सोमवार, 24 फ़रवरी 2014
हिन्दी - कब तक उपेक्षित रहेगी
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 6:10 am 0 विचार मंच
Labels: Bijay Gujarwasia, Hindi
रविवार, 9 फ़रवरी 2014
संविधान के पहरेदार?
आज पुनः दिल्ली में इनको संविधान और संवैधानिक व्यवस्था की याद आने लगी। इनकी संवैधानिक व्यवस्था देश के लूटरों को बचाने के लिये बनी हुई है। किस प्रकार पूरी की पूरी व्यवस्था संविधान की दुहाई देने के लिये एक नजर आती है। मानों बैईमानों को हर हाल में बचाना इनके संविधान में लिखा है।
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:57 am 2 विचार मंच
Labels: शंभू चौधरी, Arvind Kejriwal
शनिवार, 8 फ़रवरी 2014
व्यंग्य: कानून के पहरेदार?
हमारे मोहल्ले में एक व्यापारी चोरी का माल खरीदने और बेचने का कारोबार करता था। जब भी उसके यहाँ पुलिस की कोई रेड पड़ती वह आदमी अपनी पंहुच की बात उस पुलिस ऑफिसर को बता के उल्टे उस अधिकारी को ही धमका देता। बेचारा पुलिस ऑफिसर उसकी धौंस से कांपने लगता और भाग जाता।
इस बात की चर्चा शहर में हर तरफ होने लगी। व्यापारी भी अपने धोंस के किस्से बाजार में फैलाता रहता था ताकि सब कोई उससे डरते रहे। एक बार एक नया ऑफिसर आया उसने भी उस कारोबारी की चर्चा सुनी तो उसने ठान लिया कि जैसे ही कोई चोर पकड़ा जायेगा उसे लेकर वह चोरी का बरामद करने खुद जायेगा। लगे हाथ उसे एक चोर मिल भी गया। उसने हवालात से उस चोर को बुलाया उसके बयान को डायरी में नोट किया और उस व्यापारी के यहाँ माल बरामद करने के लिये रेड डाल दी। संयोग से वह व्यापारी भी मिल गया।
व्यापारी ने अपनी आदतन धौंस जमाते हुए कहा कि जानते नहीं ‘‘मैं कौन हूँ?’’
ऑफिसर - ‘‘जी नहीं!’’
व्यापारी - ‘‘मेरी पंहुच ......तक है’’ तुमको पता नहीं होगा शायद? ‘‘आवाज पर जोर देते हुए कड़क से’’
ऑफिसर - ‘‘जी नहीं! आप चुप रहेंगे की आपको भी हथकड़ी डाल दूँ?’’
व्यापारी - ‘‘तुम्हारा ट्रांसफर करावा दूंगा समझते हो न चुपचाप यहाँ से चले जाओ, लिख देना कि कुछ नहीं मिला इसी में भलाई है, व्यापारी ने पुनः रौब दिखाते हुए और अपने आदमी की तरफ आँख से इशारा करते हुए कहा - ‘‘अरे कल्लू सा’ब को भीतर ले जाकर माल दिखा दो। सब समझ जायेगा।’’ व्यंग्य कसते हुए ‘‘शायद नया आया है इस इलाके में? नई बिल्ली म्यांऊ..म्यांऊ..’’
ऑफिसर - ‘‘जी नहीं!’’ आप बहार आईये हम खुद देख लेंगे भीतर क्या-क्या रखा है। ऑफिसर ने चोर से पूछा ‘‘बोले क्या चोरी का माल इसी के यहाँ बेचा था? चोर - ‘‘जी सरकार’’
अबतक ऑफिसर की बात में अकड़ आ गई थी। उसने वे सारे माल भी बरामद कर लिये थे। तभी व्यापारी ने कहा हजूर! आपका फोन आया हुआ है। मंत्री जी लाइन पर आपका इंतजार कर रहें हैं।
ऑफिसर समझ गया कि बात जरूर ऊपर से शुरू होती है। फोन पर उसने बात की ‘‘ जी सर..ररर ‘‘जी ठीक है।’’
ऑफिसर- चोर को मारते हुए साला झूठ बोलता हैं सच..सच बता माल किसके यहाँ बेचा है?
चोर चिल्लाता रहा.... माँ कसम... आप बोलें तो अपने बच्चे की कसम खा लेता हूँ!! मैंने इसी व्यापारी के यहाँ सारा माल बेचा है। देखिये व फंखा, व टीवी हाँ... वे जेवरात...
ऑफिसर- हरामी.. चोर को गाली देते हुए.. चल साले थाने तेरी आज वह धुलाई करूँगा कि सारा सच अपने आप बहार आ जायेगा।
चोर अब तक समझ गया था। सॉरी सर गलती हो गई अब किसी को कुछ नहीं बोलूँगा।
(नोट: इस व्यंग्य में सभी पात्र नकली हैं।)
- शम्भु चौधरी 08.02.2014
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:40 pm 0 विचार मंच
Labels: व्यंग्य, शंभू चौधरी
शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014
एक ईमानदार पहल में आहुति दें देशवासी....
सरकार चलाने का तर्जूबा सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के पास ही। देश की सत्ता में काबिज हो देश के खजानों को लूटना, देश की खनिज संपदा का बंदरवाट करना इनके सरकार चलाने का अर्थ होता है। देश को लूटो और राज करो। केजरीवाल को सरकार चलानी इसलिये नहीं आती क्योंकि केजरीवाल व इसके साथी इस बंद पिंजडे का पंछी नहीं हैं । हमें अवसर मिला है इसमें अपनी आहुति देने का। संविधान की मर्यादा का पालन करनेवालों को भी खुलकर केजरीवाल का साथ देना होगा नहीं तो ये लूटरें संविधान के हथियार से केजरीवाल को घायल कर देगें ।
जबसे केजरीवाल की आम आदमी सरकार दिल्ली में आई है। सियासतदानों के तरकश में नये-नये शब्द पैदा होने लगे। राजनीति को रंडीखाना बना देने वाले इन नेताओं के मुंह से कभी पागल शब्द निकलता है तो कभी ‘‘शहरी नकस्लवाद’’। एक महाशय ने एक बेनेर अपने फेसबुक पर चिपकाया है उसमें लिखा है - ‘‘आम आदमी पार्टी माओवादी संगठन जैसा है।’’ मेरी एक कविता के बोल कुछ इस प्रकार है।- एक परिंदा...
मुझे हैरत इस बात से नहीं कि भाजपा और कांग्रेस राजनीति तरीके से आम आदमी पार्टी को घेरने में लगी है। लोकतंत्र में इसका स्वागत है। हैरनी इस बात से है कि 50 से 500 कमरों के आलिशान झूग्गी-झोपडियों में रहने वाले गरीब देश के इन महान सपुतों को राजनीति करने के लिये केजरीवाल का कभी 5 कमरे का घर मिलता, तो कभी सरकारी गाड़ी का नम्बर प्लेट। कभी ये रंडियों का बचाव करने का मौका तलाशतें हैं, परन्तु नादान लडकियों को इस गौरखघंघे की आग में झौंकने वाले दरिंदों के खिलाफ चुप रहतें हैं। दिल्ली पुलिस के काली करतुतों उनकी काली कमाई के खिलाफ चुप हैं परन्तु उनके द्वारा अपराधियों को बचाये जाने को लेकर की गई गलत कार्रवाही के पक्ष में हंगामा बरापा रहें हैं। जिन बिजली कंपनियों के पुश्तैनी कारोबारी को कभी धन का संकट नहीं था आज अचानक से उनके पास धन की कमी हो गई। जिस सरकारी कंपनी ने कभी यह नहीं कहा कि वह बिजली नहीं दे सकते, उसने अचानक से नोटिस चिपका दी कि पहले पैसा दो फिर बिजली लो। मानो दिल्ली में ‘आप’ की सरकार क्या बनी, रातों-रात सारे के सारे ईमानदार हो गये। जो भाजपा पिछले 15 साल से सोई हुई थी। रजाई से बहार निकालकर खुद को तरोताजा महसूस करने लगी। जैसे दिल्ली से ही मोदी के भाग्य का फैसला होने वाला है।
दिल्ली की सरकार चुन कर आई है। परन्तु दिल्ली की सारी व्यवस्था दिल्ली के उप-राज्यपाल के माध्यम से केन्द्रीय सरकार चलायेगी। प्रत्येक बात पर दिल्ली के मुख्यमंत्री को उप-राज्यपाल की स्वीकृति लेनी आवश्यक होगी। मानो दिल्ली की जनता ने दिल्ली में अपनी सरकार बनाकर कोई पाप कर दिया है। अबतक दोनों (कांग्रेस व भाजपा) पार्टियों का धंधा दिल्ली में फलफूल रहा था। दिल्ली को तुम मिलकर लूटो, देश को हम मिलकर लूटतें हैं कोई किसी के काम में दखल नहीं देगा। इस बात की शपथ लेते थे कि दोनों पक्ष कभी भी इस लूट की व्यवस्था को जनता के सामने उजागर नहीं करेगें। यह है इनके संविधान की व्याख्या। दरअसल ये लोग संविधान की शपथ लेकर देश की जनता को लूटने का धंधा चलाते थे, जिसे केजरीवाल ने जगजाहिर करने का प्रयासभर किया है।
दिल्ली की जनता को लूटने के लिये इनके पास सारे नियम कानून और सिस्टम उपलब्ध है परन्तु जनता के धनको लूटने वालों पर अंकुश की बात करते ही इनको संविधान की याद आने लगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री के हाथ-पांव को कानून से बांधने के सभी कानून उपलब्ध है। देश के इन लूटरों के खिलाफ बोलने व दिल्ली जनलोकपाल कानून बनाने की बात करते ही इनको पद व गोपनियता की याद सताने लगी। कहते हैं वे संविधान से बंधे हुए हैं। जैसे चोर चिल्लाता है कि मुझे मारो मत मैं भी इंसान हूँ।
सरकार चलाने का तर्जूबा सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के पास ही। देश की सत्ता में काबिज हो देश के खजानों को लूटना, देश की खनिज संपदा का बंदरवाट करना इनके सरकार चलाने का अर्थ होता है। देश को लूटो और राज करो। केजरीवाल को सरकार चलानी इसलिये नहीं आती क्योंकि केजरीवाल व इसके साथी इस बंद पिंजडे का पंछी नहीं हैं । हमें अवसर मिला है इसमें अपनी आहुति देने का। संविधान की मर्यादा का पालन करनेवालों को भी खुलकर केजरीवाल का साथ देना होगा नहीं तो ये लूटरें संविधान के हथियार से केजरीवाल को घायल कर देगें । जयहिन्द! - शम्भु चौधरी 07.02.2014
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 3:40 am 0 विचार मंच
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बुधवार, 5 फ़रवरी 2014
मोदीः राजधर्म नहीं चुरा पा रहे?
भाजपा (मोदी) खेमा आगामी लोकसभा चुनाव में 272 सीटें लाने का दावा ठोक रही है। जबकी भाजपा (अडवाणी) खेमा चुपचाप मजे लेने में। इस दावे की पोल खोलने के लिये अडवाणी खेमा कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगा। बिहार में जदयू, बंगाल से ममता, महाराष्ट्र से शिवसेना और जम्मू कश्मीर के फारूक अब्दुल्ला कुछ ऐसे राज्य हैं जहां से कुल 50-60 सीटें ऐसी है जिसका झूकाव अडवाणी खेमे की तरफ है। 272 के आंकड़ें को पार करने के लिये इन सीटों की जरूरत पडेगी।
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 11:46 pm 1 विचार मंच
रविवार, 19 जनवरी 2014
बात पते की - दिल्ली पुलिस का अपहरण
दिल्ली पुलिस को अचानक से उनको रात में सपना भी आ गया कि केजरीवाल का अपहरण तक हो सकता है। दरअसल ये अपहरण की हवा सिर्फ केजरीवाल को दिल्ली पुलिस के द्वारा ब्लैकमेल करने की साजिस है। दिल्ली का रेकैट चाहता है कि उनके फलफूल रहे धंधे में केजरीवाल व उनके मंत्री उनके धंधे में कोई दखल ना दें अन्यथा उनका अपहरण तक किया जा सकता है।
सरेआम दिल्ली में सैकड़ों महिलाओं की ईज्जत को लुटते देखनेवाली दिल्ली पुलिस को कभी शर्म तक नहीं आती कि दिल्ली में इतनी घटनायें क्यों और कैसे हो जाती है जबकि देश की सबसे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था दिल्ली में दिल्ली पुलिस द्वारा पूरे ताम-झाम के साथ की जाती है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 10:18 pm 0 विचार मंच
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शुक्रवार, 17 जनवरी 2014
बात पते कीः ‘राजधर्म’ ? - शम्भु चौधरी
2014 के चुनाव में भाजपा ने मंदिर मुद्दे कुल मिलाकर पल्ला ही झाड़ लिया है। अब इस बूढ़ी घोड़ी पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लाल लगाम चढ़ा दी है। मोदीजी दुल्हे की तरह जँचने भी लगे। सज-धज के तैयार गुजरात के वीर पुरुष श्री नरेंद्र मोदी जी रोज नये-नये सपने देखने लगे हैं।
श्री नरेंद्र मोदी जी अभी तक अटल जी की एक अटल वाक्य को बोल नहीं पाये ‘‘राजधर्म का पालन करें’’ हाँ! मोदीजी इसी बात को कई प्रकार से समझाने में लगे हैं कि ‘‘सरकार का एक ही धर्म है ‘इंडिया फस्ट’, एक ही धर्मग्रंथ है ‘देश का संविधान’, एक ही भक्ति है ‘देश भक्ति’ फिर कुछ दिनों बाद याद आया तो इस कलाम में एक वाक्य और जोड़ दिये देश की एक ही शक्ति है ‘जन शक्ति’ कोटी जनता देश की जनशक्ति, सरकार की एक ही पूजा होती है देश के 125 करोड़ जनता की भलाई। अब तो मुसलमानों के गुणगान में भी कशिदे पढ़ने लगे।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:52 pm 0 विचार मंच
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मंगलवार, 14 जनवरी 2014
बात पते कीः ‘‘आप’ को वोट देने के पहले सोचें?’’ - शम्भु चौधरी
अब इस बात में कोई बहस नहीं रही कि देश में तीसरा विकल्प गर्भ में जन्म ले चुका है। जो कांग्रेस और भाजपा की भ्रष्ट राजनीति से अलग अपनी नई सोच रखता है। कांग्रेसवाद, भ्रष्टवाद, बामवाद, समाजवाद, गाँधीवाद, लोहियावाद, दक्षिणवाद, पश्चिमवाद, दलीतवाद, अल्पसंख्यकवाद, हिन्दूवाद, मुस्लिमवाद और ना जाने कितने वाद के वादों की भूलभुलैया के बीच एक नया वाद जिसे ‘इंसानवाद’ का नाम देना सटीक रहेगा, ने जन्म ले लिया है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:57 pm 0 विचार मंच
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सोमवार, 13 जनवरी 2014
बात पते की - मोदी की हवा?
सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।
दिल्ली भाजपा ने मोदी का पूरा खेल ही बिगाड़ दिया अब मोदी पगला गये, इनके समर्थक गाल-गलौज की भाषा का प्रयोग करने को ऊतारु हैं। इनको लगने लगा कि दिल्ली अब दूर हो गई है। चंद दिनों पहले तक मोदी के समर्थन में एक तरफा हवा बह रही थी, पिछले पांच राज्यों के चुनाव में 4 उत्तर भारत के राज्य ऐसे थे जिसमें भाजपा की एकतरफ़ा जीत दर्ज थी।
परन्तु भाजपा के पुराने खिलाड़ी और राजनाथजी के कट्टर विरोधी दिल्ली भाजपा के प्रभारी श्री मान् नितिन गडकरी जी भीतर ही भीतर मोदी के रथ को रोकने की योजना पर कार्य कर रहे थे इसके लिये उन्होंने विजय गोयल की दुखती नब्जों को सहलाया और दिल्ली में कमजोर नेतृत्व को सामने ला खड़ा किया।
डा. हर्षवर्धन जी जो 32 सीटों पर जीत प्राप्त कर प्रथम स्थान पर थे सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर ‘आप’ और कांग्रेस को आपस में उलझा सकते थे। परन्तु गडकरीजी ने फोन पर उनको ऐसा करने से मना कर दिया कि ‘‘वे सरकार बनाने का दावा ना करें।’’ बात बड़े नेता की माननी थी सो डा.हर्षबर्धन जी ने चुनाव परिणाम के आते ही शाम को अपने हाथ खड़े कर दिये।
उधर भाजपा अध्यक्ष राजनाथजी दावा कर रहे थे कि वे 4-0 से आगे हैं कि नितिन गडकरी ने हवा निकाल दी। राजनाथजी चाह कर भी डा.हर्षबर्धन को मना नहीं पाये कि वे कम से कम सरकार बनाने का दावा तो प्रस्तुत करें। ताकी विधानसभा में दोनो पार्टियों का रूख क्या रहता है इसका अंदाजा जनता को स्वतः ही लग जाये।
सच है कि राजनीति में घोड़े की चाल हमेशा 2.5 की होती है। शह-मात का खेल जो चलना था नितिन गड़करी जी को, सो उन्होंने डा.हर्षबर्धन को साफ मना कर दिया कि वे किसी की बात ना सुने। जाहिर था इन सबके पीछे सुषमा स्वराज और सबके पीछे थे प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये आडवाणी जी। मोदी की हवा तो निकलनी ही थी।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:41 pm 0 विचार मंच
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शुक्रवार, 10 जनवरी 2014
अरविंद का जनता दरबार - शम्भु चौधरी
अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय की छत से जनता को संबोधित कर जनता को धेर्य रखने को कहा कि ‘‘जल्द ही व्यवस्थित रूप से पुनः जनता दरबार लगाया जाएगा। अरविंद ने अपने बयान में कहा कि इतनी भीड़ की उनको उम्मीद नहीं थी। इसके लिय नये सिरे से पूरी व्यवस्था करनी होगी। जिससे लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निदान हो सके।’’
अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय की छत से जनता को संबोधित कर जनता को धेर्य रखने को कहा कि ‘‘जल्द ही व्यवस्थित रूप से पुनः जनता दरबार लगाया जाएगा। अरविंद ने अपने बयान में कहा कि इतनी भीड़ की उनको उम्मीद नहीं थी। इसके लिय नये सिरे से पूरी व्यवस्था करनी होगी। जिससे लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निदान हो सके।’’
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 11:15 pm 1 विचार मंच
Labels: आप, आम आदमी पार्टी, शम्भु चौधरी
गुरुवार, 9 जनवरी 2014
राम! राम! सत्यानाश
‘नमो’ ने अभी से ही अपने समर्थको को गाली गलोज करना सीखा दिया है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:27 am 0 विचार मंच
सोमवार, 6 जनवरी 2014
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय नीति?
सादर नमस्कार!
विषय: आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय नीति।
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति को प्रेषित पत्र
आदरणीय सदस्यगण।
वैसे तो ‘आम आदमी पार्टी’ से जुड़े मुझे चंद ही दिन हुए हैं राजनीति में लगातार 1974 से रुचि रखने और आप लोगों से जुड़ कर कार्य करने की प्रेरणा से यह पत्र आप सभी सदस्यों के विचारार्थ भेज रहा हूँ।
दिल्ली के चुनाव के पश्चात जिस प्रकार कांग्रेस व भाजपा अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा लगाता राष्ट्रवादी व अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस को तेज कर ‘आप’ को बैकफुट पर लाना चाहती है इसके लिए हमें ना सिर्फ सतर्कता की जरूरत है हमें उन तमाम मुद्दों पर गंभीर चिंतन कर नीति के निर्धारण की भी अत्यंत आवश्यकता है।
निम्न विषय आपके ध्यानार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ-
1. सर्वप्रथम हमें संगठन के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की भर्ती करनी चाहिए। संभव हो तो उन्हें सवैतनिक भत्ता के साथ सम्मान पूर्वक पद पर उनकी नियुक्ति हो। ताकी संगठन में उनके कार्यानुसार भविष्य में उनको सम्मानित राजनीति पदों पर स्थापित किया जा सके।
2. कश्मीर सहित उन सभी राष्ट्रीय मुद्दों पर ‘आप’ की स्पष्ट नीति हो। ताकी कोई भी उसके विरुद्ध कार्य या बयान ना दे सके।
3. देश की सुरक्षा, अर्थ व्यवस्था, शिक्षा, किसान नीति, मज़दूर नीति, सरकारी-ग़ैरसरकारी कर्मचारी नीति, व्यापार नीति, बैंकिंग नीति, शेयर बाजार , विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, राज्यों के साथ संबंध, विदेशी मुद्रा भंडार व काला धन, खनिज संपदा नीति आदि पर विचार करना।
4.भ्रष्टाचार व अन्य जन अपादा-विपदा नीति के साथ-साथ आम जनता की जनसेवा से जुड़े कई क्षेत्र जिसमें बिजली-पानी, चिकित्सा-दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, खाद्य वितरण प्रणाली व यातायात व्यवस्था।
5.डालर के मूल्य पर नियंत्रण और तेल के प्रबंध पर अंकुश व आयात-निर्यात व्यवस्था में सामंजस्य करना साथ ही देश की उद्योगिक क्षेत्र में प्रोत्साहन प्रदान करना।
6.आधार भूत इंफ्रास्टेक्चर व्यवस्था को सुचारु करना, सरकारी विभागों की ज़िम्मेदारी तय करना व सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक सौहार्द बनाये रखते हुए स्वच्छ राजनीति व्यवस्था का निर्माण कर देश में कानून व व्यवस्था का राज कायम करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
7. खेल क्षेत्र से राजनीतिज्ञों का वर्चश्व समाप्त करना।
8. कई ऐसे विषय जो यहां छुट गए हैं का अध्ययन करना और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर प्रणाली पर देश के जाने-माने विद्वानों की राय प्राप्त कर नीति का निर्धारण करना।
9. आम आदमी की प्राथमिकता इस बात पर भी हो कि जो नीति का निर्माण हो वह राष्ट्र की जनता पर दूरगामी प्रभाव छोड़ सके। व अन्य राजनीति पार्टियों को सोचने के लिए मजबूर कर दे।
आशा है 'आप' की राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति मेरे पत्र पर गंभीरता से विचार करेगें। आपके उत्तर का इंतजार रहेगा।
आपका ही शुभचिंतक
शंभु चौधरी, कोलकाता
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:07 am 0 विचार मंच
Labels: आम आदमी पार्टी, शम्भु चौधरी
शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
दिल्ली भाजपाः सदी की चूक - शम्भु चौधरी
जहां तक मेरी राजनीति समझ है भाजपा के नेताओं ने दिल्ली में सरकार का दावा ना प्रस्तुत कर ‘आप’ पार्टी को राजनीति जमीन प्रदान कर दी है। आज देशभर में ‘आम आदमी पार्टी’ की धूम मची हुई है। जो लोग भाजपा में आना चाहते थे वे सभी झूंड के झूंड ‘आप’ को ज्वाईन करने लगे। ‘आप’ द्वारा सरकार बनाने की घोषणा के महज चार दिनों में ‘आप’ को देशभर में जो समर्थन प्राप्त हुआ और दिल्ली में जिस प्रकार शपथ समारोह का दृश्य देशभर ने देखा इससे भाजपा की जमीन नीचे से हिल गई है।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:59 pm 1 विचार मंच
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गुरुवार, 2 जनवरी 2014
मोदी के राह का रोढ़ा - शम्भु चौधरी
सवाल उठता है कि- डॉ. हर्षवर्धन जी जब खुद मानतें हैं कि दिल्ली की जनता ने उनकी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने लाया है उनके पास विधानसभा में सबसे अधिक सीट है। उनकी पार्टी को सबसे अधिक मत मिले हैं तो सरकार क्यों नहीं बनाई? सवाल सरकार बनाने का नहीं था। प्रधानमंत्री पद का सपना संजाये श्री अडवाणी जी, भाजपा के संविधान को पलटने वाले व दौबारा अध्यक्ष का सपना देखने वाले श्रीमान नितिन गडकरी जी, महात्मा गांधीजी के पूण्य समाधि स्थल पर ठुमका लगाने वाली सुषमा स्वराज एवं डॉ. हर्षवर्धन जी दिल्ली में मोदी के रथ को रोक कर यह साबित कर दिये कि मोदी को दिल्ली में किसी भी प्रकार से आने नहीं दिया जाएगा।
डॉ. हर्षवर्धन जी मानो दिल्ली विधानसभा में ‘आप’ द्वारा प्रस्तुत विश्वास मत पर भाषण नहीं संसद में जनता को संबोधन कर रहे थे। व्यक्तिगत आरोप लगाने के माहिर भाजपाईयों ने दिल्ली के विधानसभा में भी अपनी जात दिखा दी कि वे जनता की भावना से खिलवाड़ करने के लिए अपने पैंट का जीप भी खोल सकते हैं।भाजपा को सिर्फ जनता की भावना से खिलवाड़ करना आता है। दिल्ली के चुनाव में जिस प्रकार इन लोगों ने देश की भावना से खिलवाड़ कर जनता के वोट प्राप्त करने का प्रयास किया इससे साफ हो जाता है कि इनको देश सेवा और देश से कोई प्रेम नहीं । राम मंदिर निर्माण के समय भी कुछ ऐसा ही किया गया था। अब राममंदिर इनके लिए कोई मुद्दा नहीं रहा।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:10 pm 1 विचार मंच
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गडकरी की चाल सफल
देश के इतिहास में शायद यह पहली घटना होगी जब किसी विधानसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण हुआ हो। दिल्ली विधानसभा में अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ की सरकार के बयान को देश की जनता सीधे देख रही थी। इससे पहले हम विधानसभाओं का प्रसारण जब सदन के भीतर चप्पल-जूते चलते थे तभी देखते थे।
विधानसभा में विश्वास मत पर कांग्रेस अपने 8 विधायकों को लेकर अहंकार में बोलती नजर आई मानो वह ‘आप’ को समर्थन नहीं दिल्ली की जनता के ऊपर बड़ा भारी एहसान कर रही हो। वहीं भाजपा इस बात का दंभ भरती रही कि दिल्ली की जनता ने उनको सर्वाधिक मतों से विजयी बनाया और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में होकर भी विपक्ष में बैठी है। मानो सब कोई जनता के वोट से चून कर आयें, और जनता पर ही अपने दल का एहसान लाद रहें हो। वहीं केजरीवाल ने साफ किया कि वे जनता के साथ कल भी थे और आज भी उसी तरह से जनता के साथ खड़े हैं। आप ने 37-32 से विश्वास मत जीता।
डा. हर्षवर्धन तो पहले से ही भगोड़े थे।
हर्षवर्धन जी विधानसभा में केवल इस बात का दंभ भर रहे थे कि वे विपक्ष में बैठकर भाजपा दिल्ली की जनता पर ही एहसान कर रही है। ‘‘हमारी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है जिसे जनता ने सबसे अधिक सीटें दी है। सबसे अधिक वोट मिले हमको। हम जनता के वोट से चुनकर आयें हैं इसलिए हम जनता को सदन के भीतर बैठकर जूते मारेगें।
गडकरी की चाल
दिल्ली में गडकरी की चाल सफल हुई दिल्ली में मोदी को हरा दिया गडकरी ने दिल्ली में सरकार ना बनाकर दिखा दिया की देश की पूरी जनता मोदी के साथ नहीं।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:18 am 0 विचार मंच
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बुधवार, 1 जनवरी 2014
कलम आज इनकी जय बोल - शम्भु चौधरी
देश को संसद में, विधानसभा में लूटने वाले लोग, गठबंधन के नाम पर लोकतंत्र का चिरहरण करने वाले, लोकतंत्र को लूटतंत्र में तब्दील करने वाले लोग, चुनाव के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी करने वाले लोग, विकास के नाम पर भ्रष्टाचार करने वाले लोग, कॉर्पोरेट चंदे के सौदागर, असामाजिक तत्वों के बल पर सत्ता प्राप्त करने वाले लोग, जनतंत्र को बर्वाद कर देने पर आमदा सत्ता की जोड़-तोड़ में माहिर शातिर लोगों को अचानक से सबकुछ अराजकता लगने लगी।
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प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:13 pm 0 विचार मंच
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शनिवार, 28 दिसंबर 2013
केजरीवाल का ऐतिहासिक भाषण -शम्भु चौधरी
अब यह सरकार सिर्फ 7 मंत्री नहीं चलायेगें, सरकार कुछ अफ़सर नहीं चलायेगें, सरकार कुछ पुलिसवाले नहीं चलायेंगें। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करगें दिल्ली के अंदर हम डेढ़ करोड़ लोग मिलकर सरकार बनायेगें। डेढ़ करोड़ मिलकर सरकार चलायेगें। - अरविंद
अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के रामलीला मैदान के ऐतिहासिक मंच पर
लाखों लोगों के जन सैलाब, लबालब भरा रामलीला मैदान को देशभर की जनता अपनी आंखों से देख रही थी । भारत के इतिहास में सैलाब वह भी एक साधारण सामाजिक जीवन से राजनीति में आने वाले एक आम आदमी के उस क्षण का है जो हमेशा से ही अपना नया रास्ता बनाता रहा है। मध्यम श्रेणी के परिवार में जन्मे श्री अरविंद केजरीवाल ने अपने चंद साथियों के साथ सफलता के उस शिखर पर कदम रखने के लिए अपना पहला कदम बढ़ा दिया हो।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जिस ऐतिहासिक जीत की कल्पना किसी ने भी नहीं की थी, आम आदमी पार्टी ने उन तमाम राजनैतिक आंकड़ों को उथल-पुथल कर रख दिया। लोकतंत्र क्या होता है यह देश की जनता को बता दिया। भले ही इसका रूप हमें आज बहुत छोटा नजर आता हो पर कहावत है- ‘‘ देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’’ जो राजनीति पार्टियाँ अपने अहंकार में मस्त-मस्त हो चल रही है अथवा जो राजनेता इस बात के घमंड में चूर है कि वे सत्ता की ताकत से इस आम आदमी को मिटा देने का जज्बा रखते हैं उनके एक लिए अरविंद केजरीवाल एक सबक है।
दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से श्री अरविंद केजरीवाल अपनी टीम के साथ शपथ लेने के तुरंत बाद जो भाषण दिया उस भाषण के प्रमुख अंश जो इस प्रकार है। -
अभी हमने मुख्यमंत्री और मेरे साथियों ने मंत्री पद की शपथ ली है। यह सारी लड़ाई जो हमलोगों ने लड़ी थी, यह सारी कबायत जो हमलोगों ने की थी, यह कबायत हमलोगों ने अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नहीं की थी। यह सत्ता के किले तोड़कर सत्ता जनता के हाथ में देने के लिए की थी।
दोस्तों!! आज आम आदमी की जीत हुई है। दिल्ली के लोगों ने इस बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में एक बहुत बड़ा काम कर के दिखाया है। अभी तक हमलोग, इस देश के लोग बिल्कुल निराश हो चुके थे, हमें लगता था इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह देश तो बिल्कुल गर्त में जा रहा है। इस देश की राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया था, लेकिन इसबार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में दिल्ली के लोगों ने दिखा दिया कि ईमानदारी से भी राजनीति की जा सकती है। ईमानदारी से चुनाव लड़ें जा सकतें हैं, और ईमानदारी से चुनाव जीते जा सकते हैं।
दोस्तों! इसके लिये मैं आप सब लोगों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। दिल्ली के लोगों को बधाई देता हूँ। यह एक बहुत बड़ी जीत है, दिल्ली के लोगों की जीत है। मैं परमपिता परमेश्वर, ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरु उनको मैं धन्यवाद देना चाहुँगा। जो यह जीत हुई है, यह वाकई यह कुदरती करिश्मा लगता है। नहीं तो आज से दो साल पहले हमलोग यह सोच भी नहीं सकते थे। इस देश में ऐसी क्रांति आयेगी कि जो जब हम भ्रष्ट पार्टियों को उखाड़ कर फेंक देगें और असल में जनता का राज स्थापित होगा।
दोस्तों!! यह हमारी वजह से नहीं हुआ। यह जरूर कुछ न कुछ कुदरती करिश्मा है। इसके लिये हम भगवान को धन्यवाद अदा करता हूँ, ईश्वर को धन्यवाद अदा करता हूँ अल्लाह का शुक्रिया अदा करता हूँ।
दोस्तों! अभी तो यह शुरूआत है। अभी तो केवल आम आदमी की सरकार बनी है। असली लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। यह लड़ाई हम लोग नहीं लड़ सकते। अरविंद केजरीवाल अकेले नहीं लड़ सकता। हम 6 लोग 7 लोग मिलकर यह लड़ाई नहीं लड़ सकते। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि अगर दिल्ली के डेढ़ करोड लोग़ एकट्डें हो जायें तो इस देश से दिल्ली से भ्रष्टाचार हम दूर कर सकते हैं। हम मिलकर भ्रष्टाचार दूर कर सकते हैं।
दोस्तों ! हमें यह बिल्कुल गुमान नहीं है, हमें यह बिल्कुल घमंड नहीं है कि सारी समस्याओं का समाधान हमारे पास है। हमारे पास सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। भगवान ने सारी बुद्धी हमें नहीं दी है। हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि आज सरकार बनेगी, कल सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। लेकिन हमें यह पूरा यकिन है कि यदि दिल्ली के डेढ़ करोड़ लोग एकट्डा हो गए तो ऐसी कोई समस्या नहीं कि जिसका समाधान हम नहीं निकाल सकते। हमें अब दिल्ली मिलकर चलानी होगी।
अब यह सरकार सिर्फ 7 मंत्री नहीं चलायेगें, सरकार कुछ अफ़सर नहीं चलायेगें, सरकार कुछ पुलिसवाले नहीं चलायेंगें। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करगें दिल्ली के अंदर हम डेढ़ करोड़ लोग मिलकर सरकार बनायेगें। डेढ़ करोड़ मिलकर सरकार चलायेगें।
आम आदमी पार्टी की टोपी पहने अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इनके साथ 6 अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण किया । दिल्ली के उप राज्यपाल श्री नजीब जंग ने इनको पद की गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह एक ऐतिहासिक वह झण था जिसे दिल्ली वासियों ने ना सिर्फ सुना इस घटना को अमर बना दिया है।
-शम्भु चौधरी 28/12/2013
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 11:06 am 1 विचार मंच
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बुधवार, 25 दिसंबर 2013
आम आदमी की सरकार -शम्भु चौधरी
कांग्रेसी नेताओं के अहंकार ‘‘हम चुनकर आयें हैं, हमसे बात करना हो तो चुन कर आयें। जनता ने प्रतिनिधित्व करने का दायित्व हमें दिया है। आपलोग एक भीड़ का हिस्सा हो।’’ जैसे शब्दों का चयन करना और उनको देश की जनता को सीधे तौर इस बात की चुनौती देना कि राजसत्ता में जनता कि नहीं नेताओं की बात सुनी जाती है। आखिरकार दिल्ली की जनता ने इनके इस अहंकार को नस्तनामूद कर दिया।श्री प्रमोद शाह की एक कविता है-
भले ही इस बेबसता के बीच आम आदमी को भले ही दिल्ली के चुनाव में आंशिक सफलता ही मिली हो, परन्तु इस सफलता की चर्चा ना सिर्फ देश में, दुनियाभर में हो रही है। दुनिया को केजरीवाल के अंदर ना जाने ऐसा क्या दिख रहा है कि भारत की बदलती राजनीति में उन्हें एक मसीहा के तौर पर देखा जाने लगा है।
केजरीवाल के अंदर भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत का अंदाजा उस समय लगा जब 2011 में श्री अण्णा हजारे ने केजरीवाल के सहयोग से रामलीला मैदान में ‘‘इंडिया एगेंस्ट कप्शन’’ के बैनर तले अनशन किया गया था। उस ऐतिहासिक घटना को दुनियाभर के लोगों ने देखा था।
कांग्रेसी नेताओं के अहंकार ‘‘हम चुनकर आयें हैं, हमसे बात करना हो तो चुन कर आयें। जनता ने प्रतिनिधित्व करने का दायित्व हमें दिया है। आपलोग एक भीड़ का हिस्सा हो।’’ जैसे शब्दों का चयन करना और उनको देश की जनता को सीधे तौर इस बात की चुनौती देना कि राजसत्ता में जनता कि नहीं नेताओं की बात सुनी जाती है। आखिरकार दिल्ली की जनता ने इनके इस अहंकार को नस्तनामूद कर दिया।
उस समय देश की आम जनता को लगा कि भ्रष्ट व्यवस्था बदलने के लिए सत्ता में अच्छे और इमानदार लोगों को सामने आना ही होगा। अण्णा आंदोलन के समय देशभर की यही भावना थी कि अच्छे लोगों को राजनीति में आना ही होगा। जिसकी कमान संभाली श्री अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, संजय सिंह व गोपाल राय ने। तमाम राजनीति विपरीत परिस्थितियों व सहयोगी के अड़ियल रूख के बावजूद इन लोगों ने हार नहीं मानी।
राजनीति का क, ख, ग भी नहीं जानने वाले साथियों के साथ मिलकर एक विचारधारा ‘‘पूर्ण स्वराज्य’’ के सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ाने का दृढ़ संकल्प ले इन नन्हे सेनानियों की टोली ने दिल्ली में अपना भाग अजमाने चुनावी मैदान में कूद पड़े। इस बगावत के झंडे को जिसने भी थामा उसे जनता ने सर पै बैठा लिया। 40-40 साल से चुने जानेवाले कदवार नेता को एक अदने से आम आदमी के सामने मुंह की खानी पड़ी। लोकतंत्र मानो हंस कर कह रहा था ‘‘मुझे मजाक से भी हल्का मत लेना’’
इन सबके बीच कांग्रेस ने पुनः एक नई चाल चली, इन लोगों ने अण्णाजी को पुनः अनशन कराने और देश की भावना को बांटने की साजिश रची। आनन-फानन में एक लंगड़ा लोकपाल सदन के पटल पर लाया गया। भाजपा के नेता तो इस लंगड़े बिल को पारित करने के लिए इतने उतावले दिखे कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि इसे पारित करने के लिए वक्त ना मिले तो बिना बहस के ही इस बिल को पारित किया जा सकता है। इन दोंनो राजनैतिक पार्टियों के उतावलेपन से साफ हो गया था कि केजरीवाल के बढ़ते कद का इनको पहले से ही आभास हो चुका था। जिसे ये लोग लोकपाल बिल चाहे जैसा ही क्यों न हो पारित कर दिल्ली की जनता का ध्यान बांट देना चाहते थे। ताकि चुनाव में आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्त दी जा सके साथ ही देश में बन रहे नये राजनीति धुर्वीकरण को रोका जा सके।
कहावत है ‘‘जो लोग दूसरों के लिए गड्ढा खोदतें हैं खुद उसमें गिरते हैं’’ देश की राजनीति ने नई करवटें लेनी शुरु कर दी। अण्णा को आंदोलन राळेगांव सिद्धी से शुरु होकर राहुल गांधी तक सिमटकर रह गई।
जोड़-तोड़ की राजनीति और गठबंधन धर्म की राजनीति ने देश को भीतर ही भीतर दीमक की तरह खोखला बना दिया है। मसरुम की तरह फैलते राजनीति दलों के गठबंधन की खेती सिर्फ धन पैदा करने की फसल बनकर रह गई। लोकतंत्र के चारों खंभे इस लहलहाती खेती को ललचाई आंखों से देखते और हर कोई अपने बाड़े-न्यारे करने में लग गये। बंदरबांट की इस राजनीति के बीच अचानक से एक हल्की सी चिंगारी पैदा कर दी है केजरीवाल ने।
मेरी एक कविता -
भले ही अंधरे ने बसा लिया हो साम्राज्य दुनिया में सदा,/ बस एक चिंगार भर से ही कांप जायेगा वह सदा।
जागते रहो...जागते रहो....जागते रहो...../ ठक...ठक....ठक...ठक....ठक...ठक....
बस इस शब्दचाप से ही / चोर भाग जाएगा सदा।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 2:52 am 1 विचार मंच
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शनिवार, 21 दिसंबर 2013
दिल्ली चुनावः आप ने रचा नया इतिहास-2
भारतीय गणतंत्र की इस खुशबू के साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस चमन में जो फूल खिल रहे हैं उसे कैसे इन गिद्ध दृष्टि से बचाया जा सके। निःश्कोंच मुझे यह बात मानने से कोई परहेज नहीं कि अभी आम आदमी पार्टी में परिपक्वता की काफी कमी देखने को मिली है। हांलाकि उनकी भावना और ईमानदारी पर कोई शक नहीं, परन्तु जिस प्रकार के शब्दों का चयन या प्रयोग पार्टी के कार्यकर्ताओं को करते देखा जा रहा है यह लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकती। कम से कम सभ्य तो नहीं मानी जा सकती।देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि कोई राजनैतिक पार्टी सिर्फ इसलिए जनता के पास रायशुमारी के लिए जाती है कि अब चूंकि उनकी पार्टी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला है ऐसे में उनकी पार्टी को सरकार बनाने के लिए दूसरी राजनीति पार्टी अर्थात जिस कांग्रेस के खिलाफ वे चुनाव लड़कर आयें हैं उनके ही समर्थन से सरकार बनानी चाहिए कि नहीं?
भारत के राजनीति इतिहास में कहीं भी ऐसे प्रयोग की चर्चा पढ़ने या सुनने को नहीं मिली है। हाँ! अक्सर इस बात की चर्चा हम जरूर करते हैं कि दो विपरीत विचारधाराओं को संसद और विधान सभाओं में जो चुनाव के पूर्व एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाते थे, एक -दूसरों के खून के प्यासे थे, वे सत्ता के लिए कमरे में बैठकर आपस में गले मिल जनता का गला घोंटते रहें हैं। जनता इनके इन इरादों को कभी भाँप भी ही नहीं पाती थी। लाचार जनता किंकर्तव्यविमूढ खुद को ठगी सी महसूस करती अगले चुनाव का इंतजार करती नजर आती। जिस अंगूलियों से उन्होंने वोट दिया था उन अंगूलियों को दाँत के तले दबाने के अलावा जनता के पास कुछ भी नहीं बचता था।
देश में कई राजनीति दल तो सिर्फ इस काम के लिए ही बने हैं जो सिर्फ खरीद फरोख्त के कार्य को ही अपना राजनीति धर्म मानती रही हैं । ऐसे राजनीति दलों की इस वातावरण में चाँदी ही चाँदी हो जाती थी। यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच भी है तो मजाक भी है। गठबंधन की सरकार चलाना या सरकार बनाने के लिए गठबंधन बनाना सिवा एक राजनैतिक समझौता है। जिसने देश को लूटने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है।
भारत की जनता को यह भी सोचना जरूरी हो गया कि देश में गठबंधन राजनीति का जो दौर शुरु हुआ है यह देश के कितने हित में है? कांग्रेस पार्टी के वर्तमान अनुभव की ही बात को लें तो यूपीए-2 का गठबंधन पूरी तरह से भ्रष्टाचार के बलि चढ़ चुका है। जिन-जिन राजनैतिक पार्टियों ने कांग्रेस से गठबंधन किया उन लोगों ने जमकर देश को लूटने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी। कुछ ईमानदार लोग राजनीति करने की चेष्टा की तो उनको बीच में ही इस गठबंधन से बाहर जाना पड़ा। एक गये तो दो नये आ गये। कुल मिलाकर गठबंधन की राजनीति, सत्ता का संरक्षण और देश को लूटने का लाइसेंस बन चुका है। इस राजनीति में आतंकवादी तक भी संरक्षण प्राप्त कर सकता है।
इन सबके बीच भारतीय लोकतंत्र में एक ठंडी हवा का हल्का सा झोंका ही सही देश की जनता ने दिल्ली के चुनाव में महसूस किया है। शायद मेरे मित्र मेरी इस बात से भी सहमत होंगे कि भले ही हमारी अपनी अलग-अलग विचारधारा रही हो पर इस बार दिल्ली के चुनाव में सिर्फ दिल्ली की जनता की ही भागीदारी हमें नहीं दिखी बल्की लगभग पूरी देश की निगाहें इस चुनाव पर ही टिकी थी, दिल्ली की जनता के साथ-साथ देश की जनता ने भी ‘आप पार्टी’ की रायशुमारी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है। जो कभी देखने को नहीं मिला था।
भारतीय गणतंत्र की इस खुशबू के साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस चमन में जो फूल खिल रहे हैं उसे कैसे इन गिद्ध दृष्टि से बचाया जा सके। निःश्कोंच मुझे यह बात मानने से कोई परहेज नहीं कि अभी आम आदमी पार्टी में परिपक्वता की काफी कमी देखने को मिली है। हांलाकि उनकी भावना और ईमानदारी पर कोई शक नहीं, परन्तु जिस प्रकार के शब्दों का चयन या प्रयोग पार्टी के कार्यकर्ताओं को करते देखा जा रहा है यह लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकती। कम से कम सभ्य तो नहीं मानी जा सकती। आम आदमी पार्टी ने जनता का विश्वास प्राप्त करने में जरूर सफलता प्राप्त की है परन्तु इस विश्वास पर खरा उतरने के लिए इनको ना सिर्फ अपनी भाषा को संतुलित करने, साथ ही इनको अब ज़िम्मेदारी पूर्वक बयान देने की भी जरूरत है।
रविवार की रात आम आदमी पार्टी के लिये काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। ‘आप’ एक ऐसे अंतर्विरोध के बाद सरकार बनाने का फैसला लेगी जहां दिल्ली में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभायेगी। लोकतंत्र में इसे त्रासदी कह लें यह हकीकत। आम आदमी पार्टी को मानना ही होगा कि वह जो सोचती है ये रास्ते उतने आसान नहीं हैं। अपने घोर दुश्मन के सहयोग से सरकार बनाना उससे भी कहीं खतरनाक मार्ग है। जबकि इनको इनमें से एक विकल्प चुनना ही होगा। इसी को लोकतंत्र कहा जा सकता है।
मेरी शुभकानाऐं ‘आप’ के सभी कार्यकर्ताओं के साथ है। इसी शुभकामनाएं के साथ।
शम्भु चौधरी
21-12-2013
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दिल्ली चुनावः आप ने रचा नया इतिहास-1
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 7:47 am 0 विचार मंच
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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013
दिल्ली चुनावः 'आप' ने रचा नया इतिहास
राजनीति में कुछ भी हो सकता है। यह बात चार दिन की आम आदमी पार्टी के उस दावे को झूठलाने के लिए सामने खड़ी है जिसमें ‘आप’ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में साफ किया था कि उनकी पार्टी ‘‘ना तो किसी का समर्थन लेगी ना देगी। साथ ही इनका प्रमुख सिद्धांत कि ‘‘हम यहां राजनीति करने नहीं - बल्की इसे बदलने आये हैं।’’ यह बात सही है कि जबसे ‘आप’ ने राजनीति मंच पर अपने पैर फैलने शुरु किये हैं, भारत की राजनीति में कई नये प्रयोग हमें देखने को मिल रहें हैं। जिसे अबतक के राजनीति धुरंधर समझ पाने में ना सिर्फ नकाम रहे हैं। जाने-अनजाने में वे जो भी शतरंजी दाव चलते हैं सब ‘आप’ के रणनीतिकारों के सामने रैंगते और घुटने टैकते नजर आते हैं।
दिल्ली चुनावः 'आप' ने रचा नया इतिहास-2
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:58 pm 0 विचार मंच
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बुधवार, 18 दिसंबर 2013
व्यंग्य: अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त - शम्भु चौधरी
वैसे तो मॉर्निंग वॉक के समय हंसी-मजाक को दौर रोजाना चलता ही रहता है, कभी धर्म और राजनीति को लेकर तो कभी महिलाओं से छेड़-छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज, बलात्कार, बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह, स्वास्थ, जीना-मरना आदि आदि।
धीरे-धीरे इन विषयों के वक्ता भी हमारी टीम में जमा हो गए। मुंगेरीलाल रोजना कोई नई बात (समाचार) लाते और व्यायाम के पश्चात शुरु हो जाती बहस की परम्परा। कुछ दिनों से मुंगेरीलाल बिस्तर पर ही पड़े थे लगभग एक सप्ताह हो गया। उनका अन्न-पानी सब छूट सा गया था। वजन भी कम होने लगा था। सबने मिलकर मन बनाया कि क्यों ना आज मुंगेरीलाल के पास ही मिलने को चला जाए। एक ने कुछ नाश्ता के पैकेट खरीद लिये, एक ने दो पैकट दूध ले लिया बोले- ‘‘यार लगा तो काम आ जाएगा नहीं तो घर लेते जाएंगे।’’
घर पंहुते ही एक ने व्यंग्य कसा ‘‘ कैसे हो भाई!! अब तो ‘जल’-‘पानी’ ग्रहण कर लो, लोकपाल बिल पास हो गया है।’’
मानो किसी ने मुंगेरीलाल की दुखती नब्ज को ही छेड़ दिया हो। बोले क्या खाक पास हो गया? अन्ना ने देश के साथ धोखा किया है। सब कुछ पहले से ही तय था यह सब आप लोगों ने सुना नहीं!! हमलोगों कि तरफ देखते हुए कहने लगे... मेरी तो तबियत खराब चल रही है नहीं तो....
तभी उनको बीच में ही टोकते हुए रामप्रसाद जी बोल पड़े... ‘‘अरे भाई अभी थोड़ा आराम भी कर लो, फिर लिखना जो मन आयें वैसे भी तेरे लिखे को पढ़ते ही कितने लोग हैं? अपने मुंह मियाँ मिठू खुद ही बनते रहो, खुद ही लडू बनाओ और खुद ही खाओ। फिर बात को बदलते हुए ‘‘हम तो बस आपकी सेहत का हाल जानने आ गये, कैसी है अभी आपकी सेहत?’’ पास ही भाभी जी खड़ी थी बोलने लगी - इनको कल ही डाक्टर के पास दिखाने ले गई थी बोले अभी भी थोड़ा बुखार है एक दो दिन में उतर जायेगी। सर्दी-जूकाम लग गई थी।’’
सीताराम जी को पिछले रात की घटना याद थी भाभी जी को बीच में ही रोकते हुए बोल - ‘‘ वह तो लगनी ही थी, अब भला कोई सुबह चार बजे ही इस ठंडी के समय घर से बहार किसी से लड़ने निकल जाए तो सर्दी नहीं लगेगी तो और क्या लगेगी?’’
तभी भाभी ने वैहिचक होते हुए हमारे हाथ से नाश्ते का पैकेट लेते हुए बोली- ‘‘इनसब की क्या जरूरत थी! थोड़ी सकुचाती हुई बोली दूध तो अभी आने ही वाला है...’’ तभी रामप्रसाद ने बात को संभालते हुए बोले ‘‘नहीं भाभीजी हमारे मॉर्निंग वॉकर क्लब का यह नियम ही है कि सुबह किसी से मिलने जाना हो तो वहां भी हमें अपना नाश्ता और चाय पीनी हो तो दूध साथ ही ले जाना होगा। बस आप तो इसमें अपना प्यार मिला कर हमें परोस दिजिए’’
भाभी मुसकराती हुई नाश्ते के पैकेट लेकर भीतर जाते-जाते एक तीर चला गई - हां!! हां!! अभी लाती हूँ थोड़ी इनको भी अक्ल दे देते कि कैसे बात संभाली जाती है’’ और भीतर चली गई।
तभी ने एक ने मुंगेरलाल के हालचाल पूछने के लिये पुनः उसकी दुखती नब्ज को सहलाया ‘‘तो आपने अनाज क्यों छोड़ दिया?’’ हमने तो सुना कि आप भी अन्ना के साथ अनशन में बैठे हो।
अब मुंगेरीलाल का पारा सातवें आसमान को छूने लगा। बोले- ‘‘ अरे यार मेरा अन्ना से कोई लेना-देना नहीं ना ही मेरी इस बीमारी से उनके लोकपाल बिल का कोई संबंध है। हां! एक पत्रकार के हैसियत से मैं उस आदमी की जरूर खबर लूंगा।
‘‘क्यों? क्या कर दिया अन्ना ने बीच में ही रामप्रसाद जी ने उन्हें रोकते हुए पूछ डाला।’’
क्या किया? अब मुंगेरीलाल आपे से बहार हो गया था। उसका पूरा चेहरा लाल तपतपाने लगा। ये लोग सब मिलकर संसद को ड्रामा मंच बना दिये हैं लगता ही नहीं कि कोई देश चला रहा है। सारे बिल ऐसे पास हो रहे हैं कि जैसे मनमोहन मुद्रा में पूरी संसद सोई हुई हो ... बिल्ली जैसी आंख से टूकूर-टूकूर देखता है बोलता ऐसे है जैसे कोई दैहाती औरत अपने पति के सामने घीघीयाती हो।
तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?तभी उनका गुस्सा बीजेपी पर भी आ गया। इनको कब से लकवा मार दिया। इनके नेता तो ऐसे बात करते है कि मानो संसद में इनके बाप की बपौती चल रही हो ‘‘ बिल को बिना बहस के भी पास किया जा सकता है’’ क्यों भाई फिर बहस के बीच कुछ संशोधन करने का ड्रामा क्यों किया था इन लोगों ने?
फिर थोड़ा रुककर सोचते हुए। दिल्ली चुनाव में भाजपा की भी सांस फूलने लगी। इनको लगा कि ये केजरीवाल ने कांग्रेस पार्टी का जो हर्ष दिल्ली में किया कहीं दोनो राजनीति पार्टियों की भी बैंड ना बजा दे?
बस अन्ना के दो दलाल (नाम नहीं लिया) पर इशारा काफी था को इस काम में लगा दिया। उधर अन्ना को इस बात के लिए मना लिया कि वह जनता का ध्यान बंटाने में कांग्रेस की मदद करे और कांग्रेस उनके बिल को संसद में पास कर देगी। बस शुरु हो गया लोकपाल ड्रामा।
कहते हैं 50 प्रतिशत लाभ मिलेगा। कानून में भी प्रतिशत होता है यह तो हमने आज पहली दफा ही सुना है। हमें तो इतना ही पता है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई ईमानदार मसीहा देश को चाहिए। अन्ना ने अनशन किया ही कब था जो तोड़ दिया? सब कुछ ड्रामा था। इसके अलावा कुछ नहीं था।
तभी एक ने बीच में ही टोक दिया- ‘‘वो राहुल का नाम आपने भी तो नहीं लिया?’’ बोले अरे मियाँ सब बात बोलने की नहीं होती कुछ बात खुद ही समझा करो। कह दिया ने ‘‘अन्ना का अनशन ड्रामा समाप्त‘‘ जब तक कि हमारी बात समाप्त होती चाय-नाश्ता आ गया था।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:20 pm 0 विचार मंच
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मंगलवार, 17 दिसंबर 2013
व्यंग्य: चूहे ने बिल खा लिया... - शम्भु चौधरी
अब मुंगेरीलाल ने मेरा हिसाब लेना शुरू कर दिया - ‘‘ अच्छा ये बताओ ये अन्ना का आंदोलन तुमने क्यों किया था? मुझे रोज उसपर लिखने को क्यों कहता था? भाई! वो तो दो साल पुरानी बात हो गई, इसबार तो हमने कोई आंदोलन-वांदोलन नहीं किया? यह अन्ना कहां से बीच में आगया आज?मॉर्निंग वॉकर क्लब के हमारे पत्रकार मित्र मुंगेरीलाल ने पता नहीं क्या लिख दिया कि सुबह-सुबह पांच बजे ही मुझे उठाने चले आये। ठंड से सिकुड़ता हुआ रजाई के भीतर से ही उनकी आवाज सुनी...‘‘अरे ओउउउ..सीताराम जी... जल्दी बहार आओ घूमने जाना नहीं क्या?
मुझे अनायास ही ‘अरे’ कि जगह पता नहीं सिर्फ ‘‘ओअअअ म्हारा सीताराम जी’’ सुनाई देने लगा। मैंने उनको समझाते हुए कहा कि यार सुबह-सुबह तो शुभ-शुभ बोला कर यार....
दूसरी बार उन्होंने फिर जोर से आवाज लगाई.... मैं हड़बड़ी में गरम-गरम रजाई का मोह त्याग कर खिड़की से बहार देखा- चारों तरफ कुप अंधेरा ही अंधेरा, कुहासा छाया हुआ था मध्यरात्रि सा सन्नाटा चारों तरफ बिखरा हुआ था। स्ट्रीट लाईटें चमक रही थी। कोलकाता में दिसम्बर माह में भी ठंड कम ही रहती है परन्तु हमारा ईलाका शहर से थोड़ा दूर रहने के चलते यहाँ गांव जैसा आनन्द मिलता है।
अपनी आंखें मसलते हुए- बोला यार आता हूँ...आता हूँ....उम्र की इस दहलीज पर भी आकर तुम नहीं सुधरने वाले। सुबह-सुबह क्यों बकवास किये जा रहे हो।
मुंगेरीलाल कहां मेरी बात सुनता वह चिल्लाये ही जा रहा था जल्दी बहार आता है कि आज इस कलम की समाधी तेरे घर के बाहर ही कर दूंगा। मुझे समझ में आ गया जरूर कोई बड़ी घटना रात को हो गई होगी। जल्दी से गुसलखाने में गया, कपड़े बदले सोचता हुआ रात 11 बजे तक के समाचार में तो कोई बड़ी खबर नहीं थी सिवा लोकपाल के और केजरीवाल के। पर केजरीवाल पर तो हमने कल ही बात की थी और रही लोकपाल के यह तो दो साल पुरानी बात है। अन्ना का आंदोलन में भी इस बार कोई खास बात नहीं थी जैसा कि पिछले बार देखने को मिला था। फिर इनको यह क्या सूझी कि तड़के सुबह-सुबह ही हंगामा मचाने लगे।
वैसे तो मॉर्निंग वॉक में जबतक मुंगेरीलाल जी कोई नया धमाका नहीं करते हमें मजा ही नहीं आता। हम सबने मिलकर इनका नाम ही ‘‘मीडिया समाचार’’ रख दिया है।
घर के बाहर आकर दरवाजा भीतर से बंद किया, चाबी खिड़की के भीतर डालते हुए अंदर आवाज दी... अजी सुनती हो.... ‘‘चाबी भीतर डाल दी है!’’ अंदरे से एक चुभती हुई आवाज निकली- ‘‘ मेरे सर पर मार देते?’’ काम-धाम तो कुछ करना नहीं बस दूसरों को परेशान करना।
मैंने वह आवाज सुनी-अनसुनी करते हुए मुंगेरीलाल की तरफ रुख किया बोलो तुम्हें क्या हो गया इतनी सुबह?
मुंगेरीलाल और ताव खा गया बोला- ‘‘चल बेटा आज तो तेरी भीतर भी धुलाई होनी है और बहार भी’’
मैंने उसकी तरफ शक की नजर से देखा.. प्रश्नवाचक चिन्ह की मुद्रा में उसको निहारा- ‘‘मैं...मैं...ने??
अच्छा..अ..अ..आ अब मिमियाने भी लगा तुमको सब पता है। तुम्ही हो वो....अभी थोड़ी देर में ही तुमको सब पता चल जायेगा।
मैंने ऊपर की ओर देखा अभी भी सूरज की लालीमा पूरब में नहीं दिखाई दे रही थी.. सेन्ट्रल पार्क का मैनगेट भी अभी तक नहीं खुला होगा। मुंगेरीलाल की तरफ देखते हुए भाई सुबह-सुबह मेरे से क्या गलती हो गई कि तुम इतने गुस्से में दिखाई दे रहे हो?
मुंगेरीलाल कुछ बोलता तभी पीछे से किसी ने आवाज दी.....जयश्री राम.....!! राधे....राधे....!!
हमदोंनो ने पीछे मुड़कर देखा रामप्रसाद जी मफ्लर, चादार ओढ़े चले आ रहें हैं... मैंने मौका देखते ही बात पलटने की चेष्टा की ‘‘क्यों रामप्रसादजी इतनी भी ठंड नहीं है कि आपको इतना ठंडा लग गया’’
रामप्रसादजी भी कहाँ मौका खोनेवाले थे मुझपर पलटवार करते हुए कहा- बस अब सूरज की किरण आकाश में चढ़ने दो सबको गर्मी आ जायेगी। राधे...राधे...
अब मुंगेरीलाल ने मेरा हिसाब लेना शुरू कर दिया - ‘‘ अच्छा ये बताओ ये अन्ना का आंदोलन तुमने क्यों किया था? मुझे रोज उसपर लिखने को क्यों कहता था?
भाई! वो तो दो साल पुरानी बात हो गई, इसबार तो हमने कोई आंदोलन-वांदोलन नहीं किया? यह अन्ना कहां से बीच में आगया आज?
खुद ही देख लो मैंने कहा था अन्ना से सावधान रहना!!! अब लो लोकपाल!! पूरा का पूरा लोकपाल बिल में चला गया.... अन्ना का अनशन..अन्ना का अनशन, सब दिखावा था। शेर को पीछे करने और चूहे को सामने लाने का। मजा लो अब! चूहे ने बिल खा लिया...।
मैं शर्मिंदा था। आज मुंगेरीलाल ने वह बात कह दी जो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मुझे पहली बार लगा कि मुंगेरीलाल को गुस्सा करने का हक बनता है। सुरज निकल चुका था.. लोगों का आना शुरु हो चुका था।
व्यायाम करते-करते मुझे अपनी धर्मपत्नी की भी याद आ गई। उन दिनों किस प्रकार मुझपर अन्ना का भूत सवार था। मैं उसकी एक बात सुनने को तैयार नहीं था। आज मुंगेरीलाल की बात सुनकर मुझे भीतर ही भीतर इतनी आत्मग्लानी हो रही थी कि कुछ बोले भी नहीं बन रहा था।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 9:21 pm 0 विचार मंच
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सोमवार, 16 दिसंबर 2013
गांधी परिवार तक सिमटती कांग्रेस?
जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव धार्मिक तुष्टिकरण के आधार पर नहीं लड़ा जा सकता। पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है।
कोलकाता से शम्भु चौधरी- पिछले माह पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव व इनके परिणामों पर विभिन्न विद्वानों के विश्लेषण से इस बात के संकेत प्राप्त होतें हैं कि कांग्रेस पार्टी में अब कार्यकर्ताओं की जगह नेताओं ने ले ली है। देश के चार राज्यों साम-दाम-दंड-भेद करने के बाद भी इनकी करारी हार ने ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है। यह परिणाम कांग्रेस की नीतियों और इनके बड़बोलेपन नेताओं को भी सबक है।
जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव धार्मिक तुष्टिकरण के आधार पर नहीं लड़ा जा सकता। पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है।
माहाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, छतिसगढ़, राजस्थान कुछ ऐसे राज्यों की सूची में आ चुके हैं जहाँ कांग्रेस के केन्द्रीय या राज्य के चन्द चापलूस-पदलोलुप नेताओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को सामने रख संगठन को हमेशा से नुकसान पंहुचाते रहे हैं। माहाराष्ट्र में जहाँ शरद पावर ने कांग्रेस से अलग होकर खुद को शक्तिशाली बना लिया तो बंगाल में ममता बनर्जी के कद को नीचा दिखाने व केन्द्र में रहने की मजबूरी ने इस पार्टी की जमीन ही बंगाल से हिला कर रख दी।
तमिलनाडु में पिछले 45 सालों से, बिहार और उत्तरप्रदेश में पिछले दो दशकों से, बंगाल में पिछले 35 सालों कांग्रेस पार्टी सत्ता से बहार हो चुकी है। पंजाब, कर्नाटक, आंध्रा, राजस्थान, असम, हरियाणा व देश के कुछ छोटे राज्यों में कांग्रेस अपनी स्थिति को किसी प्रकार बचा पाती है इसका कारण यह नहीं कि वहां इस पार्टी कर जनाधार मजबूत है। इसका कारण है कि अभी वहाँ जनता को कोई अच्छा विकल्प नहीं मिल पाया है। जबकि केरल व त्रिपुरा में माकपा का जनाधार कुछ हद तक कांग्रेस को टक्कर देती रही है।
कांग्रेस पार्टी के जो सोनिया के चापलुस नेतागण अपने ही राज्यों के मझले नेताओं के पर हमेशा से ही कुतरते रहे हैं इन लोगों ने ही सत्ता को अपनी जागीर बनाये रखने के लिए गांधी परिवार के सामने अपने घुटने टैकने का कार्य करते रहें हैं।
मजे कि बात यह है कि कांग्रेस पार्टी में इनके खुद की जमीन को मजबूत बनाने की जगह हवा में महल बनाने के लिए नींव रखी जाती रही है। दिल्ली के गलियारे तक सिमटती कांग्रेस पार्टी आज धीरे-धीरे राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस पार्टी का जनमत पर विश्वास न कर गांधी परिवार तक सिमटता जा रहा है।
इससे देश के अन्दर छोटी-छोटी ताकतें अपना सर उठाने में सफल रही है। देश का राजनैतिक परिदृश्य भी तेजी से बदलता जा रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम हमें चौंकाने वाले परिणाम से कांग्रेस पार्टी को पुनः सोचने के लिए विवश तो किया है साथ ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को देश में तीसरे विकल्प के रूप में जगह भी प्रदान कर दी है।
इसका विश्लेषण कांग्रेस पार्टी को अंततः करना ही चाहिए कि उनकी पार्टी किस दिशा में जा रही है? राज्य के नेताओं के पर्र कुतरने के बजाय यदि कांग्रेस पार्टी उनके कद को एक अनुशासन के अन्दर महत्व प्रदान करे और सत्ता प्राप्त करने की जल्दबाजी न कर अपने संगठन को महत्व दे तो संभवतः यह दल भारतीय राजनीति में अपनी पहचान पुनः बना पाएगी अन्यथा इसका हर्ष सिमटता चला जाऐगा।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 8:42 pm 0 विचार मंच
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व्यंग्य: हम हार नहीं मानगें? - शम्भु चौधरी
कुछ तो शर्म करो भाई! भाजपा ने दिल्ली में सरकार बना भी लेती या नहीं बनाई तो क्या हुआ? केजरीवाल को दे तो दिया सबने मिलकर अपना समर्थन। अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता से किये वादों को पूरा करे। सिर्फ छह महीने में बिजली-पानी का वादा हम भी देखते हैं कैसे पूरा करेंगें? हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। जबतक केजरीवाल को अपनी जाति में शामिल नहीं कर लेते, हम हार नहीं मानगें।
पास खड़े सीताराम जी मुंगेरीलाल की बात सुन कर थोड़े चिंतित नजर आने लगे। बीच में ही मुंगेरीलाल को टोकते हुए बोले- ‘‘यार बात तो सोचने की है, अब केजरीवाल को ही देखो समर्थन लेने के नाम पर भी अपनी शर्तें रख रहा है। गजब ही कर दिया बंदे ने’’ मेरे जीवन में तो ऐसा कभी नहीं सुना था। इतनी नैतिकता किस काम की? भले आदमी को थोड़ा तो समझौता करना ही चाहिए। अब ये घमंड ही तो है और इसको क्या कहें ?
अब सुबह का वातावरण धीरे-धीरे राजनीतिमय होने लगा। गोपालजी ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि मुझे तो लगता है इसमें भी कोई राजनीति है? केजरीवाल को सरकार बना लेनी चाहिए। राजनीति पार्टियों को समर्थन लेने की कीमत चुकानी पड़ती है परन्तु केजरीवाल को तो सब कुछ बिना शर्त बिलकुल मुफ्त मिल रहा है। कहावत हैं न ‘‘हल्दी लगे ना फिटकरी रंग चोखो आये’’ अब केजरीवाल को कुछ काम कर के दिखाना चाहिए।
हमारे कुछ मित्र राजनीति बहस होते देख धीरे-धीरे घिसकने लगे। अब हम चार ही बच गये थे सो बात करते-करते चाय की दुकान की तरफ हो लिए। चाय वाले के पास खड़े-खड़े बात ही कर रहे थे कि पास में ही युवकों की एक टोली खड़ी थी पहले तो वे लोग हमारी बातें सुनते रहे, फिर कुछ देर बाद उनमें से एक युवक थोड़ा ताव में आकर बोलने लगा। -
‘‘तो भाई सा’ब ये बीजेपी और कांग्रेस वाले ही मिलकर सरकार क्यों नहीं बना लेते? इनकी हर जगह आपस में मैच फिक्सड है। अब ये लोकपाल बिल को ही ले लिजिये? बीजेपी के वो क्या नाम है..... कुछ याद करते हुए... हां! जेटली जी सा’ब कहते हैं कि ‘‘संसद में लोकपाल बिल को बिना बहस के ही पास कर दिया जाए’’ भाई! मैं पूछता हूँ ये दोनों इतने उतावले क्यों दिखने लगे लोकपाल बिल को पास करने के मामले में? सोचना तो पड़ेगा ही दो विपरीत विचारधारा के ध्रुव जब एक दिखें तो दाल में काला तो जरूर है। हो ना हो देश में ग्रहण काल दिख रहा है।
तभी उनमें से एक दूसरा युवक बोलने लगा-
‘‘मुझे तो राहुल गांधी ज्यादा ईमानदार नजर आते हैं। बेचारा जो कुछ भी बोलता है सही बोलता है। दागी बिल में भी राहुल जी को उन लोगों ने वेबजह बकरा बना दिया। जब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने तो तय ही कर लिया था कि दागी अध्यादेश जल्दी से पास हो जाए तो बेचारे को बकरा क्यों बनाया मिलकर?
तभी तीसरा युवक सामने आया- हमें समझाने की लहजे में बोला ‘‘आरटीआई कानून से लेकर कोयला दलाली तक दोनों राजनीति दल सूर में सूर मिलाते नजर आतें हैं। क्यों ने दोनों ही मिलकर दिल्ली में सरकार बना लेते?’’
अब मुंगेरीलाल से रहा नहीं गया। बीच में ही टोकते हुए कहे ये सब तो ठीक है पर केजरीवाल को तो मौका हाथ से गँवाना नहीं चाहिए?
हम तो गंवारू लोग हैं, हमें तो बस यही समझ में आता है कि कैसे भी हो सरकार बना लो बस। जनता का वादा पानी, बिजली से हमें अब क्या लेना-देना वैसे भी केजरीवाल को कौन सा 5 साल सरकार चलानी है। 6 माह के बाद चुनाव करवाना तो होगा ही? अभी तो सरकार बना ही लेनी चाहिए’’ - क्यों कोई गलत बात हो तो बताओ?
मेरे से तब रहा नहीं गया। मैंने उनसे पूछा मेरी एक बात समझ में नहीं आती ये अन्ना को क्या हो गया जो उनको अचानक से ये अनशन की क्या सूझी, मुझे तो इनके अनशन के समय और इनके बयान पर भी शंका नजर आने लगी।
मुंगेरीलाल अब आपे से बहार हो गए- बोले जो भी हो जैसा भी हो बस अब संसद को चलने भी दो यार मिलकर जब दोनों बड़ी पार्टियां काम करती हैं तो इसमें देश का भला ही तो है। आप लोगों को बस बात बनानी आती है। बेबजह हर बात में अंगूली करना आदत सी बन गई है।
देश की दो बड़ी राजनीति पार्टी देश हित में लगातार फैसलों पर फैसला लिये जा रही है। चार साल संसद को जम कर लूटा, देश को मिल बांट कर लूटा। अब चुनाव का समय आया और फैसले लेने में लगी है तो भी इनके ऊपर सवाल पर सवाल किये जा रहे हो!! कुछ तो शर्म करो भाई! भाजपा ने दिल्ली में सरकार बना भी लेती या नहीं बनाई तो क्या हुआ? केजरीवाल को दे तो दिया सबने मिलकर अपना समर्थन। अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता से किये वादों को पूरा करे। सिर्फ छह महीने में बिजली-पानी का वादा हम भी देखते हैं कैसे पूरा करेंगें? हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। जबतक केजरीवाल को अपनी जाति में शामिल नहीं कर लेते, हम हार नहीं मानगें।
प्रकाशक: Shambhu Choudhary Shambhu Choudhary द्वारा 4:24 am 0 विचार मंच
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