली थी, इसके पास तो इतना पैसा भी नहीं कि इन मजदूरों को वापस बुला ले।  सैकड़ों मजदूर अपने परिवार, बच्चों को कंधों पर लिए, हजारों मील की पैदल यात्रा पर ही गांव की तरफ कूच कर दिये, कईयों ने रास्ते में ही अपने प्राण गंवा दिये । किसी सरकार के पास इन मौतों का कोई आंकड़ा खोजने से भी नहीं मिलेगा। प्रवासी मजदूरों की समस्या कोरोना से भी बड़ी हो चुकी थी । एक तरफ छात्र व छात्राओं में भय का वातावरण फैल चुका था । सब जल्दी से जल्दी अपने - अपने घर पंहुचना  चाहते थे। इनको लगने लगा कि यह लॉकडाउन लंबा चलेगा। पढ़ाई ठप हो चुकी थी । सभी शिक्षण संस्थानों को पहले ही बंद किया जा चुका था। खाना बनाने वाले भी आना बंद कर चुके थे। होस्टल में खाने की सामाग्रियां भी समाप्ति के कगार पर आ चुकी थी । कुछ शहरों में ऑनलाइन खरीदारी की सेवा वह भी एक लंबी अंतराल में उपलब्ध तो थी, पर यह सुविधा सब लोगों तक नहीं पंहुच पा रही थी । दिल्ली के पिज्जा डिलेभरी की घटना व हिन्दू धर्म प्रायोजित आई.टी सेल के तथाकथित धर्म प्रचारक देशभर में विष उगलने में लगे हुए थे। झूठी और मनगढंत वीडियों बना-बनाकर अफवाहों का बाजार गर्म करने में जी जान से जूटे थे ।

पालघर में दो साधुओं की हत्या 
इनको ऐसा लग रहा था कि मानो यही लड़ाई का अंतिम मौका है। हर तरफ इन प्रचारकों के मुंह से आग के गोले बरस रहे थे। पालघर में हिन्दुओं द्वारा ही फैलाये अफवाह के शिकार दो साधुओं की हिन्दू ग्रामिणों के द्वारा हत्या को सांप्रदायिक रंग दने से लेकर,  तब्लीगी समाज के चंद लोगों के नाम पर पूरे मुस्लिम समाज को अपराधी ठहराये जाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे।

एक तरफ देश की पूरी व्यवस्था, सेना, डॉक्टर’स, चिकित्सा-रत कर्मचारी-गण, प्रशासन, पुलिस, सफाई कर्मचारी, सब्जी विक्रेता, छोटे-छोटे किराना कारोबारी, व्यापारी वर्ग देश को पूरी व्यवस्था को संचारित करने में दिन-रात एक किये हुए थे। तो दूसरी तरफ अस्पतालों में मरीजों की लगातार बढ़ती लंबी कतार दिन-प्रतिदिन कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी, मरने वालों की संख्या अपने सांतवे आसमान पर थी । मैडिकल  टीम लगातार 24 घंटा कार्य करने क बाद भी कोई राहत या आराम के लिए एक शब्द नहीं बोल रहा था। केन्द्र सरकार के कर्मचारीगण विमानों से देश विदेशों से मेडिकल समानों का लगातार आयात करने में व राज्यों में पंहुचाने में व्यस्त थे, सफाई कर्मचारी लगातार अपनी सेवा दे रहा था । सब्जी वाले बाजारों में पसरे सन्नाटा के कारण घर-घर सब्जी ले कर घूमने लगे, व्यापारी लगातार मुल्यों को नियंत्रित करते हुए समानों की आपूर्ति में लगे हुए थे । देश की 90 प्रतिशत जनता अपने-अपने घरों में कैद हो चुकी थी । विमान सेवा, रेल सेवा, बस सेवा, टैक्सी सेवा सब बंद हो चुकी थी । ऐसे में बस एक ही लोग सजग थे । अफवाहबाजों का समूह जो लगातार वाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर पर किसी विशेष वर्ग को एक दूसरे के खिलाफ युद्ध चला रखे थे। कुछ हिन्दू थे, तो कुछ मुसलमान । कुछ लोग मुसलमानों को भड़काने में लगे थे, कुछ लोग हिन्दुओं को भड़काने में लगे थे। कुछ मुसलमान मस्जिदों में नमाज न अदा करने के लिए उकसाये जा रहे थे तो कुछ हिन्दू, मुसलमानों के द्वारा कोरोना फैलाये जाने की अफवाह फैलाने में लगे थे।

लॉकडाउन का दूसरा चरण इन्हीं अफवाहबाजों की भैंट चढ़ गया । मजदूर इनके लिए बस महज एक तमाशा बन कर रह गया। जगह -जगह से उनके मरने की खबरें आने लगी, लेकिन कोरोना की खबरों में सबकी आवाज दब के रह गई । मानो एक तरफ कोरोना की सुनामी आई हुई हो तो दूसरी तरफ मजदूरों की चीखें चित्कार-चित्कार के त्राहीमाम कर रही थी । बचाने वाले नेताओं की बात तो किसी के कान में सुनाई दी तो बस योगीजी व केजरीवाल सरकार की बात लिखी जा सकती है। इसके अलाव तो सब के सब तिनके से घोड़े को घास खिलाने में लगे थे। 

Fake News Clarification By UP Police
Fake News Clarification by UP Police
तीसरा फेज : इस बीच लॉकडाउन का दूसरा फेज भी समाप्त होने का आया । 4 मई से लॉकडाउन का तीसरा फेज शुरू हो जायेगा जो आगामी 17 मई तक रहेगा । आज इस लेख को लिखे जाने तक पूरे विश्व में 34 लाख लोग अबतक कोरोनावारस से प्रभावित हो चुके हैं। वहीं मरने वालों की संख्या 2 लाख चालिस हजार को पार कर चुकी है। जबकि भारत में कल तक 37 हजार कोरोना से संक्रमित लोगों की अब तक पहचान की जा चुकी है । अनुमान है कि यह संख्या लॉकडाउन के तीसरे चरण में तीन गुणी हो सकती है। क्योंकि प्रथम चरण की समाप्ति में इसकी संख्या यानी की 14 अप्रैल को लगभग 12 हजार थी जो आज यानी कि 17 दिनों में 37 हजार को पार कर चुकी है । 22 मार्च से 2 मई के बीच हमने अब तक सिर्फ लाल-पीला-हरा करने में या थाली पीटने से लेकर दीया जलाने में या अफवाहों में ही बिता दिये ।  अभी भी सरकारी सह सभी प्राइवेट अस्पतालों में चिकित्सा के हेतु बेसिक समानों की भी आपूर्ति नहीं कर पाये हैं। रोजाना अस्पतालों से खबरें आ रही है कि अमूक डाक्टर को कोरोना हो गया । अमूक अस्पताल के नर्सों को कोरोना हो गया। यदि भारत को कोरोना से लड़ना है तो कुछ काम सर्वप्रथम करना होगें ।
1. अस्पतालों को जो जिस भी हालात में हो उनकी व उनके स्टाफ की पूरी सुरक्षा प्रदान करना अन्यथा इसके खतरनाक परिणाम हो सकते है।
2. कार्यस्थल पर ही स्कील्ड मजदूरों के रहने व खाने की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से करने का आदेश सभी कंपनियों को देना।
3. अफवाहबाजों की नकेल कसना जिसमें टीवी चैनल को भी नहीं बख्सा जाना चाहिए।
4. अफवाहबाजों, पत्थरबाजों व मोब लंचिंग करने वालों को सात साल की या सख्त से सख्त सजा का प्रावधान जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल ही मोब लंचिंग के लिए कानून बनाने को सरकार से कहा था। तत्काल करना चाहिए।

कल से लॉकडाउन का तीसरा चरण शुरू हो जायेगा। इस बार पहली बार सरकार ने तीसरे लॉकडाउन की सूचना सरकारी विज्ञप्ति के माध्यम से दी है जिसमें विभिन्न प्रकार की होने वाली समस्या पर भी ध्यान दिया गया है। भारत सरकार को इस बात कर आभास हो चुका है कि यह लॉकडाउन एक लंबी प्रक्रिया है। इससे पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी । मजदूरों का पलायन को अधिक समय तक रोका नहीं जा सकता । दैनिक कारोबार के ना होने से रोजाना सरकार को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।  आय के सारे स्त्रोत का रास्ता बंद कर सरकार को नहीं चलाया जा सकता । ना ही मजदूरों के बिना कल-कारखानों को पुनः जीवित किया जा सकता । कुछ राज्य सरकारें अच्छा कार्य कर रही है तो कुछ राज्य सरकारें अभी भी बाढ़ के पानी का गला तक आने का इंतजार कर रही है । केन्द्र अकेला पूरे भारत की महामारी से बिना जनता व राज्य सरकार के सहयोग से नहीं लड़ सकता। चंद राजनीतिक स्वार्थ में लिप्त लोग राज्य की गैर भाजपाई सरकारों को अस्थिर करने में लगे हैं तो कुछ केन्द्र के निर्देशों का पालन करने में हिचकिचाहट करने में लगे हैं । कोरोना की महामारी में मौत के आंकड़ों के छुपा लेने से, पत्थरबाजों को या मुसलमानों को बचा लेने से समस्या समाप्त नहीं हो जायेगी बल्कि वैसी सरकारें जो इनको बचाने में जुटी है, वे उनके तो दुश्मन है ही, क्यों कि इससे उनके बीच महामारी का फैलाव तेजी से हो जाएगा साथ ही देश की करोड़ों जनता के साथ भी नाइंसाफी होगी, क्योंकि वे लोग पिछले 40 दिनों से अपने-अपने घरों में कैद हैं । अंत में, मैं इस लेख में लिखी सभी बातें बिना किसी भेदभाव के लिखा हूँ । मेरा उद्देष्य सिर्फ इतना ही है कि इतिहास में सच को पढ़ा जा सके।


मंदिरों को काठ क्यों सूंघ गया: 


 तिरुपति बालाजी
जिस मंदिर ने जिंदगी भर इन मजदूरों को पेट पाला, देश के करोडों भक्तों को मालामाल किया आज कोरोनावायरस की इस महामारी के चलते इसकी नियत में भी खोट दिखाई देने लगी। सूचना मिली की  तिरुपती मंदिर ट्रस्ट ने 1300 लोगों को जो मंदिर के लिए और उनके प्रसाद की दुकान चलाने के लिए दिन-रात  भंडारा चलाते थे और  चौबिसों घंटों नोटों की बंडल गिना करते थे। अचानक सब के सब को हटा दिया गये । प्रधानमंत्री जी के उस अपील की भी कोई कद्र नहीं कि जिसमें प्रधानमंत्री ने आंसू बहाते हुए देशवासियों से अपील की थी कि आप अपने कर्मचारियों का ध्यान रखेंगें और किसी भी मजदूर को लॉकडाउन के चलते ना तो हटाया जाएगा ना ही उसकी सैलेरी काटी जाए । देश के मोदी भक्त जो बात-बात में लोगों को ट्रोल किया करते  हैं आज मंदिर की इस धार्मिक और पूण्य  कार्य में कुछ तो जरूर सहयोग करेंगे।

एक बात ओर आपसे करनी है । आज तक देश की कोई बड़ी मंदिर जहां रोजाना के लाखों का चढ़ाआ आता है अभी तक कोई भी मंदिर का ट्रस्ट सामने नहीं आया कि वह भारत के इस संकट काल में अपना सब कुछ देने को तैयार है। भारत सरकार कोरोना की महामारी से लड़ने में किसी भी प्रकार की कमी न करें । परन्तु अफसोस है कि अभी तक मेरी जानकारी के अनुसार, स्वामी नारायण मंदिर सभी जगह से मिलकर 1.88 करोड़ रुपया, सांईबाबा संस्थान ट्रस्ट 51 करोड़ रुपया महाराष्ट्र सरकार को, बाबा रामदेव प्रधानमंत्री कोश में 25 करोड़ रुपया, श्री माता मानसी देवी, पंचकुला के द्वारा 10 करोड़ रुपये हरियाणा की सरकार को, जबकि पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुवनंतपुरम भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। कुछ लोग यहां की संपत्ति का अनुमान लगाकर बताते हैं कि यहां एक खरब डॉलर के मूल्य की संपत्ति है। वेंकटेश्वर मंदिर, तिरूपति नवीनतम अनुमान के अनुसार तिरुमला मंदिर में स्वर्ण भंडार और 52 टन सोने के गहने हैं और प्रत्येक वर्ष यह तीर्थयात्रियों से हुंडी/दान बाॅक्स में प्राप्त प्रति वर्ष तीन हजार किलो सोने से राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ गोल्ड रिजर्व जमा के रूप में परिवर्तित हो जाता है।  शिर्डी साईबाबा का मंदिर, इनका सिर्फ सिंहासन 94 किलोग्राम सोने का बना है। यह मंदिर भारत के अमीर मंदिरों की लिस्ट में तीसरे स्थान पर है। महज 51 करोड़ राज्य सरकार को दान देने की घोषणा की हे। वहीं वैष्णोदेवी मंदिर, जम्मू कश्मीर मंदिर में करीब 500 करोड़ की वार्षिक आय है। सिद्धि विनायक, मुंबई 100 करोड़ से अधिक की वार्षिक आय। पुरी का जगन्नाथ मंदिर, जिसकी आय सालान 50 करोड़ रुपये आंकी जाती है। आज इन मंदिरों के मठाधीशों पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता है कि यदि देश के लगभग सभी बड़े-छोटे व्यापारी घराने इस संकट के समय देश के साथ खड़े हैं इन मंदिरों को काठ क्यों सूंघ गया दान लेने में सबसे आगे दिखने वाले ये मंदिर आज दान देने में सबसे पीछे की पंक्ति में क्यों खड़े नजर आते हैं? रोजान धर्म के नाम पर जमा करने वाले इन धार्मिक पंडों से कोई सवाल तो करे कि इस धन का आखिर कब इस्तेमाल होगा? जयहिन्द !
देखें:  The Lallantop Fact check






शुक्रवार, 1 मई 2020

West Bengal Categorization_Covid-19

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

‘‘मजदूर दिवस व अव्यवस्थित लॉकडाउन’’ - शंभु चौधरी

मेरी मान्यता के अनुसार ‘‘ कल-कारखानों से अभीप्राय उन उद्योगों से है, जिसमें समूह में मानव ऊर्जा का प्रयोग किया जाता हो, भले ही उसमें उत्पादन में सहयोगी हेतु विद्युतीय मशीनों व अन्य संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता हो इनमें यदि मानव ऊर्जा का प्रयोग न किया जाए तो ये सभी संसाधन महत्वहीन व नरकंकाल के बराकर हैं । - शंभु चौधरी ’’
Das Capital
मई दिवस को हर साल पहली मई को अंतर्राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है । इसकी शुरुआत 1 मई, 1890 को पेरिस, फ्रांस में 14 जुलाई 1889 को हुई इस दिन दुनिया भर में कुल 80 प्रतिशत मजदूर अपने कार्यस्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद कर देते हैं । आज दुनिया के सामने कोरोनावायरस के संकट ने इसके नये स्वरूप पर हमें कुछ नया लिखने को मजबूर कर दिया है। सन 1918 की स्पेनी फ्लू ने पूरे विश्व में लगातार दो साल तक तबाही मचा दी थी। यह जनवरी 1918 में पैदा हुई और दिसम्बर 1920 तक चली और इसने 50 करोड़ लोगों को संक्रमित किया जो उस समय की दुनिया की आबादी का एक चौथाई है । इससे मरने वालों की संख्या अनुमानतः 170 लाख से लेकर 4 करोड़ के बीच बतायी गई है।  [देखें विकिपीडिया] इस काल में दुनिया भर में स्वः निर्मित लॉकडाउन हो गया था । हर व्यक्ति स्वयं व खुद के परिवार को बचाने के लिए अपने-अपने घरों में कैद हो गए। बस हर व्यक्ति इसी बात की दुआ कर रहा था कि यह बीमारी उसके घर में प्रवेश ना करे । स्पेनी फ्लू की महामारी ने मजदूरों के जीवन को भी काफी हद तक प्रभावित कर दिया था।  नब्बे प्रतिशत मजदूरों का जीवन संकट में आ गया था । कल-कारखाने बंद हो चुके थे । आज की तरह कोई सूचना का साधन न होने से मनगढंत कथाओं का बोलबाला था। पादरी, मौलबी, पंडितों ने इस अवसर को अपने-अपने धर्म के प्रचार में जम कर लगाया। उनको और भयभीत करते रहे, अफवाहों को फैलाते रहे । जिसका जितना बस चला वह उस तरह से अफवाहों को फैलाने लगा। समाचार पत्र उन अफवाहों का प्रचार माध्यम बन चुके थे ।

आज हम 21वीं सदी में जी रहें हैं । हमारे पास संचार के तमाम सुख-सुविधा जैसे मोबाइल फोन, इंटरनेट संचार, टीवी संचार, सोशल मीडिया संचार, समाचार पत्र आदि उपलब्ध है । जबकि आज भी हम धार्मिक अफवाहों का शिकार हो रहें हैं।  वुहान से निकला कोरोनावायरस ने दुनिया भर में कोहराम मचा दिया है। हर कोई अपने-अपने देश के सरकारी आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य है । लगभग पूरी दुनिया लॉकडाउन की चपेट में आ चुकी है। अब तक 212 देशों में इस महामारी ने, न सिर्फ उस देश में अपना आतंक फैला दिया है । लाखों लोग इस महामारी से संक्रमित हो चुके हैं। अब तक इस बीमारी का कोई ठोस इलाज, सिर्फ इस महामारी से समाज को, लोगों को कैसे बचाया जा सके के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं खोजा जा सका है । दुनिया भर के वैज्ञानिक इस महामारी की रोकथाम के लिए रोज़ाना रिसर्च कर रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस महामारी को ‘कोरोना आतंकवादी’ की संज्ञा भी दे डाली है । जिसके प्रभाव से प्रायः सभी देशों में आज मजदूर तेजी से बेकार होते जा रहें हैं जो हमें किसी खतरनाक मंदी के दौर की तरफ ले जाने का संकेत भी दे रहा है ।

दुनिया मेरी इस बात से सहमत हो या नहीं मैं आज इस बात को लिखने को बाध्य हो रहा हूँ कि मजदूर एक प्रकार की ऊर्जा है जो किसी अन्य ऊर्जा से उसकी शक्ति को कम आंकना हमारी भूल होगी। कार्ल मार्क्स ने इस ऊर्जा का संगठित करने व उसके हक के लिए जितना कुछ भी किया उसे भी नाकारा नहीं जा सकता । कार्ल मार्क्स की एक पुस्तक दास कैपिटल 1867 ई. इस पुस्तक में पूँजी एवं पूँजीवाद का विश्लेषण है एवं इसका मजदूरों पर प्रभाव व उनको इस व्यवस्था के शोषण से मुक्त करने के उपाय बताये गए हैं। इस पुस्तक के द्वारा एक सर्वथा नवीन विचारधारा प्रवाहित हुई जिसने संपूर्ण प्राचीन मान्यताओं को झकझोर कर हिला दिया । इस पुस्तक के प्रकाशित होने के कुछ ही वर्षों के बाद रूस में साम्यवादी क्रांति हुई । हांलाकि आज का युग पूँजीवादी व्यवस्था को सही ठहराता है । इसका तर्क यह दिया जाता है कि कम पूंजी से उद्योगों को चलाया जाना और आज की जरूरतों को पूरा करना संभव नहीं है, परन्तु साथ ही इस व्यवस्था के सर्मथक यह बताना भूल जाते हैं कि टाटा, बिड़ला, रिलायंस, ईमामी समूह जैसी संस्थान भारत में कम पूंजी से कल कारखाने की स्थापना की थी । कल कारखाना का सिर्फ एक ही मतलब नहीं होता, कि जिसमें लोहे के संचालित बीजली के उपकरण लगे हों।  मेरी मान्यता के अनुसार ‘‘ कल-कारखानों से अभीप्राय उन उद्योगों से है, जिसमें समूह में मानव ऊर्जा का प्रयोग किया जाता हो, भले ही उसमें उत्पादन में सहयोगी हेतु विद्युतीय मशीनों व अन्य संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता हो इनमें यदि मानव ऊर्जा का प्रयोग न किया जाए तो ये सभी संसाधन महत्वहीन व नरकंकाल के बराकर हैं । - शंभु चौधरी ’’

आज जब हम लॉकडाउन के इस युग में जिसे हम सभी देख-सुन रहें हैं । यदि सिर्फ इस एक क्षेत्र की ही बात करें तो मानव ऊर्जा के महत्व को हम इंकार नहीं कर सकते । पूंजीवाद व्यवस्था धरी की धरी रह गई । यूएसए, इटली, फ्रांस, स्पेन, यूके जैसी सर्वशक्तिशाली महाशक्तियाँ जो पूंजीवादी व्यवस्था की परिचायक है इस लॉकडाउन को लेकर सबसे अधिक चिंतित है । उनको लगने लगा है कि मजदूरों को और नहीं बैठाया जा सकता इससे तमाम व्यवस्था चरमारा जायेगी ।

भारत में भी मार्क्सवाद का एक लंबा युग चला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की स्थापना 1925 में हुई आगे चल कर इसका विभाजन 1964 में हो कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की स्थापना हुई । भारत में हिन्दी भाषी क्षेत्रों में जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की पकड़ बनी हुई है वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की पकड़ गैर हिन्दी भाषियों में अच्छी पकड़ थी । इन राजनैतिक पार्टियों ने एक तरफ मजदूरों का दोहन पूंजीवादी व्यवस्था के साथ मिलकर अपने राजनैतिक सत्ता लोभ के चलते जमकर किया । सिर्फ बंगाल में ही सत्ता में 35 सालों के इनके शासन काल में लाखों मजदूर बेकार हो गए, सैकडों परिवारों ने रोजगार चले जाने से आत्महत्या कर ली, लगभग 56 (छप्पन) हजार कल-कारखाने  को माकपा के शासन काल में नर कंगाल बना दिये गये । मानवीय ऊर्जा का दोहन राजनीतिक लाभ में लिया जाने लगा। परिणाम सामने है ।

यही भूल हम आज कर रहें हैं। अचानक से हुए इस लॉकडाउन को व्यवस्थित भी किया जा सकता था, आज एक तरफ भारत की सड़कों पर लाखों मजदूर भूखमरी की मार झेल रहें हैं तो दूसरी तरफ भारत में आर्थिक महामारी को दौर भी जल्द शुरू हो जाए तो कोई बड़ी घटना नहीं होगी। इसका सबसे बड़ा कारण होगा अव्यवस्थित लॉकडाउन जिसे इतिहास याद करेगा । जयहिन्द।

कोरोना आतंकवादी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना वायरस को किसी आतंकवादी हमले से भी अधिक खतरनाक बताते हुए कहा कि यह दुनिया में उथल-पुथल मचा सकता है और इसलिए सभी देशों को एकजुट होकर इसका मुकाबला करना चाहिए। 

'कोविड-19' पर नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस को बुधवार को संबोधित करते हुये डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. तेद्रोस गेब्रियेसस ने कहा “इस वायरस को हराने के लिए इतिहास के किसी भी क्षण से अधिक इस समय मानव जाति को एक साथ खड़े होने की जरूरत है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि यह वायरस कहर बरपा सकता है। यह किसी आतंकवादी हमले से भी बढ़कर है। यह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल मचाने में सक्षम है। चयन हमारे हाथ मैं है और हमें राष्ट्रीय स्तर पर एकता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता को चुनना चाहिये।” - विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 

प्रवासियों के सुरक्षित आवागमन के लिए विशेष ट्रेन चलाएं - राजस्थान सरकार





प्रवासी बन्धुओं हेतु महत्वपूर्ण  सूचना 


  • जैसा कि आपको विदित है कि राजस्थान सरकार ने सर्वप्रथम पहल कर एक-दूसरे राज्यों में अटके राजस्थान के प्रवासी भाई-बहनों को उनके घर पहुचाने की अनुमति के प्रयास किए ।
  • इसके लिए दो दिन पहले प्रवासियों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन भी शुरू कर दिया गया था। दो दिनों में ही 6 लाख 36 हजार से ज्यादा इच्छुक प्रवासियों ने रजिस्ट्रेशन करवा लिए हैं। यह प्रक्रिया अभी भी जारी है।
  • भारत सरकार ने 29 अप्रैल, 2020 से राज्यों द्वारा आपसी सहमती से प्रोटोकाॅल बनाकर विभिन्न  शर्तों के साथए विभिन्न स्थानों पर अटके हुए प्रवासियों, तीर्थ यात्रियों, पर्यटकों, छाात्रों एवं अन्य के आवागमन की अनुमति दी है।
  • जिन राज्यों में आप रह रहे हैं, वहां की सरकारों से राजस्थान सरकार ने अनुरोध किया है कि निजी वाहनों व अन्य साधनों से आने के लिए आपको अनुमति प्रदान करें।
  • परन्तु इतनी ज्यादा संख्या में रजिस्टर्ड लोागें का दूरस्थ राज्यों से बिना स्पेशल ट्रेन चलाए राजस्थान आना बहुत कठिन है ।
  • अतः हमने 29, अप्रैल, 2020 को ही भारत सरकार से स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था के लिए विशेष अनुरोध किया है।
  • जिन राज्यों में आप रह रहें हैं, वहां की सरकारों से सहमति प्राप्त करने के लिए मुख्य सचिव स्तर पर समन्वय किया जा रहा है।
  • संकट की इस घड़ी में प्रवासी व उनके परिजन आपस में संपर्क व समन्वय बनाये रखें जिससे सभी का आत्मविस्वास बनये रखें।
  • राजस्थान सरकार आपके साथ है।
  • टोल फ्री नम्बर 1800 180 6127  (प्रवासियों के लिए )

मुख्यमंत्री ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र राजस्थान सरकार के प्रयासों के बाद केन्द्र द्वारा जारी आदेश का स्वागत प्रवासियों के सुरक्षित आवागमन के लिए विशेष ट्रेन चलाएं 


मुख्यमंत्री ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र
राजस्थान सरकार के प्रयासों के बाद केन्द्र द्वारा जारी आदेश का स्वागत
प्रवासियों के सुरक्षित आवागमन के लिए विशेष ट्रेन चलाएं ।

जयपुर, 29 अप्रैल। मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने राजस्थान सरकार द्वारा लगातार की जा रही मांग के बाद केन्द्र सरकार द्वारा श्रमिकों एवं प्रवासियों को उनके गृह स्थान पहुंचाने के लिए जारी आदेश का स्वागत किया है। श्री गहलोत ने कहा कि बड़ी संख्या में राजस्थान के प्रवासी विभिन्न राज्यों में फंसे हुए थे। साथ ही अन्य राज्यों के लोग भी यहां अटके हुए थे। दोनों ही संकट की इस घड़ी में अपने परिवारजनों के पास पहुंचना चाहते थे। राज्य सरकार ने उनकी भावनाओं को समझा और इस दिशा में लगातार सकारात्मक प्रयास किए, जिससे उनकी घर लौटने की राह खुल सकी।
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा श्रमिकों एवं प्रवासियों के अन्तराज्यीय आवागमन के संबंध में बुधवार को जारी किए गए आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि प्रवासियों को सकुशल उनके घर पहुंचाने के लिए राजस्थान सरकार ने एक व्यवस्थित एवं सुगम प्रक्रिया के तहत ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था की है जिसमें बुधवार रात तक करीब 6 लाख 35 हजार श्रमिकों एवं प्रवासियों ने अपना पंजीयन कराया है। 
श्री गहलोत ने कहा कि आने वाले समय में और भी श्रमिक अपना पंजीयन करा सकते हैं। ऐसे में कामगारों की इतनी बड़ी संख्या तथा लंबी दूरी को देखते हुए विशेष ट्रेनों का संचालन किया जाना  कामगारों के सुरक्षित घर लौटने का व्यावहारिक समाधान होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि इन लाखों प्रवासियों एवं श्रमिकों के सुरक्षित आवागमन के लिए भारत सरकार को बिना किसी देरी के विशेष ट्रेनों का संचालन प्रारंभ करना चाहिए। 
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री ने विभिन्न पत्रों एवं प्रधानमंत्री के साथ समय-समय पर हुई वीडियो कांफ्रेंस में प्रवासियों एवं श्रमिकों की इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया था। साथ ही प्रवासी राजस्थानियों की सहायता एवं उनकी समस्याओं के समाधान के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को संबंधित राज्य सरकारों के साथ समन्वय की जिम्मेदारी दी गई थी। श्री गहलोत ने पत्र में कहा कि काफी समय से घर से दूर रहने की पीड़ा झेल रहे इन श्रमिकों एवं प्रवासियों की इस समस्या को दूर करने के लिए हमें व्यावहारिक मार्ग अपनाना होगा।
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Covid-19 India Website


India Government
Ministry of Health and Family Welfare


Bihar Government
1. https://covid19.bihar.gov.in/
[ Covid-19 Data  available on  twitter]

2. https://twitter.com/BiharHealthDept
[Official Twitter Handle Of Bihar Health Department]

3. https://twitter.com/sanjayjavin
[ Principal secretary, Bihar health dept.]

Bengal Government
https://wb.gov.in/COVID-19.aspx
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[ Covid-19 Data available on Twitter]

Delhi Government
Delhi Government
Delhi Corona Relief
Works for Clinic with Minister, Delhi

Gujarat Government
https://gujcovid19.gujarat.gov.in/


Maharashtra Government
https://arogya.maharashtra.gov.in/1175/Novel--Corona-Virus


Madhya Pradesh Government
http://mphealthresponse.nhmmp.gov.in/covid/


Rajasthan Government
https://covidinfo.rajasthan.gov.in/

Odisha Government
https://health.odisha.gov.in/covid19-dashboard.html

https://health.odisha.gov.in/


 Uttar Pradesh Government
http://dgmhup.gov.in/en/default

https://twitter.com/MhfwGoUP
[प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, श्री अमित मोहन प्रसाद जी]


 Punjab Government

COVID-19: Punjab Govt
http://pbhealth.gov.in/
Punjab : Media Bulletin COVID -19

to be continue..

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

व्यंग्य: पत्नी देवो भव

....शंभु चौधरी, कोलकाता ।

पत्नी ने फिर एक ताना कसा - ‘‘ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप का नाम तो सुने होंगे ? उनकी सारी हेकड़ी इस कोरोना ने निकाल के उसके हाथ में थमा दी ‘‘लो गिनो लाशों को बैठे-बैठे’’ । तुमको तो मसल के बिना नमक-तेल लगाये कच्चा निगल जायेगा यह चीनी  कोरोना ।
21, April'2020, कोलकाता (भारत):
एक कहावत है- ”लॉकडाउन के लड्डू जो खाये पछताये, जो ना खाये वो भी पछताये“ रामप्रसाद जी लॉकडाउन में पिछले एक माह से घर में ही खुद की पत्नी के द्वारा क्वारंटाइन हो रखे हैं । अब तो पत्नी ने अखबार लेना बंद कर दिया, पता नहीं कोरोना किस रास्ते से घर में प्रवेश कर जाए, परन्तु जब राशन-पानी की बात आती तो सबसे पहले पत्नी फेरीवाले को बाहर आवाज देती सुनाई देती ।

एऐ भाई - ‘‘ परवल है?, नींबू है?
सब्जी वाला - हाँ! परवल चालीस रुपये किलो, नींबू दस के तीन । वह जबाब देता ।
कभी ऑनलाइन राशन नहीं मंगाया पर इस लॉकडाउन ने मुझे ऑनलाइन राशन भी खरीदना सीखा दिया था ।
दिनभर कभी मोबाइल में, कभी टीवी पर समाचार देखता रहता, सारा दिन बस कुछ लिखने में, कुछ पढ़ने में गुजर जाता ।
लॉकडाउन के चलते पिछले कई दिनों से काम पर मासी भी नहीं आ रही है सो घर के सारे काम में भी सहयोग करना पड़ता ही ।

झाडू-पौंछा, बर्तन सफाई, अब तो रोटी बेलना भी सीखा दिया था पत्नी ने ।
शादी के 35 साल गुजर गये, जितना रौब मैंने इन 35  सालों में नहीं दिखाया था इन एक माह के लॉकडाउन में पत्नी ने दिखा दिया । जो-जो काम कभी सोचा नहीं था सब सीखा दिया ।
आप मेरी इस विवशता का कृपया मजाक में ना लें यह हकीकत है जो बयाने दिले सुना रहा हूँ । अब कल की ही बात लें । मैं सोचा की नाश्ते में कुछ बना लिया जाय, सो पत्नी को पूछा - ‘‘कुछ लड्डू तल लें ?’

मेरा सवाल के शब्दों की विवषता देखिये वह हँसने लगी । बड़े साहित्यकार बनते हो ! इतना भी बोलना नहीं आता लड्डू तले नहीं, बनाये जाते हैं। उसने पलट के जबाब दिया ।
तब मुझे ख्याल आया कि आज तक तो लड्डू खाये ही खाये थे, अब घर में बैठा-बैठा कर भी क्या सकता था? मन ही मन आत्मग्लानि से भर चुका था । आज तक पत्रकारिता में घूल ही फांकी थी ? तभी मुझे पाठ्यक्रम की याद आ गई कि जिस क्षेत्र में पत्रकारिता करनी हो उस क्षेत्र की भाषा, तकनीकी शब्दों का अर्थ, उसके प्रयोग की जानकारी जरूरी है । ऐसा न हो कि बाँग्ला में एक वाक्य है - ‘जोल खाबे ?’ अब इसको यह लिख दिया जाए कि पानी खाने को पूछा । तो हिन्दी के पाठक हमें मारने दौड़ेंगे ठीक वही हालात मेरी आज मेरे ही घर में हो रही थी।
इस कोरोना ने मुझे इस कदर लाचार बना दिया था कि अपना डर भी नहीं दिखा पा रहा था ।

एक दिन धौंस दिखाते हुए बोल ही दिया कि - ‘‘ तुम आजकल कुछ ज्यादा ही बोल रही हो ।’’ मैं काम पर चला जाऊँगा ।
उसने भी पलट के जबाब दे दिया वह रास्ता खुला है । किसी ने रास्ता बंद नहीं किया । हाँ ! सुनो घर में मत आना जब तक लॉकडाउन है । दो माह का राशन घर में है उसके बाद की, बाद में सोचेगें ।
मेरी तो बोलती ही मानो बंद ।

सारा धौंस एक सेकेण्ड में कपूर की तरह उड़ गया । चुप-चाप पलंग पर लेट गया और हाथ में मोबाइल लेकर अपना ध्यान दूसरी तरफ करने लगा ।
अरे यह क्या भारत में तो कल कोरोना के बारह हजार मामले थे आज पंद्रह हजार हो गए ? भीतर ही भीतर मरने वालों की संख्या की तरफ ध्यान देता हूँ । रूह कंपकपाने लगी । गला सुखने लगा । पानी का ग्लास हाथ में लिया और एक घुंट पानी पी कर आँखे बंद कर ली । तभी-

पत्नी ने फिर एक ताना कसा - ‘‘ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप का नाम तो सुने होंगे ? उनकी सारी हेकड़ी इस कोरोना ने निकाल के उसके हाथ में थमा दी ‘‘लो गिनो लाशों को बैठे-बैठे’’ ।
फिर कुछ रूक कर- "तुमको तो मसल के बिना नमक-तेल लगाये कच्चा निगल जायेगा यह चीनी  कोरोना ।"
वैसे भी सुनी हूँ कि चीनी लोग खाने के बड़े शौकीन होते हैं । सांप, छछूंदर, चमगादड़, कुत्ते, बिलार, चूहा यहाँ तक की तेलचटा, केकड़ा सब हजम कर जाते हैं।  तुम तो इसे देखकर ही डर जाते हो । इस कोरोना से बचना है तो चुप से घर में पड़े रहो । मेरी बात मानो तो अच्छा ना मानो तो भी अच्छा । हमें तो लाश भी नहीं देगी सरकार देखने । बाहर जाना है तो फोटो फ्रेम बनवाते जाओ ।
अब तक मेरे दिमाग ठिकाने पर आ चुके थे । सारी इंद्रियाँ चुस्त-दुरुस्त हो गई थी। लॉकडाउन के लड्डू कितने महँगे है समझ में आ चुका था। भाई ! मेरी सलाह मान लो आज ‘‘पत्नी देवो भव’’  का मंत्र ही हमारी रक्षा का एक मात्र सूत्र है । बस । आगे कुछ भी मत सोचो ।

रविवार, 19 अप्रैल 2020

कोविड-19 या हिन्दू-मुस्लिम ?

....शंभु चौधरी, कोलकाता ।

        19 अप्रैल 2020, कोलकाता (भारत): भारत के प्रधानमंत्री ने आज बहुत अच्छी बात कही कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सभी संप्रदाय के लोग एकजुट हो । ‘‘कोविड-19 जो किसी जाति, धर्म, रंग, पंथ, भाषा या सीमाओं को नहीं देखता। हमें एकता और भाईचारे को प्रधानता प्रदान करनी चाहिए।’’ साथ ही अंत में एक द्विअर्थी पंक्ति भी जोड़ दी।  "We are in this together : PM"  इसका अर्थ तो प्रधानमंत्री जी ही समझा सकते हैं कि उनके दिमाग में क्या चल रहा था इन शब्दों का चयन करते समय ? आम साधारण भाषा में तो इसका अर्थ यही लगाया जा सकता है। क्या सिर्फ कोरोना को लेकर ही हम एक हों बाकी विषय पर नहीं?

       
सब्जीवालों को भगवा झंडा लगा कर सब्जी बेचते
आजकल देश में एक साथ दो प्रकार की लड़ाई चल रही है पहली तो ‘कोविड-19’’ की लड़ाई तेजी से रफ्तार लेने लगी है। आजतक देश में कुल सोलह हजार से भी अधिक मामले सामने आ चुके हैं जैसे-जैसे जांच की रफ्तार तेज होगी इनकी संख्या एक लाख से भी ऊपर जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। जिसमें अब तक 519 लोगों ने अपनी जान गंवा दी है। राहत कि बात इतनी ही है कि इनमें स्वस्थ हो कर घर वापस लौटने वालों की संख्या 2310 है। जांच की रफ्तार जितनी मंद गति से चलेगी उतनी ही तेज गति से कोरोना भारत के गांव व कस्बों को अपनी चपेट में ले लेगा। बिहार जैसे राज्य जहाँ बाढ़ के पानी के आने का हर साल इंतजार रहता है अभी तक नीतीश कुमार जी की सरकार तिनके से घोड़े को घास खिला रहे हैं वहीं बंगाल, मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की सरकारों के तले से जमीन सरकती नजर आ रही है। दरअसल इन राज्य के नेताओं को कोरोना का रोना सिर्फ दिखावा लगता है। ऐसे राज्यों को सेना के हवाले कर देना चाहिये जिन-जिन राज्यों के मुख्यमंत्री असक्षम हो या जिनके पकड़ में नहीं है।
        
        देश में इन दिनों कोरोना की महामारी के बीच हिन्दू-मुस्लिम की महामारी भी तेजी से फैल चुकी है। घर-घर में इस बात को लेकर तनाव पैदा कर दिया गया है अब सब्जीवालों को भगवा झंडा लगा कर सब्जी बेचते आसानी से देखा जा सकता है। यह प्रधानमंत्री जी के उक्त बयान की भी पुष्टि करता है कि जहर किस कदर समाज में फैलाया गया है। चित्र देखें।

        आये दिन कभी किसी गैर भाजपाई राजनेताओं के नाम से अफवाहें फैलाना तो कभी पुराने वीडियों को नये ठंग से सांप्रदायिक जमा पहनाना मानो भारत सरकार से इनको अफवाहों को फैलाने का लाइसेंस मिल चुका है।। धडल्ले से आप इनको फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट करते देखें जा सकते है। 

        शुक्रवार [17.04.2020] की ही एक घटना है गत शुक्रवार को महाराष्ट्र के पालघर गांव के कासा पुलिस थाने के अन्र्तगत एक घटना घटी । स्थानीय कलेक्टर कैलास शिंदे के अनुसार, सुशील गिरि महाराज (35), चिकेन महाराज (70) और ड्राइवर नीलेश तेलगड़े (30) अपने किसी व्यक्ति के अंतिम संस्कार के लिए महाराष्ट्र से सूरत (गुजरात) जा रहे थे, लॉकडाउन की वजह से ये लोग गांव के रास्ते को चुन लिये थे ताकि रास्ते में कोई व्यवधान उत्पन्न ना हो जाए ।
इस घटना हिन्दू-मुस्लिम समझा जाय चुकि मरने वाले साधु-संत के वेश में थे ?
जब ये लोग पालघर गांव के एक ग्रामीण कस्बा गडचांचल से निकल रहे थे रात के लगभग 10 बजे उन्हें गांववालों ने पकड़ लिया । यह कस्बा आदिवासी बाहुल इलाका माना जाता है। मौके पर पुलिस भी पहुच चुकी थी ।  लॉकडाउन के मद्देनजर, पालघर जिले के ग्रामीण आदिवासी इलाकों में कई तरह की अफवाह फैल रही थी, जिसमें कुछ असामाजिक तत्व चोर, लुटेरे और अपहरणकर्ता वेश बदल कर गांव में आ सकते हैं बच्चों के चोरी की अफवाह उसमें से एक थी। आदीवासी ग्रामीणों ने इन तीनों पर संदेह के आधार पर धर दबोचा और पुलिस के सामने ही उन तीनों की सैकड़ों गांव वालों ने मिलकर उनकी हत्या कर दी। आरोपियों के खिलाफ कासा पुलिस स्टेशन में धारा  302, 120 (E) 427, 147, 148, 149/307, 353, 333, 323, 341 के तहत कुल तीन मामले दर्ज किए गए हैं। 110 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। उनमें से नौ 18 वर्ष से कम उम्र के हैं । यहां यह सोचने कि बात है कि सर्वप्रथम इस घटना हिन्दू-मुस्लिम समझा जाय चुकि मरने वाले साधु-संत के वेश में थे ? कि इसे साधारण मोबलांचिंग । दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह भी उठता है कि घटनास्थल के वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि वह साधु जिसकी उम्र लगभग 60-70 दिखती है बार-बार पुलिस को पकड़ कर खुद को बचाने की गुहार लगाता है। और घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मी बार-बार हट रहा है उससे खुद को अलग कर रहा है । इससे दो बात तो साफ हो जाती है कि मारनेवाले यदि एक बार हम मान भी ले कि सबके सब मुसलमान हैं जैसा कि अंधभक्त दावा कर रहें हैं। तो क्या महाराष्ट्र की पुलिस जो उस समय घटनास्थल पर दिख रही है वह भी मुसलमान ही थी क्या? जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है भारत सरकार उन लोगों का धर्म भी उजागर करे ताकि इस तरह की अफवाहों को विराम लगाया जा सके। -जयहिन्द।