हमारा लक्ष्य है जनता के हित में कार्य हो। हमारी पूंजी महज पांच रुपये की कलम है । ना तो हम मोदी जी के जैसे खान-पान कर सकते हैं ना ही कपड़े पहनने की कल्पना भी कर सकते हैं, ना ही राहुल गांधी की तरह हमें विरासत में राजगद्दी मिल सकती है। हम जनता के बीच से निकलते हैं और उनके बीच ही समा जाना पसंद करते हैं।
गुरुवार, 23 मई 2019
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती -
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:31 am 0 विचार मंच
Labels: चुनाव, चुनाव-2019
मंगलवार, 21 मई 2019
चुनाव आयोग की नियत पर खोट?
चुनाव आयोग भी रूल 49MA के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर राजनीति दल को जाने पर क्या करना होगा इसकी व्यवस्था की है। परन्तु जिन-जिन जगहों से ऐसी शिकायतें आई उसे दबाने का काम आयोग की भूमिका पर फिर एक नया प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:53 am 0 विचार मंच
Labels: चुनाव, चुनाव आयोग, चुनाव-2019
रविवार, 19 मई 2019
‘‘एक्जिट पोल’’ - अपना-अपना तुका
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 12:13 pm 0 विचार मंच
Labels: एक्जिट पोल, गोदी, चुनाव
बुधवार, 15 मई 2019
17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग
"2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था। जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे"
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं। - शंभु चौधरी
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:22 pm 0 विचार मंच
Labels: कांग्रेस पार्टी, चुनाव, चुनाव आयोग, चुनाव-2019, लोकसभा
रविवार, 17 नवंबर 2013
माकपा : खुद के पांव पर खुद की कुल्हाड़ी - शम्भु चौधरी
पुनः 2014 में लोकसभा के चुनाव आने हैं। बंगाल के एक वरिष्ठ नेता श्री गौतम देव का बयान ने सबको चौंका दिया है आपकी बात मानी जाए तो माकपा चाहती है कि भाजपा से लड़ने के लिए माकपा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन होना जरूरी है।। माकपा इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है कहती है कि यदि भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो देश टूट जायेगा? अब इनको कौन समझाये कि देश टूटेगा की नहीं हां! इनकी फ़ज़ीहत जरूर हो जानी है। जो पार्टी खुद के पांव पर ही नहीं खड़ी हो सकती वह जब खुद के पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाये तो कोई इनको कैसे बचायेगा?
मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्टी अर्थात माकपा एक समय में बंगाल में लगातार 25 साल एक छत्र राज किया। स्व. ज्योति बसु के नेतृत्व में इस पार्टी ने कांग्रेस का बंगाल से सफाया कर दिया था। कांग्रेस पार्टी बंगाल में हमेशा से माकपा की ‘बी’ टीम कहलाती रही और माकपा पार्टी केन्द्र में कांग्रेस पार्टी की ‘बी’ बनकर केन्द्र का लुत्फ़ उठाती रही। यह सांप-छुछुंदर का खेल आपस में कई सालों तक चलता रहा। जब बंगाल का चुनाव आता तो माकपा जम कर कांग्रेस पार्टी को गाली देती और अपनी हर असफलता का ठीकरा केन्द्र पर फोड़ती नहीं थकती और जैसे ही केन्द्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस को संसद में बहुमत की जरूरत होती यह मुंह चुरा कर समझौता कर लेती। कभी सामने के दरवाजे से तो कभी पीछे के दरवाजे से।
लेकिन जैसे ही न्यूक्लियर रियेक्टर डील पर संसद में मतदान की बात आई तो माकपा तिलमिला उठी, प्रश्न था अमेरिका को समर्थन देना का जो इनके सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था। साथ ही इनके माकपा महासचिव प्रकाश करात जी चाहते थे कि वे कांग्रेस को ठेंगा दिखा कर खुद के बल पर बंगाल में राजनीति करने में सफल रहेंगें । माकपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पहली बार माकपा के मूलभूत सिद्धांतों से अलग हटकर पुंजीपतियों के साथ मिलना शुरू कर दिये थे। बंगाल में नये उद्योग लगाने के कवायद शुरू कर दी।
सिंगुर में टाटा का नैनो कारखाना लाने की भरसक प्रयास किया गया। जमीन अधिग्रहण की राजनीति ने ममता बनर्जी को जहां राजनैतिक फसल काटने का अवसर दिया वहीं पिछले 30-35 सालों से जुड़े मजदूर संगठन धीरे-धीरे इनसे किनारा लेते गए। स्वभाव से विपरीत का समझौता इन संगठनों को रास नहीं आ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के अच्छे प्रदर्शन के बावजूद बंगाल से माकपा का सफाया हो गया।
माकपा का देश हित किस सिद्धांत पर चलता है इनकी बातों से कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता। मजदूरों के छोटे-छोटे संगठन बनाना और उनके बल पर सत्ता की राजनीति करना इनका प्रमुख और एक मात्र लक्ष्य रहता है। परन्तु जब मजदूरों की हितों के रक्षा की बात आती है तो ये लोग अपनी रोटी सेंकने में लग जाते हैं, परिणाम स्वरूप हजारों मजदूरों का परिवार सड़कों पर भीख मांगने के कगार पर खड़ा हो जाता है। इसके कई उदाहरण आपको बंगाल में देखने को मिल जायेंगे।
लगातार 25 साल से इस दल ने कांग्रेस के साथ मिलकर जनता के साथ आँख मिचौली खेलते रहे। इनका पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व आपस में तलाक हो गया तो दुश्मनी भी बराबरी की करनी थी, सो कांग्रेस पार्टी ने माकपा पार्टी की कट्टर विरोधी तृणमूल नेत्री सूश्री ममता बनर्जी का दामन थाम लिया। माकपा का बंगाल से सिर्फ लोकसभा की सीटों से ही नहीं, विधानसभा की सीटों से भी सफाया हो गया। माकपा का गढ़ देखते ही देखते बालू के टीले की तरह ढह गया । इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी को बड़ी राहत मिली। लोकसभा के चुनाव में उसने भी ममता के सहयोग से कुछ सीट बंगाल में लेने में सफलता प्राप्त कर ली ।
इस बीच तृणमूल पार्टी के द्वारा कांग्रेस से मोह भंग होते ही माकपा को पुनः बंगाल में मौका तलाशने में लग गई। बंगाल में खोई जमीन को पुनः पाने के प्रयास में माकपा चाहती है कि कांग्रेस पार्टी का दामन किसी बहाने ही सही पुनः थाम लिया जाए । अब जब कांग्रेस पार्टी की नैया देश में डूबने के कगार पर खड़ी है तो डूबती नैया पर माकपा खुद को सवार कर बची-खुची भी इज़्ज़त भी समाप्त कर लेना चाहती है।
पुनः 2014 में लोकसभा के चुनाव आने हैं। बंगाल के एक वरिष्ठ नेता श्री गौतम देव का बयान ने सबको चौंका दिया है आपकी बात मानी जाए तो माकपा चाहती है कि भाजपा से लड़ने के लिए माकपा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन होना जरूरी है।। माकपा इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है कहती है कि यदि भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो देश टूट जायेगा? अब इनको कौन समझाये कि देश टूटेगा की नहीं हां! इनकी फ़ज़ीहत जरूर हो जानी है। जो पार्टी खुद के पांव पर ही नहीं खड़ी हो सकती वह जब खुद के पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाये तो कोई इनको कैसे बचायेगा?
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:40 pm 1 विचार मंच
Labels: चुनाव, शंभु चौधरी, CPM
बुधवार, 19 अक्टूबर 2011
‘राइट टू रिजेक्ट’ एवं ‘राइट टू रिकॉल’
कोलकाता: 20 अक्टूबर 2011
विश्व की निगाहें भारत के इस बहस पर लगी हुई है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में श्री अण्णा हजारे ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ‘राइट टू रिजेक्ट’ एवं ‘राइट टू रिकॉल’ अर्थात चुनाव संबंधी प्रावधानों में जरूरी संषोधन किए जाने की। जिससे मतदान की प्रक्रिया के समय ही मतदाता सभी उम्मीदवारों को यदि अस्वीकार कर दे तो ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पुनः नये उम्मीदवारों को सामने आने का अवसर प्रदान कर सकती है। इसी प्रकार चुने जाने के बाद जो सांसद या विधायक अपने क्षेत्र में विकास के कार्य न कर रौबदारी या भ्रष्टाचार में संलिप्त पाया जाता हो, ऐसे सदस्यों को जनता पुनः वापस बुला सके।
पिछले दिनों रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर श्री अण्णा हजारे जी का अनशन को सारी दुनिया ने देखा। विश्वभर में श्री अण्णाजी के समर्थन में लोगों ने अपनी राय रखी। दो कदम आगे-दो कदम पीछे करने वाली सियासी पार्टियों ने भी आखिरकार श्री अण्णा की बातों पर अपनी मोहर लगा दी। आखिर हमें किसी व्यक्ति पर टिप्पणी करने से पहले यह तो सोचना ही पड़ेगा कि क्या सिर्फ जब श्री अण्णा हजारे ही सोचेगें तब ही हमारे देश की संसद सक्रिय होगी अन्यथा वह उसी निरसता के साथ देश के चुने हुए सांसद अपनी धौंस जमाते रहेंगें कि वे ‘चुन कर आयें हैं।’ मानो देश चलाने या लूटने का एक प्रकार से इनको जनता ने लाइसेंस दे दिया हो अब जनता चुपचाप पांच साल अपने घरों में ताला लगा कर बैठ जाए? हमें इन सभी बिन्दुओं पर खुलकर सोचने की जरूरत है।
देश के जिम्मेदार कई संपादकों ने पिछले दिनों हिसार में हुए लोकसभा सीट के चुनाव पर श्री अण्णा हजारे टीम पर अपनी कलमें धिसने का कोई अवसर चुकने नहीं दिया। मौका भी था चुनाव में राजनीति तो करनी ही चाहिए। परन्तु लोकतंत्र का चौथा खंभा भी राजनीतिज्ञों का मोहरा बन जाए तो इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जा सकता है। एक पत्रकार मित्र ने लिखा कि यदि कांग्रेस को वोट न दें तो श्री अण्णाजी को यह भी बताना चाहिए कि किसको वोट दें? हम उनसे ही जानना चाहतें हैं कि जब बुखारी साहब जामा मस्जिद से फतुआ जारी करते हैं उस समय इनकी कलम किस पान की दुकान पर ‘मुजरा’ देखने चली जाती है? या उस समय सियासतदानों की सोच किस कसाईखाने की दुकान पर हलाल होने के लिए तैयार खड़ी दिखती है? हमारे जिन मित्रों को बोलने या लिखने का पैसा मिलता है उनकी बात तो मुझे भी समझ आती है परन्तु जिनकी कलम आजाद परिन्दें की तरह स्वतंत्र अकाश में गोता लगाती है उनकी सोच को जब लकवा मार जाए तो हमें कुछ सोचने को मजबूर तो कर ही देती है।
आज जो कुछ भी लिखा या पढ़ा जा रहा है यह भविष्य में हमें आज की घटनाओं की याद दिलाएगी। आजादी के बाद देश में इतनी बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी एवं युवा वर्ग एक साथ सामने आकर देश में सूरसा की तरह फैलती जा रही एड्स बीमारी (भ्रष्टाचार) को रोकने/कम करने के लिए कार्य कर रही है। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी कलम की रूख को भी ईमानदारी से उसकी दिशा तय करने दें। गंगा में प्रदूषण फैलाने से हमारी आने वाली पौध को बहुत क्षति हाने वाली है, वेवजह इस जल प्रवाह में अपनी दखलदांजी न करें। हाँ! जो सच है उस पर अपनी बेबाक राय अवश्य देनी ही चाहिए।
आज देश के सामने नई पहल पर बहस होनी शुरू हो गई चुनाव आयोग से लेकर प्रायः सभी राजनैतिक दलों के अलग-अलग प्रतिनिधि ‘राइट टू रिजेक्ट’ एवं ‘राइट टू रिकॉल’ पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाओं व चिन्ताओं से देश को अवगत करा रहें हैं। देश के युवाओं में भी इस बहस में अच्छी रुचि देखी जा रही है। विदेशों में कई देश के युवा वर्ग अपने-अपने देश में इस व्यवस्था को लागू करवाना चाह रहें हैं ऐसे में भारत की तरफ तमाम विश्व की नजर टिकी है कि हम इस बहस का कौन सा समाधान निकालने जा रहे हैं।
जहाँ तक अभी तक के तमाम विचारों को जानने का अवसर मुझे मिला जिसमें किसी व्यक्ति विशेष का नाम लिखना उचित नहीं प्रतीत होता ‘राइट टू रिजेक्ट’ का समाधान सभी को आसान लगता है जबकि ‘राइट टू रिकॉल’ पर बहुत सारी आशंकाएँ चुनाव आयोग सहित देश के एक बुद्धिजीवी वर्ग ने जताई है।
‘राइट टू रिजेक्ट’:
जहाँ तक मैं समझता हूँ कि ‘राइट टू रिजेक्ट’ को जितना हम आसान समझ रहे हैं जबकि चुनाव आयोग के लिए यह एक पैचिदा भरा निर्णय होगा। एक तरफ तो हमारा संविधान देश के प्रत्येक नागरिकों को चुनाव लड़ने का अधिकार देती है तो दूसरी तरफ हम जनता को यह अधिकार भी दे दें कि वह उनको ‘रिजेक्ट’ कर सकती है तो क्या दोबारा इसी उम्मीदवार को किसी दूसरे चुनाव क्षेत्र से संसद या विधानसभा में नहीं भेजा जा सकता? या फिर पुनः वही उम्मीदवार उसी सीट से चुनाव लड़कर जीत गया तो इसका क्या अर्थ निकाला जाएगा?
‘राइट टू रिकॉल’:
इस विषय पर प्रायः एक सी बात सामने आ रही है कि चुनाव आयोग इसमें उलझ कर रह जाएगा। जबकि इस समस्या का सीधा समाधान है। हम ‘राइट टू रिकॉल’ को चुनाव आयोग से अलग कर दें। जिस प्रकार हम किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त या ससपेंड करते हैं अथवा महा-न्यायाधीशों पर महा-अभियोग लगाकर उनको न्यायिक प्रक्रियाओं से अलग किया जाता रहा है हमें इस समस्या को भी इन्हीं प्रक्रियाओं के तहत गुजारना होगा। वर्तमान में हम नैतिक आधार पर उनका मंत्री पद तो छिन लेते हैं परन्तु उनकी सदस्यता बनी रहती है। कई बार ऐसे सदस्यों को सरकार ब्लैकमेल कर अपने पक्ष में संसद/विधान सभाओं में मतदान कराने के मामले भी उजागर हुए हैं। अतः जब हम संसद में भ्रष्टाचार के मामले पर एक लम्बी बहस कर ही रहें हैं तो इसी में ऐसे सदस्यों पर महा-अभियोग लाने का भी प्रावधान कर दिया जाना चाहिए ताकी देश के खजाने को लूटने वाले चन्द राजनेताओं को यह अंदेशा बना रहे कि उनकी राजनीति अब समाप्त होने वाली है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:36 pm 0 विचार मंच
Labels: ‘राइट टू रिकॉल’, ‘राइट टू रिजेक्ट’, इलेक्शन, चुनाव, शंभु चौधरी, शम्भु चौधरी

