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बुधवार, 22 मई 2019

चुनाव आयोग: दाल में काला

चुनाव आयोग: दाल में काला  
किसी भी विषय के शोध में उसकी समस्या का निदान ही शोधकर्ता के लिये प्रमुख माना जाता है। कहा जाता है कि समस्या को ठीक से समझ लेना ही उसका आधा हल माना जाता है। कई बार समस्याओं को हम खुद की नाकामियों को छुपाने के लिए भयानक बना देते हैं या फिर समस्या को समझते-बुझते हुए भी कुछ ऐसी हरकतें करते हैं कि समस्या को सुलझाने की जगह और विकराल बना देते हैं। आज के चुनाव आयोग के अपरिपक्व के इस निर्णय के कारण ही कल का दिन पूरे देश के लिए तनावपूर्ण होनेवाला है। 

चुनाव समाप्त होते ही जिसप्रकार से मीडिया में ‘‘एक्जिट पोल’’ आने लगे उससे विपक्ष में स्वभाविक रूप से खलबली का माहौल बनना था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेदेपा प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू लगातार विपक्ष के सभी नेताओं से मिलकर एकजूट करने का प्रयास चुनाव से पूर्व भी करते रहे और चुनाव के सामाप्त होते ही पुनः सक्रिय हो गए। दिल्ली में सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल, उत्तरप्रदेश में मायावती-अखिलेश से और बंगाल आकर ममता बनर्जी से भी मुलाकात की। 


कल 22 दल के नेताओं ने एक साथ मिलकर चुनाव आयोग से अपील की थी कि वे लोकसभा के चुनाव में उच्चतम अदालत के निर्णय के अनुसार प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आनेवाले सभी विधानसभा क्षेत्रों के पांच-पांच ईवीएम मशीनों के वीवीपेट पर्ची की गिनती शुरू होने से पहले कराये ताकि इस बात का मिलान हो सके कि  ‘‘ईवीएम मशीनों’’ से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ नहीं की गई है। परन्तु चुनाव आयोग इस बात को मानने को तैयार नहीं है।


आज एक साथ दो खबरें आई - 
पहला- की देश में पहली वार केन्द सरकार की तरफ से मतगणना के दिन संभावित हिंसा को देखते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को अलर्ट जारी किया है। गृह मंत्रालय की तरफ से  राज्य के मुख्य सचिवों और डीजीपी को इस संबंध में सचेत करते हुए कहा गया है कि वे किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रहे । 
दूसरा- भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का अलग बयान आता है कि उनके नेता भी स्ट्रांग रूम के पास सतर्क रहें। खास कर ओड़िसा और बंगाल के लिए अलग से निर्देश जारी किये गए । सवाल उठता है कि ऐसा कौन सा पहाड़ कल टूटने वाला है या सुनामी आने वाली है जिसके लिये अचानक से कल तक जो चुनाव में जीत की निश्चिंत होकर कमाऊ की गुफा में ध्यान करने चले गये थे। एक तरफ विपक्षी खेमा परेशान था तो मोदी खेमे में पार्टी चल रही थी । आज अचानक से यह सब परिवर्तन क्यों ?

किसी भी विषय के शोध में उसकी समस्या का निदान ही शोधकर्ता के लिये प्रमुख माना जाता है। कहा जाता है कि समस्या को ठीक से समझ लेना ही उसका आधा हल माना जाता है। कई बार समस्याओं को हम खुद की नाकामियों को छुपाने के लिए भयानक बना देते हैं या फिर समस्या को समझते-बुझते हुए भी कुछ ऐसी हरकतें करते हैं कि समस्या को सुलझाने की जगह और विकराल बना देते हैं। आज के चुनाव आयोग के अपरिपक्व के इस निर्णय के कारण ही कल का दिन पूरे देश के लिए तनावपूर्ण होनेवाला है।
इससे पहले की आगे की बात करेे हम निम्न बातों पर गौर करें।
1. प्रधानमंत्री मोदी जी का मीडिया दर्शन के समय "फाटकेबाजों" की बात उनके श्रीमुख से निकलना।
2. चुनाव समाप्त होते ही 19 मई की शाम को विभिन्न मीडिया हाऊसेस की तरफ से ‘‘एक्जिट पोल’’ जारी करना, जिसमें एनडीए को 300 से लेकर 350 सीटें आने की संभावना जतायी गई।
3. 19 मई से 21 मई अमित शाह चुप रहे पार्टी मनाते रहे।
4. 22 मई को जैसे ही चुनाव आयोग का फैसला सामने आता है कि पांच वीवीपेट की पर्ची- प्रति विधानसभा की गिनती पहले नहीं की जायेगी
5. केन्द्र सरकार के साथ-साथ मोदी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी सतर्क जारी करने लगे।


 इन पाचों बातों का एक दूसरे चौली-दामन का रिश्ता है। मोदीजी के द्वारा फाटकेबाजी की बात कहना, ‘‘एक्जिट पोल’’ में एनडीए को 300 से लेकर 350 सीटें आने की संभावना व्यक्त करना, उत्तरप्रदेश में मायावती व अखिलेश के महागठबंधन को अनुमान से कम सीटें देना, बंगाल में एनडीए को अनुमान से अधिक सीटें देना, बिहार में अनुमान से अधिक सीटों का आना, जो पूरे देश में चिन्ता का विषय है कि क्या कहीं ईवीएम से छेड़छाड़ तो नहीं हो रही। इसके साथ ही ट्रकों में ईवीएम मशीनों का पकड़ा जाना, स्ट्रोंग रूम की सुरक्षा को लेकर जगह-जगह से असंतोष का होना, भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के द्वारा अपनी चिंता सार्वजनिक करना व तमाम विपक्षी दलों की बात का दरकिनार करना और चुनाव आयोग की हठधर्मिता इस बात को मजबूत करती है कि चुनाव आयोग किसी खास उद्देश्य की पूर्ती के लिए कार्य कर रहा है। खुले शब्दों में कहा जाए तो जनमत के साथ खिलवाड़ करने का मन बना लिया है। चुनाव आयोग ने। जिसका परिणाम कितना भयावह होगा इस बात का अंदाज भी सरकार को लग चुका है और इसीलिये मतगणना के दिन इस प्रकार की सुरक्षा की बात केन्द्र सरकार को करनी पड़ रही है ।


अब बात करते हैं कि चुनाव आयोग  क्यों नहीं चाहता की वीवीपेट की पर्ची की गिनती पहले हो जाए। क्योंकि चुनाव आयोग इस बात से भलीभांती वाकिफ है कि इससे दो तरह के परिणाम सामने आयेंगे। यदि पहले गिनती करा ली जाती है तो आधी से अधिक लोकसभा की सीटों पर विवाद शुरू हो जायेगा कि पूरी शत-प्रतिशत पर्चिओं की गिनती हो। जो चुनाव आयोग नहीं चाहता कि ऐसा हो। जब ईवीएम का 'जीन' जनता के सामने निकल जायेगा तब विवाद होने पर चुंकि 95 प्रतिशत की गिनती हो चुकी होगी उसे दौबार गिनती नहीं करनी होगी और वह बाकी के ईवीएम की पोल को जनता के सामने लाने से बच जायेगा। 

यदि चुनाव आयोग की मंशा पाक-साफ होती तो वह विपक्ष की इस मांग को स्वीकार कर लेता। परन्तु दाल में काला तो जरूर है ।
जयहिन्द ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

मंगलवार, 21 मई 2019

चुनाव आयोग की नियत पर खोट?

चुनाव आयोग की नियत पर खोट?


 चुनाव आयोग भी रूल 49MA  के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर राजनीति दल को जाने पर क्या करना होगा इसकी व्यवस्था की है। परन्तु जिन-जिन जगहों से ऐसी शिकायतें आई उसे दबाने का काम आयोग की भूमिका पर फिर एक नया प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।  
देश के लोकतंत्र में यह शायद यह पहली बार हो रहा है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला विपक्ष, चुनाव आयोग के सामने इतना कमजोर और बौना साबित हो चुका है जो कहीं न कहीं लोकतंत्र के किसी खतरे का संकेत भी दे रहा है।  पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी  ने भी ईवीएम की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहे कि  " ईवीएम की सुरक्षा  की पूरी ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की है कि किसी को शक  करने की  कोई जगह ना मिले। " यानि कि देश की जनता पिछले दो-तीन दिनों की ईवीएम की हलचलों से काफी चिंतित है।

 रूल 49MA   :  चुनाव आयोग कि भूमिका को लेकर खुद चुनाव आयोग के एक सदस्य ने जो सवाल जनता के सामने रखे, उससे भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो चुके हैं। चुनाव के दौरान बार-बार और बड़ी संख्या में ईवीएम  मशीनों की खराबी को लेकर शोर-शराबा होता रहा। चुनाव आयोग अपनी कारस्थानियों को छुपाने के लिये लोगों को धमकाता रहा। उनके ऊपर एफआईआर करता रहा।  शरद पावर का बयान सामने आया कि "ईवीएम से गलत वोट पड़ रहें हैं" यानि कि जिसे वोट दिया जा रहा है उसे ना जाकर किसी अन्य राजनीतिक दल को वह वोट जा रहा है । ऐसी ही कई ख़बरें विभिन्न राज्यों से आती रही।  चुनाव आयोग भी रूल 49MA  के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर राजनीति दल को जाने पर क्या करना होगा,  इसकी व्यवस्था की है। परन्तु जिन-जिन जगहों से ऐसी शिकायतें आई उसे दबाने का काम आयोग की भूमिका पर फिर एक नया प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।    रूल 49MA   के लिये चुनाव आयोग ने क्या प्रचार किया ?  जबकि इस बार चुनाव आयोग ने प्रचार में काफी धन खर्च भी किया है।  क्या रूल 49MA  के विषय में जनता को जागरूक नहीं किया जाना चाहिये  था कि ऐसी कोई बात हो तो जनता चुनाव आयोग को तुरन्त इत्ला करें ताकि चुनाव में परदर्शिता लाई जा सके। इसके विपरित चुनाव आयोग उन लोगों को जेल भेजने का काम करती पाई गई।


आयोग की नियुक्ति :  चुनाव आयोग की नियुक्ति पर भी कांग्रेस पार्टी की तरफ से बयान आया कि इस बात पुनः विचार करने की जरूरत है कि आयोग की नियुक्तियाँ कैसे की जाए । यानि कि आयोग की नियुक्तियाँ भी सवाल के घेरे में आ चुका है। वहीं आयोग को इस बार सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा जमा कर यह स्वीकार करना पड़ा कि उनके पास विशाल शक्ति है । कहने का अभिप्रायः यह है कि आयोग के हर हरकतों पर कहीं ना कहीं प्रश्न खड़ा होना शुभ संकेत तो नहीं माना जा सकता ।


20 लाख ईवीएम मशीनें  :  एक आरटीआई से पता चला की चुनाव आयोग के पास 20 लाख ईवीएम मशीनें कम है जिसके जबाब में चुनाव आयोग की प्रवक्ता शेफाली शरण ने कहा कि ‘‘हकीकत में चुनाव आयोग एक-एक ईवीएम को अपनी निगरानी में रखता है। यहां तक कि एक भी ईवीएम को इधर से उधर नहीं किया जा सकता है। किसी भी ईवीएम को कहीं ले जाने के लिए चुनाव आयोग से आधिकारिक इजाज़त लेनी पड़ती है। चुनाव आयोग के पास ‘ईवीएम मैनेजमेंट साफ्टवेयर’ EMS है, इसके जरिए हरेक ईवीएम और वीवीपैट मशीन की हर वक्त मॉनिटरिंग होती है।’’ परन्तु वह उस बात को स्पष्ट नहीं कर रही कि उनके पास कितनी ईवीएम आयी और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है और किस राज्यों में कितनी ईवीएम खराब है कितनी सही ? साथ ही यह भी सवाल उठता है कि जब आयोग इतनी सख़्त निगरानी रखता है तो चुनाव के पश्चात उत्तरप्रदेश और बिहार में इतनी बड़ी तादाद में ट्रकों में लोड इतनी मशीनें एक साथ क्या करने जा रही थी। इससे पूर्व तो ये मशीनें कभी इस प्रकार ना तो पकड़ी गई ना ही कभी कोई शिकायत मीडिया में किसी पार्टी ने लगाया था। यदि किसी ‘मोक’ ट्रेनिंग के लिए भी ये मशीनें भेजी जा रही थी या वहां से वापस आ रही थी तो जैसा कि चुनाव आयोग खुद कह रहा है कि उसके पास सभी मशीनों पर निगरानी ‘ईवीएम मैनेजमेंट साफ्टवेयर’ कर रही है तो उसकी सूचना उम्मीदवारों को क्यों नहीं दी गई ताकि यह जो अफवाहें बाजार में फैल रही है उसपर लगाम लगाया जा सके। परन्तु इन ईवीएम मशीनों के अवैध हरकतों पर आयोग की चुप्पी किसी नये शक को जन्म दे रही है। क्या कहीं ‘‘एक्जिट पोल’’ के आँकड़ों से इसका कोई संबंध तो नहीं ? 


नेचुरल जस्टीस :  आयोग किसी के नामांकन पत्र को वैध कारण बता कर रद्द कर सकती है परन्तु वह ‘‘ नेचुरल जस्टीस’’ का पूरा अवसर उस उम्मीदवार को देना होगा। जबकि इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ रात का वक्त देकर  ''नेचुरल जस्टीस'' को भी ताक पर रख दिया। किसी भी पत्र के जबाब के लिये कम से कम एक दिन का कार्यकारी दिवस देना उस व्यक्ति उस व्यक्ति का संवैधानिक हक बनता है जबकि एक ही दिन में आयोग ने उस उम्मीदवार को दो नोटिस जारी कर दी और शाम छह बजे की नोटिस का जबाब वह भी 500-500 किलोमीटर की दूरी तय कर के दूसरे दिन ग्यारह बजे तक जबाब देने को कहा जाना आयोग की निष्पक्षता पुनः सवाल तो खड़े कर ही जाता है। भले ही चुनाव आयोग उनकी सुनाई पूरी कर के भी उस उम्मीदवार के नामांकन को रद्द कर सकती थी। जल्दबाजी में किसी के दबाव में लिया गया निर्णय एक प्रश्नचिन्ह अपने पीछे छोड़ देता है।


 तीन सदस्यीय पीठ :  चुनाव आयोग को यह पूरा अधिकार है कि वह राजनीति पार्टियों को विभिन्न शिकायतों का समय पर निपटारा करे, परन्तु यहां भी सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है। अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी के मामले में लगातार चुनाव आयोग की चुप्पी और फिर उनको सभी मामलों में बरी कर देना भी चुनाव आयोग कि निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है । जिसका उल्लेख चुनाव आयोग के एक सदस्य ने अपने आरोप में लगाया कि उनके विचारों को मिनट बुक में नहीं दर्शाया गया है। तब सवाल यह भी उठता है कि तीन सदस्यीय पीठ का निर्णय था कि दो सदस्यीय पीठ का निर्णय? 


वीवीपेट की पर्ची :  इसी प्रकार आज पुनः 22 विपक्षी दल के प्रतिनिधियों ने वीवीपेट की पर्ची  की गनती को लेकर अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की मांग की कि किस प्रकार इसकी गिनती की प्रणाली क्या अपनाने जा रही है? यानि कि चुनाव आयोग किसी घपले को अंजाम देने की ताक में तो नहीं है? विपक्ष को अब चुनाव आयोग की हर हरकतों पर शंका का होना लोकतंत्र के लिये शुभ तो नहीं माना जा सकता ।
2019 के चुनाव में एक बात तो धीरे-धीरे साफ होती जा रही है कि चुनाव आयोग किसी भी प्रकार से निष्पक्ष नहीं हैं जो लोकतंत्र के लिये किसी खतरे का संकेत दे रहा है कि कोई एक व्यक्ति लोकतंत्र को जब चाहे अपना ग़ुलाम बना सकता है।  जयहिन्द ।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

बुधवार, 15 मई 2019

17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग

17वीं लोकसभा - एजेंडा सेटिंग
"2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था।  जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे"
17वीं लोकसभा के सातवें और अंतिम चरण का चुनाव आगामी रविवार को शेष 59 सीटों के लिय मतदान होने जा रहा है इसके साथ ही चुनाव आयोग का चेहरा भी ‘मोदी रडार’  से साफ-साफ दिखने लगा कि किस प्रकार चुनाव में मोदी का सहयोग कर रहा है ‘चुनाव आयोग’ । गुजरात से एक गुंडा बंगाल आकर पैसे के ताकत पर बंगाल में अराजकता फैला जाता है।
‘विद्यासागर’ की मुर्ति को तुड़वा जाता है। बंगााल की संस्कृति पर हमला कर जाता है कोई इसका विरोध करे तो देश के लोकतंत्र पर खतरा पैदा हो जाता है ? देश के सर्वोच्च अदालत ने जब सीधे मोदी सरकार पर हमला किया कि ‘‘देश के लोकतंत्र को खतरा पैदा हो चुका है’’ तब दिल्ली के तथाकथित बिकाऊ मीडिया हाऊसेस की जुबान को लकवा मार गया था? जब आरबीआई पर हमला हुआ, जब सीबीआई को पंगु बना दिया गया, जब चुनाव आयोग को भ्रष्ट अफिसरों से भर दिया गया तब इनका लोकतंत्र किस महखने में ‘स’राब की बोतलें खोल रहा था? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को तबायतों का अड्डा बना देने वाले मीडिया हाऊस खुद को लोकतंत्र का रक्षक मानते हैं पर इनकी हरकतें तो बताती है ये लोकतंत्र के भक्षक हैं । भाजपा का चरित्र तो दिल्ली के चुनाव में सड़क-सड़क पर चर्चा का विषय बना हुआ है कि किस प्रकार ये लोग किसी महिला के लेकर कितने नीचे स्तर तक गिर सकते हैं। कोई यही बात इनकी महिला नेताओं को लेकर करे तब? सत्ता के लोभ ने इनके स्तर को इतना नंगा कर दिया कि अब ‘शरम’ भी इनसे ‘शरमा’ जायेगी । असभ्यता और अनैतिकता इनके खुन में रमा-रचा-बसा है कोलोस्ट्रोल की परतें जम गई है इनके खुन में जो-जो पाप 70 साल में नहीं देखे आज की युवा पीढ़ी यह सब देख-सुन व सीख रही है ।
खैर ! अब परिणामों के घनघोर बादल छटने लगे हैं। इसबार के चुनाव में भाजपा ने कई बार अपनी रणनीतिओं में बदलाव किया कभी ‘‘राम मंदिर’’ को भुनाने का प्रयास किया गया, जब इस पर बात नहीं बनती दिखी तो, पांच साल किसानों को ठगती रही मोदी सरकार ने ठीक चुनाव से पूर्व जल्दीबाजी में अपने अंतिम बजट में दस हजार किसानों को 2000-2000/- खैरात में बांटे । पांच साल व्यापारियों को कंकाल बना देने के बाद उन्हें आयकर में 12,500/- का प्रलोभन देने का काम किया गया जो आंख में धूल झौंकने के बराबर है क्योंकि 5 लाख से ऊपर आय के होते ही यह छुट गायब हो जाती है। फिर भी इनको लगा कि इससे भी बात नहीं बनी तो जैसा सभी अनुमान लगा रहे थे कि मोदी जी चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान पर हमला भी कर सकते हैं कुछ ऐसा ही किया भी गया और राहुल की तरह, मोदीजी को भी पिछली कांग्रेस सरकार की तरह सर्वशक्तिमान नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा । विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के तकतवार नेता को अचानक से इन कलपुर्जे की क्या जरूरत आ पड़ी। जब मोदी जी इतना काम किये हैं कि पिछले 70 सालों में कभी हुआ ही नहीं जैसा कि इनके घोषणा पत्र में कहा गया है तो फिर ऐन चुनाव के वक्त यह छल-प्रपंच किसके लिए किये गये?
इस बीच विपक्ष लगातार मोदी के पिछले पांच सालों के कार्याकाल व तमाम संवैधानिक संस्थाओं को लेकर शोर मचा ही रहा था, वहीं राहुल गांधी ‘राफेल’ के मुद्दे को किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं थे। लगातार ‘‘चौकीदार चोर है’’ बोल-बोल कर मोदी पर प्रहार किये जा रहे थे । 
2019 के चुनाव में भाजपा की रणनीति में तीन बार बदलाव लाया गया। पहले इनका नारा बड़े-बड़े विज्ञापनों से यह प्रचारित किया गया कि ‘‘नामुमकिन अब मुमकिन है’’  फिर इसमें मोदीजी का नाम जोड़ा गया ‘‘ मोदी है तो मुमकिन है’’ यह बताने का प्रयास किया गया कि मोदी के आने से वह काम हुआ जो कभी नहीं हो सका था पर जैसे ही इस नारे का उल्टा अर्थ सामने आने लगा तो अचानक से मोदी ने ‘‘मैं भी चौकीदार’’ से कांग्रेस पर पलटवार करना चाहा। यानि 'राहुल' का वार सही जगह जाकर लग चुका था। मोदी अपनी सारी रणनीति भूलकर खुद 'चौकीदार' के एजेंडे में उलझ गये और साथ ही अपनी पूरी टीम को भी उसमें उलझा डाले। इसे पत्रकारिता में ‘‘बुलेट एजेंडा सेटिंग’’ बोला जाता है जो सीधे सामने वाले के मस्तिष्क में जाकर अटेक करता है। किसी ने उन्हें ज्ञान दिया कि इससे आप ‘राफेल’ के मुद्दे को ही खुद जनता के बीच ले जा रहें हैं तो रातों-रात मोदी की पार्टी ने फिर अपने नारे में बदलाव कर दिया ‘‘फिर एक बार मोदी सरकार’’  जबकि पिछले 2014 के लोकसभा के चुनाव में मोदी पार्टी के कई नारे थे जिसमें - बहुत हुई मंहगाई की मार- अबकी बार मोदी सरकार’’ , ‘‘अच्छे दिन आने वाले हैं।’’ ‘‘हर-हर मोदी-घर-घर मोदी’’  आप एक नजर नारों के इस गणित को ही देखें । 
2014 में दिये नारों में जनता से सीधे संवाद नजर आता था जैसे मंहगाई, अच्छे दिन और घर-घर मोदी ये सभी नारों में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ‘जनता से संवाद’ काम कर रहा था।  जबकि 2019 के चुनाव में इनके नारे से ‘जनता से संवाद’ गायब है और इनके समर्थक चाहकर भी मोदी लहर नहीं बना पा रहे थे जैसा पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। राम मंदिर, जय श्री राम, हिन्दू-मुस्लिम, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, एनआरसी का मुद्दा जहां जो काम लगे वहां वही लगा दिया गया। भाजपा के तमाम नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि 'किस' जनता को क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। किसी भी जगह मोदीजी जनता से सीधा संवाद जो पिछले लोकसभा में कर रहे थे नहीं कर पा रहे थे। उसकी जगह मोदी जी भूगोल के साथ-साथ विज्ञान को भी बदलने लगे। कभी कुछ, कभी कुछ कह डालते हैं जो स्वतः विवाद पैदा कर देती है। कहने का अर्थ है कि 2019 के चुनाव में मोदीजी ना तो पिछले पांच सालों की सफलता पर कोई बात कह पा रहे थे ना ही  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही मोदीजी के कार्यकाल की सफलता पर कोई चर्चा कर रहें थे। 

हां! भाजपा के घोषणा पत्र में मोदी सरकार के कार्यों की चर्चा जरूर की गई है ‘‘संकल्पित भारत - सशक्त भारत’’ के नाम से 2019 का भाजपा के संकल पत्र में लिखा है कि ‘‘कोई एक सरकार बीस साल तक चलती है तो एक-दो ऐतिहासिक निर्णय लेती है। श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पांच वर्षों में अनेक ऐसे निर्णय लिये हैं, जो ऐतिहासिक और आमूलचूल बदलाव को मूर्त रूप देने वाले हैं । स्वच्छता आंदोलन, उज्जवला योजना, सौभाग्य योजना, नोटबंदी, जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, हर घर बजली, 2.5 करोड़ से ज्यादा परिवारों को आवास तथा पचास करोड़ लोगों को मुफ्त चिकित्सा देने के लिए आयुष्मान भारत योजना और 14 करोड़ लोगों को मुद्रा लोन के तहत ऋण जैसे अनेक ऐसे कार्य हैं, जो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने करना तो दूर, कभी सोचा तक नहीं ।’’ 
अर्थात चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र में कही गई बातों की कोई चर्चा नहीं हो रही थी, ना ही भाजपा का यह संकल्प पत्र को आम जनता पढ़ पा रही थी।  जनता तो मोदीजी और अमित शाह के आये दिन के भाषणों  के टेप गोदी मीडिया के माध्यम से ही सुन व पढ़ रही थी जिसमें सिवा हिन्दू खतरे में है को छोड़कर कोई नई बात थी तो "डाक्टर मोदी जी" का तीसरा ज्ञान ‘‘नाले के गेस पैदा करने से "रडार ज्ञान" तक, डिजिटल कैमरा से लेकर ई-मेल ज्ञान’’ मानों देश की युवाओं को वह यह बता रहे हैं जो दादी मां अपने बच्चों को कैसे बहला फुसला के खाना खिला देती थी। मोदीजी के संकल्प घोषणा पत्र में एक नजर उसके आंकड़ों पर देखें तो 66.5 करोड़ देश की आबादी को मोदी की तमाम योजनाओं से सीधे लाभ पंहुचा है। यानि कि लगभग देश की आधी आबादी को मोदी सरकार ने सीधे लाभ पंहुचा है। वहीं 10 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 2000/- रुपये ठीक चुनाव से पहले जमा करा कर लगभग 75.5 करोड़ लोगों को सीधे लाभ दिया गया । इस प्रकार देखा जाए तो मोदी सरकार ने कुल 90 करोड़ मतदाताओं में से 75 करोड़ मतदाताओं को जो कुल मतदाताओं का 83% होता है को तो सीधे मोदी सरकार से लाभ मिला है तो फिर उनको अपने कामों पर वोट ना मांगना, समझ से परे है।  कभी सेना का नाम पर, तो कहीं राम के नाम पर तो कभीं नेहरू, राजीव गांधी को अपमानित कर, तो कहीं विद्यासागर जी की मुर्ति को खंडित कर, कहीं हिन्दुओं को भड़का कर, तो कहीं पुलमावा के शहीदों के नाम वोट करने का प्रथम युवा मतदाताओं से आह्वान कर, तरह-तरह की बात, जगह-जगह, अलग-अलग बात करते देखे गए। इसके साथ ही गोदी मीडिया साथ-साथ अपनी ताकत झौंके हुए है। 

मुझे एक बात अभी तक समझ में नहीं आ रही जब मोदी सरकार की इतनी सफलता है तो उनको अपने कामों पर वोट ना मांगते देखकर घोर आश्चर्य भी हो रहा है और इनके रणनीतिकारों के दिवालियापन पर अफसोस भी । ऊपर मैंने इनके नारे के फर्क की बात की, फिर इनके घोषणा पत्र की बात की अब तीसरे भाग में कुछ चुनावी अंकगणित पर भी चर्चा कर लेते हैं।

2014 में पांच राज्यों प्रमुख राज्यों जिसमें उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तिसगढ़ और बिहार जो भाजपा का गढ़ माने जाते थे जिसमें पिछले लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने उत्तरप्रदेश में 41.3% वोट प्रतिशत शेयर के साथ में 80 में 71 सीटें,  राजस्थान में 54.9% वोट प्रतिशत शेयर के साथ में 25 में 25 सीटें , मध्यप्रदेश में 54% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 29 में 27 सीटें, छत्तिसगढ़ में  में 48.7% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 11 में 10 सीटें और बिहार में वर्तमान यूपीए गठबंधन को 51.6% वोट प्रतिशत शेयर के साथ 40 में 30 सीटें आज इनके पास है। यानि की इन पांच राज्यों में ही भाजपा को 163 सीटें मिली थी। जो 2019 के चुनाव में उत्तरप्रदेश में वोट प्रतिशत घटकर 35% वोट प्रतिशत के नीचे घिसने का अनुमान लगाया जा रहा है इसके प्रमुख कारण है - योगी सरकार से ब्राहमणों की बड़ी नाराजगी वहीं मोदी सरकार की नोटबंदी व जीएसटी से परेशान बुनकर उद्योग का कमजोर तबका खासा नाराज दिख रहा है। जबकि 2014 में ‘‘मोदी लहर’’ में बाबजूद बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी को 41.8% वोट प्रतिशत शेयर प्राप्त हुए थे।  यह ‘‘मोदी लहर’’ जैसा कि सबने 2014 में देखा और अनुभव भी किया था आज किसी भी रूप में यह कोई ‘मोदी लहर’ यूपी में नहीं है। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ़ में भाजपा की सरकार चले जाने से वहां भी लोकसभा के चुनाव के वे सम्मीकरण जो 2014 में थे गड़बड़ाये हुए हैं। अर्थात कि उत्तर प्रदेश में 10%  और इन तीनों राज्यों - राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ़ में 7% से 10% वोट शेयर प्रतिशत में गिरावट का अंदाज आंका जा रहा है। 
वहीं बिहार की बात ले लें तो, इस बार बिहार में लोजपा और नितीश की सरकार से लोगों को नाराज साफ देखा जा रहा है जो नितीश कुमार के चेहरे से भी साफ झलक रहा है। कहने का अभिप्रायः यह है कि बिहार में भी भाजपा 2014 के मुकाबले उतनी मजबूत नहीं दिखाई पड़ रही है।  अर्थात इन पांच राज्यों में कुछ न कुछ खोना निश्चित है । जो लगभग 80 सीटों के आसपास माना जा रहा है । 
अब महाराष्ट्र, गुजरात में भी भाजपा को कुछ नुकसान तो जरूर होगा यह नुकसान दोनों राज्यों में मिलाकर 10 सीटों के आसपास से रहेगी।  इसी प्रकार भाजपा को अन्य राज्यों में जैसे दिल्ली, कर्नाटका, झारखंड, हरियाणा और असम में भी हानि के संकेत मिल रहे है। कुल अनुमान के अनुसार इसबार भाजपा को पिछले चुनाव परिणाम से लगभग 100 सीटों का भारी नुकसान का आंकलन साफ दिख रहा है जिसकी भरपाई बंगाल व ओडिशा से कदापी संभव नहीं हो सकता यदि अमित शाह की बात भी मान ली जाए तो तब भी  बंगाल की कुल 42 सीटें, ओडिशा की कुल 21 सीटें और त्रिपुरा की दो सीटों में आधी भी भाजपा को दे दी जाए यानि कि 65 सीटों में 30-32 सीटें भी भाजपा के खातें में जोड़ भी दी जाए जो एक काल्पनिक बात है तब भी भाजपा को बहुमत से 70 सीटें कम रहेगी। जो ना तो अखिलेश - मायावती की जोड़ी पूरी कर सकती है ना ही शरद पवार और ममता की जोड़ी । जयहिंद !

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।  - शंभु चौधरी

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

चुनाव आयोग - दाल में काला


VVPAT ki parchi ki ginti tou good idea hai. Kisi ko koi sikayat hi nai rahegi.

1. Voter janch kar liya ki uska vote kise Gaya.
2. Candidate gin le ki kisko kitna Mila.
Vivad Kahan hai?
Ya tou app free and fare chonaw nai karana chate. Ya niyat main kahin  khot hai.
आज तीसरे चरण का मतदान संपन्न हो गया। इसके साथ ही देशभर से ईवीएम मेशीनों में गड़बड़ी की शिकायतें आती रही। चुनाव आयोग इसे तकनीकी खराबी बोलकर मशीनों को बदल रहा है। पर यह सोचने की बात है जब से ईवीएम मशीन में किसे वोट पड़ा को वीवीपेड के माध्यम से देखने की व्यवस्था की गई है तब से उन मेशीनों में जाे शिकायतें आ रही है वह भाजपा को ही मत जाने की शिकायत क्यों दिखा रहा है अर्थात ये वहीं मशीनें है जिस लेकर लगातार कई राजनीतिक ने पिछलेे चुनावों में आवाजें उठाई थी।

इन मेशीनें में निकल रही गड़बड़ियों को चुनाव आयोग हल्के में टाल रहा है पर इसके पीछे गहरी साजिश की भी बू आ रही है कि क्या ये वहीं मशीनें हैं जिसमें बिना वीवीपेड के चुनाव हुआ थे?

यदि ये वही मशीने हैं तो चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि इन गड़बड़ी वाली मशीनों का उपयोग पिछले किन-किन चुनाव में और किन-किन बुथों पर हुआ था? ताकि उन बुथों के मतों के परिणामों का आकलन पुनः  किया जा सके कि वहां क्या हुआ था।

चुनाव आयोग यदि वह सच में लोकतंत्र की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है तो वर्तमान लोकसभा के चुनाव में शिकायतें आने वाली तमाम मेशीनों के आंकड़ों  उसकी कोड संख्या और पिछले चुनावों में उन मेशीनों का प्रयोग किन-किन बुथों पर हुआ था उसकी पूरी सूचना अपने बेवसाइट पर जारी करे। अन्यथा यह मान लिया जायेगा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र के नाम पर मजाक करने में किसी विशेष राजनीति दल को सहयोग कर रहा है और चुनाव आयोग की उस आनाकानी की भी बात अब समझ में आ जायेगी जिसमें आयोग सभी बुथों के वीवीपेड के मतपत्रों की गिणती में हिचकिचा रहा था दाल में काला तो जरूर है। जब लोकतंत्र की ताकत जनगणना है जो मतगणना से क्यों डर रहा है आयोग?

1. Das Joseph Koottappillil6:04 In Kerala EVM votes are going to BJP while pressing icons other parties..

2.
Sameer Omar0:02 ചേര്ത്തലയിലും വോട്ടിംഗ് മെഷീനില് പിഴവ്; കോണ്ഗ്രസിനും എല്ഡിഎഫിനും വോട്ട് ചെയ്താല് സ്‌ക്രീനില് തെളിയുന്നത് താമര

https://www.reporter.live/2019/04/23/557345.html


3. 
गोवा में ‘दोषपूर्ण’ ईवीएम अन्य वोटों को बीजेपी में ट्रांसफर करती है. क्या वास्तव में प्रोग्राम में दोष है या इसे इस तरह से प्रोग्राम किया गया है.

4. 
“Faulty” EVM in Goa also transfers others votes to BJP. Are these really faulty or programmed in this fashion?

5.
Way too many EVMs are malfunctioning in Chittapur. Over 20 reported so far. Hope the district administration has enough backups.@ceo_karnataka

कई जगह खराब हुईं ईवीएम
केरल से भी इसी तरह की खबर आ रही है. न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक आरोप लग रहे हैं कि कांग्रेस को पड़ने वाले वोट बीजेपी के खाते में जा रहे हैं. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक राज्य के कई लोकसभा क्षेत्रों से ईवीएम खराब होने की रिपोर्ट्स आ रही हैं. कासरगोड में 20 ईवीएम और कयानकुलम में 5 मशीनों के खराब होने की रिपोर्ट आई है. वायनाड जहां से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव लड़ रहे हैं यहां एनडीए के प्रत्याशी ने फिर से चुनाव कराने की मांग की है. इस लोकसभा सीट पर भी कई ईवीएम के खराब होने की खबर आई है.
यूपी में खराब हुईं 300 ईवीएम?यूपी के रामपुर में समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि सैकड़ों ईवीएम मशीनें काम नहीं कर रही हैं. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आजम खान के बेटे अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि 300 से ज्यादा ईवीएम काम नहीं कर रही हैं. हालांकि बाद में रामपुर के डीएम ने कहा कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है. ये अफवाह था.