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गुरुवार, 23 मई 2019

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती -

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती -

स्व. हरिवंशराय बच्चन  जी की एक कविता का जिक्र करते हुए आज फिर से अपनी बात रखूगां। 
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती ।

हमारा लक्ष्य है जनता के हित में कार्य हो। हमारी पूंजी महज पांच रुपये की कलम है । ना तो हम मोदी जी के जैसे खान-पान कर सकते हैं ना ही कपड़े पहनने की कल्पना भी कर सकते हैं, ना ही राहुल गांधी की तरह हमें विरासत में राजगद्दी मिल सकती है। हम जनता के बीच से निकलते हैं और उनके बीच ही समा जाना पसंद करते हैं।   

2019 : 17वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम एक तरफ विपक्षी पार्टियों  की उम्मीदों पर पानी फेर दिया तो वहीं मोदी समर्थकों खेमे में ख़ुशियाँ बिखेर दी। इस बात को स्वीकार करने में मुझे जरा भी संकोच नहीं है कि कल तक मैं भी "गोदी मीडिया" के एक्ज़िट पाल को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। देश के प्रायः सभी राजनीतिक पंडित कहे जाने वाले पत्रकारों के लिए उत्तरप्रदेश में महागठबंधन की असफलता, बिहार के सुसाशन बाबू की सफलता,  बंगाल में भाजपा को ऐतिहासिक जीत और आंध्रप्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की हार, इस लोकसभा  चुनाव में चौंका देने वाले माने जायेंगे।


लोकतंत्र में इस बात को जो नहीं स्वीकार करता कि उसकी हार हो चुकी है उसे या तो लोकतंत्र में आस्था नहीं है या फिर वह व्यक्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने ताजा संदेश में कहा कि ‘‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’’ वहीं विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि ‘‘यह दो अलग-अलग विचारधारा की लड़ाई है। हमें मानना पड़ेगा कि मोदी जी जीते हैं। इसलिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। ’’  दो माह के तनावपूर्ण चुनावी यात्रा, कड़वाहट भरे बयानों के पश्चात नेताओं के सकारात्मक बयान ही हमारी जीत है।



आज इस बात की चर्चा करना कि चुनाव में क्या हुआ या क्या कहा गया या क्या लिखा गया इससे मीडिया को भी ऊपर उठना होगा। स्वाभाविक तौर पर हम बुद्धिजीवी वर्ग में खुद को मानते हैं। हमारे बीच भी विचारों की लड़ाई चलनी ही चाहिये। यदि पत्रकारों के बीच भी विचारों की शून्यता आ जायेगी तो फिर बचेगा ही क्या? 



हमें अपने कार्य को पुनः सजगता के साथ करने की जरूरत है बिना किसी राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित होकर नई ताजगी, नई ऊर्जा, नए जोश के साथ अपने पिच पर पुनः डट जाना चाहिये। समीक्षा के लिए हमारे पास फिर से नये पांच साल हैं, वह भी पिछले पांच सालों के आंकड़ों के साथ । हमारा लक्ष्य है जनता के हित में कार्य हो। हमारी पूंजी महज पांच रुपये की कलम है । ना तो हम मोदी जी के जैसे खान-पान कर सकते हैं ना ही कपड़े पहनने की कल्पना भी कर सकते हैं, ना ही राहुल गांधी की तरह हमें विरासत में राजगद्दी मिल सकती है। हम जनता के बीच से निकलते हैं और उनके बीच ही समा जाना पसंद करते हैं। पत्रकार का जीवन पुण्य प्रसून बाजपेयी से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। उनको लगातार परेशान किया गया एक नही, दो, दो नहीं तीन-तीन चैनलों से लगातार उनको हटा दिया गया। उनकी बेचैनी का अंदाज सिर्फ लगा लें कि यदि आने वाले दिनों में यही हाल हमारे साथ हो तो क्या करेगें हम? हम गुलाम तो हो ही चुके हैं अब क्या अपने विचारों को भी गुलाम बना दें?

किसी राजसत्ता के अधीन गुलाम होना और उनकी गुलामी करना यह एक बात है पर विचारों को भी गुलाम बना देना तो जानवर बन के जीने के बराबर है। मैं यहां सिर्फ इस तर्क को समझाने के लिये यहां ‘‘मंगल पाण्डेय’’ का उदाहरण दे रहा हूँ। मंगल पाण्डेय ब्रितानी हकुमत के गुलाम सिपाही थे, परन्तु उनके विचार स्वतंत्र थे, तभी उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की। यदि उनके विचार भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े होते तो? आपके विवेक पर छोड़ता हूँ। कुछ देर सोचियेगा।



उनके (पुण्य प्रसून बाजपेयी) यूट्यूब पर जो वीडियो सुनने को हमें लगातार मिल रहे थे उससे उनके चेहरे के भाव को हम यदि नहीं पढ़ पा रहे थे तो हमें पत्रकार नहीं होना चाहिये। संभवतः ऐसे कई पत्रकार होंगे, मेरी अज्ञानता के कारण उनके नामों को इस लेख में नहीं जोड़ पा रहा हूँ पर उनके दर्द को, हम महसूस नहीं करेंगें तो, हमारे दर्द को कौन करेगा? सत्ता में कौन आयेगा या जाएगा यह हमारे विचारों को यदि प्रभावित करता हो तो हमें इसी वक्त पत्रकारिता के पेशे को त्याग कर राजनीति से जुड़ जाना चाहिये। कई पत्रकार ऐसा कर चुके हैं। करने में कोई हर्ज भी नहीं हैं वे ईमानदार हैं कम से कम जनता को धोखा तो नहीं दे रहे।

ताज़ा उदाहरण आशुतोष का ही हमारे सामने है उन्होंने पत्रकारिता को छोड़कर राजनीति स्वीकार कर ली, पर उनके विचारों में वह तनाव था जो वे राजनीति ज्वाईन करने के बाद उनके अंदर देखा गया था । आज उन्होंने राजनीति को छोड़ पुनः पत्रकारिता को स्वीकार कर लिया। उनकी साख में कोई आंच नहीं आ सकती। उन्होंने जो कुछ भी किया ईमानदारी से किया।

हम किसी विचारधारा के ना तो कभी समर्थक रहें है ना ही किसी विचारधारा के विरोधी। हम एक स्वाद टेस्टर के रूप में अपना काम पहले की तरह आज भी करते रहेगें। चाय का स्वाद यदि मीठा होगा तो हम नमकीन कैसे बोल दें? हम किसी के समर्थक या भक्त तो नहीं बन सकतें। पत्रकारिता का एक मात्र धर्म है सत्ताधारी दल के कार्यों की लगातार समीक्षा करते रहना। विरोध पक्ष की बातों को बिना भेदभाव के सामने रखना। अपने विचारों का तड़का ना लगाते हुए रोजाना सूर्य की तरह उगना, चमकना, धहकना, फिर शाम होते-होते ढल जाना। 


वहीं संपादक की अलग भूमिका होती है, पत्रकारों की अलग। संपादक का कार्य है विचारों को प्रतिनिधित्व करना, भले वह सत्ता पक्ष को हो या प्रतिपक्ष का, जनता का हो या समाचार पत्र का। पत्रकारों को अपने विचारों में किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करना चाहिये यदि वह ऐसा करते है तो उसके विचार हमेशा विवाद ही पैदा करेगें। कभी मेरी बात पर आप गौर करियेगा। जयहिन्द।

लेखक स्वतंत्र  व  पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी  

बुधवार, 22 मई 2019

चुनाव आयोग: दाल में काला

चुनाव आयोग: दाल में काला  
किसी भी विषय के शोध में उसकी समस्या का निदान ही शोधकर्ता के लिये प्रमुख माना जाता है। कहा जाता है कि समस्या को ठीक से समझ लेना ही उसका आधा हल माना जाता है। कई बार समस्याओं को हम खुद की नाकामियों को छुपाने के लिए भयानक बना देते हैं या फिर समस्या को समझते-बुझते हुए भी कुछ ऐसी हरकतें करते हैं कि समस्या को सुलझाने की जगह और विकराल बना देते हैं। आज के चुनाव आयोग के अपरिपक्व के इस निर्णय के कारण ही कल का दिन पूरे देश के लिए तनावपूर्ण होनेवाला है। 

चुनाव समाप्त होते ही जिसप्रकार से मीडिया में ‘‘एक्जिट पोल’’ आने लगे उससे विपक्ष में स्वभाविक रूप से खलबली का माहौल बनना था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेदेपा प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू लगातार विपक्ष के सभी नेताओं से मिलकर एकजूट करने का प्रयास चुनाव से पूर्व भी करते रहे और चुनाव के सामाप्त होते ही पुनः सक्रिय हो गए। दिल्ली में सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल, उत्तरप्रदेश में मायावती-अखिलेश से और बंगाल आकर ममता बनर्जी से भी मुलाकात की। 


कल 22 दल के नेताओं ने एक साथ मिलकर चुनाव आयोग से अपील की थी कि वे लोकसभा के चुनाव में उच्चतम अदालत के निर्णय के अनुसार प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आनेवाले सभी विधानसभा क्षेत्रों के पांच-पांच ईवीएम मशीनों के वीवीपेट पर्ची की गिनती शुरू होने से पहले कराये ताकि इस बात का मिलान हो सके कि  ‘‘ईवीएम मशीनों’’ से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ नहीं की गई है। परन्तु चुनाव आयोग इस बात को मानने को तैयार नहीं है।


आज एक साथ दो खबरें आई - 
पहला- की देश में पहली वार केन्द सरकार की तरफ से मतगणना के दिन संभावित हिंसा को देखते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को अलर्ट जारी किया है। गृह मंत्रालय की तरफ से  राज्य के मुख्य सचिवों और डीजीपी को इस संबंध में सचेत करते हुए कहा गया है कि वे किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रहे । 
दूसरा- भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का अलग बयान आता है कि उनके नेता भी स्ट्रांग रूम के पास सतर्क रहें। खास कर ओड़िसा और बंगाल के लिए अलग से निर्देश जारी किये गए । सवाल उठता है कि ऐसा कौन सा पहाड़ कल टूटने वाला है या सुनामी आने वाली है जिसके लिये अचानक से कल तक जो चुनाव में जीत की निश्चिंत होकर कमाऊ की गुफा में ध्यान करने चले गये थे। एक तरफ विपक्षी खेमा परेशान था तो मोदी खेमे में पार्टी चल रही थी । आज अचानक से यह सब परिवर्तन क्यों ?

किसी भी विषय के शोध में उसकी समस्या का निदान ही शोधकर्ता के लिये प्रमुख माना जाता है। कहा जाता है कि समस्या को ठीक से समझ लेना ही उसका आधा हल माना जाता है। कई बार समस्याओं को हम खुद की नाकामियों को छुपाने के लिए भयानक बना देते हैं या फिर समस्या को समझते-बुझते हुए भी कुछ ऐसी हरकतें करते हैं कि समस्या को सुलझाने की जगह और विकराल बना देते हैं। आज के चुनाव आयोग के अपरिपक्व के इस निर्णय के कारण ही कल का दिन पूरे देश के लिए तनावपूर्ण होनेवाला है।
इससे पहले की आगे की बात करेे हम निम्न बातों पर गौर करें।
1. प्रधानमंत्री मोदी जी का मीडिया दर्शन के समय "फाटकेबाजों" की बात उनके श्रीमुख से निकलना।
2. चुनाव समाप्त होते ही 19 मई की शाम को विभिन्न मीडिया हाऊसेस की तरफ से ‘‘एक्जिट पोल’’ जारी करना, जिसमें एनडीए को 300 से लेकर 350 सीटें आने की संभावना जतायी गई।
3. 19 मई से 21 मई अमित शाह चुप रहे पार्टी मनाते रहे।
4. 22 मई को जैसे ही चुनाव आयोग का फैसला सामने आता है कि पांच वीवीपेट की पर्ची- प्रति विधानसभा की गिनती पहले नहीं की जायेगी
5. केन्द्र सरकार के साथ-साथ मोदी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी सतर्क जारी करने लगे।


 इन पाचों बातों का एक दूसरे चौली-दामन का रिश्ता है। मोदीजी के द्वारा फाटकेबाजी की बात कहना, ‘‘एक्जिट पोल’’ में एनडीए को 300 से लेकर 350 सीटें आने की संभावना व्यक्त करना, उत्तरप्रदेश में मायावती व अखिलेश के महागठबंधन को अनुमान से कम सीटें देना, बंगाल में एनडीए को अनुमान से अधिक सीटें देना, बिहार में अनुमान से अधिक सीटों का आना, जो पूरे देश में चिन्ता का विषय है कि क्या कहीं ईवीएम से छेड़छाड़ तो नहीं हो रही। इसके साथ ही ट्रकों में ईवीएम मशीनों का पकड़ा जाना, स्ट्रोंग रूम की सुरक्षा को लेकर जगह-जगह से असंतोष का होना, भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के द्वारा अपनी चिंता सार्वजनिक करना व तमाम विपक्षी दलों की बात का दरकिनार करना और चुनाव आयोग की हठधर्मिता इस बात को मजबूत करती है कि चुनाव आयोग किसी खास उद्देश्य की पूर्ती के लिए कार्य कर रहा है। खुले शब्दों में कहा जाए तो जनमत के साथ खिलवाड़ करने का मन बना लिया है। चुनाव आयोग ने। जिसका परिणाम कितना भयावह होगा इस बात का अंदाज भी सरकार को लग चुका है और इसीलिये मतगणना के दिन इस प्रकार की सुरक्षा की बात केन्द्र सरकार को करनी पड़ रही है ।


अब बात करते हैं कि चुनाव आयोग  क्यों नहीं चाहता की वीवीपेट की पर्ची की गिनती पहले हो जाए। क्योंकि चुनाव आयोग इस बात से भलीभांती वाकिफ है कि इससे दो तरह के परिणाम सामने आयेंगे। यदि पहले गिनती करा ली जाती है तो आधी से अधिक लोकसभा की सीटों पर विवाद शुरू हो जायेगा कि पूरी शत-प्रतिशत पर्चिओं की गिनती हो। जो चुनाव आयोग नहीं चाहता कि ऐसा हो। जब ईवीएम का 'जीन' जनता के सामने निकल जायेगा तब विवाद होने पर चुंकि 95 प्रतिशत की गिनती हो चुकी होगी उसे दौबार गिनती नहीं करनी होगी और वह बाकी के ईवीएम की पोल को जनता के सामने लाने से बच जायेगा। 

यदि चुनाव आयोग की मंशा पाक-साफ होती तो वह विपक्ष की इस मांग को स्वीकार कर लेता। परन्तु दाल में काला तो जरूर है ।
जयहिन्द ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

मंगलवार, 21 मई 2019

चुनाव आयोग की नियत पर खोट?

चुनाव आयोग की नियत पर खोट?


 चुनाव आयोग भी रूल 49MA  के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर राजनीति दल को जाने पर क्या करना होगा इसकी व्यवस्था की है। परन्तु जिन-जिन जगहों से ऐसी शिकायतें आई उसे दबाने का काम आयोग की भूमिका पर फिर एक नया प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।  
देश के लोकतंत्र में यह शायद यह पहली बार हो रहा है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला विपक्ष, चुनाव आयोग के सामने इतना कमजोर और बौना साबित हो चुका है जो कहीं न कहीं लोकतंत्र के किसी खतरे का संकेत भी दे रहा है।  पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी  ने भी ईवीएम की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहे कि  " ईवीएम की सुरक्षा  की पूरी ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की है कि किसी को शक  करने की  कोई जगह ना मिले। " यानि कि देश की जनता पिछले दो-तीन दिनों की ईवीएम की हलचलों से काफी चिंतित है।

 रूल 49MA   :  चुनाव आयोग कि भूमिका को लेकर खुद चुनाव आयोग के एक सदस्य ने जो सवाल जनता के सामने रखे, उससे भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो चुके हैं। चुनाव के दौरान बार-बार और बड़ी संख्या में ईवीएम  मशीनों की खराबी को लेकर शोर-शराबा होता रहा। चुनाव आयोग अपनी कारस्थानियों को छुपाने के लिये लोगों को धमकाता रहा। उनके ऊपर एफआईआर करता रहा।  शरद पावर का बयान सामने आया कि "ईवीएम से गलत वोट पड़ रहें हैं" यानि कि जिसे वोट दिया जा रहा है उसे ना जाकर किसी अन्य राजनीतिक दल को वह वोट जा रहा है । ऐसी ही कई ख़बरें विभिन्न राज्यों से आती रही।  चुनाव आयोग भी रूल 49MA  के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर राजनीति दल को जाने पर क्या करना होगा,  इसकी व्यवस्था की है। परन्तु जिन-जिन जगहों से ऐसी शिकायतें आई उसे दबाने का काम आयोग की भूमिका पर फिर एक नया प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।    रूल 49MA   के लिये चुनाव आयोग ने क्या प्रचार किया ?  जबकि इस बार चुनाव आयोग ने प्रचार में काफी धन खर्च भी किया है।  क्या रूल 49MA  के विषय में जनता को जागरूक नहीं किया जाना चाहिये  था कि ऐसी कोई बात हो तो जनता चुनाव आयोग को तुरन्त इत्ला करें ताकि चुनाव में परदर्शिता लाई जा सके। इसके विपरित चुनाव आयोग उन लोगों को जेल भेजने का काम करती पाई गई।


आयोग की नियुक्ति :  चुनाव आयोग की नियुक्ति पर भी कांग्रेस पार्टी की तरफ से बयान आया कि इस बात पुनः विचार करने की जरूरत है कि आयोग की नियुक्तियाँ कैसे की जाए । यानि कि आयोग की नियुक्तियाँ भी सवाल के घेरे में आ चुका है। वहीं आयोग को इस बार सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा जमा कर यह स्वीकार करना पड़ा कि उनके पास विशाल शक्ति है । कहने का अभिप्रायः यह है कि आयोग के हर हरकतों पर कहीं ना कहीं प्रश्न खड़ा होना शुभ संकेत तो नहीं माना जा सकता ।


20 लाख ईवीएम मशीनें  :  एक आरटीआई से पता चला की चुनाव आयोग के पास 20 लाख ईवीएम मशीनें कम है जिसके जबाब में चुनाव आयोग की प्रवक्ता शेफाली शरण ने कहा कि ‘‘हकीकत में चुनाव आयोग एक-एक ईवीएम को अपनी निगरानी में रखता है। यहां तक कि एक भी ईवीएम को इधर से उधर नहीं किया जा सकता है। किसी भी ईवीएम को कहीं ले जाने के लिए चुनाव आयोग से आधिकारिक इजाज़त लेनी पड़ती है। चुनाव आयोग के पास ‘ईवीएम मैनेजमेंट साफ्टवेयर’ EMS है, इसके जरिए हरेक ईवीएम और वीवीपैट मशीन की हर वक्त मॉनिटरिंग होती है।’’ परन्तु वह उस बात को स्पष्ट नहीं कर रही कि उनके पास कितनी ईवीएम आयी और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है और किस राज्यों में कितनी ईवीएम खराब है कितनी सही ? साथ ही यह भी सवाल उठता है कि जब आयोग इतनी सख़्त निगरानी रखता है तो चुनाव के पश्चात उत्तरप्रदेश और बिहार में इतनी बड़ी तादाद में ट्रकों में लोड इतनी मशीनें एक साथ क्या करने जा रही थी। इससे पूर्व तो ये मशीनें कभी इस प्रकार ना तो पकड़ी गई ना ही कभी कोई शिकायत मीडिया में किसी पार्टी ने लगाया था। यदि किसी ‘मोक’ ट्रेनिंग के लिए भी ये मशीनें भेजी जा रही थी या वहां से वापस आ रही थी तो जैसा कि चुनाव आयोग खुद कह रहा है कि उसके पास सभी मशीनों पर निगरानी ‘ईवीएम मैनेजमेंट साफ्टवेयर’ कर रही है तो उसकी सूचना उम्मीदवारों को क्यों नहीं दी गई ताकि यह जो अफवाहें बाजार में फैल रही है उसपर लगाम लगाया जा सके। परन्तु इन ईवीएम मशीनों के अवैध हरकतों पर आयोग की चुप्पी किसी नये शक को जन्म दे रही है। क्या कहीं ‘‘एक्जिट पोल’’ के आँकड़ों से इसका कोई संबंध तो नहीं ? 


नेचुरल जस्टीस :  आयोग किसी के नामांकन पत्र को वैध कारण बता कर रद्द कर सकती है परन्तु वह ‘‘ नेचुरल जस्टीस’’ का पूरा अवसर उस उम्मीदवार को देना होगा। जबकि इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ रात का वक्त देकर  ''नेचुरल जस्टीस'' को भी ताक पर रख दिया। किसी भी पत्र के जबाब के लिये कम से कम एक दिन का कार्यकारी दिवस देना उस व्यक्ति उस व्यक्ति का संवैधानिक हक बनता है जबकि एक ही दिन में आयोग ने उस उम्मीदवार को दो नोटिस जारी कर दी और शाम छह बजे की नोटिस का जबाब वह भी 500-500 किलोमीटर की दूरी तय कर के दूसरे दिन ग्यारह बजे तक जबाब देने को कहा जाना आयोग की निष्पक्षता पुनः सवाल तो खड़े कर ही जाता है। भले ही चुनाव आयोग उनकी सुनाई पूरी कर के भी उस उम्मीदवार के नामांकन को रद्द कर सकती थी। जल्दबाजी में किसी के दबाव में लिया गया निर्णय एक प्रश्नचिन्ह अपने पीछे छोड़ देता है।


 तीन सदस्यीय पीठ :  चुनाव आयोग को यह पूरा अधिकार है कि वह राजनीति पार्टियों को विभिन्न शिकायतों का समय पर निपटारा करे, परन्तु यहां भी सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है। अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी के मामले में लगातार चुनाव आयोग की चुप्पी और फिर उनको सभी मामलों में बरी कर देना भी चुनाव आयोग कि निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है । जिसका उल्लेख चुनाव आयोग के एक सदस्य ने अपने आरोप में लगाया कि उनके विचारों को मिनट बुक में नहीं दर्शाया गया है। तब सवाल यह भी उठता है कि तीन सदस्यीय पीठ का निर्णय था कि दो सदस्यीय पीठ का निर्णय? 


वीवीपेट की पर्ची :  इसी प्रकार आज पुनः 22 विपक्षी दल के प्रतिनिधियों ने वीवीपेट की पर्ची  की गनती को लेकर अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की मांग की कि किस प्रकार इसकी गिनती की प्रणाली क्या अपनाने जा रही है? यानि कि चुनाव आयोग किसी घपले को अंजाम देने की ताक में तो नहीं है? विपक्ष को अब चुनाव आयोग की हर हरकतों पर शंका का होना लोकतंत्र के लिये शुभ तो नहीं माना जा सकता ।
2019 के चुनाव में एक बात तो धीरे-धीरे साफ होती जा रही है कि चुनाव आयोग किसी भी प्रकार से निष्पक्ष नहीं हैं जो लोकतंत्र के लिये किसी खतरे का संकेत दे रहा है कि कोई एक व्यक्ति लोकतंत्र को जब चाहे अपना ग़ुलाम बना सकता है।  जयहिन्द ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

बुधवार, 15 मई 2019

17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग

17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग
"2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था।  जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे"
17वीं लोकसभा के सातवें और अंतिम चरण का चुनाव आगामी रविवार को शेष 59 सीटों के लिय मतदान होने जा रहा है इसके साथ ही चुनाव आयोग का चेहरा भी ‘मोदी रडार’  से साफ-साफ दिखने लगा कि किस प्रकार चुनाव में मोदी का सहयोग कर रहा है ‘चुनाव आयोग’ । गुजरात से एक गुंडा बंगाल आकर पैसे के ताकत पर बंगाल में अराजकता फैला जाता है।
‘विद्यासागर’ की मुर्ति को तुड़वा जाता है। बंगााल की संस्कृति पर हमला कर जाता है कोई इसका विरोध करे तो देश के लोकतंत्र पर खतरा पैदा हो जाता है ? देश के सर्वोच्च अदालत ने जब सीधे मोदी सरकार पर हमला किया कि ‘‘देश के लोकतंत्र को खतरा पैदा हो चुका है’’ तब दिल्ली के तथाकथित बिकाऊ मीडिया हाऊसेस की जुबान को लकवा मार गया था? जब आरबीआई पर हमला हुआ, जब सीबीआई को पंगु बना दिया गया, जब चुनाव आयोग को भ्रष्ट अफिसरों से भर दिया गया तब इनका लोकतंत्र किस महखने में ‘स’राब की बोतलें खोल रहा था? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को तबायतों का अड्डा बना देने वाले मीडिया हाऊस खुद को लोकतंत्र का रक्षक मानते हैं पर इनकी हरकतें तो बताती है ये लोकतंत्र के भक्षक हैं । भाजपा का चरित्र तो दिल्ली के चुनाव में सड़क-सड़क पर चर्चा का विषय बना हुआ है कि किस प्रकार ये लोग किसी महिला के लेकर कितने नीचे स्तर तक गिर सकते हैं। कोई यही बात इनकी महिला नेताओं को लेकर करे तब? सत्ता के लोभ ने इनके स्तर को इतना नंगा कर दिया कि अब ‘शरम’ भी इनसे ‘शरमा’ जायेगी । असभ्यता और अनैतिकता इनके खुन में रमा-रचा-बसा है कोलोस्ट्रोल की परतें जम गई है इनके खुन में जो-जो पाप 70 साल में नहीं देखे आज की युवा पीढ़ी यह सब देख-सुन व सीख रही है ।
खैर ! अब परिणामों के घनघोर बादल छटने लगे हैं। इसबार के चुनाव में भाजपा ने कई बार अपनी रणनीतिओं में बदलाव किया कभी ‘‘राम मंदिर’’ को भुनाने का प्रयास किया गया, जब इस पर बात नहीं बनती दिखी तो, पांच साल किसानों को ठगती रही मोदी सरकार ने ठीक चुनाव से पूर्व जल्दीबाजी में अपने अंतिम बजट में दस हजार किसानों को 2000-2000/- खैरात में बांटे । पांच साल व्यापारियों को कंकाल बना देने के बाद उन्हें आयकर में 12,500/- का प्रलोभन देने का काम किया गया जो आंख में धूल झौंकने के बराबर है क्योंकि 5 लाख से ऊपर आय के होते ही यह छुट गायब हो जाती है। फिर भी इनको लगा कि इससे भी बात नहीं बनी तो जैसा सभी अनुमान लगा रहे थे कि मोदी जी चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान पर हमला भी कर सकते हैं कुछ ऐसा ही किया भी गया और राहुल की तरह, मोदीजी को भी पिछली कांग्रेस सरकार की तरह सर्वशक्तिमान नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा । विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के तकतवार नेता को अचानक से इन कलपुर्जे की क्या जरूरत आ पड़ी। जब मोदी जी इतना काम किये हैं कि पिछले 70 सालों में कभी हुआ ही नहीं जैसा कि इनके घोषणा पत्र में कहा गया है तो फिर ऐन चुनाव के वक्त यह छल-प्रपंच किसके लिए किये गये?
इस बीच विपक्ष लगातार मोदी के पिछले पांच सालों के कार्याकाल व तमाम संवैधानिक संस्थाओं को लेकर शोर मचा ही रहा था, वहीं राहुल गांधी ‘राफेल’ के मुद्दे को किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं थे। लगातार ‘‘चौकीदार चोर है’’ बोल-बोल कर मोदी पर प्रहार किये जा रहे थे । 
2019 के चुनाव में भाजपा की रणनीति में तीन बार बदलाव लाया गया। पहले इनका नारा बड़े-बड़े विज्ञापनों से यह प्रचारित किया गया कि ‘‘नामुमकिन अब मुमकिन है’’  फिर इसमें मोदीजी का नाम जोड़ा गया ‘‘ मोदी है तो मुमकिन है’’ यह बताने का प्रयास किया गया कि मोदी के आने से वह काम हुआ जो कभी नहीं हो सका था पर जैसे ही इस नारे का उल्टा अर्थ सामने आने लगा तो अचानक से मोदी ने ‘‘मैं भी चौकीदार’’ से कांग्रेस पर पलटवार करना चाहा। यानि 'राहुल' का वार सही जगह जाकर लग चुका था। मोदी अपनी सारी रणनीति भूलकर खुद 'चौकीदार' के एजेंडे में उलझ गये और साथ ही अपनी पूरी टीम को भी उसमें उलझा डाले। इसे पत्रकारिता में ‘‘बुलेट एजेंडा सेटिंग’’ बोला जाता है जो सीधे सामने वाले के मस्तिष्क में जाकर अटेक करता है। किसी ने उन्हें ज्ञान दिया कि इससे आप ‘राफेल’ के मुद्दे को ही खुद जनता के बीच ले जा रहें हैं तो रातों-रात मोदी की पार्टी ने फिर अपने नारे में बदलाव कर दिया ‘‘फिर एक बार मोदी सरकार’’  जबकि पिछले 2014 के लोकसभा के चुनाव में मोदी पार्टी के कई नारे थे जिसमें - बहुत हुई मंहगाई की मार- अबकी बार मोदी सरकार’’ , ‘‘अच्छे दिन आने वाले हैं।’’ ‘‘हर-हर मोदी-घर-घर मोदी’’  आप एक नजर नारों के इस गणित को ही देखें । 
2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था।  जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे। कभी कुछ, कभी कुछ कह डालते हैं जो स्वतः विवाद पैदा कर देती है। कहने का अर्थ है कि 2019 के चुनाव में मोदीजी ना तो पिछले पांच सालों की सफलता पर कोई बात कह पा रहे थे ना ही  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही मोदीजी के कार्यकाल की सफलता पर कोई चर्चा कर रहें थे। 

हां! भाजपा के घोषणा पत्र में मोदी सरकार के कार्यों की चर्चा जरूर की गई है ‘‘संकल्पित भारत - सशक्त भारत’’ के नाम से 2019 का भाजपा के संकल पत्र में लिखा है कि ‘‘कोई एक सरकार बीस साल तक चलती है तो एक-दो ऐतिहासिक निर्णय लेती है। श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पांच वर्षों में अनेक ऐसे निर्णय लिये हैं, जो ऐतिहासिक और आमूलचूल बदलाव को मूर्त रूप देने वाले हैं । स्वच्छता आंदोलन, उज्जवला योजना, सौभाग्य योजना, नोटबंदी, जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, हर घर बजली, 2.5 करोड़ से ज्यादा परिवारों को आवास तथा पचास करोड़ लोगों को मुफ्त चिकित्सा देने के लिए आयुष्मान भारत योजना और 14 करोड़ लोगों को मुद्रा लोन के तहत ऋण जैसे अनेक ऐसे कार्य हैं, जो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने करना तो दूर, कभी सोचा तक नहीं ।’’ 
अर्थात चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र में कही गई बातों की कोई चर्चा नहीं हो रही थी, ना ही भाजपा का यह संकल्प पत्र को आम जनता पढ़ पा रही थी।  जनता तो मोदीजी और अमित शाह के आये दिन के भाषणों  के टेप गोदी मीडिया के माध्यम से ही सुन व पढ़ रही थी जिसमें सिवा हिन्दू खतरे में है को छोड़कर कोई नई बात थी तो "डाक्टर मोदी जी" का तीसरा ज्ञान ‘‘नाले के गेस पैदा करने से "रडार ज्ञान" तक, डिजिटल कैमरा से लेकर ई-मेल ज्ञान’’ मानों देश की युवाओं को वह यह बता रहे हैं जो दादी मां अपने बच्चों को कैसे बहला फुसला के खाना खिला देती थी। मोदीजी के संकल्प घोषणा पत्र में एक नजर उसके आंकड़ों पर देखें तो 66.5 करोड़ देश की आबादी को मोदी की तमाम योजनाओं से सीधे लाभ पंहुचा है। यानि कि लगभग देश की आधी आबादी को मोदी सरकार ने सीधे लाभ पंहुचा है। वहीं 10 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 2000/- रुपये ठीक चुनाव से पहले जमा करा कर लगभग 75.5 करोड़ लोगों को सीधे लाभ दिया गया । इस प्रकार देखा जाए तो मोदी सरकार ने कुल 90 करोड़ मतदाताओं में से 75 करोड़ मतदाताओं को जो कुल मतदाताओं का 83% होता है को तो सीधे मोदी सरकार से लाभ मिला है तो फिर उनको अपने कामों पर वोट ना मांगना, समझ से परे है।  कभी सेना का नाम पर, तो कहीं राम के नाम पर तो कभीं नेहरू, राजीव गांधी को अपमानित कर, तो कहीं विद्यासागर जी की मुर्ति को खंडित कर, कहीं हिन्दुओं को भड़का कर, तो कहीं पुलमावा के शहीदों के नाम वोट करने का प्रथम युवा मतदाताओं से आह्वान कर, तरह-तरह की बात, जगह-जगह, अलग-अलग बात करते देखे गए। इसके साथ ही गोदी मीडिया साथ-साथ अपनी ताकत झौंके हुए है। 

मुझे एक बात अभी तक समझ में नहीं आ रही जब मोदी सरकार की इतनी सफलता है तो उनको अपने कामों पर वोट ना मांगते देखकर घोर आश्चर्य भी हो रहा है और इनके रणनीतिकारों के दिवालियापन पर अफसोस भी । ऊपर मैंने इनके नारे के फर्क की बात की, फिर इनके घोषणा पत्र की बात की अब तीसरे भाग में कुछ चुनावी अंकगणित पर भी चर्चा कर लेते हैं।

2014 में पांच राज्यों प्रमुख राज्यों जिसमें उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तिसगढ़ और बिहार जो भाजपा का गढ़ माने जाते थे जिसमें पिछले लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने उत्तरप्रदेश में 41.3% वोट प्रतिशत शेयर के साथ में 80 में 71 सीटें,  राजस्थान में 54.9% वोट प्रतिशत शेयर के साथ में 25 में 25 सीटें , मध्यप्रदेश में 54% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 29 में 27 सीटें, छत्तिसगढ़ में  में 48.7% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 11 में 10 सीटें और बिहार में वर्तमान यूपीए गठबंधन को 51.6% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 40 में 30 सीटें आज इनके पास है। यानि की इन पांच राज्यों में ही भाजपा को 163 सीटें मिली थी। जो 2019 के चुनाव में उत्तरप्रदेश में वोट प्रतिशत घटकर 35% वोट प्रतिशत के नीचे घिसने का अनुमान लगाया जा रहा है इसके प्रमुख कारण है - योगी सरकार से ब्राहमणों की बड़ी नाराजगी वहीं मोदी सरकार की नोटबंदी व जीएसटी से परेशान बुनकर उद्योग का कमजोर तबका खासा नाराज दिख रहा है। जबकि 2014 में ‘‘मोदी लहर’’ में बाबजूद बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी को 41.8% वोट प्रतिशत शेयर प्राप्त हुए थे।  यह ‘‘मोदी लहर’’ जैसा कि सबने 2014 में देखा और अनुभव भी किया था आज किसी भी रूप में यह कोई ‘मोदी लहर’ यूपी में नहीं है। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ़ में भाजपा की सरकार चले जाने से वहां भी लोकसभा के चुनाव के वे सम्मीकरण जो 2014 में थे गड़बड़ाये हुए हैं। अर्थात कि उत्तर प्रदेश में 10%  और इन तीनों राज्यों - राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ़ में 7% से 10% वोट शेयर प्रतिशत में गिरावट का अंदाज आंका जा रहा है। 
वहीं बिहार की बात ले लें तो, इस बार बिहार में लोजपा और नितीश की सरकार से लोगों को नाराज साफ देखा जा रहा है जो नितीश कुमार के चेहरे से भी साफ झलक रहा है। कहने का अभिप्रायः यह है कि बिहार में भी भाजपा 2014 के मुकाबले उतनी मजबूत नहीं दिखाई पड़ रही है।  अर्थात इन पांच राज्यों में कुछ न कुछ खोना निश्चित है । जो लगभग 80 सीटों के आसपास माना जा रहा है । 
अब महाराष्ट्र, गुजरात में भी भाजपा को कुछ नुकसान तो जरूर होगा यह नुकसान दोनों राज्यों में मिलाकर 10 सीटों के आसपास से रहेगी।  इसी प्रकार भाजपा को अन्य राज्यों में जैसे दिल्ली, कर्नाटका, झारखंड, हरियाणा और असम में भी हानि के संकेत मिल रहे है। कुल अनुमान के अनुसार इसबार भाजपा को पिछले चुनाव परिणाम से लगभग 100 सीटों का भारी नुकसान का आंकलन साफ दिख रहा है जिसकी भरपाई बंगाल व ओडिशा से कदापी संभव नहीं हो सकता यदि अमित शाह की बात भी मान ली जाए तो तब भी  बंगाल की कुल 42 सीटें, ओडिशा की कुल 21 सीटें और त्रिपुरा की दो सीटों में आधी भी भाजपा को दे दी जाए यानि कि 65 सीटों में 30-32 सीटें भी भाजपा के खातें में जोड़ भी दी जाए जो एक काल्पनिक बात है तब भी भाजपा को बहुमत से 70 सीटें कम रहेगी। जो ना तो अखिलेश - मायावती की जोड़ी पूरी कर सकती है ना ही शरद पवार और ममता की जोड़ी । जयहिंद !

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

रविवार, 17 मार्च 2019

चाय-पकौड़ा बिचवाया, अब चौकीदारी करो ?


2014 में चुनाव में मोदी का सबसे बड़ा मुद्दा था, काला धन, भ्रष्टाचार और तेल-डालर के दाम के साथ-साथ, देश के युवाओं को प्रति साल दो करोड़ नौकरी देने के वादा किया था।  ‘‘अच्छे दिन आयेंगे, 15 लाख देश के लोगों के खाते में जमा करायेगें। यह सब बातें झूठे वादे साबित हुए। चाय बेच कर सरकार बनायी और आते ही सबसे पहले यह बोल दिया कि पकौड़े बेचो । भाजपा के अध्यक्ष अमित साह ने खुद स्वीकार किया चुनाव में जो वादे किये थे सभी वादे जुमले थे। तब तो इनकी देश भक्ति का यह नये नाटक को भी जुमला ही क्यों ना मान लिया जाए?
गत् पांच सालों में मोदी ने बिना किसी संस्थान के अनुमति के नोट बंदी किया जिसका परिणाम हमने देखा कि 25 दिनों में आरबीआई को बार-बार नियमों में बदलाव लाना पड़ा, सैकड़ों लोगों की जान चली गई। ठीक इसी प्रकार 'जीएसटी' को लेकर जिस एक्ट में जितनी धाराएं नहीं उससे अधिक तो एक साल में इनको संशोधन लाना पड़ा। 100 पेज के एक्ट में 200 पेज का संशोधन यह है हमारे पढ़े-लिखे मोदी का हाल । व्यापारियों की कमर तौड़ डाली । लाखों युवाओं की नौकरी चली गई। किसानों की आत्महत्या थमने का नाम नहीं ले रही। कालेधन के नाम देश को गुमराह किया गया । नोट बंदी से आतंकवाद को लगाम तो नहीं लगा पाये सेनाओं की जम कर हत्या करवाते रहे। पठानकोट, उरी, पुलमावा जैसी कई आतंकवादी घटना भारत की सीमा में आकार, आतंकवादी ‘‘सर्जिकल आतंक’’ करते रहे और पांच साल मोदी जी हाथ पर हाथ धरे चुप-चाप आतंकवाद को कश्मीर में (मु्फ्ती सरकार) समर्थन देते रहे।
तमाम संवैधानिक संस्थाओं, आरबीआई, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों में हेरा-फेरी, कॉलिजियम के द्वारा तय नामों में बिना सहमति से बदलाव, पूर्व में तय नामों की सूची में हेरा-फेरी, चुनाव आयोग में भ्रष्ट अधिकारियों का चयन इस बात का इंगित करता है कि मोदी सरकार देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं को कठपुतली बनाकर अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का काम करते पाये गये। जिस प्रकार राफेल सौदा किया गया, देश की एक दिवालिया कंम्पनी के मालिक को राफेल का कान्ट्रेक्ट दिलाया गया यह सब कई खतरनाक संकेतों की तरफ इशारा कर रहा है।
अब जब मोदी को लगा कि उनकी सरकार पिछले पांच सालों में देश की जनता का ठगा और छला ही छला है। खुद विदेश के दौरा करते रहे और इधर देश में कभी गाय के नाम पर कभी छदम राष्ट्रवाद के नाम पर तो कभी भारत माता के नाम पर देश की जनता को 'गोदी मीडिया' के सहयोग से उलझाये रखकर नीरव मोदी या दिवालिया कंम्पनी के मालिकों के साथ फोटो खिंचवाने में लगे रहे । 100 से भी अधिक देशों के चक्कर लगाने वाला चौकीदार भ्रष्टाचार के इतने खिलाफ था कि पिछले पांच सालों में 'लोकपाल' का गठन तक नहीं होने दिया ।
जब लोकसभा का चुनाव सर पर आ गया तो इनका मानसिक दिवालियापन देखिये ये अब देश भक्ति को भजाने में लगे हैं । देश के युवाओं को नौकरी तो दे नहीं सके सबको बोल रहें कि चौकीदारी करो अब। 
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

मंगलवार, 12 मार्च 2019

नामुमकिन अब' मुमकिन नहीं ? - शंभु चौधरी

एयर स्ट्राइक के  साथ-साथ ही दो झूठे और मनगढंत बात मोदी सरकार की तरफ से जारी की गई- 
पहला कि - मोदीजी रातभर साये नहीं। 
दूसरा ‘‘350 आतंकवादी सहित मसूद को छुड़ाने वाला युसूफ भी मारा गया’’ प्रश्न यहीं से उठने शुरू हो गये जब अमित शाह ने 250 आंतकियों के मारे जाने की बात कही, फिर सेना को आकर बयान देना पड़ा कि संख्या सरकार बातायेगी। इस आंकड़ों के झूठ ने एक बार फिर मोदी के झूठ को नंगा कर दिया था। 
इन सब बातों को कड़ी दर कड़ी जोड़ दिया जाय तो पुलमावा की साजिश में मोदी सरकार की एक करतूत है जो भारतीय सेनाओं की शहादत पर अपनी राजनीति रोटी सैंकने में लगी है।    

भारत के प्रधानमंत्री अपने पांच साल की असफलता, देश की समस्त लोकतांत्रिक संस्थाओं को कठपुतली बना देने के बाद भी उनको सत्ता की पिपासा इस कदर उन पर हॉबी है कि जैसे ही मोदी जी को लगा कि पिछले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार और आगामी लोकसभा के चुनाव में भाजपा को 100 से अधिक सीटों का नुकसान होने का संभावना है, गोदी मीडिया सहित कई लोगों कि नींद खराब कर दी थी। सबको यह लगने लगा कि मोदी अब पाकिस्तान पर कोई बड़ी कार्यवाही जरूर करेंगे, तभी उनकी सत्ता में नई जान फूंकी जा सकेगी । परिणाम स्वरूप क्रमवार मोदी सरकार की हरकतों पर नजर डालें तो यह साफ हो जायेगा कि पुलवामा का हमला मोदी सरकार की एक सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा था जिसे जानबूझकर ठीक चुनाव के ऐनवक्त पर करवाया गया ।  यदि साफ शब्दों में लिखा जाए पुलमावा में सैनिकों की हत्या की गई ।
क्रमवार देखें -
1. राम मंदिर का मुद्दा उछाला गया, जब यह बात सामने आई कि भाजपा चुनाव आते ही इस मुद्दे को भुनाने में लग जाती है तो मोदी ने एक कदम पीछे कर लिए ।
2. किसानों की बदहाली पर मोदी को पांचवें साल ध्यान आया जब सरकार को अंतिम बजट पेश करना था वह भी ‘ऊंट में जीरा’  जब इससे भी बात नही बनी तो,
3. वीवीआईपी हेलीकॉप्टर अगस्ता वेस्टलैंड केस की चल रही 10 साल  पुराने  गड़े मुर्दे को फिर से जिंदा किया गया ताकी कांग्रेस पर हमला किया जा सके। 
4. रॉबर्ट वाड्रा की फाइलें खंखाली जाने लगी।
5. यहां भी जब बात नहीं बनी तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव पर सीबीआई के द्वारा दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह कांग्रेस के साथ गठजोड़ न करें। 
6. पश्चिम बंगाल में सीपीएम के टाईम हुए चिटफंड घोटाले में ममता की सरकार को परेशान किया जाने लगा।

सवाल उठता हे पांच साल मोदी जी क्या कर रहें थे? ये सभी मामले तो पांच साल पुराने थे, पांच साल चुप्पी के बाद , लोकसभा चुनाव के ठीक कुछ महीने पूर्व इनकी सक्रियता क्या दर्शाती है?
कारण साफ था देश की जनता मोदी सरकार के कई तानाशाही फ़ैसलों से इतनी परेशान थी कि उनके सामने एक ही विकल्प था कि किसी भी प्रकार से मोदी को सत्ता से बेदखल कर दिया जाए । इसके लिये मोदी के नाम पर मोदी भक्तों की अफ़वाहों के प्रचार और गोदी मीडिया से लोहा लेना जरूरी हो गया था।
जैसे ही मोदी-शाह की जोड़ी को लगा कि अब उनकी सत्ता उनके हाथ से खिसकनेवाली ही और सत्ता के जाते ही  सबसे पहले राफेल के घोटाले और नोटबंदी के समय हुए नोटों की अदला-बदली के घोटालों से पर्दा उठ जायेगा। 
पुलमावा का हमला,  भारतीय सैनिकों की शहादत को लेकर यह आशंका पहले से ही चर्चा में थी जैसे 1990 में बाबरी मस्जिद ढहाने के समय था। सबको पता था कि ऐसा होने जा रहा  है ठीक इस बार भी या चर्चा आम थी कि मोदी सैनिकों की कोई बड़ी कार्यवाही कर सकते हैं।

भारत सरकार की गुफिया ऐजेंसिंया इस बात की आशंका पहले ही जाहिर कर चुकी थी और मोदी सरकार चाहती थी खतरे को टाला ना जाए ।  घटना का राजनीति लाभ लेने की मंशा मोदी ने मन ही मन बना चुकी थी। जैसे ही पुलमावा में 14 फरवारी 2019 को हमला हुआ, मोदी जी शांत भाव से चुनावी भाषण देने में लगे थे मानो सबकुछ प्लान के अनुसार चल रहा हो। बस उन्होंने मन ही मन इसकी नई योजना बाननी शुरू कर दी। जिसका आभास टाइम्स  ऑफ़ फ इंडिया के स्वामीनाथन एस.ए अयर (24 फरवरी, 2019 ) के लेख में साफ संकेत थे कि  "Between now and the elections, can Modi launch another surgical strike or bombing of terrorist camps in Pakistan?" अर्थात यह साफ हो चुका था कि मोदी राजनैतिक लाभ लेने के लिये फिर वही नाटक करेगा जो उसने 2016 में किया था। जिसकी कहानी  दो साल बाद उनको याद आई कि वे रात भर नहीं सो पाये थे। ठीक वही कहानी इसबार भी दौहराई गई। जैसे ही मीडिया में यह समाचार प्रसारित किया गया कि भारतीय वायु सेना ने एयर स्ट्राइक किया है साथ-साथ ही दो झूठे और मनगढंत बात मोदी सरकार की तरफ से जारी की गई- 
पहला कि - मोदीजी रातभर साये नहीं। 
दूसरा ‘‘350 आतंकवादी सहित मसूद को छुड़ाने वाला युसूफ भी मारा गया’’ प्रश्न यहीं से उठने शुरू हो गये जब अमित शाह ने 250 आंतकियों के मारे जाने की बात कही, फिर सेना को आकर बयान देना पड़ा कि संख्या सरकार बातायेगी। इस आंकड़ों के झूठ ने एक बार फिर मोदी के झूठ को नंगा कर दिया था। 
इन सब बातों को कड़ी दर कड़ी जोड़ दिया जाय तो पुलमावा की साजिश में मोदी सरकार की एक करतूत है जो भारतीय सेनाओं की शहादत पर अपनी राजनीति रोटी सैंकने में लगी है।  
सच में मोदी है तेा कुछ भी नामुमकिन नहीं । 
भले ही सेना को कश्मीर में जूतें क्यों ना खाने पड़े या लोकतंत्र के  चौथे खंभे को घूटनों के बल रेंगना पड़े।
कश्मीर विधानसभा में  तीन साल मोदी सरकार ने उस मुफ्ती (बाप-बेटी) की सरकार चलाई जिसने 'जैस ए मोहम्मद' के सरगना को आजाद किया था। जिसने भारत के विमान अपहरण पर  आतंकवादियों  को छुड़वाने में भारत पर दबाव बनाया था, और खुद भारत के गृह मंत्री (मुफ्ती मोहम्मद सईद) रहते भारत सरकार के मंत्री को आतंकवादियों के साथ कंधार भेजा था। जिसने अपनी बेटी डॉक्टर रूबिया का अपहरण का नाटक रचकर खुंखार आतंकवादियों को जेल से रिहा करवा दिया था। जिसे खुद मोदी ने जम्बू-कशमीर विधानसभा चुनाव में आतंकवादी कहा था के साथ सरकार बना ली थी । आज कश्मीर की इस हालात का एक मात्र दोषी मोदी है जिसके चलते करगील के बाद सेनाओं की लगातार हत्या कश्मीर में  हो रही है और सरकार चुपचाप सब कुछ देखती रही।  देशप्रेम और देश सुरक्षा से गद्दारी करने वाला प्रधानमंत्री मोदी जब छुप के पाकिस्तान जातें हैं तब उनकी देशभक्ति कहां चली गई थी?
लोकसभा के चुनाव में अपनी पांच साल कि विफलताओं को छुपाने का सबसे बड़ा हथियार यही था कि लोगों को देश की रक्षा के नाम पर बड़गलाया जा सके। भले ही मोदी सरकार इसमें एक बार सफल हो कर पुनः जोड़-तौड़कर पांच साल सत्ता में आजाए, पर भारत के पत्रकारों को यह बात डायरी में लिख लेनी चाहिये कि लोकतंत्र का अंत अब निकट आ चुका है। कलतक जो पत्रकार गुलामी करते थे वे अब गुमनामी की जिंदगी जियेगें। जयहिन्द।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

चुनाव-2019: भेड़िया आया


कोलकाता- 2 नवंबर 2018
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक लघु कथा है ‘भेड़िया’ गांव में एक बालक हर बार गाँववालों को मुर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया करता था। जब भी उसको गांव वालों को मुर्ख बनाने की जरूरत पड़ती वह गांव में भागा-भागा आता और जोर-जोर से चिल्लाता ‘‘भेड़िया आया... भेड़िया आया...’’ बस गांव के सारे लोग उस बालक के कहे-कहे भेड़िया को मारने दौड़ पड़ते। पर हाथ कुछ नहीं आता । बालक मन ही मन गांव वालों की मुर्खता पर इतराता और मजा लेता था ।
इस बार के चुनाव में इस बालक को पहले से अंदाज हो चुका है कि उसे लोक सभा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। जिसमें राजस्थान, तेलंगाना मध्य प्रदेश और मिजोरम और छत्तीसगढ़। इसमें तीन राज्यों राजस्थान, तेलंगाना मध्य प्रदेश में भाजपा की हालात बहुत खराब बताई जा रही है।  इन सभी राज्यों में लोकसभा की 83 सीटें हैं। यदि हम प्रमुख तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और मिजोरम और छत्तीसगढ़ की बात करें इन तीन राज्यों में भाजपा के पास अभी 16वीं लोकसभा की 61 सीटें हैं। भाजपा को लगता इन राज्यों में हमने जनता को इतना छल्ला है कि अब धोखे से भी हमारी बात में नहीं आयेगें। विधानसभा चुनाव से उनके तलवे की जमीं अभी से ही खिसकती दिखाई दे रही है। 
लगे हाथ आपको बताता चला जाऊँ कि इस बार भाजपा को सत्ता में लाने के लिये चुनाव आयोग खुलकर जनता के साथ धोखा/साज़िश करने का मन बना चुकी है। पूरी की पूरी चुनाव आयोग की टीम तोता बन चुकी है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पिछली चुनावी घोषणा के ठीक एक दिन पूर्व भाजपा के द्वारा तेल के दामों में 2.5 रुपये की कटौती करना । इसका स्पष्ट अर्थ निकलता है कि चुनाव आयोग भाजपा की ‘बी टीम’ के रूप में कार्य कर रही है। 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून 2014 को हुआ था एवं इसके इसका कार्यकाल 3 जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जायेगा । स्पष्ट है कि आगामी चुनाव की तिथि की घोषणा आगामी जनवरी-फरवरी माह में किसी भी समय कर दी जायेगी 
आज एक पंचतंत्र की कहानी सही साबित हो रही चालाक सियार ने शेर के खोल धारण कर लिया है। आरएसएस की मुंबई में हुए तीन दिवसीय शिविर के समापन में संघ के महासचिव व भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने नया सगुफा छोड़ दिया । एक चोर साहुकार बनकर दूसरे चोर को चेतावनी दे डाली कि ‘‘राम मंदिर को लेकर पुनः 1992 जैसा आंदोलन करेगी’’ । पिछले 70 सालों में संघ का यह चेहरा नया नहीं है । हर चुनावी मौसम में संघ कोई न कोई नया पैंतरा दिखाता ही है। 
अबकी सबको पता है कि मोदी का वह जूमला जिसमें तेल के दाम, डालर के बढ़ते मूल्य, मंहगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन, जवानों के दो सर, युवाओं को नौकरी, अच्छे दिन के वादा जैसे कोई खोखले वादे नहीं चलने वाला है। काठ की हांडी  पूरी तरह से जलकर खाख हो चुकी है। अब मोदी को वे सभी संवैधानिक संस्थाये बचाने का प्रयास करेगी जिसके प्रमुख को मोदी ने तमाम नियमों को ताख पर रखकर पदास्थिापित किया है।
इस बार के चुनाव में एक तरफ व्यापारी वर्ग काफी नाराज है उन्हें लग रहा हे मोदी ने उनके साथ धोखा किया। वहीं यही हालात किसानों की है, तो आरक्षण विवाद भी एक प्रकार से मोदी सरकार के गले की हड्डी बन चुकी है। पिछले पांच सालों में मोदी की विदेश यात्रा, राफेल सौदे में देश को गुमराह करना, सभी संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बना देना मोदी सरकार की उपलब्धि रही है । अब यह देखना है कि गांव को हर बार झलने वाला व्यक्ति क्या इस बार भी सफल हो जायेगा देश को अपने जुमले सुनाकर या संध के नये पैंतरे से देश को मुर्ख बनाया जायेगा?
-शंभु  चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

चुनाव-2019: काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

चुनाव-2019:  काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
कोलकाता- 2 नवम्बर 2018
हम सभी इस बात से भलीभांती अवगत हैं कि 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून 2014 को हुआ था एवं इसके इसका कार्यकाल 3 जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जायेगा । स्पष्ट है कि आगामी चुनाव की तिथि की घोषणा आगामी जनवरी-फरवरी माह में किसी भी समय कर दी जायेगी । 
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 में भारत के चुनाव आयोग को इसका अधिकार दिया गया है। वहीं अनुच्छेद 83(2) में इसका कार्यकाल 5 वर्ष का तय किया गया और आपात किसी स्थिति में एक साल का कार्यकाल संसद में कानून बना के बढ़ाया जा सकता है । वहीं भारत के नागरिकता कानून, 1951 की धारा 14 में नई लोकसभा गठन की प्रक्रिया दी गई है। जिसमें लिखा है कि नई लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव करायें जायेगें । इसके लिए पूर्व की लोकसभा की समाप्ति जो कि जून 2019 में हो जायेगी के छः माह अर्थात 1 दिसम्बर-2018 से 30 मई 2019 के बीच चुनाव की सभी प्रक्रियाओं को पूरा कर लेनी होगी । अर्थात 16वीं लोकसभा की उलटी गनती शुरू हो चुकी है। 
पिछले पांच सालों में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि मोदीजी ने देश को बहुत बड़े आर्थिक संकट में डाल दिया  है । तेल व गैस के दाम, डालर का मंहगा होना, रसोई गैस का 400/- रुपये से 900/- रुपये का हो जाना, राफेल सौदे में 20 हजार करोड़ का डाका, निरव मोदी का फरार होना, अमित साह के बेटे के धन में रातों-रात, दिन दूनी रात चौकनी कमाई हो जाना, बाबा रामदेव के 850 करोड़ रुपये की कम्पनी का 11526 करोड़ की कम्पनी हो जानी, बाबा के विज्ञापनों के माध्यम से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को नपूंसक बना देना का षड़यंत्र, नोटबंदी से 60 प्रतिशत नये करोड़पतियों की उपज, कालेधन पर चुप्पी, आतंकवाद के नाम पर देश को धोखा देना, सेना का इस्तमाल अपनी रक्षा में प्रयोग करना, बच्चों की शिक्षा पर भी जीएसटी लागू कर देना। कभी गाय के नाम पर कभी धर्म के नाम पर  तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर देश को गुमराह करना, देश के युवाओं को पकौड़े बेचने को कहना, ‘‘मान न मान - मैं तेरा मेहमान’’ विश्वभर में 80 से अधिक बार विदेश की यात्रा, मानहानी के मुकदमों का नया दौर शुरू कर अपने विरोधियों की आवाज को दबा देना। रिजर्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, सीबीआई, आईबी, लोकपाल, आदि सभी संवैधनिक संस्थाओं को पिछले पांच सालों में कमजोर कर लोकतंत्र को धराशाही करने में लगातार कार्यरत रहना यह मोदी सरकार की पिछले पांच साल की प्रमुख उपलब्धीयां हैं । 

  • आज हमें सोचना होगा कि क्या हम लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं कि बाबा रामदेव के विज्ञापनों के पीछे कुत्ते की तरह दुम हिल्लाकर अपनी कलम को, पत्रकारिता को गिरबी रखना चाहतें हैं?
  • आज हमें सोचना होगा कि धर्म की आड़ लेकर जो भेड़िया हमें पिछले 25 सालों से नोचता रहा वह पुनः उसी खाल में हमें लुटने तो नहीं आ रहा?
  •  आज हमें सोचना होगा जिसने 2014 के चुनाव में हमें जो सपने दिखाये थे उसका क्या हुआ।
  • आज हमें साचेना होगा घरों की रसोई की गैस में ऐसी कौन सी आग लग गई की मोदी सरकार ने पांच सालों में इसके मूल्य को 400 से 900 कर दिये?
  • आज हमें यह भी सोचना होगा जिस लोकपाल के गठन को लेकर पूरा देश आंदोलनरत हो चुका था, उसका गठन मोदी सरकार ने क्यों नहीं किया? 
  • ऐसे हजार सवाल हो सकते हैं साथ ही एक सवाल यह भी उठता है कि मोदी नहीं तो फिर कौन?
  • स्वाल बहुत गंभीर है। क्या हमारे पास कोई विकल्प नहीं? क्या एक सवाल यह भी किया जा सकता है मोदी ने इन पांच सालों में हमारी सोच को भी विकलांग बना दिया कि हम किसी विकल्प की बात भी नहीं सोच सकते?  जयहिन्द !  
- शंभु चौधरी, लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व विधि विशेषज्ञ भी है।