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सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

सेकुलरवादी दल आई.एस.आई के एजेंट?

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके। ।

पिछले 27 अक्टूबर को पटना में आयोजित भाजपा की विशाल रैली जिसमें लगभग 5 से 6 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था इस दौरान पटना के रेलवे स्टेशन और गांधी मैदान के चारों तरफ सिलसिलेवार सात बम धमाके हुए। इन धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई, जबकि 100 से अधिक लोगों की घायल होन की सूचना मिली। दो लोग मौके से पकड़े जा चुके हैं। बोधगया के बाद बिहार में यह दूसरी और सबसे बड़ी आतंकी घटना है । गांधी मैदान में आयोजित इस विशाल रैली में भाजपा के नेताओं ने यदि थोड़ी सी भी चूक की होती या श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने भाषण में इन विस्फोटों का जिक्र किया होता तो भगदड़ मच जाती और इस भगदड़ में हजारों लोगों की जान पलकों में चली जाती । खैर! हम इस बात के लिए भाजपा नेताओं की दिलेरी और हिम्मत को सलाम करते हैं कि इतनी बड़ी बारदात को आंखों के सामने होते हुए भी मंच छोड़ कर नहीं भागे जैसा की कांग्रेसी सोच रहे हैं। संभवतः सेकुलरवादी दलों की मिलीभगत रही हागी किसी प्रकार इस रैली में भगदड़ मचा दिया जाए और फिर इस भगदड़ के बहाने देश की जनता को गुमराह कर अपनी-अपनी राजनीति रोटी पकाई जा सके।

मुज्जफ्फरनगर दंगों की आग को जिस प्रकार राहुल गांधी ने आग में घी डालने का प्रयास किया और देश के मुसलमानों पर शंका कर उन्हें अपमानित करने का प्रयास किय इससे भी इस बात की पूष्टी हो जाती हैं कि इस देश में सेकुलरवादी दल आईएसआई के एजेंट के रूप में कार्य कर रहें हैं। इंडियन मुजाहिदीन भारत में तेजी से अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा है । उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड में इस संगठन ने काफी सक्रियता से पांव फैलायें हैं। जिसको आंचलिक सेकुलरवादी दलों का संरक्षण भी प्राप्त है। अब कांग्रेसी भी इस संगठन को अपना संरक्षण देने का प्रयास कर आतंकवदियों के साथ सांठगांठ करने का प्रयास कर रही है। मुसलमानों के वोट को लेकर भारत में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है इससे यह तो स्पष्ट हो चुका है कि अब मुसलमानों को काफी सतर्क होने की आवश्यकता है । एक तरफ आईएसआई इनको भारत के खिलाफ भड़काने में लगी है तो दूसरी तरफ सेकुलरवादी दल इनको अपने-अपने पाले में लेने के लिए इनको हिन्दुओं के खिलाफ भडकाने में लगी है। जिसप्रकार इन दिनों राजनैतिक दलो द्वारा वोट की रजनीति के लिए सेकुलरवाद की परिभाषा का अलग-अलग अर्थ लगाया जा रहा है इससे आईएसआई मजबूत ही नहीं उनके समर्थकों का मनोबल भी बढ़ता जा रहा है। मानों ऐसा लग रहा है कि भारत में सेकुलरवादी राजनैतिक दल आईएसआई के पक्षधर बन चुकें है। मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के कारण समस्‍तीपुर, दरभंगा और मधुबनी जिला इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है! यूपी का 'आजमगढ़ मॉड्यूल' की जगह अब 'दरभंगा मॉड्यूल' और 'मधुबनी मॉड्यूल' सक्रिय हो गया है।

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम सत्ता की लालच में इस कदर अपनी जमीर बेच चुके हैं कि कोई कुछ भी कर जाए हमें कुछ नहीं फर्क पड़ता । आखिर देश बचेगा तब न राजनीति करोगो । भारत में आई.एस.आई के समर्थक नहीं चाहते कि भारत में कोई मजबूत प्रधानमंत्री बने जो उनको आंख दिखाकर बात करे और पाकिस्तानियों को भारत की भूमि से खदेर कर भगा देवे। ऐसे लोग चाहते है कि कोई ऐसा हरामजादा इस देश की सत्ता पर राज कर सके जो उनके कुत्तों को रोटी खिला सके।

सोमवार, 16 सितंबर 2013

गन्ने के खेत में वोट की खेती - शम्भु चौधरी

हे सूर्य ! जब-जब तेरा प्रताप डगमगाएगा,
दीपक की एक लौ से भी, अंधेरा मिट जायेगा ।
जिनको गुमान है सत्ता का, शाम ढलते ही डूब जायेगा ।

कहावत भी है कि ‘‘रोपे पेड़ बबुल के आम कहां से होय’’ हमलोग जैसा रोपेगें, सोचेगें वैसी ही फसल हमें काटने को मिलेगी । 27 अगस्त’ 13 की मामूली सी एक घटना ने सत्तारूढ़ दल के अहांकार को चूर-चूर कर रख दिया । वोट बैंक की राजनीति इनको इतनी मंहगी पड़ी की, जिसकी भरपाई करते-करते, कीमत चुकाते-चुकाते अखिलेश सरकार के दम फूलने लगे, फिर भी वे दंगे को रोकने में सफल नहीं हो सके ।

मुज़फ़्फ़रनगर कवाल गांव की घटना ना सिर्फ एक दुर्भाग्यजनक व दुखद घटना है । इस घटना ने सेकुलरवादी सत्तारूढ़ दल के चेहरे को बेनकाब कर दिया है । राजधर्म की दुहाई देने वाले सेकुलरवादी ताकतों को नंगा कर दिया । इसके लिए जिम्मेदार हम ही हैं । कहावत भी है कि ‘‘रोपे पेड़ बबुल के आम कहां से होय’’ हमलोग जैसा रोपेगें, सोचेगें वैसी ही फसल हमें काटने को मिलेगी । 27 अगस्त’ 13 की मामूली सी एक घटना ने सत्तारूढ़ दल के अहांकार को चूर-चूर कर रख दिया । वोट बैंक की राजनीति इनको इतनी मंहगी पड़ी की, जिसकी भरपाई करते-करते, कीमत चुकाते-चुकाते अखिलेश सरकार के दम फूलने लगे, फिर भी वे दंगे को रोकने में सफल नहीं हो सके । सेकुलरवाद की राजनीति करने वाले आजाम खान, कादिर राणा, सईद उर जमां, रासिद सिद्दकी, हरेन्द्र मलिक, राज्यपाल बाल्यान और राकेश टिकैत और सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले हुकुम सिंह, भारतेन्दु, संगीत सोम और साध्वी प्राची । सबके मुह में जहर भरा था, हर कोई खेत में लहलहाती गन्ने की फसल को काटने में लगा था, तो कोई इसमें आग लगाने में । किसी ने भी इस आग को रोकने की जिम्मेदारी नहीं निभाई ।

सत्ताधारी दल के सेकुलरवादी नेताओं ने जहर के बीज इस कदर रोपे की उसमें से सौंप ही सौंप निकलने लगे । मात्र सात दिनों में यह फसल मुज़फ़्फ़रनगर के आस-पास के गांवों में बलखाने लगी । सत्ता के नशे में चूर सेकुलरवादी नेताओं ने मामूली सी छेड़छाड़ की घटना को इतान जवान कर दिया कि देखते ही देखते वहाँ सेना को बुलानी पड़ी । जबतक एक समुदाय पर जुल्म ढहाया जाता रहा, उनके परिवारों व गांव के लोगों पर झूठे मामले गढ़ कर कवाल गांव के सैकड़ों अपराधियों को बचाने का प्रयास किया जाता रहा सबकुछ ठीक था । एक तरफ खालापुर में पंचायत कर लोगों जहन में ज़हर के बीज रोपे जा रहे थे ता दूसरी तरफ शाम को महापंचायत से लौटते निहते लोगों को घात लगा-लगा कर मारा गया, कई ट्रेक्टरों को आग के हवाले कर दिया गया कई लोगों को जान गंवा देनी पड़ी या वे घायल हो गए । जबतक सेकुलरवाद का ख़ौफ़ सर चढ़कर बोलता रहा और एक विशेष समुदाय के लोग मारे जाते रहे तब तक सरकार को कुछ भी पता नहीं चला कि उनकी नाक के नीचे क्या सब चल रहा है । चारों तरफ हा-हाकार की गुंज होने लगी । सुरक्षा के अभाव में मामला उलटा पड़ने लगा तब जाकर केन्द्र और राज्य सरकार हरकत में आई और तत्काल सेना को बुलाया गया । परिणाम सामने है । गन्ने के खेत में वोट की खेती, दोनों समुदाय पुस्तों से इस जमीन में गन्ने की खेती करते रहें हैं, अपनी बोली से समाज में मिठृठास घोलते रहें हैं, उनको चंद सियासतदानों ने सेकुलरवाद राजनीति की रोटी सेंकने के लिए उपजाऊ जमीन बना डाली । फसल तो 2014 के आगामी लोकसभा चुनाव में कटेगी । अब दिलचस्प देखना यह होगा कि यह फसल किसके पाले में जायेगी ? जयहिंद !

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिन्दू-मुसलमानों को बांटती ताकतें - शम्भु चौधरी

जब भी कोई दंगा होगा, कोई न कोई नंगा होगा,
हिन्दू-मुस्लिम ना हो भाई ऐसा ही कोई बंदा होगा।

देश के मुसलमानों को हिन्दूओं से दूरी बनाने के बदले उन्हें ऐसे अवसर तलाशने चाहिए कि जो दूरियाँ सेकुलरवादी ताकतों ने बना दी है उसे कैसे कम किया जा सके । हमें मिलकर दोनों समुदाय के बीच के बिचौलियों को हटाकर भारत के विकास व अपने बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित होने की जरूरत है। यह तभी संभव हो सकता है जब मुसलमान सेकुलरवादी ताकतों को उखाड़ फैंकने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दे तो पूरे राष्ट्र में उनके प्रति स्वतः सम्मान पैदा हो जाएगा ।

उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर की घटना ना सिर्फ एक दुर्भगयजनक व दुखद घटना है । यह घटना इस बात को प्रमाणित करने में सझम है कि सेकुलरवादी चौला पहनकर मुसलमानों को जो लोग मुर्ख बनाते रहें हैं दरअसल वे मुसलमानों की सुरक्षा के लिए नहीं, उनको हिन्दुओं से दूरी बनाये रखने के लिए है । उत्तरप्रदेश में यदि दोनों समुदाय के बीच सामाजिक ताने-बाने तौड़े ना जाते तो जिस छोटी सी घटना ने, जो कि भारतवर्ष में आम घटना मानी जाती है को लेकर इतना बड़ा नुकसान दोनों समुदाय को नहीं उठाना पड़ता । लगातार 10 दिनों तक शहर में तनाव बना रहा, जातीय व धार्मिक धूव्रीकरण आस-पास के गाँवों में होता रहा । इस बीच ना सिर्फ स्थानीय प्रशासन, लखनऊ भी सोता रहा । अब यही सेकुलरवादी ताकतें कभी इसके लिए जातीय संघर्ष की बात दौहराती है तो कभी इसके लिए सांप्रदायिक ताकतों को दंगा भड़काने के लिए जिम्मेदार मानती है । अर्थात दिल्ली में बैठी कांग्रेस की सेकुलरवादी सरकार और उत्तरप्रदेश की सेकुलरवादी सरकार हाथ पर हाथ धर कर तमाशा देखती रही । शायद यह सोचती रही होगी कि दंगे फैलने के बाद मुसलमानों को पुनः बहलाया या फुसलाया जा सकेगा । मानों मुसलमानों को ऐन-केन-प्रकारेण डराये रखना सेकुलरवादी ताकतों का उद्देश्य बन गया हो । ना सिर्फ उद्देश्य मुसलमानों को हिन्दूवादी विचारधारा से अलग करते हुए देश की सत्ता पर खुद को स्थापित कर सामाजिक सौहार्द को बांटे रखना ताकि दोनों समुदायों के बीच आपसी संवाद न बन सके ।

कुल मिलाकर हिन्दू और मुसलमानों के बीच आपसी संवाद के रूप में यह सेकुलरवादी ताकतें खुद को बिचौलिये के रूप में रखना चाहती है । देश आज परिवर्तन की तरफ जाने को बैताब हो रहा है। वहीं सेकुलरवादी ताकतें देश में दंगों की आड़ में पुनः मुसलमानों के वोट बैंक पर कब्जा जमाने की हौड़ में लगी है । इन सब के बीच कहीं मुसलमान मारा जा रहा है तो कहीं हिन्दू ।

सीयासी पार्टी सत्ता को प्राप्त करने के लिए अपने भ्रष्टाचार के कार्यकाल को मोदी बनाम सेकुलरवाद की तरफ ले जाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है । अचानक से देश के गृहमंत्रीजी का एक बयान आता है कि देश के कई राज्यों में दंगा होने की संभावना है । दरअसल देश में कोई दंगा-वंगा नहीं होने का यह इन लोगों की सोची समझी साजिस है कि इससे मुसलमानों के बड़े वर्ग को हिन्दूओं के विचारों से अलग-थलग कर ‘मोदी की लहर’ को किसी प्रकार से रोका जा सके ।

मुजफ्फरनगर की घटना ना सिर्फ मुसलमानों के लिए चिंता का विषय है, हिन्दुओं के परिवार भी कई गाँवों से पलायन कर चुके हैं । क्षति का पैमाना इतना बड़ा है कि इसे पाटने में कई साल लग सकते हैं । सामाजिक तानें-बानें बिखर से गए हैं । 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही दोनों समुदाय को आमने-सामने खड़ा कर दिया है । ऐसे में इन तथाकथित सेकुलरवादी ताकतों से सत्ता छीन कर मोदी के नेतृत्व में दोनों समुदायों को एक जुट होकर देश में एक नए वातावरण का निर्माण किया जाना चाहिए । यह अवसर ना सिर्फ देश के हित में होगा जो लोग सत्ता प्राप्त करने के लिए मुसलमानों को वोट बैंक समझते हैं उनको करारा तमाचा भी होगा ।

देश के मुसलमानों को हिन्दूओं से दूरी बनाने के बदले उन्हें ऐसे अवसर तलाशने चाहिए कि जो दूरियाँ सेकुलरवादी ताकतों ने बना दी है उसे कैसे कम किया जा सके । हमें मिलकर दोनों समुदाय के बीच के बिचौलियों को हटाकर भारत के विकास व अपने बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित होने की जरूरत है। यह तभी संभव हो सकता है जब मुसलमान सेकुलरवादी ताकतों को उखाड़ फैंकने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दे तो पूरे राष्ट्र में उनके प्रति स्वतः सम्मान पैदा हो जाएगा।


मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सेकुलरिज्म बनाम देश की सुरक्षा - शम्भु चौधरी

देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। जो लोग ऐसा सोचते हैं कि इससे उनको चुनावों में फायदा हो सकता है से भी स्पष्ट हो जाता है कि देश में पकिस्तानियों की संख्या भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बनती जा रही है। अर्थात सेकुलरवादी राजनेता देश की सुरक्षा के सौदागर बन चुके हैं।

जबसे भारतीय संविधान में सेकुलर शब्द को अंकित किया गया है तब से देश के भीतर पाकिस्तानी समर्थकों का मनोबल इतना ऊँचा हो गया है कि देश की सुरक्षा को भी खतरा मंडराने लगा है। पाकिस्तानी समर्थकों से आप जो भी अर्थ लगायें वह आपकी सोच हो सकती है। जहां तक मेरा मानना है कि जो लोग भारतीयता को नहीं स्वीकारते, भारतीय संस्कृति को अपनाने में जिनको अड़चनें आती हों। भारतीय सैनिकों की बलि पर जो लोग संसद के भीतर और बहार देश को गुमराह करते हों, जो लोग पकिस्तानियों को दोष मुक्त करार देने में जरा भी संकोच नहीं करते, भारतीय क्षेत्र में रहकर भारत के विरूद्ध साजिश करने में सहयोग प्रदान करना, आतंकवादियों व उन से जुड़ी घटनाओं की वकालत करना व देश की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ कर उन्हें भारतीय राजनीति का हिस्सा बनाना या बनाने का प्रयास करना यह सभी कारनामे देशद्रोही की श्रेणी में आते हैं। और इसके लिए खुद को सेकुलरवादी बताने वाले लोग ही जिम्मेदार हैं । यही सेकुलरवादी ना सिर्फ आतंकी घटनाओं के लिए देश में जगह-जगह होने वाले दंगों के लिए भी जिम्मेदार हैं।

इन दिनों देश की संसद व विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं में कुछ ऐसे तत्वों की भरमार सी हो चुकी है जो सेकुलरिजम के बहाने देश की सुरक्षा के खिलाफ न सिर्फ सार्वजनिक बयान देते पाये जाते हैं इन लोगों ने देश के सैनिकों के मनोबल को भी कमजोर करने का प्रयास किया है। इन सबके बीच देश का लोकतंत्र तमाशबीन बनकर रह गया। इस बात को लेकर भी हम आश्चर्यचकित हैं कि आखिर में हमारे सेकुलरवादी विचारधारा के झंडावाज नेतागण देश को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। इनका जमीर इस कदर समाप्त हो चुका कि ये लोग सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सुरक्षा तक को भी दाव में लगाने से बाज नहीं आते।

ऐसे नेताओं के विरूद्ध देशद्रोह का मामला बनाया जाना चाहिए जिससे इस तरह के बयानों से जिससे देश की सुरक्षा को खतरा बनता हो पर लगाम लगाया जा सके। देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। इससे उनको चुनावों में किसी विशेष समुदाय के वोटों का फायदा तो हो सकता है परन्तु कालान्तर में यही फायदा देश की संप्रभुता के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। जो लोग ऐसा सोचते हैं उनकी इन हरकतों से उनको या उनके दल का राजनीति फायदा होता है वे लोग देश के इतिहास को उठाकर देख लें कि इसके क्या परिणाम सामने हमें देखने को मिल रहें हैं। जैसे-जैसे सत्ता पर सांप्रदायिक ताकतों का पल्ला मजबूत होता जा रहा है देश में उतने ही तेजी से सांप्रदायिक तनाव फैलता जा रहा है। अब तो कई जगह खुले रूप में देश के विरूद्ध जहर तक उगलने लगे हैं।

यहाँ यह सवाल नहीं है कि किसी संप्रदाय या दल विशेष की बात हो या उनकी नीतियों को दोषी ठहराया जाए। सवाल है कि हम इन मुद्दों को लेकर देश को किस जगह ले जाने का प्रयास कर रहें हैं इससे किसको फायदा होने वाला है। जो लोग भारतीयता को स्वीकार नहीं कर पा रहे उनको हम भारतीय राजनीति में जगह देकर ना सिर्फ खुद को कमजोर करने का प्रयास कर रहें हैं अन्ततः इसका परिणाम सभी राजनैतिक दलों को झेलना पड़ सकता हैं । उस समय आज कि इस राजनीति के परिणाम कितने घातक होगें इसकी कल्पना मात्र से देश की रूह कांप जाऐगी। सभी राजनीति दलों को इस सेकुलरवादी विचारधारा के परिणामों पर ना सिर्फ पुनः सोचने की जरूरत है। भारतीय राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता को प्राप्त करना नहीं, भारतीय संस्कृति की रक्षा भी होना जरूरी है। ताकी सभी धर्म के लोग आपसी भाई-चारे के साथ रह कर अपने-अपने समाज का विकास कर सकें।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।