रविवार, 7 मार्च 2010

समीक्षा: शमोइल एहमद की इक्कीस श्रेठ कहानियां


शमोइल एहमद की कहानियां पढ़ने का ‘ दुर्भाग्य’ मेरे ऊपर न जाने कैसे सवार हो गया। डायमंड प्रकाशन से प्रकाशित उनकी २७ कहानियों का संकलन मेरे हाथ में आ गया और मैं एक के बाद एक कहानी इस आस में झेलती गयी कि शायद अब अगली कोई कहानी अच्छी निकल आए, पर वहाँ तो सारी कहानिया औरत से शुरू होकर बिस्तर पर खत्म होती रही। मैंने व्यर्थ ही अपनी आँखें फोड़ी, घटिया कहानी पढ़कर। मुझे ताज्जुब है कि इस आदमी के ज़हन में औरत, उसके जिस्म और सैक्स के अलावा और कुछ है ही नहीं और वही सब जनाब की कहानियों में भरा पड़ा है। बात ये नहीं कि औरत पर कहानी लिखना निषिद्ध है पर औरत में जिस्म के अलावा गहन सोच विचार और सघन भावनाएं और संवेदनाएं भी होती हैं। अनेक क्षमताएं, विविध गुण और प्रतिभाएं भी कूट कूट के भरी होती हैं। वे तो इन जनाब को शायद कभी दिखी ही नहीं। दिखती भी कैसे जब इनकी रुचि ही सिर्फ जिस्म में है। अंदर तक औरत को कभी खंगाल कर इन्होंने देखा ही नहीं, बस ऊपर से उसकी देह ही टटोलते रहे। इसलिए कहानियां भी सतही बन पड़ी हैं। न कहानी संरचना का उचित रूप आकार है, न मानवीय भावनाएं, संवेदनाएं हैं, न कहीं पात्रों का अन्तर्द्वन्द है और न भाषा दिल और आत्मा को छूती है। कहानी शिल्प से तो शमोइल एहमद अनजान लगते हैं। ऐसी कहानियां तो विकृत मनोवृति के व सीखतड़ लोग लिखा करते हैं।
आजकल हर कोई कलम पकड़ कर पन्ने काले किया करता है जैसे कि ये महाशय कर रहें हैं। जैसे आज का हर दूसरा लड़का और लड़की फिल्म स्टार बनना चाहता है, भले ही सूरत और प्रतिभा के नाम पर राखी सावंत और इमरान हाशमी की तरह हो। ठीक इसी तरह हर इंसान ‘रचनाकार’ बनना चाहता है, भले ही उसमें लेखन प्रतिभा हो या न हो। यदि गलती से वह एक दो प्रतिनिधि पत्रिकाओं में सिर्फ एक या दो बार छप जाए, तो वह अपने को रातोंरात यशस्वी लेखक मानने लगता है। आत्म मुग्धता की स्थिति में जीता है।खैर, लिखने वाले को अपना जजमेंट करने का कोई अधिकार नहीं होता। यह काम तो ‘’साधारण व बुद्धिजीवी’’ दोनों तरह के पाठकों का होता है। मैंने शमोइल एहमद की कहानियां पढकर अपने मित्रों को दी, ये सोच कर कि कहीं मुझे ही खराब लग रहीं हों कहानियां। लेकिन उन सबने भी कहानियों को सामान स्वर से ‘’भूसा ‘’ कहते हुए मेरी प्रतिक्रिया को सही सिद्ध किया। मैं और मेरे समस्त पाठक मित्र शमोइल एहमद की कहानियों को पढकर बेहद - बेहद निराश हुए।
जनाब से गुजारिश है कि या तो वे कहानियां लिखना छोड़ दे या फिर किसी से मार्गदर्शन लें पर यूं लेखन जैसे उद्दात व उत्तम कार्य का अपमान न करें।


रितिका एवं साथी मित्र

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